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                <title>Space Mission - Amrit Vichar</title>
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                <description>Space Mission RSS Feed</description>
                
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                <title>आर्टेमिस 2 मिशन :  हम चले चांद की ओर</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">नासा ने बीते कल आर्टेमिस 2 मिशन की सफलतापूर्वक लॉन्चिंग कर दी। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से भारतीय समयानुसार सुबह 3:54 बजे विशाल एसएलएस रॉकेट ने आसमान में उड़ान भरी। यह 54 साल बाद इंसानों को चांद की ओर ले जाने वाला पहला मानव मिशन है। लॉन्च पूरी तरह सफल रहा और चारों अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित रूप से पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गए हैं। इस मिशन में चार सदस्यीय क्रू शामिल है</p>
<h5 style="text-align:justify;">रीड वाइसमैन (मिशन कमांडर)</h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>विक्टर ग्लोवर (पायलट) - चांद के पास जाने वाले पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री</strong><br /><strong>क्रिस्टीना कोच (मिशन स्पेशलिस्ट) - चांद मिशन पर जाने</strong></p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577354/artemis-ii-mission--we-re-heading-to-the-moon"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(1)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नासा ने बीते कल आर्टेमिस 2 मिशन की सफलतापूर्वक लॉन्चिंग कर दी। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से भारतीय समयानुसार सुबह 3:54 बजे विशाल एसएलएस रॉकेट ने आसमान में उड़ान भरी। यह 54 साल बाद इंसानों को चांद की ओर ले जाने वाला पहला मानव मिशन है। लॉन्च पूरी तरह सफल रहा और चारों अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित रूप से पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गए हैं। इस मिशन में चार सदस्यीय क्रू शामिल है</p>
<h5 style="text-align:justify;">रीड वाइसमैन (मिशन कमांडर)</h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>विक्टर ग्लोवर (पायलट) - चांद के पास जाने वाले पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री</strong><br /><strong>क्रिस्टीना कोच (मिशन स्पेशलिस्ट) - चांद मिशन पर जाने वाली पहली महिला</strong><br /><strong>जेरेमी हैनसेन (मिशन स्पेशलिस्ट)- चांद के पास जाने वाले पहले कनाडाई अंतरिक्ष यात्री</strong></p>
<p style="text-align:justify;">ये चारों अब ओरियन कैप्सूल में बैठकर चांद की ओर बढ़ रहे हैं। आर्टेमिस 2 लैंडिंग मिशन नहीं है। यह 10 दिन का परीक्षण मिशन है। क्रू चांद के बहुत करीब- लगभग 9600 किलोमीटर तक जाएगा। वे चांद के चारों ओर घूमेंगे और फिर पृथ्वी पर वापस आएंगे। इस दौरान ओरियॉन कैप्सूल की गहरे अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता, जीवन रक्षा प्रणाली, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और हीट शील्ड की पूरी जांच की जाएगी। वापसी के समय ओरियॉन 40 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह लॉन्च इसलिए ऐतिहासिक है, क्योंकि अपोलो 17 के बाद पहली बार इंसान चांद के इतने करीब जा रहे हैं। यह मिशन आर्टेमिस कार्यक्रम की असली शुरुआत है। इसकी सफलता के बाद नासा आर्टेमिस 3 में चांद पर इंसानों को उतारेगा और आगे चलकर चांद पर स्थायी बेस बनाने की तैयारी करेगा। यह मिशन भविष्य में मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशनों की भी नींव रखेगा, साथ ही यह युवा पीढ़ी को अंतरिक्ष विज्ञान की ओर आकर्षित करेगा। 16 नवंबर सन् 2022 को आर्टेमिस-1 के प्रक्षेपण के साथ इस मिशन की शुरुआत हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब क्रू कई दिनों तक चांद की ओर बढ़ता रहेगा। वे चांद के पीछे वाले हिस्से से भी गुजरेंगे, जहां पृथ्वी से रेडियो संपर्क कुछ समय के लिए टूट जाएगा। इस दौरान कई वैज्ञानिक प्रयोग किए जाएंगे। लगभग 10 दिन बाद ओरियॉन कैप्सूल प्रशान्त महासागर में पैराशूट की मदद से उतरेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">नासा की आर्टेमिस 2 मिशन की सफल लॉन्चिंग अंतरिक्ष इतिहास का एक बड़ा पल है। 54 साल बाद इंसान फिर चांद की यात्रा पर निकले हैं। यह मिशन न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी मानवता के लिए नई उम्मीद और नई संभावनाएं लेकर आया है।-डॉ. राजीव अग्रवाल</p>]]>
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                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:28:08 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anjali Singh]]>
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                <title>वाइल्ड लाइफ:  मकाऊ: वर्षावनों का रंगीन और बुद्धिमान प्रहरी</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">मकाऊ तोते प्रकृति के सबसे आकर्षक और रंगीन पक्षियों में गिने जाते हैं। बड़े आकार, चमकीले रंगों और लंबी, खूबसूरत पूंछ के कारण ये तुरंत ध्यान खींच लेते हैं। तोते परिवार के अन्य पक्षियों से इन्हें अलग पहचान देने वाली एक खास विशेषता इनके चेहरे का वह हिस्सा है, जहां पंख नहीं होते। यह बिना पंखों वाला भाग हर प्रजाति में अलग-अलग आकार और पैटर्न में दिखाई देता है, जिससे उनकी पहचान और भी विशिष्ट हो जाती है। मकाऊ का आकार भी काफी विविध होता है। सबसे छोटे हैन मकाऊ की लंबाई लगभग 30 सेंटीमीटर (करीब 12 इंच) होती है,</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574781/wildlife--the-macaw%E2%80%94the-colorful-and-intelligent-sentinel-of-the-rainforests"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(2)6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मकाऊ तोते प्रकृति के सबसे आकर्षक और रंगीन पक्षियों में गिने जाते हैं। बड़े आकार, चमकीले रंगों और लंबी, खूबसूरत पूंछ के कारण ये तुरंत ध्यान खींच लेते हैं। तोते परिवार के अन्य पक्षियों से इन्हें अलग पहचान देने वाली एक खास विशेषता इनके चेहरे का वह हिस्सा है, जहां पंख नहीं होते। यह बिना पंखों वाला भाग हर प्रजाति में अलग-अलग आकार और पैटर्न में दिखाई देता है, जिससे उनकी पहचान और भी विशिष्ट हो जाती है। मकाऊ का आकार भी काफी विविध होता है। सबसे छोटे हैन मकाऊ की लंबाई लगभग 30 सेंटीमीटर (करीब 12 इंच) होती है, जबकि हायसिंथ मकाऊ दुनिया के सबसे बड़े तोतों में गिना जाता है और इसकी लंबाई लगभग 102 सेंटीमीटर (करीब 40 इंच) तक पहुंच सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस विशालकाय मकाऊ का वजन लगभग 1550 से 1600 ग्राम तक होता है। अपने आकर्षक रूप और प्रभावशाली आकार के कारण यह पक्षी प्रकृति प्रेमियों के बीच विशेष लोकप्रिय है। भोजन की बात करें तो अधिकांश मकाऊ मुख्य रूप से बीज, मेवे और फलों पर निर्भर रहते हैं। उनकी मजबूत और शक्तिशाली चोंच उन्हें कठोर खोल वाले खाद्य पदार्थों को भी आसानी से तोड़ने में सक्षम बनाती है। ब्राजील नट्स जैसे सख्त छिलके वाले मेवे भी उनके लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं होते। यही वजह है कि मकाऊ की चोंच को प्रकृति की अद्भुत रचनाओं में से एक माना जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रजनन के समय मादा मकाऊ आमतौर पर एक से तीन अंडे देती है। अंडों से बच्चे निकलने में लगभग 26 से 29 दिन का समय लगता है, हालांकि यह अवधि प्रजाति के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है। रोचक बात यह है कि नर और मादा दोनों मिलकर अपने अंडों और चूजों की रक्षा करते हैं। वे अपने घोंसले आमतौर पर ऊंचे पेड़ों के खोखलों या चट्टानों की दरारों में बनाते हैं, जहां उनके बच्चों को सुरक्षित वातावरण मिल सके। मकाऊ सामाजिक और अत्यंत संवेदनशील पक्षी होते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्षावन इनके प्रमुख निवास स्थान हैं, हालांकि कुछ प्रजातियां अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रों में भी पाई जाती हैं। जंगली इलाकों में मकाऊ अक्सर मिट्टी के ऊंचे ढेरों या पहाड़ियों पर इकट्ठा होते हैं, जिन्हें ‘मकाऊ लिक्स’ कहा जाता है। यहां वे झुंड बनाकर मिट्टी खाते हैं, जो उनके पाचन तंत्र के लिए लाभकारी मानी जाती है। इन पक्षियों की बुद्धिमत्ता भी उल्लेखनीय है। मकाऊ चंचल और जिज्ञासु होते हैं तथा वे मनुष्यों की आवाजों की नकल करने में भी सक्षम होते हैं। उड़ान में भी ये कम नहीं, ये लगभग 56 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ सकते हैं। </p>]]>
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                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 09:02:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Anjali Singh]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Pi Day 2026: गूगल के रंगीन डूडल ने मचाया धमाल, 14 मार्च को क्यों मनाते हैं यह गणितीय उत्सव? जानिए π के अनंत रहस्य</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p><strong>लखनऊः </strong>हर साल 14 मार्च को दुनिया भर में पाइ डे (Pi Day) के रूप में गणित के सबसे प्रसिद्ध स्थिरांक π (पाइ) का जश्न मनाया जाता है। इस साल 2026 में भी गूगल ने एक खास इंटरैक्टिव और रंग-बिरंगा डूडल जारी किया, जो आर्किमिडीज की प्राचीन विधि को याद दिलाता है। वृत्त (circle) के अंदर-बाहर बहुभुज बनाकर π के मान का अनुमान लगाने की उस ऐतिहासिक तकनीक को!</p>
<h3><strong>गूगल डूडल का खास संदेश  </strong></h3>
<p>गूगल के इस डूडल में π की मूल ज्यामिति (geometry) को हाइलाइट किया गया है, जो बताता है कि कैसे ग्रीक गणितज्ञ आर्किमिडीज ने सदियों पहले</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574931/pi-day-2026--google-s-colorful-doodle-creates-a-buzz--why-is-this-mathematical-festival-celebrated-on-march-14--learn-the-infinite-mysteries-of-%CF%80"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/muskan-dixit-(18)5.png" alt=""></a><br /><p><strong>लखनऊः </strong>हर साल 14 मार्च को दुनिया भर में पाइ डे (Pi Day) के रूप में गणित के सबसे प्रसिद्ध स्थिरांक π (पाइ) का जश्न मनाया जाता है। इस साल 2026 में भी गूगल ने एक खास इंटरैक्टिव और रंग-बिरंगा डूडल जारी किया, जो आर्किमिडीज की प्राचीन विधि को याद दिलाता है। वृत्त (circle) के अंदर-बाहर बहुभुज बनाकर π के मान का अनुमान लगाने की उस ऐतिहासिक तकनीक को!</p>
<h3><strong>गूगल डूडल का खास संदेश  </strong></h3>
<p>गूगल के इस डूडल में π की मूल ज्यामिति (geometry) को हाइलाइट किया गया है, जो बताता है कि कैसे ग्रीक गणितज्ञ आर्किमिडीज ने सदियों पहले वृत्त को बहुभुजों से घेरकर इसके मान को काफी सटीकता से निकाला था। डूडल में कहा गया है कि आज भी दुनिया भर के उत्साही लोग π के अंक याद करके, पाई खाकर और गणितीय चर्चाओं से इस दिन को यादगार बनाते हैं। यह डूडल गणित की विरासत को सम्मान देते हुए मॉडर्न टच देता है!</p>
<h3><strong>π क्या है और क्यों इतना खास?  </strong></h3>
<p>π वृत्त की परिधि (circumference) और व्यास (diameter) का अनुपात है, यानी परिधि ÷ व्यास = π। इसका मूल्य लगभग 3.14159... होता है, जो अनंत तक बिना दोहराव या समाप्ति के चलता रहता है। यही वजह है कि इसे अपरिमेय संख्या (irrational number) कहा जाता है। π का इस्तेमाल ज्यामिति से लेकर भौतिकी, इंजीनियरिंग, खगोल विज्ञान और क्वांटम मैकेनिक्स तक हर जगह होता है, वृत्ताकार गति, तरंगें, ब्रह्मांड की गणनाएं सबमें!</p>
<h3><strong>14 मार्च को ही क्यों चुना गया?  </strong></h3>
<p>तारीख 3/14 (अमेरिकी स्टाइल में मार्च 14) π के पहले तीन अंकों 3.14 से मिलती-जुलती है। इसी वजह से यह दिन चुना गया।</p>
<h3><strong>पाइ डे की शुरुआत और इतिहास  </strong></h3>
<p>- पहली बार 1988 में अमेरिकी भौतिकशास्त्री लैरी शॉ ने सैन फ्रांसिस्को के एक्सप्लोरेटोरियम में इसे मनाया—लोग गोल-गोल घूमे और पाई खाई!  <br />- 2009 में अमेरिकी कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय पाइ डे घोषित कर दिया।  <br />- π का प्रतीक π सबसे पहले 1706 में विलियम जोन्स ने इस्तेमाल किया, लेकिन आर्किमिडीज (250 ई.पू.) ने 96 भुजाओं वाले बहुभुजों से इसका सबसे सटीक अनुमान लगाया।</p>
<h3><strong>दुनिया के रिकॉर्ड और मजेदार तरीके  </strong></h3>
<p>- सबसे ज्यादा π के अंक याद करने का गिनीज रिकॉर्ड भारतीय राजवीर मीणा के नाम है-70,000 अंक! (2015, वेल्लोर)।  <br />- लोग आज पाई (pie) खाते हैं क्योंकि 'pie' और 'pi' सुनने में एक जैसे लगते हैं, और पाई गोल होने से π का प्रतीक भी बनती है।  <br />- π अंक याद करने की स्पर्धा, पाई ईटिंग कंटेस्ट, "Life of Pi" फिल्म देखना, या रोजमर्रा की चीजों में 3.14 ढूंढना!</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/574931/pi-day-2026--google-s-colorful-doodle-creates-a-buzz--why-is-this-mathematical-festival-celebrated-on-march-14--learn-the-infinite-mysteries-of-%CF%80</link>
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                <pubDate>Sat, 14 Mar 2026 12:52:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Muskan Dixit]]>
                    </dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नासा का चंद्र मिशन फिर टला: आर्टेमिस II रॉकेट में हीलियम सिस्टम खराब, अप्रैल तक उड़ान स्थगित...फिर लौटेगा हैंगर में</title>
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                        <![CDATA[<p><strong>केप कैनवेरल (अमेरिका): </strong>नासा अपने विशाल चंद्र रॉकेट को अंतरिक्ष यात्रियों के सवार होने से पहले और मरम्मत के लिए इस सप्ताह फिर से हैंगर में वापस लाएगा। अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, कम से कम अप्रैल तक उड़ान स्थगित रहेगी। </p>
<p>मौसम अनुकूल रहने पर मंगलवार को केनेडी स्पेस सेंटर के परिसर में रॉकेट को वापस ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। नासा ने बृहस्पतिवार को खतरनाक हाइड्रोजन ईंधन रिसाव को बंद करने के लिए दोबारा जांच की थी। इसी दौरान रॉकेट की हीलियम प्रणाली में खराबी आ गई, जिससे आधी सदी से अधिक समय बाद अंतरिक्ष यात्रियों की पहली</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/573018/nasa-s-lunar-mission-postponed-again--helium-system-malfunctions-in-artemis-ii-rocket--flight-postponed-until-april---then-will-return-to-hangar"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/muskan-dixit-(54)2.png" alt=""></a><br /><p><strong>केप कैनवेरल (अमेरिका): </strong>नासा अपने विशाल चंद्र रॉकेट को अंतरिक्ष यात्रियों के सवार होने से पहले और मरम्मत के लिए इस सप्ताह फिर से हैंगर में वापस लाएगा। अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, कम से कम अप्रैल तक उड़ान स्थगित रहेगी। </p>
<p>मौसम अनुकूल रहने पर मंगलवार को केनेडी स्पेस सेंटर के परिसर में रॉकेट को वापस ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। नासा ने बृहस्पतिवार को खतरनाक हाइड्रोजन ईंधन रिसाव को बंद करने के लिए दोबारा जांच की थी। इसी दौरान रॉकेट की हीलियम प्रणाली में खराबी आ गई, जिससे आधी सदी से अधिक समय बाद अंतरिक्ष यात्रियों की पहली चंद्र यात्रा और टल गई। इंजीनियरों ने हाइड्रोजन रिसाव पर काबू पा लिया था और प्रक्षेपण के लिए छह मार्च की तिथि तय की। प्रक्षेपण में एक माह का विलंब पहले ही हो चुका है। अचानक हीलियम प्रणाली में बाधा उत्पन्न हो गई जिससे रॉकेट के ऊपरी चरण तक हीलियम का प्रवाह बाधित हुआ। इंजनों को शुद्ध करने और ईंधन टैंकों में दबाव बनाए रखने के लिए हीलियम आवश्यक होती है। </p>
<p>नासा ने एक बयान में कहा, "समस्या के कारण का पता लगाने और उसे ठीक करने के लिए रॉकेट को केनेडी के 'व्हीकल असेंबली बिल्डिंग' में वापस ले जाना आवश्यक है।" </p>
<p>एजेंसी ने कहा कि अप्रैल में प्रक्षेपण के प्रयास के लिए तैयारियां की जा रही हैं, हालांकि यह मरम्मत की प्रगति पर निर्भर करेगा। आर्टेमिस द्वितीय मिशन के लिए चुने गए तीन अमेरिकी और एक कनाडाई अंतरिक्ष यात्री फिलहाल ह्यूस्टन में हैं और अंतरिक्षयात्रा की तैयारियां कर रहे हैं। वे 1968 से 1972 के बीच 24 अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा तक भेजने वाले नासा के अपोलो कार्यक्रम के बाद चंद्रमा की ओर उड़ान भरने वाले पहले मानव होंगे।</p>]]>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Tech News</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 12:44:22 +0530</pubDate>
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                <title>भारत के खगोलविद् समझेंगे ब्रह्मांड की गुरुत्व लहरें</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">कॉम्पैक्ट बाइनरी कोलीसेंस ऑब्जर्व्ड बाय लीगो एंड विर्गोड्यूरिंग द सेकेंड पार्ट ऑफ द थर्ड ऑब्जर्विंग रन शीर्षक से उपलब्ध एक रिसर्च-रिव्यु रिपोर्ट उस व्यापक परियोजना के बारे में बात करती है, जिससे रेडियो एस्ट्रोनॉमर्स ने सुदूर ब्रह्मांड में ग्रेविटेशनल वेव्स की उपस्थिति के स्रोतों को चिह्नित किया है।  </p>
<p style="text-align:justify;">ग्रेविटेशनल वेव्स अर्थात गुरुत्व लहरों और इनमें समाई हुई विपुल शक्ति से ब्रह्मांड में नई रचनाओं का जन्म होता है और पुरानी रचनाओं एवं अरबों-खरबों गैलेक्सियों में मौजूद तारों या कहें तो ऑब्जरवेबल स्टार्स के जीवन मरण की घटनाओं के अलावा ब्लैक होल्स की मैपिंग करने के बाद एक कैटेलॉग बनाया गया</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/572450/indian-astronomers-will-understand-cosmic-gravitational-waves"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/untitled-design-(10)10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कॉम्पैक्ट बाइनरी कोलीसेंस ऑब्जर्व्ड बाय लीगो एंड विर्गोड्यूरिंग द सेकेंड पार्ट ऑफ द थर्ड ऑब्जर्विंग रन शीर्षक से उपलब्ध एक रिसर्च-रिव्यु रिपोर्ट उस व्यापक परियोजना के बारे में बात करती है, जिससे रेडियो एस्ट्रोनॉमर्स ने सुदूर ब्रह्मांड में ग्रेविटेशनल वेव्स की उपस्थिति के स्रोतों को चिह्नित किया है।  </p>
<p style="text-align:justify;">ग्रेविटेशनल वेव्स अर्थात गुरुत्व लहरों और इनमें समाई हुई विपुल शक्ति से ब्रह्मांड में नई रचनाओं का जन्म होता है और पुरानी रचनाओं एवं अरबों-खरबों गैलेक्सियों में मौजूद तारों या कहें तो ऑब्जरवेबल स्टार्स के जीवन मरण की घटनाओं के अलावा ब्लैक होल्स की मैपिंग करने के बाद एक कैटेलॉग बनाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">कैटेलॉग, मतलब एक ऐसी बड़ी सूची वाली किताब, जिसमें यह दर्ज किया गया है कि फलां तारा या ब्लैक होल, पृथ्वी से किए गए अवलोकन की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर, ब्रह्मांड में किस तरफ और कितना दूर मौजूद हैं और क्या होने की संभावना है, जिसे एक विशिष्ट संख्या और नाम दिया गया है।-<strong>रणबीर सिंह विज्ञान लेखक</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य की वैज्ञानिक रुचियों का यह एक ऐसा अध्याय है, जिसकी कोई भी व्याख्या विस्मित करने के लिए काफी है। ब्रह्मांड अवलोकन के लिए जो भी साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स अब तक बनाए गए हैं या प्रतावित हैं, उन पर अनेक देशों ने सम्मिलित रूप से इतनी धनराशि खर्च कर दी है, जोकि हमारे अनुमान से आगे निकल जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन 200 सालों में अन्वेषण की उत्तेजना से ओतप्रोत खगोलविदों ने ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को कई गुणा बढ़ाया है। एस्ट्रोफिजिक्स में ऐसे आख्यान सेट किये गए हैं, जोकि प्रथम दृष्टया समझ से बाहर हैं, क्योंकि एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स में नियम और गणनाएं और संबद्ध टर्मिनोलॉजी उपलब्ध हैं, उन्हें इस विधा के जानकारों के अलावा अन्य लोग कम ही समझते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उपर्युक्त शीर्षक के अंतर्गत 82 पन्नों में दुनिया के जाने-माने और कम ज्ञात उन 297 संस्थानों ने सहयोग करते हुए, जो लंबा-चौड़ा शोध-समीक्षा पत्र प्रकाशित किया है वह एक व्यापक और दीर्घकालिक सहयोग का नतीजा है। ग्रेविटेशनल वेव्स के सोर्सेज की मैपिंग क्यों जरूरी है और क्यों इस पर कभी भी राजनीतिज्ञों की टिप्पणियां आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं? इसलिए कि ऐसे विषयों के बारे में संबद्ध विभाग और मंत्रालय से जुड़े हुए संस्थानों और फंडिंग एजेंसीज की टेक्निकल और साइंटिफिक एडवाइजरी कमेटियों या एक देश की संसद की स्थायी समिति में चर्चा होती है और इनकी रिपोर्टिंग कम ही होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उपर्युक्त स्टडी में कहा गया है कि इसमें ब्रह्मांड में ग्रेविटेशनल वेव स्रोतों की बहुतायत का खुलासा है, जोकि एडवांस्ड लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्ज़र्वेटरी लीगो और एडवांस्ड विर्गो डिटेक्टरों से किया गया तीसरी बार का कोलैबोरेशन सर्वेक्षण हैं। लीगो-विर्गो द्वारा किए गए सर्वेक्षण की तीसरी पारी के अंत तक खोजे गए ट्रांजिएंट ग्रेविटेशनल वेव सिग्नलों का ही यह रिकॉर्ड है, जोकि तीसरी पारी के दूसरे भाग में दर्ज किए गए सिग्नलों को शामिल करके पिछले सर्वेक्षण का नवीकरण करता है। नवीकरण अध्ययन में 1 नवंबर 2019 से 27 मार्च 2020 तक की अवधि में तीसरी पारी  के दौरान का डेटा शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्रेविटेशनल वेव्स एक एस्ट्रोनॉमिकल टूल है, जिसे इंस्ट्रूमेंट्स डिटेक्टर्स से पकड़ कर ब्रह्मांडीय रचनाओं की स्थिति, इनमें हुए परिवर्तन और व्यवहार पर नजर रखी जाती है और अवलोकन करते हुए डाटा दर्ज किया जाता है। यह भी कि इन व्यवहार परिवर्तनों और ग्रेविटेशनल वेव्स से पृथ्वी और सौर मंडल कैसे प्रभावित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पृथ्वी पर जीवन की रक्षा के उपाय इन्हीं अवलोकनों की व्याख्या से मालूम होते हैं, जिसके लिए व्यापक डाटा का सुपर कंप्यूटर से एनालिसिस किया जाता है। इससे हमें मालूम होता रहता है कि सुदूर ब्रह्मांड से आने वाली ग्रेविटेशनल लहरों की शक्ति से पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर पर क्या प्रभाव पड़ा है। अस्तित्व हेतु इसमें आने वाले सूक्ष्म परिवर्तन पृथ्वी के मौसम की विशाल मशीनरी को प्रभावित करते हैं, जिस पर जीवन टिका हुआ है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">लीगो वेधशालाओं की स्थापना</h5>
<p style="text-align:justify;">लीगो से पहले ब्रह्मांड के बारे में हमारे पास जो भी, जैसा भी डाटा था वह प्रकाश और इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों को ऑप्टिकल एवं रेडियो टेलेस्कोप्स के प्रयोग से रिकॉर्ड किया जाता था। लीगो ऑब्जर्वेटरीज की स्थापना के बाद से एक अतिरिक्त और बेहतर टूल खगोल भौतिकिविदों को हासिल हुआ है। लीगो वेधशालाओं की स्थापना होने के बाद सन् 2002 में इन्होंनें काम करना शुरू किया था। सन् 2015 में लीगो को उन्नत किया गया तभी बहुत सा नया डाटा मिला। ग्रेविटेशनल वेव्स की मौजूदगी की अवधारणा सबसे पहले अल्बर्ट आइंस्टीन ने स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में प्रकट की थी। क्या ग्रेविटेशनल वेव्स वास्तव में उपस्थित हैं, यह मालूम करने के लिए सन् 1960 में अमेरिकी और सोवियत युग के वैज्ञानिकों ने चिंतन करते हुए इन्हें पकड़ने के लिए सैद्धांतिक कार्य शुरू किया और कहा कि ये मौजूद हैं और इनके दर्ज करना भी संभव है, बशर्ते विशिष्ट प्रकार के इंस्ट्रूमेंट्स का निर्माण कर लिया जाए।</p>
<h5 style="text-align:justify;">इंटरफेरोमीटर का निर्माण</h5>
<p style="text-align:justify;">प्रोटोटाइप इंटरफेरोमेट्रिक ग्रेविटेशनल वेव डिटेक्टर इंटरफेरोमीटर, 1960 के दशक के आखिर में रॉबर्ट एल फॉरवर्ड और ह्यूजेस रिसर्च लेबोरेटरीज में उनके साथियों ने बनाए थे, जिनमें शीशे, फ्री स्विंगिंग के बजाय, वाइब्रेशन आइसोलेटेड प्लेट पर लगे थे। सन् 1970 के दशक में मैसाच्यूसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एमआईटी, कैलिफोर्निया, यूएस में वीस ने, जो इंस्ट्रूमेंट बना उसमें फ्री स्विंगिंग शीशे थे, जिनके बीच लाइट कई बार टकराती थी। बाद में जर्मनी में हेंज बिलिंग और उनके साथियों ने और फिर ग्लासगो, स्कॉटलैंड में रोनाल्ड ड्रेवर, जेम्स हॉफ और उनके साथियों ने भी अपने तरीके से ग्रेविटेशनल वेव्स को दर्ज करने के लिए यंत्र प्रणालियों का निर्माण किया था। काम जारी रहा और सन् 1980 में, यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन ने एमआईटी के पॉल लिंसय, पीटर सॉल्सन, रेनर वीस के नेतृत्व में एक बड़े इंटरफेरोमीटर के निर्माण और अध्ययन करने के लिए फंड दिया। फिर कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कैलटेक के रोनाल्ड ड्रेवर और स्टैन व्हिटकॉम्बने 40 मीटर का एक प्रोटोटाइप बनाया, लेकिन दूसरी ओर एमआईटी ने पर्याप्त सेंसिटिविटी के साथ 1 किलोमीटर स्केल पर इंटरफेरोमीटर बनाने की संभावना साबित की, जिसमें बहुत से डिश-टाइप ऐंटेना जमीन पर लगाकर इन्हें आपस में जोड़ा जाना शामिल था।</p>
<h5 style="text-align:justify;">रिसर्च और डेवलपमेंट</h5>
<p style="text-align:justify;">(एमआईटी) और कैलटेक के वैज्ञानिकों ने जब गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज के महत्व को समझा, तब उन्होंने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए साझेदारी की। ड्रेवर, किप थॉर्न और रोनाल्ड वीस के नेतृत्व में एक स्टीयरिंग कमेटी गठित की गई, जिसने 1986 तक परियोजना की दिशा तय की। बाद में अमेरिकी सरकार ने संरचना में बदलाव करते हुए कैलटेक के रोचस ई. वाउट को निदेशक नियुक्त किया। 1988 में प्रारंभिक चरण पूरा होने के बाद अनुसंधान एवं विकास के विस्तार हेतु नए प्रस्ताव को स्वीकृति मिली, किंतु 1989 से 1994 के बीच परियोजना तकनीकी और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझती रही। नियमित फंडिंग के प्रस्ताव बार-बार अस्वीकृत होते रहे। अंततः 1991 में अमेरिकी कांग्रेस ने पहले वर्ष के लिए 23 मिलियन डॉलर की राशि स्वीकृत की। 1992 में परियोजना का पुनर्गठन किया गया और इसे एक उन्नत “इवोल्यूशनरी डिटेक्टर” के रूप में विकसित करने की योजना बनी, जो गुरुत्वाकर्षण तरंगों का सूक्ष्मतम स्तर पर पता लगा सके। 1994 में नेशनल साइंस फाउंडेशन ने 395 मिलियन डॉलर की ऐतिहासिक फंडिंग दी, जो उस समय की सबसे बड़ी वैज्ञानिक सहायता थी। उसी वर्ष वाशिंगटन के हैनफोर्ड और 1995 में लुइसियाना के लिविंगस्टन में निर्माण कार्य शुरू हुआ। 1997 तक निर्माण पूरा होने की दिशा में बढ़ते हुए दो संस्थाएं स्थापित की गईं—लीगो लेबोरेटरी और लीगो साइंटिफिक कोलैबोरेशन—जिनका उद्देश्य तकनीकी और वैज्ञानिक शोध को सुव्यवस्थित करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने भी लीगो-इंडिया परियोजना के माध्यम से इस वैश्विक प्रयास में भागीदारी की। इसका लक्ष्य अमेरिका और इटली की प्रयोगशालाओं के सहयोग से भारत में एक अत्याधुनिक गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला स्थापित करना है। फरवरी 2016 में इसे सैद्धांतिक मंजूरी मिली और महाराष्ट्र में उपयुक्त स्थल का चयन हुआ। अप्रैल 2023 में भारत सरकार ने 2,600 करोड़ रुपये के बजट को स्वीकृति दी। परियोजना के 2030 तक पूर्ण होने की उम्मीद है। लीगो-इंडिया में चार किलोमीटर लंबे दो वैक्यूम चैंबर होंगे, जो अत्यधिक संवेदनशील उपकरणों से सुसज्जित रहेंगे। यह वेधशाला वैश्विक नेटवर्क का अहम हिस्सा बनेगी और गुरुत्वाकर्षण तरंग खगोल विज्ञान में भारत की भूमिका को सशक्त करेगी। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि गुरुत्व लहरों का अध्ययन ब्रह्मांड में पदार्थ की उत्पत्ति और विकास संबंधी हमारी समझ को नई दिशा देगा।</p>]]>
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                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 12:08:30 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anjali Singh]]>
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                <title>सरकारी स्कूलों की बेटियां बनेंगी ‘सुनीता विलियम्स’, बागपत के गांव तक पहुंची हाईटेक एस्ट्रोनॉमी लैब</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ, अमृत विचार:</strong> प्रदेश में बालिकाओं की शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक अहम पहल की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर अब सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली बेटियां भी अंतरिक्ष विज्ञान की बारीकियां सीख रही हैं। बागपत जनपद के छपरौली ब्लॉक में स्थापित अत्याधुनिक एस्ट्रोनॉमी लैब ने ग्रामीण छात्राओं के सपनों को नई उड़ान दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्लॉक संसाधन केंद्र परिसर में बनाई गई इस हाईटेक खगोलशास्त्र प्रयोगशाला के माध्यम से छपरौली ब्लॉक की लगभग 100 बालिकाओं को आधुनिक विज्ञान से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है। प्रयोगशाला में 45 प्रकार</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/572186/girls-from-government-schools-will-become--sunita-williams---a-high-tech-astronomy-lab-reaches-a-village-in-baghpat"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/muskan-dixit-(33)6.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ, अमृत विचार:</strong> प्रदेश में बालिकाओं की शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक अहम पहल की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर अब सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली बेटियां भी अंतरिक्ष विज्ञान की बारीकियां सीख रही हैं। बागपत जनपद के छपरौली ब्लॉक में स्थापित अत्याधुनिक एस्ट्रोनॉमी लैब ने ग्रामीण छात्राओं के सपनों को नई उड़ान दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्लॉक संसाधन केंद्र परिसर में बनाई गई इस हाईटेक खगोलशास्त्र प्रयोगशाला के माध्यम से छपरौली ब्लॉक की लगभग 100 बालिकाओं को आधुनिक विज्ञान से रूबरू होने का अवसर मिल रहा है। प्रयोगशाला में 45 प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोगों की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जिनके जरिए छात्राएं ब्रह्मांड, ग्रहों, तारों और अन्य आकाशीय पिंडों से जुड़े जटिल सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से समझ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">योगी सरकार के इस प्रयास से ग्रामीण पृष्ठभूमि की छात्राएं अब केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि टेलिस्कोप संचालन, नाइट-स्काई ऑब्जर्वेशन और डिजिटल सिमुलेशन जैसी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी कर रही हैं। इससे उनमें जिज्ञासा, आत्मविश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बागपत की जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने बताया कि इस एस्ट्रोनॉमी लैब को हाईटेक तकनीक से विकसित किया गया है। यहां छात्राओं को आधुनिक उपकरणों के साथ-साथ एस्ट्रोनॉमी सॉफ्टवेयर के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे वे आकाशीय पिंडों की स्थिति, गति और संरचना को डिजिटल माध्यम से समझ पा रही हैं। इस पहल की सबसे खास बात यह है कि छात्राएं स्वयं टेलिस्कोप के माध्यम से चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों का प्रत्यक्ष अवलोकन कर रही हैं। शिक्षकों के अनुसार, जब कोई बालिका अपने हाथों से टेलिस्कोप चलाकर चंद्रमा देखती है तो उसके भीतर आत्मविश्वास के साथ कुछ नया करने की प्रेरणा जन्म लेती है और वह खुद को सुनीता विलियम्स जैसे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से जोड़कर देखने लगती है। इसके साथ ही बागपत जिले के 25 सरकारी विद्यालयों में एआई-संचालित स्मार्ट क्लास भी शुरू की गई हैं। इन कक्षाओं के माध्यम से बच्चों को इंटरैक्टिव और तकनीक आधारित शिक्षा मिल रही है, जिससे सीखने की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा जा रहा है।</p>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>बागपत</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/572186/girls-from-government-schools-will-become--sunita-williams---a-high-tech-astronomy-lab-reaches-a-village-in-baghpat</link>
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                <pubDate>Thu, 19 Feb 2026 09:31:36 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>'इंडिया एआई एक्सपो समिट' 19 फरवरी को लोगों के लिए बंद, 21 फरवरी को एक अतिरिक्त दिन खुलेगा </title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्लीः </strong>'इंडिया एआई एक्सपो समिट' 19 फरवरी को बंद रहेगा और इसके बजाय लोगों के लिए इसे एक अतिरिक्त दिन 21 फरवरी को खोला जाएगी। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 19 फरवरी को मुख्य शिखर सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी सचिव एस. कृष्णन ने कहा, '' 19 फरवरी को एक्सपो बंद रहेगा। भारी उत्साह के कारण इसे एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया है। यह शनिवार 21 फरवरी को खुला रहेगा।'' कृष्णा ने कहा कि उद्घाटन सत्र में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सहित 20 राष्ट्राध्यक्ष उपस्थित रहेंगे।</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/572068/the-india-ai-expo-summit-will-be-closed-for-the-public-on-february-19th-and-will-open-for-an-additional-day-on-february-21st"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/muskan-dixit-(15)6.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्लीः </strong>'इंडिया एआई एक्सपो समिट' 19 फरवरी को बंद रहेगा और इसके बजाय लोगों के लिए इसे एक अतिरिक्त दिन 21 फरवरी को खोला जाएगी। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 19 फरवरी को मुख्य शिखर सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी सचिव एस. कृष्णन ने कहा, '' 19 फरवरी को एक्सपो बंद रहेगा। भारी उत्साह के कारण इसे एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया है। यह शनिवार 21 फरवरी को खुला रहेगा।'' कृष्णा ने कहा कि उद्घाटन सत्र में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सहित 20 राष्ट्राध्यक्ष उपस्थित रहेंगे। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, '' हम प्रतिबंधों के कारण जनता को किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं पहुंचाना चाहते, इसीलिए कल एक्सपो न खोलने का निर्णय लिया गया है।'' इससे पहले 'इंडिया एआई एक्सपो समिट' का आयोजन 16 से 20 फरवरी के बीच निर्धारित था। </div>]]>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>Tech News</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Feb 2026 13:08:06 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ग्रामीण बच्चों को मिलेगी अंतरिक्ष की उड़ानः 40 गांवों में स्थापित होंगी इसरो की स्पेस लैब, महोबा से हुई शुरुआत</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>महोबाः </strong>भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर, अहमदाबाद द्वारा संचालित 'विलेज वैज्ञानिक कार्यक्रम' के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के 40 गांवों में ग्रामीण स्पेस लैब स्थापित की जाएंगी। इस पहल के साथ महोबा देश का पहला जिला बन गया है, जहां ग्रामीण विद्यार्थियों को संगठित रूप से अंतरिक्ष विज्ञान की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस क्रम में लखनऊ की व्योमिका फाउंडेशन के सहयोग से 16 फरवरी को रतौली ग्राम पंचायत स्थित एक राजकीय विद्यालय में "नीलेश एम. देसाई स्पेस लैब" का उद्घाटन किया जाएगा। यह लैब इसरो के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर, अहमदाबाद की पहल</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/571319/rural-children-will-get-space-flight--mahoba-becomes-the-first-district-in-the-country----isro-s-space-labs-will-be-established-in-40-villages"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/muskan-dixit-(26)5.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>महोबाः </strong>भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर, अहमदाबाद द्वारा संचालित 'विलेज वैज्ञानिक कार्यक्रम' के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के 40 गांवों में ग्रामीण स्पेस लैब स्थापित की जाएंगी। इस पहल के साथ महोबा देश का पहला जिला बन गया है, जहां ग्रामीण विद्यार्थियों को संगठित रूप से अंतरिक्ष विज्ञान की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस क्रम में लखनऊ की व्योमिका फाउंडेशन के सहयोग से 16 फरवरी को रतौली ग्राम पंचायत स्थित एक राजकीय विद्यालय में "नीलेश एम. देसाई स्पेस लैब" का उद्घाटन किया जाएगा। यह लैब इसरो के स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर, अहमदाबाद की पहल का हिस्सा है। जिलाधिकारी गजल भारद्वाज ने शनिवार को बताया कि प्रत्येक स्पेस लैब में उन्नत एवं इंटरैक्टिव शिक्षण संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं, जिनमें कार्यशील दूरबीनें, 3डी प्रिंटर, इसरो मिशन मॉडल प्रदर्शनी, रोबोट, ड्रोन तथा स्टेम आधारित प्रयोगात्मक सेट-अप शामिल हैं। इनका उद्देश्य पारंपरिक कक्षा शिक्षण को रोचक एवं अनुभवात्मक मॉडल में परिवर्तित करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि स्पेस लैब्स को प्रारंभिक स्तर से ही वैज्ञानिक सोच और तकनीकी कौशल विकसित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसके अंतर्गत अंतरिक्ष विज्ञान, उपग्रह अनुप्रयोग, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), रोबोटिक्स और ड्रोन तकनीक जैसी उभरती तकनीकों में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को एक वर्ष के संरचित पाठ्यक्रम के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा तथा वार्षिक मूल्यांकन के माध्यम से कौशल विकास की निगरानी की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिलाधिकारी ने कहा कि यह पहल शहरी और ग्रामीण शिक्षा के बीच की खाई को पाटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है तथा ग्रामीण विद्यार्थियों को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में करियर विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करेगी। इस अवसर पर इसरो एसएसी अहमदाबाद के निदेशक नीलेश देसाई 16 फरवरी को दोपहर 12 बजे मोदी मेला परिसर में आयोजित पुस्तक मेले का अवलोकन कर विद्यार्थियों से संवाद भी करेंगे। महोबा में इन दिनों चल रहे सूर्य महोत्सव के अंतर्गत युवाओं में स्थानीय विरासत, पुस्तक पठन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। </p>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                            <category>चित्रकूट</category>
                                            <category>महोबा</category>
                                            <category>कानपुर देहात </category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 14:54:50 +0530</pubDate>
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                <title>एरीज के लिए खास मददगार साबित होगा अंतरिक्ष स्टेशन</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">पहले एस्ट्रोसेट और दूसरा आदित्य एल-1 के बाद इसरो की अंतरिक्ष में एक और लंबी छलांग की तैयारी है। इस सफलता के बाद भारत यूनाइटेड स्टेट और चीन के समकक्ष खड़ा हो जाएगा। बात अगर उत्तराखंड की करें तो यहां नैनीताल में स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिकों के लिए यह स्टेशन अंतरिक्ष के अध्ययनों में काफी मददगार साबित होगा। तकनीकी रूप से यह उन्नत होगा। इस अंतरिक्ष मिशन से जुटाए जाने वाले आंकड़े एरीज के वैज्ञानिकों के लिए बेहद मददगार साबित होंगे और एरीज के लिए यह दोहरा लाभ देने वाला मिशन साबित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, अंतरिक्ष</p>...]]>
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                                    <content:encoded>
                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/570236/the-space-station-will-prove-especially-helpful-for-aries"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/untitled-design-(5)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पहले एस्ट्रोसेट और दूसरा आदित्य एल-1 के बाद इसरो की अंतरिक्ष में एक और लंबी छलांग की तैयारी है। इस सफलता के बाद भारत यूनाइटेड स्टेट और चीन के समकक्ष खड़ा हो जाएगा। बात अगर उत्तराखंड की करें तो यहां नैनीताल में स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिकों के लिए यह स्टेशन अंतरिक्ष के अध्ययनों में काफी मददगार साबित होगा। तकनीकी रूप से यह उन्नत होगा। इस अंतरिक्ष मिशन से जुटाए जाने वाले आंकड़े एरीज के वैज्ञानिकों के लिए बेहद मददगार साबित होंगे और एरीज के लिए यह दोहरा लाभ देने वाला मिशन साबित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, अंतरिक्ष स्टेशन अत्याधुनिक तकनीक व अत्यंत सुविधाजनक है, जो पृथ्वी की ऑर्बिट से अंतरिक्ष को चारों ओर से देख सकता है। वर्ष 2028 में प्रस्तावित यह परियोजना देश के पास चलती-फिरती प्रयोगशाला होगी, जो जमीनी दूरबीनों की तुलना में कहीं अधिक कारगर होगी। इस प्रयोगशाला के जरिए चांद, तारे, ग्रह, नक्षत्रों और सुदूर अंतरिक्ष में किसी भी दिशा को देखा जा सकता है और सटीक आंकड़े जुटाए जा सकते हैं। एरीज सौर अध्ययन के साथ अंतरिक्ष मौसम का महत्वपूर्ण अध्ययन करता है। एरीज की वेदशाला में स्थापित सोलर टेलीस्कोप सूर्य और सोलर फ्लेयर्स पर नजर रखती है। अंतरिक्ष स्टेशन से मिले रियल टाइम डाटा से एरीज के अध्ययन में मदद मिल सकेगी। इसके अलावा एरीज की देव स्थल स्थित 3.6 मीटर की ऑप्टिकल दूरबीन है। इसके जरिए अंतरिक्ष से जुटाया गए आंकड़ों का मिलान अंतरिक्ष स्टेशन से प्राप्त आंकड़ों से किया जा सकेगा। माइक्रोग्रैविटी में किए गए प्रयोगों के नतीजे खगोल विज्ञान, कॉस्मिक रेडिएशन और एटमॉस्फेरिक स्टडीज़ में मदद मिलेगी। </p>
<p style="text-align:justify;">यह सभी एरीज के रिसर्च से जुड़े हुए महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र हैं। इसके अलावा एरीज हिमालय के वातावरण पर काम करता है जिसे लेकर एरीज में एसटी रडार स्थापित किया गया है। अंतरिक्ष स्टेशन का एक महत्वपूर्ण कार्य जलवायु समेत हमारी वायुमंडलीय स्थिति में नजर रखना होगा लिहाजा अंतरिक्ष स्टेशन से जुटाए आंकड़ों से एरीज के वैज्ञानिकों के लिए शोध व अन्य अध्ययनों में आसानी हो जाएगी। कुल मिलाकर भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन न केवल एरीज, बल्कि देश के तमाम अंतरिक्ष और जलवायु पर अध्ययन करने वाली संस्थाओं के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। </p>
<p style="text-align:justify;">एरीज के वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे कहते हैं कि इसमें दोराय नहीं है कि देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है और अभी तक विश्व में अलग पहचान बनाने में कामयाब हुआ है। अंतरिक्ष स्टेशन बेहद महत्वपूर्ण मिशन है और किसी भी देश का अंतरिक्ष से खुद के अध्ययन का सपना सच हो सकता है और इसरो भारतीय वैज्ञानिकों का यह साकार करने जा रहा है। इस मिशन की सफलता से वैज्ञानिक नभ, जल और थल पर अध्ययन कर सकेंगे। अभी तक पृथ्वी की निचली कक्षा में यूएस का इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और चीन का तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन मौजूद है और अब भारत अंतरिक्ष स्टेशन  वाला तीसरा देश बन जाएगा।-प्रस्तुति, बबलू चंद्रा, नैनीताल</p>]]>
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                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/570236/the-space-station-will-prove-especially-helpful-for-aries</link>
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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 10:00:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator>
                        <![CDATA[Anjali Singh]]>
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            <item>
                <title> जब कण टकराते हैं, तब खुलते हैं ब्रह्मांड के राज</title>
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                        <![CDATA[<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold">हिग्स बोसोन की खोज लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (LHC) के पहले रन में दर्ज किए गए कोलिजन डेटा से संभव हुई थी, जो 2009 के अंत से 2012 के अंत तक चला। इस खोज ने स्टैंडर्ड मॉडल के अंतिम अधूरे हिस्से को पूरा किया, लेकिन साथ ही कई नए सवाल भी खड़े कर दिए। 2015 के वसंत में व्यापक मेंटेनेंस के बाद LHC को अधिक ऊर्जा पर दोबारा शुरू किया गया। दूसरा रन इस मायने में निर्णायक है कि वह हमें हिग्स बोसोन को गहराई से समझने और स्टैंडर्ड मॉडल से आगे की भौतिकी की खोज करने का अवसर देता है।-रणबीर</strong></strong></p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/570227/when-particles-collide--the-secrets-of-the-universe-are-revealed"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/untitled-design.png" alt=""></a><br /><p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold">हिग्स बोसोन की खोज लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर (LHC) के पहले रन में दर्ज किए गए कोलिजन डेटा से संभव हुई थी, जो 2009 के अंत से 2012 के अंत तक चला। इस खोज ने स्टैंडर्ड मॉडल के अंतिम अधूरे हिस्से को पूरा किया, लेकिन साथ ही कई नए सवाल भी खड़े कर दिए। 2015 के वसंत में व्यापक मेंटेनेंस के बाद LHC को अधिक ऊर्जा पर दोबारा शुरू किया गया। दूसरा रन इस मायने में निर्णायक है कि वह हमें हिग्स बोसोन को गहराई से समझने और स्टैंडर्ड मॉडल से आगे की भौतिकी की खोज करने का अवसर देता है।-रणबीर सिंह</strong></strong></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-02/untitled-design4.jpg" alt="Untitled design" width="1280" height="720"></img></strong></strong></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">कोलिजन की क्वांटम प्रकृति</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">प्रोटॉन टकराव पूरी तरह प्रेडिक्टेबल नहीं होते। क्वांटम मैकेनिक्स के अनुसार, हर कोलिजन केवल संभावनाओं का समूह होता है। स्टैंडर्ड मॉडल यह बता सकता है कि औसतन कौन‑सी प्रक्रिया कितनी बार होगी, लेकिन किसी एक टकराव का परिणाम पहले से तय नहीं किया जा सकता। इसलिए दुर्लभ प्रक्रियाओं को देखने के लिए बहुत अधिक संख्या में कोलिजन आवश्यक होते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे पासे की निष्पक्षता जांचने के लिए उसे बार‑बार फेंकना पड़ता है।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">हिग्स बोसोन: डिके और मास मैकेनिज़्म</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">हिग्स बोसोन का महत्व इस बात में है कि वही अन्य कणों को द्रव्यमान देता है। कोलिजन में बनने के तुरंत बाद हिग्स विभिन्न कणों में डिके हो जाता है। इसके डिके चैनलों की दरें संबंधित कणों के द्रव्यमान पर निर्भर करती हैं। अब तक हिग्स के फोटॉन, W और Z बोसोन में डिके स्पष्ट रूप से देखे जा चुके हैं, जबकि फ़र्मियॉन में मुख्यतः ताऊ लेप्टन और आंशिक रूप से बॉटम क्वार्क के प्रमाण मिले हैं। दूसरे रन का अधिक डेटा इन मापों को कहीं अधिक सटीक बना सकता है।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">हिग्स की अन्य विशेषताएं</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">दूसरे रन से हम यह भी जानना चाहेंगे कि हिग्स कितनी तेजी से डिके करता है, क्या वह वास्तव में एक फंडामेंटल कण है या उसके भीतर कोई सब‑स्ट्रक्चर छिपा है और क्या हिग्स स्वयं से इंटरैक्ट करता है। हिग्स का self‑interaction सीधे इस बात से जुड़ा है कि वह स्वयं अपना द्रव्यमान कैसे प्राप्त करता है। साथ ही यह संभावना भी खुली है कि एक से अधिक, भारी हिग्स बोसोन मौजूद हों।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">उच्च ऊर्जा और नए कणों की संभावना</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">दूसरे रन में टकराव की ऊर्जा पहले से अधिक है। इसका अर्थ है कि अब अधिक भारी और अब तक अनदेखे कण बनाए जा सकते हैं। उच्च ऊर्जा पर बेहतर रिजॉल्यूशन मिलता है, जिससे कणों और बलों को और बारीकी से समझा जा सकता है। यही कारण है कि भले ही स्टैंडर्ड मॉडल काफी सफल दिखता हो, वैज्ञानिक यह मानते हैं कि वह अंतिम सिद्धांत नहीं हो सकता।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">स्टैंडर्ड मॉडल की सीमाएं</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">स्टैंडर्ड मॉडल की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उसमें गुरुत्वाकर्षण शामिल नहीं है। गुरुत्वाकर्षण को जनरल रिलेटिविटी समझाती है, जो क्वांटम सिद्धांत से अलग ढांचे में खड़ी है। इसके अलावा स्टैंडर्ड मॉडल में कई पैरामीटर और कण संरचनाएं मनमानी प्रतीत होती हैं, जैसे बोसॉन और फर्मियॉन का असंतुलन। ये संकेत देते हैं कि किसी अधिक व्यापक सिद्धांत की आवश्यकता है।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">सुपरसिमेट्री: एक संभावित विस्तार</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">स्टैंडर्ड मॉडल का एक लोकप्रिय विस्तार सुपरसिमेट्री है। यह प्रत्येक बोसॉन के लिए एक फर्मियॉन पार्टनर और प्रत्येक फर्मियॉन के लिए एक बोसॉन पार्टनर प्रस्तावित करती है। इससे हिग्स, W और Z बोसोन के अपेक्षाकृत छोटे द्रव्यमान की व्याख्या संभव होती है। सुपरसिमेट्री कई नए कणों और अतिरिक्त हिग्स बोसोन की भविष्यवाणी करती है, जिनकी खोज दूसरे रन का एक बड़ा लक्ष्य है।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">LHC के प्रमुख डिटेक्टर</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">LHC में चार मुख्य डिटेक्टर हैं। ATLAS और CMS जनरल‑पर्पस डिटेक्टर हैं और इन्हीं ने हिग्स बोसोन की खोज की थी। ALICE को भारी आयनों के टकराव के लिए डिजाइन किया गया है, ताकि क्वार्क‑ग्लूऑन प्लाज्मा और शुरुआती ब्रह्मांड जैसी स्थितियों का अध्ययन हो सके। LHCb बॉटम क्वार्क के डिके का अध्ययन करता है, जो दुर्लभ प्रक्रियाओं और नई भौतिकी के संकेत दे सकते हैं।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">मैटर-एंटीमैटर असमानता और डार्क मैटर</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">LHCb के प्रयोग CP‑वायलेशन के अध्ययन के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि ब्रह्मांड में मैटर क्यों बचा और एंटीमैटर क्यों नहीं। दूसरी ओर, डार्क मैटर की समस्या भी स्टैंडर्ड मॉडल से बाहर जाती है। ब्रह्मांड के अधिकांश द्रव्यमान का निर्माण ऐसे कणों से हुआ है, जिन्हें हम अभी नहीं जानते। कई सिद्धांत मानते हैं कि डार्क मैटर कण हिग्स क्षेत्र से द्रव्यमान प्राप्त करते हैं, इसलिए हिग्स का विस्तृत अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;"><u><strong><strong class="PlaygroundEditorTheme__textBold PlaygroundEditorTheme__textUnderline">आगे का रास्ता</strong></strong></u></p>
<p class="PlaygroundEditorTheme__paragraph" dir="ltr" style="text-align:justify;">LHC का दूसरा रन केवल पहले रन की पुष्टि नहीं है, बल्कि नई खोजों का द्वार है। चाहे वह हिग्स की गहरी समझ हो, सुपरसिमेट्री की खोज, डार्क मैटर के संकेत या मैटर‑एंटीमैटर असमानता की व्याख्या- दूसरा रन हमें यह जानने के और करीब लाता है कि ब्रह्मांड किससे और कैसे बना है।</p>]]>
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                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 10:36:55 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Anjali Singh]]>
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                <title>स्फीयर:  रोमांचकारी अनुभव और मनोरंजन का मंच</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">कल्पना कीजिए आप एक विशाल सभागार में बैठे हैं। रोशनी धीमी पड़ती है और अचानक ऐसा लगता है मानो छत गायब हो गई हो। आपके ऊपर अनंत ब्रह्मांड फैल जाता है- तारे, आकाशगंगाएं, घूमते ग्रह। आप सिर्फ देख नहीं रहे, बल्कि उस दृश्य के भीतर मौजूद हैं। चेहरे पर ठंडी हवा का अहसास होता है, कुर्सी के नीचे हल्का कंपन महसूस होता है और कानों में आती आवाज इतनी साफ कि लगता है कोई आपके बिल्कुल पास खड़ा होकर बोल रहा हो। यह न तो किसी विज्ञान-कथा फिल्म का दृश्य है और न ही भविष्य की कोरी कल्पना- यह यथार्थ</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/569450/sphere--a-platform-for-thrilling-experiences-and-entertainment"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-01/untitled-design-(6)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कल्पना कीजिए आप एक विशाल सभागार में बैठे हैं। रोशनी धीमी पड़ती है और अचानक ऐसा लगता है मानो छत गायब हो गई हो। आपके ऊपर अनंत ब्रह्मांड फैल जाता है- तारे, आकाशगंगाएं, घूमते ग्रह। आप सिर्फ देख नहीं रहे, बल्कि उस दृश्य के भीतर मौजूद हैं। चेहरे पर ठंडी हवा का अहसास होता है, कुर्सी के नीचे हल्का कंपन महसूस होता है और कानों में आती आवाज इतनी साफ कि लगता है कोई आपके बिल्कुल पास खड़ा होकर बोल रहा हो। यह न तो किसी विज्ञान-कथा फिल्म का दृश्य है और न ही भविष्य की कोरी कल्पना- यह यथार्थ है। अमेरिका के लास वेगास में बना स्फीयर (Sphere) मनोरंजन की दुनिया में इसी यथार्थ को संभव बनाता है।<strong> - डॉ. शिवम भारद्वाज, असिस्टेंट प्रोफेसर, जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा</strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">थिएटर नहीं, एक जीवंत अनुभव</h5>
<p style="text-align:justify;">स्फीयर कोई साधारण थिएटर या स्टेडियम नहीं है। यह ऐसा मंच है, जहां दर्शक कार्यक्रम को सिर्फ देखते नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रवेश कर जाते हैं। वे उसे जीते हैं। मनोरंजन के इतिहास में इसे तकनीक और अनुभव के मेल की एक असाधारण छलांग कहा जा सकता है। जिस तरह कभी मूक फिल्मों से ‘टॉकीज’ और श्वेत-श्याम से रंगीन सिनेमा तक का सफर एक ऐतिहासिक मोड़ था, उसी तरह स्फीयर उस दौर का संकेत है, जहां मनोरंजन सिर्फ देखा नहीं जाता-महसूस किया जाता है, जिया जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">एक महत्वाकांक्षी परियोजना और विशाल संरचना</h5>
<p style="text-align:justify;">करीब 2.3 अरब डॉलर की लागत से निर्मित यह संरचना दुनिया की सबसे बड़ी गोलाकार मनोरंजन इमारतों में गिनी जाती है। 2018 में मेडिसन स्क्वेर गार्डन समूह के प्रमुख जेम्स डॉलन की परिकल्पना के रूप में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट महामारी और वैश्विक सप्लाई-चेन संकट जैसी बाधाओं के बावजूद 2023 में पूरा हुआ। 366 फीट ऊंचाई और 516 फीट व्यास वाली यह इमारत केवल वास्तुकला की उपलब्धि नहीं, बल्कि ‘अनुभव-आधारित तकनीक’ का प्रतीक भी है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">तकनीक जो लगती है जादू जैसी </h5>
<p style="text-align:justify;">स्फीयर का सबसे बड़ा आकर्षण इसका 16K रैपअराउंड एलईडी स्क्रीन है, जो दर्शकों को चारों ओर से घेर लेता है। लगभग 1,60,000 वर्ग फुट में फैला यह दृश्य-परिदृश्य यह सुनिश्चित करता है कि दर्शक जहां भी बैठा हो, अनुभव का केंद्र वही हो। इमारत की बाहरी सतह करीब 5,80,000 वर्ग फुट खुद एक विशाल डिजिटल कैनवस है, जो रात के समय पूरे लास वेगास के आकाश को एक चलती-फिरती दृश्य-कला में बदल देती है। दृश्य जितने भव्य हैं, ध्वनि तकनीक उससे भी आगे जाती है। जर्मन कंपनी HOLOPLOT द्वारा डिजाइन की गई प्रणाली में 1,64,000 से अधिक साउंड ड्राइवर्स लगे हैं, जो उन्नत तकनीक के जरिए हर सीट तक सटीक ध्वनि पहुंचाते हैं। इसका परिणाम यह है कि एक ही कार्यक्रम में बैठे दो दर्शकों को भी आवाज का अनुभव थोड़ा अलग लग सकता है। इसके साथ सीटों में कंपन, तापमान और अन्य सेंसरी प्रभाव दर्शक को सिर्फ देखने-सुनने तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे अनुभव का सक्रिय हिस्सा बना देते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">विज्ञापन और शहर का नया चेहरा</h5>
<p style="text-align:justify;">स्फीयर की बाहरी सतह, जिसे ‘एक्सोस्फीयर’ कहा जाता है। तकनीकी रूप से और भी अधिक क्रांतिकारी है। लगभग 5,80,000 वर्ग फ़ुट की यह पूर्ण-रंग एलईडी स्क्रीन दिन-रात सक्रिय रहती है। कभी यह पृथ्वी का रूप ले लेती है, कभी मंगल ग्रह का, तो कभी किसी उत्सव या कल्पनालोक का दृश्य बन जाती है। मार्केटिंग के लिहाज से यह दुनिया के सबसे दृश्यमान और प्रभावशाली विज्ञापन माध्यमों में शामिल हो चुकी है। लास वेगास आने वाला लगभग हर व्यक्ति इसे देखता है चाहे वह पर्यटक हो, चालक हो या केवल आकाश की ओर देखने वाला राहगीर।</p>
<h5 style="text-align:justify;">उद्घाटन से वैश्विक पहचान तक</h5>
<p style="text-align:justify;">सितंबर 2023 में आयरिश बैंड यू-2 के उद्घाटन कार्यक्रम ने दुनिया को पहली बार इस मंच की पूरी क्षमता से परिचित कराया। इसके बाद फ़िल्म निर्देशक डैरेन एरोनोफ़्स्की की फ़िल्मपोस्टकार्ड फ्रॉम अर्थने यह स्पष्ट कर दिया कि स्फीयर सिर्फ़ संगीत या शो का मंच नहीं, बल्कि कहानी कहने और सिनेमा की भाषा को नए सिरे से गढ़ने का एक बिल्कुल नया माध्यम है। कुछ ही महीनों में बड़े आयोजनों और वैश्विक ब्रांड अभियानों ने इसे तकनीकी कौतूहल से आगे बढ़ाकर आर्थिक रूप से व्यवहार्य मंच बना दिया।</p>
<h5 style="text-align:justify;">भव्यता के साथ आती चुनौतियां</h5>
<p style="text-align:justify;">इतनी विशाल और अत्याधुनिक संरचना अपने साथ चुनौतियाँ भी लाती है। अत्यधिक लागत और लगातार उच्च-स्तरीय कंटेंट की जरूरत इसे एक साहसिक और जोखिम भरा प्रयोग बनाती है। इतनी विशाल डिजिटल संरचना के संचालन के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पर्यावरणीय स्थिरता और शहरी नियोजन के संदर्भ में इस तरह की परियोजनाएं गंभीर समीक्षा की मांग करती हैं। हालांकि सौर ऊर्जा और सीमित प्रकाश मोड जैसे उपायों के ज़रिये इन समस्याओं को कम करने की कोशिश की जा रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">भारतीय परिप्रेक्ष्य: अवसर और प्रश्न</h5>
<p style="text-align:justify;">भारत के संदर्भ में यह अनुभव कई अहम सवाल खड़े करता है। हमारे पास तकनीकी दक्षता, युवा प्रतिभा और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत—तीनों मौजूद हैं। सवाल यह नहीं कि भारत स्फीयर जैसी संरचना बना सकता है या नहीं; असली प्रश्न यह है कि क्या हम इसे केवल पश्चिमी मॉडल की नकल के रूप में अपनाएँगे, या अपनी कला, मिथक, इतिहास, विज्ञान और भविष्य-दृष्टि को वैश्विक मंच पर नए रूप में प्रस्तुत करेंगे। यदि ऐसे केंद्रों को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षिक नवाचार के रूप में देखा जाए, तो वे पर्यटन, रोजगार और रचनात्मक उद्योगों में नई ऊर्जा भर सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">भविष्य की दिशा</h5>
<p style="text-align:justify;">स्फीयर यह संकेत देता है कि भविष्य का मनोरंजन निष्क्रिय नहीं होगा।आने वाले समय में प्रतिस्पर्धा केवल स्टेडियमों, सिनेमाघरों या शो की नहीं होगी, बल्कि उन अनुभवों की होगी जो मानव मन और शरीर दोनों को गहराई से छू सकें।तकनीक तैयार है, मंच सजा हुआ है। अब चुनौती रचनात्मकता की है कि इस विशाल कैनवास पर हम कौन-सी कहानियां रचते हैं। क्योंकि जब तकनीक संस्कृति से मिलती है, तब इतिहास लिखा नहीं जाता, जिया जाता है।</p>]]>
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                <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 11:54:35 +0530</pubDate>
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                <title>ISRO में AKTU के स्नातक छात्र भी कर सकेंगे इंटर्नशिप, अंतरिक्ष विज्ञान में करियर बनाने का सपना अब बनेगा हकीकत </title>
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                        <![CDATA[<p><strong>लखनऊ, अमृत विचार :</strong> डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के स्नातक से लेकर परास्नातक और शोध छात्र तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में इंटर्नशिप करेंगे। इसके साथ ही छात्र स्टूडेंट प्रोजेक्ट ट्रेनी स्कीम के अंतर्गत अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीकी, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस और रिमोट सेंसिंग जैसे विषयों पर प्रोजेक्ट वर्क भी करेंगे। विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थानों में अध्ययनरत छात्रों के लिए इसरो ने राष्ट्रीय स्तर की इंटर्नशिप योजना और स्टूडेंट प्रोजेक्ट ट्रेनी स्कीम की घोषणा की है। इन योजनाओं के माध्यम से छात्रों को इसरो के विभिन्न केंद्रों में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों से जुड़ने का अवसर</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/569435/aktu-graduate-students-can-also-do-internship-at-isro--apply-soon-from-this-website"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-01/muskan-dixit-(40)13.png" alt=""></a><br /><p><strong>लखनऊ, अमृत विचार :</strong> डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के स्नातक से लेकर परास्नातक और शोध छात्र तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में इंटर्नशिप करेंगे। इसके साथ ही छात्र स्टूडेंट प्रोजेक्ट ट्रेनी स्कीम के अंतर्गत अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीकी, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस और रिमोट सेंसिंग जैसे विषयों पर प्रोजेक्ट वर्क भी करेंगे। विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थानों में अध्ययनरत छात्रों के लिए इसरो ने राष्ट्रीय स्तर की इंटर्नशिप योजना और स्टूडेंट प्रोजेक्ट ट्रेनी स्कीम की घोषणा की है। इन योजनाओं के माध्यम से छात्रों को इसरो के विभिन्न केंद्रों में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिलेगा।</p>
<p>चयनित छात्रों को इसरो के वैज्ञानिकों और अभियंताओं के मार्गदर्शन में वास्तविक परियोजनाओं पर कार्य करने का अवसर प्राप्त होगा, जिससे उनकी अकादमिक समझ के साथ-साथ अनुसंधान क्षमता भी सुदृढ़ होगी। स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (एसएसी) के अंतर्गत संचालित वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण प्रभाग द्वारा चयनित छात्रों को प्रयोगशाला, पुस्तकालय, इंटरनेट सहित अन्य शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इंटर्नशिप के सफल समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किया जाएगा। एकेटीयू ने सभी संबद्ध संस्थानों के निदेशकों से छात्रों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित कराने के लिए उन्हें प्रेरित करने का अनुरोध किया है।</p>
<h3><strong>आवेदन के लिए यह छात्र होंगे पात्र</strong></h3>
<p>इस योजना के लिए बीई और बीटेक के वे छात्र आवेदन कर सकते हैं, जिन्होंने छठा सेमेस्टर पूर्ण कर लिया हो। एमई, एमटेक और एमएससी के छात्रों के लिए प्रथम सेमेस्टर पूर्ण होना अनिवार्य है, जबकि बीएससी और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के केवल अंतिम वर्ष के छात्र ही पात्र होंगे। पीएचडी शोधार्थियों के लिए कोर्सवर्क पूर्ण किया होना आवश्यक किया गया है। आवेदकों के पास न्यूनतम 60 प्रतिशत अंक या 10 के पैमाने पर 6.32 सीजीपीए होना चाहिए। इंटर्नशिप की अवधि पाठ्यक्रम के अनुसार 10 सप्ताह से लेकर 52 सप्ताह तक निर्धारित की गई है।</p>
<h3><strong>इसरो की वेबसाइट से करना होगा आवेदन</strong></h3>
<p>छात्रों को आवेदन इसरो की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से करना होगा, जहां पात्रता, आवश्यक दस्तावेज और आवेदन प्रक्रिया से संबंधित विस्तृत जानकारी उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त एकेटीयू के इनोवेशन हब द्वारा विश्वविद्यालय स्तर पर समन्वय और रिकॉर्ड संधारण के लिए एक गूगल फॉर्म भी अनिवार्य रूप से भरना होगा।</p>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/569435/aktu-graduate-students-can-also-do-internship-at-isro--apply-soon-from-this-website</link>
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                <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 10:54:41 +0530</pubDate>
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