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                <title>धर्म संस्कृति - Amrit Vichar</title>
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                <description>धर्म संस्कृति RSS Feed</description>
                
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                <title>गर्भाधान संस्कार की प्रासंगिकता  </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585633/relevance-of-the--garbhadhan-sanskar---conception-ritual"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(14)17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने के लिए उसमें रंग भरे जाते हैं, उसी प्रकार व्यक्तित्व और चरित्र के समग्र विकास के लिए संस्कार आवश्यक हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">संस्कारों के माध्यम से मनुष्य का आंतरिक परिष्कार होता है और उसका पुनर्जन्म जैसा आध्यात्मिक उत्थान माना जाता है। गर्भ से लेकर मृत्यु तक जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण को संस्कारित करने के लिए हमारे ऋषियों ने विभिन्न संस्कारों की व्यवस्था की है। आज आधुनिक विज्ञान भी भारतीय संस्कार परंपरा के अनेक पक्षों को स्वीकार करने लगा है। कर्णवेध संस्कार के आधार पर विकसित एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर जैसी चिकित्सा पद्धतियां इसका उदाहरण हैं। पूर्वकाल में चूड़ाकरण संस्कार के अंतर्गत शिखा रखने की परंपरा भी शरीर की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी मानी जाती थी। किंतु पाश्चात्य प्रभाव के कारण संस्कारों के प्रति समाज की आस्था कमजोर हुई है और अनेक संस्कार लुप्तप्राय हो गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सोलह संस्कारों में गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है। दुर्भाग्य से आज यह लगभग विस्मृत हो चुका है। भारतीय संस्कृति में संतानोत्पत्ति को केवल भोग का विषय नहीं, बल्कि एक पवित्र यज्ञ माना गया है। गर्भाधान का उद्देश्य केवल संतान प्राप्ति नहीं, बल्कि श्रेष्ठ, गुणवान और संस्कारित संतति का निर्माण है। इसीलिए शास्त्रों में गर्भाधान के लिए विशेष नियम, संयम और आध्यात्मिक तैयारी का विधान किया गया है। प्राचीन परंपरा के अनुसार पति-पत्नी संतान के स्वरूप और गुणों का विचार करते हुए देवपूजन, जप, तप, संयम और प्रार्थना द्वारा स्वयं को मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से तैयार करते थे। वे अपने भीतर ओज, तेज और पवित्रता का विकास करते हुए शुभ मुहूर्त में गर्भाधान करते थे। यही आध्यात्मिक उपचार संस्कार कहलाता है। इसका उद्देश्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी श्रेष्ठ संतति का निर्माण करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां विवाह भी एक संस्कार माना गया है। यह केवल दांपत्य जीवन का आरंभ नहीं, बल्कि संयम, उत्तरदायित्व और धर्ममय जीवन का प्रवेश द्वार है। विवाह का उद्देश्य परिवार और समाज के लिए आदर्श संतति का निर्माण भी माना गया है। इसी कारण विवाह और गर्भाधान दोनों में समय, परिस्थिति और मानसिक स्थिति को महत्व दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री और पुरुष के शरीर तथा मन की स्वस्थता, पवित्रता और प्रसन्नता से ही श्रेष्ठ संतान उत्पन्न होती है। गर्भाधान के समय माता-पिता की मानसिक अवस्था का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। महर्षि चरक ने भी उल्लेख किया है कि गर्भाधान के समय माता-पिता के मन में जो भाव होते हैं, वे बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक बनते हैं। इसलिए उस समय धार्मिक, विद्वान, शूरवीर और सद्गुणी संतानों की कामना करते हुए वैसा ही चिंतन करने की प्रेरणा दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में गर्भाधान के लिए समय और काल का भी विशेष महत्व बताया गया है। ऋ तुकाल, नक्षत्र, तिथि तथा अन्य ज्योतिषीय परिस्थितियों का विचार करके गर्भाधान करने का विधान है। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि दंपति संयमित जीवन जीते हुए संतुलित मनः स्थिति में रहें। शास्त्रों ने दिन के समय गर्भाधान को अनुचित बताया तथा रात्रि के उपयुक्त समय को श्रेष्ठ माना है। गर्भावस्था में माता के आहार, विचार और व्यवहार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह विश्वास रहा है कि गर्भस्थ शिशु पर माता के वातावरण और चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ता है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय परंपरा में प्रह्लाद और अभिमन्यु के उदाहरण दिए जाते हैं, जिन्होंने गर्भावस्था में ही श्रेष्ठ संस्कार और ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए गर्भवती स्त्री को सत्संग, सद्ग्रंथों का अध्ययन, शुभ चिंतन और सकारात्मक वातावरण में रहने की सलाह दी गई है। संस्कारों का मूल उद्देश्य मनुष्य को संयमित, सदाचारी और आध्यात्मिक बनाना है। आज भोगवादी जीवनशैली और असंयम के कारण अनेक पारंपरिक संस्कार उपेक्षित हो गए हैं। परिणामस्वरूप जीवन में नैतिकता, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है। आवश्यकता इस बात की है कि संस्कारों के वास्तविक उद्देश्य को समझा जाए और उन्हें अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन के परिष्कार की प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे शास्त्र यह भी बताते हैं कि संतान की श्रेष्ठता संख्या में नहीं, गुणों में होती है। इतिहास में अनेक महान व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अकेले ही समाज और राष्ट्र को नई दिशा दी। भगवान श्रीराम, भीष्म आदि शंकराचार्य तथा प्रह्लाद जैसे महापुरुषों का महत्व उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनके गुण, चरित्र और आदर्शों के कारण है। संस्कारों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को उत्कृष्ट बनाना है। विशेष रूप से गर्भाधान संस्कार का मर्म यही है कि भावी पीढ़ी शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ बने।</p>
<h5 style="text-align:justify;">आचार्य प्रदीप द्विवेदी आध्यात्मिक लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 09:00:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बहुत शुभ होती है वैजयंती की माला</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585631/the-vaijayanti-mala-is-considered-highly-auspicious"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(13)16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे, तो उन्हें रास्ते में देवराज इंद्र आते दिखाई दिए। </p>
<p style="text-align:justify;">महर्षि दुर्वासा ने उन्हें सर्वत्र विजय के लिए वैजयंती फूलों की माला दी। अहंकार बस इंद्र ने वैजयंती माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दी। ऐरावत हाथी ने वह माला अपने पैरों के नीचे कुचल दी। यह देख सुनकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र को श्री हीन होने का श्राप दे दिया। बाद में इंद्र को बहुत कष्ट उठाने पड़े और दुर्वासा ऋषि से माफी मांगनी पड़ी। कहते हैं, जो भी वैजयंती फूलों की माला पहनता है, उसके घर लक्ष्मी जी का निवास होता है, उसे हर जगह विजय मिलती है। वैजयंती के फूल लक्ष्मी जी को बहुत पसंद हैं। भगवान कृष्ण भी वैजयंती के फूलों की माला पहनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वैजयंती या केना एक बहुवर्षीय पौधा है। इसकी पत्ते केले की भांति चिकने,हरे या ताम्र रंग के या चित्तीदार, पीली धारियों वाले होते हैं। फूल असंगत, विचित्र आकार के  चमकीले होते हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगते हैं। पुष्प भड़कीले व कई रंग में सामूहिक रूप से खिलते हैं। यह नम स्थानों, झील, तालाब और झरनों के किनारे बहुलता से पाया जाता है। मुख्यतया इसको उद्यानों एवं बागों अर्द्ध-छायादार स्थानों में लगाया जाता है। फूल के बाह्य दल हरे या ताम्र रंग के तथा पंखुड़ियां, बाह्य दल की तरह हरी अथवा रंगीन होती हैं। फूल के रंगीन भाग को स्टॉमिनाडिया कहते हैं, पुंकेसर स्टॉमिनाडिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पुष्प का अलंकृत भाग होता है। केना की लगभग 50 जातियां, प्राय: उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्ण देशों में पाई जाती हैं, जिनमें वैजयंती प्रमुख है। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके कड़े व काले बंदूक की गोली समान बीज के कारण इसे साधारणतया ‘इंडियन शॉट’ कहते हैं। संस्कृत में देवकिली, कृष्णातामारासर्वज्दया, सर्वाजया, काला फूल (बंगाली), देवकली (मराठी), हुदिंगाना (कन्नड़), काल्वालाई, पुवालाई (तमिल), कृष्णातमाय (तेलुगु) तथा काटुवाला मलयालम में कहते हैं। इसका वनस्पतिक नाम केना इंडिका है, जो एक बीजपत्री कुल-केनेसी में आता है। यह एक बहुवर्षीय शाक पात है।</p>
<p style="text-align:justify;">जड़ें प्रकंदीय, 2.5 मी. तक लंबी, तना गोलाकार, मांसल, चिकना, पत्तियां आयताकार, ऊपरी छोर पतला तथा निशिताय: पुष्प-युग्म शीर्षस्थ, छोटा: पुष्य सहपत्र चक्राकार, पुष्प पतला तथा उच्छीर्ण, दल लगभग 4 सेमी. लंबे, ऊपरी स्टॉमिनाडिया, गहरा लाल, लगभग पांच सेमी. लंबा होता है। वर्तमान में वैजयंती की जो जातियां उद्यान, पुष्प-प्रेमियों के मध्य पाई जाती हैं। वह केना इंडिका, केना पलासिड, केना इरिडिफ्लोरा, केना ग्लाउको तथा केना वासीविस्जी के संस्करण से उत्पन्न हुई हैं। संकर प्रजातियों के पुण्य बड़े, विभिन्न आकार एवं रंग के होते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">सामान्यता पुष्प वर्ष भर आते हैं, लेकिन जनवरी से अप्रैल तक अधिक फूल आते हैं। पौध को लगाने के लिए प्रकंद यानी जड़ के टुकड़ों द्वारा जुलाई में रोपण करते हैं। बीज द्वारा रोपण के लिए बीज को गर्म पानी या गोबर की खाद में 3-4 दिनों तक भिगो देते हैं, कड़े छिलके मुलायम हो जाते हैं। उसके बाद चाकू से बीज के ऊपर पतला लंबा चीरा लगाकर मिट्टी में रोपित करने से पौधे अंकुरित हो जाते हैं। वैजयंती के फूलों की सुंदरता दुनियाभर में विख्यात है। सुंदर फूलों के अलावा वैजयंती के पौधे से अनेक लाभ लिए जा सकते हैं। इसके तने के रेशे से सुतली तथा बोरा अथवा थैला बनाया जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिवचरण चौहान, लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 12:00:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> सरकारी नियंत्रण से मंदिर मुक्ति अभियान को धक्का</title>
                                    <description><![CDATA[अनेक धार्मिक संगठन लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि मंदिरों का संचालन और प्रबंधन हिंदू समाज को सौंपा जाए। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए सरकार को किसी भी धार्मिक संस्था के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585676/government-control-pushes-temple-liberation-campaign"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats513.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats514.jpg" alt="cats" width="153" height="168"></img>
<strong>बृजनंदन राजू, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">भारत की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र हमारे मंदिर रहे हैं। मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन, शिक्षा, सेवा, संस्कार और राष्ट्रीय अस्मिता के भी केंद्र रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि विदेशी आक्रांताओं ने भारतीय समाज की आत्मा को कमजोर करने के लिए मंदिरों को निशाना बनाया। मुगल आक्रांताओं ने अनेक मंदिरों को लूटा और ध्वस्त किया। इसके बाद अंग्रेजों ने बचे हुए मंदिरों का प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी देश के अनेक राज्यों में हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं।<br />विश्व हिंदू परिषद सहित अनेक धार्मिक और सामाजिक संगठन लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि मंदिरों का संचालन और प्रबंधन हिंदू समाज को सौंपा जाए। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए सरकार को किसी भी धार्मिक संस्था के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उनका तर्क है कि जब सरकार चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारे, जैन-स्थानक और बौद्ध-विहारों का संचालन नहीं करती, तो फिर हिंदू मंदिरों पर उसका नियंत्रण क्यों बना हुआ है?</p>
<p style="text-align:justify;">मंदिर मुक्ति आंदोलन के समर्थकों का कहना है कि मंदिरों की आय, चढ़ावा और दानराशि का उपयोग धर्म, संस्कृति, शिक्षा, सेवा और सनातन मूल्यों के संरक्षण में होना चाहिए। अनेक राज्यों में मंदिरों के प्रशासन के लिए सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है और उनका वेतन-भत्ता भी मंदिरों की आय से दिया जाता है। इससे मंदिरों का संचालन संतों, महंतों और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप न होकर नौकरशाही के प्रभाव में आ जाता है, इसलिए यह मांग लंबे समय से उठती रही है कि मंदिरों के संचालन की जिम्मेदारी समाज को वापस दी जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर में दानराशि की कथित अनियमितताओं और चोरी से जुड़े समाचारों ने इस बहस को नया मोड़ दे दिया है। राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है और उसके प्रबंधन पर पूरे देश की निगाह रहती है। इस प्रकरण की जांच के लिए गठित एसआईटी जांच के अंतिम निष्कर्ष अभी सार्वजनिक रूप से सामने आने बाकी हैं, लेकिन इस घटना ने मंदिर मुक्ति अभियान को नैतिक और वैचारिक स्तर पर चुनौती अवश्य दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि राम मंदिर जैसे सबसे प्रतिष्ठित मंदिर, जिसके ट्रस्ट में सीधे विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष चंपत राय व संघ से जुड़े हुए लोग हों और वहां भी वित्तीय अनियमितता सामने आती है, तो मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग कहां तक उचित है? वैसे होना यह चाहिए कि मंदिर सरकारी नियंत्रण में रहे, लेकिन मंदिर की धनराशि का उपयोग हिंदुओं के कल्याण में ही खर्च होना चाहिए। यदि कहीं अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों को दंड मिलना चाहिए, लेकिन इसके आधार पर हिंदू समाज की प्रबंधन क्षमता पर प्रश्न चिह्न लगाना उचित नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तविक आवश्यकता यह है कि मंदिरों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए। चाहे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हों या समाज के हाथों में, श्रद्धालुओं की आस्था और दानराशि की पवित्रता सर्वोपरि है। मंदिरों की आय का उपयोग धर्म, संस्कृति, शिक्षा, गौसंवर्धन, सेवा और समाज कल्याण के कार्यों में होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">राम मंदिर प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि मंदिरों के संचालन का आदर्श मॉडल क्या हो? लेकिन इतना स्पष्ट है कि किसी भी व्यवस्था की सफलता का आधार ईमानदारी, पारदर्शिता और जनविश्वास होता है। यदि इन मूल्यों को केंद्र में रखा जाए तो मंदिर न केवल आस्था के केंद्र बने रहेंगे, बल्कि समाज निर्माण और राष्ट्र पुनर्निर्माण के भी सशक्त माध्यम सिद्ध होंगे। हिंदू समाज की यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि मंदिरों की दानराशि और संसाधनों का उपयोग हिंदू समाज के कल्याण, धर्म-संरक्षण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए हो। साथ ही यह भी आवश्यक है कि मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था ऐसी हो, जिस पर श्रद्धालुओं का विश्वास अक्षुण्ण बना रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक हैं। उन्होंने देश और समाज के लिए अपने को खपा दिया और राम काज में सर्वस्व लगाया है। श्रीराम जन्मभूमि के आंदोलन का कोई भी पक्ष हो, जन जागरण का विषय हो और चाहे न्यायालयीन लड़ाई का, उसकी धुरी चंपत राय ही रहे, इसलिए साधना, समर्पण व निष्ठा पर प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकते। इस प्रकरण से करोड़ों राम भक्त आहत भी हैं। सबका नाम घसीटना ठीक नहीं है। किसी की दीर्घकालिक साधना और समर्पण पर प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकते। जल्द ही सत्य सबके सामने आएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/585676/government-control-pushes-temple-liberation-campaign</link>
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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 05:40:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> आज शुरू होगा आदिनाथ जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, आचार्य विशुद्ध सागर पहुंचे पार्श्वनाथ धाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ, अमृत विचार: </strong>काकोरी स्थित पार्श्वनाथ धाम (अमेठिया- सलेमपुर) में 24 जून से 29 जून तक होने वाले आदिनाथ जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का शुभारंभ मंगलवार को आचार्य विशुद्ध सागर के आगमन के साथ हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">आचार्य विशुद्ध सागर के प्रवेश के दौरान गोमती नगर से आलोक जैन, इंदिरा नगर से अभिषेक जैन, डालीगंज से अंजू जैन, भाईजी, रितेश जैन, चौक से अशोक जैन समेत लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों से आए बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने बैंड-बाजे की धुनों, मंगलाचार और गगनभेदी जयकारों के बीच आचार्य की अगवानी की।</p>
<p style="text-align:justify;">काकोरी जैन मंदिर में आयोजित प्रथम प्रवचन सभा में राष्ट्रसंत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585595/acharya-vishuddha-sagar-reached-parshvanath-dham"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/muskan-dixit-(6)9.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ, अमृत विचार: </strong>काकोरी स्थित पार्श्वनाथ धाम (अमेठिया- सलेमपुर) में 24 जून से 29 जून तक होने वाले आदिनाथ जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का शुभारंभ मंगलवार को आचार्य विशुद्ध सागर के आगमन के साथ हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">आचार्य विशुद्ध सागर के प्रवेश के दौरान गोमती नगर से आलोक जैन, इंदिरा नगर से अभिषेक जैन, डालीगंज से अंजू जैन, भाईजी, रितेश जैन, चौक से अशोक जैन समेत लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों से आए बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने बैंड-बाजे की धुनों, मंगलाचार और गगनभेदी जयकारों के बीच आचार्य की अगवानी की।</p>
<p style="text-align:justify;">काकोरी जैन मंदिर में आयोजित प्रथम प्रवचन सभा में राष्ट्रसंत आचार्य विशुद्ध सागर ने गूढ़ आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख दी। उन्होंने कहा कि राग को भूलने की आवश्यकता है, यह छूटता नहीं बल्कि बदला जा सकता है। पूजा करने से राग छूटता नहीं, उसका मार्ग बदल जाता है। जैसे जल में कमल खिलता है, वैसे ही जो विकारों से दूर रहता है, वही अग्नि पर चल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक शांति पर उन्होंने राजनेताओं को कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि नेता अपनी वाणी पर संयम रखें, तो विश्व में कहीं युद्ध ही न हो। नेताओं के अनाप-शनाप बोलने के कारण ही युद्ध जैसी विभीषिकाएं पैदा होती हैं। आचार्य ने सोमवार को लखनऊ के अलीगंज में हुए दुखद अग्निकांड पर गहरी संवेदना और दुख व्यक्त किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने संकेत दिया कि उनका आगामी चातुर्मास कार्यक्रम बाराबंकी में होगा, जिसकी आधिकारिक घोषणा आगामी 28 जून को की जाएगी। समिति के सदस्य विशाल जैन ने बताया कि लखनऊ के इतिहास में यह पहला दुर्लभ अवसर है कि जब एक साथ लगभग 50 पिच्छिधारी मुनिराजों और आर्यिका माताओं का सानिध्य राजधानीवासियों को मिलने जा रहा है। मुख्य संयोजक बृजेश जैन बंटी ने बताया कि इस 6 दिवसीय महोत्सव के दौरान विश्व शांति महायज्ञ और महामस्तकाभिषेक का आयोजन होगा, जो क्षेत्र में सुख, समृद्धि और शांति का संदेश देगा। उन्होंने बताया कि 24 जून को प्रातः 7 बजे काकोरी जैन मंदिर से कलश यात्रा निकाली जाएगी, जो मंगल गीतों, जयकारों और पुष्पवर्षा के साथ पूरे क्षेत्र को धर्ममय करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस महोत्सव में चर्याशिरोमणि पट्टाचार्य विशुद्ध सागर, पट्टाचार्य-गणाचार्य विराग सागर, सन्मतिरत्न, प्रज्ञाश्रमण, सुबल सागर, उपाध्याय रत्न एवं मेडिटेशन गुरु विहसंत सागर, मुनिश्री विशल्य सागर, और आर्यिका विवक्तश्री माताजी सहित बड़ी संख्या में साधु संत विराजमान रहेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/585592/the-power-of-rural-women-will-increase-yogi-government-released"><span class="t-red">ग्रामीण महिलाओं की बढ़ेगी ताकत: </span>योगी सरकार ने महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के लिए जारी किए 15.73 करोड़ रुपये</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/585595/acharya-vishuddha-sagar-reached-parshvanath-dham</link>
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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 11:23:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मनकामेश्वर मंदिर में धूल फांक रही शिवभभूत बनाने वाली मशीन, बंद हुआ काम</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>मार्कण्डेय पाण्डेय, लखनऊ,अमृत विचार: </strong>अयोध्या के हनुमान गढ़ी के फूलों से सुगंधित धूप, अगरबत्ती बनाई जानी थी तो लखनऊ के मनकामेश्वर मंदिर में चढ़ने वाले फूलों से शिवभभूत का निर्माण किया जाना था। जिसके लिए संयत्र सीएसआईआर-एनबीआरआई ने निशुल्क प्रदान किया था। लेकिन कुछ दिनों तक चलने के बाद यह संयत्र बंद करना पड़ा है। जबकि नियमित रूप से बड़ी तादात में मंदिर से फूल, पत्ते और बेलपत्र आदि निकल रहा है जिसका निस्तारण पूर्व की भांति होने लगा है। पिछले जनवरी माह में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय किसान मेला के दौरान मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों और बेलपत्र से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585585/shivbhabuth-making-machine-gathering-dust-in-mankameshwar-temple-stopped-working"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/muskan-dixit-(63)2.png" alt=""></a><br /><p><strong>मार्कण्डेय पाण्डेय, लखनऊ,अमृत विचार: </strong>अयोध्या के हनुमान गढ़ी के फूलों से सुगंधित धूप, अगरबत्ती बनाई जानी थी तो लखनऊ के मनकामेश्वर मंदिर में चढ़ने वाले फूलों से शिवभभूत का निर्माण किया जाना था। जिसके लिए संयत्र सीएसआईआर-एनबीआरआई ने निशुल्क प्रदान किया था। लेकिन कुछ दिनों तक चलने के बाद यह संयत्र बंद करना पड़ा है। जबकि नियमित रूप से बड़ी तादात में मंदिर से फूल, पत्ते और बेलपत्र आदि निकल रहा है जिसका निस्तारण पूर्व की भांति होने लगा है। पिछले जनवरी माह में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय किसान मेला के दौरान मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों और बेलपत्र से शिवभभूत बनाने की तकनीक का हस्तांतरण किया था।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(63)2.png" alt="MUSKAN DIXIT (63)" width="1280" height="720"></img></p>
<p>जनवरी के अंत में सीएसआईआर की महानिदेशक व केंद्र सरकार के डीएसआईआर की सचिव डॉ. एन. कलैसेल्वी की उपस्थिति में मनकामेश्वर मंदिर को यह संयत्र भेंट किया गया था। मंदिर की ओर से करीब 5-6 लाख रुपए व्यय करके संयत्र को लगाने के लिए स्थान बनाया गया था। साथ ही मंदिर परिसर में ही शिवभभूत की बिक्री के लिए काउंटर भी बनाया गया था। कुछ दिनों तक इस संयत्र ने काम किया और सुगंधित शिवभभूत प्रति पैकेट 10 रुपए में बिक्री की गई। लेकिन अब इसे बंद करना पड़ा है।</p>
<h4><strong>शिवभभूत संयत्र काशी विश्वनाथ में भी है चालू</strong></h4>
<p>मंदिर में चढ़ने वाले पुष्पों से शिवभभूत का निर्माण काशी विश्वनाथ में भी किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में यह लखनऊ के मनकामेश्वर मंदिर में भी स्थापित किया गया था। जो अब बंद पड़ा है।</p>
<h4><strong>संयत्र को चलाने में आ रही कठिनाई</strong></h4>
<p>शिवभभूत निर्माण करने के संयत्र को बिजली और गैस से संचालित किया जाता है। पुष्पों के निस्तारण कर भभूत बनाने की प्रक्रिया में 4 से 5 घंटे का समय लगता है। जिसके लिए रसोई गैस सिलेंडर, बिजली, पानी और कम से कम दो लोगों की आवश्यक्ता होती है। जिसकी लागत और कर्मचारी का वेतन संयत्र से नहीं निकल पा रहा है।</p>
<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(65)2.png" alt="MUSKAN DIXIT - मनकामेश्वर मंदिर लखनऊ में धूल फांकता संयत्र" width="1280" height="720"></img>
मनकामेश्वर मंदिर लखनऊ में धूल फांकता संयत्र

<h4> </h4>
<h4><strong>फ्री में भभूत लेना चाहते हैं लोग</strong></h4>
<p>मंदिर प्रांगण में बने काउंटर पर शिवभभूत की कीमत एक पैकैट महज 10 रुपए निर्धारित है। लेकिन लोग इसे मुफ्त में ही लेना चाहते हैं। जिसके कारण कम बिक्री के कारण लागत निकलने में दिक्कते आ रही हैं।</p>
<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(1)11.png" alt="MUSKAN DIXIT - मनकामेश्वर मंदिर प्रांगण में बनाया गया बिक्री काउंटर" width="1280" height="720"></img>
मनकामेश्वर मंदिर प्रांगण में बनाया गया बिक्री काउंटर

<h4> </h4>
<h4><strong>किसान मेले में इन तकनीकों का हुआ था स्थानांतरण</strong></h4>
<p>-निकोटिन मुक्त सिगरेट तैयार कर रहा है सीएस</p>
<p>-बेलपत्र से एंटी एजिंग फेस क्रीम का निर्माण</p>
<p>-फूलों से सुगंधित इत्र, धूप और अगरबत्ती का निर्माण</p>
<p>-रूम फ्रेशनर तकनीक का हस्तांतरण</p>
<p>-जैव-सक्रिय फफूंदनाशी फॉर्मूलेशन का हस्तांतरण।</p>
<p>-मेघालय बेसिन विकास प्राधिकरण को मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने की तकनीक</p>
<p>हमारा प्रयास है कि शीघ्र ही इसे चालू किया जाए। प्रशिक्षित व्यक्ति ही इसे चला सकते हैं। हमारा प्रयास है कि भक्त यदि इसे निशुल्क प्राप्त करना चाहते हैं तो उसे निशुल्क ही दिया जाए। यदि कोई स्वेच्छा से शुल्क देते हैं तो स्वीकार किया जाएगा।</p>
<p><strong>-महंत दिव्यागिरी जी, मनकामेश्वर मंदिर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 10:45:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> Barabanki News : अंतिम बड़े मंगल पर हनुमान मंदिरों में हुआ सुंदरकांड का पाठ, शहर से गांव तक बंटा भंडारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>बाराबंकी, अमृत विचार।</strong> ज्येष्ठ माह के आठवें एवं अंतिम बड़े मंगल पर भीषण गर्मी और उमस के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था चरम पर रही। सुबह से रात तक हनुमान मंदिरों और घरों में हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का पाठ, पूजा-अर्चना और भोग के कार्यक्रम आयोजित हुए। इसके बाद शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों में जगह-जगह लगे भंडारों में श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">सफेदाबाद, असेनी मोड़, रामनगर तिराहा और धनोखर हनुमान मंदिर सहित विभिन्न स्थानों पर सब्जी-पूड़ी, छोला-चावल, कढ़ी-चावल, हलुआ, बूंदी और शरबत का प्रसाद वितरित किया गया। धनोखर हनुमान मंदिर में विधि-विधान से पूजन-आरती के बाद भक्तों में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585568/barabanki-news--sundarkand-recited-at-hanuman-temples-on-the-final--bada-mangal----bhandara--distributed-from-the-city-to-the-villages"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/cats496.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बाराबंकी, अमृत विचार।</strong> ज्येष्ठ माह के आठवें एवं अंतिम बड़े मंगल पर भीषण गर्मी और उमस के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था चरम पर रही। सुबह से रात तक हनुमान मंदिरों और घरों में हनुमान चालीसा व सुंदरकांड का पाठ, पूजा-अर्चना और भोग के कार्यक्रम आयोजित हुए। इसके बाद शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों में जगह-जगह लगे भंडारों में श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">सफेदाबाद, असेनी मोड़, रामनगर तिराहा और धनोखर हनुमान मंदिर सहित विभिन्न स्थानों पर सब्जी-पूड़ी, छोला-चावल, कढ़ी-चावल, हलुआ, बूंदी और शरबत का प्रसाद वितरित किया गया। धनोखर हनुमान मंदिर में विधि-विधान से पूजन-आरती के बाद भक्तों में प्रसाद बांटा गया। देवा रोड स्थित अमर विला परिसर में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य एवं प्रदेश उपाध्यक्ष पी. मो. पंकज गुप्ता ‘पंकी’ के संयोजन में आयोजित भंडारे में दिनभर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats497.jpg" alt="cats" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">वहीं रामजीत कॉम्प्लेक्स स्थित कल्याणेश्वर मंदिर और अशोक विहार कॉलोनी में पवन सिंह एवं रामवृक्ष यादव पहलवान द्वारा विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें भाजपा जिलाध्यक्ष राम सिंह वर्मा समेत कई जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और स्थानीय नागरिक शामिल हुए। जिलाधिकारी आवास के सामने बिंद्रा स्वीट्स द्वारा आयोजित भंडारा विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यहां छोले-चावल, कढ़ी-चावल, पनीर-चावल, मसाला डोसा, बर्गर, खीर और लस्सी सहित विविध प्रसाद की व्यवस्था की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">भंडारे से पूर्व पतंजलि पीठ के अभिषेक देव जी महाराज ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हनुमान जी का पूजन कराया। आयोजन में बबलू यादव, राजू यादव और उनकी टीम सक्रिय रही। मुख्य अतिथि पूर्व सपा एमएलसी राजेश यादव ने श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया। वहीं ग्रामीण अंचल की बात करें तो रामसनेहीघाट क्षेत्र के भिटरिया स्थित उदय सिंह के प्रतिष्ठान एवं छोटी हनुमानगढ़ी परिसर में आयोजित सुंदरकांड पाठ और भंडारे में हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats498.jpg" alt="cats" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम में नगर पंचायत अध्यक्ष डॉ. ज्ञान प्रकाश यादव, एसडीएम अनुराग सिंह, अधिशासी अधिकारी संतोष कुमार चौधरी, दरियाबाद ईओ शीलू अवस्थी, नायब तहसीलदार उमेश द्विवेदी व मंत्री प्रतिनिधि प्रदीप द्विवेदी सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। ग्राम पूरेचूरई कोटवा स्थित नव निर्मित श्री संकट मोचन हनुमान मंदिर में चौधरी विशाल सिंह के नेतृत्व में प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ, जिसके उपरांत विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">हैदरगढ़ के शीतला माता मंदिर में नगर पंचायत अध्यक्ष आलोक तिवारी द्वारा सुंदरकांड, हवन-पूजन एवं भंडारे का आयोजन किया गया। समाजसेवी सिद्धार्थ अवस्थी, बार एसोसिएशन अध्यक्ष अचल कुमार मिश्रा, वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश बक्स सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। रामनगर क्षेत्र में लोधेश्वर महादेवा मेला मैदान, बुढ़वल चौराहा, अमोली कीरतपुर, सीहामऊ और भवानीगंज सहित कई स्थानों पर भंडारे एवं प्रसाद वितरण कार्यक्रम आयोजित हुए।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats499.jpg" alt="cats" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">वहीं सिरौलीगौसपुर क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर भंडारों का आयोजन कर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। मातन मंदिर बदोसराय में हनुमान जी की पूजा-अर्चना के बाद पूड़ी, सब्जी और बूंदी का प्रसाद बांटा गया। वहीं सीएचसी सिरौलीगौसपुर में मेडिकल ऑफिसर डॉ. देव प्रताप सिंह द्वारा आयोजित भंडारे में विधान परिषद सदस्य अंगद सिंह सहित अनेक लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/cats500.jpg" alt="cats" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">कोटवाधाम में संजीव सिंह टाइगर एवं रामू रावत के आयोजन में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। इसके अलावा मरकामऊ, बदोसराय, सैदनपुर और सिरौली समेत क्षेत्र के कई स्थानों पर भंडारों का आयोजन कर प्रसाद वितरण किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>बाराबंकी</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 19:59:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585554/the-glorious-cultural-tradition-of-ayodhya"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(14)16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सदियों से सनातन का केंद्र रही अयोध्या को नई पहचान सवा सौ साल पहले मिली, जब अंग्रेजी हुकूमत में साल 1902 में अंग्रेजों ने एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया। सभा ने बड़ा दुरूह कार्य किया। अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े स्थलों की खोज शुरू की। अयोध्या और उसके आसपास चार जिलों में फैले तीर्थ स्थलों को खोजा। उन पर प्रस्तर शिलालेख लगवाए। बहुत से ऐसे भी स्थल होंगे, जहां तक सभा की दृष्टि नहीं पहुंची और उन पर प्रस्तर शिला लेख नहीं लग पाए। सभा ने अयोध्या के 148 प्राचीन और ऐतिहासिक स्थलों को चिह्नित किया था। इन्हें अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा के तहत माना जाता है। बताते हैं कि इन स्थलों की खोज के लिए कई धार्मिक ग्रंथों का भी सहारा लिया गया था। ये 148 वह स्थान हैं, जिनकी पहचान आर्ष ग्रंथों में बताई गई है। तीन अन्य ऐसे स्थल तो अब भी हैं, जो उसी काल के हैं, लेकिन इन पर प्रस्तर शिलालेख नहीं लग पाए थे। त्रेतायुग में इन स्थल की महिमा, गरिमा और भव्यता आज से ज्यादा रही है। इन स्थलों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। केंद्र और प्रदेश की सरकार इसके लिए प्रयासरत है। प्रदेश सरकार से त्रेतायुग जैसी अयोध्या बनाने के लिए कार्य चल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">श्रीराम जानकी मंदिर के महंत सत्येंद्र दास वेदांती बताते है कि मुगल काल में जब हिंदुओं की आस्था से जुड़े स्थलों के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद जब अंग्रेजों की सत्ता आई, तो लोगों के प्रयास से तत्कालीन सरकार के प्रशासकों से एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया गया। इसे पुनः जीवित करने का कार्य किया गया। वर्तमान सरकार इन सभी स्थलों का जीर्णोद्धार करा रही है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ऐतिहासिक स्थल</h4>
<p style="text-align:justify;">अयोध्या के सांस्कृतिक सीमा 84 कोसी परिक्रमा के तहत 148 धार्मिक स्थानों को चिह्नित किया गया। इसमें श्रीराम जन्मभूमि के साथ लोमश मुनि, सीताकूप, सुमित्रा भवन, कैकयी भवन, रत्नमंडप, श्रीराम दुर्ग, हनुमानगढ़ी, रामसभा, दंतधावन कुंड, सुग्रीव किला, क्षीरसागर, क्षीरेश्वर नाथ, रुक्मणि कुंड, अंगद टीला, कुबेर टीला, वशिष्ठ कुंड, वामदेव आश्रम, सागर कुंड, गवाक्ष, दधि मुख, दुर्गेश्वर, शतवलि, गंधमादन, ऋषभ, शरभ, पनस, विभीषण मंदिर, विभीषण कुंड, सरमाजी, विघ्नेश, पिंडारक, मत्तगयंद, द्विविद, सप्तसागर, मैन्द, जामवंत किला, केशरी किशोर मंदिर, प्रमोदवन, रामघाट, सुग्रीव कुंड, हनुमान कुंड, स्वर्ण खनि कुंड, यज्ञवेदि, सरयू तिलोदकी संगम, सीताकुंड, अग्नि कुंड, विद्या कुंड, खरजू कुंड, मणि पर्वत, गणेश कुंड, दशरथ कुंड, कौशल्या कुंड, सुमित्रा कुंड, भरत कुंड, दुरर्सर, महाभरसर, बृहस्पति कुंड, धनयक्ष कुंड, उर्वशी कुंड, चुटकी देवी, विष्णु हरि, चक्रतीर्थ, ब्रम्हा कुंड, सुमित्रा घाट, कौशल्या घाट, कैकयी घाट, ऋणमोचन घाट, पापमोचन घाट, सहस्त्र धारा घाट, स्वर्गद्वार, चंद्र हरि, नागेश्वर नाथ, धर्महारि, जानकी घाट, वैतरणी, सूर्यकुंड, नर कुंड, नारायण कुंड, रति कुंड, कुसुमायुध कुंड, दुर्गा कुंड, गिरिजा कुंड, मंत्रेश्वर, सरोवर, शीतलादेवी, निर्मला कुंड, गुप्तार घाट, गुप्तहरि, चक्रहरि, यमस्थल, विघ्नेश्वर महादेव, योगिनी कुंड, शक्र कुंड, बंदी कुंड, मनोरमा, मखस्थान, रामरेखा, श्रृंगीऋषि, वाल्मीकि, विल्वहरिघाट, त्रिपुरारी, पुण्यहरि, राम कुंड, दुग्धेश्वर, भैरव कुंड, तमसा नदी, मांडव्याश्रम, श्रवण आश्रम, पाराशराश्रम, च्यवनाश्रम, गौतमाश्रम, पिशाचमोचन, मानस तीर्थ, गया कुंड, नंदीग्राम, कालिका देवी जटा कुंड, शत्रुघ्न कुंड, अजित कुंड, रमणकाश्रम, घृताची कुंड, सरयू घाघरा संगम, वराह क्षेत्र, जंबूतीर्थ, अगस्त्य, तुंडिलजी, गोकुलातीर्थ श्री कुंड, लक्ष्मी, स्वप्नेश्वरी, कुटिला वरस्रोत संगम, सरयू कुटिला संगम तीर्थ स्थल हैं। वर्तमान में इनमें से कई स्थल तो विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने के कगार पर हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">प्रस्तुति- सत्यप्रकाश, अयोध्या</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 18:17:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्यों वर्जित है सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि झाड़ू के उपयोग और उसके रख-रखाव से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। वास्तु के अनुसार घर की सफाई हमेशा मुख्य द्वार से शुरू करनी चाहिए और धीरे-धीरे घर के अंदरूनी हिस्सों की ओर बढ़ना चाहिए। मान्यता है कि मुख्य द्वार से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, इसलिए वहीं से सफाई आरंभ करना शुभ माना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584858/why-is-sweeping-after-sunset-prohibited"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(2)11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि झाड़ू के उपयोग और उसके रख-रखाव से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। वास्तु के अनुसार घर की सफाई हमेशा मुख्य द्वार से शुरू करनी चाहिए और धीरे-धीरे घर के अंदरूनी हिस्सों की ओर बढ़ना चाहिए। मान्यता है कि मुख्य द्वार से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, इसलिए वहीं से सफाई आरंभ करना शुभ माना जाता है। इसके विपरीत, घर के अंदर से बाहर की ओर झाड़ू लगाने को उचित नहीं माना जाता, क्योंकि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि बाहर चली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">झाड़ू लगाने के लिए सुबह का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त में की गई सफाई घर में शुद्धता और सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। वहीं सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि किसी कारणवश शाम के समय सफाई करनी पड़े, तो उस समय घर का कचरा बाहर नहीं फेंकना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इससे आर्थिक नुकसान और धन संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सफाई के बाद कचरे को लंबे समय तक घर में जमा करके रखना भी शुभ नहीं माना जाता। कचरे को समय पर बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि गंदगी और अव्यवस्था नकारात्मकता को बढ़ावा देती हैं। वास्तु शास्त्र झाड़ू के सम्मान पर भी विशेष बल देता है। झाड़ू को कभी पैर नहीं लगाना चाहिए और न ही उसे खुले स्थान पर खड़ा रखना चाहिए। इसे हमेशा ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां बाहरी लोगों की नजर आसानी से न पड़े। इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि सुरक्षित बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">नई झाड़ू का उपयोग शुरू करने के लिए शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन नई झाड़ू घर में लाने और उसका प्रयोग करने से आर्थिक स्थिरता तथा सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। हालांकि ये मान्यताएं धार्मिक और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित हैं, फिर भी इनका मूल उद्देश्य घर में स्वच्छता, अनुशासन और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना है, जो किसी भी परिवार के सुखी जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 12:00:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरक कथा :  विषयों में दुर्गंध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।</p>
<p style="text-align:justify;">घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584857/inspirational-story--the-stink-in-the-subjects"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(1)10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।</p>
<p style="text-align:justify;">घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच गए और वहा एक पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए। पास के घरों में चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था, तो कहीं नया चमड़ा सिद्ध किया जा रहा था। हर घर में चमड़ा था और उसमें से बडी दुर्गंध आ रही थी। वायु प्रवाह भी उधर ही था। दुर्गंध के मारे राजा की नाक फटने लगी। </p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने महात्माजी से कहा, “भगवन! दुर्गंध के कारण खड़ा नहीं रहा जाता, कृपया यहां से चलें।” महात्माजी बोले, “तुम्हीं को दुर्गंध आती है? देखो आसपास के घरों की ओर, कितने पुरुष, स्त्रियां और बाल-बच्चे हैं। कोई कार्य कर रहें हैं, कोई खा-पी रहे हैं, सब हंस-खेल रहे हैं। किसी को तो दुर्गंध नहीं आती, मात्र तुम्हीं को दुर्गंध आ रही है।” राजा ने कहा, “भगवन! चमड़े से कमाते-कमाते तथा चमड़े में रहते-रहते इनका अभ्यास हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनकी नाक ही ऐसी हो गई है कि इन्हें चमड़े की दुर्गंध नहीं आती, परंतु मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हूं। अतः शीघ्र चलें, अब तो एक क्षण भी यहां नहीं ठहरा जाता।” महात्मा ने हंसकर कहा, “राजन, यही दशा तुम्हारे राज प्रासाद की भी है। विषय भोगों में रहते-रहते तुम्हें उनमें दुर्गंध नहीं आती है, तुम्हें अभ्यास हो गया है, परंतु मुझको तो ये सांसारिक विषय भोग देखते ही उल्टी-सी आती है। इसी से मैं तुम्हारे घर नहीं जाता था।” राजा ने रहस्य समझ लिया था, जो महात्मा हंसकर राजा को साथ लिए वहां से चल दिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />प्रमोद श्रीवास्तव</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:00:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्योतिष शास्त्रोक्त विज्ञान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सनातन काल से ही मनुष्य को अपने भविष्य को पूर्व में ही जान लेने की इच्छा रही है। व्यक्ति किसी भी स्तर का हो कितना ही ज्ञानी अथवा पढ़ा लिखा हो डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस हो किसी भी धर्म का हो, जब उसे पता लगता है कि सामने बैठा व्यक्ति ज्योतिष का जानकार है। वह अपने भविष्य जानने की जिज्ञासा कर बैठता है। अथवा अपना हाथ आगे बढ़ा कर पूछता है कि मेरे बारे में कुछ बताइए। कुछ लोग ज्योतिष में अविश्वास भी करते हैं। विचारणीय विषय यह है कि यदि ज्योतिष में कुछ सत्यता नहीं होती, तो इस विद्या का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584856/astrology--the-science-of-yoga"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सनातन काल से ही मनुष्य को अपने भविष्य को पूर्व में ही जान लेने की इच्छा रही है। व्यक्ति किसी भी स्तर का हो कितना ही ज्ञानी अथवा पढ़ा लिखा हो डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस हो किसी भी धर्म का हो, जब उसे पता लगता है कि सामने बैठा व्यक्ति ज्योतिष का जानकार है। वह अपने भविष्य जानने की जिज्ञासा कर बैठता है। अथवा अपना हाथ आगे बढ़ा कर पूछता है कि मेरे बारे में कुछ बताइए। कुछ लोग ज्योतिष में अविश्वास भी करते हैं। विचारणीय विषय यह है कि यदि ज्योतिष में कुछ सत्यता नहीं होती, तो इस विद्या का इतना प्रसार नहीं होता। आज कोई गांव, नगर ऐसा नहीं होगा जहां थोड़ा बहुत ज्योतिष जानने वाला न हो। जन्मपत्री बनाने वाले पंडित जी तो हर मंदिर में मिल जाएंगे। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि ज्योतिष का प्रभाव बढ़ रहा है।</p><p style="text-align:justify;">हर घर के कंप्यूटर में कुंडली बनाने वाला सॉफ्टवेयर होता ही है, जो कुंडली बनाने व देखने में सक्षम हैं, लोगों की रूचि इस विद्या के अध्ययन में बढ़ रही है। विदेशों में भी इसका प्रसार खूब हो रहा है। अब तो विद्यालयों में भी इस विद्या को पढ़ाया जा रहा है, जिस प्रकार ब्रह्मांड के एक भाग में पृथ्वी और तीन भाग में जल है, उसी प्रकार हमारा शरीर भी एक सूक्ष्म ब्रह्मांड है और इसमें भी एक भाग में मांस एवं तीन भाग में जल है। </p><p style="text-align:justify;">जिस प्रकार ब्रह्मांड में सारे ग्रह विचरण करते हैं, उसी प्रकार इन ग्रहों का अंश हमारे षरीर के विभिन्न भागों में विचरण करता है और ब्रह्मांड के ग्रहों से प्रभावित होता है। हमारे शरीर में ग्रहों की स्थिति, उसका आकार हमारे जन्म के समय ही तय हो जाता है और वही जन्मकुंडली में अंश के साथ में प्रतिपादित होता है। ग्रहों के साथ-साथ शरीर में नक्षत्रों का भी स्थान होता है और समय-समय पर जीवनभर ब्रह्मांड के नक्षत्रों से प्रभावित होता है।</p><p style="text-align:justify;">इसी प्रकार राशियों का भी गुण-धर्म होता है। प्राणियों में रोग भी इन्हीं ग्रहों के कारण होते हैं और इन्हीं से उपचार भी संभव है। सभी ग्रह विभिन्न राशियों में विचरण करते रहते हैं और समय-समय पर हमारे अंदर स्थित ग्रहों को प्रभावित करते रहते हैं, जिससे जीवन में उतार चढ़ाव आते है। ज्योतिष शास्त्र एक वैज्ञानिक तथ्य है और उन्हें झूठलाया नहीं जा सकता। ज्योतिष के दो भाग होते हैं, एक गणित, दूसरा फलित।</p><p style="text-align:justify;">विविध राशियां भी प्रभाव डालती हैं और इन राशियों का हमारे शरीर पर प्रभाव पड़ता है। इस विद्या को प्राचीन समय में ऋ षियों मुनियों ने उच्चतम स्तर तक और आज आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से और उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। ज्योतिष का यह भाग है एक प्रकार दूसरा फलित।</p><p style="text-align:justify;">गणित पूर्णत्या एक सिद्ध विज्ञान है, जिसे सनातन काल से भारत जानता है और इसी के बल पर हजारों वर्ष पहले के और बाद के ग्रह नक्षत्रों की स्थिति को बताया जा सकता है, जो कि ज्योतिष का आधार है और जो पुरातन ग्रंथों में वर्णित है। ज्योतिष सीखने से पहले गणित ही सिखाया जाता था। आजकल तो ज्योतिषियों को इसकी भी जरूरत नहीं पड़ती, कंप्यूटर ने उनका यह काम बहुत आसान कर दिया है। बटन दबाते ही कोई भी कुंडली प्राप्त की जा सकती है। इसकी गणित में दोष की संभावनाएं बहुत कम ही देखी गई है।</p><p style="text-align:justify;">अब बात करते हैं फलित की, जिस प्रकार कोई मात्र डॉक्टर की डिग्री लेकर इलाज नहीं कर सकता, उसी प्रकार कोई व्यक्ति मात्र कुंडली बनाकर फलादेश नहीं बता सकता है। जिस प्रकार डॉक्टर व इंजीनियर को अपना कार्य करने के लिए अनुभव की आवश्यकता है। उसी प्रकार फलित बताने के लिए भी ज्योतिषी को अनुभव, गुरु एवं ईष्ट की आवश्यकता होती है।</p><p style="text-align:justify;">कंप्यूटर द्वारा बताए गए फलित को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है, फलित ज्योतिष में ग्रहों का फल बताने के लिए ग्रह स्पष्ट, भाव ग्रहों की स्थिति आदि जानकर फल बताया जाता है। इसके अतिरिक्त गुण-धर्म, दृष्टि आदि अनेक बातों को भी ध्यान में रखा जाता है। ग्रहों की स्थिति आदि से बनने वाले विभिन्न योगों पर ध्यान देकर, देश-काल अवस्था का ध्यान रखते हुए फल बताना चाहिए।</p><p style="text-align:justify;">जिस प्रकार कभी किसी डॉक्टर से इलाज कराने पर लाभ नहीं होता, उसी प्रकार फलादेश भी कई बार साफ नहीं निकलते हैं। डॉक्टर के इलाज से लाभ न होने पर, जिस प्रकार विज्ञान गलत नहीं होता, उसी प्रकार फलादेश सत्य न होने पर ज्योतिष शास्त्र को गलत बता देना ठीक नहीं है। इसका कारण ज्योतिषी ज्ञान और अनुभव अलग फल परिस्थितियों एवं ग्रहों का पूर्ण विचार का अभाव भी होता है। ज्योतिष ज्ञान केवल अनुभव व ईष्ट सिद्धि से ही बढ़ता है।<br />भाग्य उसी का साथ देता है, जो पुरुषार्थ करता है</p><p style="text-align:justify;">ज्योतिष शास्त्र केवल संकेत मात्र है। अब यह भविष्य वक्ता के अनुभव पर निर्भर करता है कि देश, काल, अवस्था के अनुसार वह संकेतों से कैसा फलादेश कहता है। ज्योतिष यह तो बता सकता है कि अमुक प्राणी शिक्षा प्राप्त करेगा या उच्च शिक्षा प्राप्त करेगा, परंतु यह नहीं बता सकता कि बीए पास करेगा या एमए। हां यह संकेत अवश्य मिल जाएगा कि तकनीकी ज्ञान प्राप्त करेगा या अन्य यह ज्योतिषी को अपनी बुद्धि से विचारना पड़ता है कि असल बात क्या हो सकती है? अगर धुआं हो, तो क्या यह अग्नि है अथवा भाप या कोहरा। सूक्ष्म अंतर्ज्ञान एवं दृष्टि ही किसी ज्योतिषी को सफल भविष्य वक्ता बना सकती है। ज्योतिषी को यह सूक्ष्म अंतर्ज्ञान एकाग्र-चिंतन एवं शांतिपूर्वक संकेतों पर मनन करने से प्राप्त होता है। इसके लिए ज्ञान, धर्मनिष्ठा एवं ईश्वर में पूर्ण विश्वास होना जरूरी होता है, जो इच्छा शक्ति को प्रबल बनाता है और निश्चय पूर्वक विचारने की एवं फलित कहने की शक्ति प्रदान करता है। यह शंका भ्रमित करने वाली एवं निर्मूल है कि जब ऐसा फल होना ही है, तो क्यों कोशिश की जाए? ध्यान रहे कि बिना पुरुषार्थ किए देव भी फल नहीं देते हैं। पूर्व जन्म में किए गए कार्यों को देव/भाग्य कहा जाता है। इस जन्म में किए गए कार्यों को पुरुषार्थ। शरीर रूपी गाड़ी को चलाने के लिए देव एवं पुरुषार्थ दो पहिए हैं। भाग्य उसी का साथ देता है, जो पुरुषार्थ करता है।</p><p style="text-align:justify;">नाकारा का भाग्य भी रुक जाता है। आपके पूर्व संचित कर्म बैंक में जमा राशि की तरह हैं, जिन्हें आप पुरुषार्थ के द्वारा खर्च कर सकते हैं, जो भी कर्म आपने पूर्व जन्म में किए हैं, उनका फल कर्मानुसार इस जन्म में प्राप्त होता है। यह फल ग्रहों की स्थिति विचारने से दृष्टि गोचर होता है। जब कुंडली में बुरे समय का ज्ञान हो, तो समझ लो कि पूर्व जन्म के बुरे कर्म उदय हो रहे हैं। इसका निवारण जप और धैर्य द्वारा किया जा सकता है और जब कुंडली में शुभ समय का ज्ञान हो, तो शुभ कार्य करने के कार्य में सफलता प्राप्त होती है। विदेशों में भविष्य वक्ताओं की बहुत पूछ है, क्योंकि ज्योतिषियों ने अमेरिका में सन् 61 में 12 भविष्यवाणियां की, जिनमें से कई सत्य साबित हो चुकी हैं। जॉन कैनेडी के बारे में 6 मास पूर्व ही बता दिया गया था कि वह राष्ट्रपति बनेंगे। इंग्लैंड की लेडी गाडमैन की भविष्यवाणियां जग प्रसिद्ध हैं और उनके नाम पर वहां ज्योतिष का रिसर्च इंस्टीटयूट भी है। आजकल तो यह धनोपार्जन का भी एक अच्छा साधन बन गया है।<br /></p><h4 style="text-align:justify;">अशोक सूरी, आध्यात्मिक लेखक</h4>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 13:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विदेशों में है बिहार योग पद्धति की धूम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अपनी अंतरात्मा में स्वयं को अनुभव करने से बड़ा कोई सुख नहीं है। सदियों से योग मनुष्य के भीतर शांति, संतुलन और आत्मबोध जागृत करने का माध्यम रहा है। आज जब मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और भौतिक संसाधनों में मानसिक शांति खोजने का प्रयास कर रहा है, तब योग का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। बीसवीं सदी में योग को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने वाले जिन महापुरुषों का नाम सर्वाधिक सम्मान से लिया जाता है, उनमें परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।- कुमार कृष्णन, वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र </p>
<h4 style="text-align:justify;">वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र</h4>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584855/the-bihar-school-of-yoga-method-is-making-waves-abroad"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design1.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अपनी अंतरात्मा में स्वयं को अनुभव करने से बड़ा कोई सुख नहीं है। सदियों से योग मनुष्य के भीतर शांति, संतुलन और आत्मबोध जागृत करने का माध्यम रहा है। आज जब मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और भौतिक संसाधनों में मानसिक शांति खोजने का प्रयास कर रहा है, तब योग का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। बीसवीं सदी में योग को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने वाले जिन महापुरुषों का नाम सर्वाधिक सम्मान से लिया जाता है, उनमें परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।- कुमार कृष्णन, वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र </p>
<h4 style="text-align:justify;">वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र</h4>
<p style="text-align:justify;">योगी, आध्यात्मिक गुरु, चिकित्सक तथा वेदांत के प्रकांड विद्वान स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग को आश्रमों और साधकों की सीमाओं से निकालकर सामान्य जनजीवन तक पहुंचाया। वर्ष 1963 में मुंगेर में स्थापित बिहार योग विद्यालय उनके इसी दूरदर्शी प्रयास का परिणाम था। यह संस्थान आगे चलकर वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र बना और आज भी विश्वभर में योग के प्रामाणिक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। स्वामी सत्यानंद के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं, “स्वामी सत्यानंद ने योग को नया जीवन और नया जन्म दिया। उन्होंने योग का पुनरुद्धार किया, अन्यथा यह धीरे-धीरे लुप्त हो गया होता। इसलिए वे आधुनिक युग के पतंजलि हैं।” स्वामी सत्यानंद ने अपने गुरु स्वामी शिवानंद द्वारा प्रतिपादित ‘संश्लेषण योग’ की अवधारणा को आधार बनाकर वेदांत, योग और तंत्र के व्यावहारिक पहलुओं का समन्वय किया। इसी से बिहार योग अथवा सत्यानंद योग प्रणाली का विकास हुआ। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें योग की विभिन्न शाखाओं को एक समग्र और व्यवस्थित पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस योग प्रणाली की नींव हठ योग, राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग पर आधारित है, जो क्रमशः शरीर, मन, बुद्धि, भावनाओं और कर्मक्षमता का विकास करते हैं। इसके अतिरिक्त मंत्र योग, नाद योग, क्रिया योग, कुंडलिनी योग तथा लय योग जैसी अनेक शाखाओं को भी इसमें समाहित किया गया है। इस प्रकार साधक का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पतंजलि के योगसूत्रों की आधुनिक व्याख्या</h4>
<p style="text-align:justify;">स्वामी सत्यानंद सरस्वती की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने प्राचीन योग और तांत्रिक परंपराओं में सुरक्षित अनेक दुर्लभ एवं गूढ़ साधनाओं को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने अभ्यासों के क्रम, स्तर और प्रगतिशील अवस्थाओं को स्पष्ट करते हुए उन्हें सरल और सुरक्षित बनाया। परिणामस्वरूप योग पहली बार आम लोगों के लिए व्यावहारिक और सुलभ बन सका। उन्होंने यह अनुभव किया कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच सरल, किंतु नियमित अभ्यास ही लोगों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। इसी दृष्टिकोण ने योग को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वामी सत्यानंद ने ऋ षि पतंजलि के योगसूत्रों की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत की और योग को केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं, बल्कि जीवन-विकास के विज्ञान के रूप में स्थापित किया। उन्होंने योग पर छाए रहस्यवाद के आवरण को हटाकर इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया। 1970 के दशक में उन्होंने योग के प्रभावों पर वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक शोध परियोजनाएं प्रारंभ हुईं, जिनसे यह समझ विकसित हुई कि योग शरीर, मन और भावनाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है तथा मनुष्य की सुप्त क्षमताओं को कैसे जागृत कर सकता है। इन अध्ययनों ने यह भी स्पष्ट किया कि योग केवल स्वास्थ्य संवर्धन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने वाला विज्ञान है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मानव चेतना के विकास का माध्यम</h4>
<p style="text-align:justify;">अस्थमा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर तथा गर्भावस्था जैसी अनेक परिस्थितियों में योग के चिकित्सीय उपयोगों पर किए गए अध्ययनों ने चिकित्सा जगत का ध्यान आकर्षित किया। यही कारण है कि आज विश्व के अनेक अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में योग को सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। स्वामी सत्यानंद की सबसे महत्वपूर्ण देनों में से एक है ‘योग निद्रा’। तंत्रशास्त्र की प्राचीन न्यास पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित कर उन्होंने योग निद्रा का स्वरूप प्रदान किया। आज यह तकनीक तनाव, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप तथा गंभीर रोगों के उपचार में सहायक सिद्ध हो रही है। आधुनिक शोधों से भी प्रमाणित हुआ है कि योग निद्रा मस्तिष्क की तरंगों को संतुलित कर मानसिक एवं भावनात्मक तनाव को कम करती है। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार, “योग निद्रा आज विश्वभर में प्रचलित अभ्यास बन चुकी है। अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्री भी इसका अभ्यास कर रहे हैं। जैसे घर की सफाई प्रतिदिन आवश्यक है, वैसे ही मन की सफाई भी जरूरी है और योग निद्रा इसमें अत्यंत सहायक है।” इसी प्रकार स्वामी सत्यानंद ने पवनमुक्तासन श्रृंखला का विकास किया, जिसने योग को चिकित्सा और फिजियोथेरेपी के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई। गठिया, जोड़ों के दर्द और पाचन संबंधी विकारों में इन अभ्यासों के उल्लेखनीय लाभ देखे गए हैं। उनके प्रयासों का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने योग को मानव चेतना के विकास का माध्यम माना और इसे समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का कार्य किया। अमेरिका, स्वीडन और भारत सहित कई देशों में कैदियों और बंदियों के पुनर्वास कार्यक्रमों में भी बिहार योग पद्धति का सफल उपयोग किया गया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">56 से अधिक देशों में प्रचलित योग परंपरा</h4>
<p style="text-align:justify;">आज बिहार योग या सत्यानंद योग परंपरा विश्व के 56 से अधिक देशों में प्रचलित है। विशेष रूप से फ्रांस में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। वहां के विद्यालयों, महाविद्यालयों और यहां तक कि किंडरगार्टन स्तर पर भी बिहार योग की शिक्षाएं अपनाई जा रही हैं। मुंगेर से प्रशिक्षित योग शिक्षक बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लगभग छह दशकों तक स्वामी सत्यानंद ने योग की ऐसी समग्र प्रणाली विकसित की, जो शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन को एक साथ विकसित करती है। बाह्य योग के रूप में हठ योग, राज योग और क्रिया योग का प्रशिक्षण दिया जाता है, जबकि आश्रम जीवन की प्रेरणा से कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग के आंतरिक पक्षों का विकास होता है। यह समन्वित संरचना साधक को मस्तिष्क, हृदय और कर्म—तीनों स्तरों पर संतुलित बनाती है। यही योग का वास्तविक उद्देश्य है, जहां व्यक्ति अपने भीतर सामंजस्य स्थापित कर जीवन की उच्चतर संभावनाओं को साकार कर सके।</p>
<h4 style="text-align:justify;">संतुलित जीवनशैली का विज्ञान</h4>
<p style="text-align:justify;">स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पुस्तक ‘आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध’ आज भी विश्वभर के अनेक योग संस्थानों में मानक पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है। इसका अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है और यह योग साधकों के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका मानी जाती है। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने योग को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया है। उनकी पुस्तक ‘धारणा दर्शन’ में तंत्र और उपनिषदों से संकलित अनेक एकाग्रता अभ्यासों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने ‘योग कैप्सूल’ की अवधारणा भी विकसित की, जिसमें 10 से 20 मिनट में किए जाने वाले सरल अभ्यासों को सम्मिलित किया गया है। इनका उद्देश्य आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी लोगों को योग से जोड़ना है। स्वामी निरंजनानंद का स्पष्ट मत है कि योग को केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह मानसिक एकाग्रता, भावनात्मक स्थिरता और संतुलित जीवनशैली का विज्ञान है। उनका मानना है कि योग के बढ़ते व्यावसायीकरण के बीच उसके मूल उद्देश्य और आध्यात्मिक सार को संरक्षित रखना आवश्यक है। सत्यानंद योग परंपरा ने विश्व को योग के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया है। यह केवल योग और आध्यात्मिक अनुभवों की व्याख्या नहीं करती, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने की कला भी सिखाती है। आज परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ‘भारत योग यात्रा’ के माध्यम से इसी योग प्रसाद को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। वास्तव में स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने प्राचीन योग विज्ञान को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप रूपांतरित कर मानवता को एक अमूल्य विरासत प्रदान की है। योग के वैश्विक विस्तार और उसके वैज्ञानिक स्वरूप की स्थापना में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 10:34:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Kainchi Dham Foundation Day : कैंची धाम दर्शन के लिए शटल सेवा शुरू, 15 जून को स्थापना दिवस पर उमड़ेगा भक्तों का जनसमूह </title>
                                    <description><![CDATA[कैंची धाम में कल-सोमवार को स्थापना दिवस पर भव्य मेला लगेगा। हर साल की तरफ इस बार भी लाखों भक्त दर्शन करने पहुंचेंगे। पुलिस-प्रशासन ने सुरक्षा से लेकर यातायात व्यवस्था तक का खाका खींच दिया है। श्रद्धालुओं को आश्रम तक ले जाने के लिए शटल सेवा प्रारंभ कर दी गई है। निजी वाहनों से आश्रम तक जाने पर रोक है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584693/kainchi-dham-foundation-day-shuttle-service-started-for-kainchi-dham"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/kainchi-dham-1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>अमृत विचार :</strong> कैंची धाम में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया है। सोमवार-15 जून को स्थापना दिवस है। भव्य आयोजन होगा। श्रद्धालुओं को आश्रम तक पहुंचाने के लिए शटल सेवा भी प्रारंभ हो गई है। रविवार को हल्द्वानी के केमू स्टेशन के पास से बसों का शुभारंभ किया गया। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को यहां से बसों के जरिये आश्रम तक ले जाया जाएगा। </p>
<p><a href="https://www.amritvichar.com/article/584622/kainchi-dham-foundation-day-security-ring-has-been-set-up-for-the-kainchi-dham-fair-by-nainital-police#gsc.tab=0"><strong>कैंची धाम के स्थापना दिवस</strong></a> पर श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का अनूठा संगम दिखेगा। लाखों भक्त आश्रम पर दर्शन देने उमड़ेंगे। पुलिस-प्रशासन ने यहां सुरक्षा व्यवस्था से लेकर ट्रैफिक का फुलप्रूफ प्लान तैयार किया गया है। </p>
<p>कैंची धाम आश्रम तक जाने के लिए निजी वाहनों पर पूरी तरह से रोक है। शटल सेवा-बसों के जरिये ही भक्त कैंची धाम जाएंगे। व्यापक रूट डायवर्जन से लेकर पार्किंग तक की व्यवस्था बनाई गई है। </p>
<h4><strong>यातायात नियमों का पालन करें</strong></h4>
<p>श्रद्धालुओं से भी अपील की गई है कि यातायात व्यवस्था बेहतर बनाए रखने का ख्याल रखें। पार्किंग निर्धारित कर दी गई हैं। वहीं अपने वाहन खड़े करें। शटल सेवा का उपयोग करें। </p>
<p>कैंची धाम आश्रम के स्थापना दिवस पर आयोजित मेले में 5 लाख से ज्यादा भक्तों की भीड़ जुटने की संभावना है। पिछले सालों में भी बेशुमार भीड़ होती रही है। इसलिए भीड़ प्रबंधन और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए यहां भारी भरकम पुलिस फोर्स तैनात की गई है। 1100 से ज्यादा पुलिसकर्मी श्रद्धालुओं की सुरक्षा, ट्रैफिक और राहत बचाव में सक्रिय रहेंगे। </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>पॉजिटिव स्टोरीज</category>
                                            <category>उत्तराखंड</category>
                                            <category>नैनीताल</category>
                                            <category>हल्द्वानी</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 14 Jun 2026 10:27:54 +0530</pubDate>
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