अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाईं किन्नर कल्याण योजनाएं

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को बदलने वाली सरकारी योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पाईं। केंद्र सरकार द्वारा पिछले पांच वर्षों के दौरान बजट के रूप में आवंटित भारी भरकम धनराशि प्रशासनिक लापरवाहियों के कारण खर्च ही नहीं हो सकी?

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डॉ. रमेश ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार

 

ट्रांसजेंडर समुदाय के जीवन को बदलने वाली सरकारी योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पाईं। केंद्र सरकार द्वारा पिछले पांच वर्षों के दौरान बजट के रूप में आवंटित भारी भरकम धनराशि प्रशासनिक लापरवाहियों की वजह से खर्च ही नहीं हो सकी? प्रत्येक वर्ष का पैसा वापस जाता रहा, जबकि किन्नरों को भी मुख्यधारा से जोड़ने को केंद्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रयास हुए थे। अगर ईमानदारी से पूरा पैसा खर्च किया जाता, तो किन्नर समुदाय में भारी बदलाव आया होता। 

सरकार-समाज ये दोनों वर्ग अच्छे से परिचित हैं कि किन्नरों को हमेशा से सामाजिक स्वीकार्यता से दूर रखा गया है। ट्रांस जेंडरों की संख्या भारत में लगभग छह लाख के आसपास है। पिछली जनगणना में 4,87,803 संख्या सामने आई थी। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 1,37,465 किन्नर रहते हैं। विकसित होते समाज में भी ये समूची आबादी अब भी हाशिए पर है।

हाल में संपन्न हुए संसद सत्र में इसी मुद्दे को सांसद संजय सिंह से राज्यसभा में पुरजोर तरीके से उठाकर व्यवस्था तंत्र का ध्यानाकर्षण करवाया, तभी केंद्र सरकार ने नए सिरे से समीक्षा करने का मन भी बनाया है। समाज के दूसरे पारंपरिक समुदायों के मुकाबले ट्रांसजेंडर भी तरक्की करें।

देश के विकास की मुख्यधारा में लोगों के साथ कदमताल मिलाएं, इसे ध्यान में रखकर ही इनके कल्याण के लिए तमाम सारी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का शुभारंभ किया गया था। प्रत्येक वर्ष करोड़ों का बजट आवंटन होना आरंभ हुआ, लेकिन दुर्भाग्य किसी भी साल पूरी धनराशि किन्नर कल्याण पर खर्च नहीं हुई। पैसा खर्च नहीं होना, निश्चित रूप से बड़ा मजाक ही कहा जाएगा।

पिछले 4-5 वर्षों में आवंटित धनराशि पर गौर करें, तो महसूस होगा कि वास्तव में कितना बड़ा विश्वासघात किन्नरों के साथ किया गया? काविड-19 के बाद साल 2021-22 के केंद्रीय बजट में ट्रांसजेंडरों के लिए 20 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसमें मात्र एक करोड़ 91 लाख ही खर्च हुए।

यानी केवल 9.55 फीसदी धन खर्च हुआ। बाकी पैसा फिर से वापस चला गया। 2022-23 में इस धनराशि में इजाफा किया गया। 20 के जगह 30 करोड़ आवंटित हुए, लेकिन उसे भी खर्च नहीं किया गया। मात्र 12 लाख खर्च हुए। संपूर्ण धनराशि का केवल आधा फीसदी ही? उसके बाद साल 2023-24 में और बढ़ोतरी करके 52 करोड़ 91 लाख रुपये किन्नर कल्याण कोष को दिए।

दुर्भाग्यवश वह पैसा भी खर्च नहीं हुआ? सिर्फ छह करोड़ 59 लाख खर्च हुए। यानी 12.45 फीसदी। 2024-25 में 68 करोड़ 46 लाख रुपये आवंटित किए, जिनमें भी केवल पांच करोड़ 14 लाख रुपये ही खर्च हुए। सिर्फ 7.5 फीसदी ही विभाग खर्च कर पाया। ये मजाक नहीं तो और क्या है?

किन्नर कल्याण योजना क्यों फिसड्डी साबित हुई? जवाबदेही किसकी है? ये बहस का बड़ा मुद्दा हो सकता था, लेकिन सामाजिक विमर्श से बाहर है। इसे प्रशासनिक सुस्ती कहें या सामाजिक बहिष्कार? कभी ऐसा प्रतीत होता है कि किन्नर-विकलांग जैसे लोगों के लिए योजनाएं जमीनी हकीकत को समझे बिना बनाई जाती हैं। ऐसे आयोगों में प्रमुख भी उन्हीं के बीच से होने चाहिए, जिससे लक्षित लाभार्थियों तक योजना पहुंच सके। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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