नदी के दो किनारे: पुरानी दोस्ती, अधूरी कहानी और जिंदगी की हकीकत
गोंडाः चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट। लखनऊ से दिल्ली होते हुए बेंगलुरु की उड़ान। चेकिंग से निकलकर लोग अपनी सीट पर बैठने लगे। चेक कराकर जैसे ही इरा आगे बढ़ी, आकाश आगे जाते हुए दिखा। उसने अपना चश्मा साफ किया। फिर देखा- हां, आकाश ही है। वह आगे बढ़ी, तब तक आकाश विमान के अंदर हो चुका था। उसने अपनी सीट का नंबर देखा। उसी के बगल की सीट। आगे बढ़कर कहा- “हेलो आकाश!” आकाश भी इरा को सामने देख चौंककर खड़ा हो गया। अभिवादन किया। दोनों तीन वर्ष बाद मिल रहे थे। साथ-साथ आईआईटी कानपुर से बीटेक किया था। दोनों के चेहरे पर प्रसन्नता नाच उठी। बैठते ही दोनों ने अपने मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान किया। “अरे यह तो वही पुराना नबंर है।” इरा बोल पड़ी। “हां, मैंने नंबर नहीं बदला है।” आकाश का चेहरा लाल हो गया।
“कहो आकाश! इन तीन वर्षों में क्या करते रहे?” “कानपुर छोड़ने के बाद मैं दिल्ली आ गया। यहीं रहकर आईएएस की तैयारी करता रहा।” “अरे! कल ही तो परिणाम आया है।” “हां, निकल गया है।” “तो तुम आईएएस हो गए। तुम्हारी मां का सपना पूरा हुआ। एक ही बार तो मिली थी उनसे। तुम्हें बधाइयां मिल रही होंगी। मेरी ओर से भी बधाई!” कहकर इरा हंस पड़ी। “थोड़ी सफलता मिलने पर लोग बधाई देते ही हैं।” पर इन तीन वर्षों में तुमने क्या किया इरा?” “मैंने अनुसंधान के क्षेत्र में जाने को सोचा। इस समय इसरो, बेंगलुरु में हूं।” “तुमने ठीक किया।”
“और तुमने?” मैंने, घर-परिवार और अपनी इच्छा से इस तरह प्रेरित हुआ कि तीन वर्ष लगातार सबकुछ भूलकर पढ़ाई में लगा रहा। दो बार उत्तीर्ण होते-होते रह गया। कभी-कभी मन भी विचलित हो जाता। मेरे बाबा ने उच्च शिक्षा में एक लंबा समय बिताया है। जब कभी घर जाता, उनसे मिलता। वे खुश होते पर कहते-“ बेटा, तीन-चार वर्ष से अधिक समय इस परीक्षा में मत देना। जीवन में अनेक कार्य हैं, जिन्हें करते हुए आप आगे बढ़ सकते हैं। आईएएस ही कोई अंतिम विकल्प नहीं है। यह संयोग ही कहिए कि तीसरे वर्ष मैं निकाल ले गया।”
“इस पर बाबा भी बहुत खुश हुए होंगे?” इरा बोल पड़ी। “उनको खुश होना ही था। पर, वे बहुत संयत रहते हैं। उनकी खुशी भी संयत होती है। हम लोगों की तरह हवा महल नहीं बनाते।” “अनेक वैज्ञानिक तो हवा महल बनाते ही आगे बढ़े।” इरा मुस्करा उठी। चश्मा उतारकर फिर साफ किया। “हवा महल बनाने में जोखिम भी है। यदि सफलता मिल गई तो वैज्ञानिक बन जाओगे। यदि नहीं मिली तो कूड़ा समझकर फेंक दिए जाओगे।” आकाश ने समझाया। “ठीक कहते हो। सामान्य परिवार जोखिम लेने से डरता है। जोखिम से डरने वाले कोई आविष्कारक भी नहीं बन पाते।” इसी बीच काफी आ गई। दोनों काफी की चुस्की लेते हुए बात करते रहे। “हमारी शिक्षा में भी जोखिम उठाने की सीख कहां दी जाती है! सभी को मध्यम मार्ग अपनाने की सलाह दी जाती है।” इरा कहती रही। “तुम्हारी यह बात बिल्कुल सच है। हम अधिकतर औसत उत्पन्न करते हैं। कोई बड़ा आविष्कारक क्या कभी स्कूल का टाॅपर रहा?” “यही तो त्रासदी है। तभी तो लोग कहने लगे कि स्कूल मर चुके हैं।” “ईवान ईलिच और उनके सहयोगी तो और भी बहुत कुछ कहते हैं।” “लेकिन स्कूल यदि बंद कर दिए जाएं तो बेसिक कौन सिखाएगा? बिना भाषा-गणित आदि का आधार तैयार किए कोई आगे कैसे बढ़ पाएगा?” “यह तो है ही। स्कूलों को बंद नहीं किया जा सकता, भले ही वे औसत गढ़ रहे हों।” “समाज को औसत की जरूरत भी अधिक होती है।” “यह भी सच है।” “अरे, पन्द्रह मिनट बाद तुम दिल्ली उतर जाओगे। मुझे दक्षिण की राह पकड़नी होगी।” “ओह, मुझे भी समय का ध्यान ही न रहा। एक सेल्फी।” “अवश्य। जरूरी है यह।” दोनों अपनी मोबाइल से सेल्फी लेते हैं। “चलो, बहुत अच्छा हुआ, नहीं तो हम बातों में भूल ही जाते।” “एक बात बताएं आकाश। आईआईटी में साथ पढ़ते हुए तुमसे एक लगाव हो गया था। मैं उसे कोई नाम नहीं दे सकती।” “मुझे भी तुम बहुत अच्छी लगती थी। तुम्हारी शालीनता मुझे आकर्षित करती थी।” “कानपुर छोड़ने के बाद मैं तुम्हें बहुत मिस करती थी पहले साल। मैंने जब भी फोन मिलाया, तुम्हारा फोन स्विच ऑफ स्विच ऑफ...।” आईएएस की तैयारी के चक्कर में मैं अपना फोन स्विच ऑफ रखता था।” “कॉल बैक तो कर सकते थे?” “हां, कर सकता था। पर, नहीं किया। अपने को घरौंदे में सीमित कर लिया, बिल्कुल पिंजरे का पंछी।” कहते-कहते आकाश की आंखें भर आईं। इरा भी विचलित हो उठी। अपने को संभालने की कोशिश में भी कुछ बूंदे आंखों में उभर ही आईं। “मैं आईएएस जरूर हो गया पर बहुत कुछ छूट भी गया।” “कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है। हम चौराहे से चारों ओर नहीं जा सकते। किसी एक रास्ते पर चलेंगे तो अन्य रास्ते छूट ही जाएंगे।”
“यही सच है।” “मैं तुम्हें एक बात बताऊं?”
“बताओ।” “आश्चर्य तो नहीं करोगे?”
“कह नहीं सकता।” “आश्चर्य करना तो ठीक है, पर दुःखी मत होना।” “क्या ऐसी कोई बात है?” “हां, ऐसी ही है। तुम बहुत उत्सुक हो उठे न?” “तुम बात ही इस तरह कर रही हो।” “हां, बात ही ऐसी है। जानते हो आकाश, जब तुम्हारा फोन कभी नहीं उठा, कभी तुमने काॅल बैक भी नहीं किया, मैं तुमसे घृणा करने लगी। क्या नेह का विपर्यय घृणा...” कहते-कहते इरा भावुक हो उठी। रूमाल निकाला। आखों में उभरी बूंदों को साफ किया।
“यदि नेह का विपर्यय घृणा है, तो घृणा का विपर्यय नेह भी तो हो सकता है।” आकाश ने इरा को सामान्य करने की कोशिश की। “हो सकता है पर, तुमसे भेंट न होती तो बिल्कुल नहीं हो सकता था।”
“पर अब?” “अब हम दोनों, नदी के दो किनारे हैं। धरती और आकाश के बीच का क्षितिज। लगता है कि धरती और आकाश दोनों क्षितिज पर मिले हुए हैं, निकट ही हैं। पर, ज्यों-ज्यों हम क्षितिज की ओर बढ़ते हैं, वह दूर होता जाता है। हमें कोई भी निर्णय सोच-विचार कर लेना चाहिए, भावुकता में नहीं। आखिर हम लोगों ने पढ़-लिख कर क्या सीखा? पति-पत्नी संबंध ही अंतिम नहीं है। हम लोगों ने पढ़ा है- द्रुपद, द्रौपदी का विवाह कृष्ण जी से करना चाहते थे। सलाहकारों ने बताया था कि वही द्रोणाचार्य का वध कर सकते थे। कृष्ण जी ने द्रौपदी से मिलकर आश्वस्त किया- मैं पति तो नहीं बन सकता पर, भाई बनकर आजीवन तुम्हारे साथ रहूंगा। कौन कह सकता है कि उन्होंने भाई का दायित्व नहीं निभाया?”
“तुम प्रशासकीय कार्यों में जाने कहां-कहां रहोगे!” “और तुम?”
“हमारा कार्यक्षेत्र इसरो के परिक्षेत्र में ही रहेगा। तुम्हें एक सुयोग्य साथी मिले, इसकी कामना है। हां, जब कभी बंधन में बंधना, मुझे सूचित अवश्य करना। मैं कहीं भी रहूंगी, पहुंचने की कोशिश करूंगी।” जैसे ही आवाज गूंजी— देवियो और सज्जनो! इंडिगो की ओर से दिल्ली में आपका स्वागत है, दिल्ली उतरनेवाले यात्री सजग होने लगे। बेंगलुरु जानेवाले यात्री कुछ बैठे रह गए, कुछ उतरकर दिल्ली एयरपोर्ट का आनंद लेने लगे। आकाश सबसे बाद में उठा। इरा ने उसे विदा किया। खिड़की से आकाश को जाते देखती रही। जैसे ही आकाश ओझल हुआ, उसने अपना पैड निकाला और अपने प्रोजेक्ट पर काम करने लगी।
-सूर्यपाल सिंह, गोण्डा
