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                <title>सम्पादकीय - Amrit Vichar</title>
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                <title>संपादकीय: महत्वाकांक्षी मिशन </title>
                                    <description><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश को डेटा सेंटर, स्टार्टअप और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का केंद्र बनाने संबंधी जिन नीतियों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरी झंड़ी दिखाई है वे राज्य की अर्थव्यवस्था को पुराने उद्योगों के ढर्रे से बाहर निकालकर ज्ञान-आधारित आधुनिकता की ओर ले जाने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को डिजिटल अवसंरचना, डेटा प्रबंधन, एआई अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में देश का एक अग्रणी राज्य बनाने का है।</p>
<p>सच है कि उत्तर प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में डेटा सेंटर निवेश को आकर्षित करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश के सबसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584266/editorial--ambitious-mission"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy2.jpg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश को डेटा सेंटर, स्टार्टअप और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का केंद्र बनाने संबंधी जिन नीतियों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हरी झंड़ी दिखाई है वे राज्य की अर्थव्यवस्था को पुराने उद्योगों के ढर्रे से बाहर निकालकर ज्ञान-आधारित आधुनिकता की ओर ले जाने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को डिजिटल अवसंरचना, डेटा प्रबंधन, एआई अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में देश का एक अग्रणी राज्य बनाने का है।</p>
<p>सच है कि उत्तर प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में डेटा सेंटर निवेश को आकर्षित करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश के सबसे बड़े डेटा सेंटर पार्कों में से कुछ का विकास नोएडा और ग्रेटर नोएडा में हो रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से निकटता, विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार, बेहतर एक्सप्रेसवे नेटवर्क और अपेक्षाकृत सस्ती भूमि उपलब्धता ने निवेशकों को आकर्षित किया है। <br />यदि प्रदेश वास्तव में दो गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता विकसित करने के अपने लक्ष्य को हासिल कर लेता है, तो यह भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे में उसकी केंद्रीय और रणनीतिक भूमिका स्थापित कर देगा। इसी प्रकार, नई स्टार्टअप नीति के माध्यम से राज्य के युवाओं को उद्यमिता की ओर प्रेरित करने का सरकारी प्रयास भी अत्यंत स्वागतयोग्य है।</p>
<p>देश की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले राज्य के लिए यह समय की मांग है कि वह केवल नौकरी तलाशने वालों का प्रदेश न रहकर रोजगार सृजित करने वाले युवाओं का हब बने। एआई, फिनटेक, एग्रीटेक, हेल्थटेक और डीप-टेक जैसे भविष्य के तकनीकी क्षेत्रों में स्टार्टअप संस्कृति का विकसित होना राज्य की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है, लेकिन बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या यह डिजिटल सपना जमीन पर उतरने के लिहाज से यथार्थवादी है? और यदि हां, तो इसकी वास्तविक सफलता की अनिवार्य शर्तें क्या हैं? डेटा सेंटर अत्यधिक बिजली तथा पानी की खपत करते हैं। ऐसे में यदि भविष्य में डेटा सेंटरों की मांग तेजी से बढ़ती है, तो क्या राज्य की ऊर्जा अवसंरचना उसी गति से खुद को विकसित कर पाएगी? </p>
<p>कहीं इससे पारंपरिक उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं पर बिजली-पानी का अतिरिक्त दबाव तो नहीं पड़ेगा? डेटा सेंटरों में निवेश तो बहुत विशाल होता है, लेकिन पैदा होने वाले प्रत्यक्ष रोजगार काफी सीमित। प्रस्तावित 'एआई सिटी' और राज्यव्यापी स्टार्टअप हब की अवधारणा भी केवल तभी सफल हो सकती है, जब विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच एक वास्तविक व्यावहारिक साझेदारी  विकसित हो। उत्तर प्रदेश को भी इसी राह पर अपनी अकादमिक संस्कृति को सुधारना होगा। इन चुनौतियों के बावजूद, इस पूरी सरकारी पहल का सबसे सकारात्मक और सराहनीय पहलू यह है कि उत्तर प्रदेश पहली बार भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था को लेकर एक दीर्घकालिक और प्रगतिशील सोच प्रदर्शित कर रहा है। </p>
<p>यदि स्टार्टअप नीति को केवल कागजों के बजाय सीधे राज्य के विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों से व्यावहारिक रूप से संबद्ध किया जाए; और यदि एआई मिशन को केवल बाहरी निवेश आकर्षित करने का जरिया बनाने के बजाय वास्तविक ज्ञान सृजन का माध्यम बनाया जाए, तो यह निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को समृद्ध दिशा दे सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 08:07:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: आग बड़ी या लापरवाही</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक बीएनबी होटल में लगी भीषण आग राजधानी की प्रशासनिक विफलता, शहरी अव्यवस्था, नियामकीय भ्रष्टाचार और आपदा प्रबंधन की कमजोरियों का सामूहिक अभियोग है। हर बड़ी आग के बाद शोक, मुआवजा और जांच की घोषणा होती है, लेकिन कुछ महीनों बाद अगली त्रासदी तक सब कुछ सामान्य हो जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583893/editorial--the-fire%E2%80%94or-the-negligence"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy1.jpg" alt=""></a><br /><p>दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक बीएनबी होटल में लगी भीषण आग राजधानी की प्रशासनिक विफलता, शहरी अव्यवस्था, नियामकीय भ्रष्टाचार और आपदा प्रबंधन की कमजोरियों का सामूहिक अभियोग है। हर बड़ी आग के बाद शोक, मुआवजा और जांच की घोषणा होती है, लेकिन कुछ महीनों बाद अगली त्रासदी तक सब कुछ सामान्य हो जाता है। छह कमरों की अनुमति ले 25 कमरे बना देना ऐसी अनियमितता नहीं है, जिसे प्रशासन देख न पाया हो। किसी भवन में अतिरिक्त निर्माण, व्यावसायिक उपयोग, बिजली लोड में वृद्धि, पानी और सीवर कनेक्शन, ग्राहकों की आवाजाही— ये सब खुलेआम दिखाई देने वाली गतिविधियां हैं। यदि वर्षों तक यह सब चलता रहा, तो इसका अर्थ है कि या तो निगरानी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय था, या फिर उसने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं। </p>
<p>दिल्ली में जनवरी 2021 से मई 2026 के बीच आग की घटनाओं में सैकड़ों लोगों की मृत्यु और हजारों के घायल होने के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि समस्या किसी एक होटल या एक इलाके तक सीमित नहीं है। पालम, विवेक विहार, द्वारका, रिठाला और अब मालवीय नगर— लगातार हो रही घटनाएं बताती हैं कि हमने हादसों से सीखने की संस्कृति विकसित नहीं की है। दिल्ली में बड़ी संख्या में गेस्ट हाउस, पीजी, बीएनबी और ओयो आधारित आवासीय प्रतिष्ठान ऐसे क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं, जो मूलतः आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत हैं। इनमें से अनेक के पास वैध फायर एनओसी नहीं है, न पर्याप्त अग्निशमन उपकरण, न आपातकालीन निकास और न ही क्षमता के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था। यदि एक न्यायिक याचिका के अनुसार हजार से अधिक लाइसेंसी होटलों में से केवल कुछ दर्जन के पास फायर एनओसी है, तो यह किसी एक विभाग की नहीं बल्कि पूरे शासन तंत्र की विफलता है। </p>
<p>नगर निकाय का दावा है, इमारत का नक्शा स्वीकृत नहीं था, तो वह वर्षों तक संचालित कैसे होती रही? अग्निशमन विभाग की भूमिका भी कठघरे में है। अनापत्ति प्रमाणपत्र केवल एक कागज नहीं, जीवन सुरक्षा की गारंटी माना जाता है। यदि एनओसी नियमों की अनदेखी करके जारी की जाती है, या बिना एनओसी के प्रतिष्ठान चलने दिए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक लापरवाही है। जांच में आग के कारणों के अलावा यह देखना होगा कि नियमों का उल्लंघन किस स्तर पर हुआ और किन अधिकारियों ने उसे संरक्षण दिया। घटना की सबसे बड़ी सीख यह है कि भारत के महानगरों में अग्नि सुरक्षा को कागजी औपचारिकता नहीं, सार्वजनिक सुरक्षा का मूल तत्व माना जाए।</p>
<p> सभी होटलों, पीजी, गेस्ट हाउसों और बहुमंजिला इमारतों का समयबद्ध सुरक्षा ऑडिट, डिजिटल निरीक्षण प्रणाली, सार्वजनिक एनओसी डेटाबेस, दोषी अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और अवैध निर्माणों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई अनिवार्य की जानी चाहिए। साथ ही प्रत्येक जिले में नियमित अग्नि सुरक्षा अभ्यास और नागरिक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। मालवीय नगर की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि आग अक्सर चिंगारी से नहीं, लापरवाही से फैलती है। जब तक नियमों का उल्लंघन करने वालों और उन्हें संरक्षण देने वालों को कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी दुर्घटनाएं ‘दुर्भाग्य’ नहीं बल्कि ‘पूर्व घोषित त्रासदियां’ बनी रहेंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 08:05:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय: पूर्व का प्रवेशद्वार</title>
                                    <description><![CDATA[<p>म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग द्वारा अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत का चयन रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत और म्यांमार के संबंध कूटनीतिक के अलावा इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और भू-राजनीति के बहुस्तरीय ताने-बाने से जुड़े हुए हैं। ऐसे समय में जब चीन दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है, हमारे लिए म्यांमार केवल पड़ोसी देश ही नहीं, ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का वास्तविक प्रवेशद्वार बन चुका है। हमारी तीन प्रमुख विदेश नीति अवधारणाएं— ‘नेबरहुड फर्स्ट’, ‘एक्ट ईस्ट’ और हाल में घोषित ‘महासागर’ दृष्टिकोण— तीनों के लिए म्यांमार महत्वपूर्ण है।</p>
<p>म्यांमार दक्षिण एशिया और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583721/editorial--gateway-to-the-east"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy.jpg" alt=""></a><br /><p>म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग द्वारा अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत का चयन रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत और म्यांमार के संबंध कूटनीतिक के अलावा इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और भू-राजनीति के बहुस्तरीय ताने-बाने से जुड़े हुए हैं। ऐसे समय में जब चीन दक्षिण-पूर्व एशिया में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है, हमारे लिए म्यांमार केवल पड़ोसी देश ही नहीं, ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का वास्तविक प्रवेशद्वार बन चुका है। हमारी तीन प्रमुख विदेश नीति अवधारणाएं— ‘नेबरहुड फर्स्ट’, ‘एक्ट ईस्ट’ और हाल में घोषित ‘महासागर’ दृष्टिकोण— तीनों के लिए म्यांमार महत्वपूर्ण है।</p>
<p>म्यांमार दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सेतु है और अपने पूर्वोत्तर राज्यों को आसियान देशों से जोड़ने वाली सबसे व्यवहारिक स्थलीय कड़ी भी। ऐसे में लंबे समय से अटकी कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट परियोजना और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग को नई गति देने पर जोर देना उचित ही है। यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं, तो पूर्वोत्तर भारत के आर्थिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव आएगा। व्यापार, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और सीमापार औद्योगिक गतिविधियों के नए द्वार खुलेंगे। </p>
<p>भारत-म्यांमार सीमा लगभग 1600 किलोमीटर लंबी और अत्यंत संवेदनशील है। ऐसे में समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर दोनों देशों की सहमति केवल औपचारिक कूटनीति नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा का अनिवार्य तत्व है। चीन पहले ही म्यांमार के बंदरगाहों, ऊर्जा परियोजनाओं और सैन्य संपर्कों के माध्यम से वहां गहरी पैठ बना चुका है। भारत यदि इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति कमजोर होने देता है, तो उसका सीधा प्रभाव हिंद महासागर और पूर्वोत्तर भारत की सामरिक स्थिति पर पड़ सकता है। </p>
<p>म्यांमार जैसे संसाधन-संपन्न देश के साथ रेयर अर्थ मेटल और खनिजों पर सहयोग पर सहयोग समझौते रणनीतिक महत्व के हैं, जो भारत को भविष्य की तकनीकी और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति दिला सकता है। इस पूरी कूटनीति के साथ कुछ नैतिक और राजनीतिक प्रश्न भी जुड़े हैं। म्यांमार इस समय सैन्य शासन के अधीन है और वहां लोकतंत्र समर्थक आंदोलन तथा सेना के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने रणनीतिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन कैसे बनाए। भारत का दृष्टिकोण अब तक व्यावहारिक रहा है— वह म्यांमार में स्थिरता, संवाद और समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया की बात करते हुए संपर्क बनाए रखना चाहता है। दरअसल भारत यह समझता है कि म्यांमार को पूरी तरह चीन के प्रभाव क्षेत्र में छोड़ देना, उससे कहीं बड़ा रणनीतिक जोखिम होगा। </p>
<p>असल प्रश्न यह है कि क्या भारत इस अवसर को रणनीतिक दूरदृष्टि के साथ उपयोग कर पाएगा? अतीत में कई परियोजनाएं नौकरशाही देरी, सुरक्षा चुनौतियों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण वर्षों तक अटकी रहीं। यदि भारत को वास्तव में दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रभावशाली भूमिका निभानी है, तो उसे केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर समयबद्ध निष्पादन, आर्थिक निवेश और विश्वसनीय कूटनीतिक उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। म्यांमार आज भारत का पड़ोसी होने के साथ ही पूर्व की ओर खुलने वाला भू-राजनीतिक द्वार है। इस द्वार को खुला रखना भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं, सामरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव— तीनों के लिए अनिवार्य है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 09:09:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विशेष लेख: मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्राचीन पशुपति मुहर और इतिहास बोध पर चिंतन  </title>
                                    <description><![CDATA[<p><em><strong>हृदयनारायण दीक्षित, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उत्तर प्रदेश</strong></em></p>
<p>राम प्रसाद चंद ने आर्यों को हड़प्पा सभ्यता के नाश का अभियुक्त ठहराया। चंद ने ऋग्वेद का सहारा लिया। उन्होंने ‘पणि’ को इन नगरों का मूल निवासी बताया। इंद्र को पुरहा-पुरंदर ध्वंसक बताया। चंद के अनुसार इंद्र ने आर्य दिवोदास के लिए दास शंबर के पुर जीते। शंबर ‘दास’ था। पहाड़ पर रहता था, जबकि सच यह है कि पहाड़ पर न मोहन जोदड़ो था और न ही हड़प्पा।</p>
<p>अभी तक भारतीय इतिहास बोध को अपनी मंशा के अनुसार बदलने की कोशिशें चल रही थीं। अब देवी-देवताओं पर भी हमले हैं। भारत सरकार</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583447/reflections-on-the-ancient-pashupati-seal-from-mohenjo-daro-and-the-sense-of-history"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/hnd.jpg" alt=""></a><br /><p><em><strong>हृदयनारायण दीक्षित, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उत्तर प्रदेश</strong></em></p>
<p>राम प्रसाद चंद ने आर्यों को हड़प्पा सभ्यता के नाश का अभियुक्त ठहराया। चंद ने ऋग्वेद का सहारा लिया। उन्होंने ‘पणि’ को इन नगरों का मूल निवासी बताया। इंद्र को पुरहा-पुरंदर ध्वंसक बताया। चंद के अनुसार इंद्र ने आर्य दिवोदास के लिए दास शंबर के पुर जीते। शंबर ‘दास’ था। पहाड़ पर रहता था, जबकि सच यह है कि पहाड़ पर न मोहन जोदड़ो था और न ही हड़प्पा।</p>
<p>अभी तक भारतीय इतिहास बोध को अपनी मंशा के अनुसार बदलने की कोशिशें चल रही थीं। अब देवी-देवताओं पर भी हमले हैं। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त 4300 वर्ष पुरानी पशुपति मुहर और मूलबंधासन योग मुद्रा में बैठी आकृति को शिव का रूप बताया है और हमें भारत की सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक बताया है। एक इतिहासकार आद्रे ने इस दावे को खारिज कर दिया है और कहा है कि यह आकृति शिव की नहीं है। यह पश्चिमी संस्कृति और यूरेशियाई पशुओं के देवता से प्रभावित है। इसके पहले भी ऐसे लोग सिंधु सभ्यता पर बाहरी प्रभावों का जिक्र करते रहे हैं। दरअसल 1922 में मोहनजोदड़ो में खुदाई के दौरान एएसआई के महानिदेशक मार्शल ने इसे शिव का रूप बताया था। उन्होंने अपनी किताब में भी शिव का प्रारंभिक रूप बताया है। लेखक अमीश ने मुहर पर अंकित जानवरों को विदेशी नहीं बताया। वे भारत में पाए जाते हैं।</p>
<p>दक्षिणी पश्चिमी ईरान में भी यह पशु प्राकृतिक रूप में नहीं पाए जाते। डॉ. एल. वेमसानी का तर्क ध्यान देने योग्य है। पशुपति मुहर में आकृति योग मुद्रा में है। पश्चिमी इतिहासकारों द्वारा बहुत पहले से ही भारतीय इतिहास को विकृत किया जाता रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने हम भारत के निवासियों को बाहर से आया हमलावर बताया था, लेकिन यह झूठ पकड़ा गया। वे सिद्ध करना चाहते थे कि भारतीय ज्ञान, देवता और सभ्यता उधार के हैं, जबकि भारत में ऋग्वैदिक काल और उसके बहुत पहले से सांस्कृतिक निरंतरता है। आर्य आक्रमण का झूठ लोग जान गए हैं। <br />शिव भारत के देवता ही हैं। यजुर्वेद का एक पूरा अध्याय शिव पर है। अब आर्य आक्रमण की बात करने वाले खिसियाए हुए हैं। संस्कृति मंत्रालय ने एक ट्वीट में लिखा है कि, ‘भारत के अखंड और निरंतर चली आ रही सभ्यता की यह सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक है। अविभाजित भारत के मोहनजोदड़ो में मिली यह लगभग 4300 साल पुरानी मुहर एक योग मुद्रा में बैठे व्यक्ति को दिखाती है, जिसे व्यापक रूप से शिव पशुपति माना जाता है। यह आकृति मूलबंधासन में बैठी दिखाई देती है और उसके चारों ओर कई जानवर बने हुए हैं।’</p>
<p>इतिहास की वैज्ञानिक समझ से वर्तमान को बदलना मार्क्सवादी लक्ष्य था, उन्होंने वर्तमान की निजी जरूरतों के मुताबिक इतिहास बदला। यही काम अंग्रेजों ने किया। उन्होंने अंग्रेजी राज को जायज ठहराने के लिए भारत का नया इतिहास लिखाया। इतिहास से सीखकर वर्तमान बदलना अच्छा विचार है, लेकिन अपनी आवश्यकतानुसार इतिहास बदलना महापाप है। इतिहास ने उन्हें दंडित किया। मार्क्सवादी इतिहास शेष रहे, लेकिन दोनों के विषाणु भारत में आज भी मौजूद हैं। भारत पर अंग्रेजी शासन के लिए भाषा, इतिहास, सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान जरूरी था। बेशक पश्चिमी विद्वानों ने मेहनत की। </p>
<p>पश्चिम की संस्कृति का मूलाधार यूनान था, लेकिन विलियम जोंस ने थर्ड एनुअल डिसकोर्स एशियाटिक रिसर्चेज में कहा, ‘यूनानी दार्शनिक पाइथागोरस और प्लेटो के उत्कृष्ट अनुभव प्राचीन भारतीय ऋषियों के अनुरूप थे। हिंदू कला व शौर्य में विलक्षण थे। प्रशासन में सुयोग्य, विधि निर्माण में बुद्धिमान और ज्ञान में प्रवीण थे। डेविड कोफ जैसे विद्वानों को भारतीय समाज वैदिक आदर्शों से भटका हुआ लगा। वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं थी।’ यह अध्ययन ईसाई मिशनरियों के लिए खतरनाक था। उनकी नजर में शासन के लिए अंग्रेजी और परमात्मा के मार्ग के लिए प्रभु ईशु ही विकल्प थे। इस चुनौती से जूझे एक अंग्रेज जेएस मिल। जेएस मिल ने ‘हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ लिखकर भारत के सनातन ज्ञान पर हल्ला बोला। इतिहास में उन्हें ‘उपयोगितावादी चिंतक’ की सही संज्ञा मिली।</p>
<p>कांग्रेसजनों और मार्क्सवादियों का उपयोगितावाद विचारणीय है। बच्चे पढ़ें कि आर्यों ने ईरान के रास्ते आकर हड़प्पा सभ्यता नष्ट की। किले तोड़े। वे चरवाहे और लुटेरे थे। मोहनजोदड़ो और हड़प्पावासी सभ्य थे। हड़प्पा सभ्यता का पतन दरअसल 1750 ई. पूर्व के आस-पास हुआ। कालीबंगा की खोदाई से मिले तथ्यों में यही समय सरस्वती के सूखने का भी है। ऋग्वेद में सरस्वती भरी पूरी वेगवती आराध्य नदी है। ऋग्वेद के बाद रचे गए यजुर्वेद में भी सरस्वती पूरे यौवन और उफान पर हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद के बाद सरस्वती सूखी और हड़प्पा सभ्यता का ह्रास हुआ। सरस्वती समय विभाजक रेखा है। उसे पार करके ही आर्य आक्रमण के झूठ का प्रचार संभव है। ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता से पुराना है। मिस्त्र और सुमेर की सभ्यता से भी प्राचीन। दयाराम साहनी व आरके बनर्जी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो नामक दो प्राचीन नगरों की खोज (1921-22) की। हड़प्पा रावी तट पर था, मोहनजोदड़ो सिंध पर।</p>
<p>राम प्रसाद चंद ने आर्यों को हड़प्पा सभ्यता के नाश का अभियुक्त ठहराया। चंद ने ऋग्वेद का सहारा लिया। उन्होंने ‘पणि’ को इन नगरों का मूल निवासी बताया। इंद्र को पुरहा-पुरंदर ध्वंसक बताया। चंद के अनुसार, इंद्र ने आर्य दिवोदास के लिए दास शंबर के पुर जीते। शंबर ‘दास’ था। पहाड़ पर रहता था, जबकि सच यह है कि पहाड़ पर न मोहनजोदड़ो था और न ही हड़प्पा। फिर ऋग्वेद (9.61.2) में दिवोदास के शत्रुओं की सूची में शंबर के साथ यदु और तुर्वस जैसे आर्य भी हैं। यानी कथित आर्य हमले में दोनों तरफ आर्य थे। सवाल पेचीदे हैं। उन्होंने ऋग्वेद को गवाह बनाया है। यानी ऋग्वेद हड़प्पा सभ्यता के नाश (सरस्वती के सूख जाने) के बाद रचा गया। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद् रेनफ्रीव ने लिखा- ‘आर्य आक्रमण का समय निर्धारण निःसंदेह डांवाडोल है।’ ऋग्वेद 10-15 हजार वर्ष से ज्यादा पुराना है। पश्चिम के विद्वान भी इसे 2500-3000 वर्ष पुराना मानते हैं। सिंधु क्षेत्र में सिंधु लिपि थी। इसी से ब्राह्मी आई।</p>
<p>लैंगडन के अनुसार सिंधु की चित्र लिपि का समय 2800 ईसा पूर्व है। उन्होंने लिखा- ‘इतिहास जितना मानता है, भारत में आर्य उससे कहीं अधिक प्राचीन हैं।’ फिलाडेल्फिया के पुरातत्वविद डेल्स 1960 के दशक में पाकिस्तान में उत्खनन कार्य से जुड़े। उन्होंने ‘द मिथिकल मैस्केयर ऑफ मोहनजोदड़ो’ (मोहनजोदड़ो के हत्याकांड की कपोलकथा) में व्हीलर, चंद, मार्शल, मैकाय आदि सिद्धांतकारों की बातें काट दीं। रेनफ्रीव ने आर्यों को भारत का मूल निवासी माना, आर्य आक्रमण सिद्धांत को गलत बताया। </p>
<p>उन्होंने लिखा- ‘ऋग्वेद के दर्जन भर प्रसंगों में से एक में भी आक्रमण का संकेत नहीं मिलता।’ प्रख्यात मार्क्सवादी विचारक डॉ. रामविलास शर्मा ने आर्य आक्रमण को भाषा विज्ञान की कल्पना बताते हुए लिखा- ‘सघोष महाप्राण ध्वनियों वाले भारतीय शब्दों के ईरानी, यूरोपियन प्रतिरूपों में सघोषता और महाप्राणता का संयोग नहीं होता। यह विशेषता केवल भारतीय आर्य भाषाओं की है। यही एक तथ्य आर्य आक्रमण सिद्धांत को ध्वस्त करने के लिए काफी है।’ डॉ. अंबेडकर ने ऋग्वेद के छठे, सातवें, आठवें और नौवें मंडल के सूक्तों के हवाले से लिखा- ‘लेखकों ने आर्य नस्ल का जो सिद्धांत बनाया, वह वैज्ञानिक अनुसंधान का उल्टा है। भारत ही आर्यों का मूल निवास था।’</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 08:08:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>‘अर्बन हीट आइलैंड’ का बढ़ता प्रभाव </title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong><em>लेख-योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार</em></strong></p>
<p>‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बदलती जलवायु के कारण भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में है। अब यह संकट पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर तटीय इलाकों तक फैल चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, घटती हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते निर्माण से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583212/increasing-impact-of-urban-heat-island"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/goel.jpg" alt=""></a><br /><p><strong><em>लेख-योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार</em></strong></p>
<p>‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बदलती जलवायु के कारण भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में है। अब यह संकट पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर तटीय इलाकों तक फैल चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, घटती हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते निर्माण से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर से लेकर दिल्ली की गलियों और विदर्भ के मैदानों तक पारा 45 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है। यह केवल बढ़ते तापमान का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक गहराता सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक चेतावनी है। हीट वेव अब केवल मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव अस्तित्व के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। बढ़ते तापमान, घटती हरियाली और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने जीवन को लू की लपटों में समेट दिया है।</p>
<p>मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि हीट वेव अब केवल अपने पारंपरिक गढ़ (उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत) तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने दक्षिण भारत के उन तटीय इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जो ऐतिहासिक रूप से कम ताप प्रभावित रहते थे। अध्ययन बताते हैं कि 1981 से 2000 के बीच लू की औसत अवधि जहां 2.5 से 5.5 दिन थी, वहीं 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 8.5 दिन तक पहुंच गई। लू का भौगोलिक दायरा भी 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर से फैलकर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है। </p>
<p>यह विस्तार बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कड़वी हकीकत है। हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे मुक्त करते हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव पैदा होता है। इस तपती आग में सबसे अधिक जोखिम उन लोगों (रेहड़ी-पटरी वाले, निर्माण श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर) का है, जो खुले आसमान के नीचे अपना वजूद तलाशते हैं। इनके पास न तो कूलिंग सेंटर की सुविधा है और न ही काम के घंटों में लचीलापन। इसके साथ ही बच्चे और बुजुर्ग इस बढ़ते ‘डिस्कंफर्ट इंडेक्स’ के सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।</p>
<p>वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में वृद्धि से आगामी वर्षों में हीट वेव, गर्मी का मौसम ज्यादा समय तक रहने और सर्दी के मौसम का समय घटने जैसी स्थितियां पैदा होंगी। इस बारे में वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि जिस जलवायु परिवर्तन के बारे में अब तक हम केवल पढ़ते-सुनते रहे थे, वह अब हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। भारत में मई का महीना गर्म हवाओं (लू) का चरम समय होता है और लू की घटनाओं को भी मौसम में दिन-प्रतिदिन बदलाव का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है, लेकिन चिंता की बात यही है कि लू की तीव्रता लगातार वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में 2009, 2010, 2016, 2017 और 2022 भारत में रिकॉर्ड किए गए पांच सबसे गर्म वर्ष रहे। आईएमडी के मुताबिक 15 सबसे गर्म वर्षों में से 11 वर्ष 2008 से 2022 के बीच ही दर्ज किए गए।</p>
<p>यह जानना भी जरूरी कि हीट वेव आखिर है क्या? जैसा कि नाम से ही जाहिर है, हीट वेव अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि है, जो प्रायः दो या ज्यादा दिनों तक रहती है। जब तापमान किसी क्षेत्र के सामान्य औसत तापमान से अधिक हो जाता है, तो उसे ‘हीट वेव’ कहा जाता हं। आईएमडी के अनुसार मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान जब 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो लू चलने लगती है और यदि तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो यह खतरनाक लू की श्रेणी में कही जाती है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस हो जाता है, तो लू चलने लगती है। </p>
<p>हीट वेव के कारण लोगों के बीमार होने और हीट स्ट्रोक का खतरा बहुत बढ़ जाता है, तथा सैंकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1998 से 2017 के बीच हीट वेव के कारण 1.66 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और यह आंकड़ा अब वर्ष दर वर्ष तेजी से बढ़ रहा है। आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तापमान में वृद्धि तथा लू का मानव शरीर पर व्यापक असर पड़ रहा है। गर्म हवाओं से ब्रेन स्ट्रोक, हृदयाघात, नसों में खून के थक्के जमने की आशंका, स्थायी विकलांगता का खतरा बढ़ जाता है और इससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है। </p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, हीट वेव बाढ़ के बाद दूसरी सबसे घातक आपदा है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर रही है। लू का असर हृदय तथा फेफड़े जैसे अंगों पर सर्वाधिक पड़ता है, जो बेहद खतरनाक हो सकता है। हीट वेव से ऐसे लोगों की स्थिति और खराब होने की संभावना होती है, जो हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी इत्यादि समस्याओं से पीड़ित हैं। आईएमडी के मुताबिक वैसे तो हर साल दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना इत्यादि उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य, पूर्व और उत्तर प्रायद्वीपीय भारत के मैदानी इलाकों में मार्च से जून के दौरान हीट वेव का दौर चलता है, लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वी की जलवायु गर्म होती जा रही है, दिन और रात भी सामान्य से अधिक गर्म होते जा रहे हैं, जिससे हीट वेव की घटनाएं बढ़ रही हैं और मौतों तथा बीमारियों की आशंका भी बढ़ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 09:09:54 +0530</pubDate>
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                <title>संपादकीय : क्वाड का संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक ने यह साफ कर दिया कि अब यह मंच मात्र कूटनीतिक संवाद का समूह न रह कर अब “कार्रवाई आधारित रणनीतिक गठबंधन” में बदल रहा है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने जिस तरह समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा सुरक्षा, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन पर ठोस पहल की घोषणा की, उससे “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” की अवधारणा को पहली बार व्यावहारिक आधार मिलता दिखाई देता है। इस बैठक का सबसे बड़ा संदेश चीन के लिए था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583270/editorial--the-quad-s-message"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy20.jpg" alt=""></a><br /><p>दिल्ली में हुई क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक ने यह साफ कर दिया कि अब यह मंच मात्र कूटनीतिक संवाद का समूह न रह कर अब “कार्रवाई आधारित रणनीतिक गठबंधन” में बदल रहा है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने जिस तरह समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा सुरक्षा, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन पर ठोस पहल की घोषणा की, उससे “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” की अवधारणा को पहली बार व्यावहारिक आधार मिलता दिखाई देता है। इस बैठक का सबसे बड़ा संदेश चीन के लिए था।</p>
<p>क्वाड ने सीधे चीन का नाम भले सीमित रूप से लिया हो, लेकिन “कोअर्शन”, “मैरिटाइम मिलिटराइजेशन”, “सप्लाई चेन कंसन्ट्रेशन” और “सिंगल-सोर्स मोनोपोली” जैसे शब्दों का लक्ष्य स्पष्ट रूप से बीजिंग ही था। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक चीन की बढ़ती आक्रामकता और रेयर अर्थ तथा क्रिटिकल मिनरल्स पर उसकी लगभग एकाधिकार जैसी स्थिति ने क्वाड देशों को सामूहिक प्रतिक्रिया के लिए मजबूर किया है। दिल्ली बैठक का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय 20 अरब डॉलर के “क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव” और भारत-अमेरिका के बीच रेयर अर्थ तथा क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क पर सहमति रहा। </p>
<p>इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, एआई और ग्रीन एनर्जी सभी के लिए लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ जरूरी हैं, जिनकी प्रोसेसिंग पर आज चीन का दबदबा है। क्वाड अब इस निर्भरता को तोड़ने की दिशा में बढ़ रहा है। समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में भी यह बैठक निर्णायक रही। इंडो-पैसिफिक मैरिटाइम सर्विलांस सहयोग, रियल-टाइम सूचना साझेदारी और फिजी में संयुक्त पोर्ट परियोजना केवल विकास कार्यक्रम नहीं हैं। वे चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के जवाब के रूप में देखे जाएंगे। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति और बंदरगाह नेटवर्क के मुकाबले क्वाड अब वैकल्पिक समुद्री ढांचा खड़ा करना चाहता है।</p>
<p>भारत के लिए इस बैठक के कई रणनीतिक लाभ हैं। पहला, भारत अब केवल “बैठकों की मेजबानी करने वाला देश” नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक सुरक्षा संरचना का केंद्रीय स्तंभ बनकर उभरा है। दूसरा, चीन पर निर्भर वैश्विक सप्लाई चेन के विकल्प के रूप में भारत को नई औद्योगिक भूमिका मिल सकती है। तीसरा, हिंद महासागर में भारत की प्राकृतिक भौगोलिक बढ़त को क्वाड की तकनीकी और वित्तीय शक्ति का समर्थन प्राप्त होगा। चौथा, अमेरिका के साथ हालिया व्यापारिक और राजनीतिक तनावों के बावजूद यह बैठक दिखाती है कि सामरिक स्तर पर वाशिंगटन और नई दिल्ली की साझेदारी अभी भी मजबूत है। </p>
<p>हालांकि क्वाड की वास्तविक परीक्षा अब शुरू होगी। यदि यह समूह केवल घोषणाओं तक सीमित रहता है, तो चीन की विशाल आर्थिक और सैन्य शक्ति के सामने इसका प्रभाव सीमित रह जाएगा, लेकिन यदि घोषित परियोजनाएं समयबद्ध तरीके से लागू होती हैं, सप्लाई चेन वास्तव में विविध होती है और हिंद महासागर में साझा सुरक्षा तंत्र मजबूत होता है, तो आने वाले दशक में इंडो-पैसिफिक की शक्ति-संरचना बदल सकती है। दिल्ली बैठक ने कम-से-कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि एशिया की नई भू-राजनीति अब केवल चीन केंद्रित नहीं रहेगी, उसके सामने एक संगठित, संसाधन-संपन्न और रणनीतिक रूप से समन्वित प्रतिरोध खड़ा हो रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 08:03:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय : प्रधान बनाम प्रशासक</title>
                                    <description><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें अगले छह महीनों के लिए ‘प्रशासक’ नियुक्त करने का निर्णय प्रत्याशित था। पहली दृष्टि में यह निर्णय व्यावहारिक प्रतीत होता है। ऐसा न करने से अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति आ जाती, सो यह प्रशासनिक व्यवस्था दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक संकेतों वाला कदम है। अब तक प्रधान का कार्यकाल समाप्त होने पर एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था, जिससे स्थानीय विकास कार्यों की गति प्रभावित होती थी। सरकार का तर्क है कि गांव की वास्तविक समस्याओं, अधूरे विकास कार्यों और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को प्रधान बेहतर समझते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583211/editorial--chief-vs--administrator"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy19.jpg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें अगले छह महीनों के लिए ‘प्रशासक’ नियुक्त करने का निर्णय प्रत्याशित था। पहली दृष्टि में यह निर्णय व्यावहारिक प्रतीत होता है। ऐसा न करने से अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति आ जाती, सो यह प्रशासनिक व्यवस्था दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक संकेतों वाला कदम है। अब तक प्रधान का कार्यकाल समाप्त होने पर एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था, जिससे स्थानीय विकास कार्यों की गति प्रभावित होती थी। सरकार का तर्क है कि गांव की वास्तविक समस्याओं, अधूरे विकास कार्यों और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को प्रधान बेहतर समझते हैं, इसलिए उन्हें ही जिम्मेदारी देना अधिक प्रभावी होगा। </p>
<p>राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में पहले से लागू मॉडल का हवाला देकर इसे ‘सतत विकास’ की दिशा में कदम बताया जा रहा है, हालांकि यह निर्णय प्रशासनिक के साथ ही राजनीतिक भी हो सकता है। पंचायत चुनावों के टलने की पृष्ठभूमि में यह व्यवस्था गांवों में मौजूदा राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने का माध्यम बन सकती है। संभावना है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव 2027 के बाद हों ऐसे में छह महीने की यह अंतरिम व्यवस्था और आगे बढ़ेगी। ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट, मतदाता सूची और विधानसभा चुनावी तैयारी जैसे कारणों का हवाला दिया जा रहा है, परंतु वास्तविकता यह भी है कि पंचायत चुनावों को टालने से सरकार को ग्रामीण राजनीतिक नेटवर्क को नियंत्रित रखने का अतिरिक्त समय मिल जाएगा। </p>
<p>सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रशासक केवल सामान्य और नियमित कार्य कर सकेंगे, कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। विशेष परिस्थिति में जिलाधिकारी की मंजूरी जरूरी होगी। यही बिंदु भविष्य की जटिलताओं का कारण बनेगा। गांवों में विकास कार्य अक्सर त्वरित निर्णय मांगते हैं, नाली, सड़क, पेयजल, हैंडपंप मरम्मत, या पंचायत भवन जैसे मुद्दों पर यदि हर बार डीएम कार्यालय की स्वीकृति लेनी पड़ी, तो निर्णय प्रक्रिया का धीमा होना स्वाभाविक है। इससे जनता में असंतोष बढ़ सकता है। पंचायतों में भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता और फर्जी भुगतान के आरोप वर्षों से लगते रहे हैं, इसलिए सरकार संभवत: इसके जरिए वित्तीय नियंत्रण भी चाहती है। अलग बात है कि व्यवहारिक स्तर पर यह दोहरी व्यवस्था प्रधानों और नौकरशाही के बीच टकराव पैदा कर सकती है। प्रधान स्वयं को निर्वाचित प्रतिनिधि की तरह देखेंगे, जबकि प्रशासन उन्हें सीमित अधिकार वाला प्रशासक मानेगा। </p>
<p>इस निर्णय का सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण होगा। ग्राम पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई है। चुनाव टलने से नई नेतृत्व पीढ़ी, महिलाओं और पिछड़े वर्गों को अवसर मिलने में देरी होगी। कई गांवों में सत्ता का स्थानीय केंद्रीकरण और मजबूत हो सकता है। दूसरी ओर, जिन पंचायतों में विकास कार्य अधूरे हैं, वहां निरंतरता बनी रहने से कुछ सकारात्मक परिणाम भी संभव हैं। असल चुनौती अब प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक संतुलन दोनों को बनाए रखने की है। यदि सरकार छह महीने के भीतर पारदर्शी तरीके से पंचायत चुनाव कराती है तो यह व्यवस्था संक्रमणकालीन समाधान मानी जाएगी, लेकिन यदि यह अवधि लगातार बढ़ती गई, तो प्रश्न उठेगा कि क्या पंचायतें वास्तव में स्वायत्त लोकतांत्रिक संस्थाएं रह गई हैं, या वे धीरे-धीरे प्रशासनिक विस्तार में बदल रही हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 07:03:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय:  यात्रा से संदेश </title>
                                    <description><![CDATA[<p>वर्तमान में भारत-अमेरिका संबंध अभूतपूर्व सामरिक निकटता और समानांतर असहजताओं, दोनों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत आना कई लिहाज से महत्वपूर्ण है। फिलहाल अब तक की उनकी यात्रा और कूटनीति का मूल उद्देश्य दिखा है कि टैरिफ, वीजा, इमिग्रेशन, पाकिस्तान, चीन, आतंकवाद जैसे गंभीर सवालों के जवाब भले न मिलें, पर अमेरिकी हितों से जरा भी समझौता किए बिना आपसी भरोसा बनाए रखना है। </p>
<p>रूबियो ने कूटनीतिक शिष्टाचार दर्शाते हुए भारत के प्रति अपने सार्वजनिक संदेशों में लगातार सकारात्मकता दिखाई। ‘आई लव इंडिया’ जैसे भावनात्मक वाक्य उस रणनीतिक यथार्थ की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583132/editorial--a-message-from-the-journey"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy18.jpg" alt=""></a><br /><p>वर्तमान में भारत-अमेरिका संबंध अभूतपूर्व सामरिक निकटता और समानांतर असहजताओं, दोनों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत आना कई लिहाज से महत्वपूर्ण है। फिलहाल अब तक की उनकी यात्रा और कूटनीति का मूल उद्देश्य दिखा है कि टैरिफ, वीजा, इमिग्रेशन, पाकिस्तान, चीन, आतंकवाद जैसे गंभीर सवालों के जवाब भले न मिलें, पर अमेरिकी हितों से जरा भी समझौता किए बिना आपसी भरोसा बनाए रखना है। </p>
<p>रूबियो ने कूटनीतिक शिष्टाचार दर्शाते हुए भारत के प्रति अपने सार्वजनिक संदेशों में लगातार सकारात्मकता दिखाई। ‘आई लव इंडिया’ जैसे भावनात्मक वाक्य उस रणनीतिक यथार्थ की स्वीकृति है कि अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत चीन के संतुलनकारी साझेदार के रूप अपरिहार्य है। वे जानते हैं कि जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत की भागीदारी के बिना अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति अधूरी है। इसके बावजूद इस रिश्ते में सहजता अधूरी लगती है। </p>
<p>अमेरिकी राजनीति में बढ़ते संरक्षणवाद, ट्रंप-युगीन ‘अमेरिका फर्स्ट’ मानसिकता और भारतीय पेशेवरों पर बढ़ती वीजा-सख्ती ने भारतीय मध्यमवर्ग और प्रवासी समुदाय को बेहद चिंतित किया है। नस्लीय टिप्पणियों और एंटी-इमिग्रेशन राजनीति ने भी असहजता बढ़ाई है। ऐसे में रूबियो का सबसे बड़ा दायित्व यह भरोसा दिलाना है कि भारतीय प्रतिभा को अमेरिका में संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। भारत के लिए यह केवल प्रवासी प्रश्न नहीं, बल्कि सेवा-निर्यात, टेक्नोलॉजी और वैश्विक प्रतिभा-आधारित अर्थव्यवस्था का मामला है। व्यापार और टैरिफ विवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। </p>
<p>अमेरिका भारत से बाजार पहुंच और शुल्क में नरमी चाहता है, जबकि भारत अपनी घरेलू उद्योग और कृषि सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। रूबियो की भूमिका यहां मध्यस्थ की नहीं, बल्कि ‘संतुलन निर्माता’ की हो सकती है। वे यह समझते हैं कि भारत को चीन-विरोधी रणनीतिक साझेदार बनाए रखना है, तो केवल दबाव की नीति पर्याप्त नहीं होगी। ऊर्जा सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, रक्षा निर्माण और महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है। </p>
<p>पाकिस्तान को लेकर रूबियो का रुख है कि किसी भी देश से अमेरिकी संबंध भारत के हितों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। बयान भारत के लिए आश्वस्तकारी अवश्य है, परंतु भारत यह भी जानता है कि वाशिंगटन इस्लामाबाद से दूरी नहीं बना सकता। अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया और आतंकवाद-रोधी रणनीतियों में पाकिस्तान की उपयोगिता अभी समाप्त नहीं हुई है, इसलिए भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका से आतंकवाद पर स्पष्ट और व्यावहारिक सहयोग सुनिश्चित करे, महज बयानबाजी नहीं। </p>
<p>भारतीय विदेश मंत्री का ‘इंडिया फर्स्ट’ दृष्टिकोण भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। साफ संकेत है कि भारत अब किसी गुट की परछाईं नहीं बनने वाला। रूस से संबंध हों, ईरान से ऊर्जा खरीदी या ग्लोबल साउथ की राजनीति— भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता नहीं छोड़ेगा। रूबियो भी संभवतः यह समझ चुके हैं कि नया भारत साझेदार तो बन सकता है, पर आश्रित नहीं। भारत-अमेरिका संबंध अब भावनात्मक मित्रता नहीं, बल्कि परस्पर हितों की परिपक्व साझेदारी हैं। इसमें सहयोग भी होगा, मतभेद भी। यदि संवाद और विश्वास बना रहा, तो यह संबंध 21वीं सदी की सबसे निर्णायक वैश्विक साझेदारियों में बदल सकता है। इस यात्रा का यही सबसे बड़ा संदेश है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 May 2026 08:05:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय:  स्वागत योग्य सख्ती </title>
                                    <description><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश में आए बिजली संकट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सख्त रुख स्वागत योग्य है। अधिकारियों को जवाबदेह बनाना, ब्रेकडाउन पर तत्काल सप्लाई बहाल करने के निर्देश देना और आपूर्ति व्यवस्था की समीक्षा करना, आवश्यक कदम हैं। शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता की परीक्षा ले रही घंटों की अघोषित कटौती, ट्रिपिंग, लो-वोल्टेज, ट्रांसफार्मरों के जलने और आपूर्ति बहाल होने में देरी, जिससे आम नागरिक, किसान, व्यापारी सभी परेशान हैं, उन्हें मुख्यमंत्री के इस  कदम से कुछ ढांढस बंधा है। पर महज सख्ती से इस गहरे संकट का समाधान कठिन है। </p>
<p>प्रदेश में बिजली की मांग दशक भीतर तेजी से बढ़ती हुई,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583125/editorial--welcome-strictness"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy17.jpg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश में आए बिजली संकट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सख्त रुख स्वागत योग्य है। अधिकारियों को जवाबदेह बनाना, ब्रेकडाउन पर तत्काल सप्लाई बहाल करने के निर्देश देना और आपूर्ति व्यवस्था की समीक्षा करना, आवश्यक कदम हैं। शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता की परीक्षा ले रही घंटों की अघोषित कटौती, ट्रिपिंग, लो-वोल्टेज, ट्रांसफार्मरों के जलने और आपूर्ति बहाल होने में देरी, जिससे आम नागरिक, किसान, व्यापारी सभी परेशान हैं, उन्हें मुख्यमंत्री के इस  कदम से कुछ ढांढस बंधा है। पर महज सख्ती से इस गहरे संकट का समाधान कठिन है। </p>
<p>प्रदेश में बिजली की मांग दशक भीतर तेजी से बढ़ती हुई, ढाई गुना से ज्यादा हो चुकी है और उपभोक्ताओं की संख्या भी दो गुना बढ़ गई है। भीषण गर्मी, एयर कंडीशनर और कूलरों के बढ़ते उपयोग और बढ़ते शहरीकरण ने बिजली खपत को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है। आज यह खपत प्रतिदिन औसतन 653 मिलियन यूनिट तक पहुंचना यही कहता है। प्रदेश इससे पहले भी बिजली की भारी मांग पूरी कर चुका है, इसलिए आज इस मामले में जो व्यापक अव्यवस्था दिख रही है,  उसका कारण उत्पादन और उपलब्धता से अधिक वितरण और प्रबंधन व्यवस्था है। प्रदेश में तापीय बिजली उत्पादन 5,000 मेगावाट से बढ़कर 9,000 मेगावाट से अधिक पहुंच गया है, तो केंद्र और निजी स्रोतों से भी पर्याप्त बिजली उपलब्ध है, इसलिए समस्या ‘बिजली की कमी’ से अधिक ‘बिजली पहुंचाने की क्षमता’ की प्रतीत होती है। </p>
<p>जर्जर ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें, ओवरलोड फीडर और कमजोर पारेषण नेटवर्क संकट को बढ़ा रहे हैं। उपभोक्ता कम लोड का कनेक्शन लेकर वास्तविक उपयोग अधिक कर रहे हैं, जिससे ट्रांसफार्मरों पर दबाव असामान्य रूप से बढ़ रहा है। भीषण गर्मी इस तकनीकी कमजोरी को और उजागर कर रही है। समय पर ट्रांसफार्मर बदलने, लाइन उन्नयन, रख-रखाव और लोड आकलन में लापरवाही वर्षों से चली आ रही है। कई क्षेत्रों में लाइन लॉस और बिजली चोरी ने भी बिजली घरों के भ्रसटाचार ने भी व्यवस्था को कमजोर किया है। मानव संसाधन का टोटा अत्यंत गंभीर प्रश्न है। संविदा कर्मियों की छंटनी और सीमित तकनीकी गैंगों की व्यवस्था ने मरम्मत तंत्र को लगभग अपंग बना दिया है। इसके चलते कर्मचारी दबाव में हैं, जोखिम उठाकर काम कर रहे हैं और उपभोक्ता असहाय महसूस कर रहे हैं। पहले स्थानीय एसडीओ या अभियंता तक पहुंच संभव थी, अब शिकायत व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत और निर्जीव हो गई है। जनता को समस्या के समाधान से अधिक ‘कोई सुनने वाला नहीं’ होने की पीड़ा है। उपभोक्ता और विभाग के बीच संवादहीनता भी जनाक्रोश का कारण बनी है। </p>
<p>उत्तर प्रदेश की बढ़ती अर्थव्यवस्था और औद्योगिक आकांक्षाओं के लिए विश्वसनीय बिजली व्यवस्था कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता है। सरकार को अब तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर काम करना होगा। तत्काल तौर पर अतिरिक्त तकनीकी गैंग, मोबाइल ट्रांसफार्मर, स्थानीय शिकायत निवारण केंद्र और अस्पतालों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था जरूरी है, जबकि दीर्घकालिक समाधान के लिए वितरण नेटवर्क का आधुनिकीकरण, स्मार्ट लोड प्रबंधन, पर्याप्त तकनीकी भर्ती और जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा अनिवार्य होगा। इस क्षेत्र में सरकार की असली कसौटी यही होगी कि अंतिम उपभोक्ता तक बिजली निर्बाध पहुंचे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 May 2026 08:05:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय: मतभेद का मतलब</title>
                                    <description><![CDATA[<p>ट्रंप और नेतन्याहू के बीच टकराव पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक वास्तविकताओं और अमेरिका-इजराइल संबंधों के भीतर बढ़ती वैचारिक दूरी बताता है। साफ है कि अमेरिका अब इजराइल की हर सैन्य प्राथमिकता को बिना शर्त स्वीकार नहीं करने वाला। यह मतभेद ईरान के लिए रणनीतिक अवसर देता है। तेहरान को लगता है कि वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच पूर्ण सामंजस्य नहीं है, तो वह वार्ता में अधिक कठोर रुख अपनाएगा। </p>
<p>लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि ट्रंप और नेतन्याहू लगभग समान सोच वाले हैं— दोनों कठोर राष्ट्रवाद, सैन्य शक्ति और ईरान-विरोध की राजनीति के प्रतीक रहे, किंतु</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582883/editorial--the-meaning-of-disagreement"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy16.jpg" alt=""></a><br /><p>ट्रंप और नेतन्याहू के बीच टकराव पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक वास्तविकताओं और अमेरिका-इजराइल संबंधों के भीतर बढ़ती वैचारिक दूरी बताता है। साफ है कि अमेरिका अब इजराइल की हर सैन्य प्राथमिकता को बिना शर्त स्वीकार नहीं करने वाला। यह मतभेद ईरान के लिए रणनीतिक अवसर देता है। तेहरान को लगता है कि वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच पूर्ण सामंजस्य नहीं है, तो वह वार्ता में अधिक कठोर रुख अपनाएगा। </p>
<p>लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि ट्रंप और नेतन्याहू लगभग समान सोच वाले हैं— दोनों कठोर राष्ट्रवाद, सैन्य शक्ति और ईरान-विरोध की राजनीति के प्रतीक रहे, किंतु युद्ध और कूटनीति के वास्तविक क्षण अक्सर मित्रताओं की सीमाएं उजागर कर देते हैं। तनाव का बड़ा कारण लक्ष्य और प्राथमिकताओं का अंतर है। इजराइल के लिए ईरान एक प्रत्यक्ष, भौगोलिक और अस्तित्वगत खतरा है। </p>
<p>तेहरान समर्थित समूह हिजबुल्लाह, हमास और अन्य क्षेत्रीय नेटवर्क इजराइल की सुरक्षा रणनीति के केंद्र में हैं। नेतन्याहू मानते हैं कि यदि ईरान को अभी निर्णायक रूप से नहीं रोका गया, तो वह अपनी मिसाइल, ड्रोन और परमाणु क्षमता को इतना मजबूत कर लेगा कि भविष्य में उसे नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाएगा, इसलिए इजराइल युद्ध को ‘विकल्प’ नहीं, बल्कि ‘पूर्व-निवारक आवश्यकता’ के रूप में देखता है। इसके विपरीत अमेरिका की प्राथमिकताएं कहीं अधिक व्यापक और जटिल हैं। ट्रंप लंबे, महंगे और अनिश्चित युद्धों से बचना चाहते हैं। इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों ने अमेरिकी समाज को युद्ध से थका दिया है। </p>
<p>अमेरिकी जनता पश्चिम एशिया में एक और व्यापक सैन्य हस्तक्षेप के पक्ष में दिखाई नहीं देती। ट्रंप यह भी समझते हैं कि पूर्ण युद्ध तेल बाजार, वैश्विक व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका दे सकता है, इसलिए वे सैन्य दबाव बनाए रखते हुए भी अंतिम क्षण तक समझौते और शक्ति-प्रदर्शन के मिश्रण की नीति अपनाना चाहते हैं। यही कारण है कि युद्ध के शुरुआती दौर से ही ट्रंप और नेतन्याहू के दृष्टिकोण में अंतर दिखाई देता रहा। इजराइल त्वरित और निर्णायक सैन्य कार्रवाई चाहता रहा, जबकि अमेरिका कई बार संयम, वार्ता और ‘नियंत्रित दबाव’ की रणनीति की ओर झुकता दिखा।</p>
<p>ट्रंप की राजनीतिक मजबूरियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। वे एक ओर अमेरिकी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते हैं, दूसरी ओर युद्ध-विरोधी घरेलू भावना को भी नाराज नहीं कर सकते। यदि वे बहुत नरम दिखते हैं, तो रिपब्लिकन खेमे का कट्टर राष्ट्रवादी वर्ग असंतुष्ट होगा; यदि वे पूर्ण युद्ध में उतरते हैं तो आर्थिक और राजनीतिक जोखिम बढ़ेंगे, इसलिए उनकी नीति लगातार दबाव और सीमित संयम के बीच झूलती दिखाई देती है। ट्रंप का यह कहना कि ईरान ‘युद्ध और शांति की दहलीज पर खड़ा है’, अतिशयोक्ति नहीं लगता। </p>
<p>वास्तव में पूरा क्षेत्र इसी अस्थिर संतुलन पर टिका हुआ है। भारत के लिए यह परिस्थिति संवेदनशील है। उसके गहरे संबंध ईरान, इसराइल और अमेरिका तीनों से हैं। ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह, पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासी, रक्षा सहयोग और व्यापार सभी दांव पर हैं, इसलिए हमें संतुलित, व्यावहारिक और बहुध्रुवीय कूटनीति अपनानी होगी। भारत के हित युद्ध में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता में निहित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/582883/editorial--the-meaning-of-disagreement</link>
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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 08:02:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: गरमी से राहत कैसे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बरेली हो या बांदा पूरा उत्तर भारत इन दिनों भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। सूबे के दर्जन से ज्यादा जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। हल्द्वानी जैसे पहाड़ी इलाकों का तापमान भी 40 डिग्री को छूने वाला है। मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों के लिए 'येलो' और उसके बाद 'ऑरेंज' अलर्ट जारी कर दिया। सरकार ने 12वीं तक की कक्षाएं स्थगित कर दीं, प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारियों को घर से काम करने को कहने, सड़कों पर जल छिड़काव करवाने एवं प्राणि उद्यानों में वन्य जीवों को गरमी से बचाने के लिए प्रबंध करने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582760/editorial--how-to-find-relief-from-the-heat"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy15.jpg" alt=""></a><br /><p>बरेली हो या बांदा पूरा उत्तर भारत इन दिनों भीषण गर्मी की मार झेल रहा है। सूबे के दर्जन से ज्यादा जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है। हल्द्वानी जैसे पहाड़ी इलाकों का तापमान भी 40 डिग्री को छूने वाला है। मौसम विभाग ने अगले तीन दिनों के लिए 'येलो' और उसके बाद 'ऑरेंज' अलर्ट जारी कर दिया। सरकार ने 12वीं तक की कक्षाएं स्थगित कर दीं, प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारियों को घर से काम करने को कहने, सड़कों पर जल छिड़काव करवाने एवं प्राणि उद्यानों में वन्य जीवों को गरमी से बचाने के लिए प्रबंध करने के अलावा लोगों को यह हिदायत दी कि लोग दोपहर से शाम तक घर से बाहर न निकलें।<br /> <br />हर साल गरमी से बचाव के उपायों में ये सब शामिल होता है। साल दर साल गरमी की तीव्रता बढ़ती जा रही है और आगे और बढ़ेगी। प्रकृति प्रसूत इस प्रकोप का सीधा और मुकम्मल इलाज हमारे पास नहीं, पर जब यह कोई आकस्मिक, परिघटना नहीं है, पता है कि भारत के इस हिस्से में एक तय समय के दौरान भीषण गरमी पड़ती है, तो इससे निबटने, इसे सह्य बनाने के सफल प्रयास अब तक क्यों नहीं किए जा सके। गरमी आने पर उससे निबटने के फौरी प्रयास प्यास लगने पर कुआं खोदने जैसे लगते हैं और ये प्रयास भी स्थाई नहीं होते, बल्कि अगली साल की गर्मियों में दोहराने पड़ते हैं। </p>
<p>निःसंदेह हम गरमी के मूल कारकों को नहीं रोक सकते, लेकिन जब हम हर क्षेत्र में विकास कर लोगों का जीवन सुगम बनाने का दावा कर सकते हैं, तो इस भीषण गरमी से निबटने, जनता, मवेशियों, खेती को उससे बचाने और सहने लायक बनाने के स्थायी प्रयास क्यों नहीं कर सकते। आज इंटरनेट के युग में आम लोग भी यह जानते हैं कि सिंगापूर से लेकर सियरा लियोन, एथेंस और बांग्लादेश से लेकर ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे देशों ने डीआई यानी थर्मल डिस्कम्फर्ट इंडेक्स का एटलस बनाने, चीफ हीट ऑफीसर नियुक्त करने और उन ऑफीसर्स द्वारा इससे निबटने के लिए क्या-क्या किया गया और उन्हें कितनी सफलता मिली। </p>
<p>हमारे यहां हीट एक्शन प्लान है पर वह भी लखनऊ, प्रयागराज, झांसी आगरा जैसे उच्च जोखिम वाले तमाम जिलों में पर्याप्त कुशलता से लागू नहीं। मौसम विभाग की ‘हीट इंडेक्स’ प्रणाली अभी भी चरणबद्ध विस्तार में है। कई छोटे शहरों में तकनीकी रूप से तो गरमी का डेटा उपलब्ध है, पर सार्वजनिक बुलेटिन ही रोजाना जारी नहीं होता। शहरों के कुछ इलाकों में अत्यधिक गरमी वाले क्षेत्र ‘हीट आइलैंड’ बन जाते हैं, इन्हें पहचानने और इलाकों की हीट प्रोफाइल तैयार करने का भी व्यापक काम अभी तक नहीं हुआ है, जो इस मर्ज की अकसीर दवा बन सकती है। भवन और अवसंरचना निर्माण के लिए कूल मेटेरियल पर कारगर शोध की बात हो या शहरों में इलाके, बाजार पहचान कर शेड की व्यवस्था, कूल रूफ, कूलिंग सेंटर बनाना, मजदूर, गिग वर्कर्स, इत्यादि के लिए संबंधित योजनाओं का नितांत अभाव है। उम्मीद है कि सरकार ने हर साल आने वाली भीषण गरमी से निबटने के अस्थाई उपायों के साथ स्थाई प्रबंधों पर भी बढ़ेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 22 May 2026 08:07:38 +0530</pubDate>
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                <title>संपादकीय: आशंकाओं की आहट</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पेट्रोल और डीजल की कीमतों में दूसरी बार हुई बढ़ोतरी ईंधन महंगा होने की सामान्य घटना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव का साफ संकेत है। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना कि तेल कंपनियों के नुकसान में केवल ‘एक चौथाई’ की कमी आई है, यह संकेत देता है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले महीनों में और मूल्यवृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। 2022 में पेट्रोल-डीजल के दाम 13 बार बढ़ाए गए थे। उस समय भी सरकार और तेल कंपनियों ने चरणबद्ध वृद्धि का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582658/editorial--the-sound-of-apprehensions"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy14.jpg" alt=""></a><br /><p>पेट्रोल और डीजल की कीमतों में दूसरी बार हुई बढ़ोतरी ईंधन महंगा होने की सामान्य घटना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव का साफ संकेत है। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना कि तेल कंपनियों के नुकसान में केवल ‘एक चौथाई’ की कमी आई है, यह संकेत देता है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले महीनों में और मूल्यवृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। 2022 में पेट्रोल-डीजल के दाम 13 बार बढ़ाए गए थे। उस समय भी सरकार और तेल कंपनियों ने चरणबद्ध वृद्धि का रास्ता अपनाया था, ताकि जनता पर अचानक भारी बोझ न पड़े। इस बार भी वैसी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। </p>
<p>यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है, तो तेल कंपनियां घाटे की भरपाई के लिए धीरे-धीरे कीमतें बढ़ा सकती हैं। इसका प्रभाव पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं होगा, इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था की लागत संरचना पर पड़ेगा। ट्रक और टेंपो का किराया बढ़ेगा, कृषि उपज, फल, सब्जियां, राशन और उपभोक्ता वस्तुओं की बड़ी आपूर्ति सड़क परिवहन पर निर्भर है, तो डीजल महंगा होने से दूसरे राज्यों से आने वाली वस्तुओं की लागत बढ़ेगी और उसका बोझ अंततः उपभोक्ता पर पड़ेगा। </p>
<p>ईंधन की महंगाई खाद्य मुद्रास्फीति को जन्म देगी। स्कूल बसें, ऑटो, टैक्सी और निजी बस ऑपरेटर ईंधन लागत बढ़ने का भार यात्रियों पर डालने की कोशिश करेंगे। इसका सीधा असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग की मासिक आय पर पड़ेगा, क्योंकि परिवहन व्यय घरेलू बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ट्रैक्टर, पंपिंग सेट और सिंचाई का बड़ा हिस्सा डीजल आधारित है, तो खेती की लागत बढ़ेगी,  किसानों का मुनाफा कम होगा। भारत में ही नहीं इंडोनेशिया, वियतनाम, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में ईंधन भंडार तेजी से घट रहे हैं। कहीं ब्लैकआउट है, कहीं पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें। </p>
<p>पाकिस्तान और श्रीलंका पहले ही दिखा चुके हैं कि ऊर्जा संकट किस तरह राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता में बदल सकता है। भारत की स्थिति इन देशों से अपेक्षाकृत बेहतर अवश्य है, क्योंकि यहां विदेशी मुद्रा भंडार, रणनीतिक तेल भंडार और बड़ी अर्थव्यवस्था का सहारा मौजूद है। फिर भी हम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। यदि तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो चालू खाते का घाटा बढ़ेगा, रुपये पर दबाव पड़ेगा और महंगाई नियंत्रण कठिन हो जाएगा। यही कारण है कि प्रधानमंत्री द्वारा पेट्रोल, गैस और डीजल के संयमित उपयोग की अपील केवल नैतिक सलाह नहीं, बल्कि दूरदर्शी चेतावनी मानी जानी चाहिए। </p>
<p>ऊर्जा संकट के इस दौर में ईंधन बचत अब केवल व्यक्तिगत अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है। भारत के सामने चुनौती केवल तेल खरीदने की नहीं, बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ऊर्जा दक्षता को तेज गति से बढ़ाने की भी है। जाहिर है कि ऊर्जा पर अत्यधिक आयात निर्भरता हमारी अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरी बन सकती है। हमें भविष्य की महंगाई और वैश्विक अस्थिरता से बचना है, तो अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में कहीं अधिक तेज और निर्णायक कदम उठाने ही होंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 21 May 2026 07:07:14 +0530</pubDate>
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