नदी जो पत्थरों पर करती है अनोखी चित्रकारी... बांदा का शजर पत्थर दुनिया को दे रहा है प्रकृति का जादू
कानपुरः मध्य प्रदेश का पन्ना जिला अगर हीरों के लिए मशहूर है, तो उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड का बांदा जिला शजर पत्थर के प्राकृतिक खजाने के लिए प्रसिद्ध है। यहां केन नदी में पाए जाने वाले इस दुर्लभ और कीमती रत्न से एक से बढ़कर एक गहने और सजावटी सामान बनाए जाते हैं। ‘शजर’ पर्शियन शब्द है, जिसका अर्थ पेड़ होता है। यह नाम इस पत्थर को इसी कारण मिला, क्योंकि इसमें पेड़ जैसी प्राकृतिक आकृतियां बनी होती हैं। अपनी अनूठी प्राकृतिक तस्वीरों के कारण ही इसे पहचाना भी जाता है।
शजर पत्थर लाखों साल पुराने जीवाश्मों से बना होता है। इसका निर्माण कैपिलरी एक्शन प्रक्रिया से होता है, जिसमें पिघला हुआ खनिज पत्थर की दो कठोर पर्तों के बीच ठंडा होकर फैलता है। इससे पत्थर में कुदरती तौर पर पेड़, पत्तियां, मोर, चंद्रमा, फूल या मानव आकृतियां बन जाती हैं। शजर पत्थर, एक प्रकार का सेमी-प्रेशियस पत्थर है। कुछ लोग इसे हकीक पत्थर का ही एक प्रकार भी मानते हैं, जबकि अंग्रेजी में इसे ‘डेंड्रिटिक एगेट’ नाम से पुकारा जाता है। आमतौर पर यह पत्थर सफेद, भूरे, काले और हल्के गुलाबी रंगों में मिलता है। केन नदी की तलहटी में पाए जाने वाले शजर पत्थर की विशेषता इसमें दिखाई देने वाले पेड़-पौधों जैसे प्राकृतिक चित्र होते हैं, जो इन्हें अन्य पत्थरों से अलग बनाते हैं। ये चित्र पत्थर में पाए जाने वाले खनिजों के कारण प्राकृतिक रूप से बनते हैं, इसी कारण इन्हें प्राकृतिक कला भी कहा जाता है। वास्तव में शजर पत्थर शिल्प कला प्रकृति और हुनर का वह अद्भुत संगम है, जिसमें एक नदी अपने पत्थरों पर खुद चित्रकारी करती है।
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17 वीं सदी में शजर की खूबियों को दुनियाभर ने पहचाना
ऐसा माना जाता है कि केन नदी में शजर पत्थर हमेशा से पाए जाते थे, लेकिन इनकी असल पहचान 17 वीं शताब्दी में तब हुई, जब अरब से आए लोगों ने इन पत्थरों की खूबियां पहचानी। वह लोग शजर पत्थर में बनी आकृतियां देखकर आश्चर्यचकित रह गए। पत्थर पर प्राकृतिक रूप से पेड़, पत्तियां और अलग-अलग तरह की आकृतियां देखकर उन्होंने इसका नाम ‘शजर’ रख दिया। शजर का मतलब पर्शियन में पेड़ होता है। मुगल शासनकाल में शजर पत्थर की अहमियत काफी बढ़ गई। मुगलों के समय में इस कला को बहुत प्रोत्साहन मिला। शजर पत्थर का इस्तेमाल राजदरबार में कीमती वस्तुएं बनाने और सजावट के लिए किया जाने लगा। एक समय में ईरान, मिस्त्र, अफगानिस्तान जैसे देशों में शजर पत्थर की खासी मांग थी। इसका मुख्य कारण इसका अद्भुत स्वरूप था। वहां इस पत्थर को पवित्र और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
क्वीन विक्टोरिया ले गई थीं शजर मुस्लिम देशों में भी खासी मांग
देश में जिस समय ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था, उस समय ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरिया के लिए दिल्ली के दरबार में एक नुमाइश लगाई गई थी। इसमें रानी विक्टोरिया को शजर पत्थर इतना ज्यादा पसंद आया था कि वह इसे अपने साथ ब्रिटेन ले गईं। दुनियाभर में खासकर मुस्लिम देशों में शजर पत्थर की खासी मांग रहती है। मुसलमानों के बीच इस पत्थर का विशेष महत्व है। वह इसे कुदरत का नायाब तोहफा मानते हैं और इस पर कुरान की आयतें तक लिखवाते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि मक्का जाने वाले हज यात्री इस पत्थर को अपने साथ लेकर जाते हैं। इसी तरह कुछ लोगों की आस्था है कि इस पत्थर को पहनने से बीमारियां दूर भागती हैं।
इंसानों की तरह कोई दो पत्थर एक जैसे नहीं होते
शजर पत्थर पूरी दुनिया में सिर्फ तीन स्थानों पर पाया जाता है। भारत में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के अलावा मोन्ताना, ब्राजील तथा रूस में इसकी उपलब्धता मिलती है। इन पत्थरों की खास बात यह है कि ये खुद अपनी चित्रकारी करते हैं, लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस तरह दुनिया में कोई दो इंसान तमाम मानकों पर एक जैसे नहीं होते हैं, उसी तरह कोई भी दो शजर पत्थर एक तरह के नहीं होते।
मान्यता और वैज्ञानिक तथ्य
ऐसी मान्यता है कि शजर पत्थर पर आकृतियां उस समय उभरती हैं, जब शरद पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की किरणें इस पत्थर पर पड़ती हैं। ऐसे में पत्थरों और किरणों के बीच में जो भी आकृति आती है, वही इन पत्थरों पर उभर जाती है। हालांकि वैज्ञानिक तथ्यों के मुताबिक शजर पत्थर पर उभरने वाली प्राकृतिक आकृति वास्तव में फंगस ग्रोथ होती है।
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हस्तशिल्प की अनूठी पहचान
केन नदी में मिलने वाला शजर पत्थर न केवल बांदा क्षेत्र की संस्कृति का प्रतिबिंब है, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प की अनूठी पहचान है। यह पत्थर अपनी शिल्प कला, ऐतिहासिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पूरी दुनिया में विशिष्ट स्थान रखता है। शजर पत्थर शिल्प स्थानीय कारीगरों की आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत है। बांदा और उसके आसपास के शिल्पकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कला को जीवित रखे हुए हैं। वह इस पत्थर से खूबसूरत आभूषणों को तैयार करते हैं, जो न केवल देखने में आकर्षक होते हैं, बल्कि सांस्कृतिक महत्व भी रखते हैं। शजर पत्थर की उपलब्धता यहां के कारीगरों की आजीविका का साधन होने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के विकास में भी योगदान कर रही है। सरकार ने एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना के तहत यहां के इस अद्वितीय शिल्प को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए खासी पहल की है, जिससे स्थानीय कारीगरों की माली हालत में सुधार आने के साथ उनकी कला को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित और सुरक्षित करने में मदद मिली है।
विरासत को सहेजने जैसा है, इन्हें पसंद करना
बांदा के हुनरमंद शिल्पकारों द्वारा तराशा गया शजर पत्थर अब जीआई टैग प्राप्त उत्पाद होने के साथ प्रदेश के हस्तशिल्प परिपथ का गौरव भी है। जब कोई इन नायाब पत्थरों को अपनी पसंद बनाता है, तो एक प्रकार से वह वैश्विक विरासत को भी सहेजता है। प्रकृति के उपहार जैसा यह पत्थर मानव जाति के लिए भौगोलिक मूल्य वाला एक भूवैज्ञानिक आश्चर्य भी है।
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मेहनत और धैर्य से भरी शिल्प निर्माण की प्रक्रिया
शजर पत्थर शिल्प की प्रक्रिया काफी मेहनत और धैर्य से भरी होती है। इसके कई चरणों में तैयार किया जाता है। सबसे पहले केन नदी से पत्थर एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद इन पत्थरों को आवश्यक आकार में काटा और तराशा जाता है। अगली प्रक्रिया पॉलिशिंग की होती है, जिसमें पत्थरों को चमकाया जाता है। इसी दौरान पत्थरों पर नक्काशी या उनकी प्राकृतिक डिजाइन को उभारने का काम किया जाता है।
कौन से बनते हैं उत्पाद
गहनों में हार, अंगूठी, झुमके, बाली और कंगन के साथ सजावटी सामान में फूलदान, पेपरवेट, मूर्तियां व तस्वीरों के फ्रेम, शिवलिंग, मंदिर आदि बनते हैं।
पर्यावरण मित्र उत्पाद
यह शिल्प बांदा के हजारों शिल्पकारों के लिए रोजगार का साधन है। यह क्षेत्रीय संस्कृति और परंपरा को संरक्षित रखता है। प्राकृतिक पत्थरों से बनाए गए उत्पाद पर्यावरण के लिए हानिरहित होते हैं। शजर पत्थर शिल्प अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी अपना स्थान बना चुका है।
आधुनिक तकनीक प्रशिक्षण और प्रोत्साहन की जरूरत
वर्तमान में शजर पत्थर शिल्प को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केन नदी में पत्थरों की उपलब्धता सीमित होने से कच्चे माल की कमी हो रही है। शिल्पकारों के पास आधुनिक उपकरणों के साथ तकनीक की कमी है। छोटे शिल्पकारों को अपने उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में अक्सर कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसे देखते हुए शिल्पकारों का कहना है कि सरकार को इस कला के प्रोत्साहन के लिए योजना बनानी चाहिए। आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। शजर पत्थर शिल्प को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के लिए प्रदर्शनियां आयोजित करने के साथ ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ा जाना चाहिए। शजर पत्थर को तराशने वाले कारीगरों का कहना है कि सरकार से पर्याप्त सुविधाएं, बाजार व वित्तीय मदद मिलने से शजर आभूषणों का सौंदर्य चमकने में देर नहीं लगेगी। शजर पत्थर शिल्प देश की अप्रतिम धरोहर है। यह केवल एक कला नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, और मानव श्रम का अद्भुत संगम है। अगर इसे सही दिशा और समर्थन मिले, तो इसमें कोई शक नहीं कि यह शिल्प अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक ख्याति अर्जित कर सकता है।
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कमान और सिलिकान से कटान घिसाई के बाद चमकाने का काम
शजर पत्थर को तराशने का काम कुशल कारीगरों द्वारा परंपरागत तरीके से किया जाता है। इसके लिए धनुष की आकृति वाली लकड़ी में स्टील का तार बंधा जाता है, जिसे कमान कहते हैं। शजर पत्थर को लकड़ी के स्टैंड में रखकर कमान और सिलिकान कार्बाइड पाउडर की मदद से दो से चार सेंटीमीटर की पतली पट्टिकाओं में काटा जाता है। इसके बाद ग्राइंडर से घिसकर चिकना करने के बाद जब इस पर पालिश की जाती है, तो प्राकृतिक तस्वीरें जैसे पेड़, शाखाएं, पत्तियां, त्रिशूल, ऊंट व बत्तख आदि की आकृति उभरकर सामने आ जाती है और पत्थर को देखने से ऐसा लगता है कि जैसे कैमरे से फोटो खींचे गए हो। शजर पत्थर से बने आभूषण और सजावटी सामान की कीमत 300 से लेकर 25,000 रुपये तक होती है।
-मनोज त्रिपाठी, कानपुर।
