"मैं जीना नहीं चाहता...," ड्रॉप ईयर के तनाव ने छात्रों को डिप्रेशन में धकेला

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊः रात के 11 बज गए हैं। अब तो आधी दुनिया सो चुकी होगी और कई लोग सोने की तैयारी में होंगे, लेकिन मैं... मैं सुबह होने के इंतजार में बिस्तर पर पड़ा हुआ हूं। घर वालों के लिए तो मैं पढ़ाई कर रहा हूं, लेकिन सच कहूं तो मेरी जिंदगी मजाक बन गई है। अब तो जीने का दिल भी नहीं करता। मेरा दर्द कोई समझ नहीं सकता। यहां कोई भी मेरा अपना नहीं है। मैं बाहर से जितना कठोर दिखता हूं अंदर से उतना ही टूट चुका हूं। अब किसी से बात करने का दिल नहीं करता। बस एक ही डर सताता है, एक साल मैंने ड्राप तो कर लिया, परंतु यदि मेरा रैंक अच्छा नहीं आया और एक अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिला तो क्या करूंगा? सब हंसेंगे। रिश्तेदार और दोस्त सब मजाक उड़ाएंगे। ऊपर से घरवाले ताने देंगे, सो अलग। मेरा दिमाग अब और दबाब नहीं सह पा रहा। मैंने मेहनत की है, लेकिन सबको सिर्फ मंजिल हासिल करने से मतलब है, मंजिल का सफर मैं कैसे तय कर रहा हूं इससे किसी को कोई मतलब नहीं। मैं यह सारी बातें किसी अपने के साथ साझा करना चाहता हूं, लेकिन किसके साथ? मुझे तो कोई नजर नहीं आ रहा, जो मेरी तकलीफ को सुने।

इसी बोझ तले राहुल हर दिन तनाव में रहने लगा था। राहुल के घर में उसकी बहन, माता-पिता सब थे, लेकिन फिर भी राहुल का दर्द कोई महसूस नहीं कर पा रहा था। इसी कारण राहुल अपनी बातों को छुपाए रखता था। दिन में राहुल लाइब्रेरी जाया करता था, लेकिन वहां भी किसी से कोई बात नहीं करता और घंटों अकेला बैठा रहता था। लाइब्रेरियन राहुल की हरकतों को रोज देखता। कई बार उसने राहुल से पूछना चाहा, लेकिन राहुल हर बार की तरह टाल दिया करता था।

एक दिन राहुल लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई कर रहा था। थोड़ी देर बाद उसके सर में तेज दर्द होने लगा। लाइब्रेरियन, जिसका नाम रमेश था एक भला इंसान था, जिसने तुरंत उसे हास्पिटल पहुंचा दिया। क्योंकि रमेश, राहुल को काफी दिनों से थका हारा सा देख रहा था इसलिए उसने तुरंत राहुल को मनोचिकित्सक के पास पहुंचा दिया। मनोचिकित्सक रमेश का दोस्त था। रमेश ने मनोचिकित्सक को वह सब बताया जो वह जानता था। मनोचिकित्सक कुछ-कुछ समझ गया। उसने राहुल से एक बंद कमरे में बातचीत करना शुरू किया। तब राहुल को महसूस हुआ कि कोई है, जो मेरी बातों को सुन सकता है और समझ भी सकता है। राहुल ने धीरे-धीरे मनोचिकित्सक को वह सब कह सुनाया, जो राहुल कई महीनों से महसूस करता आ रहा था। दरअसल, 17 साल का राहुल डिप्रेशन का शिकार हो चुका था।

मनोचिकित्सक ने रमेश से कहा कि वह राहुल के घरवालों को यहां बुलाए ताकि उनसे भी राहुल के बारे में कुछ और जानकारी हासिल की जाए। राहुल के घरवालों के आते ही उनसे विस्तार से चर्चा की गई। मनोचिकित्सक ने कुछ दवाइयां लिखीं और इसके साथ ही घरवालों को राहुल पर किसी भी तरह का दबाब न डालने की सलाह भी दी।

अब राहुल के घरवाले भी राहुल का ज्यादा ध्यान रखने लगे। राहुल को कभी भी अकेला नहीं छोड़ते थे और न ही पढ़ाई या अन्य किसी चीज़ का दबाब डालते थे। धीरे-धीरे राहुल ठीक महसूस करने लगा और खुश रहने लगा। अब राहुल बिना तनाव के पढ़ाई करने लगा था और खुशी की बात यह भी थी कि उसने रैंक भी बेहतर  हासिल किया, जिसके परिणामस्वरूप उसका दाखिला अच्छे संस्थान में हो सका। यदि उस दिन रमेश सही निर्णय नहीं लेता तो आज राहुल के साथ कुछ भी अप्रिय घटित हो सकता था। जीवन में ऐसी कोई भी समस्या नहीं है, जिसका कोई हल न हो। बस जरूरत होती है, तो समस्या की पहचान करने की और किसी को समझने की, हल तो अपने आप निकल आता है। न जाने दुनिया में ऐसे कितने राहुल हैं, जो कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन कह नहीं पाते। हमें राहुल जैसे अन्य लोगों के दर्द को पहचानना है और समझना है ताकि समय रहते उनका सुनहरा जीवन उन्हें वापस लौटा सकें।

-शिवालिक अवस्थी

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