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                <title>Special - Amrit Vichar</title>
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                            <item>
                <title>Nissan ने लॉन्च की नई SUV, कीमत 10.49 लाख से शुरू; Safety से लेकर फीचर्स तक देगी बड़ी SUVs को टक्कर!</title>
                                    <description><![CDATA[बरेली में नई Nissan Tekton पेश; दमदार SUV डिजाइन, 6 एयरबैग, Google Built-in, दो टर्बो-पेट्रोल इंजन और 18.59 लाख रुपये तक की कीमत के साथ बाजार में एंट्री]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590971/nissan-tekton-launched-price-features-bncap-adas-engine"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/nissan-tekton.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मिड-साइज एसयूवी सेगमेंट में मुकाबला और कड़ा करने के लिए निसान ने अपनी नई एसयूवी टेकटन को बरेली में पेश कर दिया है। नाथ निसान शोरूम में हुई लॉन्चिंग के साथ कंपनी ने इसे दमदार डिजाइन, आधुनिक तकनीक, आराम और सुरक्षा के बेहतर पैकेज के तौर पर उतारा है। एसयूवी का डिजाइन निसान की चर्चित पेट्रोल एसयूवी से प्रेरित है, जो इसे सड़क पर मजबूत और प्रीमियम लुक देता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong><em>अट्रैक्टिव डिजाइन</em></strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">निसान टेकटन का एक्सटीरियर आधुनिक एसयूवी खरीदारों की पसंद को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसका फ्रंट लुक कंपनी की फ्लैगशिप एसयूवी निसान पेट्रोल से प्रेरित है। बड़ी फ्रंट ग्रिल, शार्प एलईडी हेडलाइट्स, वर्टिकल एलईडी डीआरएल और रोशन निसान लोगो इसे प्रीमियम पहचान देते हैं। बोनट पर उभरी हुई मस्कुलर लाइनों के साथ बड़े अक्षरों में उकेरा गया टेकटन बैज इसकी अलग पहचान बनाता है। चौड़े व्हील आर्च, रूफ रेल, ऊंचा ग्राउंड क्लीयरेंस और बॉक्सी सिल्हूट इसे मजबूत रोड प्रेजेंस प्रदान करते हैं। पीछे की ओर कनेक्टेड एलईडी टेललाइट्स और स्पोर्टी बंपर इसकी स्टाइलिंग को और आकर्षक बनाते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong><em>सुरक्षा में कोई समझौता नहीं</em></strong></span></h5>
<p style="text-align:justify;">निसान ने टेकटन को सुरक्षा के लिहाज से भी मजबूत बनाने की कोशिश की है। सभी वेरिएंट में छह एयरबैग, इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल (ESC), हिल स्टार्ट असिस्ट, ट्रैक्शन कंट्रोल, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम (TPMS), फ्रंट और रियर पार्किंग सेंसर तथा सभी सीटों के लिए तीन-पॉइंट सीट बेल्ट स्टैंडर्ड रूप से दिए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">टॉप वेरिएंट Tekna+ में लेवल-2 ADAS तकनीक भी उपलब्ध है। इसमें अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल, ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, लेन कीप असिस्ट, ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग और फॉरवर्ड कोलिजन वार्निंग जैसी आधुनिक सुरक्षा प्रणालियां शामिल हैं, जो लंबी यात्रा और हाईवे ड्राइविंग को अधिक सुरक्षित बनाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/nissan-tekton-(1).png" alt="Nissan Tekton (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><em><strong>BNCAP टेस्ट में बच्चों की सुरक्षा का भी मिला भरोसा</strong></em></span></h5>
<p style="text-align:justify;">क्रैश टेस्ट में टेकटन ने बच्चों की सुरक्षा के मामले में भी प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। भारत न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम (BNCAP) के चाइल्ड ऑक्यूपेंट प्रोटेक्शन टेस्ट में 18 महीने और तीन वर्ष के बच्चों का प्रतिनिधित्व करने वाली रियरवर्ड-फेसिंग डमी का इस्तेमाल किया गया। फ्रंटल और साइड इम्पैक्ट टेस्ट में दोनों आयु वर्गों के लिए इस एसयूवी को 24 में से पूरे 24 अंक मिले। चाइल्ड रेस्ट्रेंट सिस्टम (CRS) की प्रभावशीलता के लिए भी इसे 12 में से 12 अंक प्राप्त हुए। व्हीकल असेसमेंट श्रेणी में 13 में से 9 अंक मिलने के बावजूद कुल मिलाकर टेकटन ने 49 में से 45 अंक हासिल किए। यह स्कोर बताता है कि परिवारों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कंपनी ने इस मॉडल को विकसित किया है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(22,145,121);"><em><strong>कार में ही गूगल की दुनिया</strong></em></span></h5>
<p style="text-align:justify;">टेकटन की सबसे खास खूबियों में इसकी कनेक्टेड तकनीक शामिल है। टॉप वेरिएंट में गूगल बिल्ट-इन दिया गया है। इसकी मदद से गूगल मैप्स, गूगल असिस्टेंट समेत 200 से ज्यादा ऐप का इस्तेमाल सीधे कार की इंफोटेनमेंट स्क्रीन पर किया जा सकता है। इसके अलावा 10.1 इंच की एचडी टचस्क्रीन, 10.25 इंच का डिजिटल ड्राइवर डिस्प्ले, वायरलेस एंड्रॉयड ऑटो और एप्पल कारप्ले भी मिलते हैं। मायनिसान कनेक्टेड कार तकनीक और थ्रीडी अराउंड व्यू मॉनिटर ड्राइविंग अनुभव को और बेहतर बनाते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong><em><span style="color:rgb(224,62,45);">इंटीरियर में मिलेगा प्रीमियम अनुभव</span></em></strong></h5>
<p style="text-align:justify;">केबिन में प्रवेश करते ही टेकटन आधुनिक तकनीक और आराम का एहसास कराती है। इसमें डुअल डिजिटल डिस्प्ले सेटअप दिया गया है, जिसमें डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर और बड़ा टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम शामिल है। वायरलेस एंड्रॉयड ऑटो और एप्पल कारप्ले, वायरलेस चार्जर, पैनोरमिक सनरूफ, वेंटिलेटेड फ्रंट सीटें, ऑटोमैटिक क्लाइमेट कंट्रोल, मल्टी-फंक्शन स्टीयरिंग व्हील और प्रीमियम ऑडियो सिस्टम जैसी सुविधाएं इसे तकनीक के लिहाज से काफी आधुनिक बनाती हैं। कनेक्टेड कार फीचर की मदद से वाहन से जुड़ी कई जानकारियां मोबाइल ऐप पर भी देखी जा सकती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><em><span style="color:rgb(22,145,121);"><strong>दो टर्बो-पेट्रोल इंजन का विकल्प</strong></span></em></h5>
<p style="text-align:justify;">टेकटन में ग्राहकों को दो इंजन विकल्प मिलते हैं। पहला 1.0 लीटर टर्बो-पेट्रोल इंजन है, जो लगभग 100 पीएस की पावर और 160 एनएम का टॉर्क देता है। दूसरा 1.3 लीटर टर्बो-पेट्रोल इंजन है, जिसकी अधिकतम क्षमता 163 पीएस की पावर और 280 एनएम टॉर्क तक पहुंचती है। इंजन के साथ 6-स्पीड मैनुअल और 7-स्पीड ड्यूल-क्लच ऑटोमैटिक (DCT) गियरबॉक्स का विकल्प उपलब्ध है। कंपनी भविष्य में इसका स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड मॉडल भी बाजार में उतारने की योजना बना रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(224,62,45);"><em><strong>कीमत  </strong></em></span></h5>
<p style="text-align:justify;">निसान टेकटन की शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत 10.49 लाख रुपये रखी गई है, जबकि टॉप वेरिएंट की कीमत 18.59 लाख रुपये तक जाती है।  अलग-अलग राज्यों में टैक्स और अन्य शुल्क के कारण ऑन-रोड कीमत में अंतर हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/590743/railone-app-4-76-crore-downloads-daily-10-lakh-ticket-booking"><span class="t-red">RailOne ने मचाया धमाल! </span>4.76 करोड़ डाउनलोड के पार, रोज बुक हो रहे 10 लाख रेल टिकट</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Breaking News</category>
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                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 07:02:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वच्छ ऊर्जा की खोज में भारी न पड़ जाए कचरा </title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/2102.jpg" alt="2" width="175" height="193" />
<strong>पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">सौर ऊर्जा को लंबे समय से जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में एक अचूक और पूर्णतः स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही दुनिया के लिए सूर्य की किरणों से बिजली बनाना एक जादुई समाधान की तरह उभरा। परंतु जैसे-जैसे यह हरित क्रांति प्रौढ़ता की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसका एक अनदेखा, स्याह और खतरनाक पहलू सामने आने लगा है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की व्यापक रिपोर्ट ‘द डार्क साइड ऑफ सोलर पावर’ संकेत करती है कि जिस सौर ऊर्जा को हम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590979/garbage-should-not-outweigh-search-clean-energy"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/0157.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/2102.jpg" alt="2" width="175" height="193"></img>
<strong>पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">सौर ऊर्जा को लंबे समय से जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में एक अचूक और पूर्णतः स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता रहा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही दुनिया के लिए सूर्य की किरणों से बिजली बनाना एक जादुई समाधान की तरह उभरा। परंतु जैसे-जैसे यह हरित क्रांति प्रौढ़ता की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसका एक अनदेखा, स्याह और खतरनाक पहलू सामने आने लगा है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की व्यापक रिपोर्ट ‘द डार्क साइड ऑफ सोलर पावर’ संकेत करती है कि जिस सौर ऊर्जा को हम पर्यावरण के रक्षक के रूप में देखते हैं, वह भविष्य में कचरे के विशाल और जहरीले संकट में बदल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोलर पैनलों की समस्या का मूल कारण उनकी जीवन अवधि और उपभोक्ता व्यवहार में छिपा है। सामान्यतः एक सोलर पैनल लगभग पच्चीस से तीस वर्ष तक कुशलता से काम करता है। इसी आधार पर शुरुआती अनुमानों में माना गया था कि सौर कचरे का संकट वर्ष 2050 के आसपास आएगा, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के आर्थिक विश्लेषण के अनुसार, तकनीकी नवाचार और लगातार गिरती कीमतों के कारण लोग पुराने पैनलों को तीस वर्ष पूरा होने से पहले ही बदल रहे हैं। नई तकनीक के पैनल कम जगह में अधिक बिजली पैदा करते हैं, इसलिए बड़े सौर पार्क और आर्थिक रूप से सक्षम उपभोक्ता पुराने पैनल समय से पहले हटा देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस असमय प्रतिस्थापन ने कचरे के आगमन की रफ्तार बढ़ा दी है। अनुमान है कि सोलर कचरे का जो सैलाब 2045 या 2050 में आने की उम्मीद थी, वह उससे पहले ही दस्तक दे चुका है। यदि इस रफ्तार पर अंकुश न लगा तो 2050 तक दुनिया के लैंडफिल में छह करोड़ टन से अधिक फोटोवोल्टिक पैनलों का कचरा जमा हो सकता है। <br />फोर्ब्स में प्रकाशित माइकल शेलनबर्गर के शोध के अनुसार, सोलर पैनलों के निर्माण में सीसा, कैडमियम, एंटीमनी और क्रोमियम जैसी जहरीली भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब जीवनकाल समाप्त होने के बाद पैनलों को बिना वैज्ञानिक उपचार के खुले मैदानों या सामान्य लैंडफिल में फेंका जाता है, तो वर्षा जल के प्रभाव से ये तत्व रिसकर मिट्टी में पहुंच सकते हैं। वहां से वे भूजल स्रोतों तक पहुंचकर पेयजल और कृषि तंत्र को प्रदूषित कर सकते हैं। ‘साइंस डायरेक्ट’ में प्रकाशित शोध भी संकेत करता है कि फोटोवोल्टिक कचरे का अनियंत्रित निपटान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक खतरा है तथा प्रभावी पुनर्चक्रण तंत्र विकसित करना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के संदर्भ में यह चुनौती और अधिक संवेदनशील हो जाती है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ (एनर्जी वर्ल्ड) की रिपोर्ट ‘द रिस्की साइड ऑफ सोलर एनर्जी’ के अनुसार, भारत सौर ऊर्जा का तेजी से विस्तार करने वाले देशों में शामिल है, लेकिन सौर कचरे के प्रबंधन में उसकी तैयारी चिंता पैदा करती है। देश में इस इलेक्ट्रॉनिक और सौर कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए सख्त और व्यापक व्यवस्था की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">फर्स्टपोस्ट की एक खोजी रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि ठोस अपशिष्ट निपटान योजना के अभाव में सौर ऊर्जा का विस्तार जैव विविधता के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां विशाल सौर पार्क स्थापित हो रहे हैं, अनुपयोगी पैनलों के खुले में छोड़े जाने या अनौपचारिक कबाड़ बाजार में पहुंचने की आशंका है। वहां उन्हें असुरक्षित तरीके से तोड़ा-फोड़ा गया तो स्थानीय मिट्टी, जल और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सोलर पैनलों के पुनर्चक्रण की राह में सबसे बड़ी बाधा वित्तीय व्यवहार्यता की कमी है। ग्रीनमैच जैसे वैश्विक अध्ययनों से स्पष्ट है कि रिसाइक्लिंग की तकनीकें उपलब्ध हैं और उनसे सिलिकॉन, एल्युमीनियम तथा उच्च गुणवत्ता वाला कांच जैसी मूल्यवान सामग्री प्राप्त की जा सकती है, लेकिन तकनीकी संभावना के सामने अर्थशास्त्र की दीवार खड़ी है। </p>
<p style="text-align:justify;">हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अनुसार, एक सोलर पैनल को रिसाइकिल करने की लागत लगभग बीस से तीस डॉलर तक आती है, जबकि उससे प्राप्त सामग्री का बाजार मूल्य केवल तीन से चार डॉलर के आसपास है। इस आर्थिक अंतर के कारण निजी कंपनियों के लिए रिसाइक्लिंग आकर्षक व्यवसाय नहीं बन पाती। जब तक लागत कम नहीं होती या सरकारें प्रोत्साहन और सब्सिडी नहीं देतीं, तब तक पैनलों को डंप करना अधिक सस्ता विकल्प बना रह सकता है। यही स्थिति भविष्य में सौर ऊर्जा के विस्तार के पर्यावरणीय लाभों को कमजोर कर सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस पर्यावरणीय दुविधा से बाहर निकलने का रास्ता कड़े नीतिगत हस्तक्षेप और स्पष्ट उत्तरदायित्व से ही निकलेगा। सरकारों को ऐसे कानून बनाने चाहिए जो सौर विनिर्माताओं के लिए ‘विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व’ यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी को अनिवार्य करें, जैसा कि यूरोपीय संघ ने किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका अर्थ है कि जो कंपनी सोलर पैनल बनाती और बेचती है, उसकी कानूनी जिम्मेदारी हो कि पैनल खराब होने या जीवनकाल पूरा होने पर उसे वापस लेकर सुरक्षित पुनर्चक्रण सुनिश्चित करे। इसके साथ ही शोध और विकास में निवेश बढ़ाना होगा, ताकि रिसाइक्लिंग की नई, सस्ती और प्रभावी तकनीकें विकसित हो सकें। पैनलों के निर्माण से लेकर उनके उपयोग और अंतिम निपटान तक पूरे जीवनचक्र की निगरानी के लिए एक मजबूत व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हम आज इस समस्या की अनदेखी करते रहे तो आने वाली पीढ़ियां हमें ऐसे समाज के रूप में याद कर सकती हैं, जिसने एक प्रदूषण को कम करने की कोशिश में उससे जुड़ा नया और स्थायी कचरा संकट खड़ा कर दिया। समय आ गया है कि हम सौर ऊर्जा के इस स्याह पक्ष को स्वीकार करें और समय रहते सुधारात्मक कदम उठाएं, ताकि भविष्य की हरित क्रांति अपनी ही विफलता के मलबे के नीचे न दबे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 05:51:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
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                <title>क्या रीट से मजबूत होगा है आपका पोर्टफोलियो</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/rajat.jpg" alt="RAJAT" width="124" height="111" />
<strong>रजत मेहरोत्रा, </strong><br /><strong>वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ</strong>

<p style="text-align:justify;">भारतीय परिवारों में रियल एस्टेट को लंबे समय से संपत्ति बनाने का एक भरोसेमंद माध्यम माना जाता रहा है। अपना मकान, दुकान या जमीन खरीदना केवल निवेश ही नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा से भी जोड़कर देखा जाता है, लेकिन प्रॉपर्टी में निवेश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए बड़ी पूंजी चाहिए। इसके साथ रजिस्ट्री, रखरखाव, किरायेदार, प्रॉपर्टी टैक्स और जरूरत के समय संपत्ति बेचने में लगने वाला समय भी निवेशक की परेशानी बढ़ा सकता है। ऐसे में रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी रीट छोटे निवेशकों के लिए रियल एस्टेट में भागीदारी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590980/will-reit-strengthen-your-portfolio"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/re.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/rajat.jpg" alt="RAJAT" width="124" height="111"></img>
<strong>रजत मेहरोत्रा, </strong><br /><strong>वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ</strong>

<p style="text-align:justify;">भारतीय परिवारों में रियल एस्टेट को लंबे समय से संपत्ति बनाने का एक भरोसेमंद माध्यम माना जाता रहा है। अपना मकान, दुकान या जमीन खरीदना केवल निवेश ही नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा से भी जोड़कर देखा जाता है, लेकिन प्रॉपर्टी में निवेश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए बड़ी पूंजी चाहिए। इसके साथ रजिस्ट्री, रखरखाव, किरायेदार, प्रॉपर्टी टैक्स और जरूरत के समय संपत्ति बेचने में लगने वाला समय भी निवेशक की परेशानी बढ़ा सकता है। ऐसे में रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट यानी रीट छोटे निवेशकों के लिए रियल एस्टेट में भागीदारी का एक अलग रास्ता खोलते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">रीट को सरल भाषा में समझें, तो यह ऐसा निवेश माध्यम है, जो निवेशकों से जुटाई गई पूंजी के माध्यम से आय पैदा करने वाली रियल एस्टेट संपत्तियों में निवेश करता है। इनमें बड़े ऑफिस पार्क, बिजनेस सेंटर, शॉपिंग मॉल और अन्य कमर्शियल प्रॉपर्टी शामिल हो सकती हैं। इन संपत्तियों से मिलने वाले किराए और दूसरी आय से निवेशकों को वितरण किया जाता है। रीट की यूनिटें शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती हैं, इसलिए निवेशक किसी पूरी इमारत को खरीदे बिना भी बड़े रियल एस्टेट पोर्टफोलियो में हिस्सेदारी ले सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">सेबी भी रीट को ऐसे निवेश माध्यम के रूप में समझाता है, जिनके जरिए भौतिक संपत्ति सीधे खरीदे बिना रियल एस्टेट में निवेश किया जा सकता है। रीट का सबसे बड़ा फायदा कम पूंजी में अच्छी गुणवत्ता वाली व्यावसायिक संपत्तियों तक पहुंच है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद या पुणे जैसे शहरों में एक अच्छी कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये की आवश्यकता हो सकती है। इसके विपरीत सूचीबद्ध रीट की यूनिट बाजार मूल्य पर शेयर की तरह खरीदी जा सकती है। दूसरा फायदा लिक्विडिटी है। मकान या दुकान बेचने में कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं, जबकि एक्सचेंज पर सूचीबद्ध रीट यूनिट को बाजार में बेचा जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि रीट में हमेशा इच्छित कीमत पर तुरंत खरीदार मिलना निश्चित है। सेबी भी सूचीबद्ध रीट में निवेश का एक लाभ निवेशकों के लिए उपलब्ध अपेक्षाकृत बेहतर निकास विकल्प और पारदर्शिता को मानता है। तीसरा महत्वपूर्ण पहलू नियमित वितरण की संभावना है। रीट ढांचे का उद्देश्य आय उत्पन्न करने वाली संपत्तियों से आने वाले कैश फ्लो का बड़ा हिस्सा यूनिटधारकों तक पहुंचाना है, लेकिन निवेशक को यह समझना चाहिए कि रीट को बैंक एफडी की तरह निश्चित ब्याज देने वाला साधन नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">निवेश का एक मूल सिद्धांत है-सारा पैसा एक ही प्रकार की संपत्ति में न लगाना। किसी निवेशक के पास इक्विटी म्यूचुअल फंड, शेयर, बैंक एफडी, डेट इंस्ट्रूमेंट और सोना हो सकता है। ऐसे पोर्टफोलियो में रीट जोड़ने से उसे रियल एस्टेट से जुड़ी आय और संभावित पूंजी वृद्धि का अतिरिक्त स्रोत मिल सकता है, लेकिन प्रत्येक निवेशक के लिए रीट में 10, 15 या 20 प्रतिशत निवेश करना जरूरी नहीं है। सही अनुपात उसकी आयु, जोखिम क्षमता, आय, मौजूदा संपत्तियों, वित्तीय लक्ष्यों और निवेश अवधि पर निर्भर करेगा, जिस व्यक्ति के पास पहले से बहुत अधिक रियल एस्टेट है, उसके लिए रीट का महत्व उस निवेशक से अलग होगा, जिसके पोर्टफोलियो में प्रॉपर्टी का कोई एक्सपोजर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">रीट में निवेश की प्रक्रिया शेयर खरीदने जैसी है। निवेशक के पास डीमैट और ट्रेडिंग अकाउंट होना चाहिए। वह स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध रीट को खोजकर उसकी यूनिट बाजार मूल्य पर खरीद सकता है। NSE के वर्तमान कॉरपोरेट फाइलिंग सिस्टम में माइंडस्पेस और एम्बेसी जैसे रीट की नियमित वित्तीय रिपोर्टिंग भी उपलब्ध है, लेकिन केवल ऊंची डिस्ट्रीब्यूशन यील्ड देखकर रीट नहीं खरीदना चाहिए। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत में रीट बाजार अभी विकसित हो रहा है। अगस्त 2025 के एक उद्योग दस्तावेज में एम्बेसी, माइंडस्पेस, ब्रुकफील्ड, नेक्सस सेलेक्ट और नॉलेज रियल्टी ट्रस्ट सहित पांच सूचीबद्ध रीट के आधार पर भारतीय रीट बाजार पूंजीकरण लगभग 17 अरब डॉलर बताया गया था। यह संकेत देता है कि भारतीय रियल एस्टेट निवेश धीरे-धीरे केवल मकान और जमीन खरीदने की पारंपरिक सोच से आगे बढ़ रहा है। रीट न तो एफडी का पूर्ण विकल्प है और न शेयर बाजार का। </p>
<p style="text-align:justify;">सही रीट, उचित मूल्य और संतुलित आवंटन के साथ यह पोर्टफोलियो में आय, रियल एस्टेट एक्सपोजर और विविधीकरण जोड़ सकता है। छोटे निवेशक के लिए सबसे बड़ा बदलाव यही है। अब प्रीमियम कमर्शियल रियल एस्टेट में भागीदारी के लिए करोड़पति होना जरूरी नहीं, लेकिन कम निवेश राशि का अर्थ कम जोखिम नहीं होता। इसलिए रीट में निवेश का मंत्र भी वही होना चाहिए- पहले समझिए, फिर तुलना कीजिए और उसके बाद ही निवेश कीजिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
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                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 05:17:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>क्या वैज्ञानिक शोध का भविष्य भारत और चीन में है? बदलता वैश्विक विज्ञान दे रहा नई दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका और यूरोप की वैज्ञानिक बादशाहत के बीच भारत-चीन तेजी से उभरते शोध केंद्र; प्रतिभा, निवेश, संस्थागत क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता बन रहे निर्णायक कारक]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590840/future-of-scientific-research-india-china-global-science"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/india-china,-global-science-(1).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अब वे दिन गए जब यह कहा जाता था कि मॉडर्न साइंटिफिक रिसर्च की जन्मभूमि अमेरिका है और अमेरिका का साइंटिफिक रिसर्च बेस यूरोपियन वैज्ञानिकों की देन है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में वैज्ञानिक शोध का केंद्र धीरे-धीरे अमेरिका से आगे बढ़कर भारत और चीन जैसे देशों की ओर भी देख रहा है। इसके पीछे वैज्ञानिक प्रतिभा, संस्थागत क्षमता, सरकारी निवेश और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे कई कारण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मिजाज और उनकी नीतियों ने अमेरिकी साइंटिफिक कम्युनिटी के एक बड़े हिस्से को नाराज किया है। अमेरिका के अनेक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में बाहरी देशों के वैज्ञानिक बड़ी संख्या में काम करते हैं। इनमें से अनेक को अमेरिकी नागरिकता भी प्राप्त है। इसके बावजूद इन वैज्ञानिकों पर अमेरिकी जासूसी संस्थाओं और फेडरल पुलिस की निगरानी रहती है, खासतौर से रूस, उत्तर कोरिया और चीन से उनके संबंधों तथा विदेशी यात्राओं को लेकर।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उमर याघी ने अमेरिका छोड़कर चीन में बसने का इरादा जताया है। अमेरिका में चीनी मूल के बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और शोधार्थी हैं। इनमें से कुछ को बाहर का रास्ता दिखाया गया और कुछ को वैज्ञानिक सामग्री चीन भेजने या ले जाने के आरोप में मुकदमों का सामना करना पड़ा। विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाएं ऐसी खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करती रही हैं। कुछ समय के लिए हलचल मचती है और फिर मामला शांत हो जाता है। लेकिन उमर याघी का चीन जाने का निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका में विज्ञान के लिए फंडिंग में कटौती की चर्चा है और चीन दुनिया भर के बेहतरीन वैज्ञानिक टैलेंट को अपने यहां आकर्षित करने में जुटा है। याघी ने बीजिंग की सिंघुआ यूनिवर्सिटी में रिसर्चर के रूप में फुल-टाइम नौकरी स्वीकार की है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/india-china,-global-science.png" alt="India China, Global Science" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">चीन इस समय वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में एक अग्रणी देश बन चुका है। वहां की सरकार रेयर अर्थ मैटेरियल्स, अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में जबरदस्त निवेश कर रही है। इसके लिए उसे हजारों वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की आवश्यकता है। उमर याघी जैसे वैज्ञानिक इस प्रक्रिया की शुरुआत का संकेत हो सकते हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहता है तो अमेरिका की प्रशासनिक नीति क्या होगी, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन उच्च स्तर की प्रतिभा का ऐसा पलायन किसी भी देश के लिए चिंता का विषय तो है ही।</p>
<p style="text-align:justify;">उमर याघी यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में केमिस्ट्री के प्रोफेसर हैं। उन्हें मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क्स पर उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए 2025 का केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया। वे बर्कले ग्लोबल साइंस इंस्टीट्यूट के फाउंडिंग डायरेक्टर भी हैं। उनका उद्देश्य विकासशील देशों में रिसर्च सेंटर स्थापित करना है। इसके अलावा वे कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे वैज्ञानिक का अपना भविष्य चीन में तलाशना अमेरिका के लिए सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के संदर्भ में देखें तो 1960 से लेकर 2000 के बीच प्रतिभा पलायन में संख्यात्मक इजाफा हुआ था और सरकार चिंतित हुई थी। तब यह तर्क भी दिया जाता था कि ‘ब्रेन ड्रेन इज बेटर दैन ब्रेन इन द ड्रेन।’ राष्ट्रवादी सोच के लिए यह कथन भले ही अवमाननापूर्ण था, लेकिन सच्चाई यह थी कि हम अपनी प्रतिभाओं को रोकने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक संस्थागत इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने में नाकाम रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">1985 तक भी हमारे वैज्ञानिक उच्च स्तर की इंस्ट्रूमेंटेशन और आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों की स्वदेशी उपलब्धता के लिए संघर्ष कर रहे थे। इसके बावजूद सैकड़ों प्रतिभाशाली वैज्ञानिक भारत में रहकर और जरूरत पड़ने पर विदेशी संस्थानों में कुछ समय के लिए प्रशिक्षण लेकर देश लौटना चाहते थे। वे केमिस्ट्री, फिजिक्स, एस्ट्रोनॉमी एवं एस्ट्रोफिजिक्स और बायोलॉजिकल साइंसेज में उन्नत शोध करना चाहते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">1985 के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं। सरकारी निवेश बढ़ा और अनेक नए वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना हुई। वरिष्ठ और उभरते वैज्ञानिकों को देश में शोधकार्य बढ़ाने तथा उन्नत तकनीक विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई। निजी क्षेत्र में भी प्रतिभाशाली लोगों ने औद्योगिक संस्थान खड़े किए, जो आज अग्रणी उद्योग बन चुके हैं। इन प्रयासों से भारत में प्रतिभा पलायन काफी हद तक रुका, लेकिन चिंता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में साइंटिफिक मैनपावर के नियमन की प्रारंभिक नीतियां काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च से शुरू हुईं और बाद में डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी तथा प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण हुई। उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाने पर कोई रोक नहीं है, बल्कि भारत ने अनेक देशों के साथ वैज्ञानिक सहयोग के समझौते किए हैं। उद्देश्य यही है कि भारतीय वैज्ञानिक वैश्विक ज्ञान से जुड़ें और उनकी विशेषज्ञता का लाभ देश को भी मिले।</p>
<p style="text-align:justify;">साइंटिफिक रिसर्च को टेक्नोलॉजी और एप्लीकेशन्स तक पहुंचाने में बीस-तीस वर्ष का समय, मानवीय प्रतिभा और अपार धनराशि लगती है। इसके परिणाम तत्काल नहीं मिलते और लगातार राजनीतिक एवं संस्थागत समर्थन की जरूरत होती है। भारत ने उपग्रह, रॉकेट, परमाणु ऊर्जा, रक्षा तकनीक और पनडुब्बियों से लेकर अनेक आधुनिक क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता विकसित की है। अब शायद ही कोई ऐसा प्रमुख क्षेत्र बचा हो, जिसमें भारतीय संस्थान वैश्विक संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा की स्थिति में न हों।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए आने वाला समय केवल अमेरिका या यूरोप का वैज्ञानिक समय नहीं है। चीन ने प्रतिभा और निवेश के बल पर अपनी स्थिति मजबूत की है, जबकि भारत के पास विशाल युवा वैज्ञानिक शक्ति, बढ़ता संस्थागत आधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में स्पष्ट प्रयास हैं। यदि दोनों देश प्रतिभाओं को बेहतर शोध वातावरण, स्वतंत्रता, संसाधन और सम्मान दे सके, तो भविष्य के वैज्ञानिक शोध का बड़ा हिस्सा निश्चित रूप से भारत और चीन में आकार ले सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
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                <pubDate>Sun, 16 Aug 2026 07:10:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
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                <title>विभाजन की त्रासदी के बीच इंसानियत की मिसाल: जब दिल्ली में फरिश्तों ने संभाला था शरणार्थियों का दर्द</title>
                                    <description><![CDATA[सिविल लाइंस के ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल से जुड़ी हैं मनोज कुमार की यादें, 1947 की हिंसा के बीच स्वयंसेवकों और चिकित्सकों ने हजारों विस्थापितों की मदद की
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590860/1947-partition-delhi-humanity-brotherhood-house-st-stephens-hospital"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/independence-day-2026-(2).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मनोज कुमार जब भी दिल्ली आते, एक अजीब-सी बेचैनी उनके अंदर उठती। सिविल लाइंस के उन दो स्थानों से गुजरना उनके लिए सिर्फ रास्ता तय करना नहीं होता था-यह एक चुपचाप अदा की जाने वाली नजर थी। दिल्ली ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल। दोनों जगहें उनके जीवन की उस अंधेरी रात की याद दिलाती थीं, जब सब कुछ छूट गया था और कुछ भी बाकी नहीं बचा था। अगस्त 1947। देश दो टुकड़ों में बंट चुका था। सरहद के उस पार से आते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली पहुंचा। छोटा भाई बीमार था। उसका इलाज सेंट स्टीफंस अस्पताल में हुआ। सैकड़ों अन्य शरणार्थियों की तरह पूरा परिवार दिल्ली ब्रदरहुड हाउस के परिसर में ठहरा। इन दोनों स्थानों के प्रति कृतज्ञता का भाव उनके मन में जीवन भर बना रहा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>शरणार्थियों का सैलाब</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">उस समय दिल्ली की हालत भयावह थी। एक ओर सांप्रदायिक दंगों की लपटें उठ रही थीं, दूसरी ओर हिंदू-सिख शरणार्थियों का सैलाब शहर में घुस रहा था। लगभग नौ लाख की आबादी वाले इस शहर से करीब तीन लाख मुसलमान पाकिस्तान चले गए और लगभग पांच लाख हिंदू-सिख शरणार्थी यहां आकर बसने लगे। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियां खून से सनी, घायल और आतंकित यात्रियों से भरी उतर रही थीं। हर तरफ चीखें, चीख-पुकार और असमंजस।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>किनकी देखरेख में इलाज</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">सरकारी मशीनरी के अलावा कई स्वयंसेवी संगठन मैदान में उतरे। इनमें दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी (डीबीएस) भी शामिल थी। इसकी जड़ें 1877 में कैंब्रिज मिशन के साथ राजधानी में जमी थीं। इसी मिशन ने 1881 में सेंट स्टीफंस कॉलेज और 1885 में सेंट स्टीफंस अस्पताल की नींव रखी। विभाजन की हिंसा के दौरान इनके स्वयंसेवक पुरानी दिल्ली स्टेशन पर पहुंच रहे घायलों और शरणार्थियों को अस्पताल ले जाते। कई घायलों का इलाज डॉ. रूथ रोजवियर जैसी चिकित्सकों की देखरेख में हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">सिविल लाइंस स्थित ब्रदरहुड हाउस परिसर में फादर वेदरवेल के नेतृत्व में अस्थायी आश्रय दिया गया। जाति-धर्म से ऊपर उठकर पानी, दवा, छाया और सुरक्षा मुहैया कराई गई। स्वयंसेवक रात-दिन बिना थके काम करते रहे। अकेले डीबीएस सक्रिय नहीं था। सनातन धर्म और आर्य समाज के कार्यकर्ता सरहद पार से आ रहे शरणार्थियों की सुरक्षा, राहत शिविर और खाद्य वितरण में लगे थे। जत्थेदार संतोख सिंह के नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य सिख संगठनों ने भोजन, चिकित्सा सहायता और सुरक्षा का काम संभाला। आगे चलकर इन्हीं प्रयासों से दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल की स्थापना हुई।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>किसने मारा उस फरिश्ते को </strong></h5>
<p style="text-align:justify;">रेड क्रॉस दवाइयां और स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा था। लेडी माउंटबेटन के नेतृत्व में यूनाइटेड काउंसिल फॉर रिलीफ एंड वेलफेयर ने कई गैर-सरकारी संगठनों को समन्वित किया। कांग्रेस की राहत समितियां, कस्तूरबा कार्यकर्ता, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की दिल्ली शाखा और अन्य महिला समूह भोजन, वस्त्र और बच्चों की देखभाल में जुटे थे। डॉ. एन.सी. जोशी करोल बाग समेत कई इलाकों में घायलों की सेवा कर रहे थे, उन्हें भी दंगों में मार दिया गया। आज करोल बाग के जोशी रोड पर उनके नाम का अस्पताल चल रहा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गांधीजी की चिकित्सक भी सक्रिय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इरविन अस्पताल (अब लोक नायक अस्पताल) और लेडी हार्डिंग अस्पताल में भी घायलों का इलाज हो रहा था। लेडी हार्डिंग कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. के.जे. मैक्डरमेट और उनकी सहयोगी डॉ. ओ.पी. बाली रोज अठारह-अठारह घंटे मरीजों के साथ रहती थीं। गांधीजी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर भी शरणार्थियों और घायलों के साथ थीं। वे गांधी जी के साथ दंगा-प्रभावित इलाकों में जाकर शांति की अपील करतीं। आगे चलकर वे दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं। डीबीएस के प्रभारी ब्रदर सोलोमन जॉर्ज बताते हैं कि मनोज कुमार जीवन के अंत तक संस्था का आदर करते रहे।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हजारों जिंदगियों को राहत</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इन स्वयंसेवी प्रयासों ने हजारों जिंदगियों को राहत दी। स्टेशन से अस्पताल तक पहुंचाना, घायलों का इलाज, शिविरों में भोजन-पानी और कुछ हद तक हिंसा पर अंकुश किया। ये सब इन्हीं लोगों की मेहनत से संभव हुआ। सेंट स्टीफंस अस्पताल और कॉलेज उस समय मानवीय सहायता के जीवित केंद्र बन गए थे। विभाजन ने दिल्ली को गहरे घाव दिए। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों मारे गए, लेकिन उसी अंधेरे में स्वयंसेवकों की रोशनी भी चमकती रही। बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के, धर्म और जाति की दीवारों को पार कर जो लोग घायलों को उठाए जा रहे थे, वे मानवीयता के सच्चे प्रतिनिधि थे। आज भी कुछ बुजुर्ग मिल जाएंगे, जिन्होंने उस कठिन दौर में फरिश्तों को दिन-रात लूटे-पिटे लोगों की सेवा करते देखा था। ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल आज भी उस युग की याद दिलाते हैं, जब इंसानियत ने बाकी सब कुछ भुलाकर सिर्फ इंसान की मदद की थी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- विवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
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                                            <category>मनोरंजन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 08:23:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>माटी के वे वीर, जिन्होंने तिरंगे के लिए दे दी जान; शाहजहांपुर के रणबांकुरों की शौर्यगाथा</title>
                                    <description><![CDATA[आजादी की लड़ाई से लेकर भारत-चीन और भारत-पाक युद्धों तक शाहजहांपुर के जवानों ने दिखाई अदम्य वीरता, विभिन्न सैन्य अभियानों में भी कई वीरों ने दिया सर्वोच्च बलिदान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590858/shahjahanpur-martyrs-heroes-indian-army-independence-day"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/independence-day-2026-(1).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की आजादी की लड़ाई के तीन अमर नायकों की कहानी सभी को पता है, पर आजादी के बाद भी ऐसे तमाम मौके आए, जब शाहजहांपुर के वीर जवानों ने देश की खातिर जान देने में तनिक भी देर नहीं लगाई। यह वह मतवाले थे, जिन्होंने दुश्मनों को नाकों चने चबवा दिए, इसके बाद वह खुद वीरगति को प्राप्त हुए। देश पर मर मिटने वाले ऐसे हीरो के बारे में शाहजहांपुर के कुछ ही लोगों को पता है।  </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर के लोगों ने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी अपनी वीरता का परिचय दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शाहजहांपुर के जवानों के लिए कहा जाता था कि वह किस मिट्टी के बने हैं, उन्हें भूख नहीं लगती है और न ही उन्हें प्यास लगती है। वह केवल लड़ना ही जानते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में योगदान देने वाले सैनिकों की याद में कटरा और जलालाबाद में आज भी स्तंभ स्थापित हैं। ग्रेनेड चलाना हो, तोप चलाना हो या फिर हवाई जहाज से कूदना हो सब फन में शाहजहांपुर के वीर जवानों ने अपना लोहा मनवाया है। देश की सीमा पर दुश्मन से तो लड़ना तब भी आसान माना जाता है, क्योंकि पता होता है कि सामने दुश्मन ही है और उसे मारना है। पर शाहजहांपुर के रणबांकुरों ने तो देश के अंदर छिपे बैठे दुश्मनों को भी चुन-चुन कर मारा है, यह काम इसलिए कठिन माना जाता है, वह दुश्मन अपनों के बीच में छिपा बैठा होता था। सेना की विभिन्न रेजीमेंटों और कोरों में भर्ती होने के बाद बहुत लंबी नौकरी किसी ने नहीं की। अधिकतम दस साल के अंदर ही शाहजहांपुर के वीर जवानों ने विभिन्न युद्धों, मुठभेड़ों और आपरेशनों में वीरगति पाई। शाहजहांपुर का सेना में बड़ा योगदान रहा है। आजादी की जंग में जिस तरह से दीवाने कूदे थे। वह जज्बा आज भी कायम है। यहां के युवाओं के खून देशप्रेम बहता है। उसी के बल पर फौजियों ने हमेशा ही दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत-चीन युद्ध में शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कैप्टन कन्हैयालाल, ग्रेनेडियर कुतुबुददीन खान-4 ग्रेनेडियर कोर, एनसीई नन्हें लाल- वीईजी किरकी, सिपाही राजेंद्र सिंह-राजपूत रेजीमेंट, आरएम रामपाल सिंह-राजपुताना राइफल, सिपाही बलवीर सिंह-तोपखाना, सिपाही छोटे सिंह-तोपखाना, सिपाही दृगपाल सिंह-तोपखाना, सिपाही मुरारी सिंह-तोपखाना।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नायक जदुनाथ सिंह-राजपूत रेजीमेंट/ पहलवान सिंह-राजपूत रेजीमेंट/ सिग्नलमैन राजाराम गुप्ता-सिग्नल कोर/ सिपाही मलूक-सिख रेजीमेंट/ कमल किशोर-आर्मड रेजीमेंट/ लांस नायक दृगपाल सिंह-14 राजपूत रेजीमेंट/ नायक अनोख सिंह-पंजाब रेजीमेंट/जीडी रामहरी सिंह-9 गार्डस रेजीमेंट/ लांस नायक प्रतिपाल सिंह-तोपखाना/सिपाही चिरौंजी लाल-तोपखाना/ सब लेफ्टिनेंट शशि प्रकाश-तोपखाना/ सिपाही विद्याराम-तोपखाना।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विभिन्न ऑपरेशनों में शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">पीटीआर सत्यपाल सिंह-1 पैरा रेजीमेंट-आपरेशन ब्लू स्टार-1984/ हवलदार विक्रम सिंह- 13 मैकनाइज्ड इंफेंट्री-आपरेशन पवन-1987/ सिपाही मूलचंद्र वाल्मीकी-एएससी बटालियन-आपरेशन पवन-1988/सिपाही सुरेश कुमार शर्मा-राजपूत रेजीमेंट- आपरेशन पवन-1987/ नायब सूबेदर सुनील कुमार-इंटेलीजेंस कोर-आंतकवादियों से मुठभेड़-1999/ देवेंद्र सिंह-तोपखाना-श्रीनगर कुपवाड़ा में आंतकवादियों से मुठभेड़-2005/ सिपाही रमेश चंद्र-4 जाट रेजीमेंट-आपरेशन कारगिल-1999।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>द्वितीय विश्वयुद्ध के शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">- सिपाही लाखन, सिपाही कुबेर सिंह<br />- 1948 युद्ध के शहीद-सिपाही महेंद्र सिंह<br />जिले में पदक विजेता सैनिक<br />- 1948 में जलालाबाद तहसील के खजुरी गांव निवासी नायक जदुनाथ सिंह को मरणोपरांत परमवीर वीर चक्र प्रदान किया गया।<br />- 1971 में भारत-पाक लड़ाई में दृगपाल सिंह शहीद हुए। उनको महावीर चक्र दिया गया।<br />- इसके अलावा नरवीर सिंह को अशोक चक्र मिला है।<br />- 1994 में मेजर आशुतोष शुक्ला सेना मेडल<br />- 1996 कर्नल अभय कुमार सिंह विशिष्ट सेवा मेडल<br />- 2004 में हवलदार बलराम सिंह चौहान को सेना मेडल<br />- कैप्टन आनंद सिंह व कैप्टन खजान सिंह को द्वितीय विश्व युद्ध एसबीओबीआई मिला।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- विवेक सेंगर, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/590824/independence-day-2026-301-gallantry-medals-police-fire-service"><span class="t-red">Independence Day 2026:</span> स्वतंत्रता दिवस पर 301 वीरता पदकों का ऐलान, पुलिस-अग्निशमन सेवा के 1,057 कर्मियों को मिलेगा सम्मान</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Breaking News</category>
                                            <category>Trending News</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>बरेली</category>
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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 07:36:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शादी से एक रात पहले दूल्हा-दुल्हन तोड़ते हैं बर्तन, फिर खुद करते हैं सफाई! जर्मनी की इस परंपरा का राज हैरान कर देगा</title>
                                    <description><![CDATA[जर्मनी की ‘पोल्टरएबेंड’ रस्म में मेहमान चीनी मिट्टी के बर्तन तोड़ते हैं, जबकि नवविवाहित जोड़ा मिलकर टुकड़ों की सफाई करता है; जानिए खुशहाल दांपत्य से जुड़ी इस अनोखी परंपरा का मतलब]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590655/germany-polterabend-wedding-tradition-breaking-dishes-good-luck"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/unique-wedding-traditions-from-around-the-world.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया के अलग-अलग देशों में विवाह से जुड़ी परंपराएं अपने आप में बेहद रोचक हैं। कहीं शादी से पहले दूल्हा-दुल्हन को विशेष रस्में निभानी पड़ती हैं, तो कहीं रिश्तेदार और दोस्त अनोखे तरीकों से नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देते हैं। जर्मनी की ‘पोल्टरएबेंड’ भी ऐसी ही एक अनूठी और दिलचस्प विवाह परंपरा है। इस रस्म में शादी से एक रात पहले मेहमान चीनी मिट्टी के बर्तन, प्लेट और दूसरे टूटने वाले सामान जमीन पर पटककर तोड़ते हैं। पहली नजर में यह परंपरा अजीब लग सकती है, लेकिन जर्मन संस्कृति में इसे नवविवाहित जोड़े के लिए सौभाग्य और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">पोल्टरएबेंड का आयोजन आमतौर पर शादी से एक रात पहले किया जाता है। इसके लिए दूल्हा-दुल्हन के परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्त एकत्र होते हैं। यह आयोजन प्रायः दुल्हन के घर या उसके सामने होता है। मेहमान अपने साथ पुराने चीनी मिट्टी के प्लेट, कप, कटोरे, फूलदान या अन्य ऐसी वस्तुएं लेकर आते हैं, जिन्हें आसानी से तोड़ा जा सके। मेहमान इन बर्तनों को जमीन पर पटककर तोड़ते हैं। बर्तनों के टूटने से पैदा होने वाली तेज आवाज पूरे माहौल को उत्सव और उल्लास से भर देती है। इसके बाद दूल्हा-दुल्हन मिलकर जमीन पर बिखरे टुकड़ों की सफाई करते हैं। यही इस रस्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">पोल्टरएबेंड के पीछे सदियों पुरानी लोकमान्यता जुड़ी हुई है। माना जाता है कि बर्तनों के टूटने की आवाज नकारात्मक शक्तियों और दुर्भाग्य को दूर करती है तथा दूल्हा-दुल्हन के वैवाहिक जीवन में सौभाग्य लेकर आती है। जर्मनी में प्रचलित एक कहावत भी इस परंपरा से जुड़ी है कि टूटे हुए बर्तन सौभाग्य लाते हैं। इस रस्म को केवल मनोरंजन के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि इसे नए वैवाहिक जीवन की शुभ शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। बर्तन टूटने के बाद उनके टुकड़ों को मिलकर साफ करना भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है- विवाह के बाद आने वाली परेशानियों और जिम्मेदारियों का सामना पति-पत्नी को मिलकर करना होगा।<br /></p><p style="text-align:justify;">पोल्टरएबेंड में हर तरह की चीज तोड़ना परंपरा का हिस्सा नहीं है। विशेष रूप से कांच को तोड़ने से बचा जाता है। जर्मन मान्यता में कांच टूटना दुर्भाग्य का संकेत माना जाता है। इसलिए इस रस्म में मुख्य रूप से चीनी मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इस परंपरा को निभाने के तरीके में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है।<br /></p><p style="text-align:justify;">पोल्टरएबेंड सिर्फ बर्तन तोड़ने की रस्म नहीं है। कई स्थानों पर इसे एक छोटे उत्सव की तरह मनाया जाता है। परिवार और दोस्त दूल्हा-दुल्हन के लिए खेल, मजेदार गतिविधियां और छोटे-छोटे कार्यक्रम आयोजित करते हैं। भोजन, बातचीत और हंसी-मजाक के बीच शादी से पहले का यह आयोजन रिश्तेदारों और दोस्तों को करीब आने का अवसर भी देता है। इस परंपरा का एक सामाजिक महत्व भी है। शादी के दिन जहां मुख्य ध्यान विवाह समारोह पर रहता है, वहीं पोल्टरएबेंड में दूल्हा-दुल्हन अपने करीबी लोगों के साथ अनौपचारिक माहौल में समय बिताते हैं। परिवार और मित्र इस आयोजन के माध्यम से उन्हें शुभकामनाएं और आने वाले वैवाहिक जीवन के लिए आशीर्वाद देतें हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
                                            <category>देश</category>
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                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 07:00:48 +0530</pubDate>
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                <title>स्वाधीनता की रक्षा के लिए आत्ममंथन जरूरी, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना समय की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि समानता, न्याय, लोकतांत्रिक मर्यादा और राष्ट्रहित से जुड़ी चुनौतियों पर विचार करने का अवसर भी है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590857/swadhinta-ko-akshunn-banaye-rakhne-ki-chunauti"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/independence-day-20261.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता, न्याय और राष्ट्रहित के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। आजादी के 79 वर्षों में देश ने विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक-राजनीतिक विभाजन, अवैध घुसपैठ, जातीय-सांप्रदायिक राजनीति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं में गिरावट जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब हर नागरिक को समान अवसर, न्याय और सम्मान मिले। स्वतंत्रता दिवस हमें उपलब्धियों के साथ कमियों पर आत्ममंथन का अवसर देता है। राष्ट्र की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का साझा दायित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत को ब्रिटिश दास्ता से मुक्त हुए उन्यासी वर्ष बीत चुके हैं। इन उन्यासी सालों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र के मूल मूल्यों पर कितनी खरी उतर रही है तथा स्वतंत्रता, समानता और न्याय के बुनियादी सिद्धांत क्या आम आदमी के प्रति निष्पक्ष रूप से लागू है अथवा उस पर भी अवसरवादी व अलगाववादी जातीय राजनीति का कुत्सित चेहरा प्रभावी है। यह गंभीर चिंतन का विषय है। कौन नहीं जानता कि किसी भी राष्ट्र के समग्र एवं चहुंमुखी विकास के लिए वहां के सभी नागरिकों का राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होना पहली अनिवार्यता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी आवश्यक होता है कि प्रत्येक नागरिक जाति, धर्म, संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पित रहे तथा व्यक्तिगत स्वार्थ को नकार कर राष्ट्र को सर्वोपरि माने। बहरहाल स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने भले ही भौतिक संसाधनों में चाहे जितनी वृद्धि की हो, मगर कुछ समस्याएं दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ी हैं, जिन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया। कहीं-कहीं राजनीतिक कारणों से समस्याओं को नजरअंदाज किया गया, जिस कारण समस्याएं विकराल होती गईं। कौन नहीं जानता कि देश में अधिकांश समस्याओं की जड़ बढ़ती जनसंख्या है, जिस पर अंकुश न लगाए जाने से स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। महंगाई और बेरोजगारी इसी के चलते बढ़ रही है। वस्तुस्थिति यह है कि सीमित संसाधनों के चलते हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी जैसी मूलभूत सुविधाओं को व्यवस्थित करना कठिन हो गया है। यही नहीं, सीमांत प्रदेशों में विदेशी घुसपैठियों की सटीक पहचान न होने से घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं, तिस पर सत्ता सुख के लिए राजनीतिक दलों द्वारा माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम जैसी नीतियां अपनाकर मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से देश में ऐसी जमात खड़ी हो गई है, जो मुफ्त का माल खाकर भी देश की सगी नहीं है। देश का उत्तरोत्तर विकास जिनका दायित्व है, उनके कार्य में बाधा डालने के लिए अपने पैरों तले से सियासी धरती खो चुके राजनीतिक दल एकजुट होकर विरोध का कोई अवसर नहीं चूकना चाहते। यूं तो सत्ता पर नकेल कसकर निरंकुश सत्ता को सचेत करना स्वस्थ विपक्ष का दायित्व होता है, लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध करके कल्याणकारी योजनाओं में अवरोध उत्पन्न करना किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता। देश का दुर्भाग्य है कि किसी भी समस्या के निपटने के बाद भी समस्या को मुद्दा बनाकर अराजकता उत्पन्न करना ही कुछ लोगों का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। ऐसे में सही को सही कहने का साहस भी कोई नहीं जुटा पा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लील गालियां और अभद्र भाषा का प्रयोग देश की स्वाधीनता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। ताज्जुब तब होता है, जब विपक्ष की राजनीति करने वाले तथाकथित नेता गाली बाजों के समर्थन में खड़े होकर अश्लील कृत्यों की पीठ थपथपाने में शर्म महसूस नहीं करते।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>राष्ट्रहित में सुधारों की चुनौती</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">देश में बरसों से राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने और सभी के साथ समान न्याय हेतु समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की बात की जा रही है, किंतु समान नागरिक संहिता का नाम सुनते ही कथित सांप्रदायिक शक्तियां विरोध करने पर उतारू हो जाती हैं। जैसे उन्हें औरों से अधिक सुविधाएं व अधिकार मिलें, कुछ राजनीतिक दलों को लगता है कि यदि समान नागरिक संहिता लागू हो गई, तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।  इसी प्रकार जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा करते ही कुछ धर्मगुरुओं की धार्मिक आस्थाएं आहत होने लगती हैं, जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को वह प्रकृति के विरुद्ध सिद्ध करने लगते हैं। जिस कारण राष्ट्र के कर्णधार कठोर निर्णय लेने की अपेक्षा अपने कदम पीछे हटाने के लिए विवश होते हैं तथा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार योजनाबद्ध ढंग से नहीं हो पाता। पुरानी कहावत है कि विदेशी या प्रत्यक्ष दुश्मन से लड़ना आसान होता है, किंतु अपने ही घर में यदि दुश्मनों के प्रतिनिधि बैठे हों, तो उनसे लड़ना सरल नहीं होता। आज देश ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। देश को अस्थिर करने हेतु षड्यंत्रकारी शक्तियां अपने-अपने मोहरों के साथ सड़कों पर हैं, जो नाम बदल-बदल कर देश की युवा पीढ़ी को भ्रमित करने और उकसाकर राष्ट्र को क्षति पहुंचाने में जुटी हैं। समृद्धि की राह पर अग्रसर भारत इन्हें रास नहीं आ रहा है। सड़क से लेकर संसद तक नकारात्मक दृष्टिकोण राष्ट्र को पीछे धकेलने का प्रयास कर रहा है। जनता द्वारा नकारे गए राजनीतिक दल अपनी खोई हुई धरती तलाशने के लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर रहे हैं। ऐसे में आवश्यक है कि स्वाधीनता दिवस को मंथन दिवस मानकर विश्लेषण किया जाए कि भारत ने विगत उन्यासी सालों में कितनी प्रगति की तथा किन मोर्चों पर भारत फेल हुआ। केवल पक्ष और विपक्ष की लड़ाई में भारत किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं होना चाहिए। सरकारें आएंगी जाएंगी, लेकिन राष्ट्र सुधारों में कोई विलंब नहीं होना चाहिए। समान नागरिक संहिता, आरक्षण विहीन सामाजिक व शैक्षिक व्यवस्था, कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति आज की प्राथमिकताओं में सर्वोपरि होनी चाहिए, ताकि स्वतंत्र भारत वास्तव में स्वस्थ लोकतंत्र का प्रहरी बना रहे। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप राष्ट्र निर्माण को चुनौती के रूप में स्वीकार करके आगे बढ़ना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधाकर आशावादी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, मेरठ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
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                                            <category>मेरठ</category>
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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 07:00:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुपरमैसिव ब्लैक होल रोक देता है नए तारों का जन्म, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोला आकाशगंगा के विकास का रहस्य</title>
                                    <description><![CDATA[500 से अधिक आकाशगंगाओं के अध्ययन में सामने आया अहम तथ्य; ब्लैक होल से निकलने वाली शक्तिशाली गैस और जेट ठंडी गैस को बाहर धकेलकर तारों के निर्माण को प्रभावित करती हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590838/supermassive-black-hole-stops-new-star-formation-indian-scientists"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/supermassive-black-hole.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ब्रह्मांड की असीम शक्तियों में शुमार सुपर मेसिव ब्लैकहोल न केवल अपने नजदीक आने वाले ग्रह और तारों की निगल जाता है, बल्कि नए तारों को जन्म के विकास को रोक लेता है। भारतीय खगोल वैज्ञानिकों ने आकाश गंगाओं में नए तारों का निर्माण रुकने की महत्वपूर्ण खोज की है। यह खोज बताती है कि ब्लैक होल किस तरह आकाश गंगा के विकास को प्रभावित करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आकाश गंगाओं के बीच अदृश्य ब्लैकहोल के बारे में हम जानते हैं और यह भी समझते हैं कि यह इतना ताकतवर होता है कि अपने नजदीक आने वाले बड़े तारों और प्रकाश को भी निगल जाता है। किसी बड़े तारे को निगलने का बाद ही नए तारों के निर्माण रुकने की कहानी शुरू होती है। इस खोज में वैज्ञानिकों ने 500 से अधिक आकाश गंगाओं और उनके बीच सुपर मेसिव ब्लैकहोल का अध्ययन किया और देखा कि ब्लैकहोल के आसपास पदार्थ तेजी से गिरता है यानि किसी तारे को ब्लैक होल निगलता है तो ब्लैकहोल के भीतर से अत्यधिक ऊर्जा वाली रेडिएशन और लगभग प्रकाश की गति से चलने वाली कॉस्मिक जेट्स बाहर निकलता हैं। ब्लैकहोल से जेट बाहर निकलने की गति 2000 किमी प्रति सेकंड हो सकती है। ब्लैकहोल में जमा रेडिएशन जेट के साथ मिलकर ब्लैकहोल के केंद्र से गैस को बाहर धकेल ददेता हैं। इस प्रतिक्रिया में जेट से निकलने वाली गैस नए तारों का जन्म लगभग रुक जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स बेंगलुरु और इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स पुणे के वैज्ञानिकों ने यह खोज की है। वैज्ञानिक डॉ. पायल नंदी के नेतृत्व में यह शोध किया गया। खोजकर्ता वैज्ञानिकों के अनुसार, उन्होंने आकाश गंगाओं के केंद्र में सक्रिय सुपरमैसिव ब्लैक होल के भीतर से 2,000 किमी प्रति सेकंड तक की रफ्तार से निकलने वाली गैस का अध्ययन किया। तब पता चला कि ब्लैक होल के आसपास से निकलने वाली गर्म आयनित गैस की धाराएं बेहद शक्तिशाली हैं। ब्लैक होल की ऊर्जा गैस को बाहर धकेलने वाली मुख्य शक्ति है और जेट उस प्रक्रिया के 'बूस्टर' की तरह आगे बढ़ाने का काम करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/supermassive-black-hole-(1).png" alt="Supermassive Black Hole (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">ये जेट ब्लैक होल के आसपास से निकलने वाले अत्यधिक ऊर्जावान कणों की संकरी धाराएं होती हैं, जो लगभग प्रकाश की गति से आगे बढ़ती हैं और नए तारों को जन्म देने वाली ठंडी धूल और गैस को अपने साथ उड़ा ले जाती है। जिस कारण जन्म ले रहे तारों का निर्माण रुक जाता है। यह शोध एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आकाशगंगा विकास और तारों के निर्माण को लेकर अहम खोज</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे बताते हैं कि, ऐसा कई बार देखा जा चुका है कि आकाश गंगाओं में तारों के नए तारों का निर्माण रुक सा गया है जिस कारण आकाश गंगा का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। इस रहस्य को समझने के लिए यह शोध किया गया और तब यह जानकारी निकलकर सामने आई कि ब्लैकहोल से निकलने वाले जेट के कारण आकाश गंगा प्रभावित होती है जिससे नए तारों का निर्माण नहीं हो पाता है। इस खोज से काफी हद तक नए तारों के निर्माण में व्यवधान स्पष्ट हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-बबलू चंद्रा, नैनीताल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
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                                            <category>यूरेका</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 06:00:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बुलंदियों के क्षितिज पर भारत </title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/050.jpg" alt="0" width="153" height="178" />
अरविंद जयतिलक,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा का जयघोष से देश झंकृत और चमत्कृत है। स्वाभिमान से देश का माथा दमक रहा है। अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर घर तिरंगा की ऊंची शान से आसमान गुंजायमान है। पर्वत, पठार नदियां, झरने सबसे आजादी के तराने प्रस्फुटित हो रहे हैं। पक्षियों का कलरव, भंवरों का गुंजन और मलयगिरी से उठती सुगंधियां भारत की समृद्धि-समरसता और एकता-अखंडता के भाव को लयबद्ध कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सड़कों, संस्थानों व प्रतिष्ठानों से उठती इंकलाब की गूंजे और वंदे मातरम के मधुर स्वर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590871/india-he-horizon-heights"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/370.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/050.jpg" alt="0" width="153" height="178"></img>
अरविंद जयतिलक,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा का जयघोष से देश झंकृत और चमत्कृत है। स्वाभिमान से देश का माथा दमक रहा है। अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर घर तिरंगा की ऊंची शान से आसमान गुंजायमान है। पर्वत, पठार नदियां, झरने सबसे आजादी के तराने प्रस्फुटित हो रहे हैं। पक्षियों का कलरव, भंवरों का गुंजन और मलयगिरी से उठती सुगंधियां भारत की समृद्धि-समरसता और एकता-अखंडता के भाव को लयबद्ध कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सड़कों, संस्थानों व प्रतिष्ठानों से उठती इंकलाब की गूंजे और वंदे मातरम के मधुर स्वर उन परवानों की याद दिला रहे हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अधीनता से आजादी तक का सफर त्याग और बलिदान का हैं। पतन से उत्थान तक का है। समर्पण और संकल्प का है। समर्पण व संकल्प का यह उच्चतम भाव और अनवरत आठ दशक की साधना से ही आज भारत उपलब्धियों के आसमान पर है। इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए देश को कई बदलावों से गुजरना पड़ा है। नतीजा आज देश संपूर्ण दुनिया को अपनी सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक उपलब्धियों की विराटता का बोध करा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत दुनिया का सबसे सफल लोकतांत्रिक देश बन चुका है, जिसकी सराहना दुनियाभर में होती है। आजादी के बाद ही भारत ने अपने सभी नागरिकों को ढेरों अधिकार दे दिए, जिससे नागरिकों को अपने व्यक्तित्व को संवारने की आजादी मिली। आज के भारत में जाति, धर्म, रंग, लिंग, कुल, गरीब व अमीर आदि के आधार समान है। जनमत का समर्थक भारत ने संसदीय शासन प्रणाली में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान किया है। आज भारत में सत्ता प्राप्ति के लिए खुलकर प्रतियोगिता होती है और साथ ही लोगों को चुनाव में वोट के द्वारा अयोग्य प्रतिनिधियों को हटाने का मौका भी देता है। देश का संविधान राज्य के लोगों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप करने का अधिकार सरकारों को नहीं दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है कि राजनीतिक दल सभाओं, भाषणों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा अन्य संचार माध्यमों से जनता को अपनी नीतियों और सिद्धांतों से अवगत कराते हैं। विरोधी दल संसद में मंत्रियों से प्रश्न पूछकर, काम रोको प्रस्ताव रखकर तथा वाद-विवाद द्वारा सरकार के भूलों को प्रकाश में लाते हैं। सरकार की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखते हुए उसकी नीतियों और कार्यों की आलोचना करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी इच्छानुसार शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने तथा धन का प्रबंध करने का अधिकार दिया है। भारतीय लोकतंत्र में शिक्षण-संस्थाओं को सहायता देते समय राज्य किसी शिक्षण संस्था के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं करता है, कि वह संस्था धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में है। इसी तरह भारतीय नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार हासिल है। इस व्यवस्था ने भारतीय नागरिकों को शासन-प्रशासन से सीधे सवाल-जवाब करने की नई लोकतांत्रिक धारणा को जन्म दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस व्यवस्था से सरकारी कामकाज में सुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ा है, जिससे आर्थिक विकास को तीव्र करने, लोकतंत्र की गुणवत्ता बढ़ाने और भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है। सूचना के अधिकार से सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगा है। यह चमकते-दमकते भारत का शानदार चेहरा है। 274 रुपये प्रति व्यक्ति आय के साथ शुरू हुआ आजादी का आर्थिक सफर आज भारत को दुनिया की ताकतवर आर्थिक महाशक्तियों की कतार में खड़ा कर दिया है। वह दिन दूर नहीं, जब भारत 2040 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा हासिल कर लेगा। </p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत की अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुकी है। यह भारत की समृद्धि, ताकत और तरक्की की पहचान है। सच कहें, तो आज भारत हर रोज तरक्की की नई इबारत लिख रहा है। कल-कारखाने, उद्योग धंधे और औद्योगीकरण से विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है। औद्योगीकरण और वैश्वीकरण ने भारतीय शिक्षा, विज्ञान व संचार के क्षेत्र को एक नया आयाम दिया है, जिसके जरिए वह नए-नए इनोवेशन के जरिए दुनिया को अचंभित कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज देश में कई विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान हैं। इनके जरिए आज भारतीय छात्र दुनियाभर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। कभी भारत अपने उपग्रह को स्थापित करने के लिए अमेरिका और रुस की मदद लेता था, लेकिन आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन-इसरो हर रोज नया कीर्तिमान रच रहा है। इसरो के जरिए स्वदेशी उपग्रहों के साथ कई विदेशी उपग्रह एक साथ भेजे जा रहे हैं। इन 79 वर्षों में देश ने समाज के अंतिम पांत के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लिए सामाजिक सुरक्षा व सेवाओं का विस्तार किया है।<strong> (ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong><br />        </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 05:08:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऐसे हुई ‘Account’ शब्द की उत्पत्ति, जानिए गणना से डिजिटल पहचान तक का दिलचस्प सफर</title>
                                    <description><![CDATA[‘Account’ शब्द आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है। बैंक अकाउंट से लेकर सोशल मीडिया प्रोफाइल और हिसाब-किताब तक, इसका इस्तेमाल लगभग हर जगह होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस शब्द की शुरुआत कहां से हुई और यह अपने मौजूदा अर्थ तक कैसे पहुंचा?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590749/account-word-origin-history-computare-acont"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/account-word-origin,-word-smith.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">‘अकाउंट’ शब्द आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। बैंक अकाउंट, सोशल मीडिया अकाउंट, हिसाब-किताब या किसी कंपनी का लेखा—हर जगह इसका इस्तेमाल होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शब्द की जड़ें हजारों साल पुरानी हैं? ‘Account’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के ‘computare’ से मानी जाती है, जिसका अर्थ था—गणना करना या हिसाब लगाना। बाद में लैटिन से यह शब्द पुरानी फ्रांसीसी भाषा में ‘acont’ के रूप में पहुंचा। मध्यकालीन अंग्रेजी में इसका रूप ‘account’ बना और धीरे-धीरे इसका अर्थ किसी चीज का हिसाब, विवरण या रिकॉर्ड हो गया। व्यापार के विस्तार के साथ अकाउंट शब्द का महत्व भी बढ़ता गया। व्यापारी अपने लेन-देन का लिखित रिकॉर्ड रखने लगे और आय-व्यय का पूरा हिसाब तैयार किया जाने लगा। इसी से ‘account’ का संबंध वित्तीय लेखांकन से मजबूत हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">समय के साथ इसका अर्थ केवल पैसों के हिसाब तक सीमित नहीं रहा। किसी घटना का विवरण देना भी ‘to account for’ कहलाने लगा। आधुनिक डिजिटल युग में यही शब्द ऑनलाइन पहचान के लिए भी इस्तेमाल होने लगा—जैसे ई-मेल अकाउंट, बैंक अकाउंट और सोशल मीडिया अकाउंट। इस तरह ‘अकाउंट’शब्द ने गणना से हिसाब और फिर डिजिटल पहचान तक का लंबा सफर तय किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Breaking News</category>
                                            <category>Trending News</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>कैंपस</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 05:00:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वाधीनता : लोकतंत्र के आत्ममंथन का समय</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की आजादी के 79 वर्ष पूरे होने पर देश के स्वतंत्रता सफर, संविधान की मूल भावना और ‘हम भारत के लोग’ की राष्ट्रीय पहचान पर विचार किया गया है। स्वतंत्रता दिवस को उत्सव के साथ संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती पर आत्ममंथन का अवसर बताया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590869/time-for-introspection-of-freedom-democracy"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/369.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/hnd2.jpg" alt="HND" width="117" height="152"></img>
हृदय नारायण दीक्षित, <br />पूर्व विधानसभा, <br />अध्यक्ष उत्तर प्रदेश 

<p style="text-align:justify;">भारतीय स्वतंत्रता की उम्र 79 वर्ष हो गई है। किसी राष्ट्र के लिए स्वाधीनता की 100-200 वर्ष की उम्र भी बहुत नहीं होती, लेकिन भारत के लिए 79 वर्ष का राष्ट्रजीवन बहुत महत्वपूर्ण है। देश स्वतंत्रता की 79 वीं वर्षगांठ का राष्ट्रीय उत्सव मना रहा है। उत्सव की बात स्वाभाविक है, लेकिन इसी अवसर पर देश को अपनी संवैधानिक संस्थाओं की गतिविधि पर भी ध्यान देना चाहिए। </p>
<p style="text-align:justify;">देश ने नवंबर 1949 में अपना संविधान अधिनियमित आत्मार्पित किया था। संविधान निर्माण के समुद्र मंथन से एक पवित्र अमृत तत्व प्रकट हुआ था। देश और संविधान निर्माताओं ने इस अमर तत्व का नाम ‘हम भारत के लोग’ रखा था। ‘हम भारत के लोग’ हमारा सामूहिक परिचय है। ‘हम भारत के लोग’ मिलजुल कर एक जन हैं। भारत जातियों और पंथों का गठजोड़ नहीं है। क्षेत्रीयताओं का योग भी राष्ट्र नहीं है। इस राष्ट्र के गठन का आधार संस्कृति है। यह संस्कृति सहस्त्रों वर्ष प्राचीन है। विशेष बात है एक सुनिश्चित भूखंड में इस संस्कृति की निरंतरता।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता है। भारत के लोग विषम परिस्थितियों में भी अपने देश की संप्रभुता के विरुद्ध कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होते। एक राष्ट्र राज्य के रूप में भारत ने लगातार स्वयं को सुदृढ़ किया है। भारत का विभाजन और पाकिस्तान का निर्माण साथ-साथ हुआ था। भारत शक्तिशाली होता गया और पाकिस्तान बिखर रहा है। भारत में उत्सव हैं और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भयानक सरकारी हिंसा है। बांग्लादेश में भी अशांति है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूरोपीय उपनिवेश बाद से मुक्त हुए अनेक देश टूट गए। इथ¨पिया, सूडान आदि भी विघटन का शिकार हुए। पश्चिमी यूरोप का यूगोस्लाविया 7 देशों में टूट गया। पूर्व का सोवियत संघ 15 टुकड़ों में हो गया। यूक्रेन और मध्य पूर्व में अभी भी टूट-फूट की प्रक्रिया जारी है। इधर हाल के दो दशकों में बने तमाम विकसित और विकासशील देश कई बार दिवालिया घोषित हुए। भारत की आर्थिक प्रतिष्ठा बनी रही। तमाम देशों में निर्वाचित सरकारों को फौजी तानाशाहों ने अपदस्थ किया। भारत में लोकतंत्र का सुंदर अनुशासन बना रहा। भारत एक राष्ट्र राज्य के रूप में अपनी संस्कृति के कारण अजर अमर और युवा राष्ट्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का स्वाधीनता संग्राम सांस्कृतिक था। 1857 का स्वाधीनता संग्राम विश्व इतिहास का अनूठा युद्ध है। अंग्रेजी सत्ता डर गई थी। ब्रिटिश सत्ता अपनी वैधानिकता सिद्ध करना चाहती थी। ब्रिटिश संसद में 1857 के ठीक 1 वर्ष बाद भारत शासन अधिनियम 1858 बना। दरअसल अंग्रेज यह सिद्ध करना चाहते थे कि वे भारत पर शासन विधि के अनुरूप चलाते हैं। 1861 में भारतीय परिषद कानून बना, लेकिन स्वाधीनता की मांग बढ़ती गई। </p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच एक अंग्रेज अधिकारी एओ ह्यूम ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की। 1892 में ब्रिटिश सत्ता ने भारतीय परिषद अधिनियम 1892 बनाया। 1909 में लार्ड मोर्ले और वायसराय मिंटो के सुधार आए। नया भारतीय परिषद अधिनियम बना। सेना, विदेशी कार्य और देशी रियासतों को छोड़कर बाकी विषयों पर बहस करने की शक्ति विधान परिषद को मिली। परिषद का आकार बढ़ा। अफसरों की संख्या घटी। निर्वाचित लोगों की संख्या बढ़ी।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव के माध्यम से जीत कर आए सदस्यों की संख्या बढ़ी। यहीं सांप्रदायिकता का प्रवेश हुआ। मुस्लिम संप्रदाय के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान हुआ। ध्यान दीजिए मुस्लिम लीग 1906 में बनी और तीन वर्ष के अंदर ही उसे सफलता मिली। कांग्रेस 1885 में बनी थी। मुस्लिम लीग उसका राष्ट्रवाद 21 वर्ष के भीतर ही निगल गई। ब्रिटेन की संसद में फिर नया भारत अधिनियम आया। भारत में 2 तरह की सरकारों की व्यवस्था हुई। </p>
<p style="text-align:justify;">केन्द्र में 2 सदन बने, लेकिन सारी ताकत गवर्नर जनरल के पास थी। 1935 में नया भारत शासन अधिनियम आया। राजनीतिज्ञों के पद बढ़े। सीटें बढ़ीं। स्वाधीनता के अवसर पर इस छोटे से विचार को जान लेना जरूरी है। 1935 के भारत शासन अधिनियम की ज्यादातर बातें भारत शासन अधिनियम में हैं। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन विचारणीय है। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां अंग्रेजों के खिलाफ थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वाधीनता का दबाव बढ़ रहा था। भारत की सांस्कृतिक चेतना में विस्फोट था। अंग्रेजी सत्ता झुक गई। ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पारित हुआ। यह कानून गवाह है कि भारत को मिली स्वतंत्रता किसी क्रांति का परिणाम नहीं है। ब्रिटिश संसद ने 4 जुलाई 1947 के दिन स्वतंत्रता अधिनियम बनाया। इधर संविधान बन रहा था।<br /> <br />देशवासी प्रसन्न थे कि अब भारत के पास अपनी संस्कृति आधारित राजव्यवस्था होगी। समतापूर्ण समाज होगा। विधि का शासन होगा। संवैधानिक संस्थाएं अपना अपना काम करेंगी। राजव्यवस्था संविधान का अनुसरण करेगी। भारत को भारत की नियति में विकसित होने का पूरा अवसर मिलेगा, लेकिन वैसा हुआ नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">संसद संप्रभु है। विधायिका में ही बजट पारण होता है। यही नए कानून बनते हैं। जरूरी हो, तो यहीं संविधान संशोधन होता है। सरकार विधायिका के प्रति जवाबदेह है। यहीं विधायिका के ही सदनों में सरकार के प्रति विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव आते हैं, लेकिन हमारी विधायी संस्थाएं लगभग 35 वर्ष से निराश कर रही हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">संसद और विधानमंडल के सदनों में एक दूसरे पर माइक फेंकने, अपशब्द कहने, गाली-गलौज करने की घटनाएं आश्चर्य पैदा नहीं करतीं। महत्वपूर्ण विधायी कार्यों का हुल्लड़ के बीच निपटारा आहतकारी है। सरकारें सदनों में विधेयक लाती हैं। भारी शोरगुल के बीच विधेयक पारित हो जाते हैं। महत्वपूर्ण विधायन पर भी कोई चर्चा नहीं होती। सदनों की कार्यवाही को बाधित करने के समाचार राष्ट्रजीवन को आहत करते हैं। बजट प्रावधानों पर भी चर्चा नहीं होती। क्या इस स्वाधीनता दिवस के पर्व पर हम अपनी संसदीय व्यवस्था पर आत्ममंथन की स्थिति में हैं? </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 04:58:44 +0530</pubDate>
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