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                <title>रंगोली - Amrit Vichar</title>
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                <title>देवगढ़ : सांस्कृतिक चेतना और शिल्प कौशल के अद्भुत स्वरूप की यात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित ललितपुर जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित देवगढ़ एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। यह स्थान अपनी प्राचीन बौद्ध गुफाओं, गुप्तकालीन दशावतार मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां विष्णु भगवान को समर्पित दशावतार मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और उत्तर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के 10 अवतारों को प्रदर्शित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर गुप्त काल में बना था। मंदिर अब एएसआई द्वारा संरक्षित है, लेकिन यहां भगवान विष्णु के दस</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582574/deogarh--a-journey-into-the-wonders-of-cultural-consciousness-and-craftsmanship"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(39)11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित ललितपुर जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित देवगढ़ एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। यह स्थान अपनी प्राचीन बौद्ध गुफाओं, गुप्तकालीन दशावतार मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां विष्णु भगवान को समर्पित दशावतार मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और उत्तर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के 10 अवतारों को प्रदर्शित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर गुप्त काल में बना था। मंदिर अब एएसआई द्वारा संरक्षित है, लेकिन यहां भगवान विष्णु के दस अवतार के दर्शन किए जा सकते हैं।</p><p style="text-align:justify;">लाल बलुआ पत्थर से बना दशावतार मंदिर शिखरयुक्त ‘पंचायतन’ शैली में बने मंदिरों में प्राचीनतम है, इसका निर्माण सन् 470 में भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग में हुआ था। एक ऊंचे चबूतरे पर चढ़कर जब प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं, तो हमें द्वार के दोनों ओर बनी गंगा और यमुना की मूर्तियां सहज ही आकृष्ट करती हैं। गर्भगृह के अंदर प्रवेश संभव नहीं है। मंदिर के चारों ओर पौराणिक कथाओं को अभिव्यक्त करती नृत्य मूर्तियों से सजाया गया है। गजेन्द्र मोक्ष, नर नारायण तपस्या तथा शेषसाई विष्णु की प्रतिमाएं बहुत ही आकर्षक हैं। अचंभित करने वाले फलक में विष्णु अपनी चिर-परिचित मुद्रा में शेषनाग की शैय्या पर लेटे हैं, ऊपर की ओर कार्तिकेय अपने मयूर पर आरूढ़, ऐरावत पर बैठे इन्द्र, कमल पर ब्रह्मा तथा नंदी पर उमा-महेश्वर बैठे हुए दृष्टिगोचर होते हैं। शैय्या के नीचे पांच पांडवों को द्रौपदी सहित दर्शाया गया है। ऐसा दृश्य किसी और मंदिर में नहीं है। 7 वीं या 8 वीं शताब्दी के कुछ शिव मंदिरों में पांडवों को जरूर दर्शाया गया है। दशावतार मंदिर को देखकर लगता है कि प्रारंभ में इसमें अन्य गुप्त कालीन देवालयों की भांति ही गर्भगृह के चतुर्दिक पटा हुआ प्रदक्षिणा पथ रहा होगा। मंदिर के एक के बजाए चार प्रवेश द्वार थे और उन सबके सामने छोटे-छोटे मंडप तथा सीढ़ियां थीं। चारों कोनों में चार छोटे मंदिर थे। इनके शिखर आमलकों से अलंकृत थे, क्योंकि खंडहरों से अनेक आमलक प्राप्त हुए हैं। प्रत्येक सीढ़ियों की पंक्ति के पास एक गोखा था। मुख्य मंदिर के चतुर्दिक कई छोटे मंदिर थे, जिनकी कुर्सियां मुख्य मंदिर की कुर्सी से नीची हैं। ये मुख्य मंदिर के बाद में बने थे। इनमें से एक पर पुष्पावलियों तथा अधोशीर्ष स्तूप का अलंकरण अंकित है। यह अलंकरण देवगढ़ की पहाड़ी की चोटी पर स्थित मध्ययुगीन जैन मंदिरों में भी प्रचुरता से प्रयुक्त है।</p><h4 style="text-align:justify;">गुप्तकालीन वास्तु कला की महत्वपूर्ण संरचना</h4><p style="text-align:justify;">दशावतार मंदिर में गुप्त वास्तु कला के प्रारूपिक उदाहरण मिलते हैं, जैसे, विशाल स्तंभ, जिनके दंड पर अर्ध अथवा तीन चौथाई भाग में अलंकृत गोल पट्टक बने हैं। ऐसे एक स्तंभ पर छठी शती के अंतिम भाग की गुप्त लिपि में एक अभिलेख पाया गया है, जिससे उपर्युक्त अलंकरण का गुप्त कालीन होना सिद्ध होता है। इस मंदिर की वास्तु कला की दूसरी विशेषता चैत्य वातायनों के घेरों में कई प्रकार के उत्कीर्ण चित्र हैं। इन चित्रों में प्रवेश द्वार या मूर्ति रखने के अवकाश भी प्रदर्शित हैं। इनके अतिरिक्त सारनाथ की मूर्तिकला का विशिष्ट अभिप्राय स्वस्तिकाकार शीर्ष सहित स्तंभयुग्म भी इस मंदिर के चैत्यवातायनों के घेरों में उत्कीर्ण है। दशावतार मंदिर का अल्पविकसित शिखर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संरचना है। </p><p style="text-align:justify;">देवगढ़ के मंदिर का शिखर अधिक ऊंचा नहीं है, वरन इसमें क्रमिक घुमाव बनाए गए हैं। इस समय शिखर के निचले भाग की गोलाई ही शेष है, किंतु शिखर का आभास मिल जाता है। शिखर के आधार के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ की सपाट छत थी, जिसके किनारे पर बड़ी व छोटी खिड़कियां थीं, जैसा कि महाबलीपुरम के रथों के किनारों पर हैं। द्वार मंडप दो विशाल स्तंभों पर आधृत था। मंदिर के चारों ओर भी गुप्त कालीन मूर्तिकारी का वैभव अवलोकनीय है। रामायण और कृष्ण लीला से संबंधित दृश्यों का चित्रण बहुत ही कलापूर्ण शैली में प्रदर्शित है।</p><h4 style="text-align:justify;">8 वीं से 18 वीं शती के 300 अभिलेख </h4><p style="text-align:justify;">देवगढ़ में कुल मिलाकर लगभग 300 अभिलेख मिले हैं, जो 8 वीं शती से लेकर 18 वीं शती तक के हैं। इनमें ऋ षभदेव की पुत्री ब्राह्मी द्वारा अंकित अठारह लिपियों का अभिलेख तो अद्वितीय ही है। चंदेल नरेशों के अभिलेख भी महत्वपूर्ण हैं। </p><h4 style="text-align:justify;">पहाड़ी के नीचे बहता है बेतवा नदी का सौंदर्य  </h4><p style="text-align:justify;">देवगढ़ बेतवा नदी के तट पर स्थित है। तट के निकट पहाड़ी पर 24 मंदिरों के अवशेष हैं, जो 7 वीं शती से 12 वीं शती तक बने थे। देवगढ़ पहाड़ी पर प्राचीन मंदिरों के अतिरिक्त ऊंची चट्टानों के नीचे घूमती हुई बेतवा नदी अनोखी छटा प्रस्तुत करती है। यह दृश्य इतना मनोरम है कि लोग घंटों निहारते ही रहते हैं। यहां चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर (सिद्ध की गुफा), राजघाटी, नहरघाटी आदि भी हैं। बेतवा नदी पहाड़ियों के नीचे बहती है, इसलिए नीचे जाने के लिए पत्थरों को काट कर सीढ़ियां बनाई गई हैं। सीढ़ियों से नीचे उतरते समय बाईं तरफ चट्टानों को तराश कर छोटे-छोटे कमरे बना दिए गए हैं, जिनमें जैन मुनि एकांत में प्रकृति का आनंद लेते हुए अपनी साधना में निमग्न हुआ करते थे।  इस तरह पहुंचे देवगढ़ उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले से लगभग 34 किमी की दूरी पर स्थित है। नजदीकी रेलवे स्टेशन ललितपुर के अलावा जाखलौन है, जो जाखलौन करीब 15 किमी की दूरी पर स्थित है। खजुराहो हवाई अड्डा 220 और ग्वालियर एयरपोर्ट 255 किमी दूर है।</p><p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(40)11.jpg" alt="Untitled design (40)" width="1280" height="720"></img></p><h5 style="text-align:justify;"><br />-- महामंडलेश्वर स्वामी मनोजानंद जी कानपुर </h5><p style="text-align:justify;"><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 May 2026 10:45:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> आर्ट गैलरी:  प्रतीकों के जादूगर की चर्चित कृति ‘द मास्क’ </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">द मास्क के. जी. सुब्रमण्यन की चर्चित कृतियों में से एक है, जिसमें उन्होंने पहचान और सामाजिक व्यवहार के विषय को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। इस पेंटिंग में ‘मुखौटा’ केवल चेहरे को ढंकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अनेक व्यक्तित्वों का प्रतीक बनकर उभरता है। चित्र में साहसिक रेखाओं, चटख रंगों और बहुआयामी आकृतियों का प्रयोग किया गया है। पेंटिंग के विभिन्न हिस्से दर्शकों को अलग-अलग भावनाओं और अर्थों की ओर ले जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कहीं रहस्य का भाव दिखाई देता है, तो कहीं व्यंग्य और आत्मविश्वास की झलक मिलती है। इस कृति की सबसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581790/art-gallery--the-magician-of-symbols--famous-work---the-mask"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(13)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">द मास्क के. जी. सुब्रमण्यन की चर्चित कृतियों में से एक है, जिसमें उन्होंने पहचान और सामाजिक व्यवहार के विषय को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। इस पेंटिंग में ‘मुखौटा’ केवल चेहरे को ढंकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अनेक व्यक्तित्वों का प्रतीक बनकर उभरता है। चित्र में साहसिक रेखाओं, चटख रंगों और बहुआयामी आकृतियों का प्रयोग किया गया है। पेंटिंग के विभिन्न हिस्से दर्शकों को अलग-अलग भावनाओं और अर्थों की ओर ले जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कहीं रहस्य का भाव दिखाई देता है, तो कहीं व्यंग्य और आत्मविश्वास की झलक मिलती है। इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में लोग किस प्रकार अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग चेहरे पहनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक शैली में बनी यह पेंटिंग भारतीय लोक कला की झलक भी प्रस्तुत करती है, जो सुब्रमण्यन की कला की खास पहचान रही है।  द मास्क केवल एक चित्र नहीं, बल्कि मनुष्य की पहचान, सामाजिक संबंधों और आंतरिक मनोविज्ञान पर आधारित एक गहरी कलात्मक अभिव्यक्ति है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">सुब्रमण्यन के बारे में </h4>
<p style="text-align:justify;">के. जी. सुब्रमण्यन भारतीय आधुनिक कला जगत के ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सुंदर सेतु बनाया। वे केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि लेखक, शिक्षक, शिल्पकार और विचारक भी थे। उनकी कला में भारतीय लोक संस्कृति, मिथक, ग्रामीण जीवन और आधुनिक समाज की जटिलताओं का अनूठा मिश्रण दिखाई देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">1924 में केरल में जन्मे सुब्रमण्यन ने बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय से कला शिक्षा प्राप्त की तथा बाद में शांतिनिकेतन से भी जुड़े। उन्होंने कला को केवल दीर्घाओं तक सीमित न रखकर आम जीवन से जोड़ने का प्रयास किया। वे मानते थे कि कला लोगों के अनुभवों और संस्कृति से जन्म लेती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी रचनाओं में रंगों की जीवंतता, प्रतीकों का प्रयोग और कल्पनाशीलता प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उन्होंने चित्रकला के साथ-साथ भित्ति चित्र, खिलौने, रेखाचित्र और लेखन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। भारतीय आधुनिक कला को नई दिशा देने वाले कलाकारों में उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 15 May 2026 10:00:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनोखी परंपरा : मलाणा गांव, जहां होती है अकबर की पूजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में स्थित मलाणा गांव अपनी अनोखी परंपराओं, प्राचीन शासन व्यवस्था और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यह गांव आधुनिकता से काफी हद तक दूर है और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को आज भी सहेजकर रखा हुआ है। मलाणा की सबसे रोचक विशेषताओं में से एक यह है कि यहां मुगल सम्राट अकबर को देवता के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि अकबर ने किसी समय इस गांव के लोगों को न्याय दिलाया था, जिसके बाद से उन्हें देवतुल्य मानकर सम्मान दिया जाता है। यहां का प्रमुख</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581789/unique-tradition--malana-village--where-akbar-is-worshipped"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/मलाणा-गांव,-जहां-होती-है-अकबर-की-पूजा.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में स्थित मलाणा गांव अपनी अनोखी परंपराओं, प्राचीन शासन व्यवस्था और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यह गांव आधुनिकता से काफी हद तक दूर है और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को आज भी सहेजकर रखा हुआ है। मलाणा की सबसे रोचक विशेषताओं में से एक यह है कि यहां मुगल सम्राट अकबर को देवता के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि अकबर ने किसी समय इस गांव के लोगों को न्याय दिलाया था, जिसके बाद से उन्हें देवतुल्य मानकर सम्मान दिया जाता है। यहां का प्रमुख देवता जमलू देवता माने जाते हैं, जिनके आदेशों और परंपराओं का पालन गांव के सभी निवासी करते हैं। इस गांव की सामाजिक व्यवस्था भी अत्यंत अनूठी है। </p>
<p style="text-align:justify;">मलाणा को भारत के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक माना जाता है, जहां आज भी पारंपरिक पंचायत प्रणाली के तहत निर्णय लिए जाते हैं। यहां बाहरी लोगों के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। यदि कोई बाहरी व्यक्ति गांव की दीवार, घर, मंदिर या किसी वस्तु को छू लेता है, तो उसे जुर्माना देना पड़ता है, जो आमतौर पर 1000 से 2500 रुपये तक हो सकता है। इस संबंध में जगह-जगह चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं, ताकि पर्यटक नियमों का उल्लंघन न करें।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां खरीदारी का तरीका भी अलग है। बाहरी लोग दुकानों के अंदर प्रवेश नहीं कर सकते और न ही किसी वस्तु को सीधे छू सकते हैं। ग्राहक दुकान के बाहर खड़े होकर सामान मांगते हैं, दुकानदार कीमत बताता है और पैसे बाहर ही रखवाए जाते हैं। इसके बाद सामान भी बाहर ही रख दिया जाता है। यह व्यवस्था गांव की शुद्धता और परंपराओं को बनाए रखने के उद्देश्य से अपनाई गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">मलाणा अपनी विशिष्ट भाषा “कनाशी” के लिए भी जाना जाता है, जिसे केवल स्थानीय लोग ही समझते हैं। इसके अलावा, यह गांव अपनी उच्च गुणवत्ता वाली ‘मलाणा क्रीम’ (हशीश) के कारण भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है, हालांकि यह अवैध है और प्रशासन द्वारा इस पर सख्ती से रोक लगाई गई है। पर्यटकों के लिए यहां ठहरने की अनुमति गांव के भीतर नहीं होती। उन्हें गांव के बाहर टेंट या गेस्टहाउस में रुकना पड़ता है। हर साल हजारों पर्यटक इस रहस्यमयी गांव की परंपराओं और प्राकृतिक सुंदरता को देखने के लिए यहां आते हैं। मलाणा न केवल अपनी अलग पहचान के कारण आकर्षित करता है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की विविधता और गहराई का भी अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 11:00:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बैंक्सी की वाटरलू मूर्ति वैश्विक प्रतिक्रियाएं और समकालीन कला</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चर्चित ब्रितानी कलाकार बैंक्सी का नवीनतम मूर्तिशिल्प, जिसे मध्य लंदन के वॉटरलू पैलेस में स्थापित किया गया है। समकालीन कला के उस हस्तक्षेपकारी स्वभाव को और तीव्रता से रेखांकित करती है, जहां कला केवल रूप-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता, विचारधारा और सार्वजनिक चेतना के बीच सक्रिय संवाद स्थापित करती है। यह कृति, जिसमें एक सूटधारी राजनेता अपने ही झंडे से अंधा होकर शून्य की ओर अग्रसर है। समकालीन राजनीतिक विवेक के उस संकट का रूपक बन जाती है, जिसकी झलक आज दुनियाभर के कई देशों में स्पष्ट हो चूका है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(12)9.jpg" alt="Untitled design (12)" width="1200" height="720" /></p>
<p style="text-align:justify;">बैंक्सी की निजता अभी तक एक रहस्य ही</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581788/banksy-s-waterloo-sculpture--global-reactions-and-contemporary-art"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(11)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चर्चित ब्रितानी कलाकार बैंक्सी का नवीनतम मूर्तिशिल्प, जिसे मध्य लंदन के वॉटरलू पैलेस में स्थापित किया गया है। समकालीन कला के उस हस्तक्षेपकारी स्वभाव को और तीव्रता से रेखांकित करती है, जहां कला केवल रूप-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता, विचारधारा और सार्वजनिक चेतना के बीच सक्रिय संवाद स्थापित करती है। यह कृति, जिसमें एक सूटधारी राजनेता अपने ही झंडे से अंधा होकर शून्य की ओर अग्रसर है। समकालीन राजनीतिक विवेक के उस संकट का रूपक बन जाती है, जिसकी झलक आज दुनियाभर के कई देशों में स्पष्ट हो चूका है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(12)9.jpg" alt="Untitled design (12)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">बैंक्सी की निजता अभी तक एक रहस्य ही है, किंतु इस बार उनके द्वारा या उनके नाम से स्थापित यह मूर्तिशिल्प कुछ नए सवाल भी उठाते हैं। यहां यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस बार बैंक्सी की कृति एक प्रमुख शहरी स्थल पर ‘स्थापित’ होती है, न कि पारंपरिक ग्राफिटी की तरह किसी ‘अवैध हस्तक्षेप’ के रूप में। जाहिर है ऐसे में यह परिवर्तन समकालीन कला की संस्थागत स्वीकृति की ओर संकेत करता है। पहले जहां बैंक्सी की कला ‘विरोध’ के रूप में दीवारों पर उभरती थी, वहीं अब वही कला शहर के दृश्य-परिदृश्य का अधिकृत हिस्सा बनती दिखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक द्वंद्व उत्पन्न होता है कि क्या यह अब भी प्रतिरोध की कला है या वह धीरे-धीरे सत्ता-संरचना द्वारा स्वीकृत हो रही है? या कहें कि घुलमिल रही है। वैश्विक कला आलोचना में यह बहस नई नहीं है, क्योंकि इससे पहले भी जीन-मिशेल बास्किया और कीथ हेरिंग जैसे कलाकारों के साथ भी यही हुआ, जहां उनकी कलाकृतियां पहले तो सड़क की विद्रोही कला के तौर पर सामने आई किंतु अंततः उनकी कृतियां कला दीर्घाओं और कला बाजार का हिस्सा बन गईं।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल इस मूर्ति पर विश्वभर में मिली प्रतिक्रियाओं को मुख्यतः तीन श्रेणी में रखकर समझा जा सकता है, जिसमें पहली है राजनीतिक प्रतिक्रिया, जिसके तहत कई विश्लेषकों ने इसे दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद और अधिनायकवाद की तीखी आलोचना के रूप में देखा है। यूरोप, अमेरिका और एशिया के संदर्भों में यह कृति उस ‘अंध राष्ट्रवाद’ की ओर संकेत करती है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं कलात्मक/सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिक्रिया के तहत इसे कला समीक्षकों के एक वर्ग द्वारा इसकी न्यूनतावादी संरचना और सशक्त रूपक को सराहा जा रहा है। क्योंकि यहां बैंक्सी बिना किसी जटिल संरचना के, एक सीधी दृश्य भाषा में गहन राजनीतिक अर्थ या संदेश संप्रेषित करते हैं, जो समकालीन ‘राजनीतिक अभिव्यक्ति वाली कला’ की प्रमुख विशेषता है। उधर इस मूर्तिशिल्प पर संशय और आलोचना भी सामने है। क्योंकि कुछ आलोचकों ने इस कृति की ‘प्रामाणिकता’ और ‘अनामता’ पर प्रश्न उठाए हैं। क्योंकि बैंक्सी की पहचान को लेकर वर्षों से चल रही जिज्ञासा और समय-समय पर हुए असफल खुलासे इस धारणा को जन्म देते हैं कि यह संभवतः किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक संगठित बौद्धिक समूह का कार्य हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां बैंक्सी एक ‘कलाकार’ से अधिक एक ‘बनाए गए मिथक’ के तौर पर चिन्हित होते  हैं। एक ऐसा मिथक बनकर, जो समकालीन समाज में आलोचनात्मक आवाज को सुरक्षित दूरी से व्यक्त करने का माध्यम बन गया है। वैसे यदि हम इसे वैश्विक कला इतिहास के संदर्भ में देखें, तो यह कृति 20 वीं सदी में प्रचलित हुए अवां-गार्द और क्रांतिकारी कला-आंदोलनों की उत्तराधिकारी प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, व्लादिमीर टैटलिन की कृति ‘तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का स्मारक’ (Monument to the Th।rd ।nternat।onal) एक यूटोपियन भविष्य की कल्पना करता है, जहां कला और राजनीति एक नई सामाजिक संरचना का निर्माण करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार, चर्चित सोवियत मूर्तिशिल्प ‘श्रमिक और कोलखोज महिला’ (Worker and Kolkhoz Woman) प्रगति, श्रम और सामूहिकता के आदर्श को महिमामंडित करती है। बात मूर्तिकार रामकिंकर बैज की कृति ‘मिल की पुकार’ (Mill Call) भारतीय आधुनिक मूर्तिकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें श्रमिकों को मिल की पुकार पर तेजी से आगे बढ़ते हुए दर्शाया गया है, जो औद्योगिक श्रम-संस्कृति और सामूहिक ऊर्जा का सशक्त प्रतीक है। आकृतियों की गतिशीलता, खुरदरी सतह और स्थानीय सामग्री का प्रयोग इसे अकादमिक यथार्थवाद से अलग करता है। यह कृति श्रम की गरिमा, वर्ग-चेतना और आधुनिक भारत के उभरते औद्योगिक समाज को व्यक्त करती है। साथ ही, इसमें लोक जीवन की सहजता और आधुनिकतावादी प्रयोगधर्मिता का अनूठा संगम भी दिखाई देता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">वैचारिक हस्तक्षेप और कला </h4>
<p style="text-align:justify;">बैंक्सी की यह कृति इन परंपराओं के विपरीत बतौर एक “विरोधी स्मारक” सामने आती है। क्योंकि ऐसी स्थिति में यह किसी आदर्श की स्थापना नहीं करती, बल्कि आदर्शों के विघटन को सामने लाती है। जहां इससे पहले के मूर्तिशिल्प ‘स्थिर सत्य’ का प्रतिनिधित्व करती थीं, वहां बैंक्सी का यह मूर्तिशिल्प या संस्थापन ‘संदेह’ और ‘संकट’ का प्रतिनिधित्व करती है। स्पष्ट है कि इस मूर्तिशिल्प के माध्यम से बैंक्सी एक बार फिर यह सिद्ध करते हैं कि समकालीन कला केवल दृश्य अनुभव नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप भी है। किंतु इस बार उनकी कला एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां वह एक साथ प्रतिरोध भी है और संस्थागत स्वीकृति का हिस्सा भी।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में यह अनुमान है कि इसके पीछे किसी बौद्धिक समूह की भूमिका हो सकती है, वैश्विक आलोचना में भी समय-समय पर उठता रहा है। परंतु शायद बैंक्सी जैसे किसी कलाकार की वास्तविक शक्ति इसी ‘अनिश्चितता’ में ही निहित है। बहरहाल, यह मूर्ति हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करती है कि क्या समकालीन कला अब भी सत्ता के विरुद्ध एक स्वतंत्र आवाज है या वह स्वयं सत्ता-संरचना का एक परिष्कृत उपकरण बनती जा रही है? जाहिर है बैंक्सी यहां इस प्रश्न का उत्तर तो नहीं देते, लेकिन वे इस प्रश्न को और धारदार जरूर बना देते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>--सुमन कुमार सिंह कलाकार/कला लेखक</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 May 2026 10:21:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकायन : संथाली लोक नृत्य, प्रकृति से जुड़ी लोकधारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">संथाली लोक नृत्य मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम का एक प्रमुख पारंपरिक आदिवासी नृत्य है। संथाली नृत्य झारखंड की संथाल जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला एक जीवंत और आकर्षक लोकनृत्य है, जो उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक जीवन का सशक्त प्रतीक है। संथाल, भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन निवासियों में से एक हैं और ऑस्ट्रोएशियाई भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित हैं। उनकी प्रमुख भाषा संथाली है, जो उनकी पहचान और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। झारखंड और पश्चिम बंगाल में इनकी सबसे अधिक आबादी पाई जाती है, जबकि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581040/lokayan--santhal-folk-dance--a-folk-tradition-connected-to-nature"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(60).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संथाली लोक नृत्य मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम का एक प्रमुख पारंपरिक आदिवासी नृत्य है। संथाली नृत्य झारखंड की संथाल जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला एक जीवंत और आकर्षक लोकनृत्य है, जो उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक जीवन का सशक्त प्रतीक है। संथाल, भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन निवासियों में से एक हैं और ऑस्ट्रोएशियाई भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित हैं। उनकी प्रमुख भाषा संथाली है, जो उनकी पहचान और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। झारखंड और पश्चिम बंगाल में इनकी सबसे अधिक आबादी पाई जाती है, जबकि ओडिशा, बिहार, असम और त्रिपुरा में भी इनकी उपस्थिति उल्लेखनीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संथाल समाज की एकता, आस्था और प्रकृति के प्रति गहरे संबंध का प्रतीक है। संथाली नृत्य की लोकप्रियता इतनी व्यापक है कि इसे भारतीय सिनेमा में भी स्थान मिला है, जैसे कि प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म ‘अगांतुक’ में इसकी झलक देखने को मिलती है।<br />संथाली नृत्य सामूहिक रूप से किया जाता है, जिसमें पुरुष और महिलाएं मिलकर भाग लेते हैं। नर्तक-नर्तकियां वृत्त या अर्धवृत्त बनाकर, एक-दूसरे की भुजाएं थामे लयबद्ध गति से नृत्य करते हैं। इस दौरान वे अलग-अलग समूह संरचनाएं बनाते हैं, जो नृत्य को और भी आकर्षक बनाती हैं। नृत्य में बांसुरी, ढोल, झांझ और पाइप जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है, जिनकी धुन पर नर्तक अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। साथ ही गायक भी मधुर गीतों के माध्यम से वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह नृत्य विशेष रूप से वसंत ऋतु के उत्सवों के दौरान प्रस्तुत किया जाता है, जब संथाल समुदाय प्रकृति के नवजीवन का उत्सव मनाता है। वन क्षेत्रों में आयोजित यह नृत्य वनदेवताओं के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का माध्यम भी है। इसके अलावा, अतिथियों के स्वागत में भी इसे प्रस्तुत किया जाता है। वेशभूषा की दृष्टि से भी संथाली नृत्य अत्यंत विशिष्ट है। पुरुष पारंपरिक धोती और पगड़ी पहनते हैं तथा स्वयं को पेड़ों की शाखाओं, पत्तियों और फूलों से सजाते हैं। वहीं महिलाएं लाल किनारी वाली सफेद या पीली साड़ी धारण करती हैं और बालों में जंगली फूलों का श्रृंगार करती हैं। यह प्राकृतिक सजावट उनके प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। संथाली नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक झारखंड आते हैं, विशेषकर वसंत उत्सव के समय। इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है और शोधकर्ता भी इसके इतिहास, महत्व और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहन अध्ययन कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 May 2026 11:00:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छापा-चित्रों में अतियथार्थवादी छाप : मनोहर लाल भूगड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">इसे भारतीय कला जगत की विसंगति ही कहा जाना चाहिए कि आज़ादी के बाद से हमारी आधुनिक या समकालीन कला महानगर-केंद्रित रही है। इसका परिणाम यह रहा कि हमारे जिन वरिष्ठ कलाकारों या कला-गुरुओं ने महानगर-परिक्रमा से परहेज रखा, उन्हें अपने ही शहर में वह ख्याति नहीं मिल पाई, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। ऐसे ही कला-गुरुओं में एक हैं मनोहर लाल भूगड़ा। लखनऊ कला महाविद्यालय में अपनी शिक्षा से लेकर अध्यापन-काल तक उन्होंने प्रिंटमेकिंग या छापा-चित्रण जैसे जटिल माध्यम की तकनीकों को साधते हुए कला-सृजन जारी रखा। वर्ष 1988/89 के दौरान मुझे उनके सान्निध्य का अवसर मिला था। जाहिर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581038/surrealism-in-print-paintings--manohar-lal-bhugra"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(57).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इसे भारतीय कला जगत की विसंगति ही कहा जाना चाहिए कि आज़ादी के बाद से हमारी आधुनिक या समकालीन कला महानगर-केंद्रित रही है। इसका परिणाम यह रहा कि हमारे जिन वरिष्ठ कलाकारों या कला-गुरुओं ने महानगर-परिक्रमा से परहेज रखा, उन्हें अपने ही शहर में वह ख्याति नहीं मिल पाई, जिसके वे वास्तविक हकदार थे। ऐसे ही कला-गुरुओं में एक हैं मनोहर लाल भूगड़ा। लखनऊ कला महाविद्यालय में अपनी शिक्षा से लेकर अध्यापन-काल तक उन्होंने प्रिंटमेकिंग या छापा-चित्रण जैसे जटिल माध्यम की तकनीकों को साधते हुए कला-सृजन जारी रखा। वर्ष 1988/89 के दौरान मुझे उनके सान्निध्य का अवसर मिला था। जाहिर है, तब उनके छापा-चित्रों और उसकी तकनीक ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। <strong>-सुमन कुमार सिंह</strong></p>
<h4 style="text-align:justify;">समकालीनों से अलग पहचान</h4>
<p style="text-align:justify;">लखनऊ ही नहीं, देश के समकालीन ग्राफिक कलाकारों में मनोहर लाल भूगड़ा का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1 अगस्त 1947 को जन्मे भूगड़ा ने लखनऊ के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट से 1968 में पंचवर्षीय डिप्लोमा तथा 1971 में छापा-चित्रण (प्रिंटमेकिंग) में पोस्ट डिप्लोमा प्रथम श्रेणी में प्राप्त किया। आगे की उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए उन्हें 1973 से 1975 के बीच शांतिनिकेतन में प्रख्यात प्रिंटमेकर सोमनाथ होर के निर्देशन में अध्ययन का अवसर मिला।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके उपरांत 1979 से 1981 तक भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग के अंतर्गत ‘प्रिंटमेकिंग के विभिन्न माध्यमों और सामग्रियों का अन्वेषण’ परियोजना पर शोध-फेलो के रूप में उन्होंने छापाकला की नई संभावनाओं पर गंभीर प्रयोग किए। मनोहर की रचनात्मकता का मूल आधार उनकी प्रयोगधर्मी दृष्टि रही है। उन्होंने कोलोग्राफ, टोनल वैरिएशन, एचिंग, ड्राई प्वॉइंट, एंग्रेविंग, विस्कोसिटी, डीप एचिंग, एल्युमिनियम प्लेट पर ड्राई प्वॉइंट, लिथोग्राफी और सॉफ्ट-इफेक्ट जैसी विविध तकनीकों में कार्य किया। यह बहुआयामी तकनीकी दक्षता उन्हें अपने समकालीनों से अलग पहचान देती है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">पाब्लो पिकासो के नियो-क्लासिकल के दौर की याद</h4>
<p style="text-align:justify;">विषय-वस्तु की दृष्टि से उनके छापा-चित्रों में नारी-आकृति प्रमुखता से उभरती है। श्वेत-श्याम संयोजन के माध्यम से वे एक रहस्यमय और गहन मनोवैज्ञानिक परिदृश्य रचते हैं। उनकी आकृतियां मांसल, सुदृढ़ और त्रिआयामी प्रभाव लिए होती हैं, जिनमें प्रकाश और अंधकार का द्वंद्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मानो वे यह संकेत दे रहे हों कि प्रकाश हमें प्रकाशित करता है, जबकि अंधकार हमें सजग बनाता है और दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। उनकी नारी-आकृतियां कहीं-कहीं पाब्लो पिकासो के नियो-क्लासिकल और यथार्थवादी दौर की याद दिलाती हैं, किंतु भूगड़ा की दृष्टि पूरी तरह भारतीय संदर्भों में रची-बसी है।</p>
<p style="text-align:justify;">आकृतियों में लयात्मकता, ऊर्जा और आंतरिक तनाव का संतुलित संयोजन दिखाई देता है। यह ऊर्जा केवल दृश्य नहीं, बल्कि चेतन और अचेतन मन की गहराइयों से उपजती प्रतीत होती है। मनोहर के छापा-चित्रों की एक विशिष्ट विशेषता उनका अतियथार्थवादी आयाम है। यद्यपि आकृतियों की मूल संरचना यथार्थपरक होती है, किंतु उनके मुख-भाग, अंगुलियों या अन्य अंगों में किए गए विकृत एवं कल्पनाशील हस्तक्षेप दर्शक को एक मनोवैज्ञानिक और स्वप्निल संसार में ले जाते हैं। यह वह बिंदु है, जहाँ कला मूर्त से अमूर्त की ओर अग्रसर होती है और पुनः एक नए रूप में मूर्तता ग्रहण करती है। इस प्रक्रिया में सत्य और स्वप्न के बीच का अंतर मिटता हुआ प्रतीत होता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">रंगों के माध्यम से लयात्मकता और संगीतात्मक प्रभाव</h4>
<p style="text-align:justify;">प्रतीकों का प्रयोग भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण पक्ष है। सर्प, पक्षी, सूंड और मछली जैसे रूपांकनों के माध्यम से वे भारतीय पौराणिक और सांस्कृतिक अर्थ-संदर्भों को जोड़ते हैं। सर्प भय, शक्ति और सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है; पक्षी आकाश और पृथ्वी के मध्य दैवीय सेतु; सूंड शक्ति और स्थायित्व का द्योतक; जबकि मछली जीवन और लय का संकेत देती है। इन प्रतीकों के माध्यम से उनके चित्र एक गहन सांस्कृतिक संवाद स्थापित करते हैं। रंगों के प्रयोग में भी उनकी विशिष्टता स्पष्ट है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(58).jpg" alt="Untitled design (58)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">टरक्वॉइज ब्लू, वेरिडियन ग्रीन और लाल रंग के प्रति उनका विशेष आकर्षण रहा है, जिन्हें वे गहरे पृष्ठभूमि रंगों और भूरे टोन के साथ संयोजित करते हैं। इनके बीच उभरता श्वेत रंग एक स्पंदन उत्पन्न करता है, जो पूरी रचना में जीवन का संचार करता है। वे केवल रेखाओं से ही नहीं, बल्कि रंगों के माध्यम से भी लयात्मकता और संगीतात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मनोहर लाल भूगड़ा का योगदान केवल एक कलाकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक शिक्षक के रूप में भी महत्वपूर्ण रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(59).jpg" alt="Untitled design (59)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने 1976 से 2010 तक लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध कला एवं शिल्प महाविद्यालय में अध्यापन किया और अनेक विद्यार्थियों को प्रिंटमेकिंग की जटिल तकनीकों से परिचित कराया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे सक्रिय रूप से सृजनरत हैं। प्रख्यात कलाकार और पूर्व प्राचार्य जय कृष्ण अग्रवाल के अनुसार, लखनऊ में क्रिएटिव प्रिंटमेकिंग विभाग की स्थापना और विकास में मनोहर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने तकनीकी उत्कृष्टता और प्रयोगधर्मिता के माध्यम से न केवल स्वयं को स्थापित किया, बल्कि अन्य छात्रों को भी प्रेरित किया। उस दौर में, जब प्रिंटमेकिंग को पर्याप्त मान्यता नहीं मिल रही थी, मनोहर ने इस माध्यम की असीम संभावनाओं को सिद्ध किया। अंततः मनोहर लाल भूगड़ा की कला-यात्रा हमें यह समझाती है कि प्रिंटमेकिंग केवल तकनीकी कौशल का माध्यम नहीं, बल्कि गहन संवेदनशीलता, प्रतीकात्मकता और वैचारिक गहराई का क्षेत्र भी है। उनकी कृतियांन केवल दृश्य-सौंदर्य का अनुभव कराती हैं, बल्कि दर्शक को एक गहरे आत्मिक और मनोवैज्ञानिक संवाद में भी ले जाती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 12:00:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कहां गुम गया अजूबे कारनामे वाला सर्कस</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">संसार में सर्कस का इतिहास, अति प्राचीन है। सर्कस का प्रादुर्भाव ईसा पूर्व पहली शताब्दी में हुआ माना जाता है, जब लोग एक विशेष स्थान पर इकट्ठा होकर घोड़ों की दौड़ का आनंद लेते थे। जूलियस सीजर्स के समय रोम में घुड़दौड़ के साथ रथदौड़ भी लोग देखने-दिखाने लगे थे। ईसा पश्चात छठी शताब्दी में इटली में जब ईसाइयों का आधिपत्य स्थापित हुआ तो उन्होंने सर्कस में नए किन्तु एक दर्दनाक खेल को भी शामिल कर लिया। वे न्यायालय से मौत की सजा पाए व्यक्ति को, लोगों के सामने खूख्वार नरभक्षी जंगली जानवरों के पिजड़े में डाल देते थे और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581036/where-has-the-circus-of-amazing-feats-disappeared"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(56).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संसार में सर्कस का इतिहास, अति प्राचीन है। सर्कस का प्रादुर्भाव ईसा पूर्व पहली शताब्दी में हुआ माना जाता है, जब लोग एक विशेष स्थान पर इकट्ठा होकर घोड़ों की दौड़ का आनंद लेते थे। जूलियस सीजर्स के समय रोम में घुड़दौड़ के साथ रथदौड़ भी लोग देखने-दिखाने लगे थे। ईसा पश्चात छठी शताब्दी में इटली में जब ईसाइयों का आधिपत्य स्थापित हुआ तो उन्होंने सर्कस में नए किन्तु एक दर्दनाक खेल को भी शामिल कर लिया। वे न्यायालय से मौत की सजा पाए व्यक्ति को, लोगों के सामने खूख्वार नरभक्षी जंगली जानवरों के पिजड़े में डाल देते थे और जब वह नरभक्षी जानवर उस व्यक्ति से लड़ता और फिर टुकड़े-टुकड़े करता तो सर्कस देखने आए लोग सिहर कर खड़े हो जाते। काफी वर्षों तक सर्कस का यही रूप प्रचलित रहा तो धीरे-धीरे लोगों को इस खेल से घृणा होने लगी।<strong>- शिवचरण चौहान</strong> </p>
<h5 style="text-align:justify;">भारत में सर्कस का प्रादुर्भाव</h5>
<p style="text-align:justify;">सर्कस की दुनिया को नया मोड़ सन् 1768 ई. में मिला, जब इंग्लैंड की सेना के सेनापति फिलिप एस अली तथा उसके साथी च्यूली ने मिलकर घोड़ों की पीठ पर बैठकर करतब दिखाने शुरू किए। एस्टली, एक गोल घेरे के मैदान में घोड़े की पीठ पर बैठकर तरह-तरह के करतब दिखाता था। यह खेल इंग्लैंड में इतना लोकप्रिय हुआ कि 1782 में एस्टली के एक अन्य साथी ह्यूज ने रायल सर्कस नाम से एक सर्कस कंपनी ही बना डाली। तभी से इस अनोखे खेलों का नाम सर्कस पड़ा। भारत तथा पड़ोसी देशों में सर्कस का प्रादुर्भाव कब हुआ ठीक से नहीं कहा जा सकता, किंतु यहां की ‘नट’ और ‘करनट’ जातियां घूम-घूम कर गांवों में अनोखें खेल दिखाया करती थीं। वैसे भारत में सर्कस का जन्म 19 वीं शताब्दी के आखिरी दशक में हुआ माना जाता है, जब एक विदेशी सर्कस कंपनी भारत आई और उसने मुंबई में एक स्थान पर सर्कस लगाया। इस कंपनी के एक कलाकार विलियम शायनी को घोड़ों के करतब देखने के लिए मुंबई क्या पूरे महाराष्ट्र की जनता उमड़ पड़ी थी। शायनी को अभिमान था कि उसके जैसे करतब भारत में कोई नहीं दिखा सकता है। उसके इस घमंड को कुरंदाबाद (कोल्हापुर) के राजा की सेना के घोड़ों के सईस पंत विनायक छत्ते ने तोड़ा। छत्ते ने सर्कस के मैदान में शायनी का घोड़ा छीनकर ऐसे करतब दिखाए कि खुद शायनी ने दांतों तले अंगुली दबा ली। वह आग को जलते गोले से घोड़े समेत निकल जाता था। छत्ते ने प्रथम सर्कस कम्पनी ‘छत्तेस न्यू इंडियन सर्कस’ स्थापित की। इसके बाद रायल, ताराबाई, कमला सर्कस कंपनियां आईं।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्कस को भारत में विकसित करने व लोकप्रिय करने का श्रेय केरल के तेल्लिचेरी गांव के जिमनास्ट कन्निकणन को है। कन्निकणन ने अपने गांवों के लड़के-लड़कियों को एकत्र कर उन्हें शारीरिक करतबों में ऐसा प्रशिक्षित किया कि देश-विदेश से उसके द्वारा प्रशिक्षित कलाकारों की मांग होने लगी। कन्निकणन के सहयोग से ही अमर सर्कस, भारत सर्कस तथा ओरियंट सर्कस </p>
<h5 style="text-align:justify;">विदेश में भी लोकप्रिय है सर्कस</h5>
<p style="text-align:justify;">कंपनियों ने विदेशों तक में अपने तम्बू गाड़े व अपनी पताकाएं फहराईं। एक समय भारत में करीब पांच सौ छोटी बड़ी सर्कस कम्पनियां थीं जो हाट, बाजारों, मेलों, ठेलों, शहरों में करतब करती थीं। आज मुश्किल से कुछ सर्कस बची है। भीरबाट, कमला, अपोलो, भारत जंबो कंपनियां आईं। एक जमाने में मशहूर कमला सर्कस  के बहुत से कलाकार मर गए और भारत में सर्कस कंपनियां चलाने में लोगों के रुके नहीं रही। सर्कस, एशिया, यूरोप, अमेरिका, इटली, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों में बहुत लोकप्रिय खेल रहा है। जर्मनी के घुमक्कड सर्कस कलाकार पूरी दुनिया भर में मशहूर थे। सर्कस को आधुनिक रूप देने अमेरिका का नाम प्रमुख है। अमेरिका में ही सबसे पहले जानवरों शेर, चीता, भालू, हाथी, कुत्तों, घोड़ों, तोतों आदि के अद्भुत करतब दिखाने शुरू किए। आंबर्ग, पाला कलाकार था जो शेर के मुंह में अपना सिर घुसेड देता था। तब के सोवियत संध में सर्कस ने नए-नए करतबों का विकास हुआ। जोकरों का प्रयोग, सर्कस में रूस की ही देन है। बौने, लंबे, मोटे जोकर विदूषक अपने करतबों से खूब हंसाते है। लड़कियों का अंग तोड़ना तथा झूले का आश्चर्यजनक खेल, आज सभी सर्कसों में दिखाया जाता है.ये भी अमेरिका की देन है।  जानवरों के खेल, करतब मौत का कुआ. शेर से कुश्ती सहित अनेक अद्भुत खेल, आज सर्कस में दिखाए जाते हैं, जिन्हें देखकर दर्शक दांतों तले अंगुली दबा लेते है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">नए सिरे से खड़ी होती सर्कस कंपनियां</h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(55).jpg" alt="Untitled design (55)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">एक समय आया था जब सिनेमा, भारत में बहुत लोकप्रिय हो गया था और लगा था कि शायद अब सर्कस का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ क्योंकि सर्कस ने भी समय के अनुसार आधुनिकतम रूप ले लिया। आज सर्कस कंपनियां कम है, जिन्हें सरकारी मदद देकर सामाजिक प्रोत्साहन देकर और बढ़ाया जा सकता है। जहं सर्कस लगता है, वहां सर्कस गांव स्थापित हो जाता है। सर्कस कंपनियां, अपना डेरा-तंबू, सामान, हाथी, घोड़ों, शेरों के पिंजड़ों को लाने ले जाने के लिए अपने वाहन रखती हैं। कई कंपनियां तो रेल के डिब्बे भी प्रयोग में लाती हैं। सर्कस में जानवरों के प्रदर्शन पर रोक लगने से सर्कस को झटका लगा है। सर्कस में जानवरों के रोक लग जाने पर निश्चित तौर से सर्कस के मालिकों और कलाकारों को झटका लगा है। आज भारत में कस्बों मेलों शहरों में कहीं-कहीं सर्कस कंपनियां अपने करतब करते दिखाई दे जाती हैं। मोबाइल गेम के कारण वे बच्चे सर्कस देखने कम आते हैं। पर सर्कस अब नए रूप में आ रहा है। दुनियाभर में सर्कस कंपनियां नए सिरे से खड़ी हो रही है। सर्कस कंपनियों में अब जादूगर भी अपने खेल दिखाने लगे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 10:26:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनोखी परंपरा:  नेपाल के न्यिनबा समुदाय में आज भी प्रचलित है ‘पांचाली’ प्रथा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिमालय की ऊंची वादियों में स्थित नेपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कुछ अनोखी और कम ज्ञात परंपराओं के लिए भी पहचाना जाता है। इन्हीं में से एक है ‘पांचाली’ प्रथा, जिसे भ्रातृ बहुपतित्व कहा जाता है। यह परंपरा महाभारत की द्रौपदी की कथा की याद दिलाती है और आज भी नेपाल के सुदूर हुमला जिले में रहने वाले न्यिनबा समुदाय के बीच प्रचलित है। इस प्रथा के अनुसार, एक ही महिला का विवाह परिवार के सभी भाइयों से कराया जाता है। आधुनिक समाज में यह व्यवस्था असामान्य लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण निहित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580306/unique-tradition--the-%E2%80%98panchali%E2%80%99-custom-still-prevails-today-among-nepal%E2%80%99s-nyinba-community"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(17)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिमालय की ऊंची वादियों में स्थित नेपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कुछ अनोखी और कम ज्ञात परंपराओं के लिए भी पहचाना जाता है। इन्हीं में से एक है ‘पांचाली’ प्रथा, जिसे भ्रातृ बहुपतित्व कहा जाता है। यह परंपरा महाभारत की द्रौपदी की कथा की याद दिलाती है और आज भी नेपाल के सुदूर हुमला जिले में रहने वाले न्यिनबा समुदाय के बीच प्रचलित है। इस प्रथा के अनुसार, एक ही महिला का विवाह परिवार के सभी भाइयों से कराया जाता है। आधुनिक समाज में यह व्यवस्था असामान्य लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण निहित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हुमला जिले के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में बसे न्यिनबा लोग अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन करते हैं। समुद्र तल से ऊँचाई पर स्थित इन गांवों में खेती सीमित है और संसाधन बहुत कम हैं। ऐसे में परिवार की जमीन का बँटवारा उनके लिए बड़ी समस्या बन सकता है। यदि प्रत्येक भाई अलग विवाह करे, तो जमीन छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाएगी, जिससे उत्पादन घटेगा और आर्थिक स्थिति कमजोर होगी। इस समस्या से बचने के लिए सभी भाइयों की शादी एक ही महिला से कर दी जाती है, जिससे संपत्ति संयुक्त रहती है और परिवार आर्थिक रूप से स्थिर बना रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस व्यवस्था में विवाह सामान्यतः बड़े भाई से होता है, जो परिवार का मुखिया भी होता है। विवाह के बाद महिला सभी भाइयों की पत्नी मानी जाती है और परिवार सामूहिक रूप से जीवन जीता है। घर और आजीविका से जुड़े निर्णय बड़े भाई द्वारा लिए जाते हैं, जबकि अन्य सदस्य भी समान रूप से जिम्मेदारियां निभाते हैं। बच्चों को किसी एक पिता से नहीं जोड़ा जाता, बल्कि पूरे परिवार की संतान माना जाता है, जिससे पारिवारिक विवाद की संभावना कम हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यिनबा समुदाय में महिलाएं घर और खेतों का कार्य संभालती हैं, जबकि पुरुष पशुपालन और व्यापार में लगे रहते हैं। जौ, बाजरा और आलू की खेती तथा नमक और ऊन का व्यापार उनकी आजीविका के मुख्य साधन हैं। हालांकि नेपाल सरकार ने 1963 में इस प्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में इसका प्रभाव सीमित रहा है। 1980 के दशक में मानवशास्त्री नैन्सी लेविन ने इस परंपरा का अध्ययन करते हुए इसे केवल सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की रणनीति बताया। आज भी यह प्रथा वहां के लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:00:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बज्जिकांचल की बसेरी कला और कंचन प्रकाश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मानव की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में चित्रांकन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्र इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों, शिकार-जीवन और प्रतीकों को दृश्य रूप में अंकित किया। भाषा, संकेत और मौखिक परंपराओं के समानांतर विकसित होते हुए भी चित्रकला ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति के निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया। यही परंपरा गुफा-चित्रों से आगे बढ़ते हुए विभिन्न सभ्यताओं में विकसित हुई और आज भी लोकजीवन में जीवित है। भारत के अनेक अंचलों की लोक चित्रकलाएं समकालीन कला परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति बनाए हुए हैं। आधुनिकता के विस्तार के बावजूद लोकचित्रों की प्रतीकात्मकता और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580304/bajjikanchal-s-baseri-art-and-kanchan-prakash"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(16)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानव की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में चित्रांकन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्र इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों, शिकार-जीवन और प्रतीकों को दृश्य रूप में अंकित किया। भाषा, संकेत और मौखिक परंपराओं के समानांतर विकसित होते हुए भी चित्रकला ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति के निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया। यही परंपरा गुफा-चित्रों से आगे बढ़ते हुए विभिन्न सभ्यताओं में विकसित हुई और आज भी लोकजीवन में जीवित है। भारत के अनेक अंचलों की लोक चित्रकलाएं समकालीन कला परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति बनाए हुए हैं। आधुनिकता के विस्तार के बावजूद लोकचित्रों की प्रतीकात्मकता और सामुदायिक ऊर्जा आज भी आकर्षण का केंद्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करती प्रदर्शनी ‘बज्जिका आर्ट: कंचन प्रकाश और संजू देवी के बीच एक संवाद’ का उद्घाटन 11 फरवरी 2026 को दिल्ली स्थित चंपा ट्री आर्ट गैलरी में हुआ। यह पहल आईसीसीआर, म्यूजियम ऑफ सेक्रेड आर्ट (MOSA) और गैलरी के संयुक्त सहयोग से आयोजित की गई। चित्रकार कंचन प्रकाश और सुजनी कढ़ाई कलाकार संजू कुमारी को साथ प्रस्तुत करते हुए यह प्रदर्शनी रंग और धागे के बीच संवाद रचती है। कथात्मक कढ़ाई और समानांतर चित्रित रूपों के माध्यम से यह आयोजन स्त्री सृजनशीलता और बज्जिका अंचल की जीवित परंपराओं को सामने लाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बज्जिकांचल की जिस बसेरी (या बंसेरी/देव-सिंगार) लोककला को यहां प्रमुखता दी गई, वह मिथिला या मंजूषा की तरह व्यापक पहचान नहीं पा सकी है। बज्जिका के विद्वान उदय नारायण सिंह के अनुसार बसेरी कला कभी इस अंचल की सांस्कृतिक पहचान थी, जो आधुनिकता की चकाचौंध में धूमिल पड़ रही है। फिर भी कुछ कला अनुरागी इसे जीवित रखे हुए हैं। इस परंपरा को संजोने में चुल्हिया देवी, वासमती देवी, इंदिरा देवी और कृति देवी जैसी महिला कलाकारों का उल्लेखनीय योगदान रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बसेरी कला मूलतः विवाह-परंपराओं से जुड़ी भित्ति-चित्रकला है। बज्जिकांचल, जिसमें बिहार के मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर और वैशाली जिले शामिल हैं, में यह विश्वास है कि विवाह के समय बांस-पूजन से वंश-वृद्धि और समृद्धि होती है। विवाह से पूर्व ‘मटकोर’ नामक रस्म के अवसर पर घर की बाहरी दीवारों को गोबर-मिट्टी से लीपकर उन पर बांस, पशु-पक्षी, फूल-पत्तियों और मंगल प्रतीकों का अंकन किया जाता है। कुछ स्थानों पर इस कार्य में नाई जाति की स्त्रियों की भी सहभागिता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मटकोर बिहार के ग्रामीण हिंदू विवाह संस्कारों की एक प्राचीन रस्म है। विवाह से एक-दो दिन पूर्व महिलाएं तालाब या खेत से मंगलगीत गाते हुए शुद्ध मिट्टी लाती हैं, जिससे मंडप (मड़वा) की वेदी तैयार की जाती है। यह मिट्टी धरती माता के आशीर्वाद, उर्वरता और नवजीवन का प्रतीक मानी जाती है। इसी क्रम में बांस के झुरमुट पर जाकर उसकी पूजा की जाती है। रोली, हल्दी, अक्षत और दीप अर्पित कर बांस देवता से अनुमति ली जाती है, तभी चयनित बांस काटा जाता है। बांस स्थायित्व, लचक और वंश वृद्धि का प्रतीक है।</p>
<p style="text-align:justify;">बसेरी चित्र इन्हीं सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रेरित होते हैं। दीवारों पर लंबवत बांस-आकृतियां, पत्तियां, चिड़ियां, लताएं और कभी-कभी सूर्य या कलश जैसे प्रतीक अंकित किए जाते हैं। रंगों में गेरुआ, हरा, पीला और नीला प्रमुख होते हैं। रेखांकन सरल, सजावटी और प्रतीकात्मक होता है। यह स्त्रियों की सामूहिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है, जो विवाह को प्रकृति और समुदाय से जोड़ती है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य पुरस्कार और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप से सम्मानित कंचन प्रकाश ने इस दीवार-कला को कागज और कैनवास पर रूपांतरित कर नई पहचान दी है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय से शिक्षित कंचन आधुनिक और समकालीन कला-भाषा से परिचित होते हुए भी अपने अंचल की परंपरा को संरक्षित और संवर्धित करने में सक्रिय हैं। उनके प्रयासों से यह विलुप्तप्राय कला राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंच रही है।  वस्तुतः बसेरी कला केवल एक लोकचित्र परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति-सम्मान, स्त्री-सृजन और सामुदायिक एकता का जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज है। इसके संरक्षण और संवर्धन के प्रयास निरंतर जारी रहें, यही अपेक्षा है।<strong>-सुमन कुमार सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 13:00:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आर्ट गैलरी:  सहयोग और जीवन की यात्रा दर्शाती पेंटिंग </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">यह पेंटिंग आधुनिक शैली की एक प्रभावशाली रचना है, जिसमें मानव जीवन, श्रम और सामाजिक संबंधों को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है। चित्र में कई मानव आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें ज्यामितीय आकृतियों जैसे वृत्त, त्रिभुज और आयत के माध्यम से उकेरा गया है। यह शैली चित्र को अमूर्तता प्रदान करती है और दर्शक को गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है। चित्र के केंद्र में कुछ महिलाएं और पुरुष दिखाई देते हैं, जो अपने-अपने कार्यों में लगे हुए हैं। किसी के हाथ में घड़ा है, तो कोई सहारा देता हुआ प्रतीत होता है। यह सामूहिकता और सहयोग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580307/art-gallery--paintings-depicting-collaboration-and-the-journey-of-life"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(19)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यह पेंटिंग आधुनिक शैली की एक प्रभावशाली रचना है, जिसमें मानव जीवन, श्रम और सामाजिक संबंधों को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है। चित्र में कई मानव आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें ज्यामितीय आकृतियों जैसे वृत्त, त्रिभुज और आयत के माध्यम से उकेरा गया है। यह शैली चित्र को अमूर्तता प्रदान करती है और दर्शक को गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है। चित्र के केंद्र में कुछ महिलाएं और पुरुष दिखाई देते हैं, जो अपने-अपने कार्यों में लगे हुए हैं। किसी के हाथ में घड़ा है, तो कोई सहारा देता हुआ प्रतीत होता है। यह सामूहिकता और सहयोग की भावना को दर्शाता है।  </p>
<p style="text-align:justify;">आकृतियों के झुके हुए चेहरे और सरल भाव जीवन की गंभीरता, संघर्ष और संवेदनशीलता को व्यक्त करते हैं। रंगों का प्रयोग भी बहुत सूक्ष्म और संतुलित है। हल्के नीले, हरे, भूरे और पीले रंगों का संयोजन शांति और स्थिरता का वातावरण बनाता है। पृष्ठभूमि का हरा रंग प्रकृति और जीवन का प्रतीक है, जबकि धूसर रंग मानव जीवन की कठिनाइयों को दर्शाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चित्र में रेखाओं और आकृतियों का संतुलन यह दर्शाता है कि कलाकार ने केवल दृश्य नहीं, बल्कि भावनाओं को भी उकेरने का प्रयास किया है। यह पेंटिंग केवल एक दृश्य प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि समाज में परस्पर निर्भरता, सहानुभूति और एकता का संदेश देती है। समग्र रूप से यह पेंटिंग दर्शाती है कि जीवन में संघर्ष और कठिनाइयों के बावजूद, मनुष्य आपसी सहयोग और समझ के माध्यम से आगे बढ़ता है। कलाकार ने अपनी अनूठी शैली के माध्यम से साधारण जीवन को असाधारण अर्थ प्रदान किया है, जो इस कृति को विशेष बनाता है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">नीरज के बारें में</h4>
<p style="text-align:justify;">नीरज गोस्वामी भारत के एक प्रसिद्ध समकालीन चित्रकार और मूर्तिकार हैं, जिन्होंने अपनी अनूठी कला शैली से विशेष पहचान बनाई है। वे विशेष रूप से तेल रंगों के कुशल प्रयोग के लिए जाने जाते हैं, जिनसे उनकी पेंटिंग्स में अद्भुत चमक और जीवंतता दिखाई देती है। उनकी कलाकृतियों में आधुनिकता और भावनात्मक गहराई का सुंदर समन्वय मिलता है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">नीरज गोस्वामी की रचनाएं दर्शकों को आकर्षित करने के साथ-साथ विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने भारतीय कला जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी सृजनशीलता के माध्यम से कला को नई दिशा प्रदान की है। वे सेलेडॉन पोर्सिलेन और ओनिक्स स्टायरेशन के रंगों का उपयोग करते हैं, जिससे उनके कैनवस में एक सौम्य चमक और अद्वितीय रंग संयोजन समाहित हो जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">नीरज की पेंटिंग्स कीमती पत्थरों से मिलती-जुलती होने के लिए जानी जाती हैं, जिनमें एक ऐसी पारदर्शिता दिखाई देती है, जो कला जगत में शायद ही कभी देखने को मिलती है। वे अपनी कलाकृतियों में एक उल्लेखनीय दीप्ति प्राप्त करते हैं, जिससे वे एक विशिष्ट और चमकदार गुणवत्ता के साथ अलग दिखती हैं। तेल रंगों पर अपनी महारत और रंगों के अनूठे संयोजन के माध्यम से, नीरज गोस्वामी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए ऐसी कलाकृतियां बनाते हैं, जो अपनी चमक और दीप्ति से मंत्रमुग्ध कर देती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 13:28:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>World Dance Day :  नृत्य, मन के भावों का अभिनीत गीत </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नृत्य मनुष्य के उल्लास का प्रत्यक्ष भावात्मक प्रदर्शन है। जब मन उल्लास से भर उठता है, तो शारीरिक चेष्टाएं उसकी अभिव्यक्ति नृत्य के रूप में करती हैं। इस प्रकार नृत्य मन के भावों का अभिनीत गीत है। यदि सूक्ष्मता से देखें तो प्रकृति का हर तत्व खुशी में नृत्य करता जान पड़ता है। बरसते पानी में महकती धरती पर सिर्फ मोर ही नहीं नाचते, पेड़ों की डालियां भी वर्षा की बूंदों के साथ झूमती नजर आती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-(15)9.jpg" alt="Untitled design (15)" width="1200" height="720" /></p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति से इतर अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में मनुष्य ने नृत्य की लय और गति को विभिन्न शैलियों में बांधकर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580301/world-dance-day--dance%E2%80%94the-enacted-song-of-the-soul-s-emotions"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(13)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नृत्य मनुष्य के उल्लास का प्रत्यक्ष भावात्मक प्रदर्शन है। जब मन उल्लास से भर उठता है, तो शारीरिक चेष्टाएं उसकी अभिव्यक्ति नृत्य के रूप में करती हैं। इस प्रकार नृत्य मन के भावों का अभिनीत गीत है। यदि सूक्ष्मता से देखें तो प्रकृति का हर तत्व खुशी में नृत्य करता जान पड़ता है। बरसते पानी में महकती धरती पर सिर्फ मोर ही नहीं नाचते, पेड़ों की डालियां भी वर्षा की बूंदों के साथ झूमती नजर आती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-(15)9.jpg" alt="Untitled design (15)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति से इतर अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में मनुष्य ने नृत्य की लय और गति को विभिन्न शैलियों में बांधकर नृत्य के अनेक प्रकारों को सृजित किया है। भारत में बहुल सांस्कृतिक विविधता में विभिन्न नृत्य शैलियां विकसित हुईं हैं। इन नृत्य शैलियों को शास्त्रीय नृत्य और लोकनृत्य की दो श्रेणियों में रख सकते हैं। यह दोनों ही शैलियां भारतीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन के जीवंत प्रतीक हैं।<strong>– डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री, निदेशक, रुहेलखंड शोध संस्थान, शाहजहांपुर</strong></p>
<p style="text-align:justify;">भारत में लोक नृत्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन, विविधतापूर्ण और जीवंत रही है, जो देश की सांस्कृतिक बहुलता का सशक्त प्रतीक है। यह परंपरा विभिन्न क्षेत्रों, जातीय समूहों और सामाजिक समुदायों के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। भारत के प्रत्येक प्रदेश- जैसे पंजाब, राजस्थान, गुजरात और असम की अपनी विशिष्ट लोकनृत्य शैलियां हैं, जो वहां की भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लोक नृत्यों का उद्भव मुख्यतः कृषि-आधारित समाज से हुआ, जहां फसल कटाई, वर्षा, विवाह और धार्मिक उत्सवों के अवसर पर सामूहिक रूप से नृत्य किया जाता था। उदाहरण के लिए, पंजाब का भांगड़ा फसल की खुशी का प्रतीक है, जबकि गुजरात का गरबा देवी-उपासना से जुड़ा हुआ है। इन नृत्यों में स्थानीय लोकगीत, वाद्य यंत्र और पारंपरिक वेशभूषा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। आधुनिक समय में भी लोक नृत्य अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं और सांस्कृतिक उत्सवों व मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से इन्हें नया आयाम मिला है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कथक नृत्य</h4>
<p style="text-align:justify;">कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में एक प्रमुख और विकसित शैली है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन कथावाचन परंपरा से जुड़ी हैं। ‘कथक’ शब्द ‘कथा’ से बना है और प्रारंभ में कथक वे कलाकार थे, जो मंदिरों और जनसभाओं में धार्मिक कथाएं प्रस्तुत करते थे। यह शैली उत्तर भारत, विशेषतः उत्तर प्रदेश में विकसित हुई तथा लखनऊ और जयपुर घरानों के माध्यम से समृद्ध हुई। इसके विकास को तीन चरणों में देखा जा सकता है- मंदिर परंपरा, दरबारी प्रभाव और आधुनिक मंचीय स्वरूप। भक्ति काल में इसमें कृष्ण लीलाओं का वर्णन प्रमुख रहा, जबकि मुगल काल में इसमें नजाकत, श्रृंगार और तकनीकी जटिलता का समावेश हुआ। कथक की विशेषता उसकी भाव-भंगिमा, ‘अभिनय’, तेज ‘तत्कार’ और घूमरदार ‘चक्कर’ हैं, जो इसे विशिष्ट बनाते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">लिल्ली घोड़ी</h4>
<p style="text-align:justify;">लिल्ली घोड़ी या कठ घोड़वा नृत्य उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित एक पारंपरिक लोकनृत्य है। यह नृत्य विवाह, मेलों और उत्सवों में प्रस्तुत किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से इसका संबंध वीरता और घुड़सवारी की परंपरा से है। नर्तक लकड़ी या बांस से बने कृत्रिम घोड़े को कमर में बांधकर रंग-बिरंगे वस्त्रों में नृत्य करते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो वे घोड़े पर सवार हों। यह नृत्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेशों का भी माध्यम रहा है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कजरी</h4>
<p style="text-align:justify;">कजरी भारतीय लोकसंगीत की एक भावप्रधान शैली है, जिसका उद्गम उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर और वाराणसी क्षेत्र में माना जाता है। सावन-भादों की वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले कजरी गीत विरह, प्रेम और प्रकृति के सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हैं। जब इन गीतों के साथ नृत्य किया जाता है, तो यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है। स्त्रियां समूह में झूला झूलते हुए या आंगन में गोल घेरा बनाकर कजरी गाती और नृत्य करती हैं। यह शैली ग्रामीण जीवन की सहज अभिव्यक्ति है, जिसमें भाव और लय का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मयूर नृत्य</h4>
<p style="text-align:justify;">मयूर नृत्य भारतीय लोक और शास्त्रीय परंपराओं का एक मनोहारी रूप है, जो विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में प्रचलित है। इसका संबंध कृष्ण की लीलाओं और प्रकृति-प्रेम से जोड़ा जाता है। वर्षा ऋ तु में मोर के नृत्य से प्रेरित होकर यह शैली विकसित हुई। कलाकार मोर के पंखों से सुसज्जित वेशभूषा पहनकर उसकी चाल और मुद्राओं का अनुकरण करते हैं। बांसुरी, ढोलक और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसकी लयात्मकता को और अधिक आकर्षक बनाते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">नौटंकी</h4>
<p style="text-align:justify;">नौटंकी उत्तर भारत की एक लोकप्रिय लोकनाट्य परंपरा है, जिसमें संगीत, गायन, संवाद और नृत्य का समन्वय होता है। इसका विकास विशेषतः उत्तर प्रदेश में हुआ। नौटंकी में नृत्य कथा-वाचन का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें कथक की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, विशेषकर चक्कर और भाव-भंगिमा में। ढोलक, नगाड़ा और हारमोनियम की ताल पर कलाकार नृत्य करते हुए कथा को जीवंत बनाते हैं।  नौटंकी में सम्मिलित नृत्य स्वरूप विविध लोक और शास्त्रीय शैलियों से प्रभावित होते हैं। इनमें कथक की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, विशेषकर उसकी घूमरदार चाल, चक्कर और भाव-भंगिमा में। इसके साथ ही लोकनृत्य की सरलता और सहजता भी इसमें समाहित रहती है, जिससे यह आम जनमानस के लिए अधिक ग्राह्य बन जाता है। नौटंकी के नृत्य में अभिनय (अभिनयात्मक नृत्य) का विशेष स्थान होता है। कलाकार गीतों और संवादों के बीच नृत्य करते हुए कथा के भावों को अभिव्यक्त करते हैं। स्त्री पात्रों की भूमिका, चाहे पुरुष कलाकार निभाएं या स्त्रियां, उसमें लयात्मकता और नज़ाकत का समावेश होता है। नृत्य की गतियां अधिक जटिल न होकर दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने वाली होती हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">छपेली</h4>
<p style="text-align:justify;">छपेली नृत्य उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक लोकप्रिय लोकनृत्य है, जो वसंत ऋ तु और होली जैसे उत्सवों पर किया जाता है। इसमें स्त्री-पुरुष युगल के रूप में भाग लेते हैं और लोकगीतों की धुन पर संवादात्मक शैली में नृत्य करते हैं। इसमें श्रृंगार, हास्य और सामाजिक जीवन के विविध रंग दिखाई देते हैं। हुड़का और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसकी लय को सजीव बनाते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पाय डंडा</h4>
<p style="text-align:justify;">पाय डंडा नृत्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित एक ऊर्जावान लोकनृत्य है। यह नृत्य मुख्यतः फसल कटाई, मेलों और धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। इसमें डंडों का तालबद्ध टकराव वीरता और समन्वय का प्रतीक होता है। इसका संबंध प्राचीन युद्धाभ्यास और शारीरिक कौशल से भी जोड़ा जाता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">जोगिनी नृत्य</h4>
<p style="text-align:justify;">जोगिनी नृत्य उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र की लोकसंस्कृति का एक आध्यात्मिक रूप है। यह देवी-उपासना और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ है। इस नृत्य में नर्तक भावावेश में आकर नृत्य करते हैं, जिससे दैवीय अनुभूति का संचार होता है। ढोल, दमाऊ और रणसिंघा जैसे वाद्य यंत्र इसकी ऊर्जा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार भारत के लोक नृत्य न केवल मनोरंजन के साधन हैं, बल्कि वे देश की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक जीवन और ऐतिहासिक परंपराओं का सजीव प्रतिबिंब भी प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 12:51:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनोखी परंपरा:  प्रकृति और परंपरा का संगम मेंढकों की शादी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत की विविध लोक परंपराओं में कई ऐसे अनोखे रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं, जो पहली नज़र में आश्चर्यचकित कर देते हैं, लेकिन उनके पीछे गहरी आस्था और प्रकृति से जुड़ा सांस्कृतिक संबंध होता है। पेड़ों की शादी की परंपरा के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन मेंढक और मेंढकी की शादी भी भारत के कुछ हिस्सों में विशेष महत्व रखती है। विशेष रूप से असम के जोरहाट जिले और अन्य पूर्वोत्तर क्षेत्रों के गाँवों में यह परंपरा प्रचलित है। यहाँ के लोगों का मानना है कि जब लंबे समय तक वर्षा नहीं होती और सूखे जैसी स्थिति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579566/a-unique-tradition--a-confluence-of-nature-and-custom%E2%80%94the-marriage-of-frogs"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(3)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की विविध लोक परंपराओं में कई ऐसे अनोखे रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं, जो पहली नज़र में आश्चर्यचकित कर देते हैं, लेकिन उनके पीछे गहरी आस्था और प्रकृति से जुड़ा सांस्कृतिक संबंध होता है। पेड़ों की शादी की परंपरा के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन मेंढक और मेंढकी की शादी भी भारत के कुछ हिस्सों में विशेष महत्व रखती है। विशेष रूप से असम के जोरहाट जिले और अन्य पूर्वोत्तर क्षेत्रों के गाँवों में यह परंपरा प्रचलित है। यहाँ के लोगों का मानना है कि जब लंबे समय तक वर्षा नहीं होती और सूखे जैसी स्थिति बन जाती है, तब मेंढकों की शादी कराने से वर्षा देवता प्रसन्न होते हैं और अच्छी बारिश होती है। यह मान्यता प्राचीन समय से चली आ रही है और आज भी लोग इसे पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अनोखी शादी में सभी पारंपरिक हिंदू विवाह रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। सबसे पहले गाँव के लोग एक नर और एक मादा मेंढक को पकड़ते हैं। इसके बाद उन्हें स्नान कराया जाता है और हल्दी लगाई जाती है। फिर छोटे-छोटे कपड़े या फूलों से उन्हें सजाया जाता है। शादी के लिए मंडप बनाया जाता है और बाकायदा एक पुजारी को बुलाया जाता है, जो मंत्रोच्चार के साथ विवाह संपन्न कराता है। विवाह के दौरान ‘बारात’ भी निकलती है, जिसमें गाँव के लोग गीत गाते और नाचते हुए शामिल होते हैं। इस परंपरा का एक वैज्ञानिक पहलू भी माना जाता है। मेंढक आमतौर पर बारिश के मौसम में अधिक सक्रिय होते हैं और उनकी टर्र-टर्र की आवाज़ वर्षा के आगमन का संकेत मानी जाती है। इसलिए यह विवाह एक प्रतीकात्मक प्रयास भी हो सकता है, जिससे लोग मानसून के प्रति अपनी आशा और विश्वास व्यक्त करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल असम ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी इस तरह की परंपराएं देखने को मिलती हैं। कहीं-कहीं इसे ‘मेंढक विवाह’ के रूप में त्योहार की तरह मनाया जाता है, जिसमें पूरे गाँव की भागीदारी होती है। हालांकि आधुनिक विज्ञान इन मान्यताओं को अंधविश्वास मान सकता है, लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह परंपरा लोगों को एकजुट करती है और संकट के समय सामूहिक आशा और सकारात्मकता का संचार करती है। इस तरह की लोक परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विविधता और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को दर्शाती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/579566/a-unique-tradition--a-confluence-of-nature-and-custom%E2%80%94the-marriage-of-frogs</link>
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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 08:00:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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