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                <title>शब्द रंग - Amrit Vichar</title>
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                <title>नानी के घर जाऊंगा, दूध मलाई खाऊंगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">“नानी के घर जाऊंगा, दूध मलाई खाऊंगा…” जैसी पंक्तियां सुनते ही न जाने कितने लोगों के मन में एक साथ कई तस्वीरें उभर आती हैं- ननिहाल, गर्मी की छुट्टियां, मोहल्ले की क्रिकेट, छत पर बिछी चारपाई, स्कूल की छुट्टियों की सुबहें और बेफिक्र दिन। ये केवल यादें नहीं हैं। ये उस सामाजिक संसार की झलक हैं, जिसमें परिवार, रिश्ते और रोजमर्रा का जीवन आज की तुलना में कहीं अधिक आत्मीय और सहज महसूस होता था।</p>
<p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया पर नजर डालिए। कहीं पुराने स्कूल की तस्वीरें हैं, कहीं बचपन के खेलों की चर्चा, कहीं ननिहाल की यादें और कहीं 90 के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586458/i-will-go-to-grandma-s-house-and-eat-milk-and-cream"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/untitled-design-(38).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">“नानी के घर जाऊंगा, दूध मलाई खाऊंगा…” जैसी पंक्तियां सुनते ही न जाने कितने लोगों के मन में एक साथ कई तस्वीरें उभर आती हैं- ननिहाल, गर्मी की छुट्टियां, मोहल्ले की क्रिकेट, छत पर बिछी चारपाई, स्कूल की छुट्टियों की सुबहें और बेफिक्र दिन। ये केवल यादें नहीं हैं। ये उस सामाजिक संसार की झलक हैं, जिसमें परिवार, रिश्ते और रोजमर्रा का जीवन आज की तुलना में कहीं अधिक आत्मीय और सहज महसूस होता था।</p>
<p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया पर नजर डालिए। कहीं पुराने स्कूल की तस्वीरें हैं, कहीं बचपन के खेलों की चर्चा, कहीं ननिहाल की यादें और कहीं 90 के दशक को याद करती रील्स। पुराने फोटो एल्बमों से निकली तस्वीरें भी अब बार-बार साझा की जा रही हैं। यह केवल एक चलन नहीं है। इसके पीछे हमारे समय की एक गहरी मनः स्थिति दिखाई देती है। वर्तमान जीवन की जटिलताओं के बीच अतीत अक्सर अधिक सरल, सुरक्षित और अपनापन भरा लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय समाज में ननिहाल केवल एक रिश्ते का नाम नहीं रहा है। वह बच्चों के लिए एक अलग दुनिया हुआ करता था। वहां नियम कुछ ढीले होते थे, स्नेह कुछ अधिक और अपेक्षाएं कुछ कम। संयुक्त परिवारों और घनिष्ठ सामाजिक संबंधों वाले दौर में ननिहाल, दादा-दादी का घर, मोहल्ले के दोस्त और छुट्टियों का समय मिलकर बचपन को एक सामूहिक अनुभव बनाते थे। यही वजह है कि कई पीढ़ियों की स्मृतियों में ये स्थान आज भी इतने जीवंत बने हुए हैं, लेकिन बचपन की स्मृतियों का यह आकर्षण केवल व्यक्तिगत नहीं है। </p>
<p style="text-align:justify;">यह हमारे समाज में हो रहे बदलावों से भी जुड़ा है। जिस जीवन में काम का दबाव लगातार बढ़ रहा हो, समय हमेशा कम पड़ता हो और व्यक्ति की पहचान उसकी उपलब्धियों से तय की जाने लगी हो, वहां लोग स्वाभाविक रूप से उन दिनों को याद करते हैं, जब जीवन अपेक्षाकृत सरल महसूस होता था। अतीत तब केवल याद नहीं रह जाता, वह एक तरह का भावनात्मक सहारा बन जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की पीढ़ी का जीवन पिछली पीढ़ियों से कई मायनों में अलग है। शहरीकरण बढ़ा है, प्रतिस्पर्धा तेज हुई है, शिक्षा और रोजगार से जुड़ी अपेक्षाएं बढ़ी हैं। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव मौजूद है। अवसर पहले से अधिक हैं, लेकिन उन्हें पाने की दौड़ भी पहले से कहीं अधिक कठिन और थकाऊ हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि जिन तकनीकों ने लोगों को चौबीसों घंटे जोड़े रखा है, उन्होंने अकेलेपन की भावना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। हमारे पास पहले से अधिक साधन हैं, लेकिन शायद पहले जितना खाली समय नहीं। बातचीत के तरीके बढ़े हैं, मगर दिल की बातें कम हुई हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर दर्जनों लोग मौजूद रहते हैं, लेकिन कई बार मन फिर भी अकेला महसूस करता है। शायद यह भी हमारे समय का एक विरोधाभास है कि यादों को सुरक्षित रखने के साधन पहले कभी इतने अधिक नहीं थे। मोबाइल फोन में हजारों तस्वीरें हैं, क्लाउड में वर्षों का डिजिटल रिकॉर्ड है और हर क्षण को दर्ज कर लेने की सुविधा मौजूद है। फिर भी लोग बार-बार उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिनकी बहुत कम तस्वीरें बची हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">लगता है कि स्मृतियों की ताकत उन्हें सहेजने के साधनों से नहीं, उन्हें जीने की गहराई से पैदा होती है। यहीं से बचपन की स्मृतियों का महत्व समझ में आता है। वे केवल बीते हुए समय की याद नहीं हैं, वे उस सहजता की याद हैं, जो आज के जीवन में धीरे-धीरे कम होती दिखाई देती है। शायद लोग बचपन को इसलिए याद नहीं करते कि वह बीत गया है, वे उसे इसलिए याद करते हैं, क्योंकि उसके साथ जीवन का एक ऐसा ढंग भी चला गया, जिसमें हर क्षण का कोई उपयोग साबित करना जरूरी नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस भावनात्मक प्रवृत्ति को समझते समय एक सावधानी भी आवश्यक है। उस दौर में भी अपनी सीमाएं, अभाव और परेशानियां थीं। फर्क केवल इतना है कि समय के साथ स्मृति सुखद अनुभवों को अधिक सहेज लेती है और कठिन अनुभवों को धीरे-धीरे पीछे छोड़ देती है। मनुष्य अतीत को वैसा नहीं याद रखता जैसा वह था, वह उसे वैसा याद रखता है जैसा उसे महसूस हुआ था। </p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि बचपन की यादों को केवल भावुकता मान लेना भी सही नहीं होगा। जब बड़ी संख्या में लोग बार-बार अपने पुराने दिनों को याद करने लगें, तो यह वर्तमान जीवन के बारे में भी कुछ बताता है। यह संकेत देता है कि आधुनिक जीवन में सुविधा तो बढ़ी है, लेकिन शायद आत्मीयता, अवकाश और भावनात्मक संतुलन के लिए जगह अपेक्षाकृत कम होती गई है।<br />सवाल यह नहीं है कि बचपन बेहतर था या वर्तमान। </p>
<p style="text-align:justify;">सवाल यह है कि क्या हमारी जीवनशैली में ऐसे रिश्तों और अनुभवों के लिए पर्याप्त स्थान बचा है, जो बिना किसी स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा या प्रदर्शन के हमें संतोष दे सकें। क्या हमारे पास ऐसा समय बचा है, जो केवल जीने के लिए हो, न कि किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए? बचपन कभी लौटकर नहीं आता। न ननिहाल वैसा रहता है, न गांव, न वे लोग और न ही हम स्वयं। </p>
<p style="text-align:justify;">फिर भी उसकी स्मृतियां बार-बार लौटती हैं। शायद इसलिए नहीं कि अतीत वर्तमान से बेहतर था, बल्कि इसलिए कि वे हमें उन चीजों की याद दिलाती हैं, जिनकी जरूरत आज भी उतनी ही है, जितनी कभी थी अपनापन, थोड़ा खाली समय और ऐसे रिश्ते, जिनमें हमें हर समय कुछ साबित न करना पड़े। शायद यही वजह है कि बचपन की यादें पुरानी नहीं पड़तीं। वे समय-समय पर लौटकर हमें यह याद दिलाती रहती हैं कि मनुष्य केवल उपलब्धियों, आय और व्यस्तताओं से नहीं बनता। उसके जीवन का असली अर्थ उन संबंधों और अनुभवों में भी छिपा होता है, जो उसे भीतर से समृद्ध बनाते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिवम भारद्वाज</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 09:00:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पुरानी दिल्ली के संकरी गलियों में ज्ञान का दीपक जलाने वाला</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">दिल्ली-6 की संकरी गलियों और अजमेरी गेट के ऐतिहासिक एंग्लो-अरेबिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शताब्दियों पुरानी इमारत में एक शिक्षक रोजाना विज्ञान की कक्षाएं लेता है, लेकिन उसकी कहानी कक्षा तक सीमित नहीं है। मकसूद अहमद स्कूल की चार दीवारों से आगे निकलकर गरीब बच्चों के लिए आशा की किरण बने हैं। वे एंग्लो-अरेबिक स्कूल में जीव विज्ञान पढ़ाते हैं और शाम को सुईवालान में अल्लामा रफीक ट्रस्ट के तहत मुफ्त कोचिंग चलाते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। उनका जीवन समर्पण, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी का अनुपम उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">मकसूद अहमद का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586456/one-who-lights-the-lamp-of-knowledge-in-the-narrow-streets-of-old-delhi"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/untitled-design-(36).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली-6 की संकरी गलियों और अजमेरी गेट के ऐतिहासिक एंग्लो-अरेबिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल की शताब्दियों पुरानी इमारत में एक शिक्षक रोजाना विज्ञान की कक्षाएं लेता है, लेकिन उसकी कहानी कक्षा तक सीमित नहीं है। मकसूद अहमद स्कूल की चार दीवारों से आगे निकलकर गरीब बच्चों के लिए आशा की किरण बने हैं। वे एंग्लो-अरेबिक स्कूल में जीव विज्ञान पढ़ाते हैं और शाम को सुईवालान में अल्लामा रफीक ट्रस्ट के तहत मुफ्त कोचिंग चलाते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। उनका जीवन समर्पण, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी का अनुपम उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">मकसूद अहमद का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली में हुआ। वे 1992 में एंग्लो-अरेबिक स्कूल में शामिल हुए, जो 1696 में मदरसा गाजीद्दीन के रूप में स्थापित हुआ था। यह स्कूल दिल्ली का सबसे पुराना शैक्षणिक संस्थान है। यहां ही उर्दू कवि अख्तर उल इमान, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर प्रो. ए.एन. कौल जैसे गणमान्य व्यक्तित्व पढ़े हैं। इस स्कूल में मुख्य रूप से कामकाजी और निम्न आय वाले परिवारों के बच्चे ही पढ़ते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कक्षा में मकसूद अहमद छात्रों के बीच जटिल जैविक अवधारणाओं को सरल बनाने और जिज्ञासा जगाने के लिए प्रसिद्ध हैं। वे कहते हैं कि शिक्षा सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन बदलने का माध्यम है। स्कूल में कुछ साल पढ़ाने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि केवल स्कूल की पढ़ाई पर्याप्त नहीं है। कई बच्चे आर्थिक तंगी के कारण आगे नहीं बढ़ पाते। कुछ साल पहले उन्होंने  सुईवालान में छोटी जगह लेकर शाम की कक्षाएं शुरू कीं। शुरू में यह छोटा प्रयास था, लेकिन धीरे-धीरे यह अल्लामा रफीक ट्रस्ट में बदल गया, जिसमें मित्रों का सहयोग शामिल हुआ। ट्रस्ट अब शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और कौशल विकास के क्षेत्र में काम करता है। मकसूद अहमद मुफ्त कोचिंग देते हैं। यहां गरीब परिवारों के बच्चे आते हैं। इनमें रिक्शा चालक, दर्जी, दुकानदार या मजदूरों के बेटे-बेटियां आईआईटी-जेईई, बैंक पीओ और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। निजी कोचिंग संस्थानों में जहां हजारों रुपये खर्च होते हैं, वहां ये बच्चे बिना किसी आर्थिक बोझ के पढ़ते हैं। वे बच्चों को स्टडी मटेरियल भी उपलब्ध करवा देते हैं। वे कहते हैं- “प्रतिभा हर जगह बराबर बंटी है, लेकिन अवसर नहीं।”</p>
<p style="text-align:justify;">अब तक उनके प्रयासों से 30 से अधिक छात्रों ने मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य प्रतियोगी कोर्स में सफलता पाई है। जामा मस्जिद और सीता राम बाजार के आसपास के मुहल्लों से कई बच्चे डॉक्टर और इंजीनियर बन चुके हैं। पूर्व छात्र डॉ. जायद अहमद (तिब्बिया आयुर्वेदिक एंड यूनानी कॉलेज) कहते हैं, “स्कूल में सर ने जीव विज्ञान पढ़ाया और फिर मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी के लिए कोचिंग दी। वे पुरानी और महान शिक्षण परंपरा के प्रतीक हैं।”<br />सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं  का भी स्थायी चेहरा</p>
<p style="text-align:justify;">मकसूद अहमद राजघाट और शांतिवन पर होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का भी स्थायी चेहरा हैं। वे वर्षों से महात्मा गांधी की जयंती (2 अक्तूबर) और बलिदान दिवस (30 जनवरी) तथा अन्य विशेष सरकारी अवसरों पर आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं में भाग लेते हैं। वे इन सभाओं  में कुरआन की आयतें पढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि सर्वधर्म प्रार्थना का विचार स्वयं महात्मा गांधी ने दुनिया को दिया था। उनके जीवनकाल में ही यह प्रथा शुरू हो गई थी और आज भी यह परंपरा जीवित है। ये सभाएं न केवल गांधीजी के सत्य, अहिंसा और सर्वधर्म समभाव के आदर्शों को जीवंत रखती हैं, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता और एकता की मिसाल भी पेश करती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">मकसूद अहमद के.आर. नारायणन, प्रणव मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर आयोजित प्रार्थना सभाओं में भी शामिल हुए हैं। मकसूद अहमद की दिनचर्या कमाल की है। स्कूल के बाद शाम को कोचिंग, देर रात तक डाउट क्लियरिंग सत्र। वे अपनी पत्नी और दोस्तों को श्रेय देते हैं, जिन्होंने हमेशा साथ दिया। वे लाइब्रेरी, वोकेशनल ट्रेनिंग, मेडिकल कैंप और स्व-अध्ययन केंद्र भी चलाते हैं। दिल्ली एजुकेशन सोसाइटी की सेक्रेटरी प्रो. केहकशां दानियाल जैसे सहयोगियों का समर्थन उन्हें प्रोत्साहित करता है। पुरानी दिल्ली की चुनौतियां कम नहीं हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">भीड़भाड़, सीमित संसाधन, आर्थिक दबाव और खासकर लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी सामाजिक बाधाएं। फिर भी मकसूद अहमद जैसे शिक्षक पूरे समुदाय को प्रभावित करते हैं। वे न केवल ज्ञान देते हैं, बल्कि आत्मविश्वास और सपने भी जगाते हैं। आज जब शिक्षा महंगाई और व्यावसायीकरण की चपेट में है, मकसूद अहमद जैसे शिक्षक याद दिलाते हैं कि सच्चा शिक्षक वह है, जो दीवारें तोड़कर पहुंचता है। उनकी कहानी पुरानी दिल्ली की गलियों में ज्ञान के दीए की तरह जल रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को रोशन करेगी। वे साबित करते हैं कि एक समर्पित शिक्षक पूरे समाज का भविष्य बदल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/untitled-design-(37).jpg" alt="Untitled design (37)" width="1280" height="720"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />विवेक शुक्ला, पूर्व सूचना अधिकारी, यूएई एंबेसी</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 12:00:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कैंची से भगत सिंह को ‘नया रूप’ देने वाले डॉ. गया प्रसाद कटियार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कानपुर की बिल्हौर तहसील के खजुरी खुर्द गांव के फिरोजपुर के एक छोटे से दवाखाने में कैंची चलाकर भारत के क्रांतिकारी इतिहास की दिशा बदल दी। उसी कैंची ने सरदार भगत सिंह के केश और दाढ़ी को नया रूप दिया, ताकि अंग्रेजी हुकूमत उन्हें पहचान न सके। वह कैंची डॉ. गया प्रसाद कटियार के हाथों में थी-एक चिकित्सक, क्रांतिकारी और लाहौर षड्यंत्र केस के ऐसे नायक, जिन्हें इतिहास ने अपेक्षित स्थान नहीं दिया।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/untitled-design-(34).jpg" alt="Untitled design (34)" width="1200" height="720" /></p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. गया प्रसाद को क्रांति की प्रेरणा विरासत में मिली थी। उनके दादा चौधरी महादीन कटियार ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586454/dr--gaya-prasad-katiyar--who-gave-a--new-look--to-bhagat-singh-with-scissors"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/untitled-design-(35).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कानपुर की बिल्हौर तहसील के खजुरी खुर्द गांव के फिरोजपुर के एक छोटे से दवाखाने में कैंची चलाकर भारत के क्रांतिकारी इतिहास की दिशा बदल दी। उसी कैंची ने सरदार भगत सिंह के केश और दाढ़ी को नया रूप दिया, ताकि अंग्रेजी हुकूमत उन्हें पहचान न सके। वह कैंची डॉ. गया प्रसाद कटियार के हाथों में थी-एक चिकित्सक, क्रांतिकारी और लाहौर षड्यंत्र केस के ऐसे नायक, जिन्हें इतिहास ने अपेक्षित स्थान नहीं दिया।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/untitled-design-(34).jpg" alt="Untitled design (34)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. गया प्रसाद को क्रांति की प्रेरणा विरासत में मिली थी। उनके दादा चौधरी महादीन कटियार ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाए थे। दादा की वीरगाथाएं सुनते-सुनते बालक गया प्रसाद के मन में विदेशी शासन के प्रति गहरा प्रतिरोध जन्म लेने लगा। हाईस्कूल के बाद उन्होंने चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उनका मन राष्ट्रसेवा और क्रांति की ओर आकृष्ट था। कानपुर की मजदूर सभा और आर्य समाज के माध्यम से उनका संपर्क गणेश शंकर विद्यार्थी और हरिहरनाथ शास्त्री जैसे राष्ट्रवादी नेताओं से हुआ। यही संपर्क आगे चलकर उन्हें हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के केंद्रीय नेतृत्व तक ले गया।</p>
<p style="text-align:justify;">17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय पर हुए बर्बर लाठीचार्ज के प्रतिशोध में अंग्रेज पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स को दंडित करने का निर्णय लिया जा चुका था। किंतु संगठन के सामने एक बड़ी चुनौती थी- भगत सिंह की पहचान। केश और दाढ़ी वाले एक युवा सिख क्रांतिकारी को पुलिस आसानी से पहचान सकती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे समय में फिरोजपुर में ‘डॉ. बी.एस. निगम’ के नाम से दवाखाना संचालित कर रहे डॉ. गया प्रसाद को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। सुखदेव के सहयोग से उन्होंने अपने दवाखाने के एक सुरक्षित कमरे में भगत सिंह के केश और दाढ़ी स्वयं काटी। कैंची की हर कतरन के साथ एक परंपरा टूट रही थी, लेकिन राष्ट्रहित में एक नए त्याग की परंपरा जन्म ले रही थी। इसके बाद भगत सिंह आधुनिक वेशभूषा में ‘बलवंत सिंह’ के रूप में लाहौर की सड़कों पर निकले और सांडर्स वध की ऐतिहासिक योजना सफल हुई। उस भवन को पंजाब सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्रांतिकारी जीवन की राह में डॉ. गया प्रसाद के लिए सबसे बड़ी व्यक्तिगत चुनौती उनका वैवाहिक जीवन था। उन्होंने अपनी पत्नी रज्जो देवी से स्पष्ट शब्दों में कहा-“मैं क्रांतिकारी बनकर मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने जा रहा हूं। समझ लो कि तुम विधवा हो चुकी हो।” कहा जाता है कि उन्होंने स्वयं पत्नी से माथे का सिंदूर पोंछने को कहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">उस दिन के बाद रज्जो देवी अपने पति का चेहरा दोबारा नहीं देख सकीं। वे जीवनभर एक ‘सुहागिन विधवा’ की तरह जीती रहीं और अंततः शिवराजपुर के बैरी गांव में विरह और प्रतीक्षा के बीच इस संसार से विदा हो गईं। स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के ऐसे मौन और अनदेखे बलिदानों को इतिहास में आज भी पर्याप्त स्थान नहीं मिला है।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. गया प्रसाद के लिए चिकित्सकीय पेशा केवल जीविका का साधन नहीं था, बल्कि क्रांतिकारी गतिविधियों का सुरक्षित आवरण भी था। उन्होंने देश के विभिन्न नगरों में अलग-अलग नामों से क्लीनिक संचालित किए। बाहर मरीजों का उपचार होता था और भीतर क्रांति की योजनाएं बनती थीं। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा फेंके गए बमों के निर्माण की व्यवस्था भी उनकी देखरेख में हुई थी। बम निर्माण की तकनीक उन्होंने यतींद्रनाथ दास से सीखी थी, जबकि निशानेबाजी का प्रशिक्षण चंद्रशेखर आजाद से प्राप्त किया था। HSRA के केंद्रीय कार्यालय का संचालन भी लंबे समय तक उनके हाथों में रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">सांडर्स वध के बाद 15 मई 1929 को सहारनपुर में डॉ. गया प्रसाद, शिव वर्मा और जयदेव कपूर हथियारों सहित गिरफ्तार कर लिए गए। डॉ. राम लाल गिरफ्तारी के समय उन्होंने अपनी जेब में रखे महत्वपूर्ण पत्रों को निगल लिया, ताकि वे अंग्रेजों के हाथ न लग सकें। इन पत्रों में चंद्रभानु गुप्ता, मोहनलाल सक्सेना और अन्य सहयोगियों से जुड़े वे संदेश थे, जिनमें चंद्रशेखर आजाद की योजनाओं का उल्लेख था।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. गया प्रसाद ने लाहौर षड्यंत्र केस की अदालती कार्यवाही में भाग लेने से स्पष्ट इंकार कर दिया। 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें बिना गवाहों की जिरह और बिना प्रभावी सुनवाई के आजीवन कारावास तथा कालापानी की सजा सुना दी गई। इसके साथ ही शुरू हुआ उनका 17 वर्षों का लंबा कारावास- लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, कोलकाता, बेलारी, राजमहेंद्रि और अंडमान सहित 11 जेलों का कठिन सफर।</p>
<p style="text-align:justify;">अंडमान की सेल्यूलर जेल में उन्होंने छह वर्षों से अधिक समय बिताया। वहां उन्होंने 46 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की, जिसे उस समय विश्व की सबसे लंबी राजनीतिक भूख हड़तालों में गिना गया। 10 फरवरी 1993 को यह महान क्रांतिकारी इस दुनिया से विदा हो गया। अपने अंतिम साक्षात्कारों में उन्होंने कहा था- “आजादी के बाद के भारत का जो स्वरूप हमने सोचा था, उसका एक कोना भी पूरा नहीं हो पाया। गोरे चले गए, काले आ गए।”</p>
<h5 style="text-align:justify;">डॉ. शाह आलम राना, दस्तावेजी लेखक</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 17:18:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> कबीर जयंती : सुमिर बंदगी कर साहिब की काल नवावे माथा... </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">18 वीं शताब्दी के आरंभ में कबीर के जीवन के साथ कई चमत्कारिक बातें जुड़ने लगीं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानंद के आशीर्वाद द्वारा एक विधवा ब्रह्मणी के पुत्र थे। अनजाने में विधवा ब्राह्मणी को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी ने उस बालक को लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया। कबीर पंथियों ने तो यहां तक माना है कि कबीर के कोई माता-पिता न थे। उन्होंने आकाश से एक ज्योति के रूप में उतरकर बालक का रूप धारण कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">परंतु संत रविदास, गुरु अमरदास, रज्जब आदि संतों ने स्पष्ट किया है कि कबीर ने एक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585929/kabir-jayanti--sumir-worships-sahib-s-kaal-navave-matha-"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(18)17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">18 वीं शताब्दी के आरंभ में कबीर के जीवन के साथ कई चमत्कारिक बातें जुड़ने लगीं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानंद के आशीर्वाद द्वारा एक विधवा ब्रह्मणी के पुत्र थे। अनजाने में विधवा ब्राह्मणी को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी ने उस बालक को लहरतारा तालाब के किनारे छोड़ दिया। कबीर पंथियों ने तो यहां तक माना है कि कबीर के कोई माता-पिता न थे। उन्होंने आकाश से एक ज्योति के रूप में उतरकर बालक का रूप धारण कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">परंतु संत रविदास, गुरु अमरदास, रज्जब आदि संतों ने स्पष्ट किया है कि कबीर ने एक मुस्लिम जुलाहिन के उदर से जन्म लिया। कबीर के शिष्य धर्मदास कहते हैं कि कबीर की माता तुर्क और पिता जुलाहा थे। रविदास के अनुसार उनके यहां ईद आदि त्योहारों पर जानवरों की बलि भी दी जाती थी। वास्तव में संतों की कोई जाति नहीं होती। कबीर स्वयं कहते हैं कि वे न हिंदू हैं न मुसलमान, वे हर मनुष्य की ही तरह पांच तत्वों से बना शरीर धारण किए हुए हैं, जिसमें अदृश्य आत्मा निवास करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कबीर का जन्म सन् 1398 में हुआ था, उनके पिता नीरू और माता नीमा जाति के जुलाहे थे। वे बनारस में शहर के बाहरी छोर पर रहते थे। बचपन से ही कबीर की रुचि परमार्थ में थी, जबकि उनको विधिवत शिक्षा का अवसर नहीं मिला, फिर भी कबीर की रचनाओं से पता चलता है कि वे एक विवेकशील व तीव्र बुद्धि थे, जिन्हें गूढ़ रहस्यों को समझने तथा उनका एवं उनका विवेचन करने की असाधारण योग्यता प्राप्त थी। बचपन से ही कबीर जुलाहे के व्यवसाय में अपने पिता का हाथ बंटाने लगे। धीरे-धीरे वे इस व्यवसाय में कुशल हो गए। साथ ही वे अपना कुछ समय अध्यात्म में बिताते थे, जिसको देखकर उनके माता-पिता चिंतित हो उठते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य कालीन कवियों ने कबीर को महान भक्त और संत माना है, परंतु बीसवीं शताब्दी के विद्वानों ने कबीर को केवल एक समाज सुधारक के रूप में देखा है। परंतु कबीर समाज सुधारक नहीं थे और न ही उनके जीवन का उद्देश्य समाज सुधार था। उनका ध्येय केवल रुहानी व आध्यात्मिक था, सामाजिक नहीं। न तो वे उपदेशक थे, न दार्शनिक, न पंडित थे, न विद्वान, वे हरि के जन थे, प्रभु प्रेमी थे। उन्होंने अपने अंतर में परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया था और वे किसी और को भी उसकी प्राप्ति के मार्ग पर लगाने की अद्भुत ताकत रखने वाले पूर्ण गुरु थे। कबीर साहिब सच्चे गुरु की शरण में जाने के बारे में कहते हैं। अनुराग सागर कबीर साहिब और उनके शिष्य धर्मदास के बीच हुए संवाद के रूप में रचित एक प्रमुख ग्रंथ है। इसमें गुरु महिमा करते हुए लिखा है कि जग में गुरु समान नहीं दाता, बस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु भली बताई बाता। सुमिर बंदगी कर मालिक की काल नवावे माथा। जग में...</p>
<p style="text-align:justify;">कबीर साहिब हमेशा मेहनत और ईमानदारी की कमाई से ही अपना तथा अपने परिवार का गुजारा करते थे। करीब के शिष्यों में राजा, नवाब, सेठ व साहूकार भी थे, जो कबीर को सब प्रकार के सुख-साधन व धन-संपत्ति आदि भेंट कर सकते थे। परंतु कबीर ने कभी अपने व परिवार के लिए कोई भेंट मंजूर नहीं की और न ही कभी किसी के आगे हाथ फैलाया। कबीर साहिब कहते हैं कि संत को अपने शिष्यों से प्रेम चाहिए, धन नहीं, जो धन के भूखे हैं, वे संत नहीं होते। कबीर के अनुसार मांगने को लेकर लिखा गया है-मर जाऊं मांगू नहीं, अपने तन के काज। </p>
<p style="text-align:justify;">परमारथ के कारने मोहि न आवे लाज। कबीर साहिब निर्भीक और स्पष्टवादी थे। कट्टरता और रूढ़िवाद के साथ उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। एक बार कुछ पंडित गंगा जल की महिमा का बखान करते हुए उनसे बोले कि गंगा का पानी घोर पापियों के पाप को धोकर उन्हें पवित्र कर देता है। यह सुनकर कबीर ने अपने लोटे में रखा गंगा का पानी पंडितों को पीने के लिए दिया। इस पर पंडित बहुत क्रोधित हुए। एक नीच जुलाहे का यह साहस कि उच्च ब्राह्मणों को अपने अपवित्र लोटे से पानी पीने को कहे, इस पर कबीर ने कहा कि यदि गंगाजल मेरे लोटे को पवित्र न कर सका, तो यह पापियों के पाप कैसे धो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन कबीर अपने शिष्यों को दर्शन देकर अपनी कुटिया में चले गए और हुक्म दे गए कि कोई अंदर न आए। दोपहर होने पर शिष्य अंदर गए, तो कबीर धरती पर लेटे थे। परंतु जिस सागर से लहर उठी थी वह उसी विशाल सागर में समा चुकी थी। सन् 1518 में कबीर की आत्मा इस नाश्वर जगत को छोड़कर परमपिता परमात्मा में लीन हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">कबीर के अंतिम संस्कार को लेकर शिष्यों में मतभेद हो गया। राजा वीरसिंह बघेला के नेतृत्व में हिंदू कबीर के शव का अग्नि संस्कार करना चाहते थे, परंतकु नवाब बिजलीखान और मुस्लिम शिष्य उसे दफनाना चाहते थे। दोनों पक्षों में विवाद के चलते झगड़े की नौबत आ गई। उसी समय कुछ शिष्यों ने सभी का ध्यान कबीर के शव की ओर आकर्षित किया। कहते हैं कि कपड़ा हटाने पर शव के स्थान पर वहां फूलों का ढेर मिला।</p>
<h5 style="text-align:justify;">- करन सिंह मौर्य, बरेली</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 10:00:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक विरले इतिहास लेखक की स्मृति </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">इतिहास लेखन एक दुधारी तलवार की तरह है। इसमें सतर्कता और प्रामाणिकता की ऐसी डगर पर चलकर लक्ष्य पर पहुंचना होता है कि एक ओर खाई, दूसरी ओर कुआं। पर आपने यदि निष्पक्ष लेखकीय प्रतिबद्धता पर चलते हुए इसे निष्कंटक पार कर लिया, तो आप एक न एक दिन इस विधा में मानक बनाने में सफल अवश्य होंगे। </p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास लेखन में ऐसे मानक देश में कम ही लोग बना पाए हैं। इंदौर को कर्मस्थली बनाकर रहे प्रोफेसर शरद पगारे स्वयं को अमृतलाल नागर और वृंदावनलाल वर्मा की परंपरा का वाहक मानते थे, पर एक ईमानदार मूल्यांकन किया जाए, तो वास्तव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585928/memory-of-a-rare-historian"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(16)17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इतिहास लेखन एक दुधारी तलवार की तरह है। इसमें सतर्कता और प्रामाणिकता की ऐसी डगर पर चलकर लक्ष्य पर पहुंचना होता है कि एक ओर खाई, दूसरी ओर कुआं। पर आपने यदि निष्पक्ष लेखकीय प्रतिबद्धता पर चलते हुए इसे निष्कंटक पार कर लिया, तो आप एक न एक दिन इस विधा में मानक बनाने में सफल अवश्य होंगे। </p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास लेखन में ऐसे मानक देश में कम ही लोग बना पाए हैं। इंदौर को कर्मस्थली बनाकर रहे प्रोफेसर शरद पगारे स्वयं को अमृतलाल नागर और वृंदावनलाल वर्मा की परंपरा का वाहक मानते थे, पर एक ईमानदार मूल्यांकन किया जाए, तो वास्तव में वे इन लेखकों से भी आगे और इतिहास लेखन में उच्चतम स्तर पर पहुंचे लेखक थे। </p>
<p style="text-align:justify;">अब से दो वर्ष पूर्व, 28 जून 2024 को वे महाप्रयाण पर निकल गए थे। तब उनकी आयु 93 वर्ष थी। वे उस समय भी रचनाकर्म में लीन थे। उन्होंने इतिहास, समाज और मनुष्य की आंतरिक त्रासदियों को एक साथ कथानक में ढालने की दुर्लभ क्षमता विकसित की। इसलिए उनका साहित्य इतिहास की विस्मृत कहानियां कहने का माध्यम होने के साथ एक वैचारिक हस्तक्षेप भी बना।</p>
<p style="text-align:justify;">5 जुलाई 1931 को खंडवा, मध्य प्रदेश में जन्मे शरद पगारे ने इतिहास विषय में एमए, पीएचडी की। मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग और विदेशी विश्वविद्यालयों में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में कई दशकों तक अध्यापन, शोध के साथ ही ऐतिहासिक एवं साहित्यिक कथाओं व उपन्यासों का नियमित लेखन किया। यह अद्भुत था कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लेखन को माध्यम बनाकर उभरते हुए युवा शरद पगारे ने इक्कीसवीं शताब्दी तक अपनी रचनात्मकता को निरंतर बनाए रखा। उनका लेखन दर्शाता है कि साहित्य समय का दस्तावेज होने के साथ उसे समझने और संवाद करने का साधन भी है। उन्होंने इतिहास को घटनाओं में छिपे मानवीय भावों, संघर्षों और विडंबनाओं के रूप में देखा। यही कारण है कि उनके कथानक पाठकों के लिए ज्ञान और संवेदना का भी माध्यम बनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके रचनाकर्म में एक स्पष्ट विकासक्रम दिखाई देता है। प्रारंभिक चरण में उनका लेखन ऐतिहासिक प्रेमकथाओं और इतिहास में अनदेखी घटनाओं के पुनर्सृजन पर केंद्रित रहा। उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहां की प्रेमिका “गुलारा बेगम” और औरंगजेब की अल्पचर्चित प्रेमिका “बेगम जैनाबादी”, जैसी कृतियों को सामने लाने का उपक्रम किया, जिन पर इतिहास में दो-चार पृष्ठों की सामग्री भी उपलब्ध नहीं है। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद उनका लेखन अधिक गहरे ऐतिहासिक विश्लेषण की ओर बढ़ता है, जिसका चरम “पाटलिपुत्र की साम्राज्ञी” में दिखाई देता है। इसकी नायिका थी वह स्त्री जिसने वास्तविक जीवन में पृष्ठभूमि में रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह अशोक महान की मां धर्मा थी, एक निर्धन दरिद्र ब्राह्मण की अपूर्व, अद्वितीय एवं अनिंद्य सुंदरी बेटी। यहां इतिहास, राजनीति और संस्कृति का एक सुंदर समेकित चित्रण मिलता है।  इसके समानांतर “गंधर्वसेन” जैसी कृतियां प्राचीन इतिहास की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">“उजाले की तलाश” जैसी रचनाओं में वे समकालीन सामाजिक यथार्थ की ओर भी मुड़ते हैं, जिससे उनका लेखन इतिहास से वर्तमान तक एक सतत संवाद स्थापित करता रहा है। इस प्रकार उनका उपन्यास-साहित्य सृजन एक क्रमिक वैचारिक यात्रा है, जिसमें इतिहास, प्रेम, समाज और मनोविज्ञान विस्तार पाते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">शरद पगारे आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका साहित्य आज भी हमारे साथ है। वह हमें सोचने का अवसर देता है, प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित करता है और सबसे महत्वपूर्ण, हमें मनुष्य बने रहने की याद दिलाता है। यही उनकी उपलब्धि है और यही उनकी अमरता का आधार भी।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/untitled-design-(17)19.jpg" alt="Untitled design (17)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4 style="text-align:justify;">राजगोपाल सिंह वर्मा लेखक</h4>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 09:00:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जॉब का पहला दिन :  आज भी याद है वरिष्ठों का अपनत्व भरा स्वभाव </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जीवन में स्मृतियां बहुत बड़ी धरोहर होती है, ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को याद रखने और भूल जाने की शक्ति दी है। अपने इसी याद रखने की शक्ति के अंतर्गत जॉब के पहले दिन की ओर जाता हूं तो मधुर स्मृतियां एक रील की तरह मस्तिष्क पर आ जाती हैं। उहापोह के अनेक प्रश्न थे, साथ ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर बनने का एक विशेष उत्साह भी था। कॉलेज में प्रवेश करते ही अभूतपूर्व डिजाइन से बनी बिल्डिंग, घास का मैदान, लान टेनिस खेलने का कोर्ट व पूरा परिवेश आकर्षित कर रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">कॉलेज पहुंचने पर सर्वप्रथम तत्कालीन प्रिंसिपल डॉक्टर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585927/first-day-of-job--still-remember-the-friendly-nature-of-seniors"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(15)19.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जीवन में स्मृतियां बहुत बड़ी धरोहर होती है, ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को याद रखने और भूल जाने की शक्ति दी है। अपने इसी याद रखने की शक्ति के अंतर्गत जॉब के पहले दिन की ओर जाता हूं तो मधुर स्मृतियां एक रील की तरह मस्तिष्क पर आ जाती हैं। उहापोह के अनेक प्रश्न थे, साथ ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर बनने का एक विशेष उत्साह भी था। कॉलेज में प्रवेश करते ही अभूतपूर्व डिजाइन से बनी बिल्डिंग, घास का मैदान, लान टेनिस खेलने का कोर्ट व पूरा परिवेश आकर्षित कर रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">कॉलेज पहुंचने पर सर्वप्रथम तत्कालीन प्रिंसिपल डॉक्टर चौहान से भेंट हुई, उनकी आत्मीयता देखते ही बनती थी। दो शब्दों में- सरल और सहज। उनका ये स्वभाव अपनी पूरी सेवा में विस्मृत न कर सका, उनका व्यवहार सदैव मन मस्तिष्क पर छाया रहा, उनके निर्देशानुसार अपनी सभी प्रपत्रों को बड़े बाबू को सौंपा, जिन्होंने स्वागत करते हुए ऑफिस के सभी लोगों से परिचय कराया। राजाओं के कॉलेज की अपनी विशिष्ट परंपराएं होती हैं, जो हर तरफ परिलक्षित हो रही थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">सभी औपचारिकताएं पूरी करने के पश्चात विभाग में पहुंचने पर केवल विभागाध्यक्ष ही नहीं, बल्कि अन्य सहयोगी साथियों से परिचय और बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। शैक्षिक योग्यता, नगर आगमन तथा विभिन्न रुचियों पर चर्चा हुई, कॉलेज के प्रथम दिन से ही जुड़े अर्थशास्त्र विभाग के डॉक्टर रूहेला व जीव विज्ञान के डॉ. सिंह आज भी मेरी स्मृतियों में है, जिन्हें याद करना आवश्यक हैं। इन वरिष्ठ साथियों ने हर स्तर पर मुझे सहयोग किया। महाविद्यालय की सभी गतिविधियों से परिचित कराते हुए मेरे निवास की व्यवस्था की तथा पारिवारिक अपनत्व प्रदान किया। </p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, पहले दिन विभागाध्यक्ष कुछ कक्षाओं में भी लेकर गए और मेरा विधिवत परिचय कराया। छात्र छात्राओं ने खड़े होकर करतल ध्वनि से स्वागत किया। छात्र-छात्राओं का उत्साह देखते ही बनता था...। जॉब के प्रथम दिन लगा ही नहीं कि परिवार से दूर कॉलेज के एक नए वातावरण में आ गया हूं... महाविद्यालय का अभूतपूर्व इतिहास पद्मश्री डॉ जयदेव सिंह, प्राचार्य  के निर्देशन में प्रारंभ हुआ। भारतीय दर्शन व शास्त्रीय संगीत में उनकी विशिष्ट ख्याति थी। उनके द्वारा स्थापित श्रेष्ठ परंपराएं, साथियों का अपनत्व आज भी एक विरासत के रूप में मेरे मस्तिष्क पर विद्यमान है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">डॉ. एससी मिश्र, सेवानिवृत्त प्रवक्ता वाईडी (पीजी) कॉलेज </h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 09:00:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत की विरासत पर बड़ा सवाल: 5000 साल पुरानी सभ्यता के बावजूद राष्ट्रीय धरोहर स्थलों की नई सूची क्यों नहीं?</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत के बावजूद राष्ट्रीय धरोहर स्थलों के व्यापक दस्तावेजीकरण की मांग उठ रही है। लेख में नए सर्वे, 'नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स' और ऐतिहासिक, धार्मिक व प्राकृतिक स्थलों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585983/india-national-heritage-sites-new-register-ayodhya-kashi-mathura"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/muskan-dixit-(35)7.png" alt=""></a><br /><p><strong>अयोध्याः </strong> ऐसा कैसे हो गया कि भारत जैसा देश, जिसका 5000 साल से भी पुराना इतिहास और समृद्ध विरासत रही है, वह धरोहर स्थलों के मामले में अमेरिका जैसे देश से बुरी तरह पिछड़ गया, जिसका कुल इतिहास मुश्किल से तीन सौ साल पुराना है। इस पिछड़ेपन के पीछे की सच्चाई क्या है? जब विकास के आधुनिक संकेतकों जैसे पुल, अस्पताल, स्टेडियम और कल कारखानों की बात हो, तो हमें आश्चर्य नहीं होता। यदि कोई कहे कि हम इन मामलों में अमेरिका जैसे विकसित देशों से बहुत पीछे हैं, लेकिन बात तब हजम नहीं होती, जब कोई कहे कि भारत ऐतिहासिक धरोहर स्थलों के मामले में भी ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। मन में तुरंत सवाल उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है बात बड़ी सीधी है। देश के धरोहर स्थल, जो हमारे चारों ओर बहुतायत में फैले हैं, उन्हें सूचीबद्ध करने का हमने कोई व्यवस्थित प्रयास ही नहीं किया। यह एक बहुत बड़ी विडंबना है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमने कुछ नहीं किया। अंग्रेजों की बनाई सूची को हम किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह पवित्र मानकर बैठ गए। हमने अपनी इतिहास और परंपरा के अनुरूप देश के धरोहर स्थलों की राष्ट्रीय सूची बनाने का प्रयास ही नहीं किया, जब धरोहर स्थलों की सूची की बात आएगी, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि हम अभी भी ब्रिटिश राज में ही जी रहे हैं।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>हनुमानगढ़ी</strong></span></h4>
<p>अयोध्या की प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर 18 वीं शताब्दी में बनाया गया था। इस स्थान का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है। लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो उन्होंने बजरंग बली को अयोध्या की रक्षा करने का आदेश दिया था, तब हनुमानजी एक गुफा में निवास करते थे। बाद में किले के रूप में हनुमानगढ़ी का निर्माण कराया गया। </p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(40)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (40)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>गुलाबबाड़ी और बहू बेगम मकबरा</strong></span></h4>
<p>फैजाबाद स्थित गुलाबबाड़ी का इतिहास भी 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। इसे अवध के तीसरे नवाब ने बनवाया था। यह केवल स्मारक नहीं है, उस समय की उत्कृष्ट स्थापत्य कला, सुसज्जित उद्यान शैली और सांस्कृतिक वैभव का प्रतीक है। इसी तरह बहू बेगम मकबरे का निर्माण 18 वीं शताब्दी में अवध की बेगम उम्मतुज्जोहरा की याद में बनाया गया था। इसे पूरब का ताजमहल कहते हैं। </p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>समकालीन होने के बावजूद सूची में अंतर</strong></span></h4>
<p>हनुमानगढ़ी और गुलाबबाड़ी दोनों लगभग 18 वीं शताब्दी के हैं, लेकिन गुलाबबाड़ी सूची में शामिल है। वहीं हनुमानगढ़ी उस सूची में शामिल नहीं है। ऐसे दर्जनों स्थान हैं, जो सूची में शामिल नहीं हैं।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष से जुड़े स्थानों और स्मारकों की अनदेखी</strong></span></h4>
<p>हल्दीघाटी का मैदान, जहां राणा प्रताप ने अकबर का लोहा लिया, जहां गुरु तेगबहादुर जी ने अपना शीशदान दिया, चमकौर का यह स्थान जहां 40 सिखों ने वीरगति प्राप्त की, ऐसे ही अनगिनत स्थान हैं, जो हर दृष्टि से राष्ट्रीय धरोहर स्थल घोषित किए जाने के योग्य हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि इन्हें राष्ट्रीय धरोहर स्थल का दर्जा नहीं दिया गया है। 1857 की लड़ाई की याद में सैकड़ों स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में हैं, लेकिन ये सभी अंग्रेज सैनिकों के सम्मान में हैं। भारतीय सेनानियों की याद में कुछ ढूंढे भी नहीं मिलता है। फतेहपुर का वह इमली का पेड़, जहां 1858 में अंग्रेजों ने 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटका दिया, झारखंड के वे स्थान जहां तिलका मांझी, सिधो-कान्हू और बिरसा मुंडा ने अपने प्राणों की आहुति दी, बाबू कुंवर सिंह की याद दिलाता उनका खंडहर घर और ऐसे ही अनगिनत स्थानों को हमने अब तक राष्ट्रीय धरोहर स्थल क्यों नहीं माना?</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(36)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (36)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>सूची में उपेक्षित अयोध्या, मथुरा और काशी</strong></span></h4>
<p>अयोध्या, मथुरा और काशी देश के साथ सभ्यता की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन शहरों की विरासत धरोहर स्थलों की सूची को मौजूदगी के सापेक्ष न के बराबर कहा जा सकता है। मथुरा में कुल 44 स्थान हैं। इनमें कुछ मंदिर हैं। वाराणसी में अब कुल 17 स्थान है, लेकिन अयोध्या में केवल छह स्थान इस सूची में शामिल हैं। इनमें तीन टीले पहला मणि पर्वत, कुबेर पर्वत और सुग्रीव पर्वत, दूसरा बेनी खानम का मकबरा, तीसरा गुलाबबाड़ी, चौथा बहू बेगम मकबरा, पांचवा हाजी इकबाल का मकबरा और परिसर और अंतिम शुजाउद्दौला का मकबरा है। अयोध्या आज से नहीं अतीत से मंदिरों की नगरी रही है, जबकि यहां के कई मंदिर कई सौ साल पुराने हैं। श्रीराम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, त्रेता नाथ मंदिर, बड़ी जगह दशरथ महल, राजद्वार, श्री नागेश्वर नाथ, लक्ष्मण मंदिर शेषावतार,रंगमहल, रत्न सिंहासन राजगद्दी, छोटी देवकाली, लक्ष्मण किला, सदगुरू सदन गोलाघाट, हनुमत निवास, हनुमत सदन, तपस्वी जी की छावनी, श्री मणिराम जी की छावनी, कालेराम मंदिर, तुलसीदास जीकी छावनी, तीन कलश तिवारी मंदिर जैसे कई ऐसे मंदिर हैं, जो कई सौ साल से अपनी आभा बिखेर रहे हैं, लेकिन सूची में इनका नामो निशान नहीं है। यह तब है, जब सभ्यता और संस्कृति ने यहीं जन्म लिया, लेकिन अयोध्या का एक भी मंदिर इस सूची में नहीं है। पुरातत्व की दृष्टि इसे उपेक्षित ही नहीं घोर उपेक्षित कहा जा सकता है।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(38)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (38)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>इस्लामी एवं ब्रिटिश स्मारकों को विशेष महत्व</strong></span></h4>
<p>भारत के हजारों साल के इतिहास में इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल की अवधि मुश्किल से एक हजार वर्ष रही। वह भी पूरे भारत में नहीं रही। ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरा भारत सीधे तौर पर इस्लामी या ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया हो। इसके बावजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में अधिकतर स्थान इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल से ही जुड़े हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची पर इस्लामी और ब्रिटिश शासनकाल के अत्यधिक प्रभाव को दर्शाने के लिए बनारस का उदाहरण देखने लायक है। हिंदुओं के इस प्राचीन शहर में पुराने मंदिरों और उनके अवशेषों की भरमार है, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने बनारस के जिन 20 स्थानों को अपनी सूची में शामिल किया है, उसमें एक भी मंदिर नहीं है, जबकि 20 चयनित स्थानों में अंग्रेजों की पांच कब्रगाहें, एक मस्जिद, एक मकबरा और अन्य स्थान शामिल है।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>प्राकृतिक स्थलों को कोई मान्यता नहीं</strong></span></h4>
<p>यूनेस्को ने जिन विश्व धरोहर स्थलों की सूची बनाई है, उनमें विशिष्ट प्राकृतिक स्थलों जैसे उत्तराखंड में फूलों की घाटी के साथ-साथ बंगाल, असम और राजस्थान के अभयारण्य शामिल किए गए हैं, लेकिन हमने ऐसी कोई राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर सूची नहीं बनाई, जिनमें विशिष्ट जलस्रोतों, वनों, पर्वतों एवं अन्य महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थलों को शामिल किया गया हो। जब केवल ईंट और पत्थर से बने स्मारकों को महत्व दिया जाएगा, तब भारत के वनाच्छादित क्षेत्र जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्य पिछड़ जाएंगे, लेकिन प्राकृतिक धरोहर स्थलों के मामले में ये राज्य अन्य राज्यों से बहुत आगे साबित होंगे।</p>
<h4><strong><span style="color:rgb(224,62,45);">परंपरा का प्रतिनिधित्व की आवश्यकता</span></strong></h4>
<p>जितनी समस्याओं का जिक्र किया गया है, उनका समाधान बड़ा सीधा है। वास्तव में हमें अपने धरोहर स्थलों की एक बिल्कुल नई सूची तैयार करनी होगी, एक ऐसी सूची जो हमारे इतिहास और हमारी परंपरा का सही मायने में प्रतिनिधित्व करे। इस सूची में उन सभी स्थानों और स्मारकों को शामिल किया जाना चाहिए, जो हमें अपनी प्राचीन सभ्यता से जोड़कर रखने में मदद करते हों। इस नई सूची के कई फायदे हैं। मसलन हमारी राष्ट्रीय पहचान मजबूत होगी। इनके संरक्षण में मदद मिलेगी। उनकी निगरानी संभव बनेगी। पर्यटन को भरपूर प्रोत्साहन मिलेगा। इतिहास को विकृत करने के प्रयास कमजोर होंगे। लोग समझदार और सहनशील होंगे। </p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(41)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (41)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>मान्यताओं से जुड़े स्थानों का कोई स्थान नहीं</strong></span></h4>
<p>भारत के चप्पे-चप्पे से ऋषि-मुनियों एवं पौराणिक पात्रों का जुड़ाव रहा है। अति प्राचीन होने के कारण इस जुड़ाव को साबित करने के लिए किसी प्राचीन इमारत के अवशेष प्रायः नहीं मिलते, लेकिन लोक परंपरा में रखा है। यदि इमारत को छोड़ दें, तो ऐसे कई बातें हैं, जिनसे इन स्थानों की प्राचीनता सिद्ध होती है। कर्नाटक में कोप्पल जिले में स्थित किष्किंधा पर्वत, हरियाणा में कुरुक्षेत्र का युद्ध स्थल, अयोध्या में रामजन्मभूमि, मथुरा में गोवर्धन पर्वत, आजमगढ़ में दुर्वासा ऋषि का आश्रम ऐसे न जाने कितने स्थान हैं, जिन्हें हम अपनी धरोहर का अटूट हिस्सा मानते हैं। दुर्भाग्य वश इन्हें हमारे राष्ट्रीय धरोहर स्थलों की सूची में शामिल नहीं किया गया है।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>राष्ट्रीय स्मारक तथा पुरावशेष मिशन</strong></span></h4>
<p>इस पर काम करने के लिए साल 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राष्ट्रीय स्मारक तथा पुरावशेष मिशन के गठन का निर्देश दिया। साल 2007 में गठित हुआ। 2012 में पूरा काम करने के लिए कहा गया, लेकिन मिशन अपना काम पूरा नहीं कर पाया।  </p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>काशी में दो हजार से ज्यादा धरोहर स्थल चिह्नित</strong></span></h4>
<p>दिल्ली के रहने वाले विमल कुमार सिंह ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के साथ मिलकर काशी में एक पायलट प्रोजेक्ट पर काम किया। नौ साल में पूरे हुए इस प्रोजेक्ट के तहत काशी में दो हजार से ज्यादा धरोहर स्थलों को चिंहित किया गया।</p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स की जरूरत</strong></span></h4>
<p>अपने पायलट प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद देश की धरोहरों को सहेजने के लिए विमल कुमार सिंह ने नेशनल रजिस्टर ऑफ हेरिटेज साइट्स की जरूरत बताई। यह रजिस्टर भारत के समृद्ध इतिहास और परंपरा को सही अर्थो में अभिव्यक्ति प्रदान करे।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/muskan-dixit-(37)7.png" alt="MUSKAN DIXIT (37)" width="1280" height="720"></img></p>
<h4><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>धरोहर स्थल की विस्तृत परिभाषा की जरूरत</strong></span></h4>
<p>पायलट प्रोजेक्ट के बाद विमल कुमार सिंह ने धरोहर स्थल की विस्तृत परिभाषा की जरूरत महसूस की। उन्होंने अपने मंतव्य  में कहा कि धरोहर स्थलों की हमें एक ऐसी परिभाषा पर सहमत होना चाहिए, जो एक सनातन सभ्यता के रूप में हमारे अस्तित्व को आधार प्रदान करे। इसके लिए हमें अंग्रेजों की बनाई संकुचित परिभाषा से बाहर निकलना चाहिए। एक स्वतंत्र देश और एक प्राचीन सभ्यता के वारिस के रूप में हमें धरोहर स्थल के रूप में ऐसे स्थानों को स्वीकार करना चाहिए।</p>
<p>-वे सभी स्थान या स्मारक, जिन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है। हमें किसी चयनित स्थान को सूची से हटाने की जरूरत नहीं है।</p>
<p>-वे सभी स्थान या स्मारक, जिन्हें राज्य सरकारों ने राज्य द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया है।</p>
<p>-वे स्थान जो किसी प्रमुख ऐतिहासिक घटना जैसे युद्ध या किसी विशिष्ट आयोजन आदि के गवाह रहे हैं। जैसे हल्दी घाटी का मैदान, फतेहाबाद का वह ईमली का पेड़, जहां 52 स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई आदि।</p>
<p>-लोक स्मृति से जुड़े स्थान, जिनका संबंध किसी पौराणिक घटना या व्यक्ति से बताया जाता है। जैसे किष्किंधा पर्वत जहां राम और सुग्रीव के बीच मित्रता हुई थी, कुरुक्षेत्र जहां महाभारत का युद्ध हुआ था आदि। जिन स्थानों पर लोग पारंपरिक रूप से निश्चित तिथि में मेला लगाकर या कोई उत्सव मनाकर इकट्ठा होते हैं, उन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।</p>
<p>-कोई भी स्मारक या ढांचा, जो हमारे इतिहास की किसी प्रमुख घटना, व्यक्ति या कालखंड से जुड़ा रहा है या जो अतीत की किसी कला शिल्प या जीवनशैली को समझने में मदद करता हो।</p>
<p>-सौ साल के भीतर बना हुआ कोई ढांचा या स्मारक, जिसका निर्माण किसी प्राचीन पद्धति से किया गया हो या जो अपनी असाधारण विशिष्टता के कारण स्थान विशेष की पहचान का हिस्सा बन गया हो। इस श्रेणी में हम दिल्ली स्थित अक्षरधाम, बिड़ला मंदिर आदि को भी एक धरोहर स्थल मान सकते हैं।</p>
<p>-विशिष्ट प्राकृतिक या भौगोलिक स्थान, जो सैकड़ों वर्ष से अस्तित्व में हैं और अपने आप में दुर्लभ है।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/chatgpt-image-jun-28,-2026,-04_39_34-pm.png" alt="muskan dixit" width="1536" height="1024"></img></p>
<h4><strong><span style="color:rgb(224,62,45);">प्रधानमंत्री को सौंपा पत्र</span></strong></h4>
<p>पायलट प्रोजेक्ट करने वाले विमल कुमार सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने बताया कि दुनिया के सभी सभ्य देश अपने धरोहर स्थलों की आधिकारिक सूची बनाते हैं। यह सूची उनकी सांस्कृतिक पहचान को एक औपचारिक स्वरूप और गरिमा प्रदान करती है। इसलिए भारत के धरोहर स्थलों को सहेजने के लिए नए सिरे से सर्वे के साथ गंभीर काम की आवश्यकता बताई।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/585890/-isro-semi-cryogenic-engine-hot-test-175-ton-thrust-lvm3-upgrade"><span class="t-red">ISRO ने रचा नया कीर्तिमान: </span>सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का हाई थ्रस्ट हॉट टेस्ट सफल, अंतरिक्ष मिशनों को मिलेगी नई ताकत</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पॉजिटिव स्टोरीज</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>अयोध्या</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>यूरेका</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/585983/india-national-heritage-sites-new-register-ayodhya-kashi-mathura</link>
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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 16:47:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हूल आंदोलन आदिवासी अस्मिता का प्रतीक </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">झारखंड में 1855 का ‘संथाल हूल’ (संथाल विद्रोह) भारतीय इतिहास की एक ऐसी क्रांतिकारी घटना है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही गहरी है, जितनी ब्रिटिश काल में थी। यह केवल एक विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, सामाजिक न्याय और आदिवासी स्वाभिमान की रक्षा का व्यापक आंदोलन था। ‘हूल’ का अर्थ है- विद्रोह या क्रांति। यह शब्द संथाल समुदाय द्वारा अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक बन गया। इतिहासकार वाल्टर हॉउजर ने अपनी पुस्तक ‘द संथाल्स एंड द राज’ में इसे ब्रिटिश नीतियों और आर्थिक शोषण के विरुद्ध हक की लड़ाई बताया है। यह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585894/hul-movement-symbol-of-tribal-identity"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(83).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">झारखंड में 1855 का ‘संथाल हूल’ (संथाल विद्रोह) भारतीय इतिहास की एक ऐसी क्रांतिकारी घटना है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही गहरी है, जितनी ब्रिटिश काल में थी। यह केवल एक विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, सामाजिक न्याय और आदिवासी स्वाभिमान की रक्षा का व्यापक आंदोलन था। ‘हूल’ का अर्थ है- विद्रोह या क्रांति। यह शब्द संथाल समुदाय द्वारा अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक बन गया। इतिहासकार वाल्टर हॉउजर ने अपनी पुस्तक ‘द संथाल्स एंड द राज’ में इसे ब्रिटिश नीतियों और आर्थिक शोषण के विरुद्ध हक की लड़ाई बताया है। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहला व्यापक और संगठित आदिवासी सशस्त्र विद्रोह माना जाता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">विद्रोह की पृष्ठभूमि</h4>
<p style="text-align:justify;">अंग्रेजों के आगमन के बाद जमींदारी व्यवस्था और साहूकारी प्रथा ने आदिवासी समाज का जीवन संकट में डाल दिया। संथालों की जमीनें छीनी जाने लगीं, उन पर भारी कर लगाए गए और ऊंची ब्याज दरों पर ऋण देकर उन्हें कर्ज के जाल में फंसाया गया। कर्ज न चुका पाने की स्थिति में उनकी जमीनें जब्त कर ली जाती थीं और उन्हें बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर किया जाता था। महाजन, जमींदार और सरकारी अमला मिलकर आदिवासियों का आर्थिक और सामाजिक शोषण कर रहे थे। इससे उनकी पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा था। यही परिस्थितियां धीरे-धीरे एक बड़े जनविद्रोह की भूमि तैयार कर रही थीं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">सिद्धू-कान्हू के नेतृत्व में क्रांति की शुरुआत</h4>
<p style="text-align:justify;">30 जून 1855 को वर्तमान झारखंड के साहेबगंज जिले के भगनाडीह गांव में सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव मुर्मू के नेतृत्व में लगभग 50 हजार आदिवासी एकत्र हुए। इनके साथ वीरांगनाएं फूलो और झानो भी आंदोलन की प्रमुख प्रेरक शक्ति थीं। सभा में घोषणा की गई कि अब अंग्रेजी शासन और मालगुजारी स्वीकार नहीं की जाएगी। सिद्धू-कान्हू ने "करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो" का उद्घोष किया। यह नारा महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से लगभग 87 वर्ष पहले दिया गया था। संथालों के बीच यह विश्वास फैलाया गया कि 'बोंगा' देवता ने उन्हें अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े होने का संदेश दिया है। डुगडुगी और साल वृक्ष की टहनियों के माध्यम से यह संदेश गांव-गांव पहुंचाया गया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">विद्रोह का विस्तार और अंग्रेजों की चुनौती</h4>
<p style="text-align:justify;">'हुल! हुल!' के नारों के साथ हजारों संथाल युवकों ने महाजनों, जमींदारों और अंग्रेजी प्रशासन के प्रतीकों पर हमला शुरू कर दिया। देखते ही देखते यह आंदोलन साहेबगंज, पाकुड़, भागलपुर, बीरभूम, हजारीबाग और बंगाल के अनेक क्षेत्रों तक फैल गया। विद्रोहियों ने रेलवे निर्माण, डाक व्यवस्था और टेलीग्राफ लाइनों को नुकसान पहुंचाया। कई स्थानों पर अंग्रेजी प्रशासन लगभग समाप्त हो गया। प्रारंभ में अंग्रेज इस आंदोलन की व्यापकता का अनुमान नहीं लगा सके और उन्हें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हालांकि बाद में अंग्रेजों ने बड़ी सैन्य टुकड़ियां भेजीं। आधुनिक हथियारों से लैस सेना के सामने संथालों के पारंपरिक धनुष-बाण और भाले टिक नहीं सके, लेकिन उन्होंने अद्भुत साहस और वीरता का परिचय दिया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">बलिदान और दमन की कहानी</h4>
<p style="text-align:justify;">विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार ने कठोर दमनचक्र चलाया। हजारों आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया और गांवों पर गोलियां बरसाई गईं। इतिहासकारों के अनुसार लगभग 20 हजार आदिवासी इस संघर्ष में शहीद हुए। चांद और भैरव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में विश्वासघात के कारण सिद्धू और कान्हू को गिरफ्तार कर लिया गया। 26 जुलाई 1855 को भगनाडीह में उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। लेकिन उनके बलिदान ने आदिवासी प्रतिरोध की ऐसी ज्योति जलाई जो आज भी प्रज्वलित है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">संथाल हूल की विरासत</h4>
<p style="text-align:justify;">संथाल विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को आदिवासी समस्याओं पर ध्यान देने के लिए बाध्य किया। इसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक सुधार किए गए और आगे चलकर संथाल परगना क्षेत्र के लिए विशेष कानूनी प्रावधान लागू किए गए। संथाल परगना काश्तकारी कानूनों ने आदिवासी भूमि की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह आंदोलन आगे चलकर बिरसा मुंडा के उलगुलान सहित अनेक आदिवासी आंदोलनों की प्रेरणा बना।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आज के समय में प्रासंगिकता</h4>
<p style="text-align:justify;">संथाल हूल केवल अतीत की घटना नहीं है, बल्कि वर्तमान समय के लिए भी एक जीवंत संदेश है। आज जब विकास परियोजनाओं, खनन और औद्योगीकरण के कारण जल, जंगल और जमीन पर संकट बढ़ रहा है, तब यह आंदोलन प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और सामुदायिक अधिकारों के संरक्षण की प्रेरणा देता है। आदिवासी पहचान, सरना धर्म कोड, भूमि अधिकार, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े वर्तमान आंदोलनों में भी संथाल हूल की चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। यह संघर्ष हमें याद दिलाता है कि अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित प्रतिरोध और सामाजिक एकता कितनी महत्वपूर्ण होती है। संथाल हूल वास्तव में केवल एक ऐतिहासिक विद्रोह नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, स्वाभिमान और न्याय की वह अमर गाथा है जिसने भारतीय इतिहास में आदिवासी अस्मिता को नई पहचान प्रदान की।</p>
<h5 style="text-align:justify;">– कुमार कृष्णन</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 13:22:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इतिहास को इतिहास ही रहने दिया जाय!</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">इतिहास में उन्हीं को याद रखा जाता है, जो विजयी होते हैं। सिकंदर, चंद्रगुप्त मौर्य, मुस्लिम शासक या अंग्रेज सभी को उनकी विजयों के कारण इतिहास में प्रमुख स्थान मिला। हालांकि कुछ पराजित या आंशिक रूप से सफल व्यक्तित्व भी इतिहास में सम्मान पाते हैं, जैसे पोरस, छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप। किंतु भावनाओं के आधार पर इतिहास का मूल्यांकन करना उचित नहीं माना जा सकता। इतिहास को नई दृष्टि से देखने का प्रयास स्वागतयोग्य है, परंतु इसका अर्थ इतिहास को मनचाहे ढंग से पुनर्लेखित करना नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">महाराणा प्रताप निस्संदेह भारतीय इतिहास के सम्मानित पात्र हैं, किंतु यह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585296/let-history-remain-history"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(33)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इतिहास में उन्हीं को याद रखा जाता है, जो विजयी होते हैं। सिकंदर, चंद्रगुप्त मौर्य, मुस्लिम शासक या अंग्रेज सभी को उनकी विजयों के कारण इतिहास में प्रमुख स्थान मिला। हालांकि कुछ पराजित या आंशिक रूप से सफल व्यक्तित्व भी इतिहास में सम्मान पाते हैं, जैसे पोरस, छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप। किंतु भावनाओं के आधार पर इतिहास का मूल्यांकन करना उचित नहीं माना जा सकता। इतिहास को नई दृष्टि से देखने का प्रयास स्वागतयोग्य है, परंतु इसका अर्थ इतिहास को मनचाहे ढंग से पुनर्लेखित करना नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">महाराणा प्रताप निस्संदेह भारतीय इतिहास के सम्मानित पात्र हैं, किंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि वे मेवाड़ के शासक थे, समूचे राजपूताना के नहीं। उस समय विभिन्न राजपूत राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष भी मौजूद थे। उनके पिता उदय सिंह को अकबर के हाथों चित्तौड़ गंवाना पड़ा था और उनसे पहले राणा सांगा भी बाबर से पराजित हुए थे। ऐसे में अकबर की इच्छा थी कि महाराणा प्रताप भी अन्य राजपूत शासकों की तरह उसकी अधीनता स्वीकार कर लें,  लेकिन प्रताप ने ऐसा नहीं किया और परिणामस्वरूप संघर्ष अपरिहार्य हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">1576 में हल्दीघाटी के निकट रक्त तलाई में हुए युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे। युद्ध के बाद महाराणा प्रताप को रणक्षेत्र छोड़ना पड़ा। हालांकि वे न तो पकड़े गए और न ही मारे गए। झाला बीदा के बलिदान के कारण वे सुरक्षित निकलने में सफल रहे और बाद के वर्षों में छापामार युद्ध जारी रखते रहे। किंतु इससे यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि हल्दीघाटी का युद्ध उन्होंने जीत लिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इधर कुछ शोधों और व्याख्याओं के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है कि हल्दीघाटी में विजय महाराणा प्रताप की हुई थी। तर्क दिया जाता है कि मुगल सेना प्रताप को जीवित या मृत पकड़ नहीं सकी तथा युद्ध के बाद मानसिंह को अकबर की नाराजगी झेलनी पड़ी। किंतु ये तथ्य अपने आप में निर्णायक प्रमाण नहीं बनते। किसी शासक का बच निकलना और अपेक्षित परिणाम न मिलने पर सम्राट का असंतुष्ट होना, युद्ध की विजय-पराजय का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार महाराणा प्रताप के नाम पर भूमि-पट्टों का जारी होना भी उनके प्रभाव और अस्तित्व का प्रमाण हो सकता है, लेकिन इससे युद्ध में उनकी विजय स्वतः सिद्ध नहीं होती। इतिहास का मूल्यांकन तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए, न कि भावनाओं या पूर्वाग्रहों के आधार पर। इतिहास बदलने से अधिक आवश्यक है इतिहास से सीख लेना, ताकि भविष्य में वही गलतियां दोहराई न जाएं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कार्तिकेय शुक्ल, शोधच्छात्र</h4>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 10:00:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> जॉब का पहला दिन : जब मिला जीवन का उद्देश्य </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">20 जुलाई 2010, मंगलवार का दिन मेरे जीवन का ऐसा यादगार दिन है, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। इसी दिन मैंने शिक्षा क्षेत्र तारुन, जनपद अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) के प्राथमिक विद्यालय पचगवां में सहायक अध्यापक के रूप में अपनी पहली नियुक्ति ग्रहण की थी। वर्षों की पढ़ाई, संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद नियुक्ति पत्र हाथ में आने पर ऐसा लगा जैसे मेरे सपनों को पंख लग गए हों। विद्यालय के पहले दिन मन में उत्साह के साथ-साथ एक अनजाना भय भी था। ईश्वर का स्मरण करते हुए जब विद्यालय परिसर में प्रवेश किया, तो बच्चों की उत्सुक निगाहें मेरी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585294/first-day-on-the-job"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(32)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">20 जुलाई 2010, मंगलवार का दिन मेरे जीवन का ऐसा यादगार दिन है, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। इसी दिन मैंने शिक्षा क्षेत्र तारुन, जनपद अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) के प्राथमिक विद्यालय पचगवां में सहायक अध्यापक के रूप में अपनी पहली नियुक्ति ग्रहण की थी। वर्षों की पढ़ाई, संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद नियुक्ति पत्र हाथ में आने पर ऐसा लगा जैसे मेरे सपनों को पंख लग गए हों। विद्यालय के पहले दिन मन में उत्साह के साथ-साथ एक अनजाना भय भी था। ईश्वर का स्मरण करते हुए जब विद्यालय परिसर में प्रवेश किया, तो बच्चों की उत्सुक निगाहें मेरी ओर उठीं। प्रधानाध्यापक और सहकर्मियों ने आत्मीयता से स्वागत किया, जिससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। इसके बाद मैं बच्चों को पढ़ाने के लिए कक्षा में पहुंचा।</p>
<p style="text-align:justify;">उसी दिन की एक घटना आज भी मेरे मन में ताजा है। कक्षा में प्रवेश करते ही एक नन्हा बालक खड़ा हुआ और बोला, “गुरुजी, अब आप रोज पढ़ावै अऊबा न...?” उसके इस सरल प्रश्न में विश्वास, अपनापन और उम्मीद का जो भाव था, उसने मुझे भीतर तक छू लिया। उसी क्षण मुझे महसूस हुआ कि शिक्षक का कार्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि बच्चों के सपनों और उनके भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी भी है। उस दिन विद्यालय से लौटते समय मन में अपार संतोष था।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों को पढ़ाने, उनके सवालों का जवाब देने और उनके साथ बिताए गए समय ने मुझे यह एहसास कराया कि मुझे जीवन का उद्देश्य मिल गया है। इसके बाद प्रतिदिन विद्यालय जाना, बच्चों को पढ़ाना और उनके साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में शामिल होना मेरे जीवन की सबसे सुखद आदत बन गई।  आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो 20 जुलाई 2010 केवल नौकरी का पहला दिन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की मेरी यात्रा का पहला महत्वपूर्ण कदम प्रतीत होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिव शंकर सोनी, सहायक अध्यापक, अयोध्या</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 10:00:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> संस्मरण :  ज्ञान और कौशल </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ज्ञान, कौशल और जीवन मूल्यों को आत्मसात करने की प्रक्रिया को समेकित रूप से शिक्षा कहा जा सकता है। एक शिक्षित व्यक्ति के लिए अपनी योग्यता के अनुरूप कार्य प्राप्त करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। वर्ष 2004 के अक्टूबर माह में मैंने शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं प्रारंभ कीं। शिक्षण कार्य के पहले दिन मन में अनेक जिज्ञासाएं और उत्सुकताएं थीं। यह संकल्प था कि विद्यार्थियों को बेहतर से बेहतर शिक्षा दूंगा और विषय को इस प्रकार समझाऊंगा कि वे उसे सहजता से ग्रहण कर सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">विद्यालय में जॉइनिंग के पहले ही दिन संस्था</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585293/reminiscence--knowledge-and-skills"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(31)10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ज्ञान, कौशल और जीवन मूल्यों को आत्मसात करने की प्रक्रिया को समेकित रूप से शिक्षा कहा जा सकता है। एक शिक्षित व्यक्ति के लिए अपनी योग्यता के अनुरूप कार्य प्राप्त करना भी एक बड़ी चुनौती होती है। वर्ष 2004 के अक्टूबर माह में मैंने शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं प्रारंभ कीं। शिक्षण कार्य के पहले दिन मन में अनेक जिज्ञासाएं और उत्सुकताएं थीं। यह संकल्प था कि विद्यार्थियों को बेहतर से बेहतर शिक्षा दूंगा और विषय को इस प्रकार समझाऊंगा कि वे उसे सहजता से ग्रहण कर सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">विद्यालय में जॉइनिंग के पहले ही दिन संस्था प्रधान ने मुझे तीन कक्षाएं पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी। गांधी स्मारक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मेरा पहला दिन विद्यार्थियों और स्टाफ के साथ उत्साहपूर्ण वातावरण में बीता। नई-नई पुस्तकों का अध्ययन कर विभिन्न विषयों को बच्चों को पढ़ाना मुझे हमेशा अच्छा लगता रहा, क्योंकि इससे विद्यार्थियों के साथ-साथ मेरा स्वयं का स्वाध्याय भी होता था। स्कूली जीवन में अनुशासन और संस्कारों का विशेष महत्व रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">विद्यार्थी जीवन के अनेक संस्मरण आज भी याद आते हैं तो चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कक्षा सात में मैंने साइकिल चलाना सीखा, जबकि घर में पिताजी के पास राजदूत मोटरसाइकिल थी। कई बार गिरने और घुटने छिलने के बाद भी सीखने का संतोष अलग ही था। मोटरसाइकिल चलाना मैंने नौकरी में आने के बाद सीखा। वह समय इंटरनेट की आभासी दुनिया से बिल्कुल अलग था। लोगों के पास एक-दूसरे के लिए पर्याप्त समय होता था।</p>
<p style="text-align:justify;">कैरम, शतरंज, लूडो, चोर-सिपाही, गिल्ली-डंडा और कंचे जैसे खेल बच्चों के जीवन का हिस्सा थे। मुझे बचपन से कंचा और शतरंज खेलने का विशेष शौक रहा है। आज भी अवसर मिलने पर परिवार के साथ शतरंज खेल लेता हूं। खेल के दौरान पुराने संस्मरण याद आते हैं और अनायास ही हंसी छूट पड़ती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">डॉ. सौरभ दीक्षित, जीवन, ज्ञान और कौशल, प्रधानाचार्य, गांधी स्मारक माध्यमिक विद्यालय</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 10:42:25 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Happy Father's Day: मां की तरह 'बहलाता' नहीं, गलतियों पर 'कूटता' है पिता... क्योंकि वह आपको खुद से आगे देखना चाहता है!</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नीरज मिश्र, लखनऊ, </strong><span style="font-family:NewswrapWeb;"><strong>अमृत विचार:</strong> पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है। पिता धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है। पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ति है। पिता रक्त में दिये हुए संस्कारों की मूर्ति है। पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है। पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है। जब मन द्रवित होता है तो पंडित ओम व्यास की यह कविता एक ''संबल'' दे जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;">रविवार को पिता दिवस मनाया जाएगा। पश्चिमी संस्कृति से जुड़े लोग भले ही सोशल मीडिया पर ''हैप्पी फादर्स डे'' बोल अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें लेकिन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585334/happy-fathers-day-father-does-not-console-you-like-a"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/muskan-dixit-(21)5.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नीरज मिश्र, लखनऊ, </strong><span style="font-family:NewswrapWeb;"><strong>अमृत विचार:</strong> पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है। पिता धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है। पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार की पूर्ति है। पिता रक्त में दिये हुए संस्कारों की मूर्ति है। पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है। पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है। जब मन द्रवित होता है तो पंडित ओम व्यास की यह कविता एक ''संबल'' दे जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;">रविवार को पिता दिवस मनाया जाएगा। पश्चिमी संस्कृति से जुड़े लोग भले ही सोशल मीडिया पर ''हैप्पी फादर्स डे'' बोल अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लें लेकिन भारत में पिता एक बहुत बड़ी और मजबूत शख्सियत का नाम है। पिता ने बच्चे की आवश्यकताओं के लिए कभी हारना नहीं सीखा।</p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-family:NewswrapWeb;">जरा सोचिए! पिता के वचन की लाज रखने के लिए ही तो राम ने 14 बरस जंगल में गुजार दिये। दरअसल पिता अनुशासन का पाठ होता है। पूरी जिन्दगी खुद को अनुशासन के आवरण में ढांपकर जिंदगी को जीता रहता है... बच्चे का भविष्य बनाते-बनाते उसकी खुद की रौनक गायब हो जाती है। पर उसे परवाह नहीं रहती। बच्चे का भविष्य संवारते-संवारते वह कब बूढ़ा हो जाता है, यह भी नहीं जान पाता। जब वह बच्चे को समाज में स्थापित कर लेता है तो कमजोर और बूढ़ी काया वाला पिता हिमालय सा मजबूत होकर खड़ा हो जाता है।</span></p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong><span style="font-family:NewswrapWeb;">मां की तरह ''बहलाता'' नहीं ''कूटता'' ज्यादा है</span></strong></h4>
<p style="text-align:justify;">पिता गलतियों पर ''कूटता'' ज्यादा ''दुलराता'' कम है। वो मां की तरह बहलाता नहीं क्योंकि पिता बच्चे को खुद से आगे देखना चाहता है। पिता कैसे भी रह ले इसकी उसे कभी चिंता नहीं होती लेकिन बच्चे को अच्छे से अच्छा लाकर देने की कोशिश में उसकी उम्र निकल जाती है। वो हमेशा इस बात की कोशिश में रहता है कि अपने साथियों के बीच उसका बच्चा कभी हीन भावना के साथ न बैठे। इसी वजह से वह कभी पीछे नहीं हटता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>घर से अनुपस्थिति में भी रहती है बच्चे पर नजर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><span><span style="font-family:NewswrapWeb;">घर में दिन भर की उसकी अनुपस्थिति का मतलब यह नहीं कि बच्चे पर उसकी नजर नहीं, वो अपने बच्चे की बेहतरी के लिए ही खुद को गला रहा होता है। बच्चे की जरूरतों की खातिर वो कोल्हू के बैल सा खट रहा होता है। बच्चों की गल्तियों पर वह डांटता है, कई बार मारता है, बच्चों के सामने हमेशा वज्र जैसा बना रहता है, प्यार कम डराता ज्यादा है क्योंकि वो जानता है कि बच्चा प्यार से नहीं डर से ही आगे बढ़ेगा। बच्चे को खुद से आगे निकालना ही उसका मकसद होता है। वो कभी इस बात की चिंता नहीं करता है कि उसका बच्चा उसके बारे में क्या सोचता है। पिता जब तक रहता है तब तक उसके बारे में बच्चा समझ नहीं पाता लेकिन जब वो चला जाता है तब भीगी आंखों के साथ उसके मुंह से निकल ही जाता है कि पिता नहीं होता तो वो भी कुछ नहीं होता...पिता है तभी वो भी ...।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पॉजिटिव स्टोरीज</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 12:13:21 +0530</pubDate>
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