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                <title>शब्द रंग - Amrit Vichar</title>
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                <title>लुप्त होने की कगार पर भोज वृक्ष</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">उच्च हिमालयी क्षेत्र में चीड़ और देवदार का साम्राज्य जहां समाप्त होता है, वहीं से भोज वृक्षों की दुनिया शुरू होती है, लेकिन आज जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक दोहन, वनों की कटाई के कारण ये विलुप्त होने के कगार पर है। हिमालय में पर्यटन का दबाव और चरागाहों का दायरा बढ़ना भी एक कारण है। उत्तराखंड और हिमाचल में धीरे-धीरे भोज पत्र के जंगल सिमटते जा रहे हैं। भोज वृक्ष हिमालय में 4500 मीटर तक की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह ठंडे वातावरण में उगने वाला पतझड़ी वृक्ष है, जो लगभग 20 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। इस वृक्ष</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591517/-bhoj-tree-verge-extinction"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/bhoj-tree.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उच्च हिमालयी क्षेत्र में चीड़ और देवदार का साम्राज्य जहां समाप्त होता है, वहीं से भोज वृक्षों की दुनिया शुरू होती है, लेकिन आज जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक दोहन, वनों की कटाई के कारण ये विलुप्त होने के कगार पर है। हिमालय में पर्यटन का दबाव और चरागाहों का दायरा बढ़ना भी एक कारण है। उत्तराखंड और हिमाचल में धीरे-धीरे भोज पत्र के जंगल सिमटते जा रहे हैं। भोज वृक्ष हिमालय में 4500 मीटर तक की ऊंचाई पर पाया जाता है। यह ठंडे वातावरण में उगने वाला पतझड़ी वृक्ष है, जो लगभग 20 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। इस वृक्ष की छाल सर्दियों में पतली परतों के रूप में निकलने लगती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भोज वृक्ष को अंग्रेजी में हिमालय बर्च और विज्ञान की भाषा में बैटूला यूटिलिस कहा जाता है।  कहां जाता है कि भोजपत्र का उपयोग प्राचीन काल में कागज के रूप में किया जाता था, लेकिन तंत्र साधना से लेकर प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथों के संग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका रखने वाला भोज वृक्ष आज दुर्लभ प्रजाति की श्रेणी में  शामिल हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">कागज की खोज से पहले हमारे देश में लिखने का काम भोजपत्र पर ही किया जाता था। आज भी देश के कई संग्रहालयों में भोजपत्र पर लिखी गई सैकड़ों पांडुलिपियां सुरक्षित रखी हैं। महाकवि कालिदास ने अपनी कृतियों में भोजपत्र का उल्लेख कई जगहों पर किया है। उनकी कृति कुमारसंभवम में तो भोजपत्र को वस्त्र के रूप में उपयोग करने का जिक्र भी है। ऋषि मुनि अपनी रचनाओं को भोजपत्र की कागजनुमा छाल में लिखा करते थे, लेकिन आज भोज पत्र के जंगल के किनारे रहने वाले गांव के लोग इनका उपयोग घर की छतों, बिछौनों, पकवान के आवरणों और चुल्हों को सुलगाने में करते हैं। गांव वाले इनकी अहमियत को नहीं समझते, इसीलिए आज उनकी संख्या गिनी चुनी रह गई है। </p>
<p style="text-align:justify;">उत्तराखंड में भोजवासा, मद्महेश्वर और गंगोत्री के ऊपरी इलाकों मे ही कुछ स्थान पर भोज वृक्ष बचे हैं। गंगोत्री धाम के रास्ते में 14 किलोमीटर पहले भोजवासा आता है। भोज वृक्षों की अधिकता के कारण इस जगह का नाम भोजवासा पड़ा है। यहां आने वाले यात्री भोज वृक्षों की छाल को जबरदस्ती निकालकर ले जाते हैं। इससे भी इन पेड़ों को नुकसान पहुंचता है। आज गंगोत्री के रास्ते में गिने-चुने पेड़ ही देखे जा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ समय पहले उत्तराखंड में इन पेड़ों को बचाने के लिए  ‘सेव भोजपत्र’ आंदोलन भी चलाया गया। प्राचीन युग में भोजपत्र अनेक ऊंचे क्षेत्रों के लोगों में ओढ़ने बिछाने के लिए भी प्रयुक्त होता था। भोजपत्र की छाल लपेटकर एक आदमी न केवल छुप सकता था, बल्कि कपड़ों या बिछौनों के अभाव में उसे अनेक प्रकार से प्रयोग में भी ला सकता था।  </p>
<p style="text-align:justify;">मनुष्य ज्यों-ज्यों देवदार के साम्राज्य में हस्तक्षेप करता जा रहा है, त्यों-त्यों भोजपत्र का मजबूत आधार कमजोर हो रहा है। प्रदूषण तो कारण है ही। हरियाली के निकट निरंतर बढ़ रही मशीन सभी प्रकार के पेड़ों को नुकसान पहुंचा रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि विकास के नाम पर जिस तरह प्रकृति का अवैज्ञानिक दोहन हो रहा है, यह हिमालय की जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इस कथित विकास के चलते ग्लेशियर पीछे खिसकते जा रहे हैं, स्नो लाइन कम होती जा रही है और उच्च हिमालयी क्षेत्र में होने वाली वनस्पति तथा पेड़ समाप्ति के कगार पर है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">दीपक नौगांई, लेखक</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 12:00:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title> नैन्सी ग्रेस:  खगोल विज्ञान की अग्रदूत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विज्ञान के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जिनके योगदान से पूरी दुनिया का ज्ञान-विज्ञान नई दिशा प्राप्त करता है। नैन्सी ग्रेस रोमन ऐसी ही एक महान खगोलविद् थीं, जिन्हें आधुनिक अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने न केवल नासा में खगोल विज्ञान कार्यक्रमों की नींव रखी, बल्कि विश्व प्रसिद्ध हबल स्पेस टेलिस्कोप की परिकल्पना को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण उन्हें ‘मदर ऑफ हबल’ कहा जाता है। उनके सम्मान में नासा ने अपनी अगली पीढ़ी की अंतरिक्ष वेधशाला का नाम ‘नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप’ रखा है, जो उनके असाधारण वैज्ञानिक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591498/nancy-grace-pioneer-astronomy"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/nancy-grace.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विज्ञान के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जिनके योगदान से पूरी दुनिया का ज्ञान-विज्ञान नई दिशा प्राप्त करता है। नैन्सी ग्रेस रोमन ऐसी ही एक महान खगोलविद् थीं, जिन्हें आधुनिक अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने न केवल नासा में खगोल विज्ञान कार्यक्रमों की नींव रखी, बल्कि विश्व प्रसिद्ध हबल स्पेस टेलिस्कोप की परिकल्पना को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी कारण उन्हें ‘मदर ऑफ हबल’ कहा जाता है। उनके सम्मान में नासा ने अपनी अगली पीढ़ी की अंतरिक्ष वेधशाला का नाम ‘नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप’ रखा है, जो उनके असाधारण वैज्ञानिक योगदान को श्रद्धांजलि है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रारंभिक वैज्ञानिक कार्य- अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने विभिन्न अनुसंधान संस्थानों में कार्य किया। उन्होंने तारों की संरचना, उनकी रासायनिक संरचना तथा उनकी गति का अध्ययन किया। उनके शोध कार्यों ने तारकीय खगोल विज्ञान (स्टेलर एस्टोनॉमी) में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि उस समय महिलाओं को वैज्ञानिक संस्थानों में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। कई बार उन्हें केवल महिला होने के कारण अवसरों से वंचित किया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।</p>
<p style="text-align:justify;">नासा में प्रवेश-वर्ष 1959 में नैन्सी ग्रेस रोमन नासा में शामिल हुईं। यह वह समय था, जब अंतरिक्ष युग की शुरुआत हो रही थी। सोवियत संघ द्वारा स्पुतनिक उपग्रह के प्रक्षेपण के बाद अमेरिका अंतरिक्ष अनुसंधान में तेजी से आगे बढ़ रहा था। नासा में शामिल होने के बाद वे संस्था की पहली मुख्य खगोलविद् (चीफ ऑफ एस्टोनॉमी) बनीं। यह उपलब्धि अपने आप में ऐतिहासिक थी, क्योंकि उस समय विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान के शीर्ष पदों पर महिलाओं की उपस्थिति अत्यंत दुर्लभ थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की स्थापना- नैन्सी रोमन का सबसे बड़ा योगदान अंतरिक्ष आधारित खगोल विज्ञान को विकसित करना था। उस समय अधिकांश खगोलीय अध्ययन पृथ्वी पर स्थित दूरबीनों से किए जाते थे, लेकिन पृथ्वी का वायुमंडल तारों और आकाशगंगाओं से आने वाले प्रकाश को विकृत कर देता है। रोमन ने यह विचार प्रस्तुत किया कि यदि दूरबीनों को अंतरिक्ष में स्थापित किया जाए, तो कहीं अधिक स्पष्ट और सटीक अवलोकन संभव होगा। उन्होंने नासा के भीतर इस विचार को लोकप्रिय बनाया और अंतरिक्ष दूरबीन कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं का समर्थन प्राप्त किया।</p>
<p style="text-align:justify;">हबल स्पेस टेलीस्कोप में योगदान- नैन्सी ग्रेस रोमन का सबसे प्रसिद्ध योगदान हबल स्पेस टेलीस्कोप के विकास में था। उन्होंने हबल परियोजना के लिए वैज्ञानिक समुदाय का समर्थन जुटाया। परियोजना की योजना और प्रारंभिक विकास में नेतृत्व प्रदान किया। सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित किया। अंतरिक्ष दूरबीन की आवश्यकता को प्रमाणित किया। इसी कारण नैन्सी रोमन को “मदर ऑफ हबल टेलिस्कोप” कहा जाता है। उनके वैज्ञानिक योगदान इस प्रकार से हैं-</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष दूरबीन की आवश्यकता को पहचानना- 1950 के दशक में अधिकांश खगोलविद् पृथ्वी पर स्थित वेधशालाओं का उपयोग करते थे। उस समय अंतरिक्ष में दूरबीन स्थापित करने की अवधारणा नई और महंगी मानी जाती थी। नैन्सी रोमन ने प्रारंभिक चरण में ही यह समझ लिया था कि पृथ्वी का वायुमंडल खगोलीय अवलोकनों को सीमित करता है। अंतरिक्ष में स्थापित दूरबीन अधिक स्पष्ट और सटीक चित्र प्राप्त कर सकती है। पराबैंगनी, अवरक्त और अन्य विकिरणों का अध्ययन अंतरिक्ष से बेहतर ढंग से किया जा सकता है। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि भविष्य का खगोल विज्ञान अंतरिक्ष आधारित वेधशालाओं पर निर्भर करेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हबल की प्रमुख उपलब्धियां </h3>
<p style="text-align:justify;">ब्रह्मांड की आयु का अधिक सटीक अनुमान।<br />डार्क एनर्जी की खोज में योगदान।<br />हजारों आकाशगंगाओं का अवलोकन।<br />ब्लैक होल के अस्तित्व के प्रमाण।<br />तारों और ग्रहों के निर्माण का अध्ययन।</p>
<p style="text-align:justify;">इन उपलब्धियों ने सिद्ध कर दिया कि नैन्सी रोमन की दूरदृष्टि सही थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सम्मान और पुरस्कार</h3>
<p style="text-align:justify;">अपने वैज्ञानिक योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">नासा विशिष्ट वैज्ञानिक उपलब्धि पदक <br />संघीय महिला सम्मान पुरस्कार <br />एयरोस्पेस क्षेत्र में महिलाओं के लिए आजीवन उपलब्धि पुरस्कार <br />अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियां।</p>
<h3 style="text-align:justify;">वैज्ञानिक समुदाय को एकजुट करना</h3>
<p style="text-align:justify;">हबल स्पेस टेलीस्कोप जैसी परियोजना के लिए केवल तकनीक ही पर्याप्त नहीं थी, इसके लिए व्यापक वैज्ञानिक समर्थन भी आवश्यक था। नैन्सी रोमन ने अमेरिका के प्रमुख खगोलविदों से संवाद स्थापित किया। विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को परियोजना से जोड़ा। विभिन्न वैज्ञानिक समितियों का गठन कराया। अंतरिक्ष दूरबीन की वैज्ञानिक उपयोगिता को स्पष्ट किया। </p>
<h3 style="text-align:justify;">हबल परियोजना की योजना में योगदान</h3>
<p style="text-align:justify;">नैन्सी रोमन ने हबल स्पेस टेलीस्कोप की प्रारंभिक वैज्ञानिक रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सुझाव दिया कि दूरबीन कि उच्च विभेदन वाली हो। पृथ्वी के वायुमंडलीय प्रभाव से मुक्त होकर कार्य करे। विभिन्न तरंगदैर्ध्यों का अध्ययन कर सके। विश्वभर के वैज्ञानिकों के लिए उपलब्ध हो। इन सिद्धांतों ने बाद में हबल की वैज्ञानिक सफलता की नींव रखी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">खगोल विज्ञान की संस्कृति का निर्माण</h3>
<p style="text-align:justify;">नैन्सी रोमन ने केवल एक दूरबीन परियोजना का समर्थन नहीं किया, बल्कि उन्होंने अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की एक नई संस्कृति विकसित की। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि अंतरिक्ष वेधशालाएं वैज्ञानिक अनुसंधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनें। डेटा विश्वभर के वैज्ञानिकों के लिए उपलब्ध हो। युवा वैज्ञानिकों को नए अवसर प्राप्त हों। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा मिले। आज अंतरिक्ष आधारित खगोल विज्ञान जिस स्तर पर है, उसकी नींव रोमन द्वारा रखी गई नीतियों में देखी जा सकती है। हबल की सफलता और रोमन की दूरदृष्टि 24 अप्रैल 1990 को हबल स्पेस टेलीस्कोप का प्रक्षेपण हुआ। प्रारंभिक तकनीकी समस्याओं के बावजूद बाद में यह मानव इतिहास की सबसे सफल वैज्ञानिक वेधशालाओं में से एक बन गया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>रूफिया खान, शिक्षिका</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 10:00:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मघा के बरसे माता के परसे</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कहावत है-“मघा के बरसे और माता के परसे ही आत्मा तृप्त होती है।” अर्थात मघा नक्षत्र में हुई वर्षा धरती को और मां के हाथ का भोजन मनुष्य को तृप्त करता है। लोकमान्यता है-“मघा न बरसे, भरे न खेत; मां न परसे, भरे न पेट।” मघा 27 नक्षत्रों में से एक है। भारतीय परंपरा में वर्षा ऋतु के आठ नक्षत्र माने गए हैं, जो आद्रा से हस्त तक माने जाते हैं। मघा को तेज बारिश, गरजते बादलों और तेज हवाओं वाला नक्षत्र माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें और झकोरती हवा लोकजीवन में अलग ही पहचान रखती हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591496/rain-magha-nakshatra-abundant-blessings"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/rain-during.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कहावत है-“मघा के बरसे और माता के परसे ही आत्मा तृप्त होती है।” अर्थात मघा नक्षत्र में हुई वर्षा धरती को और मां के हाथ का भोजन मनुष्य को तृप्त करता है। लोकमान्यता है-“मघा न बरसे, भरे न खेत; मां न परसे, भरे न पेट।” मघा 27 नक्षत्रों में से एक है। भारतीय परंपरा में वर्षा ऋतु के आठ नक्षत्र माने गए हैं, जो आद्रा से हस्त तक माने जाते हैं। मघा को तेज बारिश, गरजते बादलों और तेज हवाओं वाला नक्षत्र माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें और झकोरती हवा लोकजीवन में अलग ही पहचान रखती हैं। तुलसीदास ने भी लिखा है-“बूंद अघात सहहि गिरि कैसे, खल के बचन संत सह जैसे।” मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत में नागमती के विरह के आंसुओं की तुलना मघा की वर्षा से करते हुए लिखा है-“बरसे मघा झकोर झकोरी, मोर दुई नयन चुअय जस ओरी।” वीर रस के कवियों ने भी गोलियों की बौछार की तुलना मघा की बूंदों से की है। आल्हा में मघा के गरजते बादलों और तेज बारिश का सुंदर वर्णन मिलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इस वर्ष उत्तर भारत में मघा ने लोकविश्वास के अनुरूप वर्षा नहीं की। कहीं तेज बारिश हुई तो कहीं बादल बिना बरसे ही निकल गए। आषाढ़ और सावन भी कई क्षेत्रों में सूखे और अतिवृष्टि के बीच बीते। बुंदेलखंड समेत अनेक इलाकों में किसान बारिश की बाट जोहते रहे। धान की फसल बचाने के लिए उन्हें महंगा डीजल खरीदकर सिंचाई करनी पड़ी। मघा के बाद पूर्वा नक्षत्र आता है, जिसमें एक धार पानी बरसने की लोकमान्यता है। घाघ की कहावत है-“मघ मारे, पुरब संभारे।” मगर इस बार मघा ही धरती को धोखा दे गई।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच हरतालिका तीज का पर्व भी आता है। मान्यता है कि पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनकी सखियां उन्हें जंगल में ले गईं, जहां उन्होंने शिव की आराधना की। इसी प्रसंग की स्मृति में हरतालिका तीज मनाई जाती है। इस वर्ष पहाड़ों में अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाएं हुईं, जबकि मैदानों में कई जगह पर्याप्त बारिश नहीं हुई। मौसम के इस असंतुलन ने खेती को प्रभावित किया है। बदलते जलवायु चक्र के बीच मौसम की सटीक भविष्यवाणी भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यही कारण है कि मौसम विज्ञान को आधुनिक रडार और अत्याधुनिक तकनीक से मजबूत करने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। धरती आज भी मघा की उस भरपूर बारिश की प्रतीक्षा में है, जो खेतों को सींचे और किसान के चेहरे पर संतोष की मुस्कान लौटा सके।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>शिवचरण चौहान, लेखक</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 10:00:00 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>आइजोल :  प्रकृति की गोद में बसी साइलेंट सिटी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">शिमला, नैनीताल, मसूरी आने-जाने में अगर भीड़भाड़, यातायात जाम तथा शोर से ऊब चुके हैं और किसी शांत पहाड़ी शहर की तलाश में हैं, तो मिजोरम की राजधानी आइजोल से बढ़िया कोई दूसरा पर्यटन स्थल नहीं हो सकता है। उत्तर-पूर्व की खूबसूरत पहाड़ियों पर बसे आइजोल शहर को देश की ‘साइलेंट सिटी’ का दर्जा प्राप्त है। यहां की शांत ट्रैफिक व्यवस्था पूरी दुनिया में मशहूर है। सड़क पर चलने वाले वाहन सवार हॉर्न नहीं बजाते हैं, यहां तक कि जाम लगने और उसमें फंसने के बावजूद भी। यहां हॉर्न बजाना असभ्यता और सामाजिक पाप जैसा माना जाता है। ऐसे में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591495/aizawl--silent-city--lap-of-nature"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/aizawl-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">शिमला, नैनीताल, मसूरी आने-जाने में अगर भीड़भाड़, यातायात जाम तथा शोर से ऊब चुके हैं और किसी शांत पहाड़ी शहर की तलाश में हैं, तो मिजोरम की राजधानी आइजोल से बढ़िया कोई दूसरा पर्यटन स्थल नहीं हो सकता है। उत्तर-पूर्व की खूबसूरत पहाड़ियों पर बसे आइजोल शहर को देश की ‘साइलेंट सिटी’ का दर्जा प्राप्त है। यहां की शांत ट्रैफिक व्यवस्था पूरी दुनिया में मशहूर है। सड़क पर चलने वाले वाहन सवार हॉर्न नहीं बजाते हैं, यहां तक कि जाम लगने और उसमें फंसने के बावजूद भी। यहां हॉर्न बजाना असभ्यता और सामाजिक पाप जैसा माना जाता है। ऐसे में यातायात का अनुशासन देखने वाला होता है। </p>
<h3 style="text-align:justify;">लैंड ऑफ हाइलैंडर्स</h3>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/aizawl.jpg" alt="Aizawl" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">आइजोल की सड़कें संकरी और घुमावदार पहाड़ी रास्ते जैसी हैं, फिर भी वाहन बिना किसी हड़बड़ी के एक लेन में ही चलते हैं। दोपहिया और चार पहिया वाहन सवार खुद से अपनी लेन बनाते हैं। ट्रैफिक जाम में कोई वाहन सवार आगे निकलने का प्रयास नहीं करता है, न ही कोई ट्रैफिक लाइट को जंप करता है। सड़क पर पैदल चलने वालों को पहले प्राथमिकता दी जाती है, जब कोई सड़क पार करता है, तो गाड़ियां या तो रुक जाती हैं या रफ्तार काफी धीमी हो जाती है। एक और बात यहां हर दो पहिया वाहन सवार हेलमेट पहने नजर आता है। आइजोल में 96 फीसदी से ज्यादा लोग शिक्षित हैं, लेकिन लोगों में अनुशासन और शालीनता शिक्षा से ज्यादा संस्कृति का मामला दिखता है। </p>
<p style="text-align:justify;">देश के एक कोने में बसे मिजोरम की सीमाएं बांग्लादेश और म्यांमार से लगती हैं। मिजोरम की राजधानी आइजोल 1132 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह एक खूबसूरत शहर है, जहां सालभर मौसम सुहावना और वातावरण प्रदूषण मुक्त रहता है। पूरा शहर ऊंची पहाड़ियों और घाटियों से घिरा है। खूबसूरत वादियों के कारण इसे ‘लैंड ऑफ हाइलैंडर्स’ भी कहा जाता है। सन् 1810 में एक आदिवासी मुखिया लालसावुंगा ने इस स्थान को एक गांव के रूप में स्थापित किया। आइजोल में उनके नाम पर एक विशाल उद्यान है। यह क्षेत्र (लुशाई पहाड़ियां) 1895 में अंग्रेजों के अधीन आ गया और आइजोल को 1898 में उन्होंने राजधानी बना लिया। इसी दौरान स्थानीय लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया। आइजोल में 90 फीसदी से ज्यादा लोग ईसाई धर्म को मानते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मन मोहती खूबसूरती</h3>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/aizawl-(2).jpg" alt="Aizawl (2)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">आइजोल शहर की सुंदरता में साफ-सुथरी सड़कें और शानदार इमारतें चार चांद लगाती हैं। यहां बाइक-टैक्सी परिवहन का लोकप्रिय साधन है। घूमने के लिए 120 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला लालसावुंगा पार्क बढ़िया जगह है, इस पार्क में पहाड़ियों और जंगलों के नजारा लिया जा सकता है। क्रॉस तलांग पर्वत की दो छोटी पहाड़ियों पर फैला यह पार्क एक झूलते पुल से जुड़ा है। पर्यटक यहां सोलोमन मंदिर जरूर जाते हैं। यह भव्य चर्च सफेद संगमरमर से बना है। आइजोल में घूमने-फिरने की अन्य जगहों में मिजोरम स्टेहट म्यूजियम, रिक और बारा बाजार प्रमुख हैं। रिक एक छोटा, लेकिन बहुत सुंदर गांव है, जो आइजोल से 10 किमी की दूरी पर स्थित है। इस गांव की खूबसूरती मन मोह लेती है। हर साल हजारों पर्यटक इस गांव में पहुंचते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कैसे पहुंचें</h3>
<p style="text-align:justify;">लेंगपुई एयरपोर्ट शहर से करीब 35 किमी दूरी पर है।<br />सिलचर सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन, लगभग 180 किमी दूर है। <br />सड़क मार्ग से गुवाहाटी या शिलांग होकर पहुंच सकते हैं।</p>
<h6 style="text-align:justify;"> </h6>
<h6 style="text-align:justify;"><img width="220" height="330" alt="zdH4H8BwuJekI+llW4AAAAASUVORK5CYII="></img><br /><strong>डॉ. प्रीती शुक्ला चिकित्सक,कानपुर</strong></h6>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 14:42:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विभाजन की त्रासदी के बीच इंसानियत की मिसाल: जब दिल्ली में फरिश्तों ने संभाला था शरणार्थियों का दर्द</title>
                                    <description><![CDATA[सिविल लाइंस के ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल से जुड़ी हैं मनोज कुमार की यादें, 1947 की हिंसा के बीच स्वयंसेवकों और चिकित्सकों ने हजारों विस्थापितों की मदद की
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590860/1947-partition-delhi-humanity-brotherhood-house-st-stephens-hospital"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/independence-day-2026-(2).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मनोज कुमार जब भी दिल्ली आते, एक अजीब-सी बेचैनी उनके अंदर उठती। सिविल लाइंस के उन दो स्थानों से गुजरना उनके लिए सिर्फ रास्ता तय करना नहीं होता था-यह एक चुपचाप अदा की जाने वाली नजर थी। दिल्ली ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल। दोनों जगहें उनके जीवन की उस अंधेरी रात की याद दिलाती थीं, जब सब कुछ छूट गया था और कुछ भी बाकी नहीं बचा था। अगस्त 1947। देश दो टुकड़ों में बंट चुका था। सरहद के उस पार से आते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली पहुंचा। छोटा भाई बीमार था। उसका इलाज सेंट स्टीफंस अस्पताल में हुआ। सैकड़ों अन्य शरणार्थियों की तरह पूरा परिवार दिल्ली ब्रदरहुड हाउस के परिसर में ठहरा। इन दोनों स्थानों के प्रति कृतज्ञता का भाव उनके मन में जीवन भर बना रहा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>शरणार्थियों का सैलाब</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">उस समय दिल्ली की हालत भयावह थी। एक ओर सांप्रदायिक दंगों की लपटें उठ रही थीं, दूसरी ओर हिंदू-सिख शरणार्थियों का सैलाब शहर में घुस रहा था। लगभग नौ लाख की आबादी वाले इस शहर से करीब तीन लाख मुसलमान पाकिस्तान चले गए और लगभग पांच लाख हिंदू-सिख शरणार्थी यहां आकर बसने लगे। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियां खून से सनी, घायल और आतंकित यात्रियों से भरी उतर रही थीं। हर तरफ चीखें, चीख-पुकार और असमंजस।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>किनकी देखरेख में इलाज</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">सरकारी मशीनरी के अलावा कई स्वयंसेवी संगठन मैदान में उतरे। इनमें दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी (डीबीएस) भी शामिल थी। इसकी जड़ें 1877 में कैंब्रिज मिशन के साथ राजधानी में जमी थीं। इसी मिशन ने 1881 में सेंट स्टीफंस कॉलेज और 1885 में सेंट स्टीफंस अस्पताल की नींव रखी। विभाजन की हिंसा के दौरान इनके स्वयंसेवक पुरानी दिल्ली स्टेशन पर पहुंच रहे घायलों और शरणार्थियों को अस्पताल ले जाते। कई घायलों का इलाज डॉ. रूथ रोजवियर जैसी चिकित्सकों की देखरेख में हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">सिविल लाइंस स्थित ब्रदरहुड हाउस परिसर में फादर वेदरवेल के नेतृत्व में अस्थायी आश्रय दिया गया। जाति-धर्म से ऊपर उठकर पानी, दवा, छाया और सुरक्षा मुहैया कराई गई। स्वयंसेवक रात-दिन बिना थके काम करते रहे। अकेले डीबीएस सक्रिय नहीं था। सनातन धर्म और आर्य समाज के कार्यकर्ता सरहद पार से आ रहे शरणार्थियों की सुरक्षा, राहत शिविर और खाद्य वितरण में लगे थे। जत्थेदार संतोख सिंह के नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य सिख संगठनों ने भोजन, चिकित्सा सहायता और सुरक्षा का काम संभाला। आगे चलकर इन्हीं प्रयासों से दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल की स्थापना हुई।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>किसने मारा उस फरिश्ते को </strong></h5>
<p style="text-align:justify;">रेड क्रॉस दवाइयां और स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा था। लेडी माउंटबेटन के नेतृत्व में यूनाइटेड काउंसिल फॉर रिलीफ एंड वेलफेयर ने कई गैर-सरकारी संगठनों को समन्वित किया। कांग्रेस की राहत समितियां, कस्तूरबा कार्यकर्ता, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की दिल्ली शाखा और अन्य महिला समूह भोजन, वस्त्र और बच्चों की देखभाल में जुटे थे। डॉ. एन.सी. जोशी करोल बाग समेत कई इलाकों में घायलों की सेवा कर रहे थे, उन्हें भी दंगों में मार दिया गया। आज करोल बाग के जोशी रोड पर उनके नाम का अस्पताल चल रहा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गांधीजी की चिकित्सक भी सक्रिय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इरविन अस्पताल (अब लोक नायक अस्पताल) और लेडी हार्डिंग अस्पताल में भी घायलों का इलाज हो रहा था। लेडी हार्डिंग कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. के.जे. मैक्डरमेट और उनकी सहयोगी डॉ. ओ.पी. बाली रोज अठारह-अठारह घंटे मरीजों के साथ रहती थीं। गांधीजी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर भी शरणार्थियों और घायलों के साथ थीं। वे गांधी जी के साथ दंगा-प्रभावित इलाकों में जाकर शांति की अपील करतीं। आगे चलकर वे दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं। डीबीएस के प्रभारी ब्रदर सोलोमन जॉर्ज बताते हैं कि मनोज कुमार जीवन के अंत तक संस्था का आदर करते रहे।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हजारों जिंदगियों को राहत</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इन स्वयंसेवी प्रयासों ने हजारों जिंदगियों को राहत दी। स्टेशन से अस्पताल तक पहुंचाना, घायलों का इलाज, शिविरों में भोजन-पानी और कुछ हद तक हिंसा पर अंकुश किया। ये सब इन्हीं लोगों की मेहनत से संभव हुआ। सेंट स्टीफंस अस्पताल और कॉलेज उस समय मानवीय सहायता के जीवित केंद्र बन गए थे। विभाजन ने दिल्ली को गहरे घाव दिए। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों मारे गए, लेकिन उसी अंधेरे में स्वयंसेवकों की रोशनी भी चमकती रही। बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के, धर्म और जाति की दीवारों को पार कर जो लोग घायलों को उठाए जा रहे थे, वे मानवीयता के सच्चे प्रतिनिधि थे। आज भी कुछ बुजुर्ग मिल जाएंगे, जिन्होंने उस कठिन दौर में फरिश्तों को दिन-रात लूटे-पिटे लोगों की सेवा करते देखा था। ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल आज भी उस युग की याद दिलाते हैं, जब इंसानियत ने बाकी सब कुछ भुलाकर सिर्फ इंसान की मदद की थी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- विवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>Breaking News</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Trending News</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 08:23:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>माटी के वे वीर, जिन्होंने तिरंगे के लिए दे दी जान; शाहजहांपुर के रणबांकुरों की शौर्यगाथा</title>
                                    <description><![CDATA[आजादी की लड़ाई से लेकर भारत-चीन और भारत-पाक युद्धों तक शाहजहांपुर के जवानों ने दिखाई अदम्य वीरता, विभिन्न सैन्य अभियानों में भी कई वीरों ने दिया सर्वोच्च बलिदान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590858/shahjahanpur-martyrs-heroes-indian-army-independence-day"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/independence-day-2026-(1).png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश की आजादी की लड़ाई के तीन अमर नायकों की कहानी सभी को पता है, पर आजादी के बाद भी ऐसे तमाम मौके आए, जब शाहजहांपुर के वीर जवानों ने देश की खातिर जान देने में तनिक भी देर नहीं लगाई। यह वह मतवाले थे, जिन्होंने दुश्मनों को नाकों चने चबवा दिए, इसके बाद वह खुद वीरगति को प्राप्त हुए। देश पर मर मिटने वाले ऐसे हीरो के बारे में शाहजहांपुर के कुछ ही लोगों को पता है।  </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर के लोगों ने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी अपनी वीरता का परिचय दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शाहजहांपुर के जवानों के लिए कहा जाता था कि वह किस मिट्टी के बने हैं, उन्हें भूख नहीं लगती है और न ही उन्हें प्यास लगती है। वह केवल लड़ना ही जानते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में योगदान देने वाले सैनिकों की याद में कटरा और जलालाबाद में आज भी स्तंभ स्थापित हैं। ग्रेनेड चलाना हो, तोप चलाना हो या फिर हवाई जहाज से कूदना हो सब फन में शाहजहांपुर के वीर जवानों ने अपना लोहा मनवाया है। देश की सीमा पर दुश्मन से तो लड़ना तब भी आसान माना जाता है, क्योंकि पता होता है कि सामने दुश्मन ही है और उसे मारना है। पर शाहजहांपुर के रणबांकुरों ने तो देश के अंदर छिपे बैठे दुश्मनों को भी चुन-चुन कर मारा है, यह काम इसलिए कठिन माना जाता है, वह दुश्मन अपनों के बीच में छिपा बैठा होता था। सेना की विभिन्न रेजीमेंटों और कोरों में भर्ती होने के बाद बहुत लंबी नौकरी किसी ने नहीं की। अधिकतम दस साल के अंदर ही शाहजहांपुर के वीर जवानों ने विभिन्न युद्धों, मुठभेड़ों और आपरेशनों में वीरगति पाई। शाहजहांपुर का सेना में बड़ा योगदान रहा है। आजादी की जंग में जिस तरह से दीवाने कूदे थे। वह जज्बा आज भी कायम है। यहां के युवाओं के खून देशप्रेम बहता है। उसी के बल पर फौजियों ने हमेशा ही दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत-चीन युद्ध में शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कैप्टन कन्हैयालाल, ग्रेनेडियर कुतुबुददीन खान-4 ग्रेनेडियर कोर, एनसीई नन्हें लाल- वीईजी किरकी, सिपाही राजेंद्र सिंह-राजपूत रेजीमेंट, आरएम रामपाल सिंह-राजपुताना राइफल, सिपाही बलवीर सिंह-तोपखाना, सिपाही छोटे सिंह-तोपखाना, सिपाही दृगपाल सिंह-तोपखाना, सिपाही मुरारी सिंह-तोपखाना।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नायक जदुनाथ सिंह-राजपूत रेजीमेंट/ पहलवान सिंह-राजपूत रेजीमेंट/ सिग्नलमैन राजाराम गुप्ता-सिग्नल कोर/ सिपाही मलूक-सिख रेजीमेंट/ कमल किशोर-आर्मड रेजीमेंट/ लांस नायक दृगपाल सिंह-14 राजपूत रेजीमेंट/ नायक अनोख सिंह-पंजाब रेजीमेंट/जीडी रामहरी सिंह-9 गार्डस रेजीमेंट/ लांस नायक प्रतिपाल सिंह-तोपखाना/सिपाही चिरौंजी लाल-तोपखाना/ सब लेफ्टिनेंट शशि प्रकाश-तोपखाना/ सिपाही विद्याराम-तोपखाना।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>विभिन्न ऑपरेशनों में शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">पीटीआर सत्यपाल सिंह-1 पैरा रेजीमेंट-आपरेशन ब्लू स्टार-1984/ हवलदार विक्रम सिंह- 13 मैकनाइज्ड इंफेंट्री-आपरेशन पवन-1987/ सिपाही मूलचंद्र वाल्मीकी-एएससी बटालियन-आपरेशन पवन-1988/सिपाही सुरेश कुमार शर्मा-राजपूत रेजीमेंट- आपरेशन पवन-1987/ नायब सूबेदर सुनील कुमार-इंटेलीजेंस कोर-आंतकवादियों से मुठभेड़-1999/ देवेंद्र सिंह-तोपखाना-श्रीनगर कुपवाड़ा में आंतकवादियों से मुठभेड़-2005/ सिपाही रमेश चंद्र-4 जाट रेजीमेंट-आपरेशन कारगिल-1999।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>द्वितीय विश्वयुद्ध के शहीदों के नाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">- सिपाही लाखन, सिपाही कुबेर सिंह<br />- 1948 युद्ध के शहीद-सिपाही महेंद्र सिंह<br />जिले में पदक विजेता सैनिक<br />- 1948 में जलालाबाद तहसील के खजुरी गांव निवासी नायक जदुनाथ सिंह को मरणोपरांत परमवीर वीर चक्र प्रदान किया गया।<br />- 1971 में भारत-पाक लड़ाई में दृगपाल सिंह शहीद हुए। उनको महावीर चक्र दिया गया।<br />- इसके अलावा नरवीर सिंह को अशोक चक्र मिला है।<br />- 1994 में मेजर आशुतोष शुक्ला सेना मेडल<br />- 1996 कर्नल अभय कुमार सिंह विशिष्ट सेवा मेडल<br />- 2004 में हवलदार बलराम सिंह चौहान को सेना मेडल<br />- कैप्टन आनंद सिंह व कैप्टन खजान सिंह को द्वितीय विश्व युद्ध एसबीओबीआई मिला।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- विवेक सेंगर, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/590824/independence-day-2026-301-gallantry-medals-police-fire-service"><span class="t-red">Independence Day 2026:</span> स्वतंत्रता दिवस पर 301 वीरता पदकों का ऐलान, पुलिस-अग्निशमन सेवा के 1,057 कर्मियों को मिलेगा सम्मान</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>बरेली</category>
                                            <category>Breaking News</category>
                                            <category>शाहजहाँपुर</category>
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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 07:36:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
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                <title>स्वाधीनता की रक्षा के लिए आत्ममंथन जरूरी, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना समय की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि समानता, न्याय, लोकतांत्रिक मर्यादा और राष्ट्रहित से जुड़ी चुनौतियों पर विचार करने का अवसर भी है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590857/swadhinta-ko-akshunn-banaye-rakhne-ki-chunauti"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/independence-day-20261.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता, न्याय और राष्ट्रहित के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। आजादी के 79 वर्षों में देश ने विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक-राजनीतिक विभाजन, अवैध घुसपैठ, जातीय-सांप्रदायिक राजनीति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं में गिरावट जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब हर नागरिक को समान अवसर, न्याय और सम्मान मिले। स्वतंत्रता दिवस हमें उपलब्धियों के साथ कमियों पर आत्ममंथन का अवसर देता है। राष्ट्र की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का साझा दायित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत को ब्रिटिश दास्ता से मुक्त हुए उन्यासी वर्ष बीत चुके हैं। इन उन्यासी सालों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र के मूल मूल्यों पर कितनी खरी उतर रही है तथा स्वतंत्रता, समानता और न्याय के बुनियादी सिद्धांत क्या आम आदमी के प्रति निष्पक्ष रूप से लागू है अथवा उस पर भी अवसरवादी व अलगाववादी जातीय राजनीति का कुत्सित चेहरा प्रभावी है। यह गंभीर चिंतन का विषय है। कौन नहीं जानता कि किसी भी राष्ट्र के समग्र एवं चहुंमुखी विकास के लिए वहां के सभी नागरिकों का राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होना पहली अनिवार्यता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी आवश्यक होता है कि प्रत्येक नागरिक जाति, धर्म, संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पित रहे तथा व्यक्तिगत स्वार्थ को नकार कर राष्ट्र को सर्वोपरि माने। बहरहाल स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने भले ही भौतिक संसाधनों में चाहे जितनी वृद्धि की हो, मगर कुछ समस्याएं दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ी हैं, जिन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया। कहीं-कहीं राजनीतिक कारणों से समस्याओं को नजरअंदाज किया गया, जिस कारण समस्याएं विकराल होती गईं। कौन नहीं जानता कि देश में अधिकांश समस्याओं की जड़ बढ़ती जनसंख्या है, जिस पर अंकुश न लगाए जाने से स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। महंगाई और बेरोजगारी इसी के चलते बढ़ रही है। वस्तुस्थिति यह है कि सीमित संसाधनों के चलते हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी जैसी मूलभूत सुविधाओं को व्यवस्थित करना कठिन हो गया है। यही नहीं, सीमांत प्रदेशों में विदेशी घुसपैठियों की सटीक पहचान न होने से घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं, तिस पर सत्ता सुख के लिए राजनीतिक दलों द्वारा माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम जैसी नीतियां अपनाकर मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से देश में ऐसी जमात खड़ी हो गई है, जो मुफ्त का माल खाकर भी देश की सगी नहीं है। देश का उत्तरोत्तर विकास जिनका दायित्व है, उनके कार्य में बाधा डालने के लिए अपने पैरों तले से सियासी धरती खो चुके राजनीतिक दल एकजुट होकर विरोध का कोई अवसर नहीं चूकना चाहते। यूं तो सत्ता पर नकेल कसकर निरंकुश सत्ता को सचेत करना स्वस्थ विपक्ष का दायित्व होता है, लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध करके कल्याणकारी योजनाओं में अवरोध उत्पन्न करना किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता। देश का दुर्भाग्य है कि किसी भी समस्या के निपटने के बाद भी समस्या को मुद्दा बनाकर अराजकता उत्पन्न करना ही कुछ लोगों का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। ऐसे में सही को सही कहने का साहस भी कोई नहीं जुटा पा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लील गालियां और अभद्र भाषा का प्रयोग देश की स्वाधीनता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। ताज्जुब तब होता है, जब विपक्ष की राजनीति करने वाले तथाकथित नेता गाली बाजों के समर्थन में खड़े होकर अश्लील कृत्यों की पीठ थपथपाने में शर्म महसूस नहीं करते।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>राष्ट्रहित में सुधारों की चुनौती</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">देश में बरसों से राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने और सभी के साथ समान न्याय हेतु समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की बात की जा रही है, किंतु समान नागरिक संहिता का नाम सुनते ही कथित सांप्रदायिक शक्तियां विरोध करने पर उतारू हो जाती हैं। जैसे उन्हें औरों से अधिक सुविधाएं व अधिकार मिलें, कुछ राजनीतिक दलों को लगता है कि यदि समान नागरिक संहिता लागू हो गई, तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।  इसी प्रकार जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा करते ही कुछ धर्मगुरुओं की धार्मिक आस्थाएं आहत होने लगती हैं, जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को वह प्रकृति के विरुद्ध सिद्ध करने लगते हैं। जिस कारण राष्ट्र के कर्णधार कठोर निर्णय लेने की अपेक्षा अपने कदम पीछे हटाने के लिए विवश होते हैं तथा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार योजनाबद्ध ढंग से नहीं हो पाता। पुरानी कहावत है कि विदेशी या प्रत्यक्ष दुश्मन से लड़ना आसान होता है, किंतु अपने ही घर में यदि दुश्मनों के प्रतिनिधि बैठे हों, तो उनसे लड़ना सरल नहीं होता। आज देश ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। देश को अस्थिर करने हेतु षड्यंत्रकारी शक्तियां अपने-अपने मोहरों के साथ सड़कों पर हैं, जो नाम बदल-बदल कर देश की युवा पीढ़ी को भ्रमित करने और उकसाकर राष्ट्र को क्षति पहुंचाने में जुटी हैं। समृद्धि की राह पर अग्रसर भारत इन्हें रास नहीं आ रहा है। सड़क से लेकर संसद तक नकारात्मक दृष्टिकोण राष्ट्र को पीछे धकेलने का प्रयास कर रहा है। जनता द्वारा नकारे गए राजनीतिक दल अपनी खोई हुई धरती तलाशने के लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर रहे हैं। ऐसे में आवश्यक है कि स्वाधीनता दिवस को मंथन दिवस मानकर विश्लेषण किया जाए कि भारत ने विगत उन्यासी सालों में कितनी प्रगति की तथा किन मोर्चों पर भारत फेल हुआ। केवल पक्ष और विपक्ष की लड़ाई में भारत किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं होना चाहिए। सरकारें आएंगी जाएंगी, लेकिन राष्ट्र सुधारों में कोई विलंब नहीं होना चाहिए। समान नागरिक संहिता, आरक्षण विहीन सामाजिक व शैक्षिक व्यवस्था, कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति आज की प्राथमिकताओं में सर्वोपरि होनी चाहिए, ताकि स्वतंत्र भारत वास्तव में स्वस्थ लोकतंत्र का प्रहरी बना रहे। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप राष्ट्र निर्माण को चुनौती के रूप में स्वीकार करके आगे बढ़ना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधाकर आशावादी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, मेरठ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Top News</category>
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                <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 07:00:42 +0530</pubDate>
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                <title>हरियाली तीज: प्रकृति की हरियाली, नारी शक्ति और शिव-पार्वती के प्रेम का उत्सव</title>
                                    <description><![CDATA[सावन की हरियाली से लेकर झूलों, मेहंदी और लोकगीतों तक—हरियाली तीज भारतीय परंपरा में प्रकृति, आस्था और नारी चेतना को जोड़ने वाला पर्व है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590862/hariyali-teej-prakriti-nari-chetna-shiv-parvati-mahatva"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/hariyali-teej.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की सांस्कृतिक परंपराएं विविधता में एकता की मिसाल हैं। इन्हीं परंपराओं में विशेष स्थान रखता है हरियाली तीज का पर्व। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का अत्यंत मंगलकारी और आध्यात्मिक महत्व वाला पर्व है, जो श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पूरे भक्ति, श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। सावन मास में आने के कारण यह पर्व प्रकृति की हरियाली, वर्षा की स्फूर्ति और वातावरण की शुद्धता से गहराई से जुड़ा हुआ है। चारों ओर हरियाली की चादर बिछ जाती है और मनुष्य की चेतना भी प्रकृति के इस सौंदर्य से जुड़कर आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पर्व केवल प्राकृतिक हरियाली का उत्सव नहीं, बल्कि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य पुनर्मिलन का पावन प्रतीक भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए 107 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। श्रावण मास की शुक्ल तृतीया को व्रत रखकर उन्होंने शिव को प्रसन्न किया और अंततः भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसी आध्यात्मिक मिलन की स्मृति में हरियाली तीज मनाई जाती है। विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं तथा पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख की कामना करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी योग्य वर की प्राप्ति और विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए यह व्रत करती हैं।<br />हरियाली तीज का नाम भी सावन की हरियाली से जुड़ा है। इस दिन महिलाएं हरे वस्त्र पहनती हैं, हरी चूड़ियां धारण करती हैं, मेंहदी रचाती हैं और विशेष श्रृंगार करती हैं। हरा रंग प्रकृति की ताजगी, नवीनता, उर्वरता, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। श्रृंगार की यह परंपरा केवल शारीरिक सज्जा नहीं, बल्कि मन और आत्मा के उल्लास की भी प्रतीक है। </p>
<p style="text-align:justify;">हरियाली तीज का सामाजिक और पारिवारिक पक्ष भी अत्यंत गहरा है। <br />राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई राज्यों में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। लोकगीत, लोकनृत्य और झूले इस पर्व की प्रमुख पहचान हैं। महिलाएं वृक्षों की डालियों पर झूले डालकर सावन के गीत गाती हैं। मंदिरों में भी विशेष पूजा और झूलन उत्सव आयोजित किए जाते हैं। हरियाली तीज हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देती है। वटवृक्ष जैसे वृक्षों की पूजा यह दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को देवत्व का स्थान प्राप्त है। </p>
<p style="text-align:justify;">आज जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट के दौर में यह पर्व हमें प्रकृति से प्रेम और उसके संरक्षण की प्रेरणा देता है। आधुनिक संदर्भ में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। आज की शिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्री जब तीज व्रत करती है, तो वह अपनी परंपराओं और जड़ों से जुड़ती है। यह पर्व नारी के तप, प्रेम, सौंदर्य, श्रद्धा और संकल्प का प्रतीक है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-श्वेता गोयल, शिक्षिका </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>लखनऊ</category>
                                            <category>बरेली</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:57:20 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जॉब का पहला दिन : जब मैंने अपने सपनों को नौकरी की मेज पर रखा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जीवन में कुछ तारीखें कैलेंडर के पन्नों पर दर्ज होती हैं और कुछ सीधे दिल पर। मेरी नौकरी का पहला दिन भी ऐसी ही एक तारीख है, जिसे मैं आज भी याद करती हूं, तो मन के किसी कोने में वही उत्साह, वही घबराहट और वही चमक लौट आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह जब आंख खुली तो सबसे पहले यही ख्याल आया। आज मेरा पहला दिन है। रोज की सुबह से वह सुबह बिल्कुल अलग थी। कपड़े चुनने से लेकर बाल संवारने तक, हर छोटी बात पर मेरा विशेष ध्यान था। मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। खुशी इस बात की थी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590289/first-day-on-the-job--when-i-laid-my-dreams-out-on-the-office-desk"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/first-day-on-the-job.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जीवन में कुछ तारीखें कैलेंडर के पन्नों पर दर्ज होती हैं और कुछ सीधे दिल पर। मेरी नौकरी का पहला दिन भी ऐसी ही एक तारीख है, जिसे मैं आज भी याद करती हूं, तो मन के किसी कोने में वही उत्साह, वही घबराहट और वही चमक लौट आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह जब आंख खुली तो सबसे पहले यही ख्याल आया। आज मेरा पहला दिन है। रोज की सुबह से वह सुबह बिल्कुल अलग थी। कपड़े चुनने से लेकर बाल संवारने तक, हर छोटी बात पर मेरा विशेष ध्यान था। मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। खुशी इस बात की थी कि मुझे नौकरी मिल गई थी और चिंता इस बात की कि न जाने नए लोग मुझे कैसे स्वीकार करेंगे, काम कितना कठिन होगा और मैं अपनी जिम्मेदारियां कितनी अच्छी तरह निभा पाऊंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">घर से निकलते समय मां की आंखों में मेरे लिए गर्व साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने हमेशा की तरह छोटी-सी हिदायत दी- “अपना ध्यान रखना और मन लगाकर काम करना।” उनके ये साधारण से शब्द उस दिन मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं थे। जब जीवन बीमा कंपनी के कार्यालय के सामने पहुंची तो कुछ पल के लिए ठिठक गई। सामने वही इमारत थी, जहां से मेरे जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था। भीतर कदम रखते हुए मन में आया-कल तक मैं इस जगह के बारे में केवल सोचती थी, आज यही मेरी कर्मभूमि है।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यालय में प्रवेश किया, तो चारों ओर अनजान चेहरे थे। कोई फाइलों में व्यस्त था, कोई कंप्यूटर पर काम कर रहा था और कहीं ग्राहकों से बातचीत चल रही थी। मुझे लगा जैसे हर व्यक्ति अपने काम को लेकर कितना सहज है और केवल मैं ही हूं, जिसे कुछ पता नहीं, लेकिन धीरे-धीरे परिचय हुआ। वरिष्ठ सहकर्मियों ने काम समझाया। किसी ने पॉलिसी के बारे में बताया, किसी ने ग्राहकों से बातचीत करने का तरीका समझाया। जब एक सहकर्मी ने मुस्कुराकर कहा, “पहले दिन किसी को सब कुछ नहीं आता,” तो मेरी झिझक कुछ कम हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">उस दिन मैंने जाना कि जीवन बीमा केवल कागजों, प्रीमियम और पॉलिसियों का काम नहीं है। यह लोगों के भविष्य से जुड़ा विश्वास है। किसी परिवार का कमाने वाला व्यक्ति जब अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए बीमा करवाता है, तो वह वास्तव में अपने पीछे एक भरोसा छोड़ना चाहता है। इस जिम्मेदारी का एहसास मुझे नौकरी के पहले ही दिन हो गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">दिन कब बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम को कार्यालय से बाहर निकली तो सुबह वाली घबराई हुई लड़की कहीं पीछे छूट चुकी थी। उसकी जगह एक नई पहचान जन्म ले चुकी थी- एक कामकाजी महिला की पहचान। घर लौटते समय मन में एक अजीब-सी खुशी थी। उस दिन मुझे लगा कि नौकरी केवल आर्थिक स्वतंत्रता का साधन नहीं होती, वह आत्मविश्वास भी देती है। वह हमें अपने फैसले लेने, अपनी पहचान बनाने और अपने सपनों को आकार देने का अवसर देती है। आज वर्षों बाद भी जब उस पहले दिन को याद करती हूं, तो लगता है, वह सिर्फ नौकरी का पहला दिन नहीं था। वह मेरे भीतर की उस लड़की के आत्मनिर्भर महिला बनने की शुरुआत थी, जिसने उस दिन पहली बार महसूस किया था कि मैं भी अपने सपनों को अपनी मेहनत से सच कर सकती हूं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />तन्या सिंह, लखनऊ</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 10:00:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कारी बदरिया बहनी लागे, बदरा भैया लगे हमार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बरसात का महीना बड़ा सुहावना होता है। सावन और भादों दोनों महीनों में झमाझम पानी बरसता है। किसान, मयूर और धरती थिरकने लगती है। अनेक तीज त्योहार मनाए जाते हैं। अवध, बृज और बुंदेलखंड आदि क्षेत्र में वर्षा का आगमन होते ही धरती की प्यास बुझ जाती है। सूखे खेतों में पानी बरस जाने से कृषक अपनी खरीफ की फसल की तैयारी करने लगते हैं। बरखा से कुंए ताल-तलैया, पोखर और झील लबालब हो जाते हैं। नदी नाले अपने तट तोड़ कर बहने लगते हैं। झरने गीत गाने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्षा ऋतु के सुहावन सावन और भादों मास में अंधेरी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590288/kari-badriya-sister-lage-badra-bhaiya-lage-hamara"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/कारी-बदरिया-बहनी-लागे,-बदरा-भैया-लगे-हमार.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बरसात का महीना बड़ा सुहावना होता है। सावन और भादों दोनों महीनों में झमाझम पानी बरसता है। किसान, मयूर और धरती थिरकने लगती है। अनेक तीज त्योहार मनाए जाते हैं। अवध, बृज और बुंदेलखंड आदि क्षेत्र में वर्षा का आगमन होते ही धरती की प्यास बुझ जाती है। सूखे खेतों में पानी बरस जाने से कृषक अपनी खरीफ की फसल की तैयारी करने लगते हैं। बरखा से कुंए ताल-तलैया, पोखर और झील लबालब हो जाते हैं। नदी नाले अपने तट तोड़ कर बहने लगते हैं। झरने गीत गाने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्षा ऋतु के सुहावन सावन और भादों मास में अंधेरी रात में बिजली के चमकने, पपीहा के पिउ-पिऊ की टेर वन में मोरों का नाचना, मेंढ़कों की टर्र-टर्र की ध्वनि और नदियों प्रवाह मन को लुभाने लगता है। युवतियां गा उठती हैं- सावन मास सुहावन महिमा निसि अंधियारी रे।/बिजली चमक जो जियरा ललचे, छतियन छलकत यौवन रे।। भादों मास भयंकर महिना, चारउ दिसि नदियां धाई रे।/दादुर बोलें, पपहिया बोले वन कॉकत है मोर रे।।</p>
<p style="text-align:justify;">एक समय था जब सावन के प्रारंभ होते ही गांव-गांव में स्थान-स्थान पर नीम आम के वृक्षों पर झूले पड़ जाते थे। इन झूलों पर कन्याएं और वधुएं बड़े जोर सो पेंग भरती हुई गीत गा गाकर खुशी से झूम उठती थीं। एक चना दो देवली, माई सावन आयो।/ को कोसी बिटियां दूर री माई, सावन आयो।।/ का को से भईया लिखाउन जो बुलाउन जैहें।/नीले से घुड़ला ,कुदाउत जै हैं, लाल छडी बमकाउत जैहें।। भाइयों और बहनों का नाम लेकर गीत को आगे बढ़ाया जाता है। बहुत से भाई अपनी बहनों को ससुराल से लिवा लाए हैं, जो मायके में झूला झूलकर सावन की बहार का आनंद ले रही हैं। परंतु बहुत सी बहन ऐसी भी हैं, जो ससुराल में अपने भाइयों के आने की प्रतीक्षा में हैं। मान सिंह की बहन सुभद्रा भी उनमें से एक है, जो अभी मायके न जा सकने के कारण बहुत दुखी है। मान सिंह का रामरो गीत में लोक गायक ने उसकी वेदना का मार्मिक चित्र खींचा है। </p>
<p style="text-align:justify;">या सबकी बहिनियां झूले हिंडोरा/तुमरी बहिन बिसूरे परदेस।/ कि मोउआ पते दो बमना पढ़ दो/ बैड़या जू को दिन घर आए। कजली अथवा कजरिया बुंदेलखंड, अवध और भोजपुरी का प्रमुख त्योहार है। एक नवयुवती अपनी सहेलियों के साथ कजलियां खेलने जाना चाहती है। परंतु आकाश में बादल घिर आए हैं और वर्षा होने से वह कजरी खेलने नहीं जा सकी, जिसकी उसके मन में बड़ी ललक थी। कैसे खेलन जैहों सावन में कजरियां/ बदरिया घिर आई री सखी।। बिजुरी चमकन लागी/ बादर गर्जन लागे।।/मेरो धक-धक होय करेजवा, बदरिया धिर आई री सखी।।/ पवन सन सन हे सखि,बादर  कड़ कड़ वा तो पवन चले पुरवइया,/बदरिया घिर आई री सखी।। नायिका बादल-बदरी से भाई-बहन का नाता जोड़कर उससे अपनी अटरिया छत पर बरसने का निवेदन करती है, जिससे उसका प्रियतम परदेस न सके और वह प्रिय के साथ एक रात और बिता सके। कारी बदरिया बहना लागे, बदरा भैया लगे हमार।/आज बरस जा मोरी अटरिया बालम आज घरे रह जाएं। </p>
<p style="text-align:justify;">बुंदेलखंड और अवध क्षेत्र ब्रज क्षेत्र तथा भोजपुरी क्षेत्रों में सावन और भादो मास में अनेक तीज-त्योहार मनाया जाते हैं। झूला झूला जाता है और गौरा शिव पार्वती की पूजा की जाती है। देवी गीत के साथ ही कजरी गीत गाने की परंपरा आज भी है। महोबा में कजरी मेला लगता है, तो बनारस, मिर्जापुर और रामनगर में कजरी गाई जाती है। झूला झूला जाता है और लोक कवियों के कजरी गायन दंगल होते हैं। अब यह परंपरा लुप्त होती जा रही है। इसे पुनः जीवंत करने की जरूरत है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिवचरण चौहान, कानपुर</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 12:00:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>1857 क्रांति में उपजी एक अधूरी प्रेम कहानी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर में 1857 की क्रांति के दौरान एक प्रेम कहानी भी उपजी थी, लेकिन वह प्रेम कहानी बाद में अधूरी रह गई। इस प्रेम कहानी पर एक फिल्म जुनून भी बनी। इस फिल्म के हीरो शशि कपूर थे। उन्होंने जावेद का मुख्य किरदार निभाया था। जावेद को रूथ नाम की एक अंग्रेज लड़की से प्यार हो जाता है। रूथ की मां मरियम अंग्रेजों से जंग जीतने की शर्त रखती है, पर आखिरी में जख्मी जावेद केवल रूथ को अपनी मां मरियम के साथ जाती हुई दिखती है, प्यार की यह कहानी अधूरी रह जाती है।             </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर में हुई आजादी की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590286/an-incomplete-love-story-born-out-of-1857-revolution"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/1857-revolution.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर में 1857 की क्रांति के दौरान एक प्रेम कहानी भी उपजी थी, लेकिन वह प्रेम कहानी बाद में अधूरी रह गई। इस प्रेम कहानी पर एक फिल्म जुनून भी बनी। इस फिल्म के हीरो शशि कपूर थे। उन्होंने जावेद का मुख्य किरदार निभाया था। जावेद को रूथ नाम की एक अंग्रेज लड़की से प्यार हो जाता है। रूथ की मां मरियम अंग्रेजों से जंग जीतने की शर्त रखती है, पर आखिरी में जख्मी जावेद केवल रूथ को अपनी मां मरियम के साथ जाती हुई दिखती है, प्यार की यह कहानी अधूरी रह जाती है।             </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर में हुई आजादी की लड़ाई में एक प्रेम कहानी भी जुड़ी थी। नेविलस कृत गजेटियर से पता चलता है कि 1857 के गदर के दौरान शाहजहांपुर के कैंट स्थित चर्च पर क्रांतिकारियों ने 31 मई को हमला किया था, इस हमले में कमांडर रिक्रेट सहित बहुत से लोग मारे गए थे। इनमें से एक अंग्रेज मिस्टर लेमिस्टर जो किसी तरह चर्च से बाहर आने में कामयाब रहा, लेकिन वह स्टेशन से कुछ मील दूर क्रांतिकारियों द्वारा मार दिया गया, जबकि गजेटियर के अनुसार, उसकी पत्नी तथा बेटी का भाग्य अज्ञात है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी के ऊपर विख्यात उपन्यासकार रस्किन बांड ने अपने प्रसिद्ध नावेल फ्लाइट ऑफ पिजन की रचना की, जिस पर प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल ने फिल्म जुनून बनाई। इस फिल्म में जावेद खां नाम के मुख्य किरदार को शशि कपूर ने जीवंत किया था। इस फिल्म को खुद शशि कपूर ने प्रोड्यूज किया था। इस फिल्म का निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया था। फिल्म को कई नेशनल और इंटरनेशनल पुरस्कार भी मिले थे। फिल्म की कहानी लिखी भी रस्किन बांड ने ही थी। फिल्म की शूटिंग शाहजहांपुर में न होकर मलिहाबाद में हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म की कहानी कुछ इस प्रकार थी। देश गुलाम था। 1857 के गदर का वक्त था। उस वक्त शाहजहांपुर के कैंट स्थित चर्च पर क्रांतिकारियों ने हमला किया था। उस वक्त चर्च से भाग कर मरियम और उनकी बेटी रूथ ने लाला राजमल के घर शरण ली थी। उस वक्त शाहजहांपुर में एक जागीरदार परिवार के शादीशुदा जावेद खान शौकिया तौर पर कबूतर उड़ाया करते थे। जावेद का किरदार शशि कपूर ने निभाया। उनकी पत्नी का रोल शबाना आजमी ने अदा किया था। जावेद के एक छोटे भाई सरफराश थे, जो क्रांतिकारी थे। </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर सिटीजन ग्रुप के हेड और एसएस विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि क्रांतिकारियों ने जब चर्च पर हमला कर दिया था, उस वक्त अंग्रेज महिला मरियम ने अपनी बेटी रूथ के साथ लाला राजमल के घर शरण ले ली थी। मरियम का रोल शशि कपूर की असल पत्नी जेनेफर कैंडल ने अदा किया था। लाला राजमल के घर अंग्रेज महिला और उसकी बेटी के शरण लेने की खबर जावेद को लगती है, तो वह जबरिया वहां घुस जाते हैं। वह अपने साथ मरियम और उसकी बेटी रूथ को लेकर घर ले आते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल जावेद को उस वक्त देखते ही रूथ से प्यार हो जाता है, इसलिए हर कीमत पर रूथ और उसकी मां मरियम को किसी भी खतरे से बचाना चाहते थे। डॉ. विकास खुराना ने बताया कि जब जावेद मरियम और उसकी बेटी रूथ को लेकर अपने घर आते हैं, तो जावेद की पत्नी फिरदौस जो शबाना आजमी बनी हैं, उनमें जलन होने लगती है। परिवार में कलह हो जाती है। </p>
<p style="text-align:justify;">जावेद पर कलह का कोई असर नहीं था। बाद में फिरदौस के दबाव के चलते मरियम और उसकी बेटी रूथ को जावेद का घर छोड़ कर जाना पड़ा। पर जावेद से मरियम ने यह कहा कि अगर वह अंग्रेजों को हरा देगा, तो वह अपनी बेटी रूथ का हाथ उसके हाथ में सौंप देगी। इसके बाद जावेद पर जुनून सवार हो जाता है, वह क्रांतिकारी बनकर अंग्रेजों से लड़ता है, लेकिन आखिरी में वह जख्मी हालत में रूथ को अपनी मां मरियम के साथ जाते हुए देखता है। डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि बाद में रूथ अपनी मां मरियम के साथ इंग्लैंड चली जाती है, वहां करीब पांच साल के बाद रूथ की मौत हो जाती है।  </p>
<h5 style="text-align:justify;">  -विवेक सेंगर, शाहजहांपुर </h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 10:00:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जंगल, बादल, सुरम्य वादियां और पनचक्कियां </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश में पचमढ़ी अगर एकलौते हिल स्टेशन का रुतबा रखता है, तो सतपुड़ा की सुरम्य वादियों में बसे बैतूल जिले में कुकरू प्रकृति की गोद में छिपे उस अनमोल रत्न जैसा है, जिसके बारे में दावा किया जा सकता है कि अगर आप प्रकृति और खुले वातावरण से प्यार करते हैं, तो इस एक बार इस हिल स्टेशन की सैर पर अवश्य आइए फिर पचमढ़ी को भूल जाएंगे। पचमढ़ी की अपेक्षा कुकरू में अभी पर्यटक अपेक्षाकृत कम ही जाते हैं। बैतूल जिला मुख्यालय से करीब 92 किमी की दूरी पर घने जंगलों के बीच सबसे ऊंची पहाड़ की चोटी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590282/forest-clouds-picturesque-valleys-and-watermills"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/forests,-clouds-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश में पचमढ़ी अगर एकलौते हिल स्टेशन का रुतबा रखता है, तो सतपुड़ा की सुरम्य वादियों में बसे बैतूल जिले में कुकरू प्रकृति की गोद में छिपे उस अनमोल रत्न जैसा है, जिसके बारे में दावा किया जा सकता है कि अगर आप प्रकृति और खुले वातावरण से प्यार करते हैं, तो इस एक बार इस हिल स्टेशन की सैर पर अवश्य आइए फिर पचमढ़ी को भूल जाएंगे। पचमढ़ी की अपेक्षा कुकरू में अभी पर्यटक अपेक्षाकृत कम ही जाते हैं। बैतूल जिला मुख्यालय से करीब 92 किमी की दूरी पर घने जंगलों के बीच सबसे ऊंची पहाड़ की चोटी पर स्थित बसा यह हिल स्टेशन प्रकृति प्रमियों के लिए किसी जन्नत सरीखा है। यहां पर्यटकों के लिए अनेकों ऐसे स्पॉट मौजूद है, जिन्हें कुदरत का खजाना कहा जाता है। ऐसी जगहों पर आप कैपिंग से लेकर नेचर ट्रेल, बर्ड वाचिंग, लैंड स्केप और फोटोग्राफी का मजा लेने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। कॉफी बागानों, पवन चक्कियों और जंगल कैंपिंग के लिए प्रसिद्ध यह हिल स्टेशन पर्यटकों को मन की शांति के साथ अनूठा सुकून प्रदान करता है।<br /> </p>
<h3 style="text-align:justify;">गर्मियों में दिन रहता सुहावना और रात में ठंड का एहसास  </h3>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/clouds-.jpg" alt="clouds" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">शहरी हलचल से दूर, शांत और समृद्ध जैव विविधता से भरपूर बैतूल जिले की भैंसदेही तहसील में स्थित कुकरू की उंचाई समुद्रतल से 1137 मीटर है। कोरकू जनजाति के निवास करने के कारण इस क्षेत्र को कुकरू नाम जाना जाता है। चारों ओर घने जंगल, ऊंची-नीची पहाड़ियों, हरियाली और झरनों के कारण यह स्थान साल भर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। मई-जून की गर्मियों में मैदानी इलाकों की अपेक्षा यहां का तापमान काफी कम दर्ज किया जाता है। दिन के समय अधिकतम तापमान जहां औसतन 34 से 37 सेल्सियस डिग्री रहता है, वहीं न्यूनतम पारा 22-23 डिग्री तक पहुंचने से रातें काफी सुहावनी और ठंडी होती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रास्ते में हेयरपिन मोड़, झरने और मानसून के समय सर्दियों जैसी धुंध</h3>
<p style="text-align:justify;">कुकरू में सुबह उगते और शाम को डूबते सूर्य का दृश्य बड़ा ही मनोरम होता है। चारों तरफ से घने जंगलों से आच्छादित यह प्राकृतिक स्थल कॉफी के बागवानों के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहां का वन क्षेत्र लंबी पैदल यात्रा और ट्रैकिंग के लिए आदर्श है। यहां पहुंचने के लिए सड़क घुमावदार है, जिसमें कई हेयरपिन मोड़ मिलते हैं। चारों ओर घने जंगलों के कारण यहां सर्दियों के मौसम की ही तरह मानसून के समय भी धुंध छाई रहती है। रास्ते में जगह-जगह छोटे-बड़े झरने मिलते हैं, बारिश के मौसम में इनसे गिरने वाला स्वच्छ पानी धुआं छोड़ता नजर आता है। यहां कुछ सनसेट पॉइंट के साथ इको पॉइंट भी हैं, जहां से हरे-भरे पहाड़ों का शानदार नजारा लिया जा सकता है। रास्ते में बिजली पैदा करने वाली पवन चक्कियां भी बड़ी संख्या में दिखाई देती हैं। कॉफी, तेलिया सागौन, मिश्रित वन और अदना नदी का निकटवर्ती क्षेत्र मिलकर यहां एक बेहद आकर्षक वातावरण सृजित करते हैं। बरसात के समय घुमड़ते घने बादलों के बीच  धुंध और कोहरा कोकरू में  दुर्लभ पर्वतीय अनुभव प्रदान करते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कोदो-कुटकी की खेती और हस्तशिल्प आकर्षण का केंद्र </h3>
<p style="text-align:justify;">कुकरू अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए भी जाना जाता है। यहां कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज, रबड़ी, मावा और स्थानीय व्यंजन पर्यटकों को खासा आकर्षित करते हैं। आसपास के जंगलों में मिलने वाली वन उपज, जड़ी-बूटी और लकड़ी से बने हस्तशिल्प स्थानीय लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिनमें पर्यटकों की भी दिलचस्पी रहती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एक बार पीकर देखिए दीवाना बना देंगे यहां के कॉफी बीन्स </h3>
<p style="text-align:justify;">कुकरू की अरेबिका और रोबस्टा कॉफी बीन्स के लोग बड़ी संख्या में दीवाने हैं। यहां की वादियां में घुली कॉफी की खुशबू दिलकश नजारे के साथ दार्जिलिंग या नीलगिरी जैसा सौंदर्य प्रस्तुत करती है। इसी कारण कुकरू को मध्य प्रदेश और मध्य भारत का एकलौता कॉफी उत्पादक क्षेत्र भी कहा जाता है। यहां कॉफी बागान की शुरुआत वर्ष 1944 में ब्रिटिश महिला फ्लोरेंस हैंड्रिक्स ने की थी। सतपुड़ा के इस इलाके की जलवायु और मिट्टी कॉफी उत्पादन के लिए अनुकूल मिलने पर करीब 44 हेक्टेयर क्षेत्र में कॉफी की खेती शुरू हुई थी। इसके बाद यहां उच्च गुणवत्ता वाली कॉफी बीन्स का उत्पादन होने लगा। </p>
<h3 style="text-align:justify;">कैसे पहुंचे </h3>
<p style="text-align:justify;">वायु मार्ग – निकटतम एयरपोर्ट भोपाल और नागपुर</p>
<p style="text-align:justify;">रेल मार्ग – निकटतम रेलवे स्टेशन बैतूल</p>
<p style="text-align:justify;">सड़क मार्ग – बैतूल जिला मुख्यालय से 92 किमी</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />शुभम सिंह, मऊ</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 18:13:16 +0530</pubDate>
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