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                <title>रंगोली - Amrit Vichar</title>
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                            <item>
                <title>अनोखी परंपरा:  नेपाल के न्यिनबा समुदाय में आज भी प्रचलित है ‘पांचाली’ प्रथा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिमालय की ऊंची वादियों में स्थित नेपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कुछ अनोखी और कम ज्ञात परंपराओं के लिए भी पहचाना जाता है। इन्हीं में से एक है ‘पांचाली’ प्रथा, जिसे भ्रातृ बहुपतित्व कहा जाता है। यह परंपरा महाभारत की द्रौपदी की कथा की याद दिलाती है और आज भी नेपाल के सुदूर हुमला जिले में रहने वाले न्यिनबा समुदाय के बीच प्रचलित है। इस प्रथा के अनुसार, एक ही महिला का विवाह परिवार के सभी भाइयों से कराया जाता है। आधुनिक समाज में यह व्यवस्था असामान्य लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण निहित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580306/unique-tradition--the-%E2%80%98panchali%E2%80%99-custom-still-prevails-today-among-nepal%E2%80%99s-nyinba-community"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(17)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिमालय की ऊंची वादियों में स्थित नेपाल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कुछ अनोखी और कम ज्ञात परंपराओं के लिए भी पहचाना जाता है। इन्हीं में से एक है ‘पांचाली’ प्रथा, जिसे भ्रातृ बहुपतित्व कहा जाता है। यह परंपरा महाभारत की द्रौपदी की कथा की याद दिलाती है और आज भी नेपाल के सुदूर हुमला जिले में रहने वाले न्यिनबा समुदाय के बीच प्रचलित है। इस प्रथा के अनुसार, एक ही महिला का विवाह परिवार के सभी भाइयों से कराया जाता है। आधुनिक समाज में यह व्यवस्था असामान्य लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण निहित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हुमला जिले के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में बसे न्यिनबा लोग अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन करते हैं। समुद्र तल से ऊँचाई पर स्थित इन गांवों में खेती सीमित है और संसाधन बहुत कम हैं। ऐसे में परिवार की जमीन का बँटवारा उनके लिए बड़ी समस्या बन सकता है। यदि प्रत्येक भाई अलग विवाह करे, तो जमीन छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाएगी, जिससे उत्पादन घटेगा और आर्थिक स्थिति कमजोर होगी। इस समस्या से बचने के लिए सभी भाइयों की शादी एक ही महिला से कर दी जाती है, जिससे संपत्ति संयुक्त रहती है और परिवार आर्थिक रूप से स्थिर बना रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस व्यवस्था में विवाह सामान्यतः बड़े भाई से होता है, जो परिवार का मुखिया भी होता है। विवाह के बाद महिला सभी भाइयों की पत्नी मानी जाती है और परिवार सामूहिक रूप से जीवन जीता है। घर और आजीविका से जुड़े निर्णय बड़े भाई द्वारा लिए जाते हैं, जबकि अन्य सदस्य भी समान रूप से जिम्मेदारियां निभाते हैं। बच्चों को किसी एक पिता से नहीं जोड़ा जाता, बल्कि पूरे परिवार की संतान माना जाता है, जिससे पारिवारिक विवाद की संभावना कम हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यिनबा समुदाय में महिलाएं घर और खेतों का कार्य संभालती हैं, जबकि पुरुष पशुपालन और व्यापार में लगे रहते हैं। जौ, बाजरा और आलू की खेती तथा नमक और ऊन का व्यापार उनकी आजीविका के मुख्य साधन हैं। हालांकि नेपाल सरकार ने 1963 में इस प्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन दूरस्थ क्षेत्रों में इसका प्रभाव सीमित रहा है। 1980 के दशक में मानवशास्त्री नैन्सी लेविन ने इस परंपरा का अध्ययन करते हुए इसे केवल सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की रणनीति बताया। आज भी यह प्रथा वहां के लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:00:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बज्जिकांचल की बसेरी कला और कंचन प्रकाश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मानव की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में चित्रांकन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्र इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों, शिकार-जीवन और प्रतीकों को दृश्य रूप में अंकित किया। भाषा, संकेत और मौखिक परंपराओं के समानांतर विकसित होते हुए भी चित्रकला ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति के निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया। यही परंपरा गुफा-चित्रों से आगे बढ़ते हुए विभिन्न सभ्यताओं में विकसित हुई और आज भी लोकजीवन में जीवित है। भारत के अनेक अंचलों की लोक चित्रकलाएं समकालीन कला परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति बनाए हुए हैं। आधुनिकता के विस्तार के बावजूद लोकचित्रों की प्रतीकात्मकता और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580304/bajjikanchal-s-baseri-art-and-kanchan-prakash"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(16)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानव की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में चित्रांकन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्र इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों, शिकार-जीवन और प्रतीकों को दृश्य रूप में अंकित किया। भाषा, संकेत और मौखिक परंपराओं के समानांतर विकसित होते हुए भी चित्रकला ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति के निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया। यही परंपरा गुफा-चित्रों से आगे बढ़ते हुए विभिन्न सभ्यताओं में विकसित हुई और आज भी लोकजीवन में जीवित है। भारत के अनेक अंचलों की लोक चित्रकलाएं समकालीन कला परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति बनाए हुए हैं। आधुनिकता के विस्तार के बावजूद लोकचित्रों की प्रतीकात्मकता और सामुदायिक ऊर्जा आज भी आकर्षण का केंद्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करती प्रदर्शनी ‘बज्जिका आर्ट: कंचन प्रकाश और संजू देवी के बीच एक संवाद’ का उद्घाटन 11 फरवरी 2026 को दिल्ली स्थित चंपा ट्री आर्ट गैलरी में हुआ। यह पहल आईसीसीआर, म्यूजियम ऑफ सेक्रेड आर्ट (MOSA) और गैलरी के संयुक्त सहयोग से आयोजित की गई। चित्रकार कंचन प्रकाश और सुजनी कढ़ाई कलाकार संजू कुमारी को साथ प्रस्तुत करते हुए यह प्रदर्शनी रंग और धागे के बीच संवाद रचती है। कथात्मक कढ़ाई और समानांतर चित्रित रूपों के माध्यम से यह आयोजन स्त्री सृजनशीलता और बज्जिका अंचल की जीवित परंपराओं को सामने लाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बज्जिकांचल की जिस बसेरी (या बंसेरी/देव-सिंगार) लोककला को यहां प्रमुखता दी गई, वह मिथिला या मंजूषा की तरह व्यापक पहचान नहीं पा सकी है। बज्जिका के विद्वान उदय नारायण सिंह के अनुसार बसेरी कला कभी इस अंचल की सांस्कृतिक पहचान थी, जो आधुनिकता की चकाचौंध में धूमिल पड़ रही है। फिर भी कुछ कला अनुरागी इसे जीवित रखे हुए हैं। इस परंपरा को संजोने में चुल्हिया देवी, वासमती देवी, इंदिरा देवी और कृति देवी जैसी महिला कलाकारों का उल्लेखनीय योगदान रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बसेरी कला मूलतः विवाह-परंपराओं से जुड़ी भित्ति-चित्रकला है। बज्जिकांचल, जिसमें बिहार के मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर और वैशाली जिले शामिल हैं, में यह विश्वास है कि विवाह के समय बांस-पूजन से वंश-वृद्धि और समृद्धि होती है। विवाह से पूर्व ‘मटकोर’ नामक रस्म के अवसर पर घर की बाहरी दीवारों को गोबर-मिट्टी से लीपकर उन पर बांस, पशु-पक्षी, फूल-पत्तियों और मंगल प्रतीकों का अंकन किया जाता है। कुछ स्थानों पर इस कार्य में नाई जाति की स्त्रियों की भी सहभागिता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मटकोर बिहार के ग्रामीण हिंदू विवाह संस्कारों की एक प्राचीन रस्म है। विवाह से एक-दो दिन पूर्व महिलाएं तालाब या खेत से मंगलगीत गाते हुए शुद्ध मिट्टी लाती हैं, जिससे मंडप (मड़वा) की वेदी तैयार की जाती है। यह मिट्टी धरती माता के आशीर्वाद, उर्वरता और नवजीवन का प्रतीक मानी जाती है। इसी क्रम में बांस के झुरमुट पर जाकर उसकी पूजा की जाती है। रोली, हल्दी, अक्षत और दीप अर्पित कर बांस देवता से अनुमति ली जाती है, तभी चयनित बांस काटा जाता है। बांस स्थायित्व, लचक और वंश वृद्धि का प्रतीक है।</p>
<p style="text-align:justify;">बसेरी चित्र इन्हीं सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रेरित होते हैं। दीवारों पर लंबवत बांस-आकृतियां, पत्तियां, चिड़ियां, लताएं और कभी-कभी सूर्य या कलश जैसे प्रतीक अंकित किए जाते हैं। रंगों में गेरुआ, हरा, पीला और नीला प्रमुख होते हैं। रेखांकन सरल, सजावटी और प्रतीकात्मक होता है। यह स्त्रियों की सामूहिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है, जो विवाह को प्रकृति और समुदाय से जोड़ती है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य पुरस्कार और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप से सम्मानित कंचन प्रकाश ने इस दीवार-कला को कागज और कैनवास पर रूपांतरित कर नई पहचान दी है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय से शिक्षित कंचन आधुनिक और समकालीन कला-भाषा से परिचित होते हुए भी अपने अंचल की परंपरा को संरक्षित और संवर्धित करने में सक्रिय हैं। उनके प्रयासों से यह विलुप्तप्राय कला राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंच रही है।  वस्तुतः बसेरी कला केवल एक लोकचित्र परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति-सम्मान, स्त्री-सृजन और सामुदायिक एकता का जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज है। इसके संरक्षण और संवर्धन के प्रयास निरंतर जारी रहें, यही अपेक्षा है।<strong>-सुमन कुमार सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 13:00:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आर्ट गैलरी:  सहयोग और जीवन की यात्रा दर्शाती पेंटिंग </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">यह पेंटिंग आधुनिक शैली की एक प्रभावशाली रचना है, जिसमें मानव जीवन, श्रम और सामाजिक संबंधों को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है। चित्र में कई मानव आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें ज्यामितीय आकृतियों जैसे वृत्त, त्रिभुज और आयत के माध्यम से उकेरा गया है। यह शैली चित्र को अमूर्तता प्रदान करती है और दर्शक को गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है। चित्र के केंद्र में कुछ महिलाएं और पुरुष दिखाई देते हैं, जो अपने-अपने कार्यों में लगे हुए हैं। किसी के हाथ में घड़ा है, तो कोई सहारा देता हुआ प्रतीत होता है। यह सामूहिकता और सहयोग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580307/art-gallery--paintings-depicting-collaboration-and-the-journey-of-life"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(19)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यह पेंटिंग आधुनिक शैली की एक प्रभावशाली रचना है, जिसमें मानव जीवन, श्रम और सामाजिक संबंधों को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है। चित्र में कई मानव आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें ज्यामितीय आकृतियों जैसे वृत्त, त्रिभुज और आयत के माध्यम से उकेरा गया है। यह शैली चित्र को अमूर्तता प्रदान करती है और दर्शक को गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है। चित्र के केंद्र में कुछ महिलाएं और पुरुष दिखाई देते हैं, जो अपने-अपने कार्यों में लगे हुए हैं। किसी के हाथ में घड़ा है, तो कोई सहारा देता हुआ प्रतीत होता है। यह सामूहिकता और सहयोग की भावना को दर्शाता है।  </p>
<p style="text-align:justify;">आकृतियों के झुके हुए चेहरे और सरल भाव जीवन की गंभीरता, संघर्ष और संवेदनशीलता को व्यक्त करते हैं। रंगों का प्रयोग भी बहुत सूक्ष्म और संतुलित है। हल्के नीले, हरे, भूरे और पीले रंगों का संयोजन शांति और स्थिरता का वातावरण बनाता है। पृष्ठभूमि का हरा रंग प्रकृति और जीवन का प्रतीक है, जबकि धूसर रंग मानव जीवन की कठिनाइयों को दर्शाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चित्र में रेखाओं और आकृतियों का संतुलन यह दर्शाता है कि कलाकार ने केवल दृश्य नहीं, बल्कि भावनाओं को भी उकेरने का प्रयास किया है। यह पेंटिंग केवल एक दृश्य प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि समाज में परस्पर निर्भरता, सहानुभूति और एकता का संदेश देती है। समग्र रूप से यह पेंटिंग दर्शाती है कि जीवन में संघर्ष और कठिनाइयों के बावजूद, मनुष्य आपसी सहयोग और समझ के माध्यम से आगे बढ़ता है। कलाकार ने अपनी अनूठी शैली के माध्यम से साधारण जीवन को असाधारण अर्थ प्रदान किया है, जो इस कृति को विशेष बनाता है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">नीरज के बारें में</h4>
<p style="text-align:justify;">नीरज गोस्वामी भारत के एक प्रसिद्ध समकालीन चित्रकार और मूर्तिकार हैं, जिन्होंने अपनी अनूठी कला शैली से विशेष पहचान बनाई है। वे विशेष रूप से तेल रंगों के कुशल प्रयोग के लिए जाने जाते हैं, जिनसे उनकी पेंटिंग्स में अद्भुत चमक और जीवंतता दिखाई देती है। उनकी कलाकृतियों में आधुनिकता और भावनात्मक गहराई का सुंदर समन्वय मिलता है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">नीरज गोस्वामी की रचनाएं दर्शकों को आकर्षित करने के साथ-साथ विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने भारतीय कला जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और अपनी सृजनशीलता के माध्यम से कला को नई दिशा प्रदान की है। वे सेलेडॉन पोर्सिलेन और ओनिक्स स्टायरेशन के रंगों का उपयोग करते हैं, जिससे उनके कैनवस में एक सौम्य चमक और अद्वितीय रंग संयोजन समाहित हो जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">नीरज की पेंटिंग्स कीमती पत्थरों से मिलती-जुलती होने के लिए जानी जाती हैं, जिनमें एक ऐसी पारदर्शिता दिखाई देती है, जो कला जगत में शायद ही कभी देखने को मिलती है। वे अपनी कलाकृतियों में एक उल्लेखनीय दीप्ति प्राप्त करते हैं, जिससे वे एक विशिष्ट और चमकदार गुणवत्ता के साथ अलग दिखती हैं। तेल रंगों पर अपनी महारत और रंगों के अनूठे संयोजन के माध्यम से, नीरज गोस्वामी पारंपरिक सीमाओं को पार करते हुए ऐसी कलाकृतियां बनाते हैं, जो अपनी चमक और दीप्ति से मंत्रमुग्ध कर देती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 13:28:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>World Dance Day :  नृत्य, मन के भावों का अभिनीत गीत </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नृत्य मनुष्य के उल्लास का प्रत्यक्ष भावात्मक प्रदर्शन है। जब मन उल्लास से भर उठता है, तो शारीरिक चेष्टाएं उसकी अभिव्यक्ति नृत्य के रूप में करती हैं। इस प्रकार नृत्य मन के भावों का अभिनीत गीत है। यदि सूक्ष्मता से देखें तो प्रकृति का हर तत्व खुशी में नृत्य करता जान पड़ता है। बरसते पानी में महकती धरती पर सिर्फ मोर ही नहीं नाचते, पेड़ों की डालियां भी वर्षा की बूंदों के साथ झूमती नजर आती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-(15)9.jpg" alt="Untitled design (15)" width="1200" height="720" /></p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति से इतर अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में मनुष्य ने नृत्य की लय और गति को विभिन्न शैलियों में बांधकर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580301/world-dance-day--dance%E2%80%94the-enacted-song-of-the-soul-s-emotions"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(13)9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नृत्य मनुष्य के उल्लास का प्रत्यक्ष भावात्मक प्रदर्शन है। जब मन उल्लास से भर उठता है, तो शारीरिक चेष्टाएं उसकी अभिव्यक्ति नृत्य के रूप में करती हैं। इस प्रकार नृत्य मन के भावों का अभिनीत गीत है। यदि सूक्ष्मता से देखें तो प्रकृति का हर तत्व खुशी में नृत्य करता जान पड़ता है। बरसते पानी में महकती धरती पर सिर्फ मोर ही नहीं नाचते, पेड़ों की डालियां भी वर्षा की बूंदों के साथ झूमती नजर आती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-(15)9.jpg" alt="Untitled design (15)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति से इतर अपनी सभ्यता और संस्कृति के विकास क्रम में मनुष्य ने नृत्य की लय और गति को विभिन्न शैलियों में बांधकर नृत्य के अनेक प्रकारों को सृजित किया है। भारत में बहुल सांस्कृतिक विविधता में विभिन्न नृत्य शैलियां विकसित हुईं हैं। इन नृत्य शैलियों को शास्त्रीय नृत्य और लोकनृत्य की दो श्रेणियों में रख सकते हैं। यह दोनों ही शैलियां भारतीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन के जीवंत प्रतीक हैं।<strong>– डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री, निदेशक, रुहेलखंड शोध संस्थान, शाहजहांपुर</strong></p>
<p style="text-align:justify;">भारत में लोक नृत्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन, विविधतापूर्ण और जीवंत रही है, जो देश की सांस्कृतिक बहुलता का सशक्त प्रतीक है। यह परंपरा विभिन्न क्षेत्रों, जातीय समूहों और सामाजिक समुदायों के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। भारत के प्रत्येक प्रदेश- जैसे पंजाब, राजस्थान, गुजरात और असम की अपनी विशिष्ट लोकनृत्य शैलियां हैं, जो वहां की भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लोक नृत्यों का उद्भव मुख्यतः कृषि-आधारित समाज से हुआ, जहां फसल कटाई, वर्षा, विवाह और धार्मिक उत्सवों के अवसर पर सामूहिक रूप से नृत्य किया जाता था। उदाहरण के लिए, पंजाब का भांगड़ा फसल की खुशी का प्रतीक है, जबकि गुजरात का गरबा देवी-उपासना से जुड़ा हुआ है। इन नृत्यों में स्थानीय लोकगीत, वाद्य यंत्र और पारंपरिक वेशभूषा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। आधुनिक समय में भी लोक नृत्य अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं और सांस्कृतिक उत्सवों व मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से इन्हें नया आयाम मिला है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कथक नृत्य</h4>
<p style="text-align:justify;">कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में एक प्रमुख और विकसित शैली है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन कथावाचन परंपरा से जुड़ी हैं। ‘कथक’ शब्द ‘कथा’ से बना है और प्रारंभ में कथक वे कलाकार थे, जो मंदिरों और जनसभाओं में धार्मिक कथाएं प्रस्तुत करते थे। यह शैली उत्तर भारत, विशेषतः उत्तर प्रदेश में विकसित हुई तथा लखनऊ और जयपुर घरानों के माध्यम से समृद्ध हुई। इसके विकास को तीन चरणों में देखा जा सकता है- मंदिर परंपरा, दरबारी प्रभाव और आधुनिक मंचीय स्वरूप। भक्ति काल में इसमें कृष्ण लीलाओं का वर्णन प्रमुख रहा, जबकि मुगल काल में इसमें नजाकत, श्रृंगार और तकनीकी जटिलता का समावेश हुआ। कथक की विशेषता उसकी भाव-भंगिमा, ‘अभिनय’, तेज ‘तत्कार’ और घूमरदार ‘चक्कर’ हैं, जो इसे विशिष्ट बनाते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">लिल्ली घोड़ी</h4>
<p style="text-align:justify;">लिल्ली घोड़ी या कठ घोड़वा नृत्य उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित एक पारंपरिक लोकनृत्य है। यह नृत्य विवाह, मेलों और उत्सवों में प्रस्तुत किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से इसका संबंध वीरता और घुड़सवारी की परंपरा से है। नर्तक लकड़ी या बांस से बने कृत्रिम घोड़े को कमर में बांधकर रंग-बिरंगे वस्त्रों में नृत्य करते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो वे घोड़े पर सवार हों। यह नृत्य मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेशों का भी माध्यम रहा है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कजरी</h4>
<p style="text-align:justify;">कजरी भारतीय लोकसंगीत की एक भावप्रधान शैली है, जिसका उद्गम उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर और वाराणसी क्षेत्र में माना जाता है। सावन-भादों की वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले कजरी गीत विरह, प्रेम और प्रकृति के सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हैं। जब इन गीतों के साथ नृत्य किया जाता है, तो यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक अनुभव बन जाता है। स्त्रियां समूह में झूला झूलते हुए या आंगन में गोल घेरा बनाकर कजरी गाती और नृत्य करती हैं। यह शैली ग्रामीण जीवन की सहज अभिव्यक्ति है, जिसमें भाव और लय का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मयूर नृत्य</h4>
<p style="text-align:justify;">मयूर नृत्य भारतीय लोक और शास्त्रीय परंपराओं का एक मनोहारी रूप है, जो विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में प्रचलित है। इसका संबंध कृष्ण की लीलाओं और प्रकृति-प्रेम से जोड़ा जाता है। वर्षा ऋ तु में मोर के नृत्य से प्रेरित होकर यह शैली विकसित हुई। कलाकार मोर के पंखों से सुसज्जित वेशभूषा पहनकर उसकी चाल और मुद्राओं का अनुकरण करते हैं। बांसुरी, ढोलक और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसकी लयात्मकता को और अधिक आकर्षक बनाते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">नौटंकी</h4>
<p style="text-align:justify;">नौटंकी उत्तर भारत की एक लोकप्रिय लोकनाट्य परंपरा है, जिसमें संगीत, गायन, संवाद और नृत्य का समन्वय होता है। इसका विकास विशेषतः उत्तर प्रदेश में हुआ। नौटंकी में नृत्य कथा-वाचन का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें कथक की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, विशेषकर चक्कर और भाव-भंगिमा में। ढोलक, नगाड़ा और हारमोनियम की ताल पर कलाकार नृत्य करते हुए कथा को जीवंत बनाते हैं।  नौटंकी में सम्मिलित नृत्य स्वरूप विविध लोक और शास्त्रीय शैलियों से प्रभावित होते हैं। इनमें कथक की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, विशेषकर उसकी घूमरदार चाल, चक्कर और भाव-भंगिमा में। इसके साथ ही लोकनृत्य की सरलता और सहजता भी इसमें समाहित रहती है, जिससे यह आम जनमानस के लिए अधिक ग्राह्य बन जाता है। नौटंकी के नृत्य में अभिनय (अभिनयात्मक नृत्य) का विशेष स्थान होता है। कलाकार गीतों और संवादों के बीच नृत्य करते हुए कथा के भावों को अभिव्यक्त करते हैं। स्त्री पात्रों की भूमिका, चाहे पुरुष कलाकार निभाएं या स्त्रियां, उसमें लयात्मकता और नज़ाकत का समावेश होता है। नृत्य की गतियां अधिक जटिल न होकर दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने वाली होती हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">छपेली</h4>
<p style="text-align:justify;">छपेली नृत्य उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक लोकप्रिय लोकनृत्य है, जो वसंत ऋ तु और होली जैसे उत्सवों पर किया जाता है। इसमें स्त्री-पुरुष युगल के रूप में भाग लेते हैं और लोकगीतों की धुन पर संवादात्मक शैली में नृत्य करते हैं। इसमें श्रृंगार, हास्य और सामाजिक जीवन के विविध रंग दिखाई देते हैं। हुड़का और मंजीरा जैसे वाद्य यंत्र इसकी लय को सजीव बनाते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पाय डंडा</h4>
<p style="text-align:justify;">पाय डंडा नृत्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित एक ऊर्जावान लोकनृत्य है। यह नृत्य मुख्यतः फसल कटाई, मेलों और धार्मिक अवसरों पर किया जाता है। इसमें डंडों का तालबद्ध टकराव वीरता और समन्वय का प्रतीक होता है। इसका संबंध प्राचीन युद्धाभ्यास और शारीरिक कौशल से भी जोड़ा जाता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">जोगिनी नृत्य</h4>
<p style="text-align:justify;">जोगिनी नृत्य उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र की लोकसंस्कृति का एक आध्यात्मिक रूप है। यह देवी-उपासना और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ है। इस नृत्य में नर्तक भावावेश में आकर नृत्य करते हैं, जिससे दैवीय अनुभूति का संचार होता है। ढोल, दमाऊ और रणसिंघा जैसे वाद्य यंत्र इसकी ऊर्जा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार भारत के लोक नृत्य न केवल मनोरंजन के साधन हैं, बल्कि वे देश की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक जीवन और ऐतिहासिक परंपराओं का सजीव प्रतिबिंब भी प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 12:51:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अनोखी परंपरा:  प्रकृति और परंपरा का संगम मेंढकों की शादी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत की विविध लोक परंपराओं में कई ऐसे अनोखे रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं, जो पहली नज़र में आश्चर्यचकित कर देते हैं, लेकिन उनके पीछे गहरी आस्था और प्रकृति से जुड़ा सांस्कृतिक संबंध होता है। पेड़ों की शादी की परंपरा के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन मेंढक और मेंढकी की शादी भी भारत के कुछ हिस्सों में विशेष महत्व रखती है। विशेष रूप से असम के जोरहाट जिले और अन्य पूर्वोत्तर क्षेत्रों के गाँवों में यह परंपरा प्रचलित है। यहाँ के लोगों का मानना है कि जब लंबे समय तक वर्षा नहीं होती और सूखे जैसी स्थिति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579566/a-unique-tradition--a-confluence-of-nature-and-custom%E2%80%94the-marriage-of-frogs"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(3)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की विविध लोक परंपराओं में कई ऐसे अनोखे रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं, जो पहली नज़र में आश्चर्यचकित कर देते हैं, लेकिन उनके पीछे गहरी आस्था और प्रकृति से जुड़ा सांस्कृतिक संबंध होता है। पेड़ों की शादी की परंपरा के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन मेंढक और मेंढकी की शादी भी भारत के कुछ हिस्सों में विशेष महत्व रखती है। विशेष रूप से असम के जोरहाट जिले और अन्य पूर्वोत्तर क्षेत्रों के गाँवों में यह परंपरा प्रचलित है। यहाँ के लोगों का मानना है कि जब लंबे समय तक वर्षा नहीं होती और सूखे जैसी स्थिति बन जाती है, तब मेंढकों की शादी कराने से वर्षा देवता प्रसन्न होते हैं और अच्छी बारिश होती है। यह मान्यता प्राचीन समय से चली आ रही है और आज भी लोग इसे पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अनोखी शादी में सभी पारंपरिक हिंदू विवाह रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है। सबसे पहले गाँव के लोग एक नर और एक मादा मेंढक को पकड़ते हैं। इसके बाद उन्हें स्नान कराया जाता है और हल्दी लगाई जाती है। फिर छोटे-छोटे कपड़े या फूलों से उन्हें सजाया जाता है। शादी के लिए मंडप बनाया जाता है और बाकायदा एक पुजारी को बुलाया जाता है, जो मंत्रोच्चार के साथ विवाह संपन्न कराता है। विवाह के दौरान ‘बारात’ भी निकलती है, जिसमें गाँव के लोग गीत गाते और नाचते हुए शामिल होते हैं। इस परंपरा का एक वैज्ञानिक पहलू भी माना जाता है। मेंढक आमतौर पर बारिश के मौसम में अधिक सक्रिय होते हैं और उनकी टर्र-टर्र की आवाज़ वर्षा के आगमन का संकेत मानी जाती है। इसलिए यह विवाह एक प्रतीकात्मक प्रयास भी हो सकता है, जिससे लोग मानसून के प्रति अपनी आशा और विश्वास व्यक्त करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल असम ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी इस तरह की परंपराएं देखने को मिलती हैं। कहीं-कहीं इसे ‘मेंढक विवाह’ के रूप में त्योहार की तरह मनाया जाता है, जिसमें पूरे गाँव की भागीदारी होती है। हालांकि आधुनिक विज्ञान इन मान्यताओं को अंधविश्वास मान सकता है, लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह परंपरा लोगों को एकजुट करती है और संकट के समय सामूहिक आशा और सकारात्मकता का संचार करती है। इस तरह की लोक परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विविधता और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को दर्शाती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 08:00:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> लोकायन: परंपरा, वीरता और उत्सव की जीवंत अभिव्यक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नागालैंड के लोक नृत्य वहां की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत और आकर्षक रूप हैं। ये नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और सामूहिक जीवन की अभिव्यक्ति भी हैं। आमतौर पर ये नृत्य त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और विशेष अवसरों पर समूहों में प्रस्तुत किए जाते हैं। नागा समाज में पुरुषों का युद्ध नृत्य विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो साहस, शक्ति और वीरता का प्रतीक माना जाता है। इस नृत्य की शैली में मार्शल आर्ट जैसी ऊर्जा और एथलेटिक गति देखने को मिलती है, जिसमें नर्तक युद्ध-घोष और गीतों के साथ प्रदर्शन करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नागालैंड की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579565/lokayan--a-vibrant-expression-of-tradition--valor--and-celebration"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(2)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नागालैंड के लोक नृत्य वहां की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत और आकर्षक रूप हैं। ये नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और सामूहिक जीवन की अभिव्यक्ति भी हैं। आमतौर पर ये नृत्य त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और विशेष अवसरों पर समूहों में प्रस्तुत किए जाते हैं। नागा समाज में पुरुषों का युद्ध नृत्य विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जो साहस, शक्ति और वीरता का प्रतीक माना जाता है। इस नृत्य की शैली में मार्शल आर्ट जैसी ऊर्जा और एथलेटिक गति देखने को मिलती है, जिसमें नर्तक युद्ध-घोष और गीतों के साथ प्रदर्शन करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नागालैंड की विभिन्न जनजातियों के अपने-अपने पारंपरिक नृत्य हैं, जिनमें कुछ समानताएं भी देखने को मिलती हैं। अधिकतर नृत्यों में शरीर को सीधा रखते हुए पैरों की लयबद्ध गतिविधि प्रमुख होती है। फसल कटाई के समय किए जाने वाले नृत्य विशेष रूप से उल्लासपूर्ण होते हैं, जिनमें समुदाय के लोग मिलकर अपनी खुशियों का इजहार करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जेलियांग जनजाति का नृत्य इस दृष्टि से विशिष्ट है कि इसमें महिलाएं भी पुरुषों के साथ सक्रिय भागीदारी करती हैं। नृत्य की शुरुआत में प्रतिभागी धीमी गति से मंच पर प्रवेश करते हैं और फिर वृत्त या अन्य आकृतियां बनाते हुए लय में बंध जाते हैं। इसके बाद पैर पटकते हुए तालमेल के साथ नृत्य शुरू होता है। समूह में गाए जाने वाले शब्द, तालियां और सामूहिक स्वर इस नृत्य को एकजुटता और उत्साह से भर देते हैं। कई बार नर्तक काल्पनिक शत्रु पर आक्रमण का दृश्य प्रस्तुत करते हैं, जिसमें हाथों में लिए गए हथियारों को लयबद्ध ढंग से घुमाया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जेमी जनजाति के नृत्य भी अपनी विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। इन नृत्यों के नाम अक्सर पक्षियों, जानवरों या कीड़ों की चाल-ढाल से प्रेरित होते हैं, जैसे मुर्गा नृत्य या क्रिकेट नृत्य। कुछ नृत्य केवल पुरुषों द्वारा किए जाते हैं और इनमें गीत-संगीत का साथ होता है, जिसमें झांझ जैसी वाद्य ध्वनियां भी शामिल होती हैं। नागालैंड के विभिन्न उत्सवों, विशेषकर फसल और सांस्कृतिक पर्वों के दौरान, ये नृत्य पूरे उत्साह के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं। पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण और सामूहिक भागीदारी इन प्रस्तुतियों को और भी आकर्षक बनाते हैं। इस प्रकार, नागालैंड के लोक नृत्य वहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक जीवन की गहराई को दर्शाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 08:00:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिनाई की 5,000 वर्ष पुरानी शिलाकृति :  सत्ता, हिंसा और इतिहास का दृश्य दस्तावेज</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सामान्यतः कला और साहित्य को प्रेम, सौंदर्य और शांति के वाहक के रूप में देखा जाता है, किन्तु मानव इतिहास का यथार्थ इससे कहीं अधिक जटिल रहा है। विश्व की विभिन्न कला परंपराओं—चाहे वह भारतीय लघुचित्र हों या पाश्चात्य आधुनिक चित्रकला—में युद्ध, विजय और सत्ता-संघर्ष के दृश्य बार-बार उभरते हैं। भारतीय संदर्भ में मुग़ल और राजपूत शैली के लघुचित्रों में युद्ध और विजय के प्रसंग मिलते हैं, जबकि पश्चिम में द्वितीय विश्वयुद्ध से प्रेरित अनेक कलाकृतियाँ निर्मित हुईं। स्पष्ट है कि विजेताओं की गाथाओं के साथ-साथ उनके दृश्यांकन की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है<strong>।-सुमन कुमार सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इसी परिप्रेक्ष्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579564/a-5-000-year-old-rock-art-from-sinai--a-visual-document-of-power--violence--and-history"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(1)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सामान्यतः कला और साहित्य को प्रेम, सौंदर्य और शांति के वाहक के रूप में देखा जाता है, किन्तु मानव इतिहास का यथार्थ इससे कहीं अधिक जटिल रहा है। विश्व की विभिन्न कला परंपराओं—चाहे वह भारतीय लघुचित्र हों या पाश्चात्य आधुनिक चित्रकला—में युद्ध, विजय और सत्ता-संघर्ष के दृश्य बार-बार उभरते हैं। भारतीय संदर्भ में मुग़ल और राजपूत शैली के लघुचित्रों में युद्ध और विजय के प्रसंग मिलते हैं, जबकि पश्चिम में द्वितीय विश्वयुद्ध से प्रेरित अनेक कलाकृतियाँ निर्मित हुईं। स्पष्ट है कि विजेताओं की गाथाओं के साथ-साथ उनके दृश्यांकन की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है<strong>।-सुमन कुमार सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इसी परिप्रेक्ष्य में मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप से प्राप्त लगभग 5,000 वर्ष पुरानी एक शिलाकृति (पेट्रोग्लिफ) ने पुरातत्वविदों का विशेष ध्यान आकर्षित किया है। जर्मनी के बॉन से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वादी खामिला क्षेत्र में शैल-कला के एक सर्वेक्षण के दौरान मिस्र के पुरातत्वविद मुस्तफा नूर एल-दीन और बॉन विश्वविद्यालय के विद्वान लुडविग मोरेन्ज़ ने इस महत्वपूर्ण खोज को सामने रखा। यह शिलाकृति प्रारंभिक मिस्री राजवंशीय काल से जुड़ी मानी जा रही है और इसमें दक्षिणी सिनाई क्षेत्र पर एक प्रारंभिक फ़राओ की विजय का दृश्य अंकित है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस उत्कीर्णन में एक व्यक्ति को लंगोटी पहने खड़े हुए दर्शाया गया है, जिसके हाथ ऊपर उठे हैं मानो वह विजय या शक्ति का प्रदर्शन कर रहा हो। उसके सामने एक अन्य आकृति घुटनों के बल बैठी है, जिसके हाथ बंधे हुए हैं और उसके सीने में एक तीर धंसा हुआ दिखाई देता है। यह दृश्य केवल एक सामान्य चित्रण नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से हिंसा, दमन और सत्ता-प्रदर्शन का प्रतीक है। यही कारण है कि विद्वानों ने इसे “क्रूर कथा” के रूप में अभिहित किया है।<br />शैलीगत दृष्टि से यह चित्रण मिस्र के प्रथम राजवंश से जुड़े अन्य स्थलों—विशेषतः नूबिया क्षेत्र में स्थित गेबेल शेख सुलेमान—पर प्राप्त चित्रों से साम्य रखता है। इससे यह संकेत मिलता है कि उस समय मिस्रवासी अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहे थे और सिनाई जैसे क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। इस क्षेत्र का महत्व विशेष रूप से वहां उपलब्ध खनिज संसाधनों- जैसे तांबा और फिरोजा के कारण था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस शिलाकृति के साथ एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है, जिसका अनुवाद “देवता मिन, तांबे की खान/खनन क्षेत्र के शासक” के रूप में किया गया है। यहाँ मिन का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। मिन प्राचीन मिस्र के ऐसे देवता थे, जिन्हें उर्वरता, प्रजनन, पुरुष शक्ति और यात्रियों के संरक्षक के रूप में पूजा जाता था। इस प्रकार यह शिलालेख न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि इस विजय को दैवीय संरक्षण के अंतर्गत वैध ठहराया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">विद्वानों के अनुसार, इस प्रकार की शिलाकृतियाँ केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं होतीं, बल्कि वे एक प्रकार की “राजनीतिक घोषणा” भी होती हैं। इस चट्टान पर उकेरा गया दृश्य संभवतः सिनाई क्षेत्र पर मिस्र के अधिकार की औपचारिक उद्घोषणा रहा होगा। उल्लेखनीय है कि बाद के काल में इस चित्र और शिलालेख के ऊपर नबातियन और अरबी लिपियों में लेख अंकित कर दिए गए, जिससे मूल विजेता शासक का नाम अस्पष्ट हो गया। इस खोज का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि अब तक वादी खामिला क्षेत्र को मुख्यतः नबातियन शिलालेखों के संदर्भ में ही जाना जाता था, जो इस खोज से लगभग 3,000 वर्ष बाद के हैं। ऐसे में यह नई खोज इस क्षेत्र के इतिहास को कहीं अधिक प्राचीन और जटिल बनाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कला-इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से यह शिलाकृति इस बात का सशक्त प्रमाण है कि प्रारंभिक मानव समाजों में भी सत्ता, संघर्ष और संसाधनों पर नियंत्रण की प्रवृत्ति विद्यमान थी। यह हमें यह भी समझाती है कि कला केवल सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सत्ता और भय के प्रदर्शन का माध्यम भी रही है। अंततः सिनाई की यह 5,000 वर्ष पुरानी शिलाकृति केवल एक पुरातात्विक खोज नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के उस पक्ष का सजीव दस्तावेज़ है, जिसमें विकास के साथ-साथ हिंसा, वर्चस्व और राजनीतिक आकांक्षाएँ भी अंतर्निहित रही हैं। यह खोज हमें अतीत के माध्यम से वर्तमान को समझने और मानव इतिहास के बहुआयामी स्वरूप पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 08:00:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आदिवासी कला का पुनरुत्थान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारतीय आदिवासी कला के इतिहास में सन 1980 का दशक सदैव याद किया जाएगा, क्योंकि इस समय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत भवन की स्थापना हुई और भारतीय आदिवासी कला का तो जैसे पुनरुत्थान काल आरंभ हुआ। उस समय तक लोग आदिवासी चित्रकला के नाम पर महाराष्ट्र के वारली, मध्य प्रदेश के भील, गुजरात के राठवा और ओडिशा के सौंरा आदिवासियों के चित्र ही जानते थे। इनमें भी वारली आदिवासियों के चित्र प्रसिद्धि के शिखर पर थे।<strong> -मुश्ताक खान </strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">कलाकारों की खोज का अभियान</h5>
<p style="text-align:justify;">भारत भवन की स्थापना के साथ ही प्रसिद्ध चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के नेतृत्व में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579562/revival-of-tribal-art"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय आदिवासी कला के इतिहास में सन 1980 का दशक सदैव याद किया जाएगा, क्योंकि इस समय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत भवन की स्थापना हुई और भारतीय आदिवासी कला का तो जैसे पुनरुत्थान काल आरंभ हुआ। उस समय तक लोग आदिवासी चित्रकला के नाम पर महाराष्ट्र के वारली, मध्य प्रदेश के भील, गुजरात के राठवा और ओडिशा के सौंरा आदिवासियों के चित्र ही जानते थे। इनमें भी वारली आदिवासियों के चित्र प्रसिद्धि के शिखर पर थे।<strong> -मुश्ताक खान </strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">कलाकारों की खोज का अभियान</h5>
<p style="text-align:justify;">भारत भवन की स्थापना के साथ ही प्रसिद्ध चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के नेतृत्व में मध्य प्रदेश के विभिन्न आदिवासी समुदायों की कला परंपराओं और प्रतिभाशाली कलाकारों की खोज का एक सुविचारित अभियान आरंभ हुआ। इसका केंद्रबिंदु आदिवासी मानस की सृजन क्षमता की पहचान, परख और उसे पल्लवित होने के अवसर प्रदान करना था। परिणाम स्वरूप मध्य प्रदेश की परधान, गोंड, बैगा , मुरिया, भील, भिलाला, कोरवा, नगेसिया, बादी, कोरकू , भारिया, ओरांव जैसे अनेक आदिवासी समुदायों के कलाकार सामने आए। इनके साथ ही अनेक पिछड़े समुदायों के लोक कलाकारों को भी पहचान मिली। इस आभियान का फोकस समुदाय से अधिक व्यक्तिगत सृजनशीलता और संभावनाओं पर था। अतः किसी कलाकार के व्यक्तिगत सृजन को भी उसकी  समूचि समुदायिक कला चेतना की अभिव्यक्ति का परिणाम मान लिया गया। यह स्थिति प्रधान–गोंड चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम के साथ रही और यही स्थिति बस्तर के मुरिया चित्रकार बेलगूर तथा झाबुआ की भील चित्रकार भूरी बाई और लड़ो बाई के साथ रही। उनकी व्यक्तिगत चित्रकारी क्षमताएं ही उनके समुदाय की प्रतिनिधि चित्रकला समझी जाने लगीं। यहां मैं यह बता दूं कि मैं व्यक्तिगत तौर पर भारत भवन, भोपाल के इस अभियान का अंग रहा हूं और यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हो रहा था। </p>
<h5 style="text-align:justify;">बैगा जनजाति में विकसित होती कला</h5>
<p style="text-align:justify;">भोपाल में स्वामीनाथन के प्रयोगों की सफलता से प्रेरित और उत्साहित होकर अन्य स्थानों पर अन्य अनेक कलाकारों एवं कला संस्थाओं ने इसी प्रकार के प्रयोग करना आरंभ किए। कुछ प्रयोग सफल भी हुए और कुछ आगे नहीं बढ़ सके। सन 1985 के दौरान गुजरात के अहमदाबाद में ख्यातिप्राप्त चित्रकार हाकु भाई शाह ने गणेश जोगी और उनकी पत्नी तेजल बेन के साथ एसा ही प्रयोग आरंभ किया और उनसे चित्र बनवाना आरंभ किया। गणेश जोगी मूलतः राजस्थान की घुमक्कड़ जोगी समुदाय से थे, जो गांव -गांव घूमकर भजन और लोक कथाए गाते हैं। उस समय राजस्थान में सूखा पड़ा था और गणेश का परिवार मजदूरी की तलाश में अहमदाबाद आया था। वे और उनकी पत्नी सड़क किनारे गड्ढे खोदने का काम कर रहे थे, जहां से हाकु शाह उन्हें लाए थे। हाकु शाह का प्रयोग सफल रहा गणेश और तेजल दोनों ही प्रतिभा संपन्न निकले और उन्होंने लोक चित्रकला की एक नई जोगी चित्रशैली को जन्म दिया। बाद में भारत सरकार ने गणेश जोगी को जोगी चित्रकला में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्तमान में उनके कुटुंब के लगभग 15-20 सदस्य चित्रकारी कर रहे हैं और जोगी लोकचित्र, कला जगत में अपनी पहचान बना चुकी हैं। ऐसा ही एक अन्य प्रयोग आशीष स्वामी नाम के एक युवा चित्रकार ने मध्य प्रदेश के उमरिया क्षेत्र के बैगा आदिवासियों के गांव में आरंभ किया। आशीष भोपाल के भारत भवन से भी जुड़ा हुआ था और स्वामिनाथन जी से बहुत प्रभावित था। वह अपने व्यक्तिगत प्रयासों से बैगा आदिवासियों के लोढ़ा गांव में रहकर उन्हें कलाकर्म के लिए प्रेरित करने लगा। बैगा लोगों की अपनी पारंपरिक भित्ति अलंकरण और मिट्टी के काम तथा लकड़ी के मुखौटे बनाने की एक सीमित परंपरा थी। आशीष ने उन्हें कागज और रंग-ब्रश देकर चित्र बनाने के लिए उत्साहित किया। अंततः एक साठ वर्षीय बैगा महिला जुधैया बाई ने उसकी पहल को स्वीकार किया और अपनी व्यक्तिगत कला प्रतिभा के बल पर कुछ ही वर्षों में वे एक सफल बैगा चित्रकार के रूप में स्थपित हो गईं। जुधैया बाई को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया और एक नई बैगा चित्रकला विश्व में विख्यात हो गई। वर्तमान में यह कला आसपास के कुछ गांवों के अनेक बैगा स्त्री-पुरुष कर रहे हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">तेलंगना सरकार खरीदती है चित्र</h5>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार राजस्थानी भील मांडना चित्रों का व्यवसायीकरण भी आरंभ किया गया था। सन 1984 में जब उदयपुर के जनजातीय अनुसंधान संस्थान के सांस्कृतिक अधिकारियों को इस क्षेत्र में भेजा गया, तो उन्होंने गोमा परगी और फूला परगी नामक दो युवा भील कलाकारों को अपने पारंपरिक भित्तिचित्र मांडनो को कागज और कैनवास पर चित्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया था। उन दोनों चित्रकारों ने इन सामग्रियों का उपयोग करते हुए चित्रकारी की परंपरा को आगे बढ़ाया। परंतु इन चित्रकारों को आशातीत सफलता नहीं मिल सकी। संभवतः यह चित्रकार उतने प्रतिभशाली नहीं थे कि पारंपरिक चित्रों को एक नई ऊंचाई तक लेजा सकें। वर्तमान में लगभग दस-पंद्रह भील चित्रकार इससे अपनी आजीविका कमा रहे हैं। इस समय यशपाल बरंडा प्रसिद्ध राजस्थानी भील चित्रकार है, वे उदयपुर जिले की नयागांव तहसील के कनबई गांव के रहने वाले हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">बाद में दक्षिण भारत में भी इस प्रकार के प्रयास हुए। सन 2016 में तेलंगाना के भद्राचलम स्थित इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी ने हैदराबाद स्थित नेहरू सेंटिनरी म्यूजियम के साथ मिलकर, कोया आदिवासियों के लिए जनजातीय चित्रकारी का एक ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाया, जिसके अंतर्गत बीस कोया आदिवासी युवक-युवतियों को चित्रकारी की ट्रेनिंग दी गई। एक सप्ताह की इस ट्रेनिंग को वर्ष में तीन बार आयोजित किया गया। इसके परिणामस्वरूप कोया आदिवासी चित्रकला का उदय हुआ। इस ट्रेनिंग कार्यक्रम के मुखिया नेहरु सेंटिनरी म्यूजियम के क्यूरेटर डॉ. सत्यनारायण थे तथा चित्रकारी सिखाने के लिए कला महाविद्यालय के शिक्षकों को लाया गया था। उन्होंने निश्चित किया कि चित्र केवल गेरू मिट्टी के लाल और सफ़ेद मिट्टी के रंग से बनाए जाएंगे, जिनका प्रयोग कोया आदिवासी पहले से अपने घर पोतने के लिए करते रहे हैं। चित्रों के विषय भी कोया दैनिक जीवन की गतिविधियों से लिए गए। इनमें गौर सींघ नृत्य तथा सर पर लकड़ी का गट्ठर ले जाती महिला प्रमुख हैं। इस कार्यक्रम को स्वरोजगार योजना से भी जोड़ा गया है। अतः इन प्रशिक्षित चित्रकारों के बनाए चित्र प्रतिमाह राज्य सरकार खरीद लेती है। वर्तमान में कुछ कोया आदिवासी चित्रकार सक्रिय हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">भारतीय कला के उन्नयन में योगदान</h5>
<p style="text-align:justify;">दक्षिण भारत में अनेक आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, लेकिन उनकी चित्रकला के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। सन 2022 में तमिलनाडु के नीलगिरी क्षेत्र में रहने वाले कुरुम्बा आदिवासियों द्वारा पूजा अनुष्ठानों के लिए बनाए जाने वाले भित्तिचित्रों के बारे में चेन्नई की एक संस्था सी.पी. रामास्वामी अय्यर फाउंडेशन को पता लगा और उन्होंने कुछ कुरुम्बा चित्रकारों को कागज पर इन चित्रों को बनाने के लिए प्रेरित किया। इसका परिणाम बहुत उत्साहजनक रहा। बाला सुब्रामण्यन और कृष्णन नामक दो कुरुम्बा आदिवासी चित्रकारों का आदिवासी कला जगत में उदय हुआ। चेन्नई स्थित दक्षिण चित्र संग्रहालय ने इन कुरुम्बा चित्रकारों को अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित किया और इस प्रकार दक्षिण भारत की पहली आदिवासी चित्रकला से कला प्रेमियों का परिचय हुआ। इस प्रकार सन 1982 में कला चिंतक और चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन द्वारा भारत भवन, भोपाल के माध्यम से आरंभ किए गए, आदिवासी कला की विभिन्न परंपराओं के पुनरुत्थान के अभियान के परिणामस्वरूप भारत के अनेक आदिवासी समुदायों के चित्रकार प्रकाश में आ सके और वे अब भारतीय कला के उन्नयन में अपना योगदान दे रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 10:41:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लोकायन : रूप बदलने वाले बहुरूपिए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>शिवचरण चौहान, कानपुर/ </strong>एक बार बादशाह अकबर के दरबार में एक बहरूपिया आया। उसने दरबार में चुनौती दी कि वह ऐसा भेष बदल सकता है कि उसे कोई पहचान नहीं सकता। अगर कोई उसके भेष में कमी निकाल दे तो वह उसे अपना गुरु बना लेगा। शर्त मान ली गई। एक दिन बादशाह के दरबार में एक बैल घुस आया। सभी दरबारी इधर-उधर भागने लगे। बैल, बादशाह के सिंहासन के पास आकर पंगुराने लगा। तभी बीरबल ने एक कंकड़ बैल की पीठ पर मारा। बैल ने पीठ हिलाई। बस बीरबल बोल पड़ा-“शहंशाह, यह बैल नहीं बहरूपिया है।”</p>
<p style="text-align:justify;">बैल चोट लगने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578756/lokayan--the-shape-shifting-impersonators"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/cats93.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>शिवचरण चौहान, कानपुर/ </strong>एक बार बादशाह अकबर के दरबार में एक बहरूपिया आया। उसने दरबार में चुनौती दी कि वह ऐसा भेष बदल सकता है कि उसे कोई पहचान नहीं सकता। अगर कोई उसके भेष में कमी निकाल दे तो वह उसे अपना गुरु बना लेगा। शर्त मान ली गई। एक दिन बादशाह के दरबार में एक बैल घुस आया। सभी दरबारी इधर-उधर भागने लगे। बैल, बादशाह के सिंहासन के पास आकर पंगुराने लगा। तभी बीरबल ने एक कंकड़ बैल की पीठ पर मारा। बैल ने पीठ हिलाई। बस बीरबल बोल पड़ा-“शहंशाह, यह बैल नहीं बहरूपिया है।”</p>
<p style="text-align:justify;">बैल चोट लगने से उधर की खाल हिलाता है, जिधर उसे चोट लगती है, किंतु बहरूपिए ने धोखे से दूसरी तरफ की खाल हिला दी। एक छोटी-सी गलती से वह पकड़ा गया।  एक समय था जब रूप बदलना एक महत्वपूर्ण कला थी। बहरूपियों का समाज में सम्मान था। वे राजदरबारों में आदर पाते, इनाम-इकराम हासिल करते थे। जयपुर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश के बहरूपिए विख्यात थे। आज बहरूपियों के परिवार संकट में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरूपियों की कला को सम्मान देने वाला कोई नहीं बचा। बहरूपियों का इतिहास बहुत प्राचीन है। बहरूपिए राजा, फकीर, साधु, देवी-देवता, डाकू, पागल, विद्वान, राजसैनिक, सिपाही, हरकारा, वैद्य, हकीम, गूजरी, महिला, बैल, बंदर आदि का रूप धारण कर लोगों का मनोरंजन करते थे। आज भी कुछ शहरों में बहरूपियों को कभी-कभार हाट-बाजारों में घूमते देखा जा सकता है। रूप बदलने के लिए बहुरूपिया मिट्टी, सिंदूर, बाल आदि से लेकर आधुनिक साधनों का प्रयोग करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">होली, दीवाली के त्योहार पर आज भी बहरूपियों को गली, मुहल्लों और बाजारों में घूमते हुए देखा जा सकता है। जैन साहित्य में बहरूपिए की एक कथा प्रसिद्ध है। पाटन-गुजरात के महाराजा कुमार पाल का महामंत्री उदयन एक युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गया। उदयन ने अपने बेटों से कहा- “मेरा अंत समय आ गया है। यदि मैं पंचमहाव्रतधारी महामुनि के दर्शन कर लूं, तो मुझे मोक्ष प्राप्त हो जाए।” युद्ध भूमि में किसी साधु का मिलना मुश्किल था। उसके बेटे वाग्भट्ट के दिमाग में एक बात आई। वह तुरंत एक बहुरूपिए के पास पहुंचा। धन देने का लालच देकर उसे साधु बनाकर ले आया। उदयन ने सामने मुनिराज को देखा तो बहुत प्रसन्न हुआ। चरण-स्पर्श के लिए मुनिराज को पास बुलाया और उसी के चरणों में अपने प्राण त्याग दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">वाग्भट्ट जब उसे पैसे देने लगा तो उसने लेने से इंकार कर दिया। बोला-“जिस रूप को देखकर महामंत्री ने परम प्रसन्न व श्रद्धावनत होकर प्राण त्यागे, अब वह रूप नहीं बदलेगा।” सचमुच वह बहुरूपिया साधु बनकर वन में चला गया। बहुरूपियों का कहना है कि नाटक, नौटंकी और टीवी के कारण उनका पेशा लगभग समाप्त हो रहा है। अब लोग आदर नहीं देते। बच्चे जरूर हंसते हैं, पर बड़े लोग भगा देते हैं। उन्हें दुकान-दुकान, मकान-मकान भटकना पड़ता है, तब कहीं शाम को रोटी नसीब होती है। समाज व सरकार यदि बहरूपियों को पुरस्कार, सम्मान या पेंशन देने लगे तो लुप्त होती इस कला को बचाया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>रंगोली</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/578756/lokayan--the-shape-shifting-impersonators</link>
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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 09:34:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अनोखी परंपरा... हैदराबाद की शाम : रूहानियत, खुशबू और सुकून का संगम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">आधुनिकता की चमक-दमक और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच भी हैदराबाद का पुराना शहर अपनी परंपराओं को संजोए हुए है। यहां की तंग गलियों और ऐतिहासिक हवेलियों में आज भी एक पुरानी रस्म जीवित है, जो हर शाम मगरिब की अजान के साथ निभाई जाती है। यह परंपरा है घर के दरवाजे खोलना और लोबान या अगरबत्ती की खुशबू से पूरे वातावरण को महकाना। जैसे ही मगरिब की अजान की आवाज गूंजती है, पुराने शहर में एक खास तरह की शांति छा जाती है। दिनभर की हलचल मानो थम जाती है और घरों में एक अलग ही माहौल बन जाता है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578757/a-unique-tradition----an-evening-in-hyderabad--a-confluence-of-spirituality--fragrance--and-serenity"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/cats94.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आधुनिकता की चमक-दमक और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच भी हैदराबाद का पुराना शहर अपनी परंपराओं को संजोए हुए है। यहां की तंग गलियों और ऐतिहासिक हवेलियों में आज भी एक पुरानी रस्म जीवित है, जो हर शाम मगरिब की अजान के साथ निभाई जाती है। यह परंपरा है घर के दरवाजे खोलना और लोबान या अगरबत्ती की खुशबू से पूरे वातावरण को महकाना। जैसे ही मगरिब की अजान की आवाज गूंजती है, पुराने शहर में एक खास तरह की शांति छा जाती है। दिनभर की हलचल मानो थम जाती है और घरों में एक अलग ही माहौल बन जाता है। इस समय घर की महिलाएं या बुजुर्ग खिड़कियां और मुख्य द्वार खोल देते हैं। साथ ही, मिट्टी के धुएंदान में सुलगते कोयलों पर लोबान डाला जाता है या अगरबत्ती जलाई जाती है, जिससे उठने वाला सुगंधित धुआं पूरे घर को एक रूहानी एहसास से भर देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा और सुकून लाने का माध्यम है। कुछ लोगों का मानना है कि दिन और रात के संधिकाल में वातावरण में एक विशेष परिवर्तन होता है, जिसे शुभ माना जाता है। इसी कारण खुले दरवाजे उस सकारात्मकता के स्वागत का प्रतीक माने जाते हैं। हालांकि इसका कोई ठोस धार्मिक आधार नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक विश्वास और जीवनशैली का हिस्सा है। यह प्रथा केवल हैदराबाद तक सीमित नहीं है। भारत के कई हिस्सों में शाम के समय अगरबत्ती जलाना या दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे शांति और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यह रिवायत गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी पेश करती है। जिस समय मुस्लिम परिवारों में लोबान जलाया जाता है, उसी समय हिंदू परिवारों में संध्या के दौरान दीप जलाकर पूजा की जाती है। दोनों ही परंपराओं में शाम का समय पवित्र और शुभ माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">   हालांकि इस्लामी मान्यताओं के अनुसार मगरिब के समय दरवाजे बंद रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसे संवेदनशील समय माना गया है। ऐसे में दरवाजे खोलने की यह परंपरा अधिकतर सांस्कृतिक रूप में प्रचलित है। इस रस्म के पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं। लोबान का धुआं वातावरण को शुद्ध करने और कीटाणुओं व मच्छरों को दूर रखने में सहायक माना जाता है। वहीं, दरवाजे और खिड़कियां खोलने से घर में ताजी हवा का प्रवाह होता है, जिससे दिनभर की घुटन कम हो जाती है। हैदराबाद की यह परंपरा न केवल सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है, बल्कि जीवन में सुकून और संतुलन का संदेश भी देती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:41:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्राचीन वैश्विक संपर्कों के साक्ष्य : मिस्र की समाधियों में तमिल शिलालेख</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अक्सर देखा जाता है कि पर्यटक किसी ऐतिहासिक इमारत या स्थल पर अपना नाम अंकित कर देते हैं। सामान्यतः इसे अनुचित और विरासत के प्रति असंवेदनशील व्यवहार माना जाता है। किंतु विडंबना यह है कि कभी-कभी ऐसी ही लिखावटें इतिहास के कुछ अनजाने अध्यायों को उजागर करने का माध्यम भी बन जाती हैं। हाल के दिनों में सामने आई एक महत्वपूर्ण खोज इसी का उदाहरण है, जिसमें लगभग 2,000 वर्ष पूर्व एक भारतीय पर्यटक सिकाई कोर्रन द्वारा मिस्र के प्रसिद्ध ‘वैली ऑफ द किंग्स’ में प्राचीन तमिल भाषा में अपना नाम आठ बार अंकित किए जाने के प्रमाण मिले हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578755/evidence-of-ancient-global-connections--tamil-inscriptions-in-egyptian-tombs"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/074.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अक्सर देखा जाता है कि पर्यटक किसी ऐतिहासिक इमारत या स्थल पर अपना नाम अंकित कर देते हैं। सामान्यतः इसे अनुचित और विरासत के प्रति असंवेदनशील व्यवहार माना जाता है। किंतु विडंबना यह है कि कभी-कभी ऐसी ही लिखावटें इतिहास के कुछ अनजाने अध्यायों को उजागर करने का माध्यम भी बन जाती हैं। हाल के दिनों में सामने आई एक महत्वपूर्ण खोज इसी का उदाहरण है, जिसमें लगभग 2,000 वर्ष पूर्व एक भारतीय पर्यटक सिकाई कोर्रन द्वारा मिस्र के प्रसिद्ध ‘वैली ऑफ द किंग्स’ में प्राचीन तमिल भाषा में अपना नाम आठ बार अंकित किए जाने के प्रमाण मिले हैं। यह खोज न केवल भारतीय उपमहाद्वीप और मिस्र के बीच प्राचीन संपर्कों को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सांस्कृतिक और व्यापारिक आदान-प्रदान की परंपरा कितनी गहरी और व्यापक रही है।<strong> ---- सुमन सिंह </strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/cats90.jpg" alt="cats" width="1280" height="720"></img></strong></p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय उपमहाद्वीप और मिस्र के बीच प्राचीन संपर्कों को रेखांकित करता यह महत्वपूर्ण शोध फ्रांसीसी विद्वान चार्लोट श्मिड और स्विस प्रोफेसर इंगो स्ट्रॉच द्वारा प्रस्तुत किया गया है। उनके अनुसार, मिस्र की विभिन्न समाधियों में प्राप्त भारतीय भाषाई शिलालेखों में से लगभग एक-तिहाई अकेले सिकाई कोर्रन द्वारा अंकित हैं। यह तथ्य इस खोज को और भी अधिक विशिष्ट बनाता है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति और उसके सांस्कृतिक हस्ताक्षर का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यह शोध “तमिल एपिग्राफी : चार दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (11-14 फरवरी 2026), कार्यवाही खंड 1” शीर्षक पुस्तक में प्रकाशित हुआ है और इसे फरवरी 2026 में चेन्नई में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। इस सम्मेलन में तमिल अभिलेखों, उनके ऐतिहासिक संदर्भों और वैश्विक प्रसार पर गंभीर विमर्श हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि सिकाई कोर्रन संभवतः एक व्यापारी, यात्री या तीर्थयात्री रहे होंगे, जो उस समय के समुद्री व्यापार मार्गों के माध्यम से भारत से मिस्र पहुंचे। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में दक्षिण भारत, विशेषकर तमिल क्षेत्र, रोमन साम्राज्य और मिस्र के साथ सक्रिय व्यापारिक संबंध रखता था। मसाले, वस्त्र, मोती और हाथी-दांत जैसी वस्तुएं भारत से निर्यात होती थीं, जबकि सोना, चांदी और अन्य विलासितापूर्ण वस्तुएं आयात की जाती थीं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/cats91.jpg" alt="cats" width="299" height="370"></img></p>
<p style="text-align:justify;">मिस्र के मकबरों में तमिल लिपि में अंकित नाम इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय व्यापारी या यात्री न केवल वहां पहुंचते थे, बल्कि उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए स्थानीय स्मारकों पर लेखन भी किया। यह प्रवृत्ति आज के “ग्रैफिटी” के समान है, जहां व्यक्ति किसी स्थान पर अपने अस्तित्व का चिह्न छोड़ता है। हालांकि, प्राचीन संदर्भ में यह केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उपस्थिति का भी संकेत है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस खोज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह भारतीय भाषाओं विशेषतः तमिल-की प्राचीनता और उसके अंतर्राष्ट्रीय प्रसार को रेखांकित करती है। तमिल विश्व की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है और इस प्रकार के शिलालेख उसके ऐतिहासिक विस्तार के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए यह खोज अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह वैश्विक इतिहास के उस पक्ष को उजागर करती है, जिसमें विभिन्न सभ्यताओं के बीच संपर्क और संवाद स्थापित था। यह केवल व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक, भाषाई और मानवीय स्तर पर भी सक्रिय था।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/cats92.jpg" alt="cats" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">अंततः सिकाई कोर्रन द्वारा छोड़े गए ये तमिल शिलालेख हमें यह समझने में मदद करते हैं कि प्राचीन विश्व उतना अलग-थलग नहीं था, जितना अक्सर माना जाता है। बल्कि, यह एक जीवंत, परस्पर जुड़ा हुआ संसार था, जहां लोग, भाषाएं और संस्कृतियां सीमाओं को पार कर एक-दूसरे से संवाद कर रही थीं। यह खोज न केवल अतीत की एक रोचक कहानी है, बल्कि वर्तमान में वैश्विक सांस्कृतिक संवाद की जड़ों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रंगोली</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/578755/evidence-of-ancient-global-connections--tamil-inscriptions-in-egyptian-tombs</link>
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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 07:26:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शालू के मालिनी अवस्थी में बदलने का सफर </title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारतेंदु नाट्य अकादमी के स्वर्ण जयंती समारोह में एक शाम मालिनी अवस्थी के नाम से भी सजी। खचाखच भरे राज बिसारिया प्रेक्षागृह में प्रख्यात लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अभिनय, नृत्य और गायिकी में गुंथी जिंदगी के सफर की स्क्रिप्ट को इस अंदाज में पेश किया कि देखने वाले ठगे से रह गए। मालिनी अवस्थी ने अपने इस दो घंटे के शो में यह साबित किया कि जिंदगी में कोई बड़ा मुकाम हासिल करने के पीछे न जाने कितने बरसों की जद्दोजहद होती है। एक बड़े परिवार में जन्म लेने या बड़े परिवार में शादी हो जाने से मंच</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578754/shalu-s-journey-of-transforming-into-malini-awasthi"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/cats89.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतेंदु नाट्य अकादमी के स्वर्ण जयंती समारोह में एक शाम मालिनी अवस्थी के नाम से भी सजी। खचाखच भरे राज बिसारिया प्रेक्षागृह में प्रख्यात लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अभिनय, नृत्य और गायिकी में गुंथी जिंदगी के सफर की स्क्रिप्ट को इस अंदाज में पेश किया कि देखने वाले ठगे से रह गए। मालिनी अवस्थी ने अपने इस दो घंटे के शो में यह साबित किया कि जिंदगी में कोई बड़ा मुकाम हासिल करने के पीछे न जाने कितने बरसों की जद्दोजहद होती है। एक बड़े परिवार में जन्म लेने या बड़े परिवार में शादी हो जाने से मंच तो हासिल हो सकते हैं, लेकिन उन मंचों पर टिके रहने के लिए लगातार कई बरस तक किए गए संघर्ष और अच्छे उस्तादों से हासिल की गई शिक्षा ही काम आती है।</p>
<p><strong>शबाहत हुसैन विजेता/ </strong>कला साधना के दौरान उस्ताद राहत अली खान न मिले होते, उस्ताद नगीना साहब का आशीर्वाद न मिला होता, गिरिजा देवी जैसी गुरु न मिली होतीं, तो कन्नौज के एक डॉक्टर के घर जन्मी शालू आईएएस अफसर अवनीश अवस्थी से शादी होकर भी शालू ही रह जातीं, मालिनी अवस्थी न बन पातीं। उन्हें ऐसे उस्ताद मिले, जिन्होंने कहा कि गजल सीखनी है, तो शीन काफ दुरुस्त होना चाहिए। वो सवाल उठाती हैं कि कहां हैं ऐसे उस्ताद जो शागिर्द की डायरी पर गजल लिखकर दें। वो बताती हैं कि ईसाई स्कूल में पढ़ीं, घर में उस्ताद आते थे मुसलमान। गोरखपुर में रहकर संस्कृत सीखी। संस्कृत बीए तक साथ रही। उन्होंने माना कि अनुभव, जज्बात और किस्से कहानियों में भी शिक्षा होती है।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/23.jpg" alt="2" width="1280" height="720"></img></p>
<p>पिता मुख्य चिकित्सा अधीक्षक थे, उस्ताद राहत अली खां से उनके दोस्ताना रिश्ते थे, उन्होंने कहा कि मेरी बेटी को भी सिखा दें, एक दिन वो घर आए भी सिखाने, सबक भी दे गए, लेकिन तीन महीने तक वो लौटे नहीं और शालू वही सबक तीन महीने तक दोहराती रही। उनकी मां ने समझाया कि प्यासे के पास कुआं नहीं आता, प्यासे को जाना पड़ता है कुएं के पास। मां गाडी चलाकर रोज बेटी को ले जातीं राहत अली खां के घर। वो भजन गाते तो लगता मंदिर में बैठे हैं। राम के भजन ऐसे सुनाते वैसे क्या कोई राम भक्त सुनाएगा।</p>
<p>एक तरफ संगीत की शिक्षा चल रही थी, तो दूसरी तरफ मां-बाप को कभी कहना नहीं पड़ा कि पढ़ लो। पढ़ाई ऐसी कि पूरी क्लास में अव्वल आती थीं। लाइट अक्सर गायब हो जाती थी, तो कुप्पी में बैठकर पढ़ाई करती थीं। स्कूली शिक्षा और संगीत ट्रेन के ट्रैक की तरह साथ-साथ चले एक जैसी रफ्तार में। पिता का लखनऊ ट्रांसफर हो गया, तो भातखंडे में तालीम ली, रवींद्रालय में पहली बार गाया, तब धर्मनाथ मिश्र ने हारमोनियम पर संगत की, आज भी वही करते हैं। लखनऊ से हर शनिवार-रविवार गोरखपुर जाकर राहत अली खां से सीखने का क्रम चलता रहा। उस्ताद राहत अली लखनऊ में कार्यक्रम में आए तो उन्होंने अपने कार्यक्रम में शिष्या मालिनी से गवाया। वो उन्हें उस्ताद नगीना साहब का आशीर्वाद दिलाने ले गए।</p>
<p>बड़ीं हुईं तो घर वालों को चिंता हुई कि गाती है, देशभर में कार्यक्रम करने जाती है, शादी कैसे होगी? हालांकि मां हर जगह साथ में जाती थीं, लेकिन उन्हें कैंसर हो गया था। किसी ने कहा कि पड़ोस वाले अवस्थी जी का लड़का आईआईटी में पढ़ रहा है। उनसे बात चलाओ। बात हुई और मारुती वैन में सवार होकर अवस्थी परिवार मालिनी के घर पहुंच गया। उन्हें भातखंडे में क्लास से बुलाकर घर भेजा गया।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/13.jpg" alt="1" width="1280" height="720"></img></p>
<p><strong>अवनीश अवस्थी से हुई शादी </strong><br />मुलाकात के बाद अवनीश अवस्थी अपने ममेरे भाई के साथ मालिनी से मुलाकात करने आए। रिश्ता पक्का हो गया। उन्होंने कहा कि मेरी और मालिनी की पढ़ाई पूरी हो जाए तब शादी होगी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हुई, तो अवनीश सिविल सर्विस की तैयारी करने लगे। वो आईएएस में सिलेक्ट हुए, सेलेक्शन के बाद अवनीश ने कहा-“सेवा के भाव से आईएएस में जा रहा हूं। हो सकता है तुम्हें वो सुख न दे पाऊं, जो आईएएस की पत्नियों को मिलता है।” मालिनी ने कहा- “तुम सबसे सम्मान से मिलना, फिर इसके बाद शादी हो गई।”</p>
<p>शादी से पहले के दो साल दोनों ने एक दूसरे को खूब चिट्ठियां लिखीं। चिट्ठियां इसलिए लिखीं, क्योंकि पहले महीने इतनी बात की कि 42 हजार रुपये का बिल आ गया। दूसरे महीने भी ऐसा ही होता, तो परिवार जान जाता कि दोनों हरदम बतियाते हैं। शादी के बाद लोगों को लगता था कि आईएएस की पत्नी है इसलिए कार्यक्रम मिलते हैं। लोगों की यह सोच ऐसी चुभी कि घर में ही घुसी रह गईं। अपने दोनों बच्चों के पालन-पोषण में लग गईं। वो कहती हैं कि जीवन आनंद से भरा था, लेकिन अवनीश के पास समय नहीं था, मेरी स्थिति चांद तन्हा है आसमां तन्हा... और शाम वादा था ढल गया सारा... जैसी स्थिति हो गई। प्यार करने वाला पति, दो-दो बच्चों से भरी गोद, फिर भी बहुत कुछ खो गया था। गाना छूट गया था। पिताजी ने आकाशवाणी से बात की फिर से गाने की शुरुआत हुई।</p>
<p><strong>संगीत की दुनिया में शुरू की दूसरी पारी </strong><br />जो स्लेट कोरी हो गई थी, उसे फिर से लिखने के लिए संवारा, संगीत की दुनिया में फिर से घुटनियों चलना शुरू किया। फिर से आकाशवाणी में काम मिलने लगा। संस्कृति विभाग कार्यक्रम देने लगा। अवनीश जब ललितपुर में डीएम थे, तो असगरी बाई से मिलने कालपी गई थीं। असगरी बाई ने समझाया था कि गाती थीं तो गाती रहो।</p>
<p><strong>लंदन में अंत्याक्षरी के शो ने बदल दिए दिन </strong><br />टेलीविजन पर गजेन्द्र सिंह अंत्याक्षरी का संचालन कर रहे थे। उन्होंने बुलाया। लंदन में शो हुआ, तो मालिनी अवस्थी और भोजपुरी गायक बालेश्वर ने समां बांध दिया। इसके बाद पीछे मुड़कर देखने का मौका नहीं मिला।</p>
<p><strong>सुपरहिट शो और पद्मश्री जैसे सम्मान </strong><br />रेलिया बैरिन पिया को लिए जाए रे जैसे गीतों के जरिए मालिनी ने तमाम सुपरहिट शो दिए। उनकी कला साधना ने उन्हें पद्मश्री से पहले यशभारती सम्मान, कालिदास सम्मान और अवध सम्मान दिलाए। उनकी साधना ने उन्हें ऐसी पहचान दी कि पति अपर मुख्य सचिव रहे हों या मौजूदा समय में मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं, लेकिन यह आरोप नहीं लगता कि बड़े अफसर की बीवी हैं, इसलिए सफल हैं, जिसने उनके सुपरहिट शो देखे हैं वो जानता है कि यह सफलता सिफारिश वाली नहीं जबरदस्त रियाज वाली है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>रंगोली</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 08:16:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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