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                <title>विशेष लेख - Amrit Vichar</title>
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                <title>आर्थिक संरचना में सबसे नीचे खड़ा है मजदूर-किसान</title>
                                    <description><![CDATA[देश की विकास कथा में सबसे बड़ी विफलता यह है कि खेत में अन्न उगाने वाला किसान और मजदूर आज भी उस आर्थिक संरचना में सबसे नीचे खड़ा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589971/supreme-court-environment-clearance-development-projects-decision"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/cats38.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/cats39.jpg" alt="cats" width="148" height="170"></img>
<strong>राजेश जैन, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">भारत की विकास कथा में सबसे बड़ी विफलता यह है कि समृद्धि बढ़ने के बावजूद खेत में अन्न उगाने वाला किसान और कारखाने, सड़कें, इमारतें खड़ी करने वाला मजदूर आज भी उस आर्थिक संरचना में सबसे नीचे खड़ा है, जिसे उसकी मेहनत ने बनाया है। सवाल यह है कि आखिर क्यों? उत्तर स्पष्ट है- भारत ने विकास को ऊपर से नीचे बहने वाली प्रक्रिया मान लिया, जबकि दुनिया के सफल देशों ने नीचे से ऊपर उठने वाला मॉडल अपनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">इज़राइल के पास न विशाल भूमि है, न प्रचुर जल संसाधन, न अनुकूल जलवायु। फिर भी वह कृषि उत्पादकता के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में है। कारण-उसने खेती को दया का विषय नहीं, विज्ञान का विषय बनाया। ड्रिप इरिगेशन, सेंसर आधारित खेती, डेटा एनालिटिक्स, रिसर्च आधारित फसल प्रबंधन और जल दक्षता ने वहां कृषि को आधुनिक उद्योग का रूप दिया। भारत में इसके विपरीत खेती अब भी मानसून की दया पर निर्भर है। हम जल संकट पर सम्मेलन करते हैं, लेकिन खेतों तक आधुनिक सिंचाई तकनीक नहीं पहुंचा पाते। किसान को तकनीक की बातें तो सुनाई जाती हैं, पर उसे तकनीक तक पहुंच नहीं दी जाती। यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, प्राथमिकताओं की कमी है।</p>
<p style="text-align:justify;">नीदरलैंड आकार में भारत के कई जिलों से भी छोटा है, फिर भी कृषि निर्यात में विश्व के शीर्ष देशों में शामिल है, क्योंकि वहां किसान केवल उत्पादन नहीं करता-वह प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात का हिस्सा है। वहां खेती खेत पर खत्म नहीं होती, वहीं से उद्योग शुरू होता है। भारत में किसान आज भी मुख्यतः कच्चा माल बेचता है। टमाटर वह उगाता है, सॉस कोई और बनाता है। दूध वह निकालता है, ब्रांड कोई और बनाता है। गेहूं वह पैदा करता है, मूल्य संवर्धन का लाभ कोई और ले जाता है। यही हमारी कृषि नीति की सबसे बड़ी कमजोरी है- हम किसान को उत्पादक मानते हैं, उद्यमी नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">जर्मनी की औद्योगिक शक्ति का आधार केवल मशीनें नहीं हैं, बल्कि सुरक्षित और प्रशिक्षित श्रमिक हैं। वहां हर मजदूर के पास स्वास्थ्य सुरक्षा, पेंशन, बेरोजगारी सहायता और कार्यस्थल अधिकार हैं। श्रमिक यूनियनें केवल विरोध की संस्था नहीं, नीति निर्माण का हिस्सा हैं। भारत में मजदूर की स्थिति इसके उलट है। यहां बड़ी संख्या में श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं- बिना अनुबंध, बिना बीमा, बिना सामाजिक सुरक्षा। निर्माण स्थल पर हादसा हो जाए तो कई बार खबर तक नहीं बनती। श्रमिक को अभी भी ‘सस्ता श्रम’ समझा जाता है, ‘मानव पूंजी’ नहीं। जब तक हम मजदूर को लागत घटाने का साधन मानता रहेगा, उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन समाज मजबूत नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन का विकास केवल महानगरों की कहानी नहीं है। उसने गांवों और छोटे कस्बों में उद्योग स्थापित किए, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दिया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को औद्योगिक आधार से जोड़ा। परिणाम-पलायन नियंत्रित हुआ, आय बढ़ी और क्षेत्रीय संतुलन बना। भारत ने उल्टा रास्ता अपनाया। गांवों में अवसर सीमित रखे, शहरों में उम्मीदें केंद्रित कर दीं। परिणामस्वरूप करोड़ों लोग रोज़गार के लिए पलायन करते हैं, शहरों की झुग्गियां बढ़ती हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था खाली होती जाती है। यदि रोजगार का नक्शा विकेंद्रीकृत नहीं होगा, तो विकास भी संतुलित नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्सर तर्क दिया जाता है कि भारत की आबादी अधिक है, इसलिए चुनौतियां बड़ी हैं। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन पूर्ण सत्य नहीं। भारत के पास विशाल भूमि, युवा जनसंख्या, कृषि क्षमता, बड़ा बाजार और तकनीकी शक्ति है। कमी केवल इस बात की है कि हमने अपने उत्पादक वर्गों को रणनीतिक प्राथमिकता नहीं दी। हमने किसान के लिए राहत योजनाएं बनाईं, लेकिन लाभकारी कृषि मॉडल नहीं बनाया। हमने मजदूर के लिए पोर्टल बनाए, लेकिन सुरक्षा आधारित श्रम ढांचा नहीं खड़ा किया। हमने घोषणाएं अधिक कीं, संस्थागत सुधार कम किए।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान और मजदूर को कुछ हजार रुपये देकर या अवसर विशेष पर सम्मानित कर देने से उनकी स्थिति नहीं बदलेगी। आवश्यकता है ढांचागत सुधारों की। कृषि को उत्पादन केंद्रित से आय केंद्रित बनाना होगा। किसान को बाजार, तकनीक, भंडारण, प्रोसेसिंग और निर्यात श्रृंखला से जोड़ना होगा। श्रम नीति को केवल रोजगार सृजन तक सीमित नहीं रखना होगा; उसे सामाजिक सुरक्षा, कौशल और सम्मान आधारित बनाना होगा। गांवों में छोटे उद्योग, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और कृषि प्रसंस्करण को राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा और सबसे बढ़कर, नीति निर्माण में किसान और मजदूर को ‘लाभार्थी’ नहीं, ‘हितधारक’ मानना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 05:33:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण के विध्वंस पर नहीं लग सकती विकास की मुहर</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला मील का पत्थर साबित हो सकता है। उसने केंद्र सरकार के विकास और औद्योगिक परियोजनाओं को बाद में वैध ठहराने का रास्ता बनाने वाले कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589970/supreme-court-environment-clearance-development-projects-decision"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/cats36.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/cats37.jpg" alt="cats" width="146" height="163"></img>
<strong>पंकज चतुर्वेदी<br />वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:left;">विकास की अंधी दौड़ और पर्यावरण संरक्षण के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव के बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। 29 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के उस कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया है, जिसके आधार पर बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के शुरू हो चुकी विकास और औद्योगिक परियोजनाओं को बाद में वैध ठहराने का रास्ता बनाया गया था।</p>
<p>अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरणीय स्वीकृति किसी औपचारिक सरकारी मुहर का नाम नहीं, बल्कि एक अनिवार्य कानूनी और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे किसी प्रशासनिक आदेश के सहारे कमजोर नहीं किया जा सकता। यह निर्णय हमारी न्याय व्यवस्था में पर्यावरण के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता का ही नहीं, बल्कि कानून के शासन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है।</p>
<p>इस फैसले ने उस खतरनाक प्रवृत्ति पर गहरी चोट की है, जिसमें परियोजनाएं पहले नियमों को ताख पर रखकर शुरू कर दी जाती थीं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बाद पिछले दरवाजे से कागजी वैधता हासिल कर ली जाती थी। वर्षों से यह देखा जा रहा था कि उद्योग, खनन, सड़क, बिजली और अन्य निर्माण परियोजनाएं बिना समुचित पर्यावरणीय जांच के आरंभ हो जाती थीं।</p>
<p>जंगलों की कटाई होती थी, पहाड़ों का सीना चीर दिया जाता था, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव कर दिया जाता था और जब विरोध बढ़ता था या मामला अदालत तक पहुंचता था, तब सरकारें कार्यालय ज्ञापनों और प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से इन उल्लंघनों को नियमित करने का प्रयास करती थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पर्यावरण जैसे गंभीर विषय पर ऐसे शॉर्टकट स्वीकार नहीं किए जा सकते।</p>
<p>वर्ष 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन व्यवस्था का मूल उद्देश्य यही था कि किसी भी बड़ी परियोजना के शुरू होने से पहले यह वैज्ञानिक रूप से जांच हो कि उसका जंगलों, जलस्रोतों, वन्य जीवों, खेती और स्थानीय आबादी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यदि संभावित नुकसान सामने आता है तो उसे कम करने के उपाय पहले से तय किए जाएं। यही कारण है कि इसे पूर्व स्वीकृति कहा गया है। यदि परियोजना शुरू होने के बाद अनुमति दी जाएगी तो पूरी प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। जिस जंगल की कटाई हो चुकी हो, जिस नदी का प्रवाह बदल चुका हो या जिस पहाड़ को खोद दिया गया हो, वहां बाद की स्वीकृति प्रकृति को उसके पुराने स्वरूप में वापस नहीं ला सकती।</p>
<p>यह निर्णय केवल पर्यावरण की रक्षा का मामला नहीं है, बल्कि सुशासन और जवाबदेही का भी प्रश्न है। जब नियम तोड़ने के बाद भी वैधता मिलने की संभावना बनी रहती है, तब कानून का सम्मान कम होता है और भ्रष्टाचार के अवसर बढ़ते हैं। परियोजनाओं को बाद में नियमित करने की व्यवस्था प्रशासनिक और राजनीतिक दबावों के लिए भी रास्ता खोल देती है। इससे यह संदेश जाता है कि पहले निर्माण कर लो, बाद में कागजी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएंगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून का पालन पहले होगा और विकास उसके बाद।</p>
<p>देश के पर्यावरण पर इस फैसले का दूरगामी और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भारत पहले ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। कहीं भीषण बाढ़ है, कहीं लंबे सूखे की मार है, कहीं भूस्खलन बढ़ रहे हैं तो कहीं नदियां सिकुड़ रही हैं। हिमालयी राज्यों में अनियोजित निर्माण और अंधाधुंध खनन ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता बढ़ा दी है। पश्चिमी घाट, अरावली, मध्य भारत के वन क्षेत्र और तटीय इलाके भी लगातार दबाव झेल रहे हैं। यदि विकास परियोजनाओं का पर्यावरणीय मूल्यांकन ईमानदारी से पहले किया जाएगा तो अनेक संभावित नुकसान समय रहते रोके जा सकेंगे। इससे केवल प्रकृति ही नहीं बचेगी, बल्कि भविष्य में होने वाले आर्थिक नुकसान और मानवीय त्रासदियों को भी कम किया जा सकेगा।</p>
<p>इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीय समुदायों के अधिकारों से भी जुड़ा है। बड़ी परियोजनाओं का सबसे अधिक असर आदिवासी, ग्रामीण और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है। उनकी आजीविका जंगल, जल और जमीन पर निर्भर होती है। यदि पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन पहले होगा और लोगों की आपत्तियों तथा सुझावों को गंभीरता से सुना जाएगा तो विकास अधिक न्यायपूर्ण और सहभागी बन सकेगा। लोकतंत्र का अर्थ केवल परियोजनाओं को मंजूरी देना नहीं, बल्कि उनसे प्रभावित लोगों की आवाज को भी महत्व देना है।</p>
<p>बेशक, इस निर्णय से कुछ लोगों को यह आशंका हो सकती है कि विकास परियोजनाओं की गति धीमी पड़ जाएगी। देश में कई बार पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी, जटिल और अपारदर्शी रही है। कई परियोजनाएं वर्षों तक फाइलों में अटकी रहती हैं, जबकि कुछ मामलों में बिना पर्याप्त जांच के मंजूरी भी मिल जाती है, इसलिए आवश्यकता केवल सख्ती की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की भी है, जिसमें वैज्ञानिक जांच पूरी गंभीरता से हो और निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्णय लिया जाए। </p>
<p>विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना अपने आप में एक बड़ी भूल है। स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल, उपजाऊ भूमि और स्वस्थ जंगल किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। यदि विकास के नाम पर इन्हें नष्ट कर दिया जाएगा तो भविष्य में बाढ़ नियंत्रण, जल संकट, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा प्रबंधन पर कहीं अधिक धन खर्च करना पड़ेगा, इसलिए पर्यावरण संरक्षण विकास का विरोध नहीं, बल्कि टिकाऊ और सुरक्षित विकास की पहली शर्त है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 05:23:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महानगरों की छाया से कला को बाहर निकालने की एक कोशिश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">समकालीन वैश्विक कला का संसार निरंतर नए प्रयोगों और नवाचारों से समृद्ध होता रहा है। सामान्यतः इसकी धुरी पश्चिमी देशों और महानगरों को माना जाता है, जहाँ बड़े संग्रहालय, कला दीर्घाएं, बिएनाले और कला बाजार केंद्रित रहे हैं। किंतु पिछले दो दशकों में यह परिदृश्य बदलने लगा है। दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेषकर थाईलैंड, ने समकालीन कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय सक्रियता दिखाई है। बैंकॉक के संग्रहालयों, निजी कला फाउंडेशनों, कला मेलों और मुक्ताकाश कला परियोजनाओं ने उसे एशिया के उभरते सांस्कृतिक केंद्रों में स्थापित किया है। परिणामस्वरूप भारतीय कलाकारों, क्यूरेटरों और कला-प्रेमियों की रुचि भी अब थाईलैंड की ओर बढ़ती दिखाई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589922/the-shadow-of-metropolitan-cities"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/_metropolitan-cities.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">समकालीन वैश्विक कला का संसार निरंतर नए प्रयोगों और नवाचारों से समृद्ध होता रहा है। सामान्यतः इसकी धुरी पश्चिमी देशों और महानगरों को माना जाता है, जहाँ बड़े संग्रहालय, कला दीर्घाएं, बिएनाले और कला बाजार केंद्रित रहे हैं। किंतु पिछले दो दशकों में यह परिदृश्य बदलने लगा है। दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेषकर थाईलैंड, ने समकालीन कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय सक्रियता दिखाई है। बैंकॉक के संग्रहालयों, निजी कला फाउंडेशनों, कला मेलों और मुक्ताकाश कला परियोजनाओं ने उसे एशिया के उभरते सांस्कृतिक केंद्रों में स्थापित किया है। परिणामस्वरूप भारतीय कलाकारों, क्यूरेटरों और कला-प्रेमियों की रुचि भी अब थाईलैंड की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ दशक पहले तक एशियाई देशों के बीच कला-संवाद अपेक्षाकृत सीमित था। भारतीय समकालीन कला का झुकाव मुख्यतः यूरोप, विशेषकर फ्रांस, की ओर रहा। फ्रांसिस न्यूटन सूजा, सैयद हैदर रजा और रामकुमार जैसे अनेक प्रमुख भारतीय कलाकारों ने अपने जीवन और सृजन का महत्वपूर्ण समय फ्रांस में बिताया। फ्रांसीसी छात्रवृत्तियां भी लंबे समय तक भारतीय कला विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहीं। बाद के वर्षों में वेनिस बिएनाले जैसे अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों ने भारतीय कलाकारों को वैश्विक कला-विमर्श से और अधिक निकटता से जोड़ा। दूसरी ओर, एशिया के भीतर भी सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उल्लेखनीय उदाहरण मिलते हैं। भारतीय लोककलाओं के संदर्भ में जापान का मिथिला म्यूजियम एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित हुआ, जहां जनगढ़ सिंह श्याम तथा मिथिला चित्रकला के अनेक अग्रणी कलाकारों की कृतियां सुरक्षित हैं। संग्रहालय के संस्थापक टोकियो हसेगावा का नाम भारतीय लोककला जगत में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने न केवल भारतीय लोककलाओं के संरक्षण और प्रदर्शन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई, बल्कि भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक संवाद को भी नई दिशा दी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जारी है परियोजना का विस्तार </h3>
<p style="text-align:justify;">प्रमुख आकर्षणों में जापानी कलाकार फुजिको नाकाया की कृति ‘फॉग लैंडस्केप #48435’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो निश्चित अंतराल पर घना कृत्रिम कोहरा छोड़ती है और पूरे परिदृश्य को एक रहस्यमय अनुभव में बदल देती है। इसके अतिरिक्त बर्लिन स्थित कलाकार-युगल एल्मग्रीन एंड ड्रैगसेट की कृति ‘के-बार’ भी दर्शकों को आकर्षित करती है। जंगली घासों के बीच बनी एक पगडंडी से पहुंचा जाने वाला यह छोटा-सा स्थापत्य, प्रकृति और मानवीय हस्तक्षेप के बीच संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। यही कलाकार टेक्सास के मार्फा के निकट स्थापित प्रसिद्ध ‘प्राडा मार्फा’ आर्ट इंस्टॉलेशन के लिए भी विश्वविख्यात हैं। परियोजना का विस्तार अभी जारी है। निकट भविष्य में यहां फ्रांसीसी कलाकार-युगल सीनोकोस्म की एक साउंड इंस्टॉलेशन तथा कोलंबियाई कलाकार डेल्सी मोरेलोस की एक मोनुमेंटल अर्थवर्क स्थापित की जाएगी। </p>
<p style="text-align:justify;">इस विशाल भू-दृश्य कलाकृति का केंद्र लगभग 1,000 फुट लंबी सामुदायिक मेज होगी, जिसे एक तैरती हुई छत के नीचे निर्मित किया जा रहा है। यह केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता और साझा सांस्कृतिक अनुभव का प्रतीक भी होगी। खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट यह संकेत देता है कि इक्कीसवीं सदी की कला केवल दीर्घाओं और महानगरों की मोहताज नहीं है। वह प्रकृति, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के साथ नए संबंध स्थापित करते हुए ऐसे सांस्कृतिक भू-दृश्य भी रच सकती है, जहां कला और जीवन एक-दूसरे के पूरक बन जाएं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट का उदय </h3>
<p style="text-align:justify;">इस बदलते परिदृश्य में थाईलैंड के पोंग ता लॉन्ग स्थित खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट का उदय विशेष महत्व रखता है। यह केवल एक मुक्ताकाश कला-संग्रहालय नहीं, बल्कि समकालीन कला, पर्यावरण संरक्षण और भूमि-पुनर्जीवन को एक साथ जोड़ने वाला प्रयोग है। यदि अब तक कला संस्थानों का विकास महानगरों के इर्द-गिर्द होता रहा है, तो यह परियोजना उस प्रवृत्ति से आगे बढ़कर कला को प्राकृतिक परिवेश और ग्रामीण भू-दृश्य के बीच स्थापित करने का प्रयास करती है। संभव है कि भविष्य में भारत में भी इस प्रकार की पहल देखने को मिले। </p>
<p style="text-align:justify;">टाइम पत्रिका के ताजा विशेषांक में प्रकाशित दुनियाभर के घूमने योग्य 100 प्रमुख स्थानों की सूची में खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट को भी स्थान दिया गया है। यह लगभग 89 एकड़ में फैला मुक्ताकाश संग्रहालय बैंकॉक से लगभग तीन घंटे की सड़क यात्रा की दूरी पर स्थित है। यह परियोजना ऐसे क्षेत्र में विकसित की गई है, जो पूर्व में वनों की कटाई और भूमि-क्षरण से प्रभावित रहा था। आज वही क्षेत्र कला और प्रकृति के सहअस्तित्व का उदाहरण बन रहा है। इस परियोजना की शुरुआत बैंकॉक स्थित परोपकारी मारिसा चेरावानोन्ट तथा इतालवी वास्तुकार से क्यूरेटर बने स्टेफानो राबोली पानसेरा ने की। उनका उद्देश्य केवल समकालीन कलाकारों के लिए एक नया मंच तैयार करना नहीं था, बल्कि कला के माध्यम से पर्यावरणीय पुनर्जीवन की प्रक्रिया को भी गति देना था। </p>
<p style="text-align:justify;">इस दृष्टि से खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट एक सांस्कृतिक परियोजना होने के साथ-साथ एक पारिस्थितिक पहल भी है। आज यहां आने वाले आगंतुक धान के खेतों, जंगलों और वृक्षाच्छादित पहाड़ियों के बीच फैले प्राकृतिक परिदृश्य में कला का अनुभव करते हैं। बांस से निर्मित कैफे, खुला भू-दृश्य और विभिन्न स्थानों पर स्थापित कलाकृतियां इस परिसर को पारंपरिक संग्रहालयों से अलग पहचान देती हैं। यहां कला किसी बंद भवन की दीवारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रकृति के साथ संवाद करती है। </p>
<h5 style="text-align:justify;"><br /> - सुमन सिंह, कला लेखक<br />  </h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/589922/the-shadow-of-metropolitan-cities</link>
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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 13:50:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बोध कथा : सबसे बड़ा सुख </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक गांव में माधव नाम का किसान रहता था। उसके पास केवल पांच बीघा जमीन थी। वह मेहनती, ईमानदार और संतोषी स्वभाव का था। उसकी पत्नी और दो बच्चे भी खेत के काम में उसका हाथ बंटाते थे। फसल चाहे कम हो या अधिक, माधव हमेशा भगवान का धन्यवाद करता और जरूरतमंदों की सहायता करना नहीं भूलता। उसी गांव में सेठ धनपाल रहता था। उसके पास सैकड़ों बीघा जमीन, कई गोदाम और अपार धन-संपत्ति थी। फिर भी वह हमेशा चिंतित रहता। उसे डर लगा रहता कि कहीं उसका धन कम न हो जाए या कोई उसे धोखा न दे दे।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589763/inspirational-story--the-greatest-happiness"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/inspirational-story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक गांव में माधव नाम का किसान रहता था। उसके पास केवल पांच बीघा जमीन थी। वह मेहनती, ईमानदार और संतोषी स्वभाव का था। उसकी पत्नी और दो बच्चे भी खेत के काम में उसका हाथ बंटाते थे। फसल चाहे कम हो या अधिक, माधव हमेशा भगवान का धन्यवाद करता और जरूरतमंदों की सहायता करना नहीं भूलता। उसी गांव में सेठ धनपाल रहता था। उसके पास सैकड़ों बीघा जमीन, कई गोदाम और अपार धन-संपत्ति थी। फिर भी वह हमेशा चिंतित रहता। उसे डर लगा रहता कि कहीं उसका धन कम न हो जाए या कोई उसे धोखा न दे दे। वह किसी की मदद भी नहीं करता था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन गांव में एक संत आए। लोगों ने उनसे जीवन का सबसे बड़ा सुख पूछना शुरू किया। सेठ धनपाल ने गर्व से कहा, “महाराज! धन ही सबसे बड़ा सुख है, जिसके पास धन है, उसके पास सब कुछ है।” संत मुस्कुराए और बोले, “कल सुबह तुम दोनों मेरे साथ चलना।” अगले दिन संत पहले माधव के घर पहुंचे। माधव अपने परिवार के साथ साधारण भोजन कर रहा था। उसने संत और सेठ का आदरपूर्वक स्वागत किया और जो भी भोजन था, प्रेम से उनके सामने परोस दिया। भोजन करते समय पूरे परिवार के चेहरे पर संतोष और अपनापन झलक रहा था। इसके बाद वे सेठ के महल पहुंचे। वहां तरह-तरह के व्यंजन बने थे, लेकिन सेठ अकेला बैठा था। नौकर-चाकर उसके आदेश का इंतजार कर रहे थे। भोजन की थाली सामने थी, फिर भी वह हिसाब-किताब में उलझा हुआ था। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">संत ने दोनों को पास बुलाया और पूछा, “तुम दोनों में सबसे अमीर कौन है?” सेठ तुरंत बोला, “यह भी कोई पूछने की बात है? मेरे पास अपार संपत्ति है।” संत ने शांत स्वर में कहा, “जिसके पास धन है, वह धनी हो सकता है, लेकिन अपने पास जो है, उसमें संतुष्ट है, जो प्रेम बांटता है और दूसरों के चेहरे पर मुस्कान ला सकता है, वही वास्तव में सबसे अमीर है।” माधव ने सिर झुका लिया। सेठ पहली बार मौन हो गया। उसे समझ आ गया कि वर्षों से वह धन तो जोड़ता रहा, लेकिन सुख, अपनापन और संतोष खोता गया। उस दिन से सेठ ने अपना व्यवहार बदल दिया। उसने जरूरतमंदों की सहायता शुरू की, परिवार के साथ समय बिताना शुरू किया और धीरे-धीरे उसके चेहरे पर भी वही मुस्कान लौट आई, जो पहले केवल माधव के चेहरे पर दिखाई देती थी। कहानी से सीख मिलती है कि सच्ची समृद्धि धन के संग्रह में नहीं, बल्कि संतोष, प्रेम, उदारता और अच्छे कर्मों में होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 10:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>फर्स्ट राइड:स्टीयरिंग से दोस्ती</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कार चलाना सीखने का मेरा पहला दिन आज भी स्मृतियों में ताजा है। सुबह ड्राइविंग स्कूल के प्रशिक्षक मुझे खाली मैदान में ले गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "घबराइए मत, कार आपकी दोस्त है।" मैंने हल्के कांपते हाथों से स्टीयरिंग पकड़ा। क्लच, ब्रेक और एक्सीलेरेटर को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि पहली बार कार स्टार्ट की। उत्साह में क्लच जल्दी छोड़ दिया और कार झटके के साथ बंद हो गई। प्रशिक्षक मुस्कुरा दिए, लेकिन मेरे चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी कोशिश में मैंने धीरे-धीरे क्लच छोड़ा। इस बार कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। जैसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589751/first-ride--getting-comfortable-with-the-steering"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/first-ride.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कार चलाना सीखने का मेरा पहला दिन आज भी स्मृतियों में ताजा है। सुबह ड्राइविंग स्कूल के प्रशिक्षक मुझे खाली मैदान में ले गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "घबराइए मत, कार आपकी दोस्त है।" मैंने हल्के कांपते हाथों से स्टीयरिंग पकड़ा। क्लच, ब्रेक और एक्सीलेरेटर को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि पहली बार कार स्टार्ट की। उत्साह में क्लच जल्दी छोड़ दिया और कार झटके के साथ बंद हो गई। प्रशिक्षक मुस्कुरा दिए, लेकिन मेरे चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी कोशिश में मैंने धीरे-धीरे क्लच छोड़ा। इस बार कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। जैसे ही पहिए घूमे, मेरे भीतर भी आत्मविश्वास का एक नया पहिया घूमने लगा। कुछ मीटर चलने के बाद स्टीयरिंग संभालना, गियर बदलना और ब्रेक लगाना पहले से आसान लगने लगा। हर छोटी सफलता मेरे चेहरे पर मुस्कान ला रही थी। जब पहली बार मैंने बिना इंजन बंद किए एक पूरा चक्कर लगाया, तो ऐसा लगा जैसे कोई बड़ी मंजिल हासिल कर ली हो। उस दिन महसूस हुआ कि कार चलाना केवल मशीन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपने डर पर विजय पाना भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">घर लौटते समय मन में एक अलग ही खुशी थी। पहली ड्राइव ने मुझे सिखाया कि शुरुआत में हर काम कठिन लगता है, लेकिन धैर्य, अभ्यास और सही मार्गदर्शन से वही काम सहज हो जाता है। आज भी जब स्टीयरिंग थामता हूं, तो पहली ड्राइव का वह रोमांच, घबराहट और आत्मविश्वास से भरा पल अनायास ही याद आ जाता है। वही अनुभव हर नई यात्रा के लिए प्रेरणा बन जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>व्हील्स</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 10:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पॉलीमर प्रयोग भविष्य के भारत की मुद्रा व्यवस्था </title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/cats14.jpg" alt="cats" width="192" height="233" />
<strong>ऋषभ मिश्रा,असिस्टेंट प्रोफेसर<br />आईआईटी कानपुर </strong>

<p style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां एक ओर डिजिटल भुगतान क्रांति अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर नकदी का महत्व भी कम नहीं हुआ है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने भुगतान प्रणाली को सरल, त्वरित और सर्वसुलभ बनाया है, लेकिन इसके बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 तक प्रचलन में मुद्रा का मूल्य लगभग 41.23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589842/polymer-experiment-future-of-india-currency-system"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/65.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/cats14.jpg" alt="cats" width="192" height="233"></img>
<strong>ऋषभ मिश्रा,असिस्टेंट प्रोफेसर<br />आईआईटी कानपुर </strong>

<p style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां एक ओर डिजिटल भुगतान क्रांति अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर नकदी का महत्व भी कम नहीं हुआ है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने भुगतान प्रणाली को सरल, त्वरित और सर्वसुलभ बनाया है, लेकिन इसके बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 तक प्रचलन में मुद्रा का मूल्य लगभग 41.23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत अधिक है। मुद्रा से जीडीपी अनुपात भी बढ़कर 12.1 प्रतिशत हो गया है। यह तथ्य स्पष्ट संकेत देता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के बावजूद नकदी भारतीय आर्थिक व्यवस्था की एक मजबूत आवश्यकता बनी हुई है। </p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे समय में आरबीआई द्वारा पॉलीमर अथवा प्लास्टिक नोटों को अपनाने की दिशा में बढ़ाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल ही में आरबीआई नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (बीआरबीएनएमपीएल) ने ओपेसिफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट शीटों की आपूर्ति के लिए वैश्विक निविदाएं आमंत्रित की हैं। यह केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय मुद्रा व्यवस्था में संभावित ऐतिहासिक परिवर्तन का संकेत है। यदि यह योजना सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय मुद्रा की संरचना, सुरक्षा और टिकाऊपन में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुतः भारत में नकदी का उपयोग केवल भुगतान का माध्यम नहीं है, बल्कि आर्थिक विश्वास और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा भी है। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे व्यापारियों, कृषि क्षेत्र तथा असंगठित अर्थव्यवस्था में आज भी नकदी प्रमुख भूमिका निभाती है। देश की विशाल आबादी का एक बड़ा वर्ग अभी भी नकद लेन-देन को अधिक सहज और विश्वसनीय मानता है। नकदी की बढ़ती मांग के साथ नोटों की छपाई और रख-रखाव पर होने वाला व्यय भी लगातार बढ़ता रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय मुद्रा नोटों की छपाई पर लगभग 6,372 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। यद्यपि वित्त वर्ष 2025-26 में यह खर्च घटकर लगभग 4,875 करोड़ रुपये रह गया, फिर भी यह राशि अत्यंत बड़ी है। हर वर्ष बड़ी संख्या में नोट फटने, गंदे होने, नमी से खराब होने तथा अत्यधिक उपयोग के कारण अनुपयोगी हो जाते हैं। इन नोटों को बदलने के लिए नए नोट छापने पड़ते हैं, जिससे सरकार और आरबीआई पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। भारत जैसे विशाल देश में जहां अरबों नोट प्रचलन में हैं, वहां मुद्रा की टिकाऊपन बढ़ाना आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। इसी संदर्भ में पॉलीमर नोट एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि पॉलीमर नोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक आधारित पदार्थ से निर्मित किए जाते हैं। सामान्य कागजी नोट जहां कपास आधारित विशेष कागज से बनाए जाते हैं, वहीं पॉलीमर नोट अत्यधिक मजबूत और लचीले प्लास्टिक सब्सट्रेट पर मुद्रित होते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनकी दीर्घायु है। विशेषज्ञों के अनुसार पॉलीमर नोटों की आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में दो से चार गुना अधिक होती है। ये पानी, नमी, धूल, तेल, पसीने तथा बार-बार मोड़े जाने से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए यह विशेषता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। देश के अधिकांश हिस्सों में गर्मी, आर्द्रता, मानसून और धूल जैसी परिस्थितियां सामान्य हैं। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलीमर नोट इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके साथ ही पॉलीमर नोटों का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ सुरक्षा से जुड़ा है। नकली मुद्रा भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिए लंबे समय से एक चुनौती रही है। </p>
<p style="text-align:justify;">आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025-26 के दौरान बैंकिंग प्रणाली में लगभग 2.3 लाख नकली नोटों की पहचान की गई थी। यद्यपि यह संख्या कुल प्रचलित नोटों की तुलना में बहुत कम है, फिर भी इसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पॉलीमर नोटों में ऐसे कई उन्नत सुरक्षा फीचर जोड़े जा सकते हैं, जिनकी नकल करना अत्यंत कठिन होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनमें पारदर्शी विंडो, विशेष होलोग्राम, माइक्रो-प्रिंटिंग, उन्नत सुरक्षा धागे, धात्विक सुरक्षा चिह्न तथा रंग बदलने वाली स्याही जैसी तकनीकें शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोटों के प्रचलन से नकली मुद्रा के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। भारत जैसे देश के लिए, जहां सीमा पार से नकली मुद्रा भेजने की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं, यह लाभ अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि भारत शुरुआत में 10 और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों पर पॉलीमर तकनीक का परीक्षण कर सकता है। इसका कारण यह है कि ये नोट सबसे अधिक प्रचलन में रहते हैं और सबसे जल्दी खराब होते हैं। यदि परीक्षण सफल रहता है और लागत-लाभ विश्लेषण सकारात्मक परिणाम देता है, तो धीरे-धीरे 50, 100 और अन्य मूल्यवर्गों तक इसका विस्तार किया जा सकता है। चरणबद्ध रणनीति से जोखिम कम होगा और आवश्यक सुधार समय रहते किए जा सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि आरबीआई और सरकार चरणबद्ध तरीके से, पर्यावरणीय संतुलन, तकनीकी आत्मनिर्भरता और जन-जागरूकता को ध्यान में रखते हुए इस योजना को लागू करती है, तो भारत भी उन अग्रणी देशों की श्रेणी में शामिल हो सकता है, जिन्होंने अपनी मुद्रा प्रणाली को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप सफलतापूर्वक रूपांतरित किया है। निस्संदेह, प्लास्टिक नोट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए केवल एक नया प्रयोग नहीं, बल्कि वित्तीय आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकते हैं। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 05:51:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्ञान परंपरा के पुनर्मूल्यांकन की पहल</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/cats16.jpg" alt="cats" width="198" height="198" />
<strong>अमरपाल सिंह वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">राजस्थान के आदिवासी इलाकों में इन दिनों एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। राज्य सरकार ने सदियों से जड़ी-बूटियों और पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान रखने वाले ‘जनजाति गुणीजनों’ और ‘देसी वैद्यों’ की पहचान का अभियान शुरू किया है। उद्देश्य केवल उनकी पहचान करना भर नहीं है, बल्कि उनके अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना भी है। सरसरी तौर पर यह एक सरकारी योजना भर लग सकती है, लेकिन यदि इसे गंभीरता से देखा जाए तो यह स्वास्थ्य सेवा के मामले से आगे की बात है। </p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल यह उस ज्ञान परंपरा को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589843/knowledge-tradition-reassessment-initiative"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/cats15.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/cats16.jpg" alt="cats" width="198" height="198"></img>
<strong>अमरपाल सिंह वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">राजस्थान के आदिवासी इलाकों में इन दिनों एक महत्वपूर्ण पहल शुरू हुई है। राज्य सरकार ने सदियों से जड़ी-बूटियों और पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान रखने वाले ‘जनजाति गुणीजनों’ और ‘देसी वैद्यों’ की पहचान का अभियान शुरू किया है। उद्देश्य केवल उनकी पहचान करना भर नहीं है, बल्कि उनके अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना भी है। सरसरी तौर पर यह एक सरकारी योजना भर लग सकती है, लेकिन यदि इसे गंभीरता से देखा जाए तो यह स्वास्थ्य सेवा के मामले से आगे की बात है। </p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल यह उस ज्ञान परंपरा को  पहचानने की शुरुआत है, जिसे हमने आधुनिकता की दौड़ में लगभग भुला दिया है। राजस्थान के भील, गरासिया, सहरिया, मीणा और अन्य जनजातीय समुदायों में आज भी ऐसे अनेक गुणीजन मिल जाते हैं, जिन्हें आसपास उगने वाली जड़ी-बूटियों, पेड़-पौधों, कंद-मूल और औषधीय वनस्पतियों की अद्भुत जानकारी होती है। उन्हें यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय से नहीं मिला है। उनमें यह अनुभव, प्रकृति के साथ लंबे सह-अस्तित्व और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा से विकसित हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी गांवों में बुखार, मोच, घाव, सांप-बिच्छू के काटने, प्रसव के बाद की देखभाल या कई सामान्य बीमारियों के लिए लोग सबसे पहले ऐसे ही गुणीजनों के पास जाते थे। वे केवल दवा नहीं देते थे, बल्कि मरीज, परिवार और स्थानीय परिस्थितियों को समझ कर उपचार करते थे। ग्राम्य समाज में उनका स्थान किसी चिकित्सक से कम नहीं माना जाता था, लेकिन बदलते परिवेश में आधुनिक चिकित्सा ने असंख्य लोगों का जीवन बचाया और स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाए। </p>
<p style="text-align:justify;">अस्पताल बढ़े, नई-नई दवाएं आईं, नई तकनीक विकसित हुई। यह निश्चय ही मानव सभ्यता की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस उपलब्धि के साथ हमने पारंपरिक ज्ञान की विरासत के रूप में बहुत कुछ खो दिया। क्योंकि इसी दौर में यह मान लिया गया कि जो ज्ञान मेडिकल कॉलेजों में नहीं पढ़ाया जाता, उसका कोई महत्व नहीं है। धीरे-धीरे लोक चिकित्सा और पारंपरिक ज्ञान को या तो अंधविश्वास मान लिया गया या फिर उसे पिछड़ेपन का प्रतीक समझा जाने लगा। यह एक ऐसा दृष्टिकोण था, जिसे संतुलित नहीं कहा जा सकता। </p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान सरकार की नई पहल इसी कारण महत्वपूर्ण दिखाई देती है। सरकार गुणीजनों को स्वतंत्र चिकित्सक घोषित नहीं कर रही, बल्कि उन्हें आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का सहयोगी बनाने की कोशिश कर रही है। वे गांवों में मरीजों की शुरुआती पहचान करते हैं। अब इन्हें ये सिखाया जाएगा कि वह जरूरत पड़ने पर कैसे टेली मेडिसिन के जरिए सैटेलाइट सेंटर और एम्स के विशेषज्ञ चिकित्सकों से वीडियो कॉल पर संपर्क कर मरीजों की स्थिति की जानकारी साझा कर सकते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">यानी परंपरा और आधुनिक चिकित्सा को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह प्रयोग सावधानी के साथ आगे बढ़ता है, तो निश्चय ही इसके कई सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। सबसे पहला लाभ उन दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों को होगा, जहां के लोगों की आज भी विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंच आसान नहीं है। ऐसे इलाकों में अगर स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित और पंजीकृत गुणीजन प्रारंभिक स्वास्थ्य सलाह देने के साथ मरीजों को सही समय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंचा सकें, तो कई गंभीर बीमारियों की पहचान समय रहते होना संभव है। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ-साथ दूसरा बड़ा लाभ उस पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का होगा, जो तेजी से समाप्त हो रहा है। दुर्भाग्य है, आज अनेक बुजुर्ग गुणीजन अपने साथ एक पूरी ज्ञान-परंपरा लेकर विदा हो रहे हैं। उनके बाद उस ज्ञान को संभालने वाला कोई नहीं बच रहा। इस पांरपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है। यदि अभी भी यह नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़िय़ां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी गांवों में ऐसे लोग हुआ करते थे, जो जंगल की वनस्पतियों से उपचार करते थे। यह मुद्दा केवल स्वास्थ्य का नहीं है। यह उस मानसिकता का भी सवाल है, जिसमें हम अपने ही समाज के अनुभवजन्य ज्ञान को कमतर आंकते रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरी दुनिया आज स्थानीय ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा और जैव विविधता संरक्षण पर नए सिरे से काम कर रही है। ऐसे समय में यदि राजस्थान की सरकार अपने गुणीजनों को पहचानने और उनके ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, तो इसे केवल एक सरकारी योजना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि यह पहल अपनी मूल भावना के अनुरूप आगे बढ़ती है, तो यह केवल गुणीजनों की पहचान नहीं करेगी बल्कि हमारी उस ज्ञान-परंपरा को भी नया जीवन दे सकती है जिसे हम धीरे-धीरे भुलाते जा रहे हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 05:01:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शिव अध्यात्म और विज्ञान के अनूठा संगम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भगवान शिव धर्म (अध्यात्म) और विज्ञान का एक अनूठा संगम हैं, जो विनाश और सृजन की ऊर्जा (शिव-शक्ति) के प्रतीक हैं। वे केवल एक पौराणिक देवता नहीं, बल्कि आदियोगी हैं, जो योगिक विज्ञान, ध्यान और चेतना के माध्यम से ब्रह्मांडीय शून्य को दर्शाते हैं। शिव को ‘सृष्टि, पालन और संहार’ का विध्वंसक कहा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि सब कुछ शून्यता से उत्पन्न होता है और उसमें ही विलीन हो जाता है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को विनाश और सृजन दोनों के अधिपति के रूप में जाना जाता है। वे केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589758/shiva-unique-confluence-spirituality-science"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/shiva-spirituality.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भगवान शिव धर्म (अध्यात्म) और विज्ञान का एक अनूठा संगम हैं, जो विनाश और सृजन की ऊर्जा (शिव-शक्ति) के प्रतीक हैं। वे केवल एक पौराणिक देवता नहीं, बल्कि आदियोगी हैं, जो योगिक विज्ञान, ध्यान और चेतना के माध्यम से ब्रह्मांडीय शून्य को दर्शाते हैं। शिव को ‘सृष्टि, पालन और संहार’ का विध्वंसक कहा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि सब कुछ शून्यता से उत्पन्न होता है और उसमें ही विलीन हो जाता है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को विनाश और सृजन दोनों के अधिपति के रूप में जाना जाता है। वे केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के वैज्ञानिक स्वरूप भी माने जाते हैं। आधुनिक विज्ञान जिन सिद्धांतों को आज खोज रहा है, वे प्राचीन शिव तत्त्व में पहले ही निहित थे।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवान शिव को ‘आदि योगी’ भी कहा जाता है यानी पहले योगी, जिन्होंने योग को एक तकनीक के रूप में विकसित किया, न कि केवल एक आध्यात्मिक विश्वास के रूप में, बल्कि जो मानव शरीर में मौजूद विद्युत शक्ति और चेतना को नियंत्रित करने का विज्ञान है और यह मन और ब्रह्मांड की गहराइयों को समझने का वैज्ञानिक तरीका है। उन्होंने ध्यान की अवस्था में रहकर शरीर, मन और आत्मा को संतुलन में रखने का मार्ग दिखाया। आज आधुनिक विज्ञान भी यह मान चुका है कि मेडिटेशन और योग से मानसिक स्वास्थ्य, न्यूरोलॉजी और हार्मोन बैलेंस में सुधार आता है। कई बार यह भ्रम होता है कि धर्म और विज्ञान दो अलग दिशाओं में चलते हैं, लेकिन शिव का स्वरूप, उनकी अवधारणाएं और उनके प्रतीकों की वैज्ञानिक व्याख्या यह साबित करती है कि भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्ष पूर्व जिन तत्वों की व्याख्या की थी, उन्हें आज विज्ञान सिद्ध कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिव-शिक्षा का सिद्धांत ही वह ज्ञान है, जो आज सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में प्रचलित है, जिसे एक वर्ग ‘शिव-शिक्षा-सिद्धांत’ के रूप में पुनः अपनाने की प्रेरणा दे रहा है। शिव के प्रति श्रद्धा का एक प्रमुख प्रमाण स्विट्जरलैंड की भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला के द्वार पर स्थापित नटराज की मूर्ति है, जो उनके कलात्मक और वैज्ञानिक ज्ञान का प्रतीक है। ब्रह्मांड में सब कुछ जन्म/विकास, वृद्धि, क्षय और अंत में विनाश के अधीन है और ये चक्र बार-बार दोहराते रहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विनाश भी दैवीय लीला का हिस्सा है और इसका श्रेय भगवान शिव को दिया जाता है। भगवान शिव को गहन धार्मिक ज्ञान से जोड़ा जाता है। भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक हैं, जो ब्रह्मा और विष्णु के साथ पवित्र त्रिमूर्ति का हिस्सा हैं। ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता और विष्णु को रक्षक माना जाता है, जबकि शिव को रूपांतरणकर्ता या संहारक के रूप में जाना जाता है, लेकिन भ्रमवश हम नहीं जानते कि शिव के संदर्भ में संहार का अर्थ नकारात्मक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसका अर्थ है उन चीजों को हटाना, जो अब हमारे लिए उपयोगी नहीं हैं, ताकि नई शुरुआत के लिए जगह बन सके। जैसे एक माली सूखे पत्तों को हटाकर नए पत्ते उगाता है, उसी प्रकार शिव नकारात्मकता, अहंकार और अज्ञान को नष्ट करके ज्ञान और विकास के लिए स्थान बनाते हैं। इसीलिए उन्हें रूपांतरण का देवता भी कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि ‘धारण करने योग्य’ (मानवीय, नैतिक और सामाजिक कर्तव्यों) का पालन करना है, जो मानव के मानसिक, आध्यात्मिक विकास तथा भौतिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। यह व्यक्ति में सद्गुण विकसित कर, नि:स्वार्थ सेवा, एकता, शांति और सामाजिक सामंजस्य के माध्यम से सच्चा सुख (अभ्युदय) प्रदान करता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्यों कहा जाता है देवों का देव </h3>
<p style="text-align:justify;">शिव जन्म और मृत्यु के चक्र से परे हैं। जबकि अन्य देवता विभिन्न रूप और अवतार धारण करते हैं, शिव शाश्वत चेतना के रूप में विद्यमान हैं। उन्हें स्वयंभू माना जाता है, जिसका अर्थ है कि उनका कभी जन्म नहीं हुआ और न ही कभी मृत्यु होगी। वे परम शक्ति के स्वामी हैं। ऐसा माना जाता है कि शिव के पास संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना, पालन-पोषण और विनाश करने की शक्ति है। यही कारण है कि वे सभी देवताओं में सर्वोच्च हैं। वे गुरुओं के गुरु हैं। शिव को आदि योगी, प्रथम योगी और योग के गुरु के रूप में माना जाता है। यहां तक कि देवता भी ज्ञान और बुद्धि के लिए उनके पास आते हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि परिवर्तन स्वाभाविक और आवश्यक है। इससे डरने के बजाय, हमें इसे विकास के अवसर के रूप में स्वीकार करना चाहिए। अराजकता में भी शांत रहें। शिव ने संसार को बचाने के लिए विष ग्रहण किया और उसे अपने गले में रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया, लेकिन उस विष का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यह हमें सिखाता है कि कठिनाइयों का सामना करते समय उन्हें अपनी आंतरिक शांति को भंग न करने दें। शक्ति और करुणा में संतुलन बनाए रखें। शिव उग्र और कोमल, शक्तिशाली और सरल दोनों हैं। हम भी जरूरत पड़ने पर मजबूत हो सकते हैं और साथ ही दया और करुणा का भाव भी बनाए रख सकते हैं। अहंकार को त्याग दो। शिव सादगी से रहते हैं, उन्हें किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी वे सबसे शक्तिशाली हैं। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची शक्ति विनम्रता से आती है, अहंकार से नहीं। ध्यान और स्थिरता का अभ्यास करें। शिव युगों तक ध्यान में लीन रहते हैं, जो हमें मन को शांत करने और भीतर से उत्तर खोजने के महत्व को दर्शाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सावन मास केवल धार्मिक अनुष्ठान का महीना नहीं है बल्कि यह मास जीवन दर्शन है। यह मास मनुष्य को संयम, साधना, सेवा और समता का मार्ग दिखाता है। जब भक्त सावन मास में शिव मंत्रों का जाप करता है, जब वह बेलपत्र,जल, धतूरा , शमीपत्र अर्पित करता है और जब वह अपने भीतर के अहंकार का त्याग करता है, तभी सावन मास का वास्तविक अर्थ पूर्ण होता है। सनातन संस्कृति का यह दिव्य महीना हमें याद दिलाता है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव और प्रत्येक चेतना में विद्यमान हैं। जब मानव अपने भीतर के शिवतत्व को जागृत करता है, तभी उसका जीवन कल्याण और समृद्धि की ओर अग्रसर होता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- पं.मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य, आध्यात्मिक लेखक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 12:09:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सेल्फ-स्टार्ट बाइक बंद हो जाए तो क्या करें</title>
                                    <description><![CDATA[<p>आज की अधिकांश मोटरसाइकिलों में किक-स्टार्टर की जगह सेल्फ-स्टार्ट सिस्टम आ गया है। यदि बाइक स्टार्ट न हो, तो घबराने के बजाय सबसे पहले कुछ जरूरी बातें जांच लें।</p>
<h4>पहले यह जांचें</h4>
<p>किल स्विच RUN मोड में हो।</p>
<p>बाइक न्यूट्रल में हो।</p>
<p>क्लच पूरी तरह दबा हो।</p>
<p>हेडलाइट, हॉर्न और मीटर कंसोल काम कर रहे हों।</p>
<p>सेल्फ-स्टार्ट फेल होने के कारण</p>
<p>बैटरी कमजोर या डिस्चार्ज।</p>
<p>किल स्विच OFF।</p>
<p>क्लच या गियर की गलत स्थिति।</p>
<h4>कब करें पुश-स्टार्ट</h4>
<p>केवल मैन्युअल गियर वाली बाइक में।</p>
<p>FI बाइक में मीटर कंसोल पूरी तरह बंद हो तो पुश-स्टार्ट काम नहीं करेगा।</p>
<h4>बैटरी खराब  होने</h4>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589750/what-to-do-if-a-self-start-bike-stalls"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/elf-start-bike-stalls.jpg" alt=""></a><br /><p>आज की अधिकांश मोटरसाइकिलों में किक-स्टार्टर की जगह सेल्फ-स्टार्ट सिस्टम आ गया है। यदि बाइक स्टार्ट न हो, तो घबराने के बजाय सबसे पहले कुछ जरूरी बातें जांच लें।</p>
<h4>पहले यह जांचें</h4>
<p>किल स्विच RUN मोड में हो।</p>
<p>बाइक न्यूट्रल में हो।</p>
<p>क्लच पूरी तरह दबा हो।</p>
<p>हेडलाइट, हॉर्न और मीटर कंसोल काम कर रहे हों।</p>
<p>सेल्फ-स्टार्ट फेल होने के कारण</p>
<p>बैटरी कमजोर या डिस्चार्ज।</p>
<p>किल स्विच OFF।</p>
<p>क्लच या गियर की गलत स्थिति।</p>
<h4>कब करें पुश-स्टार्ट</h4>
<p>केवल मैन्युअल गियर वाली बाइक में।</p>
<p>FI बाइक में मीटर कंसोल पूरी तरह बंद हो तो पुश-स्टार्ट काम नहीं करेगा।</p>
<h4>बैटरी खराब  होने के संकेत</h4>
<p>स्टार्ट धीमा होना।</p>
<p>हेडलाइट डिम पड़ना।</p>
<p>हॉर्न कमजोर बजना।</p>
<h4>याद रखें</h4>
<p>बैटरी की उम्र सामान्यतः 3-4 वर्ष होती है। नियमित जांच और समय पर बैटरी बदलने से अधिकांश सेल्फ-स्टार्ट समस्याओं से बचा जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>व्हील्स</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 11:49:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भीड़ नियंत्रण की संवैधानिक कसौटी</title>
                                    <description><![CDATA[लोकतंत्र की पहचान केवल नियमित चुनावों से नहीं होती; उसकी वास्तविक कसौटी इस बात में निहित होती है कि वह असहमति की अभिव्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589705/bheed-niyantran-ki-sanvaidhanik-kasauti-democracy-civil-rights"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/21.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/5.jpg" alt="5" width="140" height="196"></img>
<strong>कुमार कृष्णन, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र की पहचान केवल नियमित चुनावों से नहीं होती, उसकी वास्तविक कसौटी इस बात में निहित होती है कि वह असहमति की अभिव्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। धरना, प्रदर्शन, रैली और जनसभा केवल राजनीतिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच संवाद के संवैधानिक माध्यम भी हैं। लोकतंत्र की शक्ति विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनने, समझने और संवैधानिक दायरे में उसका समाधान खोजने में है, इसलिए जब किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए राज्य बल प्रयोग करता है, तब प्रश्न केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता, वह नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और राज्य की लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘चलो संसद’ प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के कथित उपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका ने इसी प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी तथा खुफिया ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन आजाद सहित अन्य याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों पर बिना पर्याप्त चेतावनी ऐसे ‘प्रक्षेपास्त्रों’ का प्रयोग किया गया, जिससे अनेक लोग घायल हुए। याचिका में नागरिक प्रदर्शनों के दौरान धातुयुक्त पैलेट के प्रयोग पर रोक, घायलों के उपचार, पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था की मांग की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है। साथ ही उसने उपलब्ध अभिलेखों तथा प्रयुक्त गोला-बारूद का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया है। न्यायालय का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। उसने न तो किसी पक्ष को दोषी माना है और न ही किसी उपकरण पर तत्काल प्रतिबंध लगाया है। उसका स्पष्ट संकेत है कि किसी भी निष्कर्ष का आधार केवल तथ्य, साक्ष्य और संवैधानिक परीक्षण होंगे। यही विधि के शासन का मूल सिद्धांत है कि निर्णय जनभावना या राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि प्रमाण और कानून के आधार पर दिए जाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस संदर्भ में पूर्व पुलिस आयुक्त किरण बेदी की टिप्पणी भी विचारणीय है। उनका कहना है कि प्रत्येक विरोध-प्रदर्शन का उत्तर बल प्रयोग नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक पुलिसिंग का आधार संवाद, मध्यस्थता और विश्वास होना चाहिए। यदि पैलेट गन का प्रयोग हुआ है, तो यह भी जांच का विषय है कि उसका उपयोग निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया के अनुरूप था या नहीं। यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रशासनिक अनुभव के साथ लोकतांत्रिक पुलिसिंग की आधुनिक अवधारणा पर आधारित है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस को बल प्रयोग का अधिकार होना चाहिए या नहीं। आधुनिक राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को आवश्यक शक्तियां प्राप्त होती हैं, किंतु लोकतांत्रिक शासन इन शक्तियों को असीमित नहीं मानता। बल प्रयोग की वैधता उसकी आवश्यकता, अनुपातिकता और जवाबदेही से निर्धारित होती है। इसी कारण विश्व की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में 'न्यूनतम आवश्यक बल' का सिद्धांत स्वीकार किया गया है। इसका अर्थ है कि राज्य केवल उतनी ही शक्ति का प्रयोग करे, जितनी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अपरिहार्य हो। यदि कम जोखिम वाले और अधिक मानवीय विकल्प उपलब्ध हों, तो अधिक हानिकारक साधनों का प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और निःशस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। निःसंदेह ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और अन्य संवैधानिक आधारों पर इन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, किंतु इन प्रतिबंधों की कसौटी राज्य की सुविधा नहीं, बल्कि संविधान है। राज्य का दायित्व केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि व्यवस्था की रक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं का अनावश्यक क्षरण न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि जंतर-मंतर का विवाद किसी एक प्रदर्शन या किसी एक उपकरण के उपयोग तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रश्न का प्रतीक बन चुका है कि क्या भारत की भीड़ नियंत्रण नीति इक्कीसवीं सदी के लोकतांत्रिक और मानवाधिकार संबंधी मानकों के अनुरूप विकसित हुई है, अथवा वह अब भी औपनिवेशिक पुलिसिंग की मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है। इस प्रश्न का उत्तर केवल न्यायालय के निर्णय में नहीं, बल्कि पुलिस सुधार, प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति में भी निहित है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 05:21:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>युवा बदल रहे हैं देश की राजनीति का मिजाज</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि मतदाता भी तेजी से बदल रहे हैं। आज देश की सबसे बड़ी ताकत युवा पीढ़ी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589702/gen-z-and-indian-politics-future-india-young-voters"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/23.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/31.jpg" alt="3" width="164" height="210"></img>
<strong>सौरभ वार्ष्णेय, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p style="text-align:justify;">भारत की राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि मतदाता भी तेजी से बदल रहे हैं। आज देश की सबसे बड़ी ताकत केवल चुनावी रणनीति या गठबंधन नहीं, बल्कि वह युवा पीढ़ी है, जिसे दुनिया जेन-ज़ी के नाम से जानती है। सामान्यत: 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को इस पीढ़ी में शामिल किया जाता है। यह पीढ़ी इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में बड़ी हुई है। इसकी सोच पहले की पीढ़ियों से अलग है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वरूप काफी हद तक इसी पीढ़ी की प्राथमिकताओं और भागीदारी से प्रभावित हो सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">सवाल यह है कि आखिर जेन-ज़ी की राजनीति कैसी होगी? क्या यह परंपरागत जाति और धर्म आधारित राजनीति को आगे बढ़ाएगी, या फिर रोजगार, शिक्षा, तकनीक, पर्यावरण और सुशासन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देगी? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है और हर चुनाव में लाखों नए मतदाता जुड़ते हैं। जेन-ज़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल विचारधारा से प्रभावित नहीं होती। वह परिणाम देखना चाहती है। यदि कोई सरकार रोजगार देती है, बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराती है, डिजिटल सुविधाएं बढ़ाती है और जीवन स्तर सुधारती है, तो वह उसका समर्थन कर सकती है। यदि अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो यही पीढ़ी सोशल मीडिया के माध्यम से सवाल भी पूछती है। इस पीढ़ी के लिए राजनीतिक भाषणों से अधिक महत्व उन योजनाओं का है, जिनका सीधा असर उनके जीवन पर पड़ता है। यही कारण है कि आने वाले समय में राजनीतिक दलों को केवल बड़े नारों से नहीं, बल्कि ठोस उपलब्धियों के आधार पर जनता का विश्वास जीतना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समय था जब राजनीतिक संदेश रैलियों, पोस्टरों और समाचार पत्रों तक सीमित रहते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स (पूर्व में ट्विटर), फेसबुक और अन्य डिजिटल मंचों ने राजनीति की भाषा और शैली दोनों बदल दी हैं। जेन-ज़ी समाचार केवल टीवी चैनलों से नहीं लेती। वह अलग-अलग स्रोतों से जानकारी जुटाती है, वीडियो देखती है, बहस सुनती है और अपनी राय बनाती है, हालांकि इसके साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है— फर्जी खबरें, आधी-अधूरी जानकारी और दुष्प्रचार, इसलिए इस पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह भी है कि वह सूचना की सत्यता परखने की आदत विकसित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि जेन-ज़ी की प्राथमिकताओं की सूची बनाई जाए तो रोजगार सबसे ऊपर दिखाई देता है। अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के बाद सम्मानजनक नौकरी और बेहतर आय इस पीढ़ी की सबसे बड़ी अपेक्षा है। सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले युवाओं से लेकर स्टार्टअप शुरू करने वाले उद्यमियों तक, सभी चाहते हैं कि नीति-निर्माण ऐसा हो, जो अवसर बढ़ाए। आने वाले वर्षों में वही राजनीतिक दल अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, जो केवल रोजगार के वादे न करे, बल्कि कौशल विकास, उद्योग, निवेश, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने वाली नीतियां प्रस्तुत करे।</p>
<p style="text-align:justify;">जेन-ज़ी केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल चाहती है। यह पीढ़ी जानती है कि भविष्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था का है, इसलिए वह ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहती है जो रोजगार से जुड़ी हो। राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत है कि शिक्षा को केवल चुनावी घोषणा-पत्र का हिस्सा बनाना पर्याप्त नहीं होगा। गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, आधुनिक विश्वविद्यालय, अनुसंधान, डिजिटल शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर गंभीर निवेश आवश्यक होगा। जेन-ज़ी में राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना भी दिखाई देती है। खेल, विज्ञान, अंतरिक्ष, रक्षा और वैश्विक मंचों पर भारत की उपलब्धियां इस पीढ़ी को प्रेरित करती हैं, लेकिन इसके साथ-साथ यह पीढ़ी दुनिया से जुडऩा भी चाहती है। </p>
<p style="text-align:justify;">पहले पर्यावरण चुनावी बहस का प्रमुख विषय नहीं होता था, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक आपदाएं सीधे युवाओं के भविष्य को प्रभावित कर रही हैं। जेन-ज़ी चाहती है कि विकास हो, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। स्वच्छ ऊर्जा, हरित परिवहन, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और टिकाऊ विकास आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि जेन-ज़ी पूरी तरह जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति से दूर हो जाएगी। भारत का सामाजिक ढांचा अभी भी इन तत्वों से प्रभावित है, हालांकि यह भी सच है कि शहरों, डिजिटल शिक्षा और बढ़ते सामाजिक संपर्क ने युवाओं के सोचने का तरीका बदला है। वे पहचान से जुड़े प्रश्नों के साथ-साथ अवसर, विकास और व्यक्तिगत प्रगति को भी समान महत्व देने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जेन-ज़ी की राजनीति में महिलाओं की भूमिका पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है। शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, समान अवसर और नेतृत्व जैसे विषय अब केवल महिला मुद्दे नहीं, बल्कि मुख्य राजनीतिक मुद्दे बनते जा रहे हैं। आज बड़ी संख्या में युवा महिलाएं राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता, उद्यमिता और सामाजिक नेतृत्व में सक्रिय हैं। आने वाले समय में राजनीतिक दलों को महिला नेतृत्व और भागीदारी को और गंभीरता से लेना होगा। यह पीढ़ी सवाल पूछने से नहीं डरती। यदि कोई नीति सफल होती है, तो उसकी सराहना करती है, लेकिन यदि कोई निर्णय विवादित होता है, तो उसकी आलोचना भी करती है। जेन-ज़ी नेताओं से अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संवाद की अपेक्षा रखती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 05:07:04 +0530</pubDate>
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                <title>किस्सा:  थप्पड़</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सर्वेश सिंह एक साधारण किसान थे। उनके बेटे अजय सिंह ने इंटरमीडिएट पास किया तो पिता की इच्छा थी कि वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़कर कुछ बड़ा बने। खेती से घर का खर्च चलता था, इसलिए बेटे को इलाहाबाद छोड़ते समय उन्होंने कहा, “बेटा, मन लगाकर पढ़ना। हम अमीर नहीं हैं। खेती से जो मिलता है, उसी से तुम्हारी पढ़ाई और घर का खर्च चलता है।” अजय ने भरोसा दिलाया कि वह पूरी मेहनत करेगा। </p>
<p style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय में पढ़ाई शुरू हुई। गांव के सीधे-सादे माहौल से निकला अजय पहली बार सहशिक्षा के वातावरण में आया था। धीरे-धीरे उसकी नजर रोज सामने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589505/anecdote--the-slap"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/story,-slap.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सर्वेश सिंह एक साधारण किसान थे। उनके बेटे अजय सिंह ने इंटरमीडिएट पास किया तो पिता की इच्छा थी कि वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़कर कुछ बड़ा बने। खेती से घर का खर्च चलता था, इसलिए बेटे को इलाहाबाद छोड़ते समय उन्होंने कहा, “बेटा, मन लगाकर पढ़ना। हम अमीर नहीं हैं। खेती से जो मिलता है, उसी से तुम्हारी पढ़ाई और घर का खर्च चलता है।” अजय ने भरोसा दिलाया कि वह पूरी मेहनत करेगा। </p>
<p style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय में पढ़ाई शुरू हुई। गांव के सीधे-सादे माहौल से निकला अजय पहली बार सहशिक्षा के वातावरण में आया था। धीरे-धीरे उसकी नजर रोज सामने की सीट पर बैठने वाली अनुपमा सिंह पर टिकने लगी। पढ़ाई के साथ-साथ उसका मन अनुपमा की ओर खिंचने लगा। वह कमरे पर लौटता तो किताबों से अधिक अनुपमा का चेहरा याद आता। एक साल इसी उधेड़बुन में बीत गया और पढ़ाई पर असर पड़ने लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरे वर्ष उसने हिम्मत जुटाकर अनुपमा के नाम एक प्रेम-पत्र लिखा। उसमें उसने अपने मन की सच्ची भावनाएं व्यक्त करते हुए लिखा कि यदि कोई बात गलत लगे तो क्षमा कर देना, लेकिन उसे उससे प्रेम हो गया है। कई दिनों तक पत्र देने की हिम्मत नहीं हुई। आखिर एक दिन उसने कांपते हाथों से पत्र अनुपमा को दे दिया। अनुपमा ने बहुत आग्रह करने पर पत्र तो ले लिया, लेकिन अगले दिन पूरी कक्षा के सामने उसे बुलाकर जोरदार थप्पड़ मार दिया। अजय के लिए यह घटना किसी बड़े आघात से कम नहीं थी। कई दिनों तक वह कॉलेज नहीं गया। उसे लगा कि अब सब उसका मजाक उड़ाएंगे। तभी उसे पिता की बातें याद आईं“मन लगाकर पढ़ना।” उसने खुद को संभाला और तय किया कि वह गांव लौटकर हार नहीं मानेगा। धीरे-धीरे उसने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया। </p>
<p style="text-align:justify;">किताबें ही उसकी सबसे बड़ी मित्र बन गईं। उसने स्नातक पूरा किया और वर्षों की मेहनत के बाद पुलिस सेवा में चयनित होकर डीएसपी बन गया। जिस थप्पड़ ने कभी उसे तोड़ दिया था, वही उसके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया। उधर अनुपमा सिंह की कहानी भी संघर्ष और सफलता की मिसाल थी। वह एक संपन्न परिवार की इकलौती बेटी थी। मां की सोच परंपरागत थी और वह जल्द विवाह कर देना चाहती थीं, जबकि पिता शिक्षा के समर्थक थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इंटरमीडिएट में प्रथम श्रेणी आने के बाद अनुपमा ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जाने की जिद की। घर में विरोध हुआ, लेकिन उसने हार नहीं मानी। अंततः पिता बेटी की इच्छा के आगे झुक गए और बोले, “तुम्हें पढ़ने भेज रहा हूं, बस हमारे विश्वास और सम्मान को बनाए रखना।”</p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद पहुंचकर अनुपमा ने पूरी निष्ठा से पढ़ाई की। उसके लिए किताबें ही सबसे बड़ा लक्ष्य थीं। उसने स्नातक और परास्नातक उत्कृष्ट अंकों से पूरा किया, फिर जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चलकर वह डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुई। जब वह सफलता हासिल कर घर लौटी तो मां की आंखों में भी गर्व था। पिता मुस्करा रहे थे। अनुपमा ने भावुक होकर कहा, “पिताजी, आप मेरे लिए केवल पिता नहीं, महामानव हैं। यदि आपने मुझ पर विश्वास न किया होता, तो मैं यहां तक कभी नहीं पहुंच पाती।”</p>
<p style="text-align:justify;">यह कहानी केवल अजय और अनुपमा की नहीं, बल्कि जीवन के दो महत्वपूर्ण सत्य सिखाती है। असफलता और अपमान को यदि सकारात्मक ऊर्जा में बदल दिया जाए तो वही सफलता की सीढ़ी बन जाते हैं। वहीं बेटियों पर विश्वास, शिक्षा और अवसर उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर पूरे परिवार और समाज का गौरव बढ़ाते हैं। पिता का विश्वास और संतान का परिश्रम मिल जाए तो सपनों को मंजिल तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />राहुल सिंह, शाहजहांपुर</h5>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 11:00:15 +0530</pubDate>
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