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                <title>Special - Amrit Vichar</title>
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                <description>Special RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>विस्फोट से पहले अलर्ट करता है कंप्रेसर,  जानिए असली वजह और जानलेवा दुर्घटना से बचने का तरीका</title>
                                    <description><![CDATA[-सस्ती हाइड्रोकार्बन से फट रहे हैं एसी और फ्रीज के कंप्रेसर
-लखनऊ शहर में आगजनी की हुई है लगातार घटनाएं
-अचानक नहीं फटता कंप्रेसर उसके पहले देता है संकेत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586253/explainer--compressor-alerts-before-explosion--know-the-real-reason-and-the-way-to-avoid-a-fatal-accident"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/untitled-design-(8).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ, अमृत विचार: </strong>सामान्यत: लोग तकनीकी खराबी होने पर ही एसी की सर्विस कराते हैं, केवल गर्मी शुरू होने पर एक बार साफ-सफाई करा दी जाती है, जबकि प्रत्येक वर्ष कम से कम एक सर्विस और गर्मी में बीच-बीच में साफ सफाई जरूरी है। दरअसल इस्तेमाल होने पर एसी के आउटडोर में धूल जमा हो जाती है। गर्मी बढ़ने पर इस धूल के कारण एसी ओवरहीट होने पर कंप्रेसर में विस्फोट या आग लगने की घटनाएं हो रही हैं। एसी और रेफ्रिजरेटर के कंप्रेसर सस्ते गुणवत्ता का हाइड्रोकार्बन भी जल्दी गर्म होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार भारत की गर्म और धूलभरी जलवायु के कारण अन्य देशों की तुलना में एसी पर दबाव अधिक रहता है। बाहरी तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने पर कंप्रेसर पर कमरे की गर्मी बाहर निकालने के लिए लोड बढ़ जाता है। उस स्थिति में अगर कंडेनसर कॉयल पर धूल के अलावा गैस का असामान्य दबाव के अलावा वोल्टेज बार-बार ऊपर-नीचे हो या वायरिंग खराब होने की स्थिति में ओवरहीटिंग का खतरा बढ़ जाता है। यही स्थिति अक्सर कंप्रेसर में आग लगने या विस्फोट का कारण बनती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">इंटवर्टर तकनीक का एसी उपयुक्त्</h4>
<p style="text-align:justify;">इन्वर्टर तकनीक का एसी उच्च तापमान पर भी काम करने की क्षमता, मजबूत कंप्रेसर, बेहतर कूलिंग कॉयल और पर्याप्त ऊर्जा दक्षता (उच्च स्टार रेटिंग) वाला होता है। ये अधिक सुरक्षित माना जाता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">एसी लगाते समय किन बातों का रखें ध्यान</h4>
<p style="text-align:justify;">एसी प्रशिक्षित तकनीशियन से ही लगवाएं। बिजली की वायरिंग एसी के लोड के अनुसार होनी चाहिए तथा अलग एमसीबी और अर्थिंग की व्यवस्था हो। आउटडोर यूनिट ऐसी जगह लगाई जाए जहां उसके चारों ओर पर्याप्त हवा का प्रवाह हो। उसे बंद बॉक्स, संकरे शाफ्ट या सीधे तेज धूप में रखने से उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। गैस पाइप, ड्रेनेज और विद्युत कनेक्शन की समय-समय पर जांच भी आवश्यक है।<br />यह भी रखे ध्यान</p>
<p style="text-align:justify;">एसी के फिल्टर को प्रत्येक 15–30 दिन में साफ कराना चाहिए</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष में कम से कम एक बार पूरी सर्विस कराना आवश्यक</p>
<p style="text-align:justify;">लंबे समय तक 24–26 डिग्री पर ही चलाना चाहिए</p>
<p style="text-align:justify;">एक टन का एसी वातावरण को कितना करता है गर्म</p>
<p style="text-align:justify;">तकनीकी रूप से एक टन क्षमता का एसी कमरे से लगभग 3.5 किलोवाट (करीब 12,000 बीटीयू प्रति घंटा) गर्मी बाहर निकालता है। लेकिन यह केवल कमरे की गर्मी नहीं छोड़ता, बल्कि स्वयं जितनी बिजली खर्च करता है, वह ऊर्जा भी अंततः गर्मी के रूप में बाहर निकलती है। यदि एक टन का इन्वर्टर एसी औसतन 1 किलोवाट बिजली की खपत कर रहा हो, तो बाहर निकलने वाली कुल गर्मी लगभग 4.5 किलोवाट तक हो सकती है। एसी कमरे को ठंडा जरूर करता है, लेकिन बाहर के वातावरण में उससे अधिक गर्मी छोड़ता है। लखनऊ में अनुमान के अनुसार करीब 10 लाख एयर कंडिनशनर 35 लाख किलोवाट गर्मी पैदा कर रहे हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">रेफ्रिजरेटर भी इसी सिद्धांत पर करता है काम</h4>
<p style="text-align:justify;">रेफ्रिजरेटर भी कमरे के अंदर से गर्मी निकालकर पीछे लगी कंडेनसर कॉयल के माध्यम से बाहर छोड़ता है। इसलिए फ्रिज के पीछे की ग्रिल अक्सर गर्म महसूस होती है। यदि फ्रिज को दीवार से बिल्कुल सटाकर रखा जाए या उसके पीछे हवा के निकलने की जगह न हो, तो कंप्रेसर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और बिजली की खपत भी बढ़ जाती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">55 डिग्री तापमान में काम करते है घरेलू एयरकंडीशनर</h4>
<p style="text-align:justify;">भारत में घरेलू एयर कंडीशनर (स्प्लिट या विंडो) में लगाए जाने वाले कंप्रेसरों की "अधिकतम सहन क्षमता" आमतौर पर बाहरी तापमान के आधार पर बताई जाती है। अधिकांश सामान्य एसी लगभग 52 डिग्री सेल्सियस से से 55 डिग्री सेल्सियस तक के बाहरी तापमान पर काम करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। कई नए इन्वर्टर एसी निर्माता 55 डिग्री सेल्सियस तक संचालन का दावा करते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">इसे भी रखे याद</h4>
<p style="text-align:justify;">कंप्रेसर अचानक से नहीं फटता बल्कि फटने से पहले वह संकेत देता है जैसे ज़ोरदार खड़खड़ाहट की आवाज, हिसिंग की आवाज़, प्लास्टिक जलने जैसी गंध, एसी चालू होते ही एमसीबी का ट्रिप होना, कॉपर पाइप या इनडोर यूनिट पर बर्फ जमना, कूलिंग कम होना और एसी का बार-बार ट्रिप होना।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या कहते हैं विशेषज्ञ</h4>
<p style="text-align:justify;">एसी यदि बिना रुके चलता है, तो उसका कंप्रेसर लगातार रेफ्रिजरेंट गैस को सर्कुलेट करता रहता है। जब यह बिना रुके चलता है, तो उसके अंदर का दबाव और तापमान बहुत बढ़ जाता है। जब कंप्रेसर खराब होता है, तो अचानक धमाके जैसी आवाज़ आ सकती है। रेफ्रिजरेंट गैस के रिसाव का भी खतरा रहता है। आमतौर पर आजकल इस्तेमाल होने वाली गैसें सुरक्षित होती हैं, लेकिन सस्ती हाइड्रोकार्बन गैसों में आग लगने का जोखिम हो सकता है। यदि गैस का रिसाव खराब वायरिंग से निकलने वाली चिंगारी के संपर्क में आ जाए, तो आग लग सकती है। - <strong>प्रो. नरेन्द्र कुमार पाण्डेय, भौतिकी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय</strong></p>
<p style="text-align:justify;">विस्फोट के पीछे कई वैज्ञानिक और तकनीकी कारण एक साथ कार्य करते हैं। एयर कंडीशनर ऊष्मागतिकी के सिद्धांत पर आधारित एक ऊष्मा स्थानांतरण प्रणाली है। इसका कार्य कमरे की गर्मी को बाहर निकालना होता है। इस प्रक्रिया में कंप्रेसर रेफ्रिजरेंट गैस को उच्च दाब पर संपीडित करता है और कंडेंसर उस ऊष्मा को वातावरण में छोड़ता है। जब बाहरी तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, तब कंडेंसर के लिए वातावरण में ऊष्मा का निष्कासन कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप कंप्रेसर को अधिक समय तक और अधिक शक्ति के साथ कार्य करना पड़ता है। इससे विद्युत धारा, तापमान तथा ऊर्जा की खपत बढ़ जाती है। यहीं से जोखिम की शुरुआत होती है। यदि कंडेंसर की कॉइल (Coil) धूल और गंदगी से ढकी हो, बाहरी यूनिट के आसपास वायु संचार बाधित हो, या कूलिंग फैन ठीक से कार्य न कर रहा हो, तो मशीन के भीतर उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती। लगातार बढ़ता तापमान कंप्रेसर, मोटर की इंसुलेशन परत तथा इलेक्ट्रिक सर्किट को प्रभावित करता है। समय के साथ यही स्थिति आग लगने का कारण बन सकती है। <strong>-डॉ. आरके शुक्ला, भौतिक विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय</strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">ये भी पढ़ें  : </h5>
<h5 class="post-title" style="text-align:justify;"><a href="https://www.amritvichar.com/article/586249/pilibhit-s-yunus-shah-selected-for-asian-games--will-show-his-strength-in-nagoya--japan">पीलीभीत के यूनुस शाह का एशियाई खेलों में चयन, बोले- 'भारतीय जर्सी पहनना गर्व की बात'</a></h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पॉजिटिव स्टोरीज</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>Special</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/586253/explainer--compressor-alerts-before-explosion--know-the-real-reason-and-the-way-to-avoid-a-fatal-accident</link>
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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 12:29:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नागरिकता का प्रश्न और वैध दस्तावेज</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/cats5.jpg" alt="cats" width="104" height="133" />
सौरभ वार्ष्णेय,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">भारत में नागरिकता को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट अपने-आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि नागरिकता का निर्धारण केवल किसी एक दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के आधार पर होता है। यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों के भरोसे से भी जुड़ा है। आम नागरिक का सबसे बड़ा सवाल यही है-यदि आधार, वोटर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586223/the-question-of-citizenship-and-valid-documents"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/cats4.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/cats5.jpg" alt="cats" width="104" height="133"></img>
सौरभ वार्ष्णेय,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">भारत में नागरिकता को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट अपने-आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि नागरिकता का निर्धारण केवल किसी एक दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के आधार पर होता है। यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों के भरोसे से भी जुड़ा है। आम नागरिक का सबसे बड़ा सवाल यही है-यदि आधार, वोटर आईडी, पैन कार्ड और यहां तक कि पासपोर्ट भी अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आखिर भारतीय नागरिकता सिद्ध कैसे होगी?</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति नागरिक का विश्वास होता है। यदि नागरिक को अपने ही अधिकारों के प्रमाण को लेकर असमंजस रहे, तो यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती, इसलिए समय की मांग है कि नागरिकता प्रमाणन की प्रक्रिया स्पष्ट, सर्वसुलभ और विवाद-मुक्त बनाई जाए, ताकि किसी भी भारतीय को अपनी नागरिकता साबित करने के प्रश्न पर अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि पहचान और नागरिकता एक जैसी नहीं हैं। आधार कार्ड आपकी पहचान और निवास का प्रमाण है। वोटर आईडी मतदान के अधिकार का प्रमाण है। पैन कार्ड आयकर संबंधी पहचान है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति देता है। पासपोर्ट विदेश यात्रा और अंतर्राष्ट्रीय पहचान का दस्तावेज़ है, लेकिन इनमें से कोई भी दस्तावेज़ अकेले नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर नागरिकता कैसे तय होती है? भारत में नागरिकता का आधार नागरिकता अधिनियम, 1955 है। इस कानून के अनुसार नागरिकता प्राप्त करने के प्रमुख आधार हैं- जन्म के आधार पर, वंश के आधार पर, पंजीकरण द्वारा, प्राकृतिककरण द्वारा, किसी क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर प्रश्न उठता है तो संबंधित प्राधिकारी उपलब्ध दस्तावेज़ों, जन्म संबंधी अभिलेखों, माता-पिता की नागरिकता, सरकारी रिकॉर्ड तथा अन्य कानूनी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करता है। कोई एक दस्तावेज़ हर परिस्थिति में निर्णायक नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में जन्म प्रमाण पत्र को सबसे महत्वपूर्ण आधार दस्तावेज़ों में माना जाने लगा है, क्योंकि इससे जन्म तिथि और जन्म स्थान दोनों का रिकॉर्ड उपलब्ध होता है, लेकिन जिन लोगों का जन्म दशकों पहले हुआ और जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, उनके लिए स्कूल प्रमाणपत्र, भूमि अभिलेख, पारिवारिक रिकॉर्ड, सरकारी सेवा अभिलेख तथा अन्य आधिकारिक दस्तावेज़ भी परिस्थितियों के अनुसार महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद विपक्ष ने प्रश्न उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक किस दस्तावेज़ पर भरोसा करे। दूसरी ओर सत्तापक्ष का तर्क है कि दुनिया के अनेक देशों में भी पासपोर्ट नागरिकता निर्धारण का एकमात्र कानूनी आधार नहीं होता और विवाद की स्थिति में मूल नागरिकता रिकॉर्ड ही निर्णायक होते हैं। यह बहस संसद से लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों तक फैल चुकी है।<br />इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में आज तक ऐसा कोई एकल राष्ट्रीय नागरिकता प्रमाण-पत्र नहीं है, जिसे हर स्थिति में अंतिम माना जाए। परिणामस्वरूप लोग आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेज़ों को ही नागरिकता का प्रमाण समझ लेते हैं, जबकि कानून की दृष्टि से इनकी भूमिका अलग-अलग है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में केवल कानून होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका स्पष्ट और सरल संप्रेषण भी आवश्यक है। यदि नागरिकों में यह भ्रम बना रहे कि कौन-सा दस्तावेज़ वैध है और कौन-सा नहीं, तो इससे अनावश्यक भय और अफवाहें फैल सकती हैं। सरकार को चाहिए कि नागरिकता प्रमाणन संबंधी एक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे, जिसमें बताया जाए कि विभिन्न परिस्थितियों में कौन-कौन से दस्तावेज़ स्वीकार्य होंगे। इससे प्रशासनिक विवाद भी कम होंगे और नागरिकों का विश्वास भी बढ़ेगा। हर नागरिक को अपने जन्म, शिक्षा, परिवार और संपत्ति से जुड़े मूल सरकारी दस्तावेज़ सुरक्षित रखने चाहिए। दस्तावेज़ों का डिजिटलीकरण और समय-समय पर उनका अद्यतन कराना भी आवश्यक है। भविष्य में किसी भी कानूनी प्रक्रिया के दौरान यही रिकॉर्ड सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नागरिकता केवल एक कानूनी स्थिति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों का आधार है। इसलिए इस विषय पर राजनीति से अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता की आवश्यकता है। नागरिकों को भ्रमित करने के बजाय सरकार को एक सरल, एकीकृत और पारदर्शी नागरिकता प्रमाणन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/586223/the-question-of-citizenship-and-valid-documents</link>
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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 05:49:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उत्तराखंड : बढ़ते भूगर्भीय तनाव से बढ़ रहा है खतरा </title>
                                    <description><![CDATA[उत्तराखंड भूकंप की दृष्टि से जोन 4, 5 और 6 में विभाजित है। यहां इंडियन प्लेट निरंतर एशियन प्लेट के भीतर घुस रही है और भूगर्भीय तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586222/uttarakhand--rising-geological-stress-increases-the-risk"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-04/भूकंप.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/cats3.jpg" alt="cats" width="154" height="206"></img>
<strong>अमित शर्मा, हल्द्वानी</strong>

<p style="text-align:justify;">विज्ञान ने भले ही कितनी तरक्की कर ली हो। हम आदिवासी से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआई युग में पहुंच गए हैं, लेकिन प्रकृति से न तो उस समय और न ही आज के समय में हम जीत पाए हैं। बेशक, इतनी प्रगति तो हुई है कि संभावित खतरे की आहट भांपकर समय पूर्व तैयारियां कर उसके जोखिम को कम कर सकते हैं, लेकिन यह ठीक उसी तरह से है, जैसे हम जाने-अनजाने विनाश के कारणों को जन्म देकर उसे पाल पोसकर और समय-समय पर आमंत्रण देकर उससे बचने के उपाय तलाशें। </p>
<p style="text-align:justify;">हम बात कर रहे हैं भूकंप जैसी आपदा की, जिसने हाल ही में वेनेजुएला में कहर बरपाया है, जहां अब तक 1500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं, तो हजारों लोग अभी भी लापता हैं। तबाही के भयंकर मंजर का इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भूकंप के एक के बाद एक लगे तगड़े झटकों के बाद आई भीषण आपदा में वेनेजुएला का एक शहर तो लगभग पूरी तरह से तबाह हो चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां 7.2 और 7.5 तीव्रता के भूकंप ने तबाही मचाई है। शोध की बात करें तो दुनिया भर में हर साल लगभग पांच लाख भूकंप आते हैं, जिनमें से केवल लगभग 100,000 ही महसूस किए जाते हैं और 100 से नुकसान होता है। वर्ष 2000 से 2025 के बीच 6.0 से 6.9 तीव्रता के बीच औसतन 134 भूकंप आए।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं, वेनेजुएला में आए दो भूकंपों की तरह 7.0 से 7.9 तीव्रता के भूकंपों की संख्या प्रति वर्ष औसतन 14 से कम रही। आठ से अधिक तीव्रता वाले भूकंप तो और भी दुर्लभ हैं। औसतन प्रति वर्ष एक ही भूकंप आता है, हालांकि पिछले कुछ दशकों में कई ऐसे वर्ष भी रहे हैं, जिनमें आठ से अधिक तीव्रता का कोई भूकंप नहीं आया। इतिहास में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप वर्ष 1960 में चिली के बायोबियो में आया था। इस देश में 9.5 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें 1,655 लोग मारे गए थे और 20 लाख लोग बेघर हो गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अब बात करते हैं उत्तराखंड की। भूकंप की दृष्टि से जोन 4, 5 और 6 में विभाजित इस पर्वतीय राज्य की भूगर्भीय स्थिति कतई स्थिर नहीं है और वर्तमान में बेहद सक्रिय है। इंडियन प्लेट निरंतर एशियन प्लेट के भीतर घुस रही है और भूगर्भीय तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। भूगर्भ वैज्ञानिक मानते है कि उत्तराखंड की धरती पर कभी भी प्रलयकारी भूकंप आ सकता है। भूगर्भीय दृष्टि से हिमालय क्षेत्र पहले से ही बेहद संवेदनशील माना जाता रहा है। हिमालय की भूगर्भीय स्थिति सक्रिय होने के कारण हिमालय ऊपर उठ रहा है, जिसकी ऊंचाई साल दर साल बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) का नया जोन मानचित्र चौंकाने वाला है। नए जोन के मानचित्र के वैज्ञानिक वर्गीकरण में अब उत्तराखंड के कई क्षेत्रों को जोन 6 में शामिल कर दिया गया है, जिस कारण सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि देवभूमि की भूगर्भीय स्थिति अति संवेदनशील हो चुकी है, जिसके चलते वैज्ञानिक चिंतित हैं और चेताते हैं कि अपेक्षित भूकंप और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। लिहाजा भूकंपरोधी भवन निर्माण बचाव का बड़ा उपाय हो सकता है। यहां एक अच्छी रिपोर्ट है कि ऊधमसिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर के बागवाला में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत 1872 आवास भूकंपरोधी बनाए जा रहे हैं, जो भूकंप के निकट भविष्य के खतरे से निपटने के उपाय अपनाने की दिशा में बड़ा कदम बताता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नैनीताल स्थित डीएसबी कैंपस की भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. मौलीश्री जोशी बताती हैं कि इंडियन और एशियन प्लेट के बीच टकराव करोड़ों वर्षों से चला आ रहा है और वर्तमान में इन दोनों प्लेटों के घर्षण से बड़ा तनाव उत्पन्न हो रहा है। यह तनाव जब भी रिलीज होता है, तो भूकंप से धरती कांप उठती है। इधर, इंडियन प्लेट एशियन प्लेट के नीचे घुस रही है, जिस कारण इन दोनों प्लेटों के बीच तनाव निरंतर बढ़ रहा है, जिस कारण कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, हालांकि यह कब आएगा, भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">डीएसबी कैंपस के पूर्व विभागाध्यक्ष और भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. सीसी पंत की मानें तो नए जोन वर्गीकरण के अनुसार चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर और रुद्रप्रयाग को अति संवेदनशील भूकंप क्षेत्र जोन छह में शामिल किया गया है। ज़ोन पांच में उत्तरकाशी, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चंपावत को शामिल किया गया है। ज़ोन चार क्षेत्र में देहरादून, नैनीताल, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर शामिल किया गया है। मगर 2025 में जारी नए वर्गीकरण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि समूचे उत्तराखंड को जोन छह माना जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">भूगर्भ वैज्ञानिक मानते हैं कि भूकंप से बचाव के लिए भवन निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से होना चाहिए। जिस स्थान पर मकान बना रहे हों, वहां की भूमि ठोस होनी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में ठोस पत्थरों के ऊपर ही भवन बनाने बेहद जरूरी हैं। नदियों के तट से दूरी बेहद जरूरी है। मलबे वाली कच्ची जमीन पर कतई भवन निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में प्राचीन भवन निर्माण तकनीक भूकंपरोधी हुआ करती थी, जिसे आज भी अपनाया जा सकता है और भूकंप से बचा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब भूकंप से असली बचाव हमारे ही हाथ में है। यानी मजबूत घर और तैयार दिमाग। हिमालय बनना बंद नहीं होगा, प्लेट टकराना बंद नहीं होंगी। जापान में रोज भूकंप आते हैं, लेकिन लोग मरते नहीं, क्योंकि वहां नियम सख्त हैं और लोग तैयार हैं। डरिए मत, तैयारी कीजिए। एक-एक मजबूत मकान से और एक-एक जागरूक परिवार से, देवभूमि को हम और आप ही बचाएंगे, इसलिए अपना आशियाना हो या व्यापारिक प्रतिष्ठान, एक बार जरूर आकलन कर लें कि वह भूकंप से टक्कर लेने की स्थिति में है या नहीं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तराखंड</category>
                                            <category>देहरादून</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 05:42:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Scrub Typhus Alert: सिर्फ बुखार नहीं, लिवर और किडनी को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है स्क्रब टायफस, KGMU-PGI शोध में बड़ा खुलासा</title>
                                    <description><![CDATA[केजीएमयू और एसजीपीजीआई के संयुक्त अध्ययन में 22 मरीजों के लिवर एंजाइम, यूरिया और क्रिएटिनिन का स्तर सामान्य से कई गुना अधिक मिला। विशेषज्ञों ने समय पर जांच और इलाज को बताया जीवनरक्षक।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586153/scrub-typhus-liver-kidney-damage-kgmu-sgpgi-research-symptoms-treatment"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/muskan-dixit-(5).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ, अमृत विचारः</strong> स्क्रब टायफस को सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज करना गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। यह संक्रमण केवल तेज बुखार, सिरदर्द और बदन दर्द तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लिवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकता है। यह महत्वपूर्ण तथ्य ,,किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू),, और ,,संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई),, के संयुक्त शोध में सामने आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अध्ययन में पाया गया कि स्क्रब टायफस से संक्रमित मरीजों में लिवर और गुर्दों की कार्यक्षमता पर स्पष्ट प्रभाव देखा गया। इस शोध को यूरोपियन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड इंटरनेशनल हेल्थ ने भी मान्यता प्रदान की है।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में केजीएमयू के मेडिसिन विभाग के डॉ. जितेन्द्र सिंह, डॉ. वीरेन्द्र आतम, डॉ. राजीव वर्मा, डॉ. मुन्ना लाल पटेल, डॉ. अजय कुमार पटवा तथा एसजीपीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की डॉ. अंजू दिनकर शामिल रहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">शोध के दौरान स्क्रब टायफस से संक्रमित 22 मरीजों का अध्ययन किया गया। सभी मरीजों में संक्रमण की पुष्टि आईजीएम एलाइजा (IgM ELISA) जांच के माध्यम से हुई। इसके बाद की गई लैब जांच में लिवर एंजाइम एएलटी (ALT) और एएसटी (AST) के साथ-साथ किडनी की कार्यक्षमता दर्शाने वाले यूरिया और क्रिएटिनिन का स्तर सामान्य से कई गुना अधिक पाया गया। इससे स्पष्ट हुआ कि यह संक्रमण लिवर और गुर्दे दोनों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रब टायफस ओरिएंटिया त्सुत्सुगामुशी (Orientia tsutsugamushi) नामक बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है, जो संक्रमित चिगर (लार्वा) के काटने से फैलता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">केजीएमयू के मेडिसिन विभाग के डॉ. जितेन्द्र सिंह ने बताया कि अधिकांश मरीज शुरुआत में सामान्य वायरल बुखार जैसे लक्षणों के साथ अस्पताल पहुंचते हैं, जिससे बीमारी की पहचान में देरी हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने सलाह दी कि यदि किसी मरीज को बुखार के साथ लिवर एंजाइम बढ़े हुए मिलें, पीलिया हो, प्लेटलेट्स की संख्या कम हो या किडनी संबंधी समस्या दिखाई दे, तो स्क्रब टायफस की जांच जरूर करानी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते बीमारी की पहचान होने पर विशेष दवाओं के माध्यम से संक्रमण को नियंत्रित किया जा सकता है और लिवर, किडनी समेत अन्य अंगों को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/585988/laptop-on-lap-side-effects-health-risks-work-from-home-tips"><span class="t-red">क्या गोद में लैपटॉप रखकर काम करते हैं? </span>जानिए कैसे बढ़ सकता है त्वचा, रीढ़ और आंखों की समस्याओं का खतरा</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>Special</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 11:16:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व विजेता को सिखाने उतरा था आयरलैंड</title>
                                    <description><![CDATA[टी20 विश्व चैंपियन भारत को आयरलैंड ने लगातार दो मुकाबलों में हराकर 0-2 से ऐतिहासिक श्रृंखला जीत ली और साबित कर दिया कि क्रिकेट में नाम नहीं, तैयारी और अनुकूलन ही सबसे बड़े हथियार हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586056/ireland-stepped-out-to-teach-the-world-champions-a-lesson"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats587.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats588.jpg" alt="cats" width="147" height="198"></img>
<strong>प्रो. आरके जैन, शिक्षाविद्</strong>

<p>विश्व क्रिकेट में प्रतिष्ठा, ट्रॉफियां और रैंकिंग केवल रिकॉर्ड सजाती हैं। मैदान पर जीत उसी की होती है, जो परिस्थितियों को सबसे बेहतर पढ़ता है। 26 और 28 जून 2026 को बेलफास्ट ने भारतीय क्रिकेट को यही कठोर सच दिखा दिया। टी20 विश्व चैंपियन भारत को आयरलैंड ने लगातार दो मुकाबलों में हराकर 0-2 से ऐतिहासिक श्रृंखला जीत ली और साबित कर दिया कि क्रिकेट में नाम नहीं, तैयारी और अनुकूलन ही सबसे बड़े हथियार हैं। पहले मैच में 34 रन और दूसरे में महज एक रन की जीत ने आयरलैंड को इतिहास के शिखर पर पहुंचा दिया, जबकि भारत के आत्मसंतोष की परतें भी उधेड़ दीं। श्रेयस अय्यर की कप्तानी का आगाज जिस उम्मीद के साथ हुआ था, वह बेलफास्ट की ठंडी हवाओं में कड़ी हकीकत से टकरा गया।</p>
<p>बेलफास्ट में जीत का फैसला खिलाड़ियों के नाम नहीं, परिस्थितियों की समझ ने किया। आयरलैंड ने पिच, मौसम और स्विंग को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। पदार्पण कर रहे मैथ्यू हॉलर्ड ने सधी गेंदबाजी से भारतीय बल्लेबाजों को लगातार उलझाए रखा, जबकि लोरकन टकर ने धैर्य और आक्रामकता के संतुलन से जीत की नींव रखी। पांच प्रमुख खिलाड़ियों के बिना उतरी आयरिश टीम का अनुशासन और सामूहिक खेल पूरे मैच में दिखा। दूसरी ओर भारत विश्व कप जीत के आत्मविश्वास को सही रणनीति में नहीं बदल सका। विदेशी परिस्थितियों को हल्के में लेने का परिणाम यह हुआ कि स्विंग और विविध गेंदबाजी के सामने भारतीय बल्लेबाजी बार-बार बिखरी।</p>
<p>दोनों मुकाबलों का स्कोर कार्ड भारतीय टीम की कमजोरियों का आईना बन गया। पहले मैच में 182 रनों का लक्ष्य भारत को 148 पर रोक गया, जबकि दूसरे में 155 रनों का पीछा करते हुए टीम 153 रन पर थम गई। ये सिर्फ दो हार नहीं, बल्कि निर्णायक क्षणों में रणनीतिक चूकों की कीमत थीं। बल्लेबाज परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल नहीं सके और गेंदबाज दबाव के समय प्रभाव नहीं छोड़ पाए। दूसरी ओर आयरलैंड ने हर मौके को जीत में बदला। यही अंतर विश्व चैंपियन और उस दिन की बेहतर टीम के बीच साफ दिखा। इस श्रृंखला ने फिर साबित कर दिया कि क्रिकेट में किसी भी टीम को हल्के में लेना सबसे बड़ी भूल है।</p>
<p>बेलफास्ट ने भारतीय क्रिकेट की कई छिपी कमजोरियों से पर्दा हटा दिया। विश्व चैंपियन बनने के बावजूद टीम की गहराई, निरंतरता और मानसिक मजबूती सवालों के घेरे में आ गई। अनुभवी खिलाड़ियों की कमी और कुछ खिलाड़ियों की खराब फॉर्म ने संतुलन बिगाड़ दिया। सबसे बड़ी चिंता यह रही कि मुश्किल हालात में टीम समाधान खोजने के बजाय दबाव में बिखरती दिखी। इसके विपरीत सीमित संसाधनों वाली आयरिश टीम ने अनुशासन, सटीक तैयारी और सामूहिक खेल के दम पर असंभव को संभव कर दिखाया। इस जीत ने फिर साबित किया कि आधुनिक क्रिकेट में बड़े संसाधन नहीं, बल्कि सही रणनीति और उसे पूरी प्रतिबद्धता से लागू करने की क्षमता जीत दिलाती है।</p>
<p>श्रेयस अय्यर की कप्तानी का आगाज उम्मीदों के विपरीत दो लगातार हारों के साथ हुआ। यह झटका केवल परिणाम का नहीं, बल्कि रणनीतिक कमियों का भी था। टीम चयन, गेंदबाजों का उपयोग और मध्य ओवरों की योजना कई मौकों पर कमजोर दिखी। अभिषेक शर्मा ने उम्मीद जगाई, लेकिन बाकी बल्लेबाजी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। कप्तानी सिर्फ फैसले लेने का नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप पूरी टीम की सोच ढालने का कौशल भी है। बेलफास्ट में भारत इसी कसौटी पर पिछड़ गया। अब बहानों का नहीं, ईमानदार आत्ममंथन और ठोस सुधार का समय है।</p>
<p>भारतीय क्रिकेट का इतिहास बताता है कि बड़ी हारें अक्सर बड़े बदलाव की नींव बनती हैं। 2007 विश्व कप की निराशा के बाद टीम ने जिस तरह खुद को बदला, वह आज भी मिसाल है। बेलफास्ट की यह हार भी वैसा ही चेतावनी संकेत बन सकती है, यदि इससे सही सबक लिया जाए। आज विश्व क्रिकेट बदल चुका है, जहां छोटी टीमें भी तैयारी, डेटा विश्लेषण और मानसिक दृढ़ता के दम पर दिग्गजों को झुका रही हैं। आयरलैंड ने साबित कर दिया कि भूख, अनुशासन और परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता किसी भी बड़े नाम से अधिक ताकतवर होती है।</p>
<p>भारत को अब विदेशी परिस्थितियों के लिए अपनी मानसिक और तकनीकी तैयारी को नए स्तर पर ले जाना होगा।भारतीय प्रशंसकों के लिए यह श्रृंखला गहरी निराशा छोड़ गई। विश्व कप जीत का उत्साह अभी फीका भी नहीं पड़ा था कि बेलफास्ट ने जश्न को आत्ममंथन में बदल दिया, लेकिन खेल की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर हार सुधार का अवसर लेकर आती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>खेल</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 05:57:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सेवक नहीं, जनता का स्वामी मान बैठे हैं नौकरशाह</title>
                                    <description><![CDATA[आईएएस अफसरों में जबरदस्त ‘ब्रदरहुड’ देखा जाता है। ‘अति विशिष्ट’ होने की भावना उनमें इतनी प्रबल होती है कि अपने से इतर किसी और सेवा के अधिकारियों को ये पनपने ही नहीं देते।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586053/bureaucrats-have-come-to-regard-themselves-as-masters-of-the-public-rather-than-servants"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/034.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4.jpg" alt="अनिल त्रिगुणायत" width="173" height="173"></img>
<strong>अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ</strong>

<p style="text-align:justify;">भारत के पहले उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आईएएस को इस्पात का ढांचा (स्टील फ्रेम) कह महिमामंडन किया था। भारतीय संविधान में आईएएस अधिकारियों को अनुच्छेद 311 के अंतर्गत 'कार्यकाल की सुरक्षा' दी गई है। अखिल भारतीय सेवा के इन अफसरों को अनुच्छेद 312 एक स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रशासनिक ढांचा भी प्रदान करता है। आईसीएस (भारतीय सिविल सेवा) के स्थान पर आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) पद बने करीब 80 वर्ष हो चुके हैं। ऐसे में नौकरशाहों की भूमिका, उनकी प्रासंगिकता पर विश्लेषण के साथ-साथ उनके आधिकारिक क्रियाकलापों व समाज में उनके परिणामोन्मुखी योगदान पर दृष्टिपात लाजमी है। </p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सेवारत नौकरशाह अपने को ‘जनता का सेवक न मानते हुए स्वामी’ मान बैठे हैं। कार्य दिवसों में उनका अधिकांश समय तथाकथित बैठकों में व्यतीत होता है। पीड़ित व निरीह जनता से मिलना उन्हें अपनी झूठी शान के खिलाफ लगता है। लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में दो वर्षीय प्रशिक्षण के समय तो उनमें सेवाभाव का जज्बा हिलोरे लेता है, किंतु जब वे वहां से निकलकर फील्ड में सेवा को जाते हैं, तो उनका व्यवहार पूर्णतया परिवर्तित हो जाता है। जनसामान्य का तो मानना है कि जिले व राज्य मुख्यालय में सेवा करने के दौरान उनमें लार्ड कार्नवालिस (सिविल सेवा के जनक) की आत्मा प्रवेश कर जाती है। अपने व्यक्तित्व को अति विशिष्ट मानते हुए वे जनसामान्य से दूरी बनाने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है। अधिकांश ग्रामीण आधारभूत समस्याओं से दो-चार होते रहते हैं, हालांकि बेहतर जीवन स्तर के लिए ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायित हो रहे हैं, जिससे देश में शहरी जनसंख्या में तीव्रतम वृद्धि भी हो रही है। जाहिर है शहरी लोगों की भी अपनी दिक्कतें हैं। बुनियादी सुविधाओं अर्थात पेयजल, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य व खाद्य-पदार्थ वितरण प्रणाली के लिए उनकी निर्भरता ‘सरकारी सिस्टम’ पर टिक जाती है। सिस्टम यानी मंत्रालय/विभाग/निदेशालय के प्रशासनिक मुखिया नौकरशाह ही होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नीति निर्माण के अलावा उसके क्रियान्वयन के लिए वे प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होते हैं। आजादी के करीब आठ दशक बाद भी जिस देश की अधिकांश आबादी को मूलभूत सुविधाएं मयस्सर न हो सके तो इसके लिए सबसे बड़े दोषी नौकरशाह ही तो माने जाएंगे, क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी के वे ही पहरुआ होते हैं। देश में बुनियादी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। लाख टके का प्रश्न यह है कि आखिर कार्यपालिका परिणामोन्मुखी क्यों नहीं हो पा रही है? जनता में अपनी साख क्यों नहीं बना पा रही है? कार्य के प्रति ईमानदार व पारदर्शी क्यों नहीं हो पा रही है? पदलोलूपता, भाई-भतीजावाद, लालफीताशाही, विभागीय गलाकाट प्रतिस्पर्धा व अहम के भाव से क्यों नहीं उबर पा रही है? जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर खरी क्यों नहीं उतर पा रही? </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआती प्रशिक्षण के बाद एक आईएएस अफसर अपनी सेवा के दौरान लाल बहादुर प्रशासनिक संस्थान में पांच चरणों में ‘मध्य करियर प्रशिक्षण कार्यक्रम’ में शामिल होता है। प्रत्येक प्रशिक्षण कार्यक्रम के मूल में जनसेवा ही होती है, लेकिन ऐसे कितने आईएएस अफसर हैं, जो प्रशिक्षणोंपरांत सेवा भाव को आत्मसात कर दीन-दुखियों के चेहरे पर मुस्कान ला पा रहे हैं? सच तो यह है कि नौकरशाही जनता से अलग-थलग होकर काम करने लगी है। नतीजा यह है कि आमजन में न उनकी धाक जम पा रही न ही साख। </p>
<p style="text-align:justify;">लिखना लाजमी है कि नौकरशाहों के मनमाने तबादले व पोस्टिंग अक्सर राजनीतिक वफादारी या इच्छा पर निर्भर करती है। इससे उनका मनोबल तो गिरता ही है, वे निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर पाते। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था आज भी ब्रिटिश काल के ढांचे पर ही चल रही है, जिसमें जनकल्याण व समस्या-समाधान की बजाए सत्ता बनाए रखने पर अत्यधिक जोर होता है। वास्तविकता यह भी कि अकुशलता, अत्यधिक केंद्रीकरण व जवाबदेही में कमी के कारण नौकरशाही आमजन की नजर में अब कठघरे में खड़ी दिखने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरल कार्य को भी जटिलतम बना, उसमें अड़चनें पैदा करते रहना कोई आज के नौकरशाहों से सीखे। उनका दंभी स्वभाव आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय व लोकतांत्रिक सिद्धांत को बुरी तरह प्रभावित करते दिखता है। नौकरशाही की अक्षमताओं के कारण परियोजना निष्पादन में देरी, संसाधनों का गलत आवंटन व प्रशासनिक गुणवत्ता में निरंतर गिरावट देखने को मिल रही है। इसके अलावा, तकनीकी प्रगति व नीति नवाचारों को अपनाने में नौकरशाहों की उदासीनता से शासन संबंधी चुनौतियां बढ़ गई हैं, साथ ही आमजन भी बेहद प्रभावित हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में, शासन की रीढ़ माने जाने वाली नौकरशाही ‘बिना रीढ़’ की हो चली है। आज की नौकरशाही के बारे में आमजन की धारणा यह है कि ‘मर्सिडीज कार तो खड़ी है, लेकिन उसका इंजन गायब हो चुका है।’ केंद्र में मंत्रालय हों या राज्यों में विभाग, इन सभी जगहों के शीर्ष पर आईएएस अधिकारी ही कुंडली मारकर बैठे हैं। ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा’ की तर्ज पर वे विशेषज्ञों पर भारी तो पड़ते ही हैं, नीतियों के क्रियान्वयन में भी सबसे बड़े अवरोधभंजक बने रहते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर देश के अति महत्वपूर्ण गृह, वित्त, रक्षा, विदेश, शिक्षा तथा स्वास्थ्य मंत्रालयों के शीर्ष पद पर भी सचिव के रूप में आईएएस अफसर ही होते हैं। यही हाल राज्यों में विभागों का भी है। आईएएस अफसरों में जबरदस्त ‘ब्रदरहुड’ देखा जाता है। ‘अति विशिष्ट’ होने की भावना उनमें इतनी प्रबल कि अपने से इतर किसी और सेवा के अधिकारियों को ये पनपने ही नहीं देते। संविधान ने उनकी सेवा को स्टील फ्रेम में तो रखा है, लेकिन समय आ गया है कि वे अब अपने को जनता का सेवक मानकर अपनी साख व धाक बचाएं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में सर्व शक्तिशाली जनता ही होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 05:49:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लखनऊ का 113 साल पुराना नगर निगम मुख्यालय बनेगा धरोहर संग्रहालय, 24 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री वैश्विक नगरोदय योजना के तहत लालबाग स्थित ऐतिहासिक भवन के संरक्षण की तैयारी। जर्जर छत बदलेगी, फॉल्स सीलिंग हटेगी और नगर निगम के इतिहास को संग्रहालय के रूप में संजोया जाएगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586022/lucknow-nagar-nigam-headquarters-heritage-museum-24-crore-proposal"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-01/muskan-dixit-(6)8.png" alt=""></a><br /><p><strong>लखनऊः </strong>राजधानी के लालबाग स्थित नगर निगम के 113 साल पुराने मुख्यालय को जल्द ही धरोहर संग्रहालय का स्वरूप दिया जाएगा। इसके लिए नगर निगम मुख्यमंत्री वैश्विक नगरोदय योजना के तहत करीब 24 करोड़ रुपये*का प्रस्ताव तैयार कर रहा है। योजना के तहत भवन की मरम्मत, नई छत का निर्माण और फॉल्स सीलिंग हटाकर इसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा।</p>
<h4><strong>संग्रहालय में दिखेगा नगर निगम का इतिहास</strong></h4>
<p>प्रस्ताव के अनुसार, भवन को इस तरह विकसित किया जाएगा कि यहां आने वाले लोग नगर निगम के इतिहास, उसकी कार्यप्रणाली और विरासत से जुड़ी जानकारियां देख और समझ सकें। भवन को संग्रहालय जैसा स्वरूप देने के लिए आंतरिक और बाहरी संरचना का संरक्षण भी किया जाएगा।</p>
<h4><strong>जर्जर छत बदलेगी, बारिश में टपकते पानी से मिलेगी राहत</strong></h4>
<p>पुराने भवन की छत काफी कमजोर हो चुकी है और बरसात के दौरान कई स्थानों से पानी टपकता है। मरम्मत कार्य के तहत नई छत डाली जाएगी, जबकि कमरों में लगी फॉल्स सीलिंग हटाकर भवन की मूल संरचना को संरक्षित किया जाएगा।</p>
<h4><strong>नए मुख्यालय में शिफ्ट होने के बाद शुरू होगा काम</strong></h4>
<p>नगर निगम का नया मुख्यालय गोमती नगर स्थित केंद्रीय कार्यशाला परिसर में निर्माणाधीन है, जिसके अगले वर्ष अप्रैल तक तैयार होने की उम्मीद है। इसके बाद मुख्यालय को नए भवन में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। नगर निगम के मुख्य अभियंता महेश वर्मा के अनुसार, पुराने भवन को संग्रहालय में बदलने का कार्य मुख्यालय के शिफ्ट होने के बाद शुरू किया जाएगा।</p>
<h4><strong>1927 से नगर निगम के उपयोग में है भवन</strong></h4>
<p>लालबाग स्थित यह भवन 6 अक्टूबर 1927 को नगर निगम ने रेलवे से एक लाख रुपये*देकर लीज पर लिया था। लंबे समय से यह भवन नगर निगम मुख्यालय के रूप में उपयोग में है और शहर की प्रशासनिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।</p>
<h4><strong>खस्ताहाल भवन में काम कर रहे हैं करीब 500 कर्मचारी</strong></h4>
<p>वर्तमान में इसी जर्जर भवन में नगर निगम मुख्यालय के साथ जोन-1 कार्यालय भी संचालित हो रहा है। यहां लगभग 500 कर्मचारी और अधिकारी कार्यरत हैं। भवन में कई बार प्लास्टर और फॉल्स सीलिंग गिरने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। नए मुख्यालय के तैयार होने के बाद मुख्यालय गोमती नगर और जोन-1 कार्यालय चकबस्त रोड स्थित निर्माणाधीन भवन में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a class="post-title" href="https://www.amritvichar.com/article/586016/chhapra-anand-vihar-superfast-express-daily-train-new-schedule-lucknow"><span class="t-red">रेलवे का बड़ा फैसला: </span>छपरा-आनंद विहार सुपरफास्ट एक्सप्रेस अब चलेगी रोज, लखनऊ समेत इन शहरों के यात्रियों को राहत</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>Special</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/586022/lucknow-nagar-nigam-headquarters-heritage-museum-24-crore-proposal</link>
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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 12:11:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की बढ़ती भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हुए हैं। नतीजे में दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और वैश्विक एसेट मैनेजर भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586003/the-growing-role-of-foreign-investors-in-the-bond-market"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/rajat.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/rajat.jpg" alt="RAJAT" width="185" height="165"></img>
<strong>रजत मेहरोत्रा</strong><br /><strong>वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ</strong>

<p>भारत में निवेश की चर्चा होते ही अधिकांश लोगों के मन में शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और बैंक एफडी का विचार आता है, लेकिन भारतीय वित्तीय प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसा भी है, जो वर्षों से अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है। यह हिस्सा है भारत का बॉन्ड या ऋण बाजार। आज यह बाजार एक ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जो आने वाले वर्षों में सरकार, उद्योग, निवेशकों और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हुए हैं। भारत के कुछ सरकारी बॉन्ड प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर के पेंशन फंड, बीमा कंपनियां, सॉवरेन वेल्थ फंड, केंद्रीय बैंक और वैश्विक एसेट मैनेजर भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह केवल विदेशी पूंजी का प्रवाह नहीं है, बल्कि भारतीय वित्तीय बाजार के वैश्वीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। </p>
<p style="text-align:justify;">विभिन्न अनुमानों के अनुसार भारत का कुल बॉन्ड बाजार 230 से 250 लाख करोड़ रुपये से अधिक का माना जाता है। इसमें सरकारी प्रतिभूतियों का हिस्सा सबसे बड़ा है, जबकि कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार भी धीरे-धीरे विस्तार कर रहा है। इसके बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अभी भी कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र का अगला बड़ा अवसर मान रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के सरकारी बॉन्ड पहले ही JPMorgan Government Bond Index-Emerging Markets तथा Bloomberg Emerging Market Local Currency Index जैसे प्रमुख वैश्विक सूचकांकों में शामिल हो चुके हैं, हालांकि कुछ अन्य वैश्विक सूचकांकों में पूर्ण शामिलीकरण की प्रक्रिया अभी भी विभिन्न परिचालन और नियामकीय सुधारों पर निर्भर है। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत वैश्विक ऋण निवेशकों के लिए तेजी से एक महत्वपूर्ण गंतव्य बनता जा रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">विदेशी संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का सबसे पहला प्रभाव बॉन्ड की मांग पर पड़ता है। जब किसी बॉन्ड को खरीदने वाले निवेशकों की संख्या बढ़ती है, तो उसकी कीमत बढ़ती है और उसकी यील्ड अर्थात प्रतिफल दर कम हो जाती है। इस स्थिति से सरकार और कंपनियों दोनों को लाभ मिल सकता है, क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत कम लागत पर पूंजी जुटाने का अवसर प्राप्त होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि सरकार की उधारी लागत पर सकारात्मक दबाव पड़ता है, तो आधारभूत संरचना, रेल, सड़क, ऊर्जा, जल प्रबंधन और विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को गति मिल सकती है। भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में विकास परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक पूंजी की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। एक मजबूत बॉन्ड बाजार इस आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस परिवर्तन का प्रभाव केवल सरकार या कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी इसका लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से गिल्ट फंड, टारगेट मैच्योरिटी फंड, कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड और भारत बॉन्ड ईटीएफ जैसे निवेश साधनों में निवेश करने वालों के लिए यह सकारात्मक अवसर हो सकता है। यदि बॉन्ड यील्ड में गिरावट आती है, तो पहले से जारी बॉन्ड की कीमतों में वृद्धि होती है, जिससे कई डेट फंडों के एनएवी में सुधार देखने को मिल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेशी पूंजी प्रवाह का एक अन्य संभावित प्रभाव भारतीय रुपये पर पड़ सकता है, जब विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड खरीदते हैं, तो उन्हें रुपये की आवश्यकता होती है, जिससे भारतीय मुद्रा की मांग बढ़ती है, हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि इससे रुपया अनिवार्य रूप से मजबूत होगा, क्योंकि मुद्रा की दिशा तेल कीमतों, व्यापार घाटे, वैश्विक डॉलर प्रवृत्तियों और भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियों सहित अनेक कारकों पर निर्भर करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर भी विदेशी निवेश प्रवाह रुपये पर दबाव कम करने और बाहरी स्थिरता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है, लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विदेशी निवेश अवसरों की तलाश में आता है और जोखिम बढ़ने पर तेजी से बाहर भी निकल सकता है। यदि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका पैदा होती है या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड बाजार से धन निकाल सकते हैं। ऐसी स्थिति में बॉन्ड कीमतों में गिरावट और यील्ड में वृद्धि देखी जा सकती है। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:25:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बांग्लादेश ने बढ़ाई भारत की चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[2024 में आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586002/bangladesh-has-heightened-india-s-concerns"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats574.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/naveen.jpg" alt="NAVEEN" width="131" height="178"></img>
<strong>नवीन गुप्ता, बरेली</strong>

<p style="text-align:justify;">बांग्लादेश की सत्ता में बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान की ताजपोशी के बाद नई दिल्ली को उम्मीद थी कि ढाका के साथ रिश्तों का एक नया और सकारात्मक अध्याय शुरू होगा, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। बांग्लादेश अब रणनीतिक रूप से पूरी तरह चीन के पाले में खड़ा दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक नजदीकियां और नए समझौते न केवल भारत की बाहरी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हैं, बल्कि द्विपक्षीय व्यापारिक हितों को भी गहरी चोट पहुंचा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही बांग्लादेश की धरती पर फिर से पनपता कट्टरपंथ और भारत विरोधी माहौल हमारी आंतरिक शांति के लिए आने वाले समय में बड़ी बाधा बन सकता है, हालांकि कूटनीतिक मर्यादा के तहत भारत सरकार ने अभी भी रिश्ते सुधारने की उम्मीद नहीं छोड़ी है और लगातार प्रयास जारी हैं। साल 2024 में आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत रहे और यही वजह थी कि उस दौर में वहां अमेरिका, चीन या पाकिस्तान जैसे देशों की दाल नहीं गल पाती थी। हसीना अपने फैसले हमेशा बांग्लादेश और भारत के साझा हितों को ध्यान में रखकर लेती थीं, जिससे अमेरिका और चीन जैसे देश उनसे लगातार चिढ़ते रहे। </p>
<p style="text-align:justify;">कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सेंट मार्टिन द्वीप जैसे मुद्दों पर अपनी संप्रभुता न छोड़ने के कारण ही अमेरिका ने वहां हसीना के खिलाफ पर्दे के पीछे से तख्तापलट का खेल रचा। हसीना के बाद अंतरिम सरकार के मुखिया बने मोहम्मद यूनुस ने न सिर्फ भारत विरोधी फैसले लिए, बल्कि पाकिस्तान के साथ रक्षा सौदों और सैनिकों के प्रशिक्षण को लेकर समझौते भी कर लिए। भारत के सबसे संवेदनशील हिस्से यानी ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को घेरने के लिए पाकिस्तान और चीन के साथ कूटनीतिक नींव उन्होंने ही रखी थी। </p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव के बाद जब तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने, तो कूटनीतिक सुधारों की उम्मीद जगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है और आज ढाका की हुकूमत भारत की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाले फैसले और तेजी से ले रही है। बांग्लादेश ने भारत की आपत्तियों को दरकिनार कर तीस्ता नदी जल प्रबंधन परियोजना के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहयोग मांग लिया है। चीन तो लंबे समय से वहां पैर जमाने की फिराक में था, जो उसे इस प्रोजेक्ट के बहाने मिल गया। </p>
<p style="text-align:justify;">तीस्ता नदी सिक्किम से निकलती है और इसके जल बंटवारे को लेकर भारत-बांग्लादेश में पुराना विवाद है, ऐसे में अब इसमें तीसरे पक्ष के रूप में चीन की एंट्री भारत की क्षेत्रीय कूटनीति को कमजोर करेगी। सबसे बड़ा खतरा यह है कि चीन इस परियोजना के बहाने अपने जिन तकनीकी विशेषज्ञों को वहां तैनात करेगा, वे भारत के ‘चिकन नेक’ की गतिविधियों पर सीधे और पर पैनी नजर रखेंगे। इतना ही नहीं, बांग्लादेश ने भारत को एक और बड़ा आर्थिक और रणनीतिक झटका देते हुए अपने मोंगला बंदरगाह को चीन के हवाले करने का फैसला किया है, जहां बीजिंग अब ‘स्पेशल इकोनॉमिक जोन’ विकसित करेगा। </p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि साल 2015 में भारत ने मोंगला पोर्ट के विकास के लिए बांग्लादेश के साथ समझौता किया था, जिसका काम भारत के हिरानंदानी ग्रुप को सौंपना तय हुआ था, लेकिन साल 2025 में मोहम्मद यूनुस की सरकार ने यह प्रोजेक्ट भारत से छीन लिया और अब तारिक रहमान ने उसी भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए इसे आधिकारिक तौर पर चीन को सौंप दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी ‘बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक गलियारे’ के प्रस्ताव को तारिक रहमान सरकार ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इस गलियारे के जरिए चीन भारत को रणनीतिक रूप से चारों तरफ से घेरना चाहता है, जिसमें तारिक रहमान एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। इस कॉरिडोर से न केवल भारत की बल्कि अमेरिका की चिंताएं भी बढ़ेंगी, क्योंकि वाशिंगटन ने जिस मकसद से हसीना का तख्तापलट होने दिया, वह फेल हो गया है और चीन वहां अपनी जड़ें पूरी तरह मजबूत कर बड़े आर्थिक पैकेज का एलान कर रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच, भारत ने सद्भावना के तौर पर बांग्लादेशी नागरिकों के लिए टूरिस्ट वीजा सेवा फिर से बहाल कर दी है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इसे संबंधों को पटरी पर लाने वाली कोई ठोस पहल नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, बांग्लादेश सरकार चाहती है कि भारत पश्चिम बंगाल से बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजना बंद करे, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत में ऐसा होना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल की राजनीति में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा बेहद संवेदनशील रहा है। वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और केंद्र सरकार इस रुख पर कायम हैं कि अवैध घुसपैठियों को वापस भेजा जाएगा और अब तक 4800 से अधिक घुसपैठियों को डिपोर्ट भी किया जा चुका है। </p>
<p style="text-align:justify;">बांग्लादेश की संसद और वहां के कट्टरपंथी दल अब इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ जमकर जहर उगल रहे हैं। इतिहास खुद को दोहरा रहा है। तारिक रहमान की मां बेगम खालिदा जिया ने भी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में हमेशा भारत के हितों की अनदेखी की थी और पाकिस्तान-चीन की शह पर काम किया था। आज उनके पुत्र भी उसी राह पर चल पड़े हैं। ऐसे में भारत को अपनी पूर्वी सीमा की सुरक्षा और कूटनीति को लेकर अत्यंत सतर्क रहने की जरूरत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:13:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय : तनाव की वापसी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम यदि दस दिन के भीतर ही गंभीर सैन्य टकराव में बदलने लगे, तो यह केवल दो देशों के बीच तनाव नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की अस्थिरता का संकेत है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हवाई हमले किए, जबकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर। यदि बहरीन, कुवैत या अन्य खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डे लगातार लक्ष्य बनते हैं, तो युद्ध का दायरा स्वतः इन देशों तक फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। </p>
<p style="text-align:justify;">ध्यातव्य है कि अमेरिका-ईरान और इज़राइल-हिज़्बुल्लाह के संघर्ष परस्पर जुड़े अवश्य हैं, पर दोनों पूर्णतः</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586001/editorial--the-return-of-tension"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy24.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम यदि दस दिन के भीतर ही गंभीर सैन्य टकराव में बदलने लगे, तो यह केवल दो देशों के बीच तनाव नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की अस्थिरता का संकेत है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हवाई हमले किए, जबकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर। यदि बहरीन, कुवैत या अन्य खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डे लगातार लक्ष्य बनते हैं, तो युद्ध का दायरा स्वतः इन देशों तक फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। </p>
<p style="text-align:justify;">ध्यातव्य है कि अमेरिका-ईरान और इज़राइल-हिज़्बुल्लाह के संघर्ष परस्पर जुड़े अवश्य हैं, पर दोनों पूर्णतः एक ही युद्ध विराम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, इसलिए किसी एक मोर्चे पर हिंसा दूसरे मोर्चे को भी अस्थिर कर देती है। ट्रंप का यह बयान कि यदि ईरान युद्ध विराम तोड़ता रहा तो ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है’, अत्यंत गंभीर और अस्थिरता बढ़ाने वाला बयान है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के अस्तित्व पर सार्वजनिक धमकी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की भाषा नहीं मानी जाती और इससे समझौते की संभावनाएं कमजोर होती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">ईरान होर्मुज को खोल भले दे, लेकिन उस पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ेगा। वह यहां के समुद्री यातायात पर कड़े नियम लागू करने की कोशिश करेगा। ऐसे में होर्मुज पर समझौता दूर की कौड़ी है, इसलिए जब तक सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक समझौते पर स्थायी सहमति नहीं बनती, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर अनिश्चितता बनी रहेगी। ईरान की परमाणु सुविधाओं की अंतर्राष्ट्रीय जांच पर अमेरिकी जिद बेकार है, ईरान इसके लिए कभी राजी नहीं होगा। अमेरिका, ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत दे भी तो 28 लाख करोड़ के मुआवजे को ले कर पेच है। खाड़ी के किसी देश ने इसमें सहयोग की सहमति नहीं जताई है और उनके अनुसार वे ईरान के हमले से नुकसान उठा चुके हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">असल में मुआवजे के हकदार तो वे हैं। वे एक ऐसे युद्ध का मुआवजा क्यों दें, जो उन्होंने छेड़ा ही  नहीं। जब तक उन्हें सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं मिलती, वे मुआवजा नहीं देंगे। असल में क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों की भूमिका और होर्मुज़ की सुरक्षा- ये सभी मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हीं पर दोनों पक्षों के बीच सबसे गहरे मतभेद हैं, इसलिए यह मान लेना कि शीघ्र ही स्थायी युद्ध विराम हो जाएगा, यथार्थवादी नहीं होगा। स्थायी शांति तभी संभव है, जब दोनों पक्ष अपनी अधिकतम मांगों से पीछे हटने को तैयार हों, जिसकी संभावना नहीं दिखती और मौजूदा हालात ने युद्ध विराम अथवा स्थायी शांति की उम्मीदों को और धुंधला कर दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए इस संकट का सबसे उपयुक्त मार्ग वही है, जो उसकी पारंपरिक विदेश नीति का आधार रहा है— रणनीतिक संतुलन। भारत को किसी सैन्य ध्रुव का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर जोर देना चाहिए। साथ ही तेल आयात के स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का सुदृढ़ीकरण और भारतीय नागरिकों व समुद्री व्यापार की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पश्चिम एशिया में स्थिरता केवल क्षेत्रीय आवश्यकता नहीं, भारत की ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा प्रश्न है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:06:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> शादी के बाद गर्लफ्रेंड की वही 'क्यूट' आदतें क्यों लगने लगती हैं 'ड्रामा'? रिश्तों की बदलती सच्चाई समझिए</title>
                                    <description><![CDATA[डेटिंग में जो बातें लगती हैं प्यार की निशानी, वही शादी के बाद क्यों बन जाती हैं तनाव की वजह? जानिए रिश्तों के बदलते मनोविज्ञान की पूरी कहानी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585989/dating-vs-marriage-relationship-tips-love-after-marriage-hindi"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/muskan-dixit-(46)6.png" alt=""></a><br /><p><strong>लखनऊः </strong>प्रेम और विवाह, दोनों एक ही रिश्ते के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। प्रेम के दिनों में जो बातें दिल को छू जाती हैं, वही शादी के बाद कभी-कभी झुंझलाहट की वजह बन जाती हैं। अक्सर लोग मजाक में कहते हैं कि शादी के बाद इंसान बदल जाता है, लेकिन सच यह है कि ज्यादातर मामलों में इंसान नहीं, बल्कि परिस्थितियां और जिम्मेदारियां बदलती हैं। यही बदलाव रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदल देता है। डेटिंग के दौरान एक-दूसरे के लिए समय निकालना, छोटी-छोटी बातों पर मनाना, घंटों फोन पर बातें करना और हर पल साथ रहने की इच्छा बेहद रोमांटिक लगती है, लेकिन शादी के बाद जब जिंदगी में परिवार, करियर, आर्थिक जिम्मेदारियां और सामाजिक दायित्व जुड़ जाते हैं, तो इन्हीं आदतों का अर्थ बदलने लगता है, जो बातें पहले प्यार का प्रतीक थीं, वे कभी-कभी तनाव या दबाव का कारण भी बन सकती हैं।</p>
<h4><strong>जब फिक्र लगने लगती है निगरानी</strong></h4>
<p>प्रेम संबंधों में अक्सर लड़कियों का बार-बार फोन करना या संदेश भेजकर यह पूछना कि “खाना खाया?”, “कहां हो?”, “क्या कर रहे हो?” लड़कों को अच्छा लगता है। इससे उन्हें महसूस होता है कि कोई उनकी परवाह करता है और उनकी जिंदगी में उनकी अहमियत है, लेकिन शादी के बाद जब यही सिलसिला लगातार जारी रहता है, तो कई पुरुष इसे अलग नजरिए से देखने लगते हैं। ऑफिस के दबाव, काम की व्यस्तता और जिम्मेदारियों के बीच उन्हें कभी-कभी लगता है कि उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। दरअसल व्यवहार वही रहता है, लेकिन परिस्थितियां बदल जाने के कारण उसका अर्थ भी बदल जाता है।</p>
<h4><strong>रूठना-मनाना: रोमांस से जिम्मेदारी तक</strong></h4>
<p>डेटिंग के दिनों में छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाना अक्सर रिश्ते का सबसे प्यारा हिस्सा माना जाता है। पार्टनर को मनाने के लिए फूल देना, सरप्राइज प्लान करना या प्यार भरी बातें करना रोमांचक लगता है। उस समय रिश्ते का केंद्र केवल दो लोग होते हैं।<br />शादी के बाद स्थिति कुछ अलग होती है। अब रिश्ते के साथ घर की जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश, आर्थिक प्रबंधन और सामाजिक दायित्व भी जुड़ जाते हैं। ऐसे में बार-बार नाराज होना या हर छोटी बात पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देना कई बार साथी को थका सकता है। पति को लगने लगता है कि समस्याओं का समाधान खोजने की बजाय अनावश्यक विवाद पैदा किए जा रहे हैं। इसलिए जो नखरे कभी प्यारे लगते थे, वे बाद में अपरिपक्वता जैसे प्रतीत होने लगते हैं।</p>
<h4><strong>समय की मांग और रिश्तों का विस्तार</strong></h4>
<p>डेटिंग के दिनों में अधिकांश लोग अपने साथी को ही अपनी दुनिया मान लेते हैं। हर खाली समय साथ बिताने की इच्छा स्वाभाविक होती है, लेकिन शादी केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का भी मिलन होती है।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(46)6.png" alt="MUSKAN DIXIT (46)" width="1280" height="720"></img><br />विवाह के बाद पति-पत्नी दोनों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार, रिश्तेदारों और सामाजिक संबंधों के लिए भी समय निकालें। ऐसे में यदि कोई साथी केवल अपने लिए ही पूरा समय चाहता है, तो दूसरे व्यक्ति को यह व्यवहार असंतुलित लग सकता है। शादी में व्यक्तिगत जरूरतों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी होता है।</p>
<h4><strong>क्या सचमुच बदल जाता है प्यार</strong></h4>
<p>अक्सर कहा जाता है कि शादी के बाद प्यार खत्म हो जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। प्यार खत्म नहीं होता, बल्कि उसका स्वरूप बदल जाता है। डेटिंग के दौरान प्यार का प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है, जबकि शादी के बाद वही प्यार जिम्मेदारियों, सहयोग, त्याग और साथ निभाने के रूप में सामने आता है।</p>
<p>जब पति देर रात तक काम करता है, परिवार की जरूरतों का ध्यान रखता है या भविष्य के लिए बचत करता है, तब भी वह अपने तरीके से रिश्ते के प्रति समर्पण दिखा रहा होता है। उसी तरह पत्नी जब घर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभालती है, तो वह भी अपने प्रेम को व्यवहार में बदल रही होती है।</p>
<h4><strong>शॉपिंग और खर्चों का बदलता गणित</strong></h4>
<p>प्रेम संबंधों में गर्लफ्रेंड के साथ शॉपिंग करना, उसे उपहार देना और उसकी पसंद की चीजें खरीदना अक्सर खुशी का कारण बनता है। उस समय आर्थिक जिम्मेदारियां सीमित होती हैं और भविष्य की चिंताएं अपेक्षाकृत कम होती हैं, लेकिन शादी के बाद तस्वीर बदल जाती है। अब घर का बजट, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, निवेश, लोन और भविष्य की सुरक्षा जैसे कई पहलू सामने आ जाते हैं। ऐसे में यदि खर्चों पर नियंत्रण न हो, तो तनाव बढ़ सकता है। इसलिए वही लंबी शॉपिंग, जो कभी रोमांटिक अनुभव लगती थी, बाद में आर्थिक दबाव का कारण महसूस हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि प्यार कम हो गया है, बल्कि प्राथमिकताएं बदल गई हैं।</p>
<h4><strong>पजेसिवनेस: प्यार या अविश्वास</strong></h4>
<p>रिश्ते की शुरुआत में थोड़ी-सी जलन या पजेसिवनेस को अक्सर प्यार की निशानी माना जाता है। जब गर्लफ्रेंड पूछती है कि “उस लड़की से इतनी देर क्या बात कर रहे थे?” तो कई लड़कों को यह एहसास अच्छा लगता है कि कोई उन्हें खोने से डरता है, लेकिन विवाह के बाद यही व्यवहार अलग रूप ले सकता है। यदि हर दोस्ती, हर बातचीत या हर सामाजिक संपर्क पर सवाल उठने लगें, तो यह साथी को असहज कर सकता है। शादी का रिश्ता भरोसे की मजबूत नींव पर टिका होता है, जब पजेसिवनेस जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है, तो वह प्रेम से ज्यादा अविश्वास का संकेत लगने लगती है। यही कारण है कि शादी के बाद कई पुरुष ऐसी बातों को प्यार नहीं, बल्कि शक के रूप में देखने लगते हैं।</p>
<h4><strong>रिश्ते को मजबूत बनाने का मंत्र</strong></h4>
<p>विवाह के बाद रिश्तों में आने वाले अधिकांश तनावों की जड़ गलतफहमियां और संवाद की कमी होती है। यदि पति-पत्नी एक-दूसरे की भावनाओं, जरूरतों और जिम्मेदारियों को समझने का प्रयास करें, तो कई समस्याएं स्वतः समाप्त हो सकती हैं। एक सफल विवाह वही है, जहां दोनों साथी यह समझें कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और रिश्तों को भी उसी अनुसार परिपक्व होना पड़ता है। प्यार केवल रोमांस का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे की चुनौतियों को समझने, सम्मान देने और साथ मिलकर आगे बढ़ने का नाम है। अंततः गर्लफ्रेंड की जो आदतें शादी के बाद ‘ड्रामा’ लगने लगती हैं, उनका कारण अक्सर व्यक्ति का बदलना नहीं, बल्कि जीवन की बदलती परिस्थितियां होती हैं। यदि रिश्ते में संवाद, विश्वास और समझदारी बनी रहे, तो शादी के बाद भी वही पुराना प्यार नए और अधिक मजबूत रूप में कायम रह सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Beauty Tips</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 17:37:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत की विरासत पर बड़ा सवाल: 5000 साल पुरानी सभ्यता के बावजूद राष्ट्रीय धरोहर स्थलों की नई सूची क्यों नहीं?</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत के बावजूद राष्ट्रीय धरोहर स्थलों के व्यापक दस्तावेजीकरण की मांग उठ रही है। लेख में नए सर्वे, 'नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स' और ऐतिहासिक, धार्मिक व प्राकृतिक स्थलों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585983/india-national-heritage-sites-new-register-ayodhya-kashi-mathura"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/muskan-dixit-(35)7.png" alt=""></a><br /><p><strong>अयोध्याः </strong> ऐसा कैसे हो गया कि भारत जैसा देश, जिसका 5000 साल से भी पुराना इतिहास और समृद्ध विरासत रही है, वह धरोहर स्थलों के मामले में अमेरिका जैसे देश से बुरी तरह पिछड़ गया, जिसका कुल इतिहास मुश्किल से तीन सौ साल पुराना है। इस पिछड़ेपन के पीछे की सच्चाई क्या है? जब विकास के आधुनिक संकेतकों जैसे पुल, अस्पताल, स्टेडियम और कल कारखानों की बात हो, तो हमें आश्चर्य नहीं होता। यदि कोई कहे कि हम इन मामलों में अमेरिका जैसे विकसित देशों से बहुत पीछे हैं, लेकिन बात तब हजम नहीं होती, जब कोई कहे कि भारत ऐतिहासिक धरोहर स्थलों के मामले में भी ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। मन में तुरंत सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है बात बड़ी सीधी है। देश के धरोहर स्थल, जो हमारे चारों ओर बहुतायत में फैले हैं, उन्हें सूचीबद्ध करने का हमने कोई व्यवस्थित प्रयास ही नहीं किया। यह एक बहुत बड़ी विडंबना है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमने कुछ नहीं किया। अंग्रेजों की बनाई सूची को हम किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह पवित्र मानकर बैठ गए। हमने अपनी इतिहास और परंपरा के अनुरूप देश के धरोहर स्थलों की राष्ट्रीय सूची बनाने का प्रयास ही नहीं किया, जब धरोहर स्थलों की सूची की बात आएगी, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि हम अभी भी ब्रिटिश राज में ही जी रहे हैं।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>हनुमानगढ़ी</strong></span></h4>
<p>अयोध्या की प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर 18 वीं शताब्दी में बनाया गया था। इस स्थान का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है। लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो उन्होंने बजरंग बली को अयोध्या की रक्षा करने का आदेश दिया था, तब हनुमानजी एक गुफा में निवास करते थे। बाद में किले के रूप में हनुमानगढ़ी का निर्माण कराया गया। </p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(40)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (40)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गुलाबबाड़ी और बहू बेगम मकबरा</strong></span></h4>
<p>फैजाबाद स्थित गुलाबबाड़ी का इतिहास भी 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। इसे अवध के तीसरे नवाब ने बनवाया था। यह केवल स्मारक नहीं है, उस समय की उत्कृष्ट स्थापत्य कला, सुसज्जित उद्यान शैली और सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक है। इसी तरह बहू बेगम मकबरे का निर्माण 18 वीं शताब्दी में अवध की बेगम उम्मतुज्जोहरा की याद में बनाया गया था। इसे पूरब का ताजमहल कहते हैं। </p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>समकालीन होने के बावजूद सूची में अंतर</strong></span></h4>
<p>हनुमानगढ़ी और गुलाबबाड़ी दोनों लगभग 18 वीं शताब्दी के हैं, लेकिन गुलाबबाड़ी सूची में शामिल है। वहीं हनुमानगढ़ी उस सूची में शामिल नहीं है। ऐसे दर्जनों स्थान हैं, जो सूची में शामिल नहीं हैं।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष से जुड़े स्थानों और स्मारकों की अनदेखी</strong></span></h4>
<p>हल्दीघाटी का मैदान, जहां राणा प्रताप ने अकबर का लोहा लिया, जहां गुरु तेगबहादुर जी ने अपना शीशदान दिया, चमकौर का यह स्थान जहां 40 सिखों ने वीरगति प्राप्त की, ऐसे ही अनगिनत स्थान हैं, जो हर दृष्टि से राष्ट्रीय धरोहर स्थल घोषित किए जाने के योग्य हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि इन्हें राष्ट्रीय धरोहर स्थल का दर्जा नहीं दिया गया है। 1857 की लड़ाई की याद में सैकड़ों स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में हैं, लेकिन ये सभी अंग्रेज सैनिकों के सम्मान में हैं। भारतीय सेनानियों की याद में कुछ ढूंढे भी नहीं मिलता है। फतेहपुर का वह इमली का पेड़, जहां 1858 में अंग्रेजों ने 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटका दिया, झारखंड के वे स्थान जहां तिलका मांझी, सिधो-कान्हू और बिरसा मुंडा ने अपने प्राणों की आहुति दी, बाबू कुंवर सिंह की याद दिलाता उनका खंडहर घर और ऐसे ही अनगिनत स्थानों को हमने अब तक राष्ट्रीय धरोहर स्थल क्यों नहीं माना?</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(36)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (36)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>सूची में उपेक्षित अयोध्या, मथुरा और काशी</strong></span></h4>
<p>अयोध्या, मथुरा और काशी देश के साथ सभ्यता की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन शहरों की विरासत धरोहर स्थलों की सूची को मौजूदगी के सापेक्ष न के बराबर कहा जा सकता है। मथुरा में कुल 44 स्थान हैं। इनमें कुछ मंदिर हैं। वाराणसी में अब कुल 17 स्थान है, लेकिन अयोध्या में केवल छह स्थान इस सूची में शामिल हैं। इनमें तीन टीले पहला मणि पर्वत, कुबेर पर्वत और सुग्रीव पर्वत, दूसरा बेनी खानम का मकबरा, तीसरा गुलाबबाड़ी, चौथा बहू बेगम मकबरा, पांचवा हाजी इकबाल का मकबरा और परिसर और अंतिम शुजाउद्दौला का मकबरा है। अयोध्या आज से नहीं अतीत से मंदिरों की नगरी रही है, जबकि यहां के कई मंदिर कई सौ साल पुराने हैं। श्रीराम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, त्रेता नाथ मंदिर, बड़ी जगह दशरथ महल, राजद्वार, श्री नागेश्वर नाथ, लक्ष्मण मंदिर शेषावतार,रंगमहल, रत्न सिंहासन राजगद्दी, छोटी देवकाली, लक्ष्मण किला, सदगुरू सदन गोलाघाट, हनुमत निवास, हनुमत सदन, तपस्वी जी की छावनी, श्री मणिराम जी की छावनी, कालेराम मंदिर, तुलसीदास जीकी छावनी, तीन कलश तिवारी मंदिर जैसे कई ऐसे मंदिर हैं, जो कई सौ साल से अपनी आभा बिखेर रहे हैं, लेकिन सूची में इनका नामो निशान नहीं है। यह तब है, जब सभ्यता और संस्कृति ने यहीं जन्म लिया, लेकिन अयोध्या का एक भी मंदिर इस सूची में नहीं है। पुरातत्व की दृष्टि इसे उपेक्षित ही नहीं घोर उपेक्षित कहा जा सकता है।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(38)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (38)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>इस्लामी एवं ब्रिटिश स्मारकों को विशेष महत्व</strong></span></h4>
<p>भारत के हजारों साल के इतिहास में इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल की अवधि मुश्किल से एक हजार वर्ष रही। वह भी पूरे भारत में नहीं रही। ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरा भारत सीधे तौर पर इस्लामी या ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया हो। इसके बावजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में अधिकतर स्थान इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल से ही जुड़े हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची पर इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल के अत्यधिक प्रभाव को दर्शाने के लिए बनारस का उदाहरण देखने लायक है। हिंदुओं के इस प्राचीन शहर में पुराने मंदिरों और उनके अवशेषों की भरमार है, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने बनारस के जिन 20 स्थानों को अपनी सूची में शामिल किया है, उसमें एक भी मंदिर नहीं है, जबकि 20 चयनित स्थानों में अंग्रेजों की पांच कब्रगाहें, एक मस्जिद, एक मकबरा और अन्य स्थान शामिल है।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>प्राकृतिक स्थलों को कोई मान्यता नहीं</strong></span></h4>
<p>यूनेस्को ने जिन विश्व धरोहर स्थलों की सूची बनाई है, उनमें विशिष्ट प्राकृतिक स्थलों जैसे उत्तराखंड में फूलों की घाटी के साथ-साथ बंगाल, असम और राजस्थान के अभयारण्य शामिल किए गए हैं, लेकिन हमने ऐसी कोई राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर सूची नहीं बनाई, जिनमें विशिष्ट जलस्रोतों, वनों, पर्वतों एवं अन्य महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थलों को शामिल किया गया हो। जब केवल ईंट और पत्थर से बने स्मारकों को महत्व दिया जाएगा, तब भारत के वनाच्छादित क्षेत्र जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्य पिछड़ जाएंगे, लेकिन प्राकृतिक धरोहर स्थलों के मामले में ये राज्य अन्य राज्यों से बहुत आगे साबित होंगे।</p>
<h4><strong><span style="color:rgb(224,62,45);">परंपरा का प्रतिनिधित्व की आवश्यकता</span></strong></h4>
<p>जितनी समस्याओं का जिक्र किया गया है, उनका समाधान बड़ा सीधा है। वास्तव में हमें अपने धरोहर स्थलों की एक बिल्कुल नई सूची तैयार करनी होगी, एक ऐसी सूची जो हमारे इतिहास और हमारी परंपरा का सही मायने में प्रतिनिधित्व करे। इस सूची में उन सभी स्थानों और स्मारकों को शामिल किया जाना चाहिए, जो हमें अपनी प्राचीन सभ्यता से जोड़कर रखने में मदद करते हों। इस नई सूची के कई फायदे हैं। मसलन हमारी राष्ट्रीय पहचान मजबूत होगी। इनके संरक्षण में मदद मिलेगी। उनकी निगरानी संभव बनेगी। पर्यटन को भरपूर प्रोत्साहन मिलेगा। इतिहास को विकृत करने के प्रयास कमजोर होंगे। लोग समझदार और सहनशील होंगे। </p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(41)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (41)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>मान्यताओं से जुड़े स्थानों का कोई स्थान नहीं</strong></span></h4>
<p>भारत के चप्पे-चप्पे से ऋषि-मुनियों एवं पौराणिक पात्रों का जुड़ाव रहा है। अति प्राचीन होने के कारण इस जुड़ाव को साबित करने के लिए किसी प्राचीन इमारत के अवशेष प्रायः नहीं मिलते, लेकिन लोक परंपरा में रखा है। यदि इमारत को छोड़ दें, तो ऐसे कई बातें हैं, जिनसे इन स्थानों की प्राचीनता सिद्ध होती है। कर्नाटक में कोप्पल जिले में स्थित किष्किंधा पर्वत, हरियाणा में कुरुक्षेत्र का युद्ध स्थल, अयोध्या में रामजन्मभूमि, मथुरा में गोवर्धन पर्वत, आजमगढ़ में दुर्वासा ऋषि का आश्रम ऐसे न जाने कितने स्थान हैं, जिन्हें हम अपनी धरोहर का अटूट हिस्सा मानते हैं। दुर्भाग्य वश इन्हें हमारे राष्ट्रीय धरोहर स्थलों की सूची में शामिल नहीं किया गया है।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>राष्ट्रीय स्मारक तथा पुरावशेष मिशन</strong></span></h4>
<p>इस पर काम करने के लिए साल 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राष्ट्रीय स्मारक तथा पुरावशेष मिशन के गठन का निर्देश दिया। साल 2007 में गठित हुआ। 2012 में पूरा काम करने के लिए कहा गया, लेकिन मिशन अपना काम पूरा नहीं कर पाया।  </p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>काशी में दो हजार से ज्यादा धरोहर स्थल चिह्नित</strong></span></h4>
<p>दिल्ली के रहने वाले विमल कुमार सिंह ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के साथ मिलकर काशी में एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम किया। नौ साल में पूरे हुए इस प्रोजेक्ट के तहत काशी में दो हजार से ज्यादा धरोहर स्थलों को चिंहित किया गया।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स की जरूरत</strong></span></h4>
<p>अपने पायलट प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद देश की धरोहरों को सहेजने के लिए विमल कुमार सिंह ने नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स की जरूरत बताई। यह रजिस्टर भारत के समृद्ध इतिहास और परंपरा को सही अर्थो में अभिव्यक्ति प्रदान करे।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(37)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (37)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>धरोहर स्थल की विस्तृत परिभाषा की जरूरत</strong></span></h4>
<p>पायलट प्रोजेक्ट के बाद विमल कुमार सिंह ने धरोहर स्थल की विस्तृत परिभाषा की जरूरत महसूस की। उन्होंने अपने मंतव्य  में कहा कि धरोहर स्थलों की हमें एक ऐसी परिभाषा पर सहमत होना चाहिए, जो एक सनातन सभ्यता के रूप में हमारे अस्तित्व को आधार प्रदान करे। इसके लिए हमें अंग्रेजों की बनाई संकुचित परिभाषा से बाहर निकलना चाहिए। एक स्वतंत्र देश और एक प्राचीन सभ्यता के वारिस के रूप में हमें धरोहर स्थल के रूप में ऐसे स्थानों को स्वीकार करना चाहिए।</p>
<p>-वे सभी स्थान या स्मारक, जिन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है। हमें किसी चयनित स्थान को सूची से हटाने की जरूरत नहीं है।</p>
<p>-वे सभी स्थान या स्मारक, जिन्हें राज्य सरकारों ने राज्य द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया है।</p>
<p>-वे स्थान जो किसी प्रमुख ऐतिहासिक घटना जैसे युद्ध या किसी विशिष्ट आयोजन आदि के गवाह रहे हैं। जैसे हल्दी घाटी का मैदान, फतेहाबाद का वह ईमली का पेड़, जहां 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई आदि।</p>
<p>-लोक स्मृति से जुड़े स्थान, जिनका संबंध किसी पौराणिक घटना या व्यक्ति से बताया जाता है। जैसे किष्किंधा पर्वत जहां राम और सुग्रीव के बीच मित्रता हुई थी, कुरुक्षेत्र जहां महाभारत का युद्ध हुआ था आदि। जिन स्थानों पर लोग पारंपरिक रूप से निश्चित तिथि में मेला लगाकर या कोई उत्सव मनाकर इकट्ठा होते हैं, उन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।</p>
<p>-कोई भी स्मारक या ढांचा, जो हमारे इतिहास की किसी प्रमुख घटना, व्यक्ति या कालखंड से जुड़ा रहा है या जो अतीत की किसी कला शिल्प या जीवनशैली को समझने में मदद करता हो।</p>
<p>-सौ साल के भीतर बना हुआ कोई ढांचा या स्मारक, जिसका निर्माण किसी प्राचीन पद्धति से किया गया हो या जो अपनी असाधारण विशिष्टता के कारण स्थान विशेष की पहचान का हिस्सा बन गया हो। इस श्रेणी में हम दिल्ली स्थित अक्षरधाम, बिड़ला मंदिर आदि को भी एक धरोहर स्थल मान सकते हैं।</p>
<p>-विशिष्ट प्राकृतिक या भौगोलिक स्थान, जो सैकड़ों वर्ष से अस्तित्व में हैं और अपने आप में दुर्लभ है।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/chatgpt-image-jun-28,-2026,-04_39_34-pm.png" alt="muskan dixit" width="1536" height="1024"></img></p>
<h4><strong><span style="color:rgb(224,62,45);">प्रधानमंत्री को सौंपा पत्र</span></strong></h4>
<p>पायलट प्रोजेक्ट करने वाले विमल कुमार सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने बताया कि दुनिया के सभी सभ्य देश अपने धरोहर स्थलों की आधिकारिक सूची बनाते हैं। यह सूची उनकी सांस्कृतिक पहचान को एक औपचारिक स्वरूप और गरिमा प्रदान करती है। इसलिए भारत के धरोहर स्थलों को सहेजने के लिए नए सिरे से सर्वे के साथ गंभीर काम की आवश्यकता बताई।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/585890/-isro-semi-cryogenic-engine-hot-test-175-ton-thrust-lvm3-upgrade"><span class="t-red">ISRO ने रचा नया कीर्तिमान: </span>सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का हाई थ्रस्ट हॉट टेस्ट सफल, अंतरिक्ष मिशनों को मिलेगी नई ताकत</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पॉजिटिव स्टोरीज</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>अयोध्या</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 16:47:57 +0530</pubDate>
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