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                <title>Special Articles - Amrit Vichar</title>
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                <title>नागरिकता का प्रश्न और वैध दस्तावेज</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/cats5.jpg" alt="cats" width="104" height="133" />
सौरभ वार्ष्णेय,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">भारत में नागरिकता को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट अपने-आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि नागरिकता का निर्धारण केवल किसी एक दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के आधार पर होता है। यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों के भरोसे से भी जुड़ा है। आम नागरिक का सबसे बड़ा सवाल यही है-यदि आधार, वोटर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586223/the-question-of-citizenship-and-valid-documents"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/cats4.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/cats5.jpg" alt="cats" width="104" height="133"></img>
सौरभ वार्ष्णेय,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">भारत में नागरिकता को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस तेज हो गई है। विदेश मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि पासपोर्ट अपने-आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है, विपक्ष ने सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि नागरिकता का निर्धारण केवल किसी एक दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के आधार पर होता है। यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों के भरोसे से भी जुड़ा है। आम नागरिक का सबसे बड़ा सवाल यही है-यदि आधार, वोटर आईडी, पैन कार्ड और यहां तक कि पासपोर्ट भी अंतिम प्रमाण नहीं हैं, तो आखिर भारतीय नागरिकता सिद्ध कैसे होगी?</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति नागरिक का विश्वास होता है। यदि नागरिक को अपने ही अधिकारों के प्रमाण को लेकर असमंजस रहे, तो यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती, इसलिए समय की मांग है कि नागरिकता प्रमाणन की प्रक्रिया स्पष्ट, सर्वसुलभ और विवाद-मुक्त बनाई जाए, ताकि किसी भी भारतीय को अपनी नागरिकता साबित करने के प्रश्न पर अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि पहचान और नागरिकता एक जैसी नहीं हैं। आधार कार्ड आपकी पहचान और निवास का प्रमाण है। वोटर आईडी मतदान के अधिकार का प्रमाण है। पैन कार्ड आयकर संबंधी पहचान है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति देता है। पासपोर्ट विदेश यात्रा और अंतर्राष्ट्रीय पहचान का दस्तावेज़ है, लेकिन इनमें से कोई भी दस्तावेज़ अकेले नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर नागरिकता कैसे तय होती है? भारत में नागरिकता का आधार नागरिकता अधिनियम, 1955 है। इस कानून के अनुसार नागरिकता प्राप्त करने के प्रमुख आधार हैं- जन्म के आधार पर, वंश के आधार पर, पंजीकरण द्वारा, प्राकृतिककरण द्वारा, किसी क्षेत्र के भारत में विलय के आधार पर। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर प्रश्न उठता है तो संबंधित प्राधिकारी उपलब्ध दस्तावेज़ों, जन्म संबंधी अभिलेखों, माता-पिता की नागरिकता, सरकारी रिकॉर्ड तथा अन्य कानूनी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करता है। कोई एक दस्तावेज़ हर परिस्थिति में निर्णायक नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में जन्म प्रमाण पत्र को सबसे महत्वपूर्ण आधार दस्तावेज़ों में माना जाने लगा है, क्योंकि इससे जन्म तिथि और जन्म स्थान दोनों का रिकॉर्ड उपलब्ध होता है, लेकिन जिन लोगों का जन्म दशकों पहले हुआ और जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, उनके लिए स्कूल प्रमाणपत्र, भूमि अभिलेख, पारिवारिक रिकॉर्ड, सरकारी सेवा अभिलेख तथा अन्य आधिकारिक दस्तावेज़ भी परिस्थितियों के अनुसार महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद विपक्ष ने प्रश्न उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आम नागरिक किस दस्तावेज़ पर भरोसा करे। दूसरी ओर सत्तापक्ष का तर्क है कि दुनिया के अनेक देशों में भी पासपोर्ट नागरिकता निर्धारण का एकमात्र कानूनी आधार नहीं होता और विवाद की स्थिति में मूल नागरिकता रिकॉर्ड ही निर्णायक होते हैं। यह बहस संसद से लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों तक फैल चुकी है।<br />इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में आज तक ऐसा कोई एकल राष्ट्रीय नागरिकता प्रमाण-पत्र नहीं है, जिसे हर स्थिति में अंतिम माना जाए। परिणामस्वरूप लोग आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेज़ों को ही नागरिकता का प्रमाण समझ लेते हैं, जबकि कानून की दृष्टि से इनकी भूमिका अलग-अलग है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में केवल कानून होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसका स्पष्ट और सरल संप्रेषण भी आवश्यक है। यदि नागरिकों में यह भ्रम बना रहे कि कौन-सा दस्तावेज़ वैध है और कौन-सा नहीं, तो इससे अनावश्यक भय और अफवाहें फैल सकती हैं। सरकार को चाहिए कि नागरिकता प्रमाणन संबंधी एक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करे, जिसमें बताया जाए कि विभिन्न परिस्थितियों में कौन-कौन से दस्तावेज़ स्वीकार्य होंगे। इससे प्रशासनिक विवाद भी कम होंगे और नागरिकों का विश्वास भी बढ़ेगा। हर नागरिक को अपने जन्म, शिक्षा, परिवार और संपत्ति से जुड़े मूल सरकारी दस्तावेज़ सुरक्षित रखने चाहिए। दस्तावेज़ों का डिजिटलीकरण और समय-समय पर उनका अद्यतन कराना भी आवश्यक है। भविष्य में किसी भी कानूनी प्रक्रिया के दौरान यही रिकॉर्ड सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नागरिकता केवल एक कानूनी स्थिति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों का आधार है। इसलिए इस विषय पर राजनीति से अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता की आवश्यकता है। नागरिकों को भ्रमित करने के बजाय सरकार को एक सरल, एकीकृत और पारदर्शी नागरिकता प्रमाणन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 05:49:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उत्तराखंड : बढ़ते भूगर्भीय तनाव से बढ़ रहा है खतरा </title>
                                    <description><![CDATA[उत्तराखंड भूकंप की दृष्टि से जोन 4, 5 और 6 में विभाजित है। यहां इंडियन प्लेट निरंतर एशियन प्लेट के भीतर घुस रही है और भूगर्भीय तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586222/uttarakhand--rising-geological-stress-increases-the-risk"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-04/भूकंप.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/cats3.jpg" alt="cats" width="154" height="206"></img>
<strong>अमित शर्मा, हल्द्वानी</strong>

<p style="text-align:justify;">विज्ञान ने भले ही कितनी तरक्की कर ली हो। हम आदिवासी से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआई युग में पहुंच गए हैं, लेकिन प्रकृति से न तो उस समय और न ही आज के समय में हम जीत पाए हैं। बेशक, इतनी प्रगति तो हुई है कि संभावित खतरे की आहट भांपकर समय पूर्व तैयारियां कर उसके जोखिम को कम कर सकते हैं, लेकिन यह ठीक उसी तरह से है, जैसे हम जाने-अनजाने विनाश के कारणों को जन्म देकर उसे पाल पोसकर और समय-समय पर आमंत्रण देकर उससे बचने के उपाय तलाशें। </p>
<p style="text-align:justify;">हम बात कर रहे हैं भूकंप जैसी आपदा की, जिसने हाल ही में वेनेजुएला में कहर बरपाया है, जहां अब तक 1500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं, तो हजारों लोग अभी भी लापता हैं। तबाही के भयंकर मंजर का इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भूकंप के एक के बाद एक लगे तगड़े झटकों के बाद आई भीषण आपदा में वेनेजुएला का एक शहर तो लगभग पूरी तरह से तबाह हो चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां 7.2 और 7.5 तीव्रता के भूकंप ने तबाही मचाई है। शोध की बात करें तो दुनिया भर में हर साल लगभग पांच लाख भूकंप आते हैं, जिनमें से केवल लगभग 100,000 ही महसूस किए जाते हैं और 100 से नुकसान होता है। वर्ष 2000 से 2025 के बीच 6.0 से 6.9 तीव्रता के बीच औसतन 134 भूकंप आए।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं, वेनेजुएला में आए दो भूकंपों की तरह 7.0 से 7.9 तीव्रता के भूकंपों की संख्या प्रति वर्ष औसतन 14 से कम रही। आठ से अधिक तीव्रता वाले भूकंप तो और भी दुर्लभ हैं। औसतन प्रति वर्ष एक ही भूकंप आता है, हालांकि पिछले कुछ दशकों में कई ऐसे वर्ष भी रहे हैं, जिनमें आठ से अधिक तीव्रता का कोई भूकंप नहीं आया। इतिहास में अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप वर्ष 1960 में चिली के बायोबियो में आया था। इस देश में 9.5 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसमें 1,655 लोग मारे गए थे और 20 लाख लोग बेघर हो गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अब बात करते हैं उत्तराखंड की। भूकंप की दृष्टि से जोन 4, 5 और 6 में विभाजित इस पर्वतीय राज्य की भूगर्भीय स्थिति कतई स्थिर नहीं है और वर्तमान में बेहद सक्रिय है। इंडियन प्लेट निरंतर एशियन प्लेट के भीतर घुस रही है और भूगर्भीय तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। भूगर्भ वैज्ञानिक मानते है कि उत्तराखंड की धरती पर कभी भी प्रलयकारी भूकंप आ सकता है। भूगर्भीय दृष्टि से हिमालय क्षेत्र पहले से ही बेहद संवेदनशील माना जाता रहा है। हिमालय की भूगर्भीय स्थिति सक्रिय होने के कारण हिमालय ऊपर उठ रहा है, जिसकी ऊंचाई साल दर साल बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान और भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) का नया जोन मानचित्र चौंकाने वाला है। नए जोन के मानचित्र के वैज्ञानिक वर्गीकरण में अब उत्तराखंड के कई क्षेत्रों को जोन 6 में शामिल कर दिया गया है, जिस कारण सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि देवभूमि की भूगर्भीय स्थिति अति संवेदनशील हो चुकी है, जिसके चलते वैज्ञानिक चिंतित हैं और चेताते हैं कि अपेक्षित भूकंप और भूगर्भीय स्थिति को नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। लिहाजा भूकंपरोधी भवन निर्माण बचाव का बड़ा उपाय हो सकता है। यहां एक अच्छी रिपोर्ट है कि ऊधमसिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर के बागवाला में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत 1872 आवास भूकंपरोधी बनाए जा रहे हैं, जो भूकंप के निकट भविष्य के खतरे से निपटने के उपाय अपनाने की दिशा में बड़ा कदम बताता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नैनीताल स्थित डीएसबी कैंपस की भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. मौलीश्री जोशी बताती हैं कि इंडियन और एशियन प्लेट के बीच टकराव करोड़ों वर्षों से चला आ रहा है और वर्तमान में इन दोनों प्लेटों के घर्षण से बड़ा तनाव उत्पन्न हो रहा है। यह तनाव जब भी रिलीज होता है, तो भूकंप से धरती कांप उठती है। इधर, इंडियन प्लेट एशियन प्लेट के नीचे घुस रही है, जिस कारण इन दोनों प्लेटों के बीच तनाव निरंतर बढ़ रहा है, जिस कारण कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, हालांकि यह कब आएगा, भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">डीएसबी कैंपस के पूर्व विभागाध्यक्ष और भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. सीसी पंत की मानें तो नए जोन वर्गीकरण के अनुसार चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर और रुद्रप्रयाग को अति संवेदनशील भूकंप क्षेत्र जोन छह में शामिल किया गया है। ज़ोन पांच में उत्तरकाशी, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और चंपावत को शामिल किया गया है। ज़ोन चार क्षेत्र में देहरादून, नैनीताल, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर शामिल किया गया है। मगर 2025 में जारी नए वर्गीकरण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि समूचे उत्तराखंड को जोन छह माना जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">भूगर्भ वैज्ञानिक मानते हैं कि भूकंप से बचाव के लिए भवन निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से होना चाहिए। जिस स्थान पर मकान बना रहे हों, वहां की भूमि ठोस होनी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में ठोस पत्थरों के ऊपर ही भवन बनाने बेहद जरूरी हैं। नदियों के तट से दूरी बेहद जरूरी है। मलबे वाली कच्ची जमीन पर कतई भवन निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में प्राचीन भवन निर्माण तकनीक भूकंपरोधी हुआ करती थी, जिसे आज भी अपनाया जा सकता है और भूकंप से बचा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब भूकंप से असली बचाव हमारे ही हाथ में है। यानी मजबूत घर और तैयार दिमाग। हिमालय बनना बंद नहीं होगा, प्लेट टकराना बंद नहीं होंगी। जापान में रोज भूकंप आते हैं, लेकिन लोग मरते नहीं, क्योंकि वहां नियम सख्त हैं और लोग तैयार हैं। डरिए मत, तैयारी कीजिए। एक-एक मजबूत मकान से और एक-एक जागरूक परिवार से, देवभूमि को हम और आप ही बचाएंगे, इसलिए अपना आशियाना हो या व्यापारिक प्रतिष्ठान, एक बार जरूर आकलन कर लें कि वह भूकंप से टक्कर लेने की स्थिति में है या नहीं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तराखंड</category>
                                            <category>देहरादून</category>
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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 05:42:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विश्व विजेता को सिखाने उतरा था आयरलैंड</title>
                                    <description><![CDATA[टी20 विश्व चैंपियन भारत को आयरलैंड ने लगातार दो मुकाबलों में हराकर 0-2 से ऐतिहासिक श्रृंखला जीत ली और साबित कर दिया कि क्रिकेट में नाम नहीं, तैयारी और अनुकूलन ही सबसे बड़े हथियार हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586056/ireland-stepped-out-to-teach-the-world-champions-a-lesson"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats587.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats588.jpg" alt="cats" width="147" height="198"></img>
<strong>प्रो. आरके जैन, शिक्षाविद्</strong>

<p>विश्व क्रिकेट में प्रतिष्ठा, ट्रॉफियां और रैंकिंग केवल रिकॉर्ड सजाती हैं। मैदान पर जीत उसी की होती है, जो परिस्थितियों को सबसे बेहतर पढ़ता है। 26 और 28 जून 2026 को बेलफास्ट ने भारतीय क्रिकेट को यही कठोर सच दिखा दिया। टी20 विश्व चैंपियन भारत को आयरलैंड ने लगातार दो मुकाबलों में हराकर 0-2 से ऐतिहासिक श्रृंखला जीत ली और साबित कर दिया कि क्रिकेट में नाम नहीं, तैयारी और अनुकूलन ही सबसे बड़े हथियार हैं। पहले मैच में 34 रन और दूसरे में महज एक रन की जीत ने आयरलैंड को इतिहास के शिखर पर पहुंचा दिया, जबकि भारत के आत्मसंतोष की परतें भी उधेड़ दीं। श्रेयस अय्यर की कप्तानी का आगाज जिस उम्मीद के साथ हुआ था, वह बेलफास्ट की ठंडी हवाओं में कड़ी हकीकत से टकरा गया।</p>
<p>बेलफास्ट में जीत का फैसला खिलाड़ियों के नाम नहीं, परिस्थितियों की समझ ने किया। आयरलैंड ने पिच, मौसम और स्विंग को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। पदार्पण कर रहे मैथ्यू हॉलर्ड ने सधी गेंदबाजी से भारतीय बल्लेबाजों को लगातार उलझाए रखा, जबकि लोरकन टकर ने धैर्य और आक्रामकता के संतुलन से जीत की नींव रखी। पांच प्रमुख खिलाड़ियों के बिना उतरी आयरिश टीम का अनुशासन और सामूहिक खेल पूरे मैच में दिखा। दूसरी ओर भारत विश्व कप जीत के आत्मविश्वास को सही रणनीति में नहीं बदल सका। विदेशी परिस्थितियों को हल्के में लेने का परिणाम यह हुआ कि स्विंग और विविध गेंदबाजी के सामने भारतीय बल्लेबाजी बार-बार बिखरी।</p>
<p>दोनों मुकाबलों का स्कोर कार्ड भारतीय टीम की कमजोरियों का आईना बन गया। पहले मैच में 182 रनों का लक्ष्य भारत को 148 पर रोक गया, जबकि दूसरे में 155 रनों का पीछा करते हुए टीम 153 रन पर थम गई। ये सिर्फ दो हार नहीं, बल्कि निर्णायक क्षणों में रणनीतिक चूकों की कीमत थीं। बल्लेबाज परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल नहीं सके और गेंदबाज दबाव के समय प्रभाव नहीं छोड़ पाए। दूसरी ओर आयरलैंड ने हर मौके को जीत में बदला। यही अंतर विश्व चैंपियन और उस दिन की बेहतर टीम के बीच साफ दिखा। इस श्रृंखला ने फिर साबित कर दिया कि क्रिकेट में किसी भी टीम को हल्के में लेना सबसे बड़ी भूल है।</p>
<p>बेलफास्ट ने भारतीय क्रिकेट की कई छिपी कमजोरियों से पर्दा हटा दिया। विश्व चैंपियन बनने के बावजूद टीम की गहराई, निरंतरता और मानसिक मजबूती सवालों के घेरे में आ गई। अनुभवी खिलाड़ियों की कमी और कुछ खिलाड़ियों की खराब फॉर्म ने संतुलन बिगाड़ दिया। सबसे बड़ी चिंता यह रही कि मुश्किल हालात में टीम समाधान खोजने के बजाय दबाव में बिखरती दिखी। इसके विपरीत सीमित संसाधनों वाली आयरिश टीम ने अनुशासन, सटीक तैयारी और सामूहिक खेल के दम पर असंभव को संभव कर दिखाया। इस जीत ने फिर साबित किया कि आधुनिक क्रिकेट में बड़े संसाधन नहीं, बल्कि सही रणनीति और उसे पूरी प्रतिबद्धता से लागू करने की क्षमता जीत दिलाती है।</p>
<p>श्रेयस अय्यर की कप्तानी का आगाज उम्मीदों के विपरीत दो लगातार हारों के साथ हुआ। यह झटका केवल परिणाम का नहीं, बल्कि रणनीतिक कमियों का भी था। टीम चयन, गेंदबाजों का उपयोग और मध्य ओवरों की योजना कई मौकों पर कमजोर दिखी। अभिषेक शर्मा ने उम्मीद जगाई, लेकिन बाकी बल्लेबाजी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। कप्तानी सिर्फ फैसले लेने का नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप पूरी टीम की सोच ढालने का कौशल भी है। बेलफास्ट में भारत इसी कसौटी पर पिछड़ गया। अब बहानों का नहीं, ईमानदार आत्ममंथन और ठोस सुधार का समय है।</p>
<p>भारतीय क्रिकेट का इतिहास बताता है कि बड़ी हारें अक्सर बड़े बदलाव की नींव बनती हैं। 2007 विश्व कप की निराशा के बाद टीम ने जिस तरह खुद को बदला, वह आज भी मिसाल है। बेलफास्ट की यह हार भी वैसा ही चेतावनी संकेत बन सकती है, यदि इससे सही सबक लिया जाए। आज विश्व क्रिकेट बदल चुका है, जहां छोटी टीमें भी तैयारी, डेटा विश्लेषण और मानसिक दृढ़ता के दम पर दिग्गजों को झुका रही हैं। आयरलैंड ने साबित कर दिया कि भूख, अनुशासन और परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता किसी भी बड़े नाम से अधिक ताकतवर होती है।</p>
<p>भारत को अब विदेशी परिस्थितियों के लिए अपनी मानसिक और तकनीकी तैयारी को नए स्तर पर ले जाना होगा।भारतीय प्रशंसकों के लिए यह श्रृंखला गहरी निराशा छोड़ गई। विश्व कप जीत का उत्साह अभी फीका भी नहीं पड़ा था कि बेलफास्ट ने जश्न को आत्ममंथन में बदल दिया, लेकिन खेल की सबसे बड़ी सीख यही है कि हर हार सुधार का अवसर लेकर आती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>खेल</category>
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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 05:57:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सेवक नहीं, जनता का स्वामी मान बैठे हैं नौकरशाह</title>
                                    <description><![CDATA[आईएएस अफसरों में जबरदस्त ‘ब्रदरहुड’ देखा जाता है। ‘अति विशिष्ट’ होने की भावना उनमें इतनी प्रबल होती है कि अपने से इतर किसी और सेवा के अधिकारियों को ये पनपने ही नहीं देते।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586053/bureaucrats-have-come-to-regard-themselves-as-masters-of-the-public-rather-than-servants"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/034.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4.jpg" alt="अनिल त्रिगुणायत" width="173" height="173"></img>
<strong>अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ</strong>

<p style="text-align:justify;">भारत के पहले उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आईएएस को इस्पात का ढांचा (स्टील फ्रेम) कह महिमामंडन किया था। भारतीय संविधान में आईएएस अधिकारियों को अनुच्छेद 311 के अंतर्गत 'कार्यकाल की सुरक्षा' दी गई है। अखिल भारतीय सेवा के इन अफसरों को अनुच्छेद 312 एक स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रशासनिक ढांचा भी प्रदान करता है। आईसीएस (भारतीय सिविल सेवा) के स्थान पर आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) पद बने करीब 80 वर्ष हो चुके हैं। ऐसे में नौकरशाहों की भूमिका, उनकी प्रासंगिकता पर विश्लेषण के साथ-साथ उनके आधिकारिक क्रियाकलापों व समाज में उनके परिणामोन्मुखी योगदान पर दृष्टिपात लाजमी है। </p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सेवारत नौकरशाह अपने को ‘जनता का सेवक न मानते हुए स्वामी’ मान बैठे हैं। कार्य दिवसों में उनका अधिकांश समय तथाकथित बैठकों में व्यतीत होता है। पीड़ित व निरीह जनता से मिलना उन्हें अपनी झूठी शान के खिलाफ लगता है। लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में दो वर्षीय प्रशिक्षण के समय तो उनमें सेवाभाव का जज्बा हिलोरे लेता है, किंतु जब वे वहां से निकलकर फील्ड में सेवा को जाते हैं, तो उनका व्यवहार पूर्णतया परिवर्तित हो जाता है। जनसामान्य का तो मानना है कि जिले व राज्य मुख्यालय में सेवा करने के दौरान उनमें लार्ड कार्नवालिस (सिविल सेवा के जनक) की आत्मा प्रवेश कर जाती है। अपने व्यक्तित्व को अति विशिष्ट मानते हुए वे जनसामान्य से दूरी बनाने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है। अधिकांश ग्रामीण आधारभूत समस्याओं से दो-चार होते रहते हैं, हालांकि बेहतर जीवन स्तर के लिए ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायित हो रहे हैं, जिससे देश में शहरी जनसंख्या में तीव्रतम वृद्धि भी हो रही है। जाहिर है शहरी लोगों की भी अपनी दिक्कतें हैं। बुनियादी सुविधाओं अर्थात पेयजल, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य व खाद्य-पदार्थ वितरण प्रणाली के लिए उनकी निर्भरता ‘सरकारी सिस्टम’ पर टिक जाती है। सिस्टम यानी मंत्रालय/विभाग/निदेशालय के प्रशासनिक मुखिया नौकरशाह ही होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नीति निर्माण के अलावा उसके क्रियान्वयन के लिए वे प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार होते हैं। आजादी के करीब आठ दशक बाद भी जिस देश की अधिकांश आबादी को मूलभूत सुविधाएं मयस्सर न हो सके तो इसके लिए सबसे बड़े दोषी नौकरशाह ही तो माने जाएंगे, क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी के वे ही पहरुआ होते हैं। देश में बुनियादी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। लाख टके का प्रश्न यह है कि आखिर कार्यपालिका परिणामोन्मुखी क्यों नहीं हो पा रही है? जनता में अपनी साख क्यों नहीं बना पा रही है? कार्य के प्रति ईमानदार व पारदर्शी क्यों नहीं हो पा रही है? पदलोलूपता, भाई-भतीजावाद, लालफीताशाही, विभागीय गलाकाट प्रतिस्पर्धा व अहम के भाव से क्यों नहीं उबर पा रही है? जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर खरी क्यों नहीं उतर पा रही? </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआती प्रशिक्षण के बाद एक आईएएस अफसर अपनी सेवा के दौरान लाल बहादुर प्रशासनिक संस्थान में पांच चरणों में ‘मध्य करियर प्रशिक्षण कार्यक्रम’ में शामिल होता है। प्रत्येक प्रशिक्षण कार्यक्रम के मूल में जनसेवा ही होती है, लेकिन ऐसे कितने आईएएस अफसर हैं, जो प्रशिक्षणोंपरांत सेवा भाव को आत्मसात कर दीन-दुखियों के चेहरे पर मुस्कान ला पा रहे हैं? सच तो यह है कि नौकरशाही जनता से अलग-थलग होकर काम करने लगी है। नतीजा यह है कि आमजन में न उनकी धाक जम पा रही न ही साख। </p>
<p style="text-align:justify;">लिखना लाजमी है कि नौकरशाहों के मनमाने तबादले व पोस्टिंग अक्सर राजनीतिक वफादारी या इच्छा पर निर्भर करती है। इससे उनका मनोबल तो गिरता ही है, वे निष्पक्ष रूप से काम नहीं कर पाते। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था आज भी ब्रिटिश काल के ढांचे पर ही चल रही है, जिसमें जनकल्याण व समस्या-समाधान की बजाए सत्ता बनाए रखने पर अत्यधिक जोर होता है। वास्तविकता यह भी कि अकुशलता, अत्यधिक केंद्रीकरण व जवाबदेही में कमी के कारण नौकरशाही आमजन की नजर में अब कठघरे में खड़ी दिखने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरल कार्य को भी जटिलतम बना, उसमें अड़चनें पैदा करते रहना कोई आज के नौकरशाहों से सीखे। उनका दंभी स्वभाव आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय व लोकतांत्रिक सिद्धांत को बुरी तरह प्रभावित करते दिखता है। नौकरशाही की अक्षमताओं के कारण परियोजना निष्पादन में देरी, संसाधनों का गलत आवंटन व प्रशासनिक गुणवत्ता में निरंतर गिरावट देखने को मिल रही है। इसके अलावा, तकनीकी प्रगति व नीति नवाचारों को अपनाने में नौकरशाहों की उदासीनता से शासन संबंधी चुनौतियां बढ़ गई हैं, साथ ही आमजन भी बेहद प्रभावित हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में, शासन की रीढ़ माने जाने वाली नौकरशाही ‘बिना रीढ़’ की हो चली है। आज की नौकरशाही के बारे में आमजन की धारणा यह है कि ‘मर्सिडीज कार तो खड़ी है, लेकिन उसका इंजन गायब हो चुका है।’ केंद्र में मंत्रालय हों या राज्यों में विभाग, इन सभी जगहों के शीर्ष पर आईएएस अधिकारी ही कुंडली मारकर बैठे हैं। ‘न खेलूंगा न खेलने दूंगा’ की तर्ज पर वे विशेषज्ञों पर भारी तो पड़ते ही हैं, नीतियों के क्रियान्वयन में भी सबसे बड़े अवरोधभंजक बने रहते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर देश के अति महत्वपूर्ण गृह, वित्त, रक्षा, विदेश, शिक्षा तथा स्वास्थ्य मंत्रालयों के शीर्ष पद पर भी सचिव के रूप में आईएएस अफसर ही होते हैं। यही हाल राज्यों में विभागों का भी है। आईएएस अफसरों में जबरदस्त ‘ब्रदरहुड’ देखा जाता है। ‘अति विशिष्ट’ होने की भावना उनमें इतनी प्रबल कि अपने से इतर किसी और सेवा के अधिकारियों को ये पनपने ही नहीं देते। संविधान ने उनकी सेवा को स्टील फ्रेम में तो रखा है, लेकिन समय आ गया है कि वे अब अपने को जनता का सेवक मानकर अपनी साख व धाक बचाएं। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में सर्व शक्तिशाली जनता ही होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 05:49:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की बढ़ती भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हुए हैं। नतीजे में दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और वैश्विक एसेट मैनेजर भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586003/the-growing-role-of-foreign-investors-in-the-bond-market"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/rajat.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/rajat.jpg" alt="RAJAT" width="185" height="165"></img>
<strong>रजत मेहरोत्रा</strong><br /><strong>वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ</strong>

<p>भारत में निवेश की चर्चा होते ही अधिकांश लोगों के मन में शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड और बैंक एफडी का विचार आता है, लेकिन भारतीय वित्तीय प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसा भी है, जो वर्षों से अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है। यह हिस्सा है भारत का बॉन्ड या ऋण बाजार। आज यह बाजार एक ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जो आने वाले वर्षों में सरकार, उद्योग, निवेशकों और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में भारतीय सरकारी बॉन्ड वैश्विक निवेशकों के लिए अधिक सुलभ हुए हैं। भारत के कुछ सरकारी बॉन्ड प्रमुख वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर के पेंशन फंड, बीमा कंपनियां, सॉवरेन वेल्थ फंड, केंद्रीय बैंक और वैश्विक एसेट मैनेजर भारतीय ऋण बाजार की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह केवल विदेशी पूंजी का प्रवाह नहीं है, बल्कि भारतीय वित्तीय बाजार के वैश्वीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। </p>
<p style="text-align:justify;">विभिन्न अनुमानों के अनुसार भारत का कुल बॉन्ड बाजार 230 से 250 लाख करोड़ रुपये से अधिक का माना जाता है। इसमें सरकारी प्रतिभूतियों का हिस्सा सबसे बड़ा है, जबकि कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार भी धीरे-धीरे विस्तार कर रहा है। इसके बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अभी भी कई विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे भारत के वित्तीय क्षेत्र का अगला बड़ा अवसर मान रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के सरकारी बॉन्ड पहले ही JPMorgan Government Bond Index-Emerging Markets तथा Bloomberg Emerging Market Local Currency Index जैसे प्रमुख वैश्विक सूचकांकों में शामिल हो चुके हैं, हालांकि कुछ अन्य वैश्विक सूचकांकों में पूर्ण शामिलीकरण की प्रक्रिया अभी भी विभिन्न परिचालन और नियामकीय सुधारों पर निर्भर है। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत वैश्विक ऋण निवेशकों के लिए तेजी से एक महत्वपूर्ण गंतव्य बनता जा रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">विदेशी संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का सबसे पहला प्रभाव बॉन्ड की मांग पर पड़ता है। जब किसी बॉन्ड को खरीदने वाले निवेशकों की संख्या बढ़ती है, तो उसकी कीमत बढ़ती है और उसकी यील्ड अर्थात प्रतिफल दर कम हो जाती है। इस स्थिति से सरकार और कंपनियों दोनों को लाभ मिल सकता है, क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत कम लागत पर पूंजी जुटाने का अवसर प्राप्त होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि सरकार की उधारी लागत पर सकारात्मक दबाव पड़ता है, तो आधारभूत संरचना, रेल, सड़क, ऊर्जा, जल प्रबंधन और विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को गति मिल सकती है। भारत अगले कुछ वर्षों में दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में विकास परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक पूंजी की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। एक मजबूत बॉन्ड बाजार इस आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस परिवर्तन का प्रभाव केवल सरकार या कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी इसका लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से गिल्ट फंड, टारगेट मैच्योरिटी फंड, कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड और भारत बॉन्ड ईटीएफ जैसे निवेश साधनों में निवेश करने वालों के लिए यह सकारात्मक अवसर हो सकता है। यदि बॉन्ड यील्ड में गिरावट आती है, तो पहले से जारी बॉन्ड की कीमतों में वृद्धि होती है, जिससे कई डेट फंडों के एनएवी में सुधार देखने को मिल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेशी पूंजी प्रवाह का एक अन्य संभावित प्रभाव भारतीय रुपये पर पड़ सकता है, जब विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड खरीदते हैं, तो उन्हें रुपये की आवश्यकता होती है, जिससे भारतीय मुद्रा की मांग बढ़ती है, हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि इससे रुपया अनिवार्य रूप से मजबूत होगा, क्योंकि मुद्रा की दिशा तेल कीमतों, व्यापार घाटे, वैश्विक डॉलर प्रवृत्तियों और भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियों सहित अनेक कारकों पर निर्भर करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर भी विदेशी निवेश प्रवाह रुपये पर दबाव कम करने और बाहरी स्थिरता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है, लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विदेशी निवेश अवसरों की तलाश में आता है और जोखिम बढ़ने पर तेजी से बाहर भी निकल सकता है। यदि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका पैदा होती है या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक भारतीय बॉन्ड बाजार से धन निकाल सकते हैं। ऐसी स्थिति में बॉन्ड कीमतों में गिरावट और यील्ड में वृद्धि देखी जा सकती है। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>Special</category>
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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:25:48 +0530</pubDate>
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                <title>बांग्लादेश ने बढ़ाई भारत की चिंता</title>
                                    <description><![CDATA[2024 में आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586002/bangladesh-has-heightened-india-s-concerns"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats574.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/naveen.jpg" alt="NAVEEN" width="131" height="178"></img>
<strong>नवीन गुप्ता, बरेली</strong>

<p style="text-align:justify;">बांग्लादेश की सत्ता में बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान की ताजपोशी के बाद नई दिल्ली को उम्मीद थी कि ढाका के साथ रिश्तों का एक नया और सकारात्मक अध्याय शुरू होगा, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। बांग्लादेश अब रणनीतिक रूप से पूरी तरह चीन के पाले में खड़ा दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ती कूटनीतिक नजदीकियां और नए समझौते न केवल भारत की बाहरी सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा हैं, बल्कि द्विपक्षीय व्यापारिक हितों को भी गहरी चोट पहुंचा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही बांग्लादेश की धरती पर फिर से पनपता कट्टरपंथ और भारत विरोधी माहौल हमारी आंतरिक शांति के लिए आने वाले समय में बड़ी बाधा बन सकता है, हालांकि कूटनीतिक मर्यादा के तहत भारत सरकार ने अभी भी रिश्ते सुधारने की उम्मीद नहीं छोड़ी है और लगातार प्रयास जारी हैं। साल 2024 में आवामी लीग की मुखिया शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तल्खी का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत रहे और यही वजह थी कि उस दौर में वहां अमेरिका, चीन या पाकिस्तान जैसे देशों की दाल नहीं गल पाती थी। हसीना अपने फैसले हमेशा बांग्लादेश और भारत के साझा हितों को ध्यान में रखकर लेती थीं, जिससे अमेरिका और चीन जैसे देश उनसे लगातार चिढ़ते रहे। </p>
<p style="text-align:justify;">कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि सेंट मार्टिन द्वीप जैसे मुद्दों पर अपनी संप्रभुता न छोड़ने के कारण ही अमेरिका ने वहां हसीना के खिलाफ पर्दे के पीछे से तख्तापलट का खेल रचा। हसीना के बाद अंतरिम सरकार के मुखिया बने मोहम्मद यूनुस ने न सिर्फ भारत विरोधी फैसले लिए, बल्कि पाकिस्तान के साथ रक्षा सौदों और सैनिकों के प्रशिक्षण को लेकर समझौते भी कर लिए। भारत के सबसे संवेदनशील हिस्से यानी ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को घेरने के लिए पाकिस्तान और चीन के साथ कूटनीतिक नींव उन्होंने ही रखी थी। </p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव के बाद जब तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने, तो कूटनीतिक सुधारों की उम्मीद जगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है और आज ढाका की हुकूमत भारत की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाले फैसले और तेजी से ले रही है। बांग्लादेश ने भारत की आपत्तियों को दरकिनार कर तीस्ता नदी जल प्रबंधन परियोजना के लिए चीन से तकनीकी और आर्थिक सहयोग मांग लिया है। चीन तो लंबे समय से वहां पैर जमाने की फिराक में था, जो उसे इस प्रोजेक्ट के बहाने मिल गया। </p>
<p style="text-align:justify;">तीस्ता नदी सिक्किम से निकलती है और इसके जल बंटवारे को लेकर भारत-बांग्लादेश में पुराना विवाद है, ऐसे में अब इसमें तीसरे पक्ष के रूप में चीन की एंट्री भारत की क्षेत्रीय कूटनीति को कमजोर करेगी। सबसे बड़ा खतरा यह है कि चीन इस परियोजना के बहाने अपने जिन तकनीकी विशेषज्ञों को वहां तैनात करेगा, वे भारत के ‘चिकन नेक’ की गतिविधियों पर सीधे और पर पैनी नजर रखेंगे। इतना ही नहीं, बांग्लादेश ने भारत को एक और बड़ा आर्थिक और रणनीतिक झटका देते हुए अपने मोंगला बंदरगाह को चीन के हवाले करने का फैसला किया है, जहां बीजिंग अब ‘स्पेशल इकोनॉमिक जोन’ विकसित करेगा। </p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि साल 2015 में भारत ने मोंगला पोर्ट के विकास के लिए बांग्लादेश के साथ समझौता किया था, जिसका काम भारत के हिरानंदानी ग्रुप को सौंपना तय हुआ था, लेकिन साल 2025 में मोहम्मद यूनुस की सरकार ने यह प्रोजेक्ट भारत से छीन लिया और अब तारिक रहमान ने उसी भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए इसे आधिकारिक तौर पर चीन को सौंप दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी ‘बांग्लादेश-म्यांमार-चीन आर्थिक गलियारे’ के प्रस्ताव को तारिक रहमान सरकार ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इस गलियारे के जरिए चीन भारत को रणनीतिक रूप से चारों तरफ से घेरना चाहता है, जिसमें तारिक रहमान एक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। इस कॉरिडोर से न केवल भारत की बल्कि अमेरिका की चिंताएं भी बढ़ेंगी, क्योंकि वाशिंगटन ने जिस मकसद से हसीना का तख्तापलट होने दिया, वह फेल हो गया है और चीन वहां अपनी जड़ें पूरी तरह मजबूत कर बड़े आर्थिक पैकेज का एलान कर रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच, भारत ने सद्भावना के तौर पर बांग्लादेशी नागरिकों के लिए टूरिस्ट वीजा सेवा फिर से बहाल कर दी है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर इसे संबंधों को पटरी पर लाने वाली कोई ठोस पहल नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, बांग्लादेश सरकार चाहती है कि भारत पश्चिम बंगाल से बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजना बंद करे, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत में ऐसा होना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल की राजनीति में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा बेहद संवेदनशील रहा है। वर्तमान में राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और केंद्र सरकार इस रुख पर कायम हैं कि अवैध घुसपैठियों को वापस भेजा जाएगा और अब तक 4800 से अधिक घुसपैठियों को डिपोर्ट भी किया जा चुका है। </p>
<p style="text-align:justify;">बांग्लादेश की संसद और वहां के कट्टरपंथी दल अब इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ जमकर जहर उगल रहे हैं। इतिहास खुद को दोहरा रहा है। तारिक रहमान की मां बेगम खालिदा जिया ने भी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में हमेशा भारत के हितों की अनदेखी की थी और पाकिस्तान-चीन की शह पर काम किया था। आज उनके पुत्र भी उसी राह पर चल पड़े हैं। ऐसे में भारत को अपनी पूर्वी सीमा की सुरक्षा और कूटनीति को लेकर अत्यंत सतर्क रहने की जरूरत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:13:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय : तनाव की वापसी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम यदि दस दिन के भीतर ही गंभीर सैन्य टकराव में बदलने लगे, तो यह केवल दो देशों के बीच तनाव नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की अस्थिरता का संकेत है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हवाई हमले किए, जबकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर। यदि बहरीन, कुवैत या अन्य खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डे लगातार लक्ष्य बनते हैं, तो युद्ध का दायरा स्वतः इन देशों तक फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। </p>
<p style="text-align:justify;">ध्यातव्य है कि अमेरिका-ईरान और इज़राइल-हिज़्बुल्लाह के संघर्ष परस्पर जुड़े अवश्य हैं, पर दोनों पूर्णतः</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586001/editorial--the-return-of-tension"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy24.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम यदि दस दिन के भीतर ही गंभीर सैन्य टकराव में बदलने लगे, तो यह केवल दो देशों के बीच तनाव नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की अस्थिरता का संकेत है। अमेरिका ने ईरानी सैन्य ठिकानों पर नए हवाई हमले किए, जबकि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर। यदि बहरीन, कुवैत या अन्य खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी अड्डे लगातार लक्ष्य बनते हैं, तो युद्ध का दायरा स्वतः इन देशों तक फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। </p>
<p style="text-align:justify;">ध्यातव्य है कि अमेरिका-ईरान और इज़राइल-हिज़्बुल्लाह के संघर्ष परस्पर जुड़े अवश्य हैं, पर दोनों पूर्णतः एक ही युद्ध विराम व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, इसलिए किसी एक मोर्चे पर हिंसा दूसरे मोर्चे को भी अस्थिर कर देती है। ट्रंप का यह बयान कि यदि ईरान युद्ध विराम तोड़ता रहा तो ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का अस्तित्व ही समाप्त हो सकता है’, अत्यंत गंभीर और अस्थिरता बढ़ाने वाला बयान है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के अस्तित्व पर सार्वजनिक धमकी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की भाषा नहीं मानी जाती और इससे समझौते की संभावनाएं कमजोर होती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">ईरान होर्मुज को खोल भले दे, लेकिन उस पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ेगा। वह यहां के समुद्री यातायात पर कड़े नियम लागू करने की कोशिश करेगा। ऐसे में होर्मुज पर समझौता दूर की कौड़ी है, इसलिए जब तक सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक समझौते पर स्थायी सहमति नहीं बनती, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर अनिश्चितता बनी रहेगी। ईरान की परमाणु सुविधाओं की अंतर्राष्ट्रीय जांच पर अमेरिकी जिद बेकार है, ईरान इसके लिए कभी राजी नहीं होगा। अमेरिका, ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत दे भी तो 28 लाख करोड़ के मुआवजे को ले कर पेच है। खाड़ी के किसी देश ने इसमें सहयोग की सहमति नहीं जताई है और उनके अनुसार वे ईरान के हमले से नुकसान उठा चुके हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">असल में मुआवजे के हकदार तो वे हैं। वे एक ऐसे युद्ध का मुआवजा क्यों दें, जो उन्होंने छेड़ा ही  नहीं। जब तक उन्हें सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं मिलती, वे मुआवजा नहीं देंगे। असल में क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों की भूमिका और होर्मुज़ की सुरक्षा- ये सभी मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हीं पर दोनों पक्षों के बीच सबसे गहरे मतभेद हैं, इसलिए यह मान लेना कि शीघ्र ही स्थायी युद्ध विराम हो जाएगा, यथार्थवादी नहीं होगा। स्थायी शांति तभी संभव है, जब दोनों पक्ष अपनी अधिकतम मांगों से पीछे हटने को तैयार हों, जिसकी संभावना नहीं दिखती और मौजूदा हालात ने युद्ध विराम अथवा स्थायी शांति की उम्मीदों को और धुंधला कर दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए इस संकट का सबसे उपयुक्त मार्ग वही है, जो उसकी पारंपरिक विदेश नीति का आधार रहा है— रणनीतिक संतुलन। भारत को किसी सैन्य ध्रुव का हिस्सा बनने के बजाय संवाद, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर जोर देना चाहिए। साथ ही तेल आयात के स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का सुदृढ़ीकरण और भारतीय नागरिकों व समुद्री व्यापार की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पश्चिम एशिया में स्थिरता केवल क्षेत्रीय आवश्यकता नहीं, भारत की ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा प्रश्न है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:06:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>सिकल सेल डिजीज से आदिवासी बन रहे एनीमिया का शिकार </title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/020.jpg" alt="0" width="146" height="195" />
<strong>रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक</strong>

<p style="text-align:justify;">देश की आदिवासी आबादी में बहुत व्यक्ति सिकल सेल डिजीज से पीड़ित हैं। इस बीमारी की उत्पत्ति मलेरिया परजीवी से बचाव की रणनीति के रूप में शरीर में हुई थी। इस बीमारी के लक्षणों में रक्त की लाल कोशिकाएं दराती जैसी शक्ल की हो जाती हैं और इनकी ऑक्सीजन वहन की क्षमता मर जाती है। इसकी वजह से लोग एनीमिया से पीड़ित होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, जिन्हें यह बीमारी है उनमें से 35 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक पांच प्रतिशत की मृत्यु हो जाती है। हर साल 50 हज़ार ऐसे बच्चों का जन्म</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585931/tribals-falling-prey-to-anemia-due-to-sickle-cell-disease"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/010.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/020.jpg" alt="0" width="146" height="195"></img>
<strong>रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक</strong>

<p style="text-align:justify;">देश की आदिवासी आबादी में बहुत व्यक्ति सिकल सेल डिजीज से पीड़ित हैं। इस बीमारी की उत्पत्ति मलेरिया परजीवी से बचाव की रणनीति के रूप में शरीर में हुई थी। इस बीमारी के लक्षणों में रक्त की लाल कोशिकाएं दराती जैसी शक्ल की हो जाती हैं और इनकी ऑक्सीजन वहन की क्षमता मर जाती है। इसकी वजह से लोग एनीमिया से पीड़ित होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, जिन्हें यह बीमारी है उनमें से 35 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक पांच प्रतिशत की मृत्यु हो जाती है। हर साल 50 हज़ार ऐसे बच्चों का जन्म होता है, जिनमें जन्म के समय से ही इस बीमारी के चिह्न होते हैं। देश में सात करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं, इसीलिए भारत सरकार से स्वास्थ्य मंत्रालय ने सन 2023 में गाइडलाइंस फॉर नेशनल प्रोग्राम फॉर प्रिवेंशन एंड मैनेजमेंट ऑफ़ सिकल सेल डिजीज बनाई। </p>
<p style="text-align:justify;">इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए क्रिसपर जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी के अलावा कोई अन्य कारगर उपाय नहीं है, लेकिन यह तो मात्र दसेक से क्लिनिकल तौर से और हिंदुस्तान में एक-दो साल पहले से उपलब्ध हुई है। किसी-किसी अस्पताल में यह इलाज संभव है, क्योंकि इसके प्रोसीजर बहुत उच्च तकनीक वाले हैं और सभी डॉक्टर इसमें ट्रेंड नहीं हैं। इस टेक्नोलॉजी के आने से पहले लाक्षणिक इलाज ही संभव थी, लेकिन पूरी तरह से कारगर नहीं। सिकल सेल डिजीज (एससीडी) के लिए कुछ मानक चिकित्सा उपचार तय किए गए थे, परंतु भारत में सिकल सेल डिजीज (एससीडी) का कोई मानक हर्बल या पारंपरिक इलाज नहीं है। </p>
<p style="text-align:justify;">चिकित्सकीय रूप से, एकमात्र स्थायी इलाज अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण है, जबकि मानक प्रबंधन दर्द के दौरों को रोकने के लिए हाइड्रोक्सीयूरिया जैसी दवाइयों पर निर्भर करता है। इसकी खुराक बहुत मंहगी है। हाइड्रोक्सीयूरिया, भ्रूण हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मानक दवा है, जो दर्दनाक वाहिका अवरोध के दौरों की आवृत्ति और गंभीरता को काफी कम कर देती है। दूसरा उपाय रक्ताधान अथवा ब्लड ट्रांसफ्युज़न हैं, जिसे तीव्र जटिलताओं, गंभीर एनीमिया के इलाज और स्ट्रोक की रोकथाम के लिए उपयोग किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तीसरा उपाय है, फोलिक एसिड सप्लीमेंट, जिसे नई लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में सहायता के लिए प्रतिदिन निर्धारित किया जाता है। अस्थि मज्जा/स्टेम सेल प्रत्यारोपण वर्तमान में एकमात्र सिद्ध, संभावित रूप से उपचारात्मक उपचार है, जो आमतौर पर गंभीर मामलों के लिए आरक्षित है। भारत में पारंपरिक और वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियां आयुर्वेद, होम्योपैथी और जनजातीय/लोक चिकित्सा, कभी-कभी दीर्घकालिक दर्द के प्रबंधन या रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए अपनाई जाती हैं, हालांकि इनमें से कोई भी पारंपरिक उपचार अंतर्निहित आनुवंशिक दोष को ठीक करने या उलटने में सिद्ध नहीं हुआ है। पारंपरिक विकल्पों पर विचार करते समय चिकित्सक लक्षणों के प्रबंधन के लिए आयुर्वेद और होम्योपैथी सहायक उपचार प्रदान कर सकते हैं, लेकिन इनका उपयोग केवल आधुनिक चिकित्सा देखरेख के साथ पूरक उपचार के रूप में किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य और पश्चिमी भारत (विशेष रूप से आदिवासी आबादी के बीच) में सिकल सेल एनीमिया की उच्च व्यापकता को देखते हुए, सरकार ने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया है, जो व्यापक प्रारंभिक जांच, आनुवंशिक परामर्श और आधुनिक चिकित्सा देखभाल के मानकीकरण पर जोर देता है। सन 2023 के मिशन डॉक्यूमेंट में उन्नत अनुसंधान के बारे में यह कहा गया कि वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद का इंस्टिट्यूट फॉर जेनोमिक एंड इन्टीग्रेटिव बिलोग्य, सिकल सेल रोग के इलाज के लिए कोशिकाओं पर क्रिस्पर कैस-9 थेरेपी (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट) पर काम कर रहा है। मरीज़ों में आनुवंशिक बीमारियों को ठीक करने के लिए क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट -एसोसिएटेड तरीकों की ज़बरदस्त सफलता ने, इन तरीकों को क्लिनिक तक लाने के लिए वैज्ञानिक निवेश को काफ़ी बढ़ावा दिया है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 05:45:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>पिछड़ा-अगड़ा बताना कुरान की शिक्षा के विपरीत</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/hnd2.jpg" alt="HND" width="157" height="204" />
<strong>हृदयनारायण दीक्षित, </strong><br /><strong>पूर्व विधानसभा अध्यक्ष यूपी </strong>

<p style="text-align:justify;">बहुत लंबे समय से ईसाई और इस्लामी धर्म उपदेशक धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी पिछड़े वर्गों की सुविधाएं मांगते रहे हैं। भिन्न-भिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं और फैसले सुनाए हैं, लेकिन राजनीतिक दलतंत्र द्वारा धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी आरक्षण की सुविधा मांगी जाती रही है। इस दफा न्यायालय ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मतांतरण करने से किसी व्यक्ति का वर्ग नहीं बदलता और मतांतरित व्यक्ति को पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">मतांतरण से आरक्षण नहीं मिलता। इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति अपना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585926/labeling-people-as--backward--or--forward--is-contrary-to-the-teachings-of-the-quran"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/hnd2.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/hnd2.jpg" alt="HND" width="157" height="204"></img>
<strong>हृदयनारायण दीक्षित, </strong><br /><strong>पूर्व विधानसभा अध्यक्ष यूपी </strong>

<p style="text-align:justify;">बहुत लंबे समय से ईसाई और इस्लामी धर्म उपदेशक धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी पिछड़े वर्गों की सुविधाएं मांगते रहे हैं। भिन्न-भिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं और फैसले सुनाए हैं, लेकिन राजनीतिक दलतंत्र द्वारा धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी आरक्षण की सुविधा मांगी जाती रही है। इस दफा न्यायालय ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मतांतरण करने से किसी व्यक्ति का वर्ग नहीं बदलता और मतांतरित व्यक्ति को पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">मतांतरण से आरक्षण नहीं मिलता। इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति अपना मत बदल कर मुसलमान हो सकता है, लेकिन पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं रह जाता। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि ईसाई मिशनरियों और इस्लामी उपदेशकों ने सदियों तक अपने-अपने पंथ की प्रशंसा की है कि उनके यहां सामाजिक समता है। बराबरी है। भेदभाव नहीं है। हिंदुओं में जाति व्यवस्था है। कोर्ट ने कहा है कि उसका मत है कि कुछ वर्गों को पिछड़ा और कुछ को अगड़ा बताना कुरान की शिक्षा के विपरीत है। फिर इस्लाम का तो दावा ही बराबरी वाला समाज बनाना है। </p>
<p style="text-align:justify;">बहुत लंबे समय से ईसाई और इस्लामी धर्म उपदेशक धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी पिछड़े वर्गों की सुविधाएं मांगते रहे हैं। भिन्न-भिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं और फैसले सुनाए हैं, लेकिन राजनीतिक दलतंत्र द्वारा धर्मांतरित व्यक्ति के लिए भी आरक्षण की सुविधा मांगी जाती रही है। इस दफा न्यायालय ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मतांतरण करने से किसी व्यक्ति का वर्ग नहीं बदलता और मतांतरित व्यक्ति को पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के मार्च 2024 के आदेश को असंवैधानिक बताया है और उसे रद्द कर दिया है। सरकारी आदेश में मतांतरण करने वाले व्यक्ति को मुस्लिम पिछड़े वर्ग का सदस्य माना गया था। मतांतरित व्यक्ति को भी पिछड़े वर्गों के रूप में मान्यता देने का प्रावधान किया गया था। यह चर्चित फैसला मद्रास हाई कोर्ट की पीठ ने 25 जून को सुनाया है। कोर्ट ने यह निर्णय सम्यक विचारोपरांत एक ऐसे मामले में दिया है, जिसमें एक व्यक्ति, जिसका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था और बाद में उसने हिंदू धर्म छोड़ कर फिर से अपना नाम समीर अहमद रख लिया था। </p>
<p style="text-align:justify;">मुसलमान हो जाने के बाद उसने स्वयं को मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का सदस्य बताया है। उसने अपने तहसीलदार से पिछड़ा वर्ग प्रमाण पत्र की मांग की। तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। तब वो हाई कोर्ट पहुंचा। तमिलनाडु सरकार ने अपने आदेश में प्रावधान किया था कि अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग या डिनोटिफाइड समुदायों से आने वाले लोग यदि धर्मांतरण करते हैं और इस्लाम धर्म अपनाते हैं, तो उन्हें भी पिछड़े वर्गों के रूप में आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का तर्क था कि इससे मतांतरण करने वाले व्यक्तियों के भी अधिकार सुरक्षित रहेंगे, लेकिन कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी और स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण का आधार पंथ या मजहब नहीं होता, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन होता है। कोर्ट ने साफ किया कि संवैधानिक श्रेणियों जैसे अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग को एक साथ मिला कर नई श्रेणी बनाना संविधान के मूल ढांचे के विपरीत है।</p>
<p style="text-align:justify;">मद्रास हाई कोर्ट ने ही 1951 के फैसले का हवाला देते हुए कहा था, ‘जब कोई हिंदू, इस्लाम अपनाता है, तो वह सिर्फ मुसलमान बनता है। समाज में उसकी प्रतिष्ठा जाति के आधार पर नहीं होती। हिंदू धर्म छोड़ते ही वह अपनी मूल जाति का सदस्य नहीं रह जाता।’ आरक्षण का मसला भारत की संविधान सभा में भी आया था। मजहबी आधार पर ही देश का विभाजन हो चुका था। संविधान सभा बड़े उदास क्षणों में आरक्षण पर विचार कर रही थी। संविधान सभा ने सरदार पटेल की अगुवाई में अल्पसंख्यकों के आरक्षण के मुद्दे पर विचार करने के लिए एक समिति बनाई थी। समिति ने अपनी सिफारिश में मजहबी आरक्षण को सिरे से खारिज कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">सभा की अल्पसंख्यक अधिकारों, मूलाधिकारों संबंधी समिति के सभापति सरदार पटेल ने संविधान सभा में समिति की रिपोर्ट (25 मई, 1949) पेश की। लगातार दो दिन (25 व 26 मई, 1949) बहस हुई। जगत नारायण लाल ने कहा, “भारत एक लौकिक (सेकुलर) राज्य होगा। उसके बाद रक्षणों की कोई मांग नहीं होनी चाहिए। जहां तक अनुसूचित जातियों का प्रश्न है, उन्हें आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए होने के कारण ही रक्षण दिया गया है।”</p>
<p style="text-align:justify;">ज्यादातर सदस्यों ने अनुसूचित जाति के अस्थाई आरक्षण को सही बताया, लेकिन ‘आरक्षण’ की मूल भावना को कोसा। नजीरुद्दीन अहमद ने कहा, “मैं समझता हूं कि किसी प्रकार के रक्षण स्वस्थ राजनीतिक विकास के प्रतिकूल हैं। उनसे एक प्रकार की हीन भावना प्रकट होती है। .... .श्रीमान रक्षण ऐसा रक्षा उपाय है, जिससे वह वस्तु जिसकी रक्षा की जाती है वह नष्ट हो जाती है। जहां तक अनुसूचित जातियों का संबंध है, हमें कोई शिकायत नहीं है।”<br /> <br />जेडएच लारी ने मुस्लिम आरक्षण की पैरवी करते हुए कहा, “आपको अनुसूचित जाति के हितों की चिंता है। मुसलमानों के हितों की परवाह नहीं। अनुसूचित जाति के स्थान रक्षण सिद्धांत के साथ क्या आप यह भी नहीं स्वीकार करते कि आरक्षण राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध नहीं है?” आरक्षण राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होता है। आरक्षण एक विशेष अस्थाई उपाय है। इसके नफा-नुकसान पर सम्यक् विचार नहीं हुआ। संविधान निर्माताओं ने इसे सामाजिक पुनर्निर्माण का औजार बनाया। अनुसूचित जातियों/जनजातियों को जन्मना आधारित अस्थाई आरक्षण मिला। </p>
<p style="text-align:justify;">पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए आयोग बनाने की व्यवस्था (अनु. 340) की गई। पं. नेहरू के समय (1953) पिछड़े वर्गों की खोज के लिए काका कालेलकर आयोग बना। आयोग के कई सदस्य जन्मना जाति को पिछड़ेपन का आधार बनाने पर असहमत थे। आयोग ने राष्ट्रपति को लिखा, “समानता वाले समाज की ओर प्रगति में जाति प्रथा बाधा है। कुछ निश्चित जातियों को पिछड़ा मानने से यह हो सकता है कि हम जाति प्रथा के आधार पर भेदभाव को सदा के लिए बनाए रखें।” </p>
<p style="text-align:justify;">नेहरू सरकार ने जाति के अलावा पिछड़ेपन का आधार जांचने की कोई दीगर कसौटी खोजने की बात की। वीपी मंडल के नेतृत्व में दूसरा आयोग बना। मंडल आयोग की रिपोर्ट (1980) में ‘जाति’ को पिछड़ेपन का आधार बनाया गया। आयोग ने पिछड़ी जातियों की सूची भी बनाई। मंडल ने गरीबी हटाने के राष्ट्रीय कार्यक्रमों को आरक्षण से अलग रखने की आश्चर्यजनक बात कही, “गरीबी हटाने की राष्ट्रीय समस्या के अंतर्गत अन्य पिछड़ी जातियों को ऊपर उठाने की समस्या आती है। पर यह बात अंशतः ही सही है। अन्य पिछड़ी जातियों का अभावग्रस्त होना एक अलग बड़ी राष्ट्रीय समस्या है।” (रिपोर्ट, पृ. 62)। यानी देश के बाकी जनों की गरीबी अलग समस्या है। पिछड़ी जातियों की गरीबी भी विचारणीय है, लेकिन मजहबी आधार पर आरक्षण मान्य नहीं है।<strong> (ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 05:19:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भूकंप के विकराल होने में मानव भी जिम्मेदार</title>
                                    <description><![CDATA[पर्यावरणविदों की मानें तो सभी भूकंप प्राकृतिक नहीं होते, बल्कि उन्हें विकराल बनाने में मानवीय हस्तक्षेप भी शामिल है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585861/humans-are-also-responsible-for-the-devastating-nature-of-earthquakes"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2023-10/भूकंप.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats550.jpg" alt="cats" width="163" height="165"></img>
<strong>प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में एक मिनट के अंतराल पर आए दो शक्तिशाली भूकंपों ने बड़ी ताबाही मचा दी है। 24 जून 2026 को शाम को आए 7.2 और 7.5 तीव्रता वाले भूकंपों ने पूरे देश की बुनियाद को हिला दिया है। इसे वेनेजुएला का एक सदी में आए सबसे ज्यादा विनाशकारी भूकंप का दर्जा दिया गया है। इस शक्तिशाली भूकंप के प्रभाव से राजधानी कराकस और उसके आसपास की सैंकड़ों इमारतें कंक्रीट और स्टील के मलबे में बदल गईं। 188 लोगों की मृत्यु हो गई और हजारों लोग मलबे में दबे हुए हैं। यूएस भूगर्भीय सर्वेक्षण में कहा गया है कि आशंका है कि 10,000 से भी अधिक लोग इस विनाशलीला में समा गए हों? </p>
<p style="text-align:justify;">7.2 तीव्रता का पहला भूकंप कैरिबियन तट पर मोरोन के पश्चिम में आया। राजधानी कराकस से करीब 170 किमी की दूरी पर यह स्थल है। भूकंप का केंद्र धरती से 22 किमी नीचे था। ठीक एक मिनट बाद 7.5 तीव्रता का दूसरा भूकंप आया, यह धरती की 10 किमी गहराई से उभरा था। यह जगह मोरोन से 16 किमी दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। चूंकि यह भूकंप छुट्टी के दिन आया था, इस कारण ज्यादातर लोग बहुमंजिला इमारतों वाले घरों में थे। इस कारण मौतों का अनुमान 10,000 तक लगाया जा रहा है। इसकी आशंका इसलिए की जा रही है, क्योंकि गुमशुदा लोगों की जानकारी के लिए बनाई गई वेबसाइट पर 66 हजार से भी अधिक लापता लोगों की सूची सामने आई है। इस भूकंप के झटके जापान और नेपाल में भी दर्ज किए गए हैं।    </p>
<p style="text-align:justify;">उथले भूकंप गर्भ से भूमि की सतह पर फूटने के साथ भीषण बर्बादी का कारण बनते हैं। वेनेजुएला का भूकंप 10 और 22 किमी की गहराई से फूटे, इसलिए नुकसान ज्यादा होने की आशंका है। भूकंप की चेतावनी संबंधी प्रणालियां अनेक देशों में संचालित हैं, लेकिन वह भू-गर्भ में हो रही दानवी हलचलों की सटीक जानकारी समय पूर्व देने में लगभग असमर्थ हैं, क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी देने वाले अमेरिका, जापान, भारत, नेपाल, अफगानिस्तान, चीन और अन्य देशों में भूकंप आते ही रहते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">यहां लाख टके का सवाल उठता है कि चांद और मंगल जैसे ग्रहों पर मानव बस्तियां बसाने का सपना और पाताल की गहराइयों को नाप लेने का दावा करने वाले वैज्ञानिक आखिर पृथ्वी के नीचे उत्पात मचा रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में क्यों असफल हैं? जबकि वैज्ञानिक इस दिशा में लंबे समय से कार्यरत हैं। अमेरिका एवं भारत समेत अनेक देशों के मौसम व भू-गर्भीय हलचल की जानकारी देने वाले सैंकड़ों उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित कर चुके हैं। हिंदूकुश क्षेत्र में आया यह भूकंप भारत के लिए भी चेतावनी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के नामचीन विषेशज्ञों व पर्यावरणविदों की मानें तो सभी भूकंप प्राकृतिक नहीं होते, बल्कि उन्हें विकराल बनाने में मानवीय हस्तक्षेप शमिल है, इसीलिए इस भूकंप को स्थानीय भू-गर्भीय विविधता का कारण माना गया है। दरअसल प्राकृतिक संसाधनों के अकूत दोहन से छोटे स्तर के भूकंपों की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। भविष्य में इन्हीं भूकंपों की व्यापकता और विकरालता बढ़ जाती है। यही कारण है कि भूकंपों की आवृत्ति बढ़ रही है। पहले 13 सालों में एक बार भूकंप आने की आशंका बनी रहती थी, लेकिन अब यह घटकर चार साल हो गई है। </p>
<p style="text-align:justify;">यही नहीं, आए भूकंपों का वैज्ञानिक आकलन करने से यह भी पता चला है कि भूकंपीय विस्फोट में जो ऊर्जा निकलती है, उसकी मात्रा भी पहले की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली हुई है। 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में जो भूकंप आया था, उनसे 20 थर्मोन्यूक्लियर हाइड्रोजन बमों के बराबर ऊर्जा निकली थी। यहां हुआ प्रत्येक विस्फोट हिरोशिमा-नागाशाकी में गिराए गए परमाणु बमों से भी कई गुना ज्यादा ताकतवर था। जापान और फिर क्वोटो में आए सिलसिलेवार भूकंपों से पता चला है कि धरती के गर्भ में अंगड़ाई ले रही भूकंपीय हलचलें महानगरीय आधुनिक विकास और आबादी के लिए अधिक खतरनाक साबित हो रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये हलचलें भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश की धरती के नीचे भी अंगड़ाई ले रही हैं, इसलिए इन देशों के महानगर भूकंप के मुहाने पर खड़े हैं। विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण की अनदेखी प्रकृति को प्रकोप में बदल रही है, इसलिए बाढ़, भू-स्खलन, सूखा, हिमनदों का पिघलना, भूकंप और सुनामी जैसे तूफानों का आना निरंतर बना हुआ है।  </p>
<p style="text-align:justify;">भूकंप के लिए जरूरी ऊर्जा के एकत्रित होने की प्रक्रिया को धरती की विभिन्न परतों के आपस में टकराने के सिद्धांत से आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी वैज्ञानिक मान्यता है कि करीब साढ़े पांच करोड़ साल पहले भारत और आस्ट्रेलिया को जोड़े रखने वाली भूगर्भीय परतें एक-दूसरे से अलग हो गईं और वे यूरेशिया परत से जा टकराईं। इस टक्कर के फलस्वरूप हिमालय पर्वतमाला अस्तित्व में आई और धरती की विभिन्न परतों के बीच वर्तमान में मौजूद दरारें बनीं। हिमालय पर्वत उस स्थल पर अब तक अटल खड़ा है, जहां पृथ्वी की दो अलग-अलग परतें परस्पर टकराकर एक-दूसरे के भीतर घुस गई थीं। परतों के टकराव की इस प्रक्रिया की वजह से हिमालय और उसके प्रायद्वीपीय क्षेत्र में भूकंप आते रहते हैं। इसी प्रायद्वीप में ज्यादातर एशियाई देश बसे हुए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विदेश</category>
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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 05:08:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मॉनसून के लिए विलेन बना ‘अल नीनो’</title>
                                    <description><![CDATA[जून का महीना मानसून के आगमन का रहता है। महीना बीतने को है, लेकिन मानसून का कोई अता-पता नहीं। मौसम विभाग ने मानसून देरी का कारण ‘अल नीनो’ को बताया है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585860/el-ni%C3%B1o--turns-villain-for-the-monsoon"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats548.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats549.jpg" alt="cats" width="187" height="220"></img>
<strong>डॉ. रमेश ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">मानसून की उदासीनता केरल से लेकर भारत के विभिन्न हिस्सों में बरकरार है। 64 फीसदी बारिश अभी तक कम हुई है। पिछले माह 26 मई को केरल में मानसून आने का अनुमान था, वह भी धराशायी हुआ। जून का महीना मानसून के आगमन का रहता है, पर महीना बीतने को है, लेकिन मानसून का कोई अता-पता नहीं है? अभी लापता है। मौसम विभाग ने मानसून देरी का कारण ‘अल नीनो’ को बताया है।</p>
<p style="text-align:justify;">‘स्टेट यूनिवर्सिटीज ऑफ न्यूर्याक’ में इस महीने की रिसर्च से वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मौजूदा ‘अल नीनो’ का प्रभाव 140 वर्ष पूर्व के अभी तक के सबसे खतरनाक मोड़ पर है। मानसून वर्षा पर भारत की तकरीबन 70 फीसदी खेती-बाड़ी निर्भर रहती है, जो अब प्रभावित होती दिखने लगी है। पिछले 11 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतनी कम बारिश दर्ज की गई हो, हालांकि पिछले दिनों बारिश हुई, लेकिन बारिशें सामान्य ‘पूर्वमेघ’ थी, उसे ‘उत्तरमेघ’ यानी मानूसन से नहीं जोड़ा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">अलनीनो है क्या? दरअसल, यह एक ‘स्पेनिश’ शब्द है, जो प्रशांत महासागर में उत्पन्न कर देना वाला अप्राकृतिक मौसम का ‘विलेन’ होता है। इसके प्रभाव से मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जो मानसून पर सीधा अटैक करता है। ‘अलनीनो’ के प्रभाव से दक्षिणी गोलार्ध से उठने वाली हवाओं का दबाव भूमध्यीय रेखाओं के निकट कम हुआ है, जिसके चलते ही भीषण गर्मी का जनमानस सामना कर रहे हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">अलनीनो को तबाही भी कहते हैं, जो मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कैस्पियन सागर के ऊपर बहने वाली प्रवाहमान गति को अपने प्रभाव से थामता है। यही कारण है, वायुमंडलीय क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थितियां बनती हैं, तो मानसून के रूख में बदलाव होने लगता है। अलनीनो का बुरा प्रभाव कब दिखता है, इस संबंध में वैज्ञानिकों का मानना है कि जब पर्यावरण असंतुलित होता है, तो अलनीनो का विपरीत प्रभाव दिखने लगता है। लगातार होता पर्यावरणीय दोहन, कटते जंगल, सिकुड़ते पहाड़ और असंतुलित होता कुदरती माहौल मुख्य कारण है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानसून कब दस्तक देगा, इसका इंतजार सबसे ज्यादा अन्नदाता कर रहे हैं, क्योंकि ये महीना खरीफ फसलों की बुआई का रहता है, जो लगातार प्रभावित हो रहा है। मानसून की बेरुखी के चलते समूचे देश में न सिर्फ भीषण गर्मी का दौर है, बल्कि सूखे की आहट भी सुनाई देने लगी है। मानूसन के चलते अगर खेती प्रभावित हुई, तो पूरक व्यवसाय के लिहाज से बाजार में मंदी का साया भी पड़ सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">मानसून के रूठने से कपास की बुआई एकदम अधर में पड़ी है। बदरा बरसे, इसको लेकर लोग देसी परंपराओं का इस्तेमाल भी करने लगे हैं? इंद्रदेव को मनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों ने पूजा-पाठ शुरू की है, क्योंकि ‘मृग नक्षत्र’ बीत चुका है, जिसमें बारिश इस बार नहीं हुई। मानसून की अविलंबता ने न सिर्फ भारतीयों को परेशान किया हुआ है, बल्कि वैश्विक जलवायु मौसम चक्र के मिजाज को भी गड़बड़ा दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में 28 मई से सक्रिय हुए ‘अलनीनो’ के प्रभाव के चलते मानसून ने बेरुखी अख्तियार की है। वहीं, ‘विश्व मौसम संगठन’ ने भी चेताया है कि अलनीनो इस बार अपना बुरा प्रभाव पूरे संसार में दिखाएगा, जिससे सूखे का संकट बढ़ेगा। ‘नासा’ के जरिए उपग्रह से जो तस्वीरें फिलहाल ली गई हैं, उनमें भी दक्षिण-पश्चिम जलीय भू-भागों में बदलाव के कोई संकेत नहीं मिले। मानसून की देरी के चलते सूखते जलस्त्रोत, अधर में पड़ती खेती की बुआई और भीषण गर्मी से जनजीवन पर बुरा प्रभाव पड़ना आरंभ हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान हालात को देखते हुए मौसम विभाग ने किसानों को फिलहाल इंतजार करने को कहा है, लेकिन अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो इससे न केवल किसान आर्थिक रूप से परेशान होंगे, बल्कि फसल उत्पादन पर भी विपरीत असर पड़ेगा। सभी जानते हैं कि भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र तकरीबन 20 से 25 फीसदी की भूमिका निभाता है। कृषि का गड़बड़ाना, यानी कई व्यवस्थाएं एक साथ चरमराना? कृषि के लिए वैकल्पिक सुविधाएं अब इतनी नहीं जितनी होनी चाहिए। नाले, नदियां, तालाब, पोखर, जलाशय आदि सूखे पड़े हैं, जबकि किसी जमाने में यह जलीय संसाधन बारिश न होने की भरपाई करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लापता होते मानसून को मनाने का माध्यम अब सिर्फ और सिर्फ पर्यावरण सुधार कर ही किया जा सकता है। महासागरों की सतहों को प्रभावित करने वाली सभी मानवीय गतिविधियों पर रोक लगाने की जरूरत है। जंगलों को काटने से बचाना होगा। अरावली के पहाड़ सुरक्षित रखने होंगे। इन्हीं, वजहों से मानसून को लेकर वैज्ञानिक अनुमान सही साबित नहीं हो पाते, क्योंकि प्र्यावरण की गति लगातार बिगड़ती जा रही है। मानसून की बेरुखी सिर्फ किसानों को ही प्रभावित नहीं करेगी, जनमानस को भी तहस-नहस करने पर आमादा है। बिगड़े मौसम के मिजाज ने ही अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में मानसून को आगे नहीं बढ़ने दिया है। इस कारण मध्य और उत्तर-पश्चिम की शुष्क हवाएं भी सुस्त पड़ी हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 04:58:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>पांच दशक बाद भी आपातकाल महत्वपूर्ण चेतावनी </title>
                                    <description><![CDATA[आज, आपातकाल के पांच दशक बाद भी यह घटना एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में याद की जाती है। इसका संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और जवाबदेह शासन से मजबूत होता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585674/even-after-five-decades--the-emergency-remains-a-crucial-warning"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats511.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats512.jpg" alt="cats" width="166" height="211"></img>
<strong>सौरभ वार्ष्णेय, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">25 जून 1975 की आधी रात का काला अध्याय कैसे कोई भूल सकता है? गर्मी, तपिश और आंधी ने तो जनमानस को पहले से ही झुलसा रखा था, ऊपर से रेडियो पर आया संदेश से पूरा देश सकते में आ गया। देश ने पहले कभी आपातकाल नहीं देखा था। अचानक आए राजनीतिक तूफान ने देश में अफरातफरी मचा दी। देश में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय माना जाता है। लगभग 21 महीनों तक चले इस दौर ने न केवल राजनीतिक व्यवस्था को झकझोर दिया, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं, अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक मूल्यों पर भी गंभीर प्रश्न चिह्न खड़े किए। </p>
<p style="text-align:justify;">तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए थे। आपातकाल समाप्त हुए पांच दशक बीत चुके हैं, लेकिन उसके काले छींटे पूरी तरह धुल नहीं पाए हैं। इसका कारण केवल इतिहास की स्मृतियां नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र को लेकर लगातार बनी रहने वाली चुनौतियां भी हैं। जब भी सत्ता के केंद्रीकरण, संस्थाओं की स्वायत्तता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या विपक्ष की भूमिका पर बहस होती है, तब आपातकाल की याद स्वत: ताजा हो जाती है। </p>
<p style="text-align:justify;">आपातकाल की घटनाओं का स्मरण केवल अतीत को कोसने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक है। दुर्भाग्य से, आपातकाल पर राजनीतिक दल अक्सर अपने-अपने दृष्टिकोण से चर्चा करते हैं। एक पक्ष इसे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला बताता है, जबकि दूसरा पक्ष वर्तमान परिस्थितियों की तुलना उस दौर से करने का प्रयास करता है। इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच वास्तविक आवश्यकता यह है कि देश उस कालखंड का निष्पक्ष मूल्यांकन करे और उससे मिले सबकों को आत्मसात करे। </p>
<p style="text-align:justify;">नागरिक अधिकारों का सम्मान, सत्ता की जवाबदेही, प्रेस की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती ही उस अंधकारमय दौर की पुनरावृत्ति को रोक सकती है। इतिहास को भुलाना समाधान नहीं है; उससे सीख लेकर लोकतंत्र को और मजबूत बनाना जरूरी है। आपातकाल को केवल राजनीतिक विमर्श का विषय न बनाया जाए, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का स्थायी पाठ बनाया जाए। </p>
<p style="text-align:justify;">मार्च 1977 में जब आपातकाल समाप्त हुआ, तब देश ने राहत की सांस तो ली, लेकिन इसके पीछे छिपी पीड़ा, भय और लोकतांत्रिक संस्थाओं को हुई क्षति लंबे समय तक महसूस की गई। आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। अखबारों को सरकारी अनुमति के बिना समाचार प्रकाशित करने की स्वतंत्रता नहीं थी। विरोधी नेताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया। लोकतंत्र की आत्मा मानी जाने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो गई थी। </p>
<p style="text-align:justify;">आपातकाल के अंतिम चरण में सबसे अधिक आलोचना जबरन नसबंदी अभियान और झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने की कार्रवाइयों को लेकर हुई। कई स्थानों पर प्रशासनिक दबाव में लोगों को नसबंदी के लिए मजबूर किया गया। गरीब और कमजोर वर्ग इस नीति का सबसे बड़ा शिकार बने। इससे जनता में व्यापक असंतोष पैदा हुआ। अनेक परिवारों ने सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कष्ट झेले, जिसकी पीड़ा आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है। </p>
<p style="text-align:justify;">आपातकाल इसलिए भी भयावह कहा जाता है, क्योंकि उस समय तक लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता काफी कमजोर हो चुकी थी। संसद, न्यायपालिका और मीडिया पर सत्ता का प्रभाव बढ़ गया था। जनता के अधिकार सीमित हो गए थे और भय का वातावरण बन गया था। लोगों को यह एहसास होने लगा था कि यदि लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों की रक्षा न हो तो शासन निरंकुशता की ओर बढ़ सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">मार्च 1977 के आम चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र की ताकत को भी साबित किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने चुनाव कराने का निर्णय लिया और जनता ने मतदान के माध्यम से अपना फैसला सुनाया। पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। यह लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का महत्वपूर्ण क्षण था। आपातकाल की समाप्ति ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की जनता लोकतांत्रिक मूल्यों से गहरा लगाव रखती है। सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंतत: जनता ही सर्वोच्च होती है। इस दौर ने संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। </p>
<p style="text-align:justify;">आज, आपातकाल के पांच दशक बाद भी यह घटना एक महत्वपूर्ण चेतावनी के रूप में याद की जाती है। इसका संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और जवाबदेह शासन से मजबूत होता है। आपातकाल का अंत भयावह अनुभवों और लोकतंत्र की पुनर्जागृति दोनों का प्रतीक था।</p>
<p style="text-align:justify;">यह इतिहास हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को सदैव सजग रहना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जागरूक नागरिक ही होते हैं। जब देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग होगा तथा शासन संविधान की मर्यादाओं के भीतर कार्य करेगा, तभी आपातकाल के वे काले छींटे वास्तव में मिट सकेंगे और भारत का लोकतंत्र और अधिक परिपक्व तथा सशक्त बन सकेगा। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 06:32:32 +0530</pubDate>
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