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                <title>Space Mission - Amrit Vichar</title>
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                <description>Space Mission RSS Feed</description>
                
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                <title>Uttrakhand News : क्या है सूरज पर 'कोरोना' का रहस्य ? सुलझने के करीब पहुंची ये गुत्थी</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>अमृत विचार, नैनीताल।</strong> सूर्य का बाहरी वायु मंडल कोरोना के अत्यधिक तापमान की गुत्थी अब सुलझने के करीब जा पहुंची है। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज की शोध छात्रा अंबिका सक्सेना ने सिमुलेशन के जरिए समझाया है कि सूर्य के प्लाज्मा के तरंगों के विविध घनत्व के कारण सूर्य के कोरोना के तापमान में वृद्धि होती है।</p>
<p><strong>सूर्य की अंतिम परत को कहते हैं कोरोना</strong><br />सूर्य का वायु मंडल पृथ्वी की ही तरह है। पृथ्वी के वायु मंडल की आखिरी परत अधिक ठंडी होती है, जबकि सूर्य के वायु मंडल की अंतिम परत बेतहाशा गर्म होती है। सूर्य की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582933/what-is-the-mystery-of-the-sun-s--corona---this-riddle-is-close-to-being-solved"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/corona.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>अमृत विचार, नैनीताल।</strong> सूर्य का बाहरी वायु मंडल कोरोना के अत्यधिक तापमान की गुत्थी अब सुलझने के करीब जा पहुंची है। आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज की शोध छात्रा अंबिका सक्सेना ने सिमुलेशन के जरिए समझाया है कि सूर्य के प्लाज्मा के तरंगों के विविध घनत्व के कारण सूर्य के कोरोना के तापमान में वृद्धि होती है।</p>
<p><strong>सूर्य की अंतिम परत को कहते हैं कोरोना</strong><br />सूर्य का वायु मंडल पृथ्वी की ही तरह है। पृथ्वी के वायु मंडल की आखिरी परत अधिक ठंडी होती है, जबकि सूर्य के वायु मंडल की अंतिम परत बेतहाशा गर्म होती है। सूर्य की अंतिम परत को कोरोना कहा जाता है। जिसमें आश्चर्यजनक बात यह है कि सूर्य की सतह के ताप से कोरोना का तापमान लाखों गुना अधिक रहता  है। सूर्य की सतह पर 5500 डिग्री सेल्सियस तापमान रहता है, जबकि कोरोना का ताप हजारों केल्विन तक पहुंच जाता है। कोरोना का तापमान क्यों इतना अधिक रहता है। इस बारे में अभी तक सटीक जानकारी नहीं मिल पाई है। इस रहस्य को समझने के लिए अनेकों शोध किए जा चुके हैं, लेकिन इस रहस्य का आज भी पता नहीं चल सका है। </p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/girl.jpg" alt="GIRL" width="1920" height="1080"></img></p>
<p><strong>छात्रा ने किया प्लाजमा पर शोध</strong><br />इधर एरीज की शोध छात्रा अंबिका सक्सेना ने सूर्य से निकलने वाले प्लाज्मा पर शोध किया है। उनके शोध में बताया है कि प्लाज्मा के तरंगों का घनत्व एक समान न होकर अलग अलग रहता है। सूर्य का कोरोना चुंबकीय संरचनाओं से भरा हुआ है जो तरंगों के प्रवाह के साथ लगातार हिलती रहती हैं। इनमें सबसे सामान्य अनुप्रस्थ चुंबकीय जलगतिकीय (एमएचडी) तरंगें हैं। इन्हें अल्फ़वेनिक या किंक तरंगें भी कहा जाता है। ये तरंगें इन चुंबकीय संरचनाओं के साथ बाहर की ओर बढ़ते हुए कोरोना की संरचनाओं को अगल-बगल दोलन कराती हैं। जिसकी वजह से कोराना के तापमान में अंतर आता है। </p>
<p><strong>एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में प्रकाशित शोध</strong><br />शोध छात्रा अंबिका सक्सेना ने आईआईटी दिल्ली के भौतिकी विभाग के प्रो वैभव पंत के सूपरविजन में यह शोध किया है। उन्होंने अनुप्रस्थ काट में घनत्व असमानताओं वाले एक खुले क्षेत्र के कोरोनल क्षेत्र का सिमुलेशन किया। जिसमे निचली सीमा पर अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न की गईं और उन्हें संरचित चुंबकीय क्षेत्र के ऊपर की ओर भेजा गया। तब  सूर्य के कोरोना का तापमान में वृद्धि का यह कारण सामने आया । एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल  में यह शोध प्रकाशित हुआ है। </p>
<p><strong>कोरोना के ताप को पूरी तरह समझने में अभी वक्त लगेगा </strong><br />अंबिका सक्सेना कहती हैं कि इससे सूर्य के कोरोना के अत्यधिक तापमान के कारण का कुछ हद तक पता चलता है, लेकिन अभी यह नहीं कहा जा सकता कि यही एक कारण है। इसके और भी कई कारण हो सकते हैं। जिनका पता लगाने में अभी लंबा समय लगेगा। वह आगे भी इस पर शोध जारी रखेंगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि कई दशकों से इस रहस्य को सुलझाने में जुटे सौर वैज्ञानिक अगले कुछ वर्षों में ही इस गुत्थी को पूरी तरह सुलझा लेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तराखंड</category>
                                            <category>नैनीताल</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 May 2026 10:07:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Monis Khan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मरीन लाइफ :  जेलीफिश, प्रकृति का पारदर्शी चमत्कार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जेलीफिश का शरीर बेहद मुलायम, पारदर्शी और जेल जैसा होता है, जिससे इन्हें ‘समुद्री जेली’ भी कहा जाता है। इनका शरीर लगभग 95 प्रतिशत पानी से बना होता है, इसलिए ये बहुत हल्की होती हैं और समुद्र की लहरों के साथ आसानी से तैरती रहती हैं। जेलीफिश की सबसे खास बात यह है कि इनमें दिल, दिमाग और हड्डियां नहीं होतीं, फिर भी ये लाखों वर्षों से पृथ्वी पर जीवित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जेलीफिश को दिल की आवश्यकता इसलिए नहीं होती, क्योंकि इनके शरीर में रक्त संचार (ब्लड सर्कुलेशन) की जटिल प्रणाली नहीं होती। इनके शरीर की संरचना इतनी सरल होती है</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579034/marine-life--jellyfish%E2%80%94nature-s-transparent-miracle"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(20)11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जेलीफिश का शरीर बेहद मुलायम, पारदर्शी और जेल जैसा होता है, जिससे इन्हें ‘समुद्री जेली’ भी कहा जाता है। इनका शरीर लगभग 95 प्रतिशत पानी से बना होता है, इसलिए ये बहुत हल्की होती हैं और समुद्र की लहरों के साथ आसानी से तैरती रहती हैं। जेलीफिश की सबसे खास बात यह है कि इनमें दिल, दिमाग और हड्डियां नहीं होतीं, फिर भी ये लाखों वर्षों से पृथ्वी पर जीवित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जेलीफिश को दिल की आवश्यकता इसलिए नहीं होती, क्योंकि इनके शरीर में रक्त संचार (ब्लड सर्कुलेशन) की जटिल प्रणाली नहीं होती। इनके शरीर की संरचना इतनी सरल होती है कि पानी सीधे इनके ऊतकों (टिश्यू) के बीच से गुजरता है। इसी पानी के माध्यम से ऑक्सीजन और पोषक तत्व शरीर के सभी हिस्सों तक पहुंच जाते हैं। इस प्रक्रिया को डिफ्यूजन कहा जाता है, जिससे ये बिना दिल और ब्लड वेसल्स के भी आसानी से जीवित रह पाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इनका शरीर मुख्य रूप से एक घंटी के आकार का होता है, जिसके नीचे लटकती हुई टेंटेकल्स होती हैं। इन टेंटेकल्स में सूक्ष्म डंक होते हैं, जिन्हें नेमाटोसिस्ट कहा जाता है। ये डंक शिकार को पकड़ने और खुद की रक्षा करने में मदद करते हैं। कुछ जेलीफिश का डंक इंसानों के लिए भी खतरनाक हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जेलीफिश का अपना कोई विकसित दिमाग नहीं होता, लेकिन इनके पास एक सरल तंत्रिका जाल (nerve net) होता है, जो इन्हें अपने आसपास के वातावरण को महसूस करने में मदद करता है। ये प्रकाश और स्पर्श के प्रति प्रतिक्रिया कर सकती हैं, जिससे ये दिशा बदलने या खतरे से बचने में सक्षम होती हैं।<br />एक और रोचक तथ्य यह है कि कुछ जेलीफ़िश प्रजातियां, जैसे कि ‘अमर जेलीफिश’, अपनी उम्र को वापस शुरुआती अवस्था में ले जाने की क्षमता रखती हैं, जिससे वे सैद्धांतिक रूप से अमर मानी जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जेलीफिश समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये छोटे जीवों को खाकर संतुलन बनाए रखती हैं और खुद भी कई बड़े समुद्री जीवों के भोजन का स्रोत होती हैं। इस तरह, अपनी सरल संरचना के बावजूद, जेलीफिश समुद्र के जीवन चक्र में एक अहम कड़ी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 11:01:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सर्पविष का विज्ञान:  संरचना और प्रभाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत में आदिकाल से सांप से संबंधित फोकलोर और वैज्ञानिक साहित्य उपलब्ध है। आयुर्वेद में विष चिकित्सा में इनका वर्णन है। अंग्रेजों के समय में भारत उपमहाद्वीप ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और बर्मा में पाए जाने वाले सांपों की प्रजातियों और इनके जहर के बारे में विशेष अध्ययन और डॉक्यूमेंटेशन वर्क हुआ था। इन पुस्तकों में सभी किस्म सांपों के हाथ से बनाए गए रंगीन चित्र दिए गए हैं। इनके बारे में बहुत सा अध्ययन ब्रिटेन की लैब्स में उन दिनों अंग्रेज वैज्ञानिकों ने किया था और मनुष्य में सांप के काटने के बाद शरीर में फैलने वाले इन जहरों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579032/the-science-of-snake-venom--structure-and-effects"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(18)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में आदिकाल से सांप से संबंधित फोकलोर और वैज्ञानिक साहित्य उपलब्ध है। आयुर्वेद में विष चिकित्सा में इनका वर्णन है। अंग्रेजों के समय में भारत उपमहाद्वीप ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और बर्मा में पाए जाने वाले सांपों की प्रजातियों और इनके जहर के बारे में विशेष अध्ययन और डॉक्यूमेंटेशन वर्क हुआ था। इन पुस्तकों में सभी किस्म सांपों के हाथ से बनाए गए रंगीन चित्र दिए गए हैं। इनके बारे में बहुत सा अध्ययन ब्रिटेन की लैब्स में उन दिनों अंग्रेज वैज्ञानिकों ने किया था और मनुष्य में सांप के काटने के बाद शरीर में फैलने वाले इन जहरों को बे-असर करने के उपाय विकसित किए गए थे। </p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक मॉलिक्यूलर बायोलॉजीकल अध्ययनों से विभिन्न जहरीले सांपों के जहर की विस्मित करने वाली संरचनाएं सामने आईं हैं। दवा उद्योग में सांपों के विभिन्न प्रकार के जहर की बड़ी मांग है, क्योंकि इस पर अरबों रुपये का उद्योग खड़ा किया गया है। मनुष्य और पालतू पशुओं की जान बचाने के लिए या एन्वीनोमिंग के लिए जो एंटीबाडीज और अन्य उत्पाद दवा फैक्ट्रीज में बनाए जाए हैं, उससे पहले इन पर व्यापक अध्ययन किया जाता है और खास तरह की प्रोसस्सेस को विकसित किया जाता है। अब सांप के काटे का टीका बनाने के लिए घोड़ों का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है,  क्योंकि बायोटेक्नोलॉजी और केमिकल विधियों से इन्हें बड़ी मात्रा में निर्मित करना सिद्ध किया जा चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोग सांप के प्रति एक ही प्रकार का नजरिया रखते हैं: मार देना। यह बिल्कुल प्रकृति विरुद्ध काम है। सांपों के परिवेश अर्थात हैबिटैट और व्यवहार का अध्ययन करने वाले कुछ और कहते हैं। भारत में सांपों की करीब 300 किस्में हैं और इनके रंग और हैबिटैट भी अलग है। इनमें से नाग अर्थात कोबरा, वाईपर की दो किस्में और करात ही जहरीले हैं। सांप प्रजातियों की खुराक अलग-अलग होती है। भारत में सभी सांप जहरीले नहीं हैं। इनमें चार प्रकार के जहर होते हैं। ये एक प्रकार के कुदरती एंजाइम अथवा प्रोटीन होते हैं और इनकी रासायनिक और मॉलिक्यूलर संरचना अलग-अलग तरह की होती है। ज्यादातर जहर चार प्रकार के असर वाले यथा न्यूरोटॉक्सिक, साइटोटॉक्सिक, हीमोटॉक्सिक और मायोटॉक्सिक हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">अर्थात कोई जहर शरीर के नर्वस सिस्टम, दूसरा, रक्त कोशिकाओं, तीसरा शरीर के उत्तकों की कोशिकाओं और चौथा मांशपेशियों की कोशिकाओं को नष्ट करता है। सांप अपने शरीर में जहर का निर्माण अथवा सिंथेसिस शिकार को बेदम करने के लिए और अपनी रक्षा करने के लिए करते हैं। इन चारों किस्म के जहर का निर्माण करने के लिए सांप के शरीर में विशेष कोशिकाएं/ग्रंथियां होती हैं। विष का उत्पादन अत्यधिक विशिष्ट लार स्रावी ग्रंथियों के भीतर होता है। रूपांतरित ग्रंथियां अथवा एपिथीलियल कोशिकाएं विभिन्न प्रोटीन घटकों का संश्लेषण करती हैं। सांपों के जहर की एक बड़ी वैरायटी फोस्फोलायीपेज ए-2 डाइजेस्टिव एंजाइम से ‘तेज विकास’ की प्रक्रिया के जरिए विकसित हुई है। इन जहरों के अलग-अलग टिश्यू टारगेट, मेम्ब्रेन रिसेप्टर और सेल प्लाज्मा मेम्ब्रेन को बदलने के अलग-अलग तरीके होते हैं। जहर जैसे असरात दिखाने वाले फोस्फोलायीपेज ए-2 की किस्मों से होने वाले दो सबसे आम असर हैं न्यूरोटॉक्सिसिटी और मायोटॉक्सिसिटी। </p>
<p style="text-align:justify;">विभिन्नताओं के बावजूद, सांप का जहर एक जैसा सेल्यूलर घाव कैसे पैदा करते हैं, जो विकास के नजरिए से बहुत ज्यादा सुरक्षित है। वे शुरू में प्लाज्मा मेम्ब्रेन में गड़बड़ी पैदा करते हैं, जिससे साइटोसोलिक कैल्शियम आयन Ca2+ की मात्रा में भारी बढ़ोतरी होती है, जिससे सेल का क्षरण होता है। यह प्रक्रिया उन तरीकों से होती है, जिसमें मांसपेशियों के सेल्स और न्यूरोमस्कुलर जंक्शन प्रभावित होते हैं। उक्त कैल्शियम आयन एक धनात्मक आवेश वाला आयन है और कई जैविक तथा शारीरिक प्रक्रियाओं के लिए जरूरी है। यह एक द्विसंयोजी धनायन है, जिसका मतलब है कि जब एक उदासीन कैल्शियम परमाणु अपने दो सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन खो देता है, तो उस पर +2 का आवेश आ जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस धनात्मक आवेश के कारण यह ऋ णात्मक आवेश वाले आयनों (ऋ णायनों) -जैसे कि फॉस्फेट और कार्बोनेट, के साथ आयनिक बंध बना पाता है। यह प्रक्रिया कैल्शियम लवणों के निर्माण और हड्डियों के खनिजीकरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहरों से होने वाले अलग-अलग सिस्टमिक पैथोफिजियोलॉजिकल नतीजे सेल टॉक्सिसिटी के अलग-अलग तरीकों की वजह से नहीं होते, बल्कि टारगेट किए गए टिश्यू और सेल्स की अंदरूनी शारीरिक और जैविक विशेषताओं की वजह से होते हैं। फोस्फोलायीपेज ए-2 एक ऐसा एंजाइम है, जो फॉस्फोलिपिड्स के हाइड्रोलिसिस को उत्प्रेरित करता है। </p>
<p style="text-align:justify;">वाइपर सांप की किस्म के विष के मामले में, फोस्फोलायीपेज ए-2 द्वारा पैदा की गई स्थानीय विकृति अन्य विषाक्त घटकों -मुख्य रूप से जिंक-निर्भर मेटालोप्रोटीनेज, की क्रिया से और भी अधिक जटिल हो जाती है। ये घटक रक्तस्राव, फफोले और अन्य ऐसे बदलाव पैदा करते हैं, जो ऊतकों को व्यापक नुकसान पहुंचाने और ऊतकों के खराब पुनर्निर्माण के कारण होने वाले दीर्घकालिक परिणामों अर्थात सीक्वेली के लिए जिम्मेदार होते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, विषाक्त पदार्थों के कारण ऊतकों को होने वाला नुकसान बैक्टीरिया के संक्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है। यह संक्रमण स्थानीय विकृति को और भी अधिक जटिल बना देता है और अंततः गैंग्रीन तथा ऊतकों के नष्ट होने का कारण बन सकता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रभावित अंग को काटकर अलग करने की आवश्यकता पड़ सकती है। इन फोस्फोलायीपेज ए-2  टॉक्सिन्स के समूह का गहन अध्ययन किया जाता है, क्योंकि कई देशों में सर्पदंश से मरने वाले लोगों की बड़ी संख्या बहुत गंभीर है। टॉक्सिन्स का अध्ययन इसलिए भी किया जाता है, क्योंकि वे ऊतकों और कोशिकाओं की कार्यप्रणाली  के अज्ञात पहलुओं को उजागर करने में मदद कर सकते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:00:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिक फैक्ट :  क्यों दिखाई पड़ता है आकाश का रंग नीला</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">साफ और धूप वाले दिन जब हम आसमान की ओर देखते हैं, तो वह हमें चमकीला नीला दिखाई देता है, जबकि शाम के समय वही आकाश लाल, नारंगी और गुलाबी रंगों में बदल जाता है। यह परिवर्तन प्रकृति के एक बेहद रोचक वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है, जिसे समझने के लिए हमें प्रकाश और वायुमंडल की भूमिका जाननी होती है। सूर्य से आने वाला प्रकाश देखने में भले ही सफेद लगता हो, लेकिन वास्तव में यह कई रंगों लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी (इंडिगो) और बैंगनी का मिश्रण होता है। इन सभी रंगों की तरंगदैर्ध्य अलग-अलग होती है। लाल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579033/scientific-fact--why-does-the-sky-appear-blue"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(19)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">साफ और धूप वाले दिन जब हम आसमान की ओर देखते हैं, तो वह हमें चमकीला नीला दिखाई देता है, जबकि शाम के समय वही आकाश लाल, नारंगी और गुलाबी रंगों में बदल जाता है। यह परिवर्तन प्रकृति के एक बेहद रोचक वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है, जिसे समझने के लिए हमें प्रकाश और वायुमंडल की भूमिका जाननी होती है। सूर्य से आने वाला प्रकाश देखने में भले ही सफेद लगता हो, लेकिन वास्तव में यह कई रंगों लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी (इंडिगो) और बैंगनी का मिश्रण होता है। इन सभी रंगों की तरंगदैर्ध्य अलग-अलग होती है। लाल रंग की तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होती है, जबकि नीले और बैंगनी रंग की सबसे कम। कम तरंगदैर्ध्य वाले रंगों में ऊर्जा अधिक होती है और वे वातावरण में अधिक बिखरते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जब सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो वह गैसों (जैसे ऑक्सीजन और नाइट्रोजन), धूलकणों और जलवाष्प से टकराता है। इस टकराव के कारण प्रकाश का बिखराव होता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में “रेले प्रकीर्णन” कहा जाता है। इस प्रक्रिया में नीले और बैंगनी रंग की तरंगें सबसे अधिक बिखरती हैं। हालांकि बैंगनी रंग का बिखराव अधिक होता है, फिर भी हमें आकाश नीला दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि हमारी आंखें नीले रंग के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं और सूर्य से भी नीले प्रकाश की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक पहुंचती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिन के समय सूर्य सिर के ऊपर होता है, जिससे प्रकाश को कम दूरी तय करनी पड़ती है और नीला प्रकाश हर दिशा में बिखरकर पूरे आकाश को नीला बना देता है, लेकिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य क्षितिज के पास होता है, जिससे प्रकाश को अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। इस दौरान नीला और बैंगनी प्रकाश रास्ते में ही बिखर जाता है और हमारी आंखों तक मुख्यतः लाल, नारंगी और पीले रंग की किरणें पहुंचती हैं, जिससे आकाश का रंग बदल जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऊंचाई बढ़ने पर आकाश का रंग और गहरा नीला दिखाई देता है, क्योंकि वहां वायुमंडल पतला होता है और बिखराव कम होता है। अंतरिक्ष में तो लगभग कोई वायुमंडल नहीं होता, इसलिए वहां आकाश काला दिखाई देता है। इस प्रकार, आकाश का नीला रंग प्रकृति की एक सुंदर वैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है, जो हमें हर दिन एक नया और आकर्षक दृश्य प्रदान करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:00:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धूमकेतु के लिए रोमांचक माह अप्रैल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अप्रैल माह धूमकेतु दर्शन के लिए एक रोमांचक समय होगा, क्योंकि इस महीने में कम से कम दो प्रमुख धूमकेतु नग्न आंखों से या दूरबीन की मदद से दिखाई दे सकते हैं। ये धूमकेतु लंबी अवधि के (लॉन्ग-पिरियड) और आवर्ती (पिरियडिक) प्रकार के हैं। मुख्य रूप से दो धूमकेतु सी/2026 ए1 (मैप्स) और सी/2025 आर3 (पैनस्टार्स), जिनकी चमक अपेक्षाकृत अधिक होने की संभावना है। इसके अलावा, 10पी/टेम्पेल 2 जैसे अन्य धूमकेतु दूरबीन से दिखाई दे सकते हैं, लेकिन वे कम चमकीले होंगे। ध्यान दें कि धूमकेतु की चमक मौसम, वायुमंडलीय स्थितियों और उनके व्यवहार पर निर्भर करती है, इसलिए पूर्वानुमान</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578932/april--an-exciting-month-for-comet"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(75).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अप्रैल माह धूमकेतु दर्शन के लिए एक रोमांचक समय होगा, क्योंकि इस महीने में कम से कम दो प्रमुख धूमकेतु नग्न आंखों से या दूरबीन की मदद से दिखाई दे सकते हैं। ये धूमकेतु लंबी अवधि के (लॉन्ग-पिरियड) और आवर्ती (पिरियडिक) प्रकार के हैं। मुख्य रूप से दो धूमकेतु सी/2026 ए1 (मैप्स) और सी/2025 आर3 (पैनस्टार्स), जिनकी चमक अपेक्षाकृत अधिक होने की संभावना है। इसके अलावा, 10पी/टेम्पेल 2 जैसे अन्य धूमकेतु दूरबीन से दिखाई दे सकते हैं, लेकिन वे कम चमकीले होंगे। ध्यान दें कि धूमकेतु की चमक मौसम, वायुमंडलीय स्थितियों और उनके व्यवहार पर निर्भर करती है, इसलिए पूर्वानुमान बदल सकते हैं। भारत (उत्तर गोलार्ध) से देखने के लिए सामान्य दिशा और समय पर फोकस करना आवश्यक है।- डॉ. इरफान ह्यूमन, एसोसिएट प्रोफेसर/विज्ञान लेखक</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(74).jpg" alt="वायरल तस्वीर (74)"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">सी/2026 ए1 (मैप्स) - संग्रेजिंग धूमकेतु</h5>
<p style="text-align:justify;">यह धूमकेतु 13 जनवरी, 2026 को चिली के अमैक्स1 वेधशाला में चार खगोलशास्त्रियों द्वारा खोजा गया। यह क्रूट्ज संग्रेजर समूह का सदस्य है, जो सूर्य के बहुत निकट से गुज़रने वाले धूमकेतु हैं। यह अब तक का सबसे पहले खोजा गया इनबाउंड क्रूट्ज धूमकेतु है (पेरिहेलियन से 11.5 सप्ताह पहले)। पेरिहेलियन एक खगोलीय अवधारणा है, जो सूर्य-केंद्रित कक्षाओं (जैसे ग्रहों, धूमकेतुओं या अन्य वस्तुओं की कक्षा) से संबंधित है। यह वह बिंदु है, जहां कोई वस्तु (जैसे पृथ्वी या धूमकेतु) अपनी कक्षा में सूर्य के सबसे निकट पहुंचती है। पेरी का अर्थ सबसे निकट और हेलियन का अर्थ सूर्य होता है। अर्थात सूर्य के चारों ओर घूमने वाली वस्तुओं की कक्षा आमतौर पर अंडाकार (एलिप्टिकल) होती है, न कि पूरी तरह गोलाकार। इसलिए इन पिंडों की दूरी हमेशा एक समान नहीं रहती।</p>
<p style="text-align:justify;">संग्रेजिंग धूमकेतु के पेरिहेलियन की बात करें, तो 4 अप्रैल, 2026 को यह सूर्य की सतह से मात्र 7,48,000 किलोमीटर (4,65,000 मील) की दूरी पर रहेगा। यह सूर्य के व्यास का आधा हिस्सा जितना निकट है। इसकी अपेक्षित चमक की बात करें, तो यदि यह टूटा नहीं, तो इसकी चमक -4 मैग्निट्यूड तक पहुंच सकती है (शुक्र ग्रह जितनी चमकीली)। इससे पहले मार्च के अंत में बड़े शौकिया दूरबीनों से 13 मैग्निट्यूड पर दिखाई देगी, लेकिन अप्रैल में तेजी से चमक बढ़ेगी। लंबी पूंछ विकसित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अप्रैल में सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में मध्य-ट्वाइलाइट (अर्ध-अंधेरे) में दिखाई दे सकता है। दक्षिणी गोलार्ध में मार्च के अंत से ही दिखना शुरू हो सकता है, लेकिन उत्तर भारत से अप्रैल में पश्चिम क्षितिज पर निम्न ऊंचाई पर रहेगा। अप्रैल के मध्य के बाद यह सूर्य के करीब होने के कारण इसे देखना कठिन हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सूर्यास्त के तुरंत बाद (लगभग 6-7 बजे आईएसटी) पश्चिम की ओर देखें, जहां यह शुक्र ग्रह के आसपास होगा। 8 अप्रैल को शुक्र के बहुत पास दिखाई दिया। नग्न आंखों से या छोटी दूरबीन से पूंछ दिख सकती है, लेकिन सूर्य के करीब होने से इसका दृश्यावलोकन कठिन होगा। इसे देखने के लिए अवरोध-रहित क्षितिज चुनें। यदि इस धूमकेतु की चमक -4 तक पहुंची, तो दिन के उजाले में भी दिख सकता है। संभावित जोखिम यह है कि सूर्य के निकट गर्मी और गुरुत्वाकर्षण से यह पूरी तरह टूट सकता है। यदि ऐसा हुआ, तो चमक कम हो जाएगी। फिर भी यदि बचा रहा, तो सूर्य के करीब होने से इसे देखना चुनौतीपूर्ण रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">संग्रेजिंग धूमकेतु के पेरिहेलियन की बात करें, तो 4 अप्रैल, 2026 को यह सूर्य की सतह से मात्र 7,48,000 किलोमीटर (4,65,000 मील) की दूरी पर रहेगा। यह सूर्य के व्यास का आधा हिस्सा जितना निकट है। इसकी अपेक्षित चमक की बात करें, तो यदि यह टूटा नहीं, तो इसकी चमक -4 मैग्निट्यूड तक पहुंच सकती है (शुक्र ग्रह जितनी चमकीली)। इससे पहले मार्च के अंत में बड़े शौकिया दूरबीनों से 13 मैग्निट्यूड पर दिखाई देगी, लेकिन अप्रैल में तेजी से चमक बढ़ेगी। लंबी पूंछ विकसित हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अप्रैल में सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में मध्य-ट्वाइलाइट (अर्ध-अंधेरे) में दिखाई दे सकता है। दक्षिणी गोलार्ध में मार्च के अंत से ही दिखना शुरू हो सकता है, लेकिन उत्तर भारत से अप्रैल में पश्चिम क्षितिज पर निम्न ऊंचाई पर रहेगा। अप्रैल के मध्य के बाद यह सूर्य के करीब होने के कारण इसे देखना कठिन हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सूर्यास्त के तुरंत बाद (लगभग 6-7 बजे आईएसटी) पश्चिम की ओर देखें, जहां यह शुक्र ग्रह के आसपास होगा। 8 अप्रैल को शुक्र के बहुत पास दिखाई दिया। नग्न आंखों से या छोटी दूरबीन से पूंछ दिख सकती है, लेकिन सूर्य के करीब होने से इसका दृश्यावलोकन कठिन होगा। इसे देखने के लिए अवरोध-रहित क्षितिज चुनें। यदि इस धूमकेतु की चमक -4 तक पहुंची, तो दिन के उजाले में भी दिख सकता है। संभावित जोखिम यह है कि सूर्य के निकट गर्मी और गुरुत्वाकर्षण से यह पूरी तरह टूट सकता है। यदि ऐसा हुआ, तो चमक कम हो जाएगी। फिर भी यदि बचा रहा, तो सूर्य के करीब होने से इसे देखना चुनौतीपूर्ण रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">10 पी/टेंपेल 2 एक आवर्ती धूमकेतु है, जिसकी कक्षीय अवधि 5.5 वर्ष है। इसकी चमक 12 मैग्निट्यूड, शाम और सुबह के आकाश में (ऊंचाई 11-44 डिग्री) पर ओफ्यूकस तारामंडल में दिखाई देगा। यह दूरबीन से ही दिखेगा, नग्न आंखों से नहीं, क्योंकि इसका चरम अगस्त 2026 में होगा। इसे देखने के लिए शाम को पश्चिम या सुबह पूर्व दिखा में खोजें। एक अन्य धमकेतु सी/2024 ई1 (विएरझोस), जिसका 10 मैग्निट्यूड होगा, शाम में दिखाई देगा, लेकिन ये कम उल्लेखनीय हैं और शौकिया खगोलविदों के लिए यह भी दूरबीनों से दृष्टिगोचर होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 08:00:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चंद्रमा की गोद से पृथ्वी पर वापसी, आर्टेमिस-2 का ऐतिहासिक सफर पूरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ह्यूस्टनः </strong>आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्रियों के शुक्रवार को प्रशांत महासागर में उतरने के साथ ही आधी सदी से अधिक समय बाद मनुष्य की पहली चंद्र यात्रा पूरी हो गई। चार अंतरिक्ष यात्रियों वाला दल सफल चंद्र मिशन के बाद पृथ्वी पर लौटा। इस मिशन के दौरान उन्होंने चंद्रमा के उस हिस्से को देखा, जिसे पहले कभी इतने करीब से नहीं देखा गया था और इसने मानव इतिहास में सबसे ज्यादा दूरी तय करने का नया रिकॉर्ड भी बनाया। इस दौरान पूर्ण सूर्य ग्रहण भी दिखाई दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्टेमिस-2 चंद्रमा पर नहीं उतरा और न ही उसकी परिक्रमा की लेकिन उसने अपोलो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578242/returning-to-earth-from-the-moon-s-embrace--artemis-2-s-historic-journey-completes"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/muskan-dixit-(21)3.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ह्यूस्टनः </strong>आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्रियों के शुक्रवार को प्रशांत महासागर में उतरने के साथ ही आधी सदी से अधिक समय बाद मनुष्य की पहली चंद्र यात्रा पूरी हो गई। चार अंतरिक्ष यात्रियों वाला दल सफल चंद्र मिशन के बाद पृथ्वी पर लौटा। इस मिशन के दौरान उन्होंने चंद्रमा के उस हिस्से को देखा, जिसे पहले कभी इतने करीब से नहीं देखा गया था और इसने मानव इतिहास में सबसे ज्यादा दूरी तय करने का नया रिकॉर्ड भी बनाया। इस दौरान पूर्ण सूर्य ग्रहण भी दिखाई दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्टेमिस-2 चंद्रमा पर नहीं उतरा और न ही उसकी परिक्रमा की लेकिन उसने अपोलो 13 के दूरी के रिकॉर्ड को तोड़ दिया और पृथ्वी से मानव द्वारा की गई अब तक की सबसे लंबी यात्रा का उस समय रिकॉर्ड बनाया, जब चालक दल 252,756 मील (406,771 किमी) की दूरी तक पहुंचा। कमांडर रीड वाइसमैन, पायलट विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडा के जेरेमी हैनसेन 'मैक 33' यानी ध्वनि की गति से 33 गुना अधिक रफ्तार से वायुमंडल में दाखिल हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">'इंटीग्रिटी' नामक उनका ओरियन कैप्सूल स्वचालित प्रणाली के सहारे समुद्र में उतरा। मिशन नियंत्रण कक्ष में उस समय तनाव बढ़ गया जब अत्यधिक ताप के दौरान कैप्सूल लाल गर्म प्लाज्मा से घिर गया और तय योजना के अनुसार कुछ समय के लिए उससे संपर्क टूट गया। सबकी निगाहें कैप्सूल की जीवनरक्षक ऊष्मा-रोधी ढाल पर थीं, जिसे पुन: प्रवेश के दौरान हजारों डिग्री तापमान सहना था। मिशन नियंत्रण कक्ष के दर्शक कक्ष में अंतरिक्ष यात्रियों के परिजन भी मौजूद थे। संचार अवरोध की अवधि समाप्त होने के बाद जब कैप्सूल फिर दिखाई दिया और करीब 2,000 मील (3,219 किलोमीटर) दूर समुद्र में उतरा तो लोग खुशी से झूठ उठे।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>आर्टेमिस II मिशन के अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की परिक्रमा कर पृथ्वी पर पहुंचे: नासा </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">नासा ने कहा कि आर्टेमिस II मिशन के तहत चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर लौट आए हैं। आर्टेमिस II के चालक दल में नासा के अंतरिक्ष यात्री रीड वाइजमैन (कमांडर), विक्टर ग्लोवर (पायलट), क्रिस्टीना कोच (मिशन विशेषज्ञ) और सीएसए के अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन (मिशन विशेषज्ञ) शामिल थे और उन्होंने 10 दिनों के मिशन के बाद सैन डिएगो के तट पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की।</p>
<p style="text-align:justify;">नासा ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा: "रीड, विक्टर, क्रिस्टीना और जेरेमी का घर वापसी पर स्वागत है! आर्टेमिस II के अंतरिक्ष यात्री पूर्वी समयानुसार रात 8:07 बजे (भारतीय समयानुसार 11 अप्रैल को सुबह 5:37 बजे) लैंड किए, जिससे चंद्रमा के चारों ओर उनका ऐतिहासिक 10 दिवसीय मिशन समाप्त हो गया।"</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष यान को एक अप्रैल की शाम को स्थानीय समयानुसार फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से लॉन्च किया गया था। नासा ने छह अप्रैल को बताया कि अंतरिक्ष यान पृथ्वी से 4,06,000 किलोमीटर से अधिक दूर था। रीड वाइजमैन के नेतृत्व में चार सदस्यीय आर्टेमिस II दल ने दस दिवसीय चंद्र उड़ान पूरी की, जो 50 से अधिक वर्षों में चंद्रमा पर पहली मानवयुक्त यात्रा और सबसे लंबी मानव अंतरिक्ष उड़ान को दर्शाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/578242/returning-to-earth-from-the-moon-s-embrace--artemis-2-s-historic-journey-completes</link>
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                <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 10:04:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अप्रैल में आकाश दर्शन  </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">अप्रैल 2026 आकाश को देखने वालों के लिए काफी रोमांचक महीना है। इसमें कोई सूर्य या चंद्र ग्रहण नहीं है, लेकिन पूर्णिमा, उल्का वर्षा, ग्रहों के सुंदर संयोग और गहरी आकाशीय वस्तुएं अच्छा-खासा नज़ारा दिखाएंगी। हमें सबकुछ आसानी से दिखेगा, बस शहर की रोशनी से दूर जाएं, बाइनोकुलर या छोटा टेलीस्कोप हो तो बेहतर है। सभी समय यूटीसी में दिए गए हैं (भारतीय समय आईएसटी= यूटीसी+ 5:30 घंटे)। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<h5 style="text-align:justify;">चंद्र पूर्णिमा </h5>
<div style="text-align:justify;">2 अप्रैल को पूर्णिमा थी। चंद्रमा सूर्य से पृथ्वी के विपरीत स्थित और उसका चेहरा पूरी तरह से रोशन था। यह चरण 2:13 यूटीसी ( कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम) पर होगा।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577351/stargazing-in-april"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर3.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">अप्रैल 2026 आकाश को देखने वालों के लिए काफी रोमांचक महीना है। इसमें कोई सूर्य या चंद्र ग्रहण नहीं है, लेकिन पूर्णिमा, उल्का वर्षा, ग्रहों के सुंदर संयोग और गहरी आकाशीय वस्तुएं अच्छा-खासा नज़ारा दिखाएंगी। हमें सबकुछ आसानी से दिखेगा, बस शहर की रोशनी से दूर जाएं, बाइनोकुलर या छोटा टेलीस्कोप हो तो बेहतर है। सभी समय यूटीसी में दिए गए हैं (भारतीय समय आईएसटी= यूटीसी+ 5:30 घंटे)। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">चंद्र पूर्णिमा </h5>
<div style="text-align:justify;">2 अप्रैल को पूर्णिमा थी। चंद्रमा सूर्य से पृथ्वी के विपरीत स्थित और उसका चेहरा पूरी तरह से रोशन था। यह चरण 2:13 यूटीसी ( कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम) पर होगा। इस पूर्णिमा को प्रारंभिक मूल अमेरिकी जनजातियों द्वारा पूर्ण कृमि चंद्रमा (पिंग मून) के रूप में जाना जाता था, क्योंकि इसने मॉस पिंक या जंगली ग्राउंड फ्लॉक्स की उपस्थिति को चिह्नित किया, जो पहले वसंत फूलों में से एक है। इस चंद्रमा को स्प्राउटिंग ग्रास मून, ग्रोइंग मून और एग मून के नाम से भी जाना जाता है। कई तटीय जनजातियों ने इसे फिश मून भी कहा जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">उच्चतम बिंदु पर बुध</h5>
<div style="text-align:justify;">3 अप्रैल को बुध ग्रह सूरज से 27.8 डिग्री की सबसे ज्यादा पश्चिमी ऊंचाई पर पहुंचेगा। बुद्ध ग्रह को देखने का यह सबसे अच्छा समय है, क्योंकि यह सुबह आसमान में क्षितिज के ऊपर अपने सबसे ऊंचे बिंदु पर होगा। सूरज उगने से ठीक पहले ग्रह को पूर्वी आसमान में नीचे देखें। बुध ग्रह को देखने का आनंद वाकई अनोखा और रोमांचक होता है। सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे नजदीक ग्रह होने के कारण बुध को ‘भूतिया ग्रह’ भी कहते हैं। यह ज्यादातर समय सूर्य की चमक में छिपा रहता है, इसलिए इसे देखना चुनौतीपूर्ण, लेकिन बेहद संतोषजनक होता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बुध सूर्य से कभी ज्यादा दूर नहीं जाता। इसे देखने का सबसे अच्छा समय सूर्योदय से ठीक पहले (सुबह) या सूर्यास्त के तुरंत बाद (शाम) होता है, जब यह क्षितिज के पास चमकदार बिंदु की तरह दिखता है। सूर्यास्त के 30-40 मिनट बाद पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में देखा जाकता है। इसे देखने के लिए साफ क्षितिज चाहिए, शहर की लाइट्स से दूर बेहतर रहेगा। बुध को देखने का आनंद सिर्फ दृश्य नहीं, बल्कि यह एहसास भी है कि आप सूर्य के इतने करीब घूमते एक चट्टानी दुनिया को देख रहे हैं, जहां दिन में 400° सेल्सियस+ तापमान और जहां रात में बेहद ठंड होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">आकाश में अंधकार</h5>
<div style="text-align:justify;">17 अप्रैल को अमावस्या (न्यू मून) होगी। इस दिन चंद्रमा सूर्य की तरह पृथ्वी के एक ही तरफ स्थित रहेगा और रात्रि आकाश में दिखाई नहीं देगा। यह खगोलीय घटना 20:30 यूटीसी पर घटित होगी। यह आकाशगंगा और तारा समूहों जैसी धुंधली वस्तुओं का निरीक्षण करने के लिए इस माह का का सबसे अच्छा समय है क्योंकि इन्हें देखने के लिए चांदनी बाधा नहीं बनेगी। ऐसे में रात के आकाश में आकाशगंगा या मन्दाकिनी के दर्शन किये जा सकते हैं। नासा की शक्तिशाली हब्बल टेलिस्कोप ने अंतरिक्ष की कई आकाशगंगाओं की तस्वीरें लेने का अद्भुत काम किया है। कई आकाशगंगाएं इतनी दूर हैं कि उनका प्रकाश हम तक पहुंचने में लाखों साल का समय लग जाता  है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">अर्थ शाइन</h5>
<div style="text-align:justify;">19-20 अप्रैल को अर्थशाइन होगी, जिसे हिंदी में पृथ्वी चमक या चंद्र चमक भी कहा जाता है, एक खगोलीय घटना है जिसमें चंद्रमा के उस भाग पर पृथ्वी से परावर्तित सूर्य की रोशनी पड़ती है, जो हमारी दृष्टि से अंधेरा (अनिलुमिनेटेड) दिखाई देता है। सरल शब्दों में, जब चंद्रमा पतला (क्रिसेंट) आकार का होता है, तो उसके उज्ज्वल किनारे पर सूर्य की सीधी रोशनी पड़ती है, लेकिन अंधेरे भाग पर पृथ्वी की चमक (जो सूर्य से प्राप्त रोशनी को परावर्तित करती है) दिखाई देती है। यह चंद्रमा को दोहरी चमक वाला बनाती है, एक पतली रोशनी की पट्टी और उसके पीछे हल्की, नीली-ग्रे चमक। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह घटना अल्बर्टाे डेमोंड (15वीं शताब्दी) द्वारा वर्णित की गई थी, और इसे ‘पुराना चंद्रमा नई चंद्रमा की गोद में’ (ओल्ड मून इन द न्यू मून्स आम्र्स) भी कहा जाता है। अर्थशाइन पृथ्वी के वायुमंडल और महासागरों के कारण चमकीला होता है, जो सूर्य की रोशनी को फैलाते हैं। इसे देखने का सबसे अच्छा दृश्य नव चंद्रमा (न्यू मून) के 2-3 दिन बाद या पहले, जब चंद्रमा 5-10 प्रतिशत रोशन (इल्यूमिनेटेड) होता है। इस समय चंद्रमा सूर्योदय या सूर्यास्त के करीब होता है, और अंधेरा आकाश चमक को उभारता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">उल्का वर्षा का आनंद</h5>
<div style="text-align:justify;">अप्रैल माह में रात के आकाश में उल्का वर्षा का आनंद लिया जा सकता है। 22 व 23 अप्रैल रात के आकाष मंे लिरिड्स नामक उल्का वर्षा दिखाई देगी। आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का (मेट्योर) और साधारण बोलचाल में टूटते हुए तारे अथवा लूका कहते हैं। उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (मेट्योराइट) कहते हैं। प्रायः प्रत्येक रात्रि को उल्काएँ अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं, किंतु इनमें से पृथ्वी पर गिरने वाले पिंडों की संख्या अत्यंत अल्प होती है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक विशेष समय में रात के आकाश में इनके गिरने की संख्या बढ़ जाती है, तब इसे उल्का वर्षा (मेट्योर शॉवर) कहते हैं। यह एक औसत प्रकार की उल्का वर्षा है, जिसमें आमतौर पर प्रति घंटे लगभग 20 उल्काओं का पात होगा। यह धूमकेतु सी/1861 जी1 थैचर द्वारा छोड़े गए धूल कणों द्वारा निर्मित उल्का वर्षा है, जिसे वर्ष 1861 में खोजा गया था। उल्का वर्षा 16-25 अप्रैल तक सालाना चलती है। यह इस साल 22 की रात और 23 की सुबह अपने उत्कृष पर होगी। ये उल्कापिंड कभी-कभी चमकीले धूलकणों का उत्पादन कर सकते हैं जो कई सेकंड तक चलते हैं और टूटते तारों के रूप में दृष्टिगोचर होंगे। सर्वश्रेष्ठ दृश्य आधी रात के बाद किसी अंधेरे स्थान से दिखाई दे सकता है। उल्का नक्षत्र लियरा से आते दिखाई देंगे, लेकिन आकाश में कहीं भी दिखाई दे सकते हैं।-<strong>डॉ. इरफान ह्यूमन, एसोसिएट प्रोफेसर/विज्ञान लेखक</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 10:00:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आर्टेमिस-2 मिशन ने रचा इतिहास: चंद्रमा के सबसे दूर तक पहुंचकर अपोलो-13 का रिकॉर्ड तोड़ा, फार साइड का देखा मनोरम नजारा! </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ह्यूस्टन:</strong> अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आर्टेमिस-2 मिशन के अंतरिक्ष यात्री सोमवार रात चंद्रमा के पिछले हिस्से से निकलकर पृथ्वी की ओर रवाना हो गए। इस दौरान उन्होंने चंद्रमा के उस हिस्से को देखा, जिसे पहले कभी इतने करीब से नहीं देखा गया था और मानव इतिहास में चंद्रमा के आसपास सबसे ज्यादा दूरी तय करने का नया रिकॉर्ड भी बनाया। करीब सात घंटे का यह सफर इस मिशन का सबसे खास हिस्सा रहा। </p>
<p style="text-align:justify;">अपोलो अंतरिक्ष कार्यक्रम के बाद पहली बार नासा ने मनुष्यों को फिर से चंद्रमा पर भेजा। इस मिशन में तीन अमेरिकी और एक कनाडाई अंतरिक्ष यात्री</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577757/artemis-2-mission-creates-history--breaks-apollo-13-s-record-by-reaching-the-far-side-of-the-moon--shows-spectacular-views-of-the-far-side"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/muskan-dixit-(8)2.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ह्यूस्टन:</strong> अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आर्टेमिस-2 मिशन के अंतरिक्ष यात्री सोमवार रात चंद्रमा के पिछले हिस्से से निकलकर पृथ्वी की ओर रवाना हो गए। इस दौरान उन्होंने चंद्रमा के उस हिस्से को देखा, जिसे पहले कभी इतने करीब से नहीं देखा गया था और मानव इतिहास में चंद्रमा के आसपास सबसे ज्यादा दूरी तय करने का नया रिकॉर्ड भी बनाया। करीब सात घंटे का यह सफर इस मिशन का सबसे खास हिस्सा रहा। </p>
<p style="text-align:justify;">अपोलो अंतरिक्ष कार्यक्रम के बाद पहली बार नासा ने मनुष्यों को फिर से चंद्रमा पर भेजा। इस मिशन में तीन अमेरिकी और एक कनाडाई अंतरिक्ष यात्री हैं। इसका लक्ष्य अगले दो साल में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास मनुष्य को भेजना है। आर्टेमिस-2 ने अपोलो 13 का पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। साल 1970 में अपोलो 13 मिशन में 4,00,171 किलोमीटर की दूरी तय की गई थी, जिसे आर्टेमिस-2 मिशन के तहत पार कर लिया गया है। </p>
<blockquote class="twitter-tweet"><a href="https://twitter.com/AIRNewsHindi/status/2041346465252233354?s=20">https://twitter.com/AIRNewsHindi/status/2041346465252233354?s=20</a></blockquote>
<p style="text-align:justify;">

</p>
<p style="text-align:justify;">कनाडाई अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन ने कहा, "बिना कोई उपकरण लगाए आंखों से चंद्रमा से जो दिख रहा है, वह रोमांचित करने वाला है। यह अविश्वसनीय है।" उन्होंने कहा कि अगली पीढ़ी को इस रिकॉर्ड को जल्द तोड़ना चाहिए। रिकॉर्ड तोड़ने के तुरंत बाद अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा पर दो नए गड्ढों (क्रेटर) के नाम रखने की अनुमति मांगी। उन्होंने एक का नाम अपने कैप्सूल के नाम पर 'इंटेग्रिटी' और दूसरे का नाम कमांडर रीड वाइजमैन की पत्नी की याद में 'कैरल' रखने का प्रस्ताव दिया, जिनका 2020 में कैंसर से निधन हो गया था। इस दौरान वाइजमैन भावुक हो गए और रो पड़े। सभी चारों अंतरिक्ष यात्रियों ने एक-दूसरे को गले लगाया। बाद में वाइजमैन ने कहा, "यहां से नजारा बहुत शानदार है।" </p>
<p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष यात्रियों ने बताया कि उन्होंने एक ही तस्वीर में चंद्रमा और पृथ्वी दोनों को कैद किया और ह्यूस्टन में वैज्ञानिकों को लगातार जानकारी देते रहे। पायलट विक्टर ग्लोवर ने बताया कि कुछ पहाड़ियां इतनी चमकदार दिख रही थीं, जैसे उन पर बर्फ जमी हो। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Tech News</category>
                                            <category>Tech Alert</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 10:10:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आर्टेमिस 2 मिशन :  हम चले चांद की ओर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नासा ने बीते कल आर्टेमिस 2 मिशन की सफलतापूर्वक लॉन्चिंग कर दी। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से भारतीय समयानुसार सुबह 3:54 बजे विशाल एसएलएस रॉकेट ने आसमान में उड़ान भरी। यह 54 साल बाद इंसानों को चांद की ओर ले जाने वाला पहला मानव मिशन है। लॉन्च पूरी तरह सफल रहा और चारों अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित रूप से पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गए हैं। इस मिशन में चार सदस्यीय क्रू शामिल है</p>
<h5 style="text-align:justify;">रीड वाइसमैन (मिशन कमांडर)</h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>विक्टर ग्लोवर (पायलट) - चांद के पास जाने वाले पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री</strong><br /><strong>क्रिस्टीना कोच (मिशन स्पेशलिस्ट) - चांद मिशन पर जाने</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577354/artemis-ii-mission--we-re-heading-to-the-moon"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(1)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नासा ने बीते कल आर्टेमिस 2 मिशन की सफलतापूर्वक लॉन्चिंग कर दी। फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से भारतीय समयानुसार सुबह 3:54 बजे विशाल एसएलएस रॉकेट ने आसमान में उड़ान भरी। यह 54 साल बाद इंसानों को चांद की ओर ले जाने वाला पहला मानव मिशन है। लॉन्च पूरी तरह सफल रहा और चारों अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित रूप से पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गए हैं। इस मिशन में चार सदस्यीय क्रू शामिल है</p>
<h5 style="text-align:justify;">रीड वाइसमैन (मिशन कमांडर)</h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>विक्टर ग्लोवर (पायलट) - चांद के पास जाने वाले पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री</strong><br /><strong>क्रिस्टीना कोच (मिशन स्पेशलिस्ट) - चांद मिशन पर जाने वाली पहली महिला</strong><br /><strong>जेरेमी हैनसेन (मिशन स्पेशलिस्ट)- चांद के पास जाने वाले पहले कनाडाई अंतरिक्ष यात्री</strong></p>
<p style="text-align:justify;">ये चारों अब ओरियन कैप्सूल में बैठकर चांद की ओर बढ़ रहे हैं। आर्टेमिस 2 लैंडिंग मिशन नहीं है। यह 10 दिन का परीक्षण मिशन है। क्रू चांद के बहुत करीब- लगभग 9600 किलोमीटर तक जाएगा। वे चांद के चारों ओर घूमेंगे और फिर पृथ्वी पर वापस आएंगे। इस दौरान ओरियॉन कैप्सूल की गहरे अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता, जीवन रक्षा प्रणाली, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और हीट शील्ड की पूरी जांच की जाएगी। वापसी के समय ओरियॉन 40 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह लॉन्च इसलिए ऐतिहासिक है, क्योंकि अपोलो 17 के बाद पहली बार इंसान चांद के इतने करीब जा रहे हैं। यह मिशन आर्टेमिस कार्यक्रम की असली शुरुआत है। इसकी सफलता के बाद नासा आर्टेमिस 3 में चांद पर इंसानों को उतारेगा और आगे चलकर चांद पर स्थायी बेस बनाने की तैयारी करेगा। यह मिशन भविष्य में मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशनों की भी नींव रखेगा, साथ ही यह युवा पीढ़ी को अंतरिक्ष विज्ञान की ओर आकर्षित करेगा। 16 नवंबर सन् 2022 को आर्टेमिस-1 के प्रक्षेपण के साथ इस मिशन की शुरुआत हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब क्रू कई दिनों तक चांद की ओर बढ़ता रहेगा। वे चांद के पीछे वाले हिस्से से भी गुजरेंगे, जहां पृथ्वी से रेडियो संपर्क कुछ समय के लिए टूट जाएगा। इस दौरान कई वैज्ञानिक प्रयोग किए जाएंगे। लगभग 10 दिन बाद ओरियॉन कैप्सूल प्रशान्त महासागर में पैराशूट की मदद से उतरेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">नासा की आर्टेमिस 2 मिशन की सफल लॉन्चिंग अंतरिक्ष इतिहास का एक बड़ा पल है। 54 साल बाद इंसान फिर चांद की यात्रा पर निकले हैं। यह मिशन न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी मानवता के लिए नई उम्मीद और नई संभावनाएं लेकर आया है।-डॉ. राजीव अग्रवाल</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:28:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वाइल्ड लाइफ:  मकाऊ: वर्षावनों का रंगीन और बुद्धिमान प्रहरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मकाऊ तोते प्रकृति के सबसे आकर्षक और रंगीन पक्षियों में गिने जाते हैं। बड़े आकार, चमकीले रंगों और लंबी, खूबसूरत पूंछ के कारण ये तुरंत ध्यान खींच लेते हैं। तोते परिवार के अन्य पक्षियों से इन्हें अलग पहचान देने वाली एक खास विशेषता इनके चेहरे का वह हिस्सा है, जहां पंख नहीं होते। यह बिना पंखों वाला भाग हर प्रजाति में अलग-अलग आकार और पैटर्न में दिखाई देता है, जिससे उनकी पहचान और भी विशिष्ट हो जाती है। मकाऊ का आकार भी काफी विविध होता है। सबसे छोटे हैन मकाऊ की लंबाई लगभग 30 सेंटीमीटर (करीब 12 इंच) होती है,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574781/wildlife--the-macaw%E2%80%94the-colorful-and-intelligent-sentinel-of-the-rainforests"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(2)6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मकाऊ तोते प्रकृति के सबसे आकर्षक और रंगीन पक्षियों में गिने जाते हैं। बड़े आकार, चमकीले रंगों और लंबी, खूबसूरत पूंछ के कारण ये तुरंत ध्यान खींच लेते हैं। तोते परिवार के अन्य पक्षियों से इन्हें अलग पहचान देने वाली एक खास विशेषता इनके चेहरे का वह हिस्सा है, जहां पंख नहीं होते। यह बिना पंखों वाला भाग हर प्रजाति में अलग-अलग आकार और पैटर्न में दिखाई देता है, जिससे उनकी पहचान और भी विशिष्ट हो जाती है। मकाऊ का आकार भी काफी विविध होता है। सबसे छोटे हैन मकाऊ की लंबाई लगभग 30 सेंटीमीटर (करीब 12 इंच) होती है, जबकि हायसिंथ मकाऊ दुनिया के सबसे बड़े तोतों में गिना जाता है और इसकी लंबाई लगभग 102 सेंटीमीटर (करीब 40 इंच) तक पहुंच सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस विशालकाय मकाऊ का वजन लगभग 1550 से 1600 ग्राम तक होता है। अपने आकर्षक रूप और प्रभावशाली आकार के कारण यह पक्षी प्रकृति प्रेमियों के बीच विशेष लोकप्रिय है। भोजन की बात करें तो अधिकांश मकाऊ मुख्य रूप से बीज, मेवे और फलों पर निर्भर रहते हैं। उनकी मजबूत और शक्तिशाली चोंच उन्हें कठोर खोल वाले खाद्य पदार्थों को भी आसानी से तोड़ने में सक्षम बनाती है। ब्राजील नट्स जैसे सख्त छिलके वाले मेवे भी उनके लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं होते। यही वजह है कि मकाऊ की चोंच को प्रकृति की अद्भुत रचनाओं में से एक माना जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रजनन के समय मादा मकाऊ आमतौर पर एक से तीन अंडे देती है। अंडों से बच्चे निकलने में लगभग 26 से 29 दिन का समय लगता है, हालांकि यह अवधि प्रजाति के अनुसार थोड़ी अलग हो सकती है। रोचक बात यह है कि नर और मादा दोनों मिलकर अपने अंडों और चूजों की रक्षा करते हैं। वे अपने घोंसले आमतौर पर ऊंचे पेड़ों के खोखलों या चट्टानों की दरारों में बनाते हैं, जहां उनके बच्चों को सुरक्षित वातावरण मिल सके। मकाऊ सामाजिक और अत्यंत संवेदनशील पक्षी होते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्षावन इनके प्रमुख निवास स्थान हैं, हालांकि कुछ प्रजातियां अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रों में भी पाई जाती हैं। जंगली इलाकों में मकाऊ अक्सर मिट्टी के ऊंचे ढेरों या पहाड़ियों पर इकट्ठा होते हैं, जिन्हें ‘मकाऊ लिक्स’ कहा जाता है। यहां वे झुंड बनाकर मिट्टी खाते हैं, जो उनके पाचन तंत्र के लिए लाभकारी मानी जाती है। इन पक्षियों की बुद्धिमत्ता भी उल्लेखनीय है। मकाऊ चंचल और जिज्ञासु होते हैं तथा वे मनुष्यों की आवाजों की नकल करने में भी सक्षम होते हैं। उड़ान में भी ये कम नहीं, ये लगभग 56 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उड़ सकते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Space Mission</category>
                                            <category>Knowledge</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 09:02:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Pi Day 2026: गूगल के रंगीन डूडल ने मचाया धमाल, 14 मार्च को क्यों मनाते हैं यह गणितीय उत्सव? जानिए π के अनंत रहस्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>लखनऊः </strong>हर साल 14 मार्च को दुनिया भर में पाइ डे (Pi Day) के रूप में गणित के सबसे प्रसिद्ध स्थिरांक π (पाइ) का जश्न मनाया जाता है। इस साल 2026 में भी गूगल ने एक खास इंटरैक्टिव और रंग-बिरंगा डूडल जारी किया, जो आर्किमिडीज की प्राचीन विधि को याद दिलाता है। वृत्त (circle) के अंदर-बाहर बहुभुज बनाकर π के मान का अनुमान लगाने की उस ऐतिहासिक तकनीक को!</p>
<h3><strong>गूगल डूडल का खास संदेश  </strong></h3>
<p>गूगल के इस डूडल में π की मूल ज्यामिति (geometry) को हाइलाइट किया गया है, जो बताता है कि कैसे ग्रीक गणितज्ञ आर्किमिडीज ने सदियों पहले</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574931/pi-day-2026--google-s-colorful-doodle-creates-a-buzz--why-is-this-mathematical-festival-celebrated-on-march-14--learn-the-infinite-mysteries-of-%CF%80"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/muskan-dixit-(18)5.png" alt=""></a><br /><p><strong>लखनऊः </strong>हर साल 14 मार्च को दुनिया भर में पाइ डे (Pi Day) के रूप में गणित के सबसे प्रसिद्ध स्थिरांक π (पाइ) का जश्न मनाया जाता है। इस साल 2026 में भी गूगल ने एक खास इंटरैक्टिव और रंग-बिरंगा डूडल जारी किया, जो आर्किमिडीज की प्राचीन विधि को याद दिलाता है। वृत्त (circle) के अंदर-बाहर बहुभुज बनाकर π के मान का अनुमान लगाने की उस ऐतिहासिक तकनीक को!</p>
<h3><strong>गूगल डूडल का खास संदेश  </strong></h3>
<p>गूगल के इस डूडल में π की मूल ज्यामिति (geometry) को हाइलाइट किया गया है, जो बताता है कि कैसे ग्रीक गणितज्ञ आर्किमिडीज ने सदियों पहले वृत्त को बहुभुजों से घेरकर इसके मान को काफी सटीकता से निकाला था। डूडल में कहा गया है कि आज भी दुनिया भर के उत्साही लोग π के अंक याद करके, पाई खाकर और गणितीय चर्चाओं से इस दिन को यादगार बनाते हैं। यह डूडल गणित की विरासत को सम्मान देते हुए मॉडर्न टच देता है!</p>
<h3><strong>π क्या है और क्यों इतना खास?  </strong></h3>
<p>π वृत्त की परिधि (circumference) और व्यास (diameter) का अनुपात है, यानी परिधि ÷ व्यास = π। इसका मूल्य लगभग 3.14159... होता है, जो अनंत तक बिना दोहराव या समाप्ति के चलता रहता है। यही वजह है कि इसे अपरिमेय संख्या (irrational number) कहा जाता है। π का इस्तेमाल ज्यामिति से लेकर भौतिकी, इंजीनियरिंग, खगोल विज्ञान और क्वांटम मैकेनिक्स तक हर जगह होता है, वृत्ताकार गति, तरंगें, ब्रह्मांड की गणनाएं सबमें!</p>
<h3><strong>14 मार्च को ही क्यों चुना गया?  </strong></h3>
<p>तारीख 3/14 (अमेरिकी स्टाइल में मार्च 14) π के पहले तीन अंकों 3.14 से मिलती-जुलती है। इसी वजह से यह दिन चुना गया।</p>
<h3><strong>पाइ डे की शुरुआत और इतिहास  </strong></h3>
<p>- पहली बार 1988 में अमेरिकी भौतिकशास्त्री लैरी शॉ ने सैन फ्रांसिस्को के एक्सप्लोरेटोरियम में इसे मनाया—लोग गोल-गोल घूमे और पाई खाई!  <br />- 2009 में अमेरिकी कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय पाइ डे घोषित कर दिया।  <br />- π का प्रतीक π सबसे पहले 1706 में विलियम जोन्स ने इस्तेमाल किया, लेकिन आर्किमिडीज (250 ई.पू.) ने 96 भुजाओं वाले बहुभुजों से इसका सबसे सटीक अनुमान लगाया।</p>
<h3><strong>दुनिया के रिकॉर्ड और मजेदार तरीके  </strong></h3>
<p>- सबसे ज्यादा π के अंक याद करने का गिनीज रिकॉर्ड भारतीय राजवीर मीणा के नाम है-70,000 अंक! (2015, वेल्लोर)।  <br />- लोग आज पाई (pie) खाते हैं क्योंकि 'pie' और 'pi' सुनने में एक जैसे लगते हैं, और पाई गोल होने से π का प्रतीक भी बनती है।  <br />- π अंक याद करने की स्पर्धा, पाई ईटिंग कंटेस्ट, "Life of Pi" फिल्म देखना, या रोजमर्रा की चीजों में 3.14 ढूंढना!</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/574931/pi-day-2026--google-s-colorful-doodle-creates-a-buzz--why-is-this-mathematical-festival-celebrated-on-march-14--learn-the-infinite-mysteries-of-%CF%80</link>
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                <pubDate>Sat, 14 Mar 2026 12:52:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नासा का चंद्र मिशन फिर टला: आर्टेमिस II रॉकेट में हीलियम सिस्टम खराब, अप्रैल तक उड़ान स्थगित...फिर लौटेगा हैंगर में</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>केप कैनवेरल (अमेरिका): </strong>नासा अपने विशाल चंद्र रॉकेट को अंतरिक्ष यात्रियों के सवार होने से पहले और मरम्मत के लिए इस सप्ताह फिर से हैंगर में वापस लाएगा। अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, कम से कम अप्रैल तक उड़ान स्थगित रहेगी। </p>
<p>मौसम अनुकूल रहने पर मंगलवार को केनेडी स्पेस सेंटर के परिसर में रॉकेट को वापस ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। नासा ने बृहस्पतिवार को खतरनाक हाइड्रोजन ईंधन रिसाव को बंद करने के लिए दोबारा जांच की थी। इसी दौरान रॉकेट की हीलियम प्रणाली में खराबी आ गई, जिससे आधी सदी से अधिक समय बाद अंतरिक्ष यात्रियों की पहली</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/573018/nasa-s-lunar-mission-postponed-again--helium-system-malfunctions-in-artemis-ii-rocket--flight-postponed-until-april---then-will-return-to-hangar"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-02/muskan-dixit-(54)2.png" alt=""></a><br /><p><strong>केप कैनवेरल (अमेरिका): </strong>नासा अपने विशाल चंद्र रॉकेट को अंतरिक्ष यात्रियों के सवार होने से पहले और मरम्मत के लिए इस सप्ताह फिर से हैंगर में वापस लाएगा। अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, कम से कम अप्रैल तक उड़ान स्थगित रहेगी। </p>
<p>मौसम अनुकूल रहने पर मंगलवार को केनेडी स्पेस सेंटर के परिसर में रॉकेट को वापस ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। नासा ने बृहस्पतिवार को खतरनाक हाइड्रोजन ईंधन रिसाव को बंद करने के लिए दोबारा जांच की थी। इसी दौरान रॉकेट की हीलियम प्रणाली में खराबी आ गई, जिससे आधी सदी से अधिक समय बाद अंतरिक्ष यात्रियों की पहली चंद्र यात्रा और टल गई। इंजीनियरों ने हाइड्रोजन रिसाव पर काबू पा लिया था और प्रक्षेपण के लिए छह मार्च की तिथि तय की। प्रक्षेपण में एक माह का विलंब पहले ही हो चुका है। अचानक हीलियम प्रणाली में बाधा उत्पन्न हो गई जिससे रॉकेट के ऊपरी चरण तक हीलियम का प्रवाह बाधित हुआ। इंजनों को शुद्ध करने और ईंधन टैंकों में दबाव बनाए रखने के लिए हीलियम आवश्यक होती है। </p>
<p>नासा ने एक बयान में कहा, "समस्या के कारण का पता लगाने और उसे ठीक करने के लिए रॉकेट को केनेडी के 'व्हीकल असेंबली बिल्डिंग' में वापस ले जाना आवश्यक है।" </p>
<p>एजेंसी ने कहा कि अप्रैल में प्रक्षेपण के प्रयास के लिए तैयारियां की जा रही हैं, हालांकि यह मरम्मत की प्रगति पर निर्भर करेगा। आर्टेमिस द्वितीय मिशन के लिए चुने गए तीन अमेरिकी और एक कनाडाई अंतरिक्ष यात्री फिलहाल ह्यूस्टन में हैं और अंतरिक्षयात्रा की तैयारियां कर रहे हैं। वे 1968 से 1972 के बीच 24 अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा तक भेजने वाले नासा के अपोलो कार्यक्रम के बाद चंद्रमा की ओर उड़ान भरने वाले पहले मानव होंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Tech News</category>
                                            <category>Space Mission</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/573018/nasa-s-lunar-mission-postponed-again--helium-system-malfunctions-in-artemis-ii-rocket--flight-postponed-until-april---then-will-return-to-hangar</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/573018/nasa-s-lunar-mission-postponed-again--helium-system-malfunctions-in-artemis-ii-rocket--flight-postponed-until-april---then-will-return-to-hangar</guid>
                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 12:44:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
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