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                <title>सम्पादकीय - Amrit Vichar</title>
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                            <item>
                <title>संपादकीय : आस्था के प्रति जवाबदेही</title>
                                    <description><![CDATA[<p>अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी और कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि राम मंदिर में बड़े पैमाने पर चोरी और कमीशनखोरी हुई। इसने देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थाओं में से एक की प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं। चढ़ावे का कोई पूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध न होना सबसे बड़ी चिंता है। कानून और लेखा-परीक्षण की दृष्टि से रिकॉर्ड का अभाव अपराध को और अधिक गंभीर बनाता है। मंदिर केवल एक धार्मिक परिसर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, इसलिए यहां</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585681/accountability-to-editorial-trust"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-017.jpg" alt=""></a><br /><p>अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी और कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच कर रही एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि राम मंदिर में बड़े पैमाने पर चोरी और कमीशनखोरी हुई। इसने देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संस्थाओं में से एक की प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं। चढ़ावे का कोई पूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध न होना सबसे बड़ी चिंता है। कानून और लेखा-परीक्षण की दृष्टि से रिकॉर्ड का अभाव अपराध को और अधिक गंभीर बनाता है। मंदिर केवल एक धार्मिक परिसर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, इसलिए यहां का मामला सामान्य वित्तीय अनियमितता से कहीं अधिक गंभीर और आस्था के प्रति जवाबदेही का है। </p>
<p>प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार समस्या केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि संस्थागत प्रक्रियाओं में भी खामियां मौजूद हैं, हालांकि अंतिम निष्कर्ष अभी आना शेष है, फिर भी प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि निगरानी और जवाबदेही की मौजूदा व्यवस्था अपेक्षित स्तर की नहीं रही। रिपोर्ट में कुछ तथ्यों को संवेदनशील और गोपनीय बताते हुए सार्वजनिक नहीं किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि जांच आगे वित्तीय लेनदेन, खरीद अनुबंधों, नियुक्तियों, ट्रस्ट से जुड़े प्रभावशाली व्यक्तियों तथा धन के प्रवाह की गहन पड़ताल की दिशा में बढ़ सकती है। ट्रस्ट के पदाधिकारियों, कर्मचारियों अथवा उनसे जुड़े जिन व्यक्तियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाए सरकार को चाहिए कि वह उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, एफआईआर और आपराधिक मुकदमे से कतई गुरेज न करे, ताकि विश्वास बहाली संभव हो। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार की पहल पर हुआ था। </p>
<p>स्वतंत्र निकाय होने के बावजूद उसकी विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार का नैतिक दायित्व है, इसलिए सरकार यह कहकर पूरी तरह अलग नहीं रह सकती कि मामला केवल ट्रस्ट के अधिकार क्षेत्र का है। जवाबदेही सुनिश्चित करना शासन का भी कर्तव्य है। लखनऊ हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका के आधार पर यदि न्यायालय को वर्तमान जांच अपर्याप्त प्रतीत होती है, तो मामले को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने की संभावना भी बन सकती है। इसी प्रकार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से व्यापक ऑडिट कराने की मांग भी तर्कसंगत प्रतीत होती है, क्योंकि इससे पिछले वर्षों के वित्तीय प्रबंधन की निष्पक्ष समीक्षा संभव होगी। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब श्रद्धालुओं के विश्वास बहाली का है। </p>
<p>सरकार को पांच वर्षों के चढ़ावे और व्ययों का स्वतंत्र ऑडिट कराना चाहिए, सभी दान की डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था लागू करने, सोना-चांदी के लिए बारकोड आधारित अभिलेखीकरण शुरू करने के अलावा गणना कक्षों में चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी और बैंक तक सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। नियुक्तियों को पूरी तरह योग्यता आधारित और पारदर्शी बनाने के लिए ट्रस्ट का पुनर्गठन और एक पेशेवर मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति भी उचित कदम होगा। करोड़ों लोगों की श्रद्धा के प्रतीक राम मंदिर से संबद्ध इस मामले में लक्ष्य केवल दोषियों को दंडित करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना होना चाहिए, जिसमें भविष्य में किसी भी श्रद्धालु को यह संदेह न रहे कि उसकी आस्था और उसका अर्पण पूर्णतः सुरक्षित हाथों में नहीं है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/585681/accountability-to-editorial-trust</link>
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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 07:00:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : इस आग से सबक</title>
                                    <description><![CDATA[<p>लखनऊ के एक व्यावसायिक भवन में हुआ हालिया अग्निकांड शासन-प्रशासन, नियामक संस्थाओं और भवन स्वामियों की सामूहिक विफलता का भयावह दस्तावेज है। जिन 15 लोगों की जान गई, वे केवल आग की लपटों से नहीं मरे, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही के अभाव के शिकार बने। राजधानी में ऐसी घटना का होना इस बात का प्रमाण है कि कागजों पर मौजूद सुरक्षा व्यवस्था और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। </p>
<p>प्रारंभिक तथ्यों से स्पष्ट है कि आवासीय को व्यावसायिक बना दिए गए भवन में आपातकालीन निकास</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585550/editorial-lessons-from-this-fire"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-016.jpg" alt=""></a><br /><p>लखनऊ के एक व्यावसायिक भवन में हुआ हालिया अग्निकांड शासन-प्रशासन, नियामक संस्थाओं और भवन स्वामियों की सामूहिक विफलता का भयावह दस्तावेज है। जिन 15 लोगों की जान गई, वे केवल आग की लपटों से नहीं मरे, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही के अभाव के शिकार बने। राजधानी में ऐसी घटना का होना इस बात का प्रमाण है कि कागजों पर मौजूद सुरक्षा व्यवस्था और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। </p>
<p>प्रारंभिक तथ्यों से स्पष्ट है कि आवासीय को व्यावसायिक बना दिए गए भवन में आपातकालीन निकास नहीं था, धुएं की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, भूतल में प्लास्टिक और रासायनिक पदार्थों का भंडारण था तथा प्रवेश-निकास का एक ही रास्ता था। मुख्य द्वार का थंब इंप्रेशन आधारित लॉकिंग सिस्टम आग फैलने के बाद बाधा बन गया। आधुनिक तकनीक सुविधा के लिए होती है, लेकिन यदि उसमें आपातकालीन मैनुअल ओवरराइड की व्यवस्था न हो तो वही तकनीक मृत्यु का कारण बन सकती है। देश और विदेश में ऐसी अनेक घटनाओं के बावजूद यदि सुरक्षा मानकों में यह पहलू शामिल नहीं किया गया, तो यह गंभीर नियामकीय कमी है। हर बड़े अग्निकांड के बाद जांच, सर्वेक्षण और अभियान शुरू होना एक सरकारी अनुष्ठान हो चुका है। लगभग हर जांच रिपोर्ट ने एक जैसी कमियां उजागर की हैं— अवैध निर्माण, बंद आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरणों का अभाव और निरीक्षण तंत्र की निष्क्रियता। प्रश्न यह है कि यदि समस्याएं पहले से ज्ञात हैं, तो कार्रवाई केवल हादसे के बाद ही क्यों होती है? यह वास्तव में आग लगने के बाद कुआं खोदने जैसी प्रवृत्ति है। सरकार द्वारा गठित दो सदस्यीय विशेष जांच दल तथ्यों का संकलन कर जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थाओं की पहचान तो करेगा पर उसे कोई ऐसी नई सच्चाई नहीं मिलेगी, जिससे शासन पहले से परिचित न हो। अधिक उपयोगी यह होता कि जांच दल में अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञ, भवन अभियंता, शहरी नियोजन विशेषज्ञ और आपदा प्रबंधन के जानकारों को भी शामिल किया जाता। इससे रिपोर्ट केवल दोष निर्धारण तक सीमित न रहकर भविष्य की नीति सुधार का आधार बन सकती थी।</p>
<p>सरकार ने कहा है कि दोषी को अवश्य सज़ा मिलेगी पर महत्वपूर्ण प्रश्न है कि दोषी कौन हैं? यदि भवन मूलतः आवासीय था और बाद में व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तित हुआ, तो उसके नक्शे, अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र, उपयोग परिवर्तन की अनुमति तथा समय-समय पर निरीक्षण की जिम्मेदारी विभिन्न सरकारी एजेंसियों की भी थी। नगर निगम यदि वर्षों से व्यावसायिक कर वसूल रहा था तो क्या उसने सुरक्षा मानकों की जांच की? अग्निशमन विभाग ने अनापत्ति प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किया या उसका नवीनीकरण किया? विकास प्राधिकरण और स्थानीय प्रशासन ने निरीक्षण क्यों नहीं किए? यह मामला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही का है। दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि ऐसे मामलों में दंड का रिकॉर्ड बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है। लंबी जांच, कानूनी प्रक्रियाएं और प्रशासनिक संरक्षण अक्सर जवाबदेही को कमजोर कर देते हैं। लखनऊ का यह भीषण अग्निकांड सबक देता है कि अब आवश्यकता भवन सुरक्षा के पूरे ढांचे की पुनर्समीक्षा की है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 07:03:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : जवाबदेही की कसौटी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>राम मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले की जांच कर रही एसआईटी को प्रकरण की सघन जांच और मंदिर ट्रस्ट को जवाबदेही की कसौटी पर परखने के लिए और समय लगेगा। प्रारंभिक जांच के निष्कर्ष निर्णायक नहीं हो सकते, क्योंकि राम मंदिर में आए दान में कथित चोरी की एसआईटी जांच का फोकस नकदी से आगे बढ़कर सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात और अन्य बहुमूल्य दान सामग्री तक पहुंच चुका है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि वास्तविक प्रश्न केवल नकदी की गिनती का नहीं, पूरे दान प्रबंधन तंत्र की पारदर्शिता का है। ट्रस्ट ने स्वयं स्वीकार किया था कि मंदिर को लगभग 13</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585483/criteria-of-editorial-accountability"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-015.jpg" alt=""></a><br /><p>राम मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले की जांच कर रही एसआईटी को प्रकरण की सघन जांच और मंदिर ट्रस्ट को जवाबदेही की कसौटी पर परखने के लिए और समय लगेगा। प्रारंभिक जांच के निष्कर्ष निर्णायक नहीं हो सकते, क्योंकि राम मंदिर में आए दान में कथित चोरी की एसआईटी जांच का फोकस नकदी से आगे बढ़कर सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात और अन्य बहुमूल्य दान सामग्री तक पहुंच चुका है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि वास्तविक प्रश्न केवल नकदी की गिनती का नहीं, पूरे दान प्रबंधन तंत्र की पारदर्शिता का है। ट्रस्ट ने स्वयं स्वीकार किया था कि मंदिर को लगभग 13 क्विंटल चांदी और 20 किलोग्राम सोना दान में मिला, किंतु उन वस्तुओं के संग्रह, भंडारण और वर्तमान स्थिति का पूरा रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है। </p>
<p>ट्रस्ट की नियमित बैठकों में सोने-चांदी, आभूषणों और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं की मात्रा, मूल्यांकन और उपलब्ध स्टॉक का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया जाना बताता है कि वित्तीय निगरानी की व्यवस्था कैसी थी? परिसंपत्तियों का नियमित मिलान, ऑडिट और प्रस्तुतीकरण अनिवार्य होना चाहिए। इस प्रक्रिया का व्यवस्थित न होना संस्थागत विफलता का संकेत है। जांच एजेंसी अब वास्तविक दानदाताओं से संपर्क कर जानने का प्रयास कर सकती है कि उन्होंने क्या दान किया था और उसका अभिलेखों में किस रूप में उल्लेख है। यदि किसी दानदाता के पास फोटो, वीडियो, रसीद, मीडिया कवरेज या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं, तो उनका मिलान अभिलेखों से करके उसका मूल्यांकन किया जा सकता है। इससे तथाकथित ‘रिवर्स ट्रैकिंग’ संभव होगी, जिसमें दानदाता से शुरू होकर वस्तु की पूरी यात्रा को ट्रेस करने का प्रयास संभव है, हालांकि इस प्रक्रिया की अपनी सीमाएं भी हैं।</p>
<p>भारत में गुप्त दान की परंपरा पुरानी है। अनेक श्रद्धालु बिना नाम बताए दान करते हैं। कई मामलों में न तो रसीद होती है और न ही कोई दृश्य प्रमाण, इसलिए प्रत्येक आभूषण या बहुमूल्य वस्तु की शत-प्रतिशत ट्रैकिंग कतई संभव नहीं होगी। फिर भी जहां प्रमाण उपलब्ध हैं, वहां यह तरीका जांच को मजबूत बना सकता है और कथित अनियमितताओं का वास्तविक आकार सामने ला सकता है। जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू बैंकिंग व्यवस्था है, जिसकी तरफ इस समाचार पत्र ने विगत में प्रमुखता से अपनी खबर में इंगित किया था और फिर एसआईटी जवाबदेही की इसी श्रृंखला को खंगालने की ओर मुड़ी। दानपात्र खोलने, नकदी और आभूषणों की गणना, रिकॉर्डिंग, परिवहन और जमा करने की प्रक्रिया में ट्रस्ट, बैंक तथा आउटसोर्स एजेंसियां एक साथ मौजूद थीं। यदि इतने स्तरों की निगरानी के बावजूद गड़बड़ियां हुईं, तो प्रश्न केवल व्यक्तियों पर नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर उठता है। आशंका यह है कि कहीं जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित न रह जाए। </p>
<p>यदि निर्णय, निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था उच्च स्तर पर केंद्रित थी, तो जवाबदेही भी उसी अनुपात में तय होनी चाहिए। बड़ी संस्थागत विफलताओं में अक्सर ‘छोटी मछलियां’ पकड़ ली जाती हैं, जबकि वास्तविक जिम्मेदार बच निकलते हैं। राम मंदिर की प्रतिष्ठा का प्रश्न किसी व्यक्ति या पद से बड़ा है। आस्था की रक्षा तभी होगी, जब सत्य पूरी तरह सामने आए और जवाबदेही बिना किसी भेदभाव के तय हो।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/585483/criteria-of-editorial-accountability</link>
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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 07:00:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : जमीन का आधार</title>
                                    <description><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यूनीक प्रॉपर्टी आईडी व्यवस्था लागू करने की मंजूरी राज्य की भूमि और संपत्ति प्रबंधन प्रणाली में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। यदि यह योजना अपने घोषित स्वरूप में लागू होती है, तो यह राजस्व प्रशासन में तकनीकी सुधार के साथ भूमि स्वामित्व, पंजीकरण, कराधान और शहरी नियोजन की पूरी व्यवस्था को डिजिटल युग में ले जाएगी। जिस देश में अधिकांश दीवानी मुकदमे भूमि विवादों से जुड़े हों और जहां संपत्ति की वास्तविक स्थिति जानने के लिए नागरिकों को कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हों, वहां ऐसी पहल का महत्व स्वतः स्पष्ट हो जाता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585395/editorial-ground-base"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-014.jpg" alt=""></a><br /><p>उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यूनीक प्रॉपर्टी आईडी व्यवस्था लागू करने की मंजूरी राज्य की भूमि और संपत्ति प्रबंधन प्रणाली में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। यदि यह योजना अपने घोषित स्वरूप में लागू होती है, तो यह राजस्व प्रशासन में तकनीकी सुधार के साथ भूमि स्वामित्व, पंजीकरण, कराधान और शहरी नियोजन की पूरी व्यवस्था को डिजिटल युग में ले जाएगी। जिस देश में अधिकांश दीवानी मुकदमे भूमि विवादों से जुड़े हों और जहां संपत्ति की वास्तविक स्थिति जानने के लिए नागरिकों को कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हों, वहां ऐसी पहल का महत्व स्वतः स्पष्ट हो जाता है। यूनीक प्रॉपर्टी आईडी का मूल विचार कि प्रत्येक भूमि पार्सल अथवा संपत्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान की जाए, सराहनीय है। यह संख्या भू-अभिलेख, जीआईएस मैपिंग, पंजीकरण, राजस्व रिकॉर्ड, नगर निकायों के कर अभिलेख, बिजली-पानी कनेक्शन और अन्य सरकारी सूचनाओं से जुड़ने का बड़ा लाभ यह होगा कि किसी संपत्ति की पहचान व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि उसके भू-स्थान और आधिकारिक रिकॉर्ड से होगी। इससे स्वामित्व संबंधी भ्रम और रिकॉर्ड में विसंगतियां कम हो सकती हैं। विवादित और फर्जी संपत्तियों की खरीद-फरोख्त पर रोक संभव है।</p>
<p>वर्तमान व्यवस्था में एक ही भूमि के कई दस्तावेज तैयार कर लेना, मृत व्यक्ति के नाम की संपत्ति बेचना, सरकारी भूमि को निजी दिखाना या मुकदमेबाजी में फंसी संपत्ति का सौदा करना आसान नहीं रहेगा। यूनीक प्रॉपर्टी आईडी को न्यायालयों, राजस्व विभाग और पंजीकरण विभाग के डेटाबेस से प्रभावी रूप से जोड़ने और पंजीकरण अधिनियम में प्रस्तावित नई धाराएं 22 ए, 22 बी और 35 ए के समावेशन से उन संपत्तियों के पंजीकरण रुकेगा जो विवादित हैं, सरकारी नियंत्रण में हैं, न्यायिक प्रक्रिया में हैं या जिनके स्वामित्व पर गंभीर प्रश्न हैं, तो ऐसी संपत्तियों की पहचान पहले हो जाने पर उनके पंजीकरण पर रोक लगाई जा सकेगी।</p>
<p>तय है कि केवल डिजिटल पहचान से अवैध कब्जे समाप्त नहीं हो जाएंगे। भारत में भूमि विवाद केवल अभिलेखों की समस्या नहीं, बल्कि प्रभावशाली कब्जाधारियों, प्रशासनिक शिथिलता और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं से भी जुड़े हैं। जीआईएस आधारित भू-अभिलेखों की विश्वसनीयता भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि प्रारंभिक सर्वेक्षण और डिजिटलीकरण में त्रुटियां रह गईं, तो वही गलतियां डिजिटल रूप में स्थायी हो सकती हैं। फिर भी इस पहल के लाभ व्यापक हैं। आम नागरिक को संपत्ति का सत्यापन कराने, नक्शा देखने, स्वामित्व जांचने और कर भुगतान के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। राजस्व विभाग को कर संग्रह में पारदर्शिता मिलेगी, नगर निकायों को संपत्ति कर का वास्तविक आधार प्राप्त होगा और निवेशकों के लिए भूमि लेन-देन अधिक सुरक्षित बन सकेगा। </p>
<p>सरकार को यह ख्याल रखना होगा कि यह केवल एक नई संख्या जारी करने तक सीमित न रहे, बल्कि भूमि प्रशासन के सभी विभागों को वास्तव में एकीकृत कर दे। यदि ऐसा हुआ, तो यह न केवल संपत्ति प्रबंधन की व्यवस्था बदलेगी, बल्कि भूमि विवादों, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जटिलताओं को कम करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी। डिजिटल शासन का वास्तविक अर्थ तभी है, जब तकनीक नागरिकों के लिए सुविधा और राज्य के लिए पारदर्शिता दोनों सुनिश्चित करे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 07:01:35 +0530</pubDate>
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                <title>संपादकीय : शांति की कीमत</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सौ दिनों से अधिक चले संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हुई और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर संकट मंडराने लगा था। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर को मानवता और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है। इस समझौते को किसी पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने की बजाए यदि क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो वास्तविक विजेता शांति होगी। किंतु इतना अवश्य कहा जाएगा कि यह बहुत महंगी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह कि दीर्घकालिक भरोसे से जुड़े प्रश्न अभी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585197/editorial-price-of-peace"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-013.jpg" alt=""></a><br /><p>सौ दिनों से अधिक चले संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हुई और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर संकट मंडराने लगा था। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर को मानवता और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है। इस समझौते को किसी पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने की बजाए यदि क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो वास्तविक विजेता शांति होगी। किंतु इतना अवश्य कहा जाएगा कि यह बहुत महंगी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह कि दीर्घकालिक भरोसे से जुड़े प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। अमेरिका को अपने उद्देश्यों में बहुत सीमित और मिश्रित सफलता ही मिली है। कई अमेरिकी अखबार इसे ट्रंप की विफलता का दस्तावेज बता रहे हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन, शासन को कमजोर करने अथवा पूर्ण परमाणु समझौते जैसी महत्वाकांक्षी अमेरिकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं। यही कारण है कि परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम निर्णय को 60 दिनों की वार्ता पर छोड़ दिया गया है। ईरान ने अभी तक संवर्धित यूरेनियम या बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर निर्णायक रियायत नहीं दी है।</p>
<p>ट्रंप द्वारा ईरान के सीमित मिसाइल अधिकारों को स्वीकार करना भी अमेरिकी लक्ष्य का अधूरा होना है। ईरान के दृष्टिकोण से देखें, तो यह समझौता उसकी महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता प्रतीत होता है। यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है, अवरुद्ध संपत्तियों तक पहुंच बहाल होती है और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ता है, तो तेहरान को बड़ी राहत मिलेगी। कथित 28 लाख करोड़ रुपये के पैकेज अथवा हर्जाने अगर उसे मिल जाता है, तो यह उसकी बड़ी जीत होगी। हालांकि वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंधों में कितनी और कैसी ढील दी जाती है। इजराइल का प्रश्न अभी भी सबसे बड़ी अनिश्चितता से भरा हुआ है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस समझौते के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखते। यदि भविष्य में चुनावे फायदे के मद्देनजर  लेबनान, गाजा या ईरान से जुड़े मोर्चों पर नेतन्याहू तनाव पैदा करते हैं, तो वर्तमान शांति प्रक्रिया फिर से संकट में पड़ सकती है। इसलिए इस समझौते के बावजूद किसी भी पक्ष द्वारा आगे सैन्य कार्रवाई न करने की पूर्ण गारंटी आज कोई नहीं दे सकता।</p>
<p>भारत के लिए यह समझौता अत्यंत सकारात्मक संकेत लेकर आया है। तेल कीमतों में नरमी से आयात बिल कम हो सकता है, रुपये को समर्थन मिल सकता है और महंगाई पर दबाव घट सकता है। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों के रोजगार और सुरक्षा की स्थिति भी बेहतर हो सकती है। साथ ही चाबहार बंदरगाह और भारत-ईरान संपर्क परियोजनाओं को नई गति मिलने की संभावना बढ़ेगी। कुल मिलाकर यह समझौता हमें याद दिलाता है कि युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं और शांति का सबसे बड़ा लाभ भी उन्हें ही मिलता है, लेकिन पश्चिम एशिया के इतिहास को देखते हुए यह भी सच है कि शांति केवल दस्तावेजों से नहीं टिकती; उसे भरोसे, संयम और सतत संवाद से जीवित रखना पड़ता है। इसलिए इस समझौते का स्वागत अवश्य होना चाहिए, पर उसकी स्थिरता की असली परीक्षा अगले कुछ महीनों में होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 07:05:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय : मित्रता बनाम हित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वैश्विक राजनीति के इस संक्रमण काल में, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, चीन की बढ़ती सक्रियता, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रतिस्पर्धा ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति बदल दी है। ऐसे माहौल में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की वार्ता को बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह भारत की उम्मीदों को बढ़ाने वाली है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप द्वारा प्रस्तुत इम्पैक्ट यानी “इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सलरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड” की अवधारणा वस्तुतः उस नई वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जिसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, डिजिटल कनेक्टिविटी और आपूर्ति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585115/editorial--friendship-vs--interest"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy23.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैश्विक राजनीति के इस संक्रमण काल में, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, चीन की बढ़ती सक्रियता, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रतिस्पर्धा ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति बदल दी है। ऐसे माहौल में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की वार्ता को बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह भारत की उम्मीदों को बढ़ाने वाली है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप द्वारा प्रस्तुत इम्पैक्ट यानी “इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सलरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड” की अवधारणा वस्तुतः उस नई वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जिसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, डिजिटल कनेक्टिविटी और आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित मॉडल से अलग कर बहुध्रुवीय ढांचे में विकसित करने की कोशिश है। भारत और ग्लोबल साउथ के लिए इसका अर्थ है कि उन्हें केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी नवाचार के केंद्र के रूप में भी देखा जाएगा। यह पहल व्यवहार में उतरती है, तो भारत को निवेश, विनिर्माण, बंदरगाह, डिजिटल अवसंरचना और निर्यात के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप का यह कहना कि युद्ध की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा होगा, महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। इसके पीछे चीन का बढ़ता प्रभाव, इंडो-पैसिफिक की रणनीति और पाकिस्तान-चीन सैन्य सहयोग जैसे कारक भी हो सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को मिले चीनी समर्थन ने वाशिंगटन को यह एहसास भी कराया है कि दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका अपरिहार्य है, लेकिन याद रखना चाहिए कि अमेरिकी विदेश नीति स्थायी मित्रता नहीं, स्थायी हितों पर आधारित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका भारत को चीन के संतुलन के रूप में देखता है, जबकि पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्थिरता और कुछ सामरिक उद्देश्यों के लिए उपयोगी मानता है। इसलिए किसी एक बयान को सुरक्षा गारंटी मान लेना उचित नहीं होगा। जहां तक एच-1बी वीजा और भारतीय प्रतिभाओं की बात है, ट्रंप का सकारात्मक रुख उत्साहजनक है, लेकिन अमेरिकी आव्रजन नीति अंततः घरेलू राजनीति से प्रभावित होती है। इसलिए तत्काल किसी बड़े बदलाव की अपेक्षा जल्दबाजी होगी। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री का कहना कि देशों के बीच भरोसा और विश्वास कम हो रहा है, आज की विश्व राजनीति का सबसे सटीक आकलन है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष, व्यापारिक प्रतिबंध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बदलते सैन्य गठबंधनों ने देशों के बीच संदेह बढ़ाया है। भरोसा केवल घोषणाओं से नहीं बढ़ता, इसके लिए नियमों का सम्मान, समझौतों का पालन और दीर्घकालिक नीति-स्थिरता आवश्यक होती है। भारत इसी कारण “रणनीतिक स्वायत्तता” पर जोर देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी की प्रशंसा करते हुए ट्रंप का यह कहना कि “जब तक मोदी हैं, व्हाइट हाउस उनके साथ है” व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों संदेश देता है। निष्कर्षतः यह भारत के प्रति सम्मान का संकेत है। भारत को ट्रंप के बयानों का स्वागत अवश्य करना चाहिए, लेकिन अपनी नीति को घोषणाओं पर नहीं, ठोस समझौतों और वास्तविक क्रियान्वयन पर आधारित रखनी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मित्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है, किंतु राष्ट्रीय हित उससे भी अधिक अहम होते हैं। यही वह संतुलन है, जिसने आज भारत को आज वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय और स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 05:49:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : समझौते पर साए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच, पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखने वाले जिस ऐतिहासिक अंतरिम समझौते की तैयारी है, उसके लिए कूटनीतिक मेज के सजने से पहले बारूदी हलचल और धमकियों के दौर में तेजी यह दर्शाती है कि इस समझौते की राह जितनी आकर्षक दिख रही है, धरातल पर उसकी नींव उतनी ही नाजुक और विरोधाभासों से घिरी हुई है। इजराइल द्वारा लेबनान पर ताजा हमले, ईरान द्वारा लेबनान से इजरायली सैनिकों की वापसी की नई शर्त और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को 28 लाख करोड़ रुपये देने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585060/editorial--shadows-on-the-agreement"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy22.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिजॉर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच, पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखने वाले जिस ऐतिहासिक अंतरिम समझौते की तैयारी है, उसके लिए कूटनीतिक मेज के सजने से पहले बारूदी हलचल और धमकियों के दौर में तेजी यह दर्शाती है कि इस समझौते की राह जितनी आकर्षक दिख रही है, धरातल पर उसकी नींव उतनी ही नाजुक और विरोधाभासों से घिरी हुई है। इजराइल द्वारा लेबनान पर ताजा हमले, ईरान द्वारा लेबनान से इजरायली सैनिकों की वापसी की नई शर्त और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को 28 लाख करोड़ रुपये देने से साफ इनकार करने ने मामले में नया पेच आ गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझौते की इस दहलीज पर वाशिंगटन ने तेल अवीव को पूरी तरह अलग-थलग छोड़ दिया है। अमेरिका द्वारा इजरायली रक्षा मंत्री बेन ग्वीर को वीजा न देना और नेतन्याहू को व्हाइट हाउस में मिलने का समय न देना यह साफ करता है कि हेनरी किसिंजर की वह उक्ति आज भी प्रासंगिक है-“अमेरिका का कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल उसके हित होते हैं”। इजरायल अब हताशा में अपने दम पर स्वतंत्र सैन्य कदम उठा रहा है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन अब सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देशों के सुर में सुर मिलाते हुए ईरान से व्यापारिक व रणनीतिक शांति चाहता है, ताकि वैश्विक तेल बाजार को ब्रेंट क्रूड के 79 डॉलर प्रति बैरल के निचले स्तर पर लाकर राहत दी जा सके।  </p>
<p style="text-align:justify;"> आगे की कूटनीतिक वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका बेहद सीमित और कतर की भूमिका सर्वाधिक होने की उम्मीद है। पाकिस्तान केवल बयानबाजी तक सीमित है, जबकि कतर और ओमान जैसे देश अमेरिका-ईरान के बीच ‘बैक-चैनल डिप्लोमेसी’ और मध्यस्थता के असली रणनीतिक केंद्र रहे हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का यह कहना सही है कि अमेरिका का अतीत में समझौते फाड़ने का इतिहास रहा है। यदि शुक्रवार को इस समझौते पर हस्ताक्षर हो भी जाते हैं, तो अगले 60 दिनों की वार्ता के दौरान दोनों पक्षों का इससे पीछे हटना पूरी तरह मुमकिन है। यूरेनियम संवर्धन, प्रतिबंध हटाने और ईरान के ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ हमास और हिजबुल्लाह को फिर से हथियार मिलने के खतरों पर दोनों पक्षों में इतनी गहरी खाई है कि 60 दिनों की इस मियाद में यह कभी भी टूट सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संदर्भ में, पश्चिम एशिया में शांति हमारे आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए संजीवनी है, हमारी ऊर्जा सुरक्षा और लाखों प्रवासी इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। इस ऊहापोह वाली स्थिति में भारत को ‘सक्रिय तटस्थता’ और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनानी होगी। भारत को जहां एक तरफ अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी को बढ़ाने के साथ चाबहार बंदरगाह के हितों को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को स्वतंत्र रूप से मजबूत रखना होगा। इजरायल के साथ अपने रक्षा संबंधों को बिना प्रभावित किए, इस बहुध्रुवीय संकट में एक संतुलित और विश्वसनीय वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए, क्योंकि पश्चिम एशिया की इस बारूदी शांति में केवल वही टिकेगा, जिसके संबंध हर धड़े से मजबूत होंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 06:39:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : रक्षा से प्रौद्योगिकी तक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा कूटनीतिक औपचारिकता से बढ़ कर रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में उभरती हुई एक नई सामरिक साझेदारी का संकेत है। दोनों देशों द्वारा अपनी साझेदारी को गहरा करते हुए व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना करने, “इनोवेशन रोडमैप 2030” लागू करने तथा एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा पर संयुक्त कार्य समूह बनाने का जो निर्णय लिया गया वह स्वागत योग्य है। खास बात यह है कि दोनों देश “रणनीतिक स्वायत्तता” के पक्षधर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">“भारत-फ्रांस इनोवेशन रोडमैप 2030” यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संकेत है कि भारत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584845/editorial--from-defence-to-technology"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy21.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा कूटनीतिक औपचारिकता से बढ़ कर रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में उभरती हुई एक नई सामरिक साझेदारी का संकेत है। दोनों देशों द्वारा अपनी साझेदारी को गहरा करते हुए व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना करने, “इनोवेशन रोडमैप 2030” लागू करने तथा एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा पर संयुक्त कार्य समूह बनाने का जो निर्णय लिया गया वह स्वागत योग्य है। खास बात यह है कि दोनों देश “रणनीतिक स्वायत्तता” के पक्षधर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">“भारत-फ्रांस इनोवेशन रोडमैप 2030” यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संकेत है कि भारत अब केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी प्रदाता बनना चाहता है। डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई, अंतरिक्ष प्रक्षेपण, वैक्सीन उत्पादन और एआई अनुप्रयोगों में भारत की उपलब्धियों ने फ्रांस को प्रभावित किया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा “भारत इनोवेट्स” कार्यक्रम में भारतीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की प्रशंसा इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">द्विपक्षीय व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना कर 16 अरब डॉलर से 32 अरब डॉलर तक ले जाना महत्वाकांक्षी अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को गति देनी होगी, रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण में संयुक्त निवेश बढ़ाना होगा तथा सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और डिजिटल प्रौद्योगिकी में साझेदारी को विस्तार देना होगा। फ्रांस पहले से भारत में प्रमुख निवेशकों में शामिल है और एक हजार से अधिक फ्रांसीसी कंपनियां भारत में सक्रिय हैं। रक्षा क्षेत्र में लगभग ₹3.25 लाख करोड़ की लागत से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर हालांकि अंतिम समझौता अभी शेष है, लेकिन भारत द्वारा औपचारिक अनुरोध भेजे जाने के बाद परियोजना निर्णायक चरण में पहुंच गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार लगभग 94 विमान भारत में “मेक इन इंडिया” के तहत निर्मित किए जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह पहली बार होगा जब राफेल का बड़े पैमाने पर उत्पादन फ्रांस के बाहर होगा। इससे भारतीय एयरोस्पेस उद्योग, निजी क्षेत्र और आपूर्ति श्रृंखला को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत और फ्रांस का प्रस्तावित ओपन मॉडल भी उल्लेखनीय है। इसका उद्देश्य कुछ बड़ी कंपनियों के स्वामित्व वाले एआई मॉडल्स के विकल्प के रूप में अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और बहुभाषी एआई पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है। भारत के लिए इसका विशेष लाभ यह होगा कि भारतीय भाषाओं, स्थानीय डेटा और सार्वजनिक उपयोग के अनुप्रयोगों के लिए एआई विकास की लागत कम होगी तथा स्टार्टअप को वैश्विक मंच मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष क्षेत्र में इसरो और सीएनएएस के बीच सहयोग भी पृथ्वी अवलोकन, समुद्री निगरानी, जलवायु अध्ययन और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े संयुक्त मिशन भारत की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेगा। इससे भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप को यूरोपीय निवेश, अनुसंधान नेटवर्क और वैश्विक बाजारों तक पहुंच मिलने की संभावना बढ़ेगी। यह यात्रा भारत को रक्षा, एआई, अंतरिक्ष और उन्नत प्रौद्योगिकी की वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि घोषित योजनाएं समयबद्ध ढंग से लागू होती हैं, तो आने वाले दशक में यह साझेदारी भारत के आर्थिक और सामरिक उदय की प्रमुख आधारशिलाओं में से एक बन सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 05:31:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : चुनौती क्रियान्वयन की</title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक का केंद्रीय विषय ‘समावेशी मानव विकास’ था, जिसमें शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक समानता को विकास की धुरी माना गया और इस मामले में यह बैठक सफल कही जाएगी कि यह एक नियमित प्रशासनिक आयोजन न हो कर अपनी चर्चाओं के दौरान 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के इन मुद्दों को राज्यों के माध्यम से जमीन पर उतारने का प्रतिबद्ध प्रयास करती दिखी, हालांकि देश में ऐसी बैठकों में अच्छे विचारों की कमी कभी नहीं रही। केवल चर्चा से विकास का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584601/editorial-challenge-implementation"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-012.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक का केंद्रीय विषय ‘समावेशी मानव विकास’ था, जिसमें शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक समानता को विकास की धुरी माना गया और इस मामले में यह बैठक सफल कही जाएगी कि यह एक नियमित प्रशासनिक आयोजन न हो कर अपनी चर्चाओं के दौरान 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य के इन मुद्दों को राज्यों के माध्यम से जमीन पर उतारने का प्रतिबद्ध प्रयास करती दिखी, हालांकि देश में ऐसी बैठकों में अच्छे विचारों की कमी कभी नहीं रही। केवल चर्चा से विकास का लाभ हर भारतीय तक तो नहीं पहुंच पाएगा, चुनौती उनके क्रियान्वयन की है। </p>
<p>शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार राज्यों के विषय हैं, जबकि संसाधन, नीतियां और वित्तीय समर्थन काफी हद तक केंद्र से आते हैं, इसलिए यदि केंद्र और राज्य मिलकर स्पष्ट लक्ष्य, समयसीमा और जवाबदेही तय करें, तभी इन चर्चाओं का वास्तविक प्रभाव दिखाई देगा। अन्यथा यह भी अनेक संकल्पों की तरह दस्तावेजों तक सीमित रह सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों को जो पांच प्रमुख सुझाव दिए, वे व्यापक दृष्टि से दूरदर्शी प्रतीत होते हैं। इनमें जिला स्तर पर जीडीपी का आकलन, निवेश के लिए अनुपालन बोझ कम करना, एआई और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों पर ध्यान देना, साइबर धोखाधड़ी एवं नशे जैसी सामाजिक चुनौतियों से निपटना तथा जल संरक्षण को प्राथमिकता देना शामिल है। इन सुझावों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे विकास को केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं रखते। जिला जीडीपी की अवधारणा स्थानीय विकास की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है। इससे पिछड़े जिलों की पहचान और संसाधनों का बेहतर आवंटन संभव होगा, हालांकि अधिकांश राज्यों में अभी विश्वसनीय जिला स्तरीय आर्थिक आंकड़ों का अभाव है, इसलिए यह कार्य आसान नहीं होगा। इसी प्रकार एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था भविष्य की जरूरत हैं, लेकिन इनके लिए कौशल, निवेश और डिजिटल अवसंरचना भी चाहिए। एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य घोषित कर चुके उत्तर प्रदेश के लिए यह बैठक जिला जीडीपी, निवेश-अनुकूल वातावरण, कौशल विकास और रोजगार सृजन की रणनीतियों के तहत नए अवसर पैदा करती हैं। प्रदेश के विशाल युवा वर्ग को एआई, इलेक्ट्रॉनिक्स, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण क्षेत्र से जोड़ने में सफलता मिली तो यह राष्ट्रीय विकास का प्रमुख इंजन बन सकता है। पर्वतीय राज्य होने के कारण उत्तराखंड के लिए जल संरक्षण, प्राकृतिक खेती, पर्यटन, कौशल विकास और डिजिटल सेवाएं उसके विकास की कुंजी हैं। एआई आधारित सेवाओं, डेटा सेंटर, स्टार्टअप और स्थानीय उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने की नीति राज्य के युवाओं के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। जिला स्तर पर आर्थिक गतिविधियों के आकलन से विकास असंतुलन की पहचान भी आसान होगी। </p>
<p>बेशक, ‘विकसित भारत’ केवल घोषणाओं से नहीं बनेगा। राज्यों की प्रशासनिक क्षमता, वित्तीय संसाधन, पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति इसकी सफलता तय करेंगे। नीति आयोग की इस बैठक की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब विकास के आंकड़े नहीं, बल्कि आम नागरिक का जीवन स्तर बदलता हुआ दिखाई दे। विकसित भारत का मार्ग दिल्ली से नहीं, जिलों, ब्लॉकों और गांवों से होकर ही गुजरेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 07:07:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : युद्धविराम का भ्रम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पश्चिम एशिया एक बार फिर याद दिला रहा है कि यहां युद्ध और शांति के बीच की रेखा अक्सर धुंधली होती है। इजराइल-ईरान संघर्ष के बीच जब यह संकेत मिलने लगे थे कि अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहता है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार संभावित समझौते की बात कर रहे थे, तब ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई ने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अमेरिका का यह कहना कि उसने ‘आत्मरक्षा में आवश्यक कार्रवाई पूरी कर ली है’, दरअसल एक राजनीतिक और रणनीतिक संदेश है। इसका अर्थ यह नहीं कि संकट समाप्त हो गया है, बल्कि यह कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584524/the-illusion-of-an-editorial-ceasefire"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-011.jpg" alt=""></a><br /><p>पश्चिम एशिया एक बार फिर याद दिला रहा है कि यहां युद्ध और शांति के बीच की रेखा अक्सर धुंधली होती है। इजराइल-ईरान संघर्ष के बीच जब यह संकेत मिलने लगे थे कि अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहता है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार संभावित समझौते की बात कर रहे थे, तब ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई ने कई नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अमेरिका का यह कहना कि उसने ‘आत्मरक्षा में आवश्यक कार्रवाई पूरी कर ली है’, दरअसल एक राजनीतिक और रणनीतिक संदेश है। इसका अर्थ यह नहीं कि संकट समाप्त हो गया है, बल्कि यह कि वाशिंगटन फिलहाल अपने सैन्य उद्देश्य पूरे मानकर आगे की प्रतिक्रिया का अधिकार सुरक्षित रखना चाहता है। यही कारण है कि ट्रंप के पूर्व बयानों और हालिया कार्रवाई के बीच विरोधाभास दिखाई देता है। उन्होंने नेतन्याहू को संयम बरतने की सलाह दी थी, लेकिन अमेरिका और इजराइल की रणनीतिक स्थितियां पूरी तरह समान नहीं हैं। स्पष्ट है कि वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच युद्ध की सीमा, समय और उद्देश्य को लेकर मतभेद मौजूद हैं। </p>
<p>मित्र देशों के बीच मतभेद असामान्य नहीं होते, लेकिन वे रणनीतिक समन्वय को जटिल अवश्य बना देते हैं। आज स्थिति एक पूर्ण युद्ध और वास्तविक शांति के बीच अटकी हुई दिखाई देती है। इसे ‘नियंत्रित टकराव’ कहा जा सकता है, जहां सभी पक्ष संघर्ष को जारी भी रखते हैं और उसे व्यापक युद्ध में बदलने से बचाने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे सीमित संघर्ष कभी-कभी किसी गलत अनुमान, दुर्घटना या अत्यधिक प्रतिक्रिया के कारण अचानक बड़े युद्ध में बदल जाते हैं, इसलिए इस खतरे को कम करके नहीं आंका जा सकता। अमेरिका के भीतर भी लंबे विदेशी युद्धों के प्रति उत्साह सीमित है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभवों के बाद अमेरिकी जनता व्यापक सैन्य अभियानों के प्रति पहले जैसी उत्सुक नहीं दिखती। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी कार्रवाई को शक्ति प्रदर्शन और कूटनीति दोनों के रूप में प्रस्तुत करें। यही कारण है कि सैन्य कदमों के साथ बातचीत के दरवाजे भी पूरी तरह बंद नहीं किए जा रहे। </p>
<p>भारत के लिए यह संकट विशेष चिंता का विषय है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण धमनियों में से एक है। यहां अस्थिरता बढ़ने का सीधा असर तेल की कीमतों, समुद्री बीमा, मालभाड़े और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारतीय नागरिकों और समुद्री कर्मियों की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी है। यही कारण है कि भारत ने सावधानीपूर्वक प्रतिक्रिया देते हुए तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है। वर्तमान घटनाक्रम का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि युद्धविराम अभी वास्तविक शांति नहीं है। यह एक ऐसा विराम है, जिसके भीतर संघर्ष की संभावनाएं जीवित हैं। </p>
<p>यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते और संवाद को प्राथमिकता नहीं देते, तो सीमित संघर्ष किसी भी समय व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। पश्चिम एशिया को आज शक्ति प्रदर्शन से अधिक कूटनीति की आवश्यकता है, क्योंकि अगला विस्फोट केवल क्षेत्र को नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/584524/the-illusion-of-an-editorial-ceasefire</link>
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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 07:04:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : कीर्तिमान से आगे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नेतृत्व की निरंतरता स्वयं में एक राजनीतिक घटना होती है। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू के लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ना मात्र व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और नेतृत्व के प्रति जनविश्वास का भी संकेत है। 146 करोड़ की आबादी, असाधारण भाषाई-सांस्कृतिक विविधता और महाद्वीपीय आकार वाले देश में इतने लंबे समय तक लोकतांत्रिक जनादेश प्राप्त करना निःसंदेह एक उल्लेखनीय राजनीतिक उपलब्धि है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक अस्थिरता सामान्य बात है। ऐसे समय में भारत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584435/beyond-editorial-record"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-01.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नेतृत्व की निरंतरता स्वयं में एक राजनीतिक घटना होती है। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू के लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ना मात्र व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और नेतृत्व के प्रति जनविश्वास का भी संकेत है। 146 करोड़ की आबादी, असाधारण भाषाई-सांस्कृतिक विविधता और महाद्वीपीय आकार वाले देश में इतने लंबे समय तक लोकतांत्रिक जनादेश प्राप्त करना निःसंदेह एक उल्लेखनीय राजनीतिक उपलब्धि है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक अस्थिरता सामान्य बात है। ऐसे समय में भारत में एक नेता का लगातार तीन आम चुनावों में केंद्रीय भूमिका निभाना इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने मतदाताओं के एक बड़े वर्ग के साथ स्थायी राजनीतिक संवाद स्थापित किया है। यह केवल संगठन की ताकत नहीं, बल्कि नेतृत्व की स्वीकार्यता का भी संकेत है। </p>
<p>30 से अधिक देशों के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित होना, अनेक देशों की संसदों को संबोधित करना और वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति को अधिक प्रभावशाली बनाना उनकी बड़ी उपलब्धियों में गिना जाएगा। आज भारत केवल दक्षिण एशिया की शक्ति नहीं, बल्कि जी-20, क्वाड, ब्रिक्स और वैश्विक दक्षिण की राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में स्थापित हुआ है। घरेलू मोर्चे पर भी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, डिजिटल भुगतान क्रांति, आधार आधारित कल्याणकारी ढांचा, जीएसटी, अनुच्छेद 370 का हटना, राम मंदिर निर्माण, जैसी तमाम उपलब्धियां उनके नाम हैं। उनके कार्यकाल में भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है और विनिर्माण, रक्षा उत्पादन तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज कर चुका है। नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेता हैं, हालांकि कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां अपेक्षाएं अभी अधूरी हैं। रोजगार सृजन, कृषि आय में स्थायी वृद्धि, न्यायिक सुधार, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य अवसंरचना और सामाजिक समरसता ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अभी भी व्यापक काम की आवश्यकता है।</p>
<p>भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में अभी लंबी यात्रा बाकी है। यह भी सच है कि लंबा शासनकाल अपने साथ नई चुनौतियां लाता है। सत्ता की निरंतरता जवाबदेही की अपेक्षाएं बढ़ाती है। प्रधानमंत्री के आलोचक संस्थागत संतुलन, राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहमति के लिए सीमित होती जगह जैसे प्रश्न उठाते हैं। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि उपलब्धियों के साथ इन प्रश्नों पर भी विमर्श हो। यह सच है कि इतिहास नेताओं को चुनावी जीतों से नहीं, उनके द्वारा छोड़ी गई स्थायी विरासत से याद रखता है। यदि आने वाले वर्षों में भारत रोजगार, शिक्षा, तकनीकी नवाचार और सामाजिक समावेशन के क्षेत्रों में निर्णायक प्रगति करता है, तो मोदी का कार्यकाल केवल सबसे लंबे निर्वाचित नेतृत्व के साथ परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में भी अवश्य याद किया जाएगा। रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अंततः राष्ट्रों का इतिहास कीर्तिमान नहीं, सार्थक परिणाम लिखते हैं। प्रधानमंत्री के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने लंबे राजनीतिक जनादेश को भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय रूपांतरण में बदलने की है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/584435/beyond-editorial-record</link>
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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 07:04:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: युद्धविराम की विराम रेखा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ईरान और इजराइल के बीच हालिया सैन्य टकराव ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को व्यापक युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दो महीने पहले हुए संघर्ष के बाद जिस प्रकार दोनों पक्षों ने अपेक्षाकृत संयम दिखाया था, उससे यह उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र धीरे-धीरे कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा, किंतु हाल के हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम और स्थायी शांति दो अलग-अलग चीजें हैं। लड़ाई थमने की खबर के बावजूद यह शांति से अधिक एक अस्थायी विराम ही प्रतीत होती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल द्वारा अमेरिकी हिदायत के बावजूद सैन्य कार्रवाई से स्पष्ट</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584374/editorial--the-line-of-pause-in-the-ceasefire"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/editorial.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान और इजराइल के बीच हालिया सैन्य टकराव ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को व्यापक युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दो महीने पहले हुए संघर्ष के बाद जिस प्रकार दोनों पक्षों ने अपेक्षाकृत संयम दिखाया था, उससे यह उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र धीरे-धीरे कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा, किंतु हाल के हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम और स्थायी शांति दो अलग-अलग चीजें हैं। लड़ाई थमने की खबर के बावजूद यह शांति से अधिक एक अस्थायी विराम ही प्रतीत होती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल द्वारा अमेरिकी हिदायत के बावजूद सैन्य कार्रवाई से स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अंतिम निर्णय का अधिकार अपने पास रखना चाहते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि वे ट्रंप के दबाव में नहीं हैं। इस तरह नेतन्याहू इस हमले को घरेलू राजनीति में एक सियासी अवसर के रूप में देख सकते हैं। यही कारण है कि कई बार वाशिंगटन और तेल अवीव के सार्वजनिक बयान एक जैसे नहीं दिखाई देते।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान का जवाब हिजबुल्लाह और अन्य सहयोगी समूहों के प्रति समर्थन प्रदर्शित करने, घरेलू जनमत को संतुष्ट करने और यह दिखाने के लिए था कि वह दबाव में नहीं झुकेगा। युद्ध के अचानक रुकने के पीछे ट्रंप की अपील से बड़ा कारण यह था कि दोनों पक्ष जानते हैं कि लंबा युद्ध अत्यधिक महंगा पड़ेगा। इजराइल की सैन्य शक्ति अत्याधुनिक है, लेकिन वह लंबे समय तक अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइलों, खुफिया सहयोग, रीफ्यूलिंग विमानों और रसद सहायता के बिना व्यापक क्षेत्रीय युद्ध नहीं लड़ सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर ईरान भी आर्थिक प्रतिबंधों और घरेलू दबावों से जूझ रहा है। युद्धविराम का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच परोक्ष संवाद के कुछ रास्ते खुले हुए हैं। युद्ध के जारी रहते इसका रास्ता अवरुद्ध हो सकता था। यदि ऐसा है तो यह सकारात्मक संकेत होगा, लेकिन खतरा बना हुआ है। किसी भी मिसाइल हमले, सीमा पार कार्रवाई या प्रॉक्सी समूह की गतिविधि से संघर्ष फिर भड़क सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों और व्यापारिक हितों का केंद्र है। यदि संघर्ष दोबारा तेज होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि लगभग निश्चित है। लाल सागर में हूती हमलों या नाकाबंदी के विस्तार से वैश्विक समुद्री व्यापार प्रभावित होगा, जिसका असर भारतीय निर्यात, आयात और माल ढुलाई लागत पर पड़ेगा। महंगा तेल अंततः महंगाई और चालू खाते के घाटे पर भी दबाव डालेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे संकट से सबसे बड़ा सबक यह है कि पश्चिम एशिया में सैन्य विजय की अवधारणा लगातार कमजोर हो रही है। आज कोई भी पक्ष निर्णायक जीत हासिल करने की स्थिति में नहीं दिखता, लेकिन सभी पक्ष एक दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं, इसलिए कूटनीति ही एकमात्र स्थायी रास्ता है। फिलहाल बंदूकों की आवाज धीमी हुई हैं, पर शांति की गारंटी अभी भी दूर है। दुनिया और विशेष रूप से भारत को इस विराम को युद्ध के अंत नहीं, बल्कि अगले मोड़ से पहले की चेतावनी के रूप में देखना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 05:20:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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