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                <title>शब्द रंग - Amrit Vichar</title>
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                <title>जॉब का पहला दिन :   एक नई सोच को स्थापित करने वाला पहला कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो बिना किसी पूर्व सूचना के आ जाते हैं और आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है कि इसी राह पर आपका करियर बनेगा, पर नियति आपको उसी दिशा में मोड़ देती है, जिसके लिए आप बने हैं। बात उन दिनों की है जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी कर नई दिल्ली में एक निजी कंपनी में अपना भविष्य टटोल रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक कंपनी में 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली में ही था। संयोग देखिए - 11 सितंबर 2001, जिस दिन न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर दुनिया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579868/first-day-on-the-job--the-first-step-to-establishing-a-new-mindset"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(36)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो बिना किसी पूर्व सूचना के आ जाते हैं और आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है कि इसी राह पर आपका करियर बनेगा, पर नियति आपको उसी दिशा में मोड़ देती है, जिसके लिए आप बने हैं। बात उन दिनों की है जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी कर नई दिल्ली में एक निजी कंपनी में अपना भविष्य टटोल रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक कंपनी में 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली में ही था। संयोग देखिए - 11 सितंबर 2001, जिस दिन न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर दुनिया का सबसे भीषण आतंकी हमला हुआ, उसी दिन छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट से एक संदेश मिला: “आपका चयन मास्टर इन टूरिज्म मैनेजमेंट के पहले बैच में अतिथि शिक्षक के रूप में हो गया है।”  </p>
<p style="text-align:justify;">वही क्षण मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बना, जब मैंने अकादमिक जगत में पहला कदम रखा। मन में हलचल थी, 25 साल की उम्र और सामने लगभग हमउम्र विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी, भीतर कहीं डर भी था, मगर पहली कक्षा के बाद संस्थान के वरिष्ठ शिक्षकों, खासकर निदेशक महोदय और वरिष्ठ प्रोफेसर ने जब कहा, “धीरे-धीरे सब परिपक्व होते हैं,” तो उन्हीं शब्दों ने मेरे भीतर नई ऊर्जा भर दी। -डॉ. सुधांशु राय, असिस्टेंट प्रोफेसर, कानपुर</p>
<p style="text-align:justify;">नौकरी का पहला दिन था। पिताजी ने सहज भाव से कहा, “यह तो प्रोफेसर बन गया।” अगले दो दिन रिश्तेदारों के फोन आते रहे- सब यही दोहराते, “आपका बेटा प्रोफेसर हो गया।” किसी को यह एहसास ही नहीं था कि प्रोफेसर एक बड़ा पद होता है, जबकि मैं तो केवल पार्ट-टाइम गेस्ट फैकल्टी, यानी लेक्चरर के रूप में जुड़ा था। मैं जब स्वयं विद्यार्थी था, तभी से डायरी लिखने का शौक था। जब पुराने पन्ने पलटे तो कहीं नहीं लिखा था कि मुझे शिक्षक बनना है। मैं तो देश-शहर सुधारने के सपने देखता हुआ सिविल या डिफेंस सर्विस में जाना चाहता था। किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बिना हिचक मैंने शिक्षण को अपनाया। पहले ही वर्ष संस्थान में पहचान बनने लगी और दो साल के भीतर मैं नियमित लेक्चरर के पद पर चुन लिया गया। जीवन अनिश्चितताओं और संघर्ष का ही दूसरा नाम है।  मेरा जीवन भी उससे अलग नहीं था। इन्हीं संघर्षों ने मेरे व्यक्तित्व को तराशा, एक नई पहचान दी। वह दौर था जब कई युवा शिक्षक एक साथ आए थे, प्रतिस्पर्धा चरम पर थी। इन्हीं संघर्षों और मेरे शांत स्वभाव ने मुझे स्थायित्व दिया। </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में लगता था कि सब पीछे खींचना चाहते हैं, पर वह केवल भ्रम था। पहले वर्ष से ही  मैंने इसे स्वीकार कर अपने व्यक्तित्व को निखारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नए पड़ाव आते गए। अपने शुरुआती विचारों को साकार करने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय के भीतर रचनात्मकता दिखाने का मौका मिला। विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट सेल, काउंसलिंग सेल, होटल एवं टूरिज्म मैनेजमेंट विभाग की स्थापना और राष्ट्रीय सेवा योजना जैसे नए कॉन्सेप्ट स्थापित किए। </p>
<p style="text-align:justify;">एनएसएस ने समाज के प्रति मेरा दृष्टिकोण व्यापक किया। एक नई विचारधारा जन्मी-शैक्षिक दायित्व के साथ-साथ समाज के प्रति भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, इस सोच के साथ सामाजिक कार्यों में भागीदारी बढ़ी। कुछ ही वर्षों में पर्यटन, सामाजिक विकास और जन-जागरूकता जैसे विषयों पर पकड़ बनी। आज कानपुर शहर को केंद्र में रखकर हैप्पीनेस, स्वास्थ्य और विजन कानपुर पर काम हो रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">“मुस्कुराए कानपुर”, “कानपुर हेल्थ कमेटी” और “कानपुर सुपर 100” जैसी संस्थाएं खड़ी कर शहर के हर क्षेत्र के प्रतिष्ठित नागरिकों को जोड़ते हुए “नव कानपुर, कुशल कानपुर” बनाने का प्रयास जारी है। सामाजिक दृष्टिकोण और प्रबंधन क्षमता के साथ जिला प्रशासन के साथ भी पर्यटन विकास और शहर के विकास में सलाहकार की भूमिका निभाकर आत्मिक संतुष्टि मिल रही है। हर इंसान के जीवन में अलग-अलग पड़ावों पर रोल मॉडल होते हैं। माता-पिता के बाद प्रारंभिक काल में एक सरकारी कार्यालय के अधीक्षक रोल मॉडल थे। </p>
<p style="text-align:justify;">सेवा भाव से भरे हुए, आज कुलपति महोदय की प्रशासनिक क्षमता, कार्य के प्रति समर्पण और दूरदर्शिता मुझे प्रेरित करती है। आज जहां भी खड़ा हूं, अपने परिवार के समर्पण एवं सहयोग से। मैं मानता हूं कि मैंने सब कुछ नहीं पाया, पर काफी हद तक जीवन में संतुष्ट हूं खुश हूं। शैक्षिक दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाते हुए समाज को नया नेतृत्व देने की कोशिश कर रहा हूं। ऐसा नेतृत्व जो अपने शहर कानपुर को “नया कानपुर, खुशहाल कानपुर” बनाने की दिशा में कुछ सार्थक कर सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 12:00:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कहां खो गया इक्का!</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">पता नहीं इक्का कहां खो गया? पहले शहरों-कस्बों में आवागमन का यही मुख्य साधन हुआ करता था। बैलगाड़ी गांव-देहात में आवागमन और भार वाहन का साधन थी। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई में बैल की एक प्रतिमा मिली है। तांबे का एक इक्का मिला है। इससे प्रमाणित होता है कि इक्का भारत सहित एशिया के एक बड़े भूभाग में आवागमन का प्रमुख साधन था। अब करनाल की राखीगढ़ी की खुदाई में कुछ ऐसी ही चीजें मिल रही हैं। इक्का को एक घोड़ा या एक बैल खींचता था। एक धुरी पर दो पहिए लगे होते थे और ऊपर छाया के लिए एक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579867/where-did-the-ace-get-lost"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(35)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पता नहीं इक्का कहां खो गया? पहले शहरों-कस्बों में आवागमन का यही मुख्य साधन हुआ करता था। बैलगाड़ी गांव-देहात में आवागमन और भार वाहन का साधन थी। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा की खुदाई में बैल की एक प्रतिमा मिली है। तांबे का एक इक्का मिला है। इससे प्रमाणित होता है कि इक्का भारत सहित एशिया के एक बड़े भूभाग में आवागमन का प्रमुख साधन था। अब करनाल की राखीगढ़ी की खुदाई में कुछ ऐसी ही चीजें मिल रही हैं। इक्का को एक घोड़ा या एक बैल खींचता था। एक धुरी पर दो पहिए लगे होते थे और ऊपर छाया के लिए एक छतरी। गाय दूध देती थी और उसके बछड़े खेत में हल चलाते थे। यही बैल गाड़ी भी खींचते थे।<strong>  -शिवचरण चौहान</strong></p>
<p style="text-align:justify;">रथ, रब्बा, बहल,छकड़ा और सग्गड़ भी। प्राचीन काल में इक्का घोड़ा दौड़ और बैल और बैल गाड़ी की दौड़ प्रतियोगिता होती थी। एक्का, तांगा, खड़खड़ा, टमटम, रथ, रब्बा, सग्गड़ और बैलगाड़ी यही आवागमन के प्रमुख साधन थे। जब तक डीजल और पेट्रोल की खोज नहीं हुई थी। बिजली और सौर ऊर्जा की खोज नहीं हुई थी। इन सबका बहुत महत्व था। गांव की बारात बैलगाड़ियों से जाती थीं। कतार में गाड़ियां कच्ची सड़कों पर चलती दिखाई देती थीं। गाड़ी वाले बैला धीरे हांक रे तथा  जरा ललकार के बैला हांकों, मेरे सैंया गाड़ीवान जैसे गीत फिल्मों में लोकप्रिय होते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म तीसरी कसम का गाड़ीवान बहुत लोकप्रिय हुआ था। टमटम चार पहियों की गाड़ी होती थी। जबकि इक्का दो पहियों की जिसमें सिर्फ एक सवारी बैठती थी। बग्घी भी चार पहियों की सवारी होती थी। पहले राजा महाराजा और बादशाह अमीर लोग बग्घी पर चला करते थे। बग्घी पर अभी भी बारातें निकलती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">डेकोरेटेड बग्घी कई शहरों में शादी-बारात के लिए बुक की जाती थी। अब सब बीती यादें हैं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उसने कहा था में तांगे वाले का जिक्र आया है। अब पेट्रोल-डीजल  बैटरी और बिजली सौर ऊर्जा से चलने वाली कारें, बसें आ गई हैं, तो इक्के वालों को कौन पूछेगा? एक संस्कृति विलुप्त हो रही है। आवागमन के साधन इतिहास में पढ़ाए जाएंगे इक्का, तांगा, टमटम और बग्घी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 08:00:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कालजयी उपन्यास ‘देवदास’ के रचयिता शरतचंद्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत में कई ऐसे यशस्वी साहित्यकार हुए हैं, जिनकी कृतियां विश्व भर में पढ़ी जाती हैं। इन साहित्यकारों में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की गणना प्रथम पंक्ति में की जाती है। आम आदमी को केंद्र में रखकर सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने पर बुने उनके उपन्यास और कहानियां पाठकों में बहुत लोकप्रिय हुईं।</p>
<p style="text-align:justify;">शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, एक ऐसे उपन्यासकार हैं, जिन्होंने अपने शब्दों और कुछ अविस्मरणीय लेखन के कारण लोगों के मन-मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ी। उन्हें पश्चिम बंगाल के लोगों के मनोभावों, उनकी रुचियों, परंपराओं तथा उनकी जीवन शैली की गहरी समझ थी। एक विख्यात लेखक, जिनकी स्पष्ट और अविस्मरणीय लेखन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579866/sharat-chandra--author-of-the-timeless-novel--devdas"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(34)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में कई ऐसे यशस्वी साहित्यकार हुए हैं, जिनकी कृतियां विश्व भर में पढ़ी जाती हैं। इन साहित्यकारों में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की गणना प्रथम पंक्ति में की जाती है। आम आदमी को केंद्र में रखकर सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने पर बुने उनके उपन्यास और कहानियां पाठकों में बहुत लोकप्रिय हुईं।</p>
<p style="text-align:justify;">शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, एक ऐसे उपन्यासकार हैं, जिन्होंने अपने शब्दों और कुछ अविस्मरणीय लेखन के कारण लोगों के मन-मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ी। उन्हें पश्चिम बंगाल के लोगों के मनोभावों, उनकी रुचियों, परंपराओं तथा उनकी जीवन शैली की गहरी समझ थी। एक विख्यात लेखक, जिनकी स्पष्ट और अविस्मरणीय लेखन की सरल शैली उस समय के नियमित पाठकों को पढ़ने के लिए एक बेहतरीन समाग्री थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शरतचंद्र ने अपने उपन्यास और कहानियों में बंगाल के ग्रामीण अंचल में प्रचलित संस्कृति और वहां की जीवन शैली को एक नया आयाम दिया। उनके उपन्यासों और कहानियों के अधिकांश पात्र समाज के सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके आचरण तथा व्यवहार में सादगी तथा भोलापन स्पष्ट रूप से झलकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">शरतचंद्र का जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन भागलपुर में अपने मामा के घर में बिताया। 1894 में, उन्होंने टीएन जुबली कॉलेजिएट स्कूल से प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें एफए क्लास में भर्ती कराया गया, लेकिन गरीबी के कारण अपनी आगे की शिक्षा जारी रखने में असमर्थ हो गए। </p>
<p style="text-align:justify;">शरतचंद्र का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी था, इसलिए उन्होंने जीवन के कई क्षेत्रों में कार्य किया। सबसे पहले उन्होंने बनाली एस्टेट में सहायक सेटलमेंट ऑफिसर के रूप में कार्य करना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता के उच्च न्यायालय में एक अनुवादक के रूप में काम किया।  फिर उन्होंने बर्मा रेलवे में लेखा विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल कांग्रेस के सक्रिय सदस्य भी रहे। वे भारतीय कांग्रेस द्वारा देश की आजादी के लिए चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लेते थे। बाद में, उन्हें हावड़ा जिला कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को एक ऐसा लेखक माना जाता है, जिन्होंने बंगाल के ग्रामीण परिवेश को अपने लेखन में अच्छी तरह से समाहित किया है। उनके कृतियों में ग्रामीण सार है, क्योंकि इनमें साधारण परिवारों, शहरों से बहुत दूर प्रकृति की गोद में, नदियों, पेड़ों और कृषि भूमि के बीच के जीवनकाल को कहानियों के रूप में दर्शाया गया है। उन्होंने महिलाओं के बारे में बहुत अधिक लिखा और एक पितृसत्तामक समाज में उनकी स्थिति के बारे में स्पष्ट रूप से और ईमानदारी से बताया। उन्होंने धर्म के नाम पर हो रहे सामाजिक भेदभाव, अन्याय और अंधविश्वास के खिलाफ विरोध किया। शरतचंद्र का पहला उपन्यास ‘बड़ीदीदी’ 1907 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उनका उपन्यास ‘बिंदुर छेले’ सन् 1913 में और एक अन्य उपन्यास ‘परिणीता’ 1914 में प्रकाशित हुआ। उनके इन उपन्यासों को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया और उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">सन् 2016 में उनका उपन्यास ‘बैकुन्ठेर उइल’ सन् 1917 में ‘देवदास’, ‘श्रीकांत’ और ‘चरित्रहीन‘ प्रकाशित हुए। देवदास और चरित्रहीन उपन्यास के प्रकाशन के बाद शरतचंद्र की गणना देश के चोटी के उपन्यासकारों में होने लगी। सन् 1926 में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘पाथेर दाबी’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का कथानक क्रांतिकारी विषयवस्तु पर आधारित था और पाठकों को आजादी के लिए प्रेरित करता था, इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। अपनी साहित्य यात्रा के दौरान शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने बच्चों के लिए कई कहानियां और उपन्यास लिखे। इनमें ‘रामर शुमाती’ तथा ‘लालू और  उनके दोस्त’ जैसी लघु कथाएं शामिल हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके  उपन्यास् और कहानियों पर सफल फिल्में भी बनाई गईं। इन फिल्मों में  ‘देवदास’, ‘परिणीता’, और ‘श्रीकांत’ जैसी फिल्मों ने अपार सफलता अर्जित की और वे दर्शकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुईं। शरतचंद्र को बंगाली साहित्य में योगदान देने के लिए कई पुरस्कार मिले। इनमें सन् 1903 में उन्हें मिला ‘कुंतालिन पुरस्कार’ सबसे महत्वपूर्ण है। सन् 1923 में बंकिम चंद्र चटर्जी को ‘जगत्तारिणी स्वर्ण पदक’ से विभूषित किया गया। सन् 1934 में उन्हे ‘बंगाली संगीत परिषद’ की सदस्यता प्रदान की गई।  16 जनवरी 1938 को उनकी मृत्यु से बंगाल साहित्य को भारी नुकसान हुआ। उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास हिंदी साहित्य की भी अनमोल धरोहर हैं। उनके विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों के लिए उनका सदैव स्मरण किया जाएगा। यह देश और समाज उनका ऋणी रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुरेश बाबू मिश्रा<br />साहित्य भूषण<br />ए-979, राजेन्द्र नगर, बरेली-243122 (उ॰प्र॰)<br />मोबाइल नं. 9411422735, <br />E-mail : <a href="mailto:sureshbabubareilly@gmail.com">sureshbabubareilly@gmail.com</a></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 12:00:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्राकृतिक सौंदर्य का दर्शनीय स्थल अमरकंटक </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश भारत के उत्तर और दक्षिण तथा पूर्व और पश्चिम का संधि- स्थल ही नहीं है, अपितु भौगोलिक दृष्टि से यहां पहाड़ पठार, घने वन, विस्तृत मैदान और नदी घाटियों का आकर्षक एवं समृद्ध प्रकृति का वरदान भी है। प्रकृति, कला और सौंदर्य की दृष्टि से यह पर्यटकों के लिए स्वर्ग है। ऐसा संयोग कम ही स्थलों को मिलता है, जहां प्रकृति की सुंदर छटा भी बिखरी हो और साथ ही धार्मिकता का पुण्य-लाभ भी प्राप्त हो, कदाचित मध्य प्रदेश का अमरकंटक ऐसा ही अनुपम स्थान है। <strong>-गौरीशंकर वैश्य विनम्र </strong></p>
<p style="text-align:justify;">अमरकंटक में प्रकृति रोमांचित करती है। घने जंगल आनंदित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579863/amarkantak--a-place-of-natural-beauty"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(31)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश भारत के उत्तर और दक्षिण तथा पूर्व और पश्चिम का संधि- स्थल ही नहीं है, अपितु भौगोलिक दृष्टि से यहां पहाड़ पठार, घने वन, विस्तृत मैदान और नदी घाटियों का आकर्षक एवं समृद्ध प्रकृति का वरदान भी है। प्रकृति, कला और सौंदर्य की दृष्टि से यह पर्यटकों के लिए स्वर्ग है। ऐसा संयोग कम ही स्थलों को मिलता है, जहां प्रकृति की सुंदर छटा भी बिखरी हो और साथ ही धार्मिकता का पुण्य-लाभ भी प्राप्त हो, कदाचित मध्य प्रदेश का अमरकंटक ऐसा ही अनुपम स्थान है। <strong>-गौरीशंकर वैश्य विनम्र </strong></p>
<p style="text-align:justify;">अमरकंटक में प्रकृति रोमांचित करती है। घने जंगल आनंदित करते हैं तथा अध्यात्म और धर्म इस नगरी को एक विशिष्ट पहचान दिलाते हैं। वास्तव में यह ऐसी जगह भी है, जो दो बड़ी नदियों नर्मदा और सोन का उद्गम स्थल भी है। पूर्व से पश्चिम की दिशा में बहने वाली देश की दो नदियों में एक नर्मदा का उद्गम एक छोटे कुंड से हुआ देखकर आश्चर्य होता है। पानी की झिर इस कुंड से होकर बड़े आयताकार कुंड में एकत्र होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस जलसंरचना का निर्माण कल्चुरी काल में किया गया। इसी प्रकार सोनमूढ़ा नर्मदाकुंड से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर मैकल पहाड़ियों के किनारे पर है। सोन नदी 100 फीट ऊंची पहाड़ी से एक झरने के रूप में यहां से गिरती है। इनके उद्गम को देखेंगे, तो लगेगा ही नहीं कि छोटे - छोटे कुंडों से निकलकर काफी दूर तक बहुत पतली धारा में बहने वाली ये नदियां देश की संस्कृति और धार्मिकता एवं विकास को नए आयाम देती हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">पहाड़ों पर बसा अमरकंटक </h5>
<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित अमरकंटक को तीर्थराज की संज्ञा भी दी गई है। यह समुद्र तट से लगभग 1065 मीटर ऊंचाई पर स्थित हिल स्टेशन की अनुभूति कराता है। कल्चुरी कालीन प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध अमरकंटक घने जंगल तथा औषधीय गुणों से भरपूर पौधों की सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ खदानें भी हैं और जलप्रपात भी, जल के अदृश्य स्रोत भी और सुंदर आश्रम तथा मंदिर भी। यहाँ का शांत वातावरण पर्यटकों को सहज ही आत्ममुग्ध कर देता है। अमरकंटक की यात्रा आध्यात्मिक स्पर्श कराती है। यहाँ आते ही हवा में ताजगी और शुद्धता का आभास होने लगता है। </p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन मान्यताओं के अनुसार माता सती के दो अंग इस क्षेत्र में गिरे थे, अतः यह क्षेत्र दो शक्तिपीठों का क्षेत्र होने के कारण अति पवित्र है। उन दो स्थानों में से एक सोनमूढ़ा सोन नदी के उद्गम स्थल के पास है और दूसरा माँ नर्मदा के उद्गम के पास स्थित देवी पार्वती जी का मंदिर है। यहाँ से मनमोहक झरने, पवित्र तालाब, ऊँची पहाड़ियों और शांत वातावरण यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">100 फीट ऊंचा जलप्रपात </h5>
<p style="text-align:justify;">पहले अमरकंटक शहडोल जिले में था। अब यह अनूपपुर जिले में है।यह मैकल पर्वत श्रृंखला पर स्थित है। पत्थरों की चारदीवारी के अंदर पत्थर से निर्मित नर्मदाकुंड मंदिर, शिव परिवार, कार्तिकेय मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, ग्यारह रुद्र मंदिर, अन्नपूर्णा, गुरु गोरखनाथ, श्री रामजानकी, श्री राधाकृष्ण मंदिर, श्री ज्वालेश्वर महादेव, सर्वोदय जैन मंदिर, कबीर चबूतरा, कपिलाधारा, माई की बगिया आदि स्थल सदियों पुरानी स्थापत्यकला को सहेजे हुए हैं, जहाँ धार्मिक पर्यटकों को आना उपकृत करता है। मंदिर परिसर के आसपास परिक्रमावासियों के समूह अमरकण्टक को तपस्थली के रूप में प्रतिबिंबित करते हैं। नर्मदा विश्व की एक मात्र सरिता है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। कुंड से आगे निकलकर नर्मदा कल - कल बहने लगती है। लगभग 6 किलोमीटर की यात्रा कर नर्मदा 100 फीट ऊँचा जलप्रपात बनाती है, जिसे कपिलाधारा के नाम से जाना जाता है। हरे - भरे वातावरण से घिरे इस झरने के आगे दूध धारा है, जो छोटा जलप्रपात है। यहाँ पर्यटक निडर होकर स्नान करते हैं। कालिदास भी यहाँ आए थे और वे यहाँ की सुंदरता में निमग्न हो गए। उनके मेघदूत के बादल इसी अमरकंटक नगरी के ऊपर से विचरण करते हैं। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने भी यहाँ आकर तप किया था। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रमुख स्थल :</strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">भगवान शिव का त्रिमुखी मंदिर </h5>
<p style="text-align:justify;">अमरकंटक के प्रमुख मंदिरों में भगवान शिव का त्रिमुखी मंदिर है। इसे कल्चुरी शासक कर्ण देव महाचंद्र ने 1041-1073 ई ० में निर्माण कराया था। मंदिर में कल्चुरी कालीन शिल्पकारों की बनाई आकृतियाँ सम्मोहित करती हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">कपिलाधारा</h5>
<p style="text-align:justify;">अमरकंटक की यात्रा कपिलाधारा देखे बिना अधूरी रहेगी। यहाँ 100 फीट की ऊँचाई से पानी गिरता है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि कपिल मुनि यहाँ रहते थे। कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन की रचना इसी स्थान पर की थी। कपिलाधारा के निकट ही कपिलेश्वर मंदिर भी बना है। इस जगह के आसपास कई गुफाएँ हैं, जहाँ अब भी साधु - संत ध्यानमग्न देखे जा सकते हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">कबीर चबूतरा </h5>
<p style="text-align:justify;">कबीरपंथियों के लिए इस स्थान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि संत कबीरदास संवत 1569 में बांधवगढ़ से जगन्नाथपुरी प्रवास के समय यहाँ लंबे समय तक रहे थे। उन्होंने यहाँ पर ध्यान लगाया था। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर कबीरदास के प्रवास के बीच गुरु नानक देव जी उनसे मिलने आए थे। कबीर चबूतरे के निकट ही रानी झरना (कबीर झरना) भी है। कबीर चबूतरे के ठीक नीचे एक जलकुंड है, जिसके बारे में कहा जाता है कि सुबह की किरणों के साथ ही यहाँ के जलकुंड का पानी दूध की तरह सफेद हो जाता है। </p>
<h5 style="text-align:justify;">धूनी पानी </h5>
<p style="text-align:justify;">यहाँ गर्म पानी का झरना  है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह झरना औषधीय गुणों से भरपूर है।इसमें स्नान करने से शरीर के असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">दुग्धधारा </h5>
<p style="text-align:justify;">दुग्धधारा एक ऐसा  झरना है , जिसका जल दूध के समान प्रतीत होता है, इसीलिए इसे दुग्धधारा के नाम से जाना जाता है। </p>
<h5 style="text-align:justify;">सोनमूढ़ा </h5>
<p style="text-align:justify;">यह सोन नदी का उद्गम स्थल है। यहाँ से घाटी और जंगल से ढकी पहाड़ियों के सुंदर दृश्य देखे जा सकते हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">माँ की बगिया </h5>
<p style="text-align:justify;">यह माता नर्मदा को समर्पित है। कहा जाता है कि इस हरी - भरी बगिया से शिव जी की पुत्री नर्मदा पुष्पों को चुनती थीं। यह बगिया नर्मदा कुंड से एक किलोमीटर की दूरी पर है। </p>
<h5 style="text-align:justify;">सर्वोदय जैन मंदिर </h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-(33)1.jpg" alt="Untitled design (33)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">यह मंदिर भारत के अद्वितीय मंदिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है। मंदिर में स्थित मूर्ति का वजन 24 टन के लगभग है। भगवान आदिनाथ अष्ट धातु के कमल सिंहासन पर विराजमान हैं, कमल सिंहासन का वजन 17 टन है। प्रतिमा को मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने 6 नवंबर, 2006 को विधि - विधान से स्थापित किया था। </p>
<h5 style="text-align:justify;">नर्मदा परिक्रमा </h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-(32)2.jpg" alt="Untitled design (32)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">नर्मदा परिक्रमा विधि - विधान - नियम से की जाए,तो 1300 किमी से भी अधिक लंबी परिक्रमा होती है,जो 3 वर्ष 3 महीने 13 दिन में पूर्ण होती है, किन्तु आज के समय में मोटरसाइकिल या चौपहिया वाहन के द्वारा यात्रा को जल्दी पूरा कर लिया जाता है। नर्मदा परिक्रमा में नर्मदा नदी को पार नहीं किया जाता है। परिक्रमा में सभी स्थानों पर दर्शनीय स्थल देखने को मिलते हैं। </p>
<h5 style="text-align:justify;">यहां कैसे पहुंचें </h5>
<p style="text-align:justify;">अमरकंटक जबलपुर और बिलासपुर के निकट है। शहडोल से भी सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है।अमरकंटक का निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर में है। यहाँ से अमरकंटक की दूरी 245   किमी है। जबलपुर - बिलासपुर ट्रैक पर पेंट्रा रोड स्टेशन अमरकंटक के सबसे समीपस्थ रेलवे-स्टेशन है। बिलासपुर, अनूपपुर और जबलपुर जंक्शन से भी अमरकंटक पहुँचा जा सकता है। शहडोल रेलवे-स्टेशन से अमरकंटक से  80 किमी तथा अनूपपुर रेलवे-स्टेशन से 72 किमी दूर है, जहाँ से लगातार बसें और टैक्सियां चलती रहती हैं। <br />  <br /><strong>-गौरीशंकर वैश्य विनम्र </strong><br /><strong>117 आदिलनगर, विकासनगर </strong><br /><strong>लखनऊ 226022 </strong><br /><strong>दूरभाष 09956087585 </strong><br /><strong>ईमेल - <a href="mailto:gsvaish51@gmail.com">gsvaish51@gmail.com</a></strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 10:21:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जॉब का पहला दिन:  सपनों से हकीकत तक पहला कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जीवन के कालखंड में कुछ तिथियां स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो जाती हैं। 25 मार्च 1995 का दिन मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय दिन है। इसी दिन मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की अमायन शाखा, जिला भिंड (मध्य प्रदेश) में अपनी पहली नौकरी की शुरुआत की और अपने करियर की पहली औपचारिक दहलीज लांघी। एक 22 वर्षीय युवा के लिए यह दिन उत्साह, गर्व और हल्की-सी बेचैनी का अनूठा संगम था। यह केवल नौकरी का पहला दिन नहीं, बल्कि मेरे सपनों, संघर्षों और आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला ठोस कदम था।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह का समय अलग ही उत्साह और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579149/first-day-on-the-job--the-first-step-from-dreams-to-reality"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/निराश्रित-पशु-का-अंतिम-संस्कार-करातीं-भावना-सक्सेना-(4).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जीवन के कालखंड में कुछ तिथियां स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो जाती हैं। 25 मार्च 1995 का दिन मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय दिन है। इसी दिन मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की अमायन शाखा, जिला भिंड (मध्य प्रदेश) में अपनी पहली नौकरी की शुरुआत की और अपने करियर की पहली औपचारिक दहलीज लांघी। एक 22 वर्षीय युवा के लिए यह दिन उत्साह, गर्व और हल्की-सी बेचैनी का अनूठा संगम था। यह केवल नौकरी का पहला दिन नहीं, बल्कि मेरे सपनों, संघर्षों और आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला ठोस कदम था।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह का समय अलग ही उत्साह और घबराहट से भरा हुआ था। मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे- कैसा होगा नया कार्यस्थल, कैसे होंगे सहकर्मी, क्या मैं अपनी जिम्मेदारियों को निभा पाऊंगा? इन सवालों के बीच एक आत्मविश्वास भी था, जो मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा था। प्रातः 10 बजे मैं अपने बड़े भाई अरविंद त्रिवेदी जी के साथ बैंक पहुंचा। उस समय मन में हजारों विचार उमड़ रहे थे। परिवार के संस्कार और बैंक की साख, दोनों का सम्मान मेरे कंधों पर था। मार्च का महीना बैंकिंग क्षेत्र में ‘क्लोजिंग’ का समय होता है, इसलिए वातावरण में विशेष व्यस्तता और ऊर्जा थी। जब मैंने शाखा प्रबंधक एस. सोनवणे जी को अपनी जॉइनिंग रिपोर्ट सौंपी, तो वह क्षण केवल पदभार ग्रहण करना नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में समाज सेवा का संकल्प भी था। शाखा का वातावरण अनुशासन और कार्यकुशलता से परिपूर्ण था। वरिष्ठ कर्मचारियों आजाद जी, एस.एस. कुशवाहा और आनंद पाल ने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया। उनकी सरलता और सहयोगपूर्ण व्यवहार ने मेरी झिझक को काफी हद तक दूर कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">मुझे बैंक के विभिन्न कार्यों जमा-निकासी, खातों का संचालन और ग्राहकों से संवाद के बारे में बताया गया। लेजर, वाउचर और कैश ट्रांजैक्शन जैसी बैंकिंग प्रक्रियाओं से मेरा परिचय उसी दिन प्रारंभ हुआ। यह सब नया था, किंतु सीखने की ललक ने हर चुनौती को सरल बना दिया। अमायन जैसे ग्रामीण क्षेत्र में बैंक केवल वित्तीय संस्था नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे का केंद्र होता है। पहले ही दिन मुझे समझ आ गया कि यहां काम केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि लोगों की उम्मीदों का है।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय सारा कार्य हस्तलिखित रजिस्टरों में होता था। एक छोटी सी चूक भी बड़ा अंतर उत्पन्न कर सकती थी, इसलिए एकाग्रता अत्यंत आवश्यक थी। मुझे मुख्यतः निरीक्षण और समझने का कार्य सौंपा गया। मैंने ध्यानपूर्वक हर प्रक्रिया को देखा और समझने का प्रयास किया। दोपहर में सहकर्मियों के साथ हुई अनौपचारिक बातचीत ने मुझे एक टीम का हिस्सा होने का एहसास कराया। उसी दिन यह भी समझ आया कि बैंक की नौकरी केवल ‘दस से पांच’ की ड्यूटी नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम है।</p>
<p style="text-align:justify;">सहकर्मियों का सहयोग मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा। उन्होंने धैर्यपूर्वक हर बात समझाई, जिससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। दिन के अंत में जब सहकर्मी आनंद ने मुझे रहने और खाने की व्यवस्था में सहयोग का प्रस्ताव दिया, तो मन भावुक हो उठा। मुझे लगा कि मैंने अपने जीवन की एक नई यात्रा आरंभ कर दी है। इस दिन ने मुझे जिम्मेदारी, अनुशासन और समर्पण का महत्व सिखाया।</p>
<p style="text-align:justify;">बाद में, 13 मई 1996 को उत्तर प्रदेश पीसीएस में चयनित होने के बाद, लगभग चौदह महीने की सेवा के पश्चात मैंने बैंक की नौकरी छोड़ दी। किंतु बैंक में बिताया गया पहला दिन आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है। उस दिन ने जो अनुभव और सीख दी, वह जीवन के हर पड़ाव पर मेरे साथ रही। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में बिताया गया समय मेरे व्यक्तित्व के निर्माण की नींव बना और उसी दिन ने मुझे आगे बढ़ने का साहस दिया।-<span style="color:rgb(186,55,42);">अजय त्रिवेदी, उप निदेशक युवा कल्याण</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 10:00:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अंजा रिंगग्रेन लोवेन:  एक मानवतावादी महिला की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अंजा रिंगग्रेन लोवेन एक डेनिश मानवतावादी कार्यकर्ता हैं, जिन्हें नाइजीरिया में ‘विष्ट बच्चे’ (व्हिच चिल्ड्रेन) के रूप में आरोपित बच्चों को बचाने और उनकी पुनर्वास के लिए जाना जाता है। वे लैंड ऑफ होप नामक चैरिटी संगठन की संस्थापक हैं, जो पहले ‘दिन नॉधजेल्प’ (एक डेनिश नाम है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-आपकी आपातकालीन सहायता) के नाम से जाना जाता था। उनका जन्म 4 सितंबर, 1978 को डेनमार्क के फ्रेडरिकशावन शहर में हुआ था। अंजा ने न केवल हजारों बच्चों की जिंदगियां बचाई हैं, बल्कि अफ्रीकी समाज में अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता फैलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी कहानी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579146/anja-ringgren-lov%C3%A9n--the-story-of-a-humanitarian-woman"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/निराश्रित-पशु-का-अंतिम-संस्कार-करातीं-भावना-सक्सेना-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अंजा रिंगग्रेन लोवेन एक डेनिश मानवतावादी कार्यकर्ता हैं, जिन्हें नाइजीरिया में ‘विष्ट बच्चे’ (व्हिच चिल्ड्रेन) के रूप में आरोपित बच्चों को बचाने और उनकी पुनर्वास के लिए जाना जाता है। वे लैंड ऑफ होप नामक चैरिटी संगठन की संस्थापक हैं, जो पहले ‘दिन नॉधजेल्प’ (एक डेनिश नाम है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-आपकी आपातकालीन सहायता) के नाम से जाना जाता था। उनका जन्म 4 सितंबर, 1978 को डेनमार्क के फ्रेडरिकशावन शहर में हुआ था। अंजा ने न केवल हजारों बच्चों की जिंदगियां बचाई हैं, बल्कि अफ्रीकी समाज में अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता फैलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी कहानी प्रेरणा का स्रोत है, जो दिखाती है कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति कैसे विश्व स्तर पर बदलाव ला सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><span style="background-color:rgb(186,55,42);">  </span> <strong> प्रारंभिक जीवन और शिक्षा-</strong> अंजा का बचपन डेनमार्क के एक छोटे से शहर में बीता, जहां वे अपनी मां, बड़ी बहन और जुड़वां बहन के साथ रहती थीं। उनके पिता शराबी थे और मां की असमय मृत्यु ने उनके जीवन को गहरा आघात पहुंचाया। इससे वे अवसाद, चिंता और एनोरेक्सिया जैसी समस्याओं से जूझीं। 1998 में उन्होंने फ्रेडरिकशावन जिम्नेजियम से शिक्षा पूरी की। उसके बाद वे मध्य पूर्व की यात्रा पर गईं और इजरायल के एक किबुट्ज में रहीं, जहां उन्होंने सामुदायिक जीवन का अनुभव प्राप्त किया।</p>
<p style="text-align:justify;">2001 में उन्होंने मर्स्क एयर के साथ स्टूअर्डेस (हवाई जहाज में महिला केबिन क्रू) के रूप में प्रशिक्षण लिया, लेकिन अपनी मां की टर्मिनल बीमारी के कारण नौकरी छोड़ दी। मां की मृत्यु के बाद वे खुदरा क्षेत्र में काम करने लगीं और आरहूस शहर में एक स्टोर मैनेजर बनीं। यह अवधि उनके जीवन की चुनौतियों से भरी थी, लेकिन इन्होंने ही उनकी मानवतावादी यात्रा की नींव रखी।</p>
<p style="text-align:justify;"><br /><span style="background-color:rgb(186,55,42);"> </span> <strong>  मानवतावादी कार्यों की शुरुआत-</strong> अंजा का मानवतावादी सफर 2008 में तब शुरू हुआ, जब उन्होंने ब्रिटिश डॉक्यूमेंट्री ‘व्हिच चिल्ड्रेन’ देखी, जिसमें नाइजीरिया में जादू-टोने के आरोप में बच्चों पर होने वाले अत्याचारों को दिखाया गया था। इन बच्चों को परिवार और समाज द्वारा त्याग दिया जाता है, उन्हें यातनाएं दी जाती हैं या यहां तक कि जिंदा जला दिया जाता है। यह दृश्य अंजा के बचपन के सपने, अफ्रीका में काम करने के सपने को साकार करने के लिए प्रेरणा बना। 2009 में उन्होंने डेनिश नेशनल चर्च एड के लिए मलावी में तीन महीने का पर्यवेक्षक कार्य किया, जहां उन्होंने एक स्कूल के नवीनीकरण के लिए धन जुटाया। इसके बाद तंजानिया में एक स्कूल बनाने में मदद की। 2012 में, आरहूस में सेल्सपर्सन की नौकरी छोड़कर, उन्होंने डीआईएनएनोदहजेल्प की स्थापना की। अपनी सारी संपत्ति बेचकर उन्होंने नाइजीरिया में ‘विष्ट बच्चों’ को बचाने का संकल्प लिया। 2013 में वे पूर्णकालिक रूप से इस कार्य में लग गईं।</p>
<p style="text-align:justify;"><br /><span style="background-color:rgb(186,55,42);"></span>   <strong> लैंड ऑफ होप की स्थापना -</strong> 2014 में अंजा ने नाइजीरियाई कानून छात्र डेविड इम्मानुएल उमेम के साथ मिलकर अफ्रीकन चिल्ड्रेंस एड एजुकेशन एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन की सह-स्थापना की। उन्होंने अकवा इबोम राज्य मंन तीन एकड़ जमीन खरीदी और इंजीनियर्स विदाउट बॉर्डर्स की मदद से लैंड ऑफ होप चिल्ड्रेंस सेंटर का निर्माण किया। यह केंद्र पश्चिम अफ्रीका का सबसे बड़ा ऐसा केंद्र है, जिसमें 100 बच्चों के लिए आवास, अस्पताल, व्यावसायिक स्कूल और कृषि भूमि शामिल है। यहां बच्चों को सुरक्षित वातावरण मिलता है, शिक्षा दी जाती है, स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती है और अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">संगठन का उद्देश्य न केवल बचाव है, बल्कि बच्चों को उनके परिवारों में पुनर्स्थापित करना भी है। अंजा और उनकी टीम ने अब तक सैकड़ों बच्चों को बचाया है, जो पहले सड़कों पर भटकते या यातनाएं झेलते थे। वे स्थानीय समुदायों में शिक्षा के माध्यम से अंधविश्वासों को समाप्त करने पर काम करती हैं। केंद्र में रहने वाले 95 बच्चे अब स्कूल में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं और कई को उनके परिवारों में वापस लौटाया जा चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रमुख उपलब्धियां</strong></p>
<p style="text-align:justify;">अंजा के कार्यों को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिसमें सम्मिलित हैं-</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>2016- </strong>ओओओएम मैगजीन द्वारा ‘दुनिया की सबसे प्रेरणादायक व्यक्ति’।<br /><strong>2016- </strong>नील्स एबेसन मेडल।<br /><strong>2017- </strong>पॉल हैरिस फेलोशिप और होप अवॉर्ड।<br /><strong>2017- </strong>डेन ऑफ द ईयर के लिए नामांकन।<br /><strong>2023- </strong>रेड क्रॉस ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्हें दलाई लामा द्वारा ‘हीरो’ घोषित किया गया है। उनके कार्यों पर कई डॉक्यूमेंट्री भी बनी हैं, जैसे हेल्वेडेस हेल्टे, अंजा ओग हेक्सेबोर्नेने और हेक्सेनकिंडर इन नाइजीरिया (जर्मनी, 2018)। अंजा डेनमार्क की सबसे मांग वाली वक्ताओं में से एक हैं, जहां वे अपनी कहानी, बलिदान और नाइजीरिया के अंधविश्वासों पर व्याख्यान देती हैं।-<span style="color:rgb(186,55,42);">रूफिया खान</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 09:00:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>विश्व धरोहर दिवस :  सभ्यता की अमूल्य धरोहरों को संरक्षण की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। इसे विश्व विरासत दिवस, वर्ल्ड हेरिटेज डे तथा आधिकारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस (इंटरनेशनल डे फोर मोन्यूमेंट्स एंड साइट्स) कहा जाता है। यह दिवस मानवता की साझा सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इन स्थलों का संरक्षण यूनेस्को विश्व धरोहर सम्मेलन, 1972 के अंतर्गत किया जाता है, जिसे यूनेस्को सदस्य देशों द्वारा स्वीकार किया गया एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समझौता माना जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य विश्वभर के ऐतिहासिक स्मारकों, सांस्कृतिक स्थलों, पुरातात्विक अवशेषों, प्राकृतिक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579148/civilization-s-priceless-heritage-needs-protection"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/निराश्रित-पशु-का-अंतिम-संस्कार-करातीं-भावना-सक्सेना-(2).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। इसे विश्व विरासत दिवस, वर्ल्ड हेरिटेज डे तथा आधिकारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल दिवस (इंटरनेशनल डे फोर मोन्यूमेंट्स एंड साइट्स) कहा जाता है। यह दिवस मानवता की साझा सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इन स्थलों का संरक्षण यूनेस्को विश्व धरोहर सम्मेलन, 1972 के अंतर्गत किया जाता है, जिसे यूनेस्को सदस्य देशों द्वारा स्वीकार किया गया एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समझौता माना जाता है। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य विश्वभर के ऐतिहासिक स्मारकों, सांस्कृतिक स्थलों, पुरातात्विक अवशेषों, प्राकृतिक संपदाओं तथा मानव सभ्यता से जुड़ी अमूल्य विरासतों के संरक्षण के प्रति जनचेतना उत्पन्न करना है। वास्तव में धरोहर केवल पत्थरों से बनी इमारतें नहीं हैं, बल्कि वे हमारी संस्कृति, परंपरा, कला, ज्ञान, संघर्ष, इतिहास और सामूहिक पहचान की जीवंत प्रतीक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%AA%E0%A4%B6%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE-(2).jpg" alt="निराश्रित पशु का अंतिम संस्कार करातीं भावना सक्सेना (2)"></img></p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में 10 चयन मानदंड निर्धारित हैं, जिनमें से कम से कम एक को पूरा करना आवश्यक है। इनमें ऐतिहासिक महत्व, स्थापत्य कला, सांस्कृतिक प्रभाव, प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता तथा वैज्ञानिक महत्व जैसे पहलू सम्मिलित हैं। विश्व धरोहर मुख्यतः तीन प्रकार की होती है- पहली, सांस्कृतिक धरोहर, जिसमें स्मारक, मंदिर, मस्जिद, चर्च, किले, मूर्तियां, प्राचीन नगर, स्थापत्य कला, भाषा, संगीत, नृत्य और परंपराएं शामिल हैं। दूसरी, प्राकृतिक धरोहर, जिसमें पर्वत, नदियां, समुद्र, वन, वन्यजीव, जैव विविधता और अद्वितीय प्राकृतिक परिदृश्य आते हैं तथा तीसरी, मिश्रित धरोहर, जिनमें सांस्कृतिक और प्राकृतिक दोनों विशेषताएं विद्यमान होती हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यूनेस्को केवल स्थायी संरचनाओं या प्राकृतिक स्थलों को ही नहीं, बल्कि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को भी मान्यता देता है। भारत की योग परंपरा और कुंभ मेला इसके प्रमुख उदाहरण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व स्तर पर सबसे अधिक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों वाला देश इटली है, जिसके बाद चीन का स्थान आता है। भारत भी विश्व धरोहर स्थलों की दृष्टि से अग्रणी देशों में सम्मिलित है। यूनेस्को एक विशेष सूची ‘वर्ल्ड हेरिटेज इन डेंजर’ भी संचालित करता है, जिसमें उन स्थलों को शामिल किया जाता है, जो युद्ध, प्रदूषण, प्राकृतिक आपदा, अतिक्रमण, अत्यधिक पर्यटन, जलवायु परिवर्तन या उपेक्षा के कारण संकट में हों। यदि कोई स्थल संरक्षण मानकों का पालन न करे या उसका मूल स्वरूप गंभीर रूप से बदल जाए, तो उसे सूची से हटाया भी जा सकता है। </p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरणस्वरूप ओमान का अरेबियन ओरिक्स अभयारण्य तथा जर्मनी की ड्रेसडेन एल्बे घाटी को सूची से हटाया जा चुका है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अक्टूबर 2024 तक विश्वभर के 196 देशों में लगभग 1,223 विश्व धरोहर स्थल थे, जिनमें 952 सांस्कृतिक, 231 प्राकृतिक और 40 मिश्रित स्थल शामिल हैं। भारत जैसे प्राचीन और बहुसांस्कृतिक देश में इस दिवस का विशेष महत्व है। अप्रैल 2025 तक भारत में 43 विश्व धरोहर स्थल (34 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और 2 मिश्रित) तथा 62 स्थल संभावित सूची में सम्मिलित थे। भारत के प्रमुख धरोहर स्थलों में ताजमहल, आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, अजंता-एलोरा गुफाएं, एलीफेंटा गुफाएं, खजुराहो समूह, सांची स्तूप, महाबोधि मंदिर, हम्पी, महाबलीपुरम, जंतर-मंतर, कुतुब मीनार, लाल किला, कोणार्क सूर्य मंदिर, नालंदा, भीमबेटका, सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिमी घाट तथा कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान प्रमुख हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष एक विशेष थीम घोषित की जाती है। वर्ष 2026 की थीम है-‘संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवित विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया’ रखी गई है। इसका आशय यह है कि युद्ध, संघर्ष और प्राकृतिक आपदाओं के समय केवल भवनों और स्मारकों की ही नहीं, बल्कि जीवित विरासतों-जैसे लोक परंपराएं, सामाजिक ज्ञान, सांस्कृतिक पहचान और समुदाय आधारित परंपराएं की भी त्वरित सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। विश्व धरोहर दिवस केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, बल्कि मानवता की साझा विरासत को सुरक्षित रखने का वैश्विक संकल्प है। यदि हम अपनी धरोहरों की रक्षा नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास, संस्कृति और पहचान से वंचित हो जाएंगी। अतः विकास के साथ-साथ विरासतों के संरक्षण, संवर्द्धन और सम्मान के लिए हमें दृढ़ संकल्पित होकर कार्य करना चाहिए।-<span style="color:rgb(186,55,42);">सुनील कुमार महला</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Tourism</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 12:33:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> बेजुबान पशुओं को मिली जुबां, नाम गौरी-शंकर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">यूपी के सीतापुर में एक महिला ने निराश्रित पशुओं के संरक्षण में ऐसा बीड़ा उठाया कि घर की गृहस्थी को तिलांजलि देकर लाखों का फ्लैट ही खरीद डाला। 16 वर्षों से गोवंशों की सेवा करने में लगा परिवार गौमाताओं के लिए पौष्टिक भोजन के साथ फल-सब्जी और पर्याप्त दवाओं की उपलब्धता भी करा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE.jpg" alt="केला खाती गौमाता" /></p>
<p style="text-align:justify;">काष्ठा फाउंडेशन की संचालिका भावना सक्सेना बताती हैं कि 16 वर्ष पूर्व उन्हें नंदी चोटिल मिला, सड़क किनारे दो गौमाताएं भी थीं। अधिक जख्म होने के कारण कोई आगे नहीं बढ़ा, परिवार के साथ मिलकर सभी को घर के करीब ले लाए ताकि सेवा की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579141/voiceless-animals-find-a-voice%E2%80%94named-gauri-and-shanka"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/कुत्ते-के-बच्चों-का-रेस्क्यू-करतीं-योशिता-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">यूपी के सीतापुर में एक महिला ने निराश्रित पशुओं के संरक्षण में ऐसा बीड़ा उठाया कि घर की गृहस्थी को तिलांजलि देकर लाखों का फ्लैट ही खरीद डाला। 16 वर्षों से गोवंशों की सेवा करने में लगा परिवार गौमाताओं के लिए पौष्टिक भोजन के साथ फल-सब्जी और पर्याप्त दवाओं की उपलब्धता भी करा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE.jpg" alt="केला खाती गौमाता"></img></p>
<p style="text-align:justify;">काष्ठा फाउंडेशन की संचालिका भावना सक्सेना बताती हैं कि 16 वर्ष पूर्व उन्हें नंदी चोटिल मिला, सड़क किनारे दो गौमाताएं भी थीं। अधिक जख्म होने के कारण कोई आगे नहीं बढ़ा, परिवार के साथ मिलकर सभी को घर के करीब ले लाए ताकि सेवा की जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%AA%E0%A4%B6%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE.jpg" alt="निराश्रित पशु का अंतिम संस्कार करातीं भावना सक्सेना"></img></p>
<p style="text-align:justify;">तमाम प्रयास के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। तभी से मन बना लिया कि निराश्रित पशुओं के लिए छांव के साथ सारे इंतजाम करने हैं। भावना बताती हैं कि परिवार के सहयोग से पैसे इकट्ठा किए, घर की ज्वैलरी भी बेंच दी, बाद में सड़क किनारे एक मकान खरीदा। फ्लैट में गौवंश के साथ 72 निराश्रितों का परिवार है। इनमें नियमित उपचार के साथ फल-सब्जियों का वितरण कराया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%88-%E0%A4%B9%E0%A5%89%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%9F%E0%A4%B2-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%95-%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%9A%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%9C%E0%A5%82%E0%A4%A6-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6.jpg" alt="शहर के आई हॉस्पिटल चौराहे के नजदीक छांव के नीचे मौजूद गौवंश"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;">ठीक होने के बाद लोगों ने अपनाए गौवंश</h5>
<p style="text-align:justify;">भावना सक्सेना की पुत्री योशिता निजी कंपनी में कार्यरत हैं। कहती हैं कि ठीक होने के बाद कई गौवंशों को अपनाने के लिए शहर और उसके आसपास के परिवार आगे आए, बताती हैं कि सड़क पर निकलते समय घायल और बीमार पशुओं को लाना दिनचर्या में है। अब तक एक लाख से अधिक गौवंशों की सेवा की जा चुकी है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">भंडारा और अंतिम संस्कार के लिए परिवार एकजुट</h5>
<p style="text-align:justify;">भावना बताती हैं कि परिवार में पुत्र स्वरित और बहू निधि के अलावा पति मुकुल मोहन और पुत्री योशिता मिलकर गौवंशों और निराश्रित पशु (कुत्ता, बिल्ली आदि) के लिए भंडारे का आयोजन करते हैं, शहर और उसके आसपास हादसे का शिकार पशुओं के अंतिम संस्कार का जिम्मा भी दैनिक दिनचर्या में है। </p>
<h5 style="text-align:justify;">नाम पुकारते ही दौड़ पड़ते हैं गौवंश</h5>
<p style="text-align:justify;">महिला और उनके बच्चों ने हर गौवंश का नाम रखा गया है। राजा, गणेश, गौरी, शंकर, गौरा, यशोदा, ममता, मंत्र, काली, रघु, भरत, आदि, छोटू, चंदू, बिल्लो सहित अन्य नामों से पुकारे जाने वाले गौवंश नाम सुनते ही दौड़ पड़ते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><br /><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>-जीशान कदीर, सीतापुर </strong></span></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 12:17:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मानवता की पुकार,  युद्ध नहीं समाधान </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">पिछले 40 वर्षों में उसने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे देशों के भीतर एक ऐसा गुप्त नेटवर्क खड़ा किया है, जिससे उसकी रणनीतिक गहराई का पता मिलता है। यह नेटवर्क राजधानी तेहरान से शुरू होकर भूमध्य सागर से लाल सागर तक फैला हुआ है। सीरिया की सरकार, लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन का हूती आंदोलन और फिलिस्तीन का हमास जैसे समूह शामिल हैं, ये सभी किसी न किसी रूप में ईरान के समर्थन और संसाधनों पर निर्भर हैं और अक्सर अमेरिका और इजराइल के खिलाफ सक्रिय रहते हैं, इनका मकसद अपने क्षेत्र से अमेरिका और इजराइल के प्रभाव को खत्म</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578251/the-call-of-humanity--solution--not-war"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(2)11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले 40 वर्षों में उसने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे देशों के भीतर एक ऐसा गुप्त नेटवर्क खड़ा किया है, जिससे उसकी रणनीतिक गहराई का पता मिलता है। यह नेटवर्क राजधानी तेहरान से शुरू होकर भूमध्य सागर से लाल सागर तक फैला हुआ है। सीरिया की सरकार, लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन का हूती आंदोलन और फिलिस्तीन का हमास जैसे समूह शामिल हैं, ये सभी किसी न किसी रूप में ईरान के समर्थन और संसाधनों पर निर्भर हैं और अक्सर अमेरिका और इजराइल के खिलाफ सक्रिय रहते हैं, इनका मकसद अपने क्षेत्र से अमेरिका और इजराइल के प्रभाव को खत्म करना है। ईरान इन समूहों को फंडिंग, हथियार और ट्रेनिंग देकर इतना मजबूत करता है, ताकि देश के भीतर शांति बनी रहे और संघर्ष बाहर ही बाहर चलता रहे। इस दौरान ईरान ने अपनी सैन्य और साइबर ताकत को भी लगातार बढ़ाया, पर्शियन गल्फ के पास स्थित भूमिगत मिसाइलों के बसे शहर इसका उदाहरण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मार्च 2026 तक भारतीय नया रुपया 94 से 95 प्रति डॉलर के आसपास पहुंच चुका था और यह गिरावट जारी है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है और जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ता है और उसकी कीमत गिरती है। वैश्विक बाजार में उत्पन्न किसी भी अनिश्चितता का असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की मुद्रा पर पड़ता है। हमारा रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बन गया है। हम तो यही चाहेंगे कि मिडिल ईस्ट जितनी जल्दी संघर्ष विराम लग जाय, हमारे लिए हितकर है। ट्रंप की हालत तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी है। उनके मन: स्थिति पल-पल में बदल रही है। ये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्राध्यक्ष का व्यवहार तो बिल्कुल भी नहीं है। इजराइल और ईरान के बीच चल रहा तनाव अब बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। </p>
<p style="text-align:justify;">पिछले महीने यानी मार्च में भी इजरायल ने ईरान के इसी गैस प्लांट को निशाना बनाया था, जिसके बाद ट्रंप का बयान आया था कि अब ईरान के एनर्जी इंफ्रा, खासकर साउथ पार्स प्लांट पर हमला नहीं किया जाएगा। ज्ञात हो कि साउथ पार्स ईरान का सबसे बड़ा गैस इंफ्रा है। ईरान की 70 प्रतिदिन गैस यहीं से आती है। यह ईरान के लिए सोने की खान से कम नहीं है। कह सकते हैं कि यह सीधे तौर पर ईरानी अर्थव्यवस्था पर हमला है। साउथ पार्स का इसका होर्मुज से बेहद नजदीक है, अब होर्मुज रूट पर भी संकट मडराने लगा है। तेल गैस फैसिलिटी पर चुन-चुनकर मिसाइल दागकर हमला करना और हबशान फुजैरा पाइपलाइन में आग लगना सिर्फ यूएई के लिए ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए। हम एलपीजी के लिए लाइन में खड़े हैं। इस तरह के हमले हमारी भी चिंता के विषय हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान इजराइल युद्ध ने दुनियाभर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है, जहां कई देशों को एनर्जी इमरजेंसी लगानी पड़ रही है। भारत में चलने वाले ढाबे, रेस्टोरेंट बंद होने के कगार पर हैं। कुछ बंद हो चुके हैं। भारत सरकार द्वारा मुश्किल समय आने का संकेत दिया गया है। हमारे तेल भंडार पर्याप्त नहीं हैं। उड़ीसा और कर्नाटक में नए तेल भंडार बनने जा रहे हैं, जिन्हें पूरा होने में 2030 तक का समय लगेगा। हालांकि पेट्रोलियम को लेकर अभी देश में बांग्लादेश और पाकिस्तान की तरह मारामारी नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने करीब 5 मिलियन बैरल ईरानी क्रूड खरीदा है।  रेल हमारे देश में सबसे बड़ा यातायात का साधन है और राहत की बात यह है कि हमारे पास कोयले का रिजर्व भंडार है और हाइड्रो पावर भी है, जो रेल यातायात को सुचारू रखने में मददगार साबित होंगे, लेकिन युद्ध के लंबा खींचने पर विषम स्थिति आ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">युद्ध के ठेकेदारों को आम जनता की परेशानी से कोई मतलब नहीं रहता। ऋ षिकेष में रहने वाले एक मित्र सपरिवार एक महीने के लिए सैन फ्रांसिस्को से भारत आए थे। जैसे ही वापस जाने का समय आया तो फ्लाइट कैंसिल होने लगीं। टिकटों के दाम बढ़ने लगे। आनन-फानन में लंबा ले-ओवर लेकर टिकट कराई ताकि समय से पहुंच कर नौकरी ज्वाइन कर सकें और आर्थिक संकट से भी बचें। एक ईरानी गीतकार अपना गिटार लेकर प्लांट के पास ही बैठ गया था। ऐसे मौके पर देश में एकता होनी बहुत जरूरी है। क्योंकि सबसे बड़ी बात यह कि कोई भी युद्ध केवल हथियारों का टकराव नहीं होता, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी लंबे समय तक गहरा प्रभाव छोड़ता है। दुनियाभर में बैठे युद्ध के ठेकेदारों को इस बात को समझना होगा।-<strong>अमृता पांडे, स्वतंत्र लेखिका</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 08:00:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title> जॉब का पहला दिन: कार्यक्षेत्र का माहौल देखकर हुआ जिम्मेदारी का एहसास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मेरे जीवन का वह दिन आज भी ताजगी के साथ याद आता है, जब मैंने 2 सितंबर 2012 को शाहजहांपुर की तहसील तिलहर में बैंक ऑफ बड़ौदा में क्लर्क के रूप में अपनी नौकरी में पहला कदम रखा था। सुबह से ही मन में उत्साह और हल्की-सी घबराहट का मिश्रण था। नए कपड़े पहनकर, आवश्यक दस्तावेजों को संभालते हुए जब मैं बैंक की शाखा में पहुंचा, तो वहां का वातावरण मेरे लिए बिल्कुल नया और अलग था। बैंक का विशाल हॉल, ग्राहकों की लंबी कतारें, कंप्यूटर की लगातार चलती आवाजें और कर्मचारियों की व्यस्तता यह सब देखकर मन में एक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578249/first-day-on-the-job--the-work-environment-instilled-a-sense-of-responsibility"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(1)10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मेरे जीवन का वह दिन आज भी ताजगी के साथ याद आता है, जब मैंने 2 सितंबर 2012 को शाहजहांपुर की तहसील तिलहर में बैंक ऑफ बड़ौदा में क्लर्क के रूप में अपनी नौकरी में पहला कदम रखा था। सुबह से ही मन में उत्साह और हल्की-सी घबराहट का मिश्रण था। नए कपड़े पहनकर, आवश्यक दस्तावेजों को संभालते हुए जब मैं बैंक की शाखा में पहुंचा, तो वहां का वातावरण मेरे लिए बिल्कुल नया और अलग था। बैंक का विशाल हॉल, ग्राहकों की लंबी कतारें, कंप्यूटर की लगातार चलती आवाजें और कर्मचारियों की व्यस्तता यह सब देखकर मन में एक जिम्मेदारी का एहसास हुआ। </p>
<p style="text-align:justify;">शाखा प्रबंधक ने मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया और अन्य कर्मचारियों से परिचय कराया। सभी ने पूर्णत: सहयोग का आश्वासन दिया, जिससे मेरा आत्मविश्वास और बढ़ा गया। मुझे पहले दिन काउंटर पर बैठाकर पासबुक अपडेट और छोटे-मोटे लेन-देन का कार्य सौंपा गया। शुरुआत में उंगलियां कीबोर्ड पर थोड़ी धीमी चल रही थीं और हर एंट्री को दो बार जांचने की आदत पड़ रही थी। एक-दो बार छोटी-सी गलती भी हुई, लेकिन वरिष्ठ सहकर्मी ने धैर्यपूर्वक समझाया। उनके सहयोग ने मुझे काम को समझने में सहज बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्राहकों से संवाद करना मेरे लिए नया अनुभव था। कोई जल्दी में था, तो कोई अपनी समस्या लेकर परेशान। एक बुजुर्ग व्यक्ति जब पासबुक अपडेट कराने आए और काम होने पर मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया, तो वह पल मेरे लिए बेहद खास बन गया। उस समय महसूस हुआ कि यह नौकरी सिर्फ लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की सेवा और विश्वास से भी जुड़ी है। दोपहर तक काम का दबाव बढ़ गया, लेकिन धीरे-धीरे मैंने गति पकड़ ली। </p>
<p style="text-align:justify;">दिन के अंत में जब कैश मिलान सही निकला, तो मन में एक संतोष और आत्मविश्वास की भावना जागी। लगा कि मैंने अपने पहले दिन की परीक्षा सफलतापूर्वक पार कर ली। शाम को घर लौटते समय थकान जरूर थी, लेकिन उससे कहीं ज्यादा खुशी और गर्व का एहसास था। पहला दिन मेरे लिए केवल एक शुरुआत नहीं था, बल्कि जिम्मेदारी, सीख और आत्मविश्वास की नई यात्रा का आरंभ था। यह अनुभव हमेशा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा।<strong>- पुलकित कुमार,इटावा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 13:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>व्यंग्यः शर्मा जी का अंडरवियर...</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">शर्मा और शर्माइन की जुगलबंदी ऐसी थी कि तेरे संग रहा न जाए और तेरे बिन भी रहा न जाए। दिन भर एक दूसरे के ऊपर तुनकना, कोई रूठ जाए तो फिर मनाना और फिर एक हो जाना। उनकी गृहस्थी की गाड़ी कभी दो पहियों के सहारे तो कभी चार पहियों के सहारे खट्टी मीठी चल रही थी। </p>
<p style="text-align:justify;">शर्मा जी ठहरे थोड़ा कंजूस प्रवृति के और शर्माइन ठहरी खुलकर खर्च करने वाली और यही वजह थी दोनों की आपसी नोक झोंक की। अक्सर शर्माइन राजधानी एक्सप्रेस की तरह दौड़ने के चक्कर में अपनी बालकनी में जब साड़ियां सूखने के लिए</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578462/satire--sharma-ji-s-underwear----beena-nayal--independent-writer"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/muskan-dixit-(41)2.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">शर्मा और शर्माइन की जुगलबंदी ऐसी थी कि तेरे संग रहा न जाए और तेरे बिन भी रहा न जाए। दिन भर एक दूसरे के ऊपर तुनकना, कोई रूठ जाए तो फिर मनाना और फिर एक हो जाना। उनकी गृहस्थी की गाड़ी कभी दो पहियों के सहारे तो कभी चार पहियों के सहारे खट्टी मीठी चल रही थी। </p>
<p style="text-align:justify;">शर्मा जी ठहरे थोड़ा कंजूस प्रवृति के और शर्माइन ठहरी खुलकर खर्च करने वाली और यही वजह थी दोनों की आपसी नोक झोंक की। अक्सर शर्माइन राजधानी एक्सप्रेस की तरह दौड़ने के चक्कर में अपनी बालकनी में जब साड़ियां सूखने के लिए डालती थी, तो चिमटी लगाना भूल जाती थी इसी हड़बड़ी में कई बार साड़ी और दूसरे कपड़े नीचे वाले पड़ोसी की बालकनी मे गिर जाते थे, जिसे लेने के लिए शर्मा जी को अक्सर नीचे जाना पड़ता था। खैर वह भी कोई बात नहीं, परेशानी तो तब होती थी, जब शर्माइन के सूट या साड़ी का कोई जोड़ा आंधी में उड़कर दूर खंबे में लटक जाता था, जिसे पूरा मोहल्ला घूम-घूम कर निहारता था और पूछता था शर्मा जी तुम्हारी पत्नी के कपड़े पैदल चल चलकर कितनी दूरी तय कर लेते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शर्मा जी द्वारा कपड़े वापस लाने पर शर्माइन बोलती थी अरे यह मेरा नहीं है किसी काम वाली का होगा। शर्मा जी बोलते थे तुम्हारा ही है। वापस क्यों नहीं लेती हो। शर्माइन गुस्से में फट पड़ती कि जब कपड़ा आंधी में उड़कर चला ही गया तो उसे वापस लेने का कोई औचित्य नहीं है। शर्मा जी हम दूसरा ले लेंगे। शर्मा जी बोलते अरे भाग्यवान पैसे क्या पेड़ पर उगते हैं, तो शर्माइन बोली पैसे तो पेड़ पर फिर भी उग जाएंगे क्या इज्जत पेड़ पर उगती है। शर्मा जी शर्माइन के तर्कों के आगे बेबस हो जाते।</p>
<p style="text-align:justify;">खैर एक दिन शर्माइन ने बालकनी में शर्मा जी का अंडरवियर सूखने के लिए डाला, जो चिमटी न लगाए जाने के कारण खो गया। खैर वो शर्मा जी का अंडरवियर ठहरा तो उसकी ढूंढ तो मचनी ही थी। शर्माइन ने कहा अरे दूसरा ले लो, शर्मा जी ने कहा नहीं उसे ही ढूंढना पड़ेगा, पैसे पेड़ पर नहीं उगते हैं। शर्मा जी नीचे पड़ोसन के घर गए और बोले आपकी बालकनी में मेरा अंडरवियर आया है क्या? पड़ोसन बोले शर्मा जी शर्म नहीं आती है आपको, एक तो गलती ऊपर से बेशर्मी। कम से कम मेरे पति के आने का ही इंतजार कर लेते। और आया होता तो मैं क्या दीवार पर नहीं टांग देती? कोई दूसरे का अंडरवियर अपने घर पर रखेगा क्या? </p>
<p style="text-align:justify;">शर्मा जी का अंडरवियर खो चुका था। हद तो तब हो गई, जब एक दिन पड़ोस मे एक बंदर उनका अंडरवियर पहनकर अलग-अलग बिल्डिंग में कूद फांद करने लगा। मोहल्ले भर के लोगों को अब मुफ्त का तमाशा मिल गया, चलते फिरते लगे टोकते, अरे शर्मा जी आज तक तो आपकी पत्नी के कपड़े उड़कर केवल खंबे तक जाते थे और आज तो आपका अंडरवियर बंदर पहने घूम रहा है। ऐसा कीजिए आप इसे वापस ले लीजिए हम मदद करते है। शर्मा जी बोले क्या इसमें लिखा है यह मेरा अंडरवियर है। </p>
<p style="text-align:justify;">शर्मा जी मुंह छुपाते-छुपाते घर तक आ गए और सारा वाक्या अपनी पत्नी को बताया तो पत्नी ने तंज कसा की वापस क्यों नहीं लेकर आए, अगर खंबे से मेरी साड़ी उतारकर ला सकते हैं तो ये क्यों नहीं? शर्मा जी बोले भाग्यवान कुछ तो शर्म करो इज्जत का फालूदा निकालोगी क्या?</p>
<p style="text-align:justify;">खैर यह तो एक वाक्या हुआ। एक दिन शर्मा जी रोजमर्रा की दुकान से जो अंडरवियर लाए वो साइज में दो नंबर कम था। शर्मा जी ने अंडरवियर पहन लिया और अंडरवियर मशीन में धुल गया। पहनने के बाद शर्मा जी को लगा यह तो टाइट है, तो उन्होंने उसे पुराने अंडरवियर से नापा जो 2 इंच छोटा था। शर्मा जी ने शर्माइन को बोला चलो इस अंडरवियर को वापस करने।<br />शर्माइन बोली शर्मा जी अंडरवियर कौन वापिस करता है, वह भी पहना हुआ। शर्मा जी ने बोला हम करेंगे ना वापस। शर्माइन बोली शर्म बाकी है मुझ में। आप चले जाओ मैं नहीं जाऊंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">शर्मा जी की दुकान में गए और बिफरते हुए बोले कि आप लोगों को बेवकूफ बनाते हो। अंडरवियर तो टाइट आया है, जो नंबर बोला था आपने उसे दो नंबर कम दिया है। दुकानदार ने समझदारी दिखाते हुए बिना कुछ कहे, उनको नया अंडरवियर दे दिया। खैर शर्मा की खुशी-खुशी घर वापस आ गए जैसे बहुत बड़ा किला फतह कर लिया हो। शर्माइन को बहुत गुस्सा आया। शर्मा इन बोली न वापस करने वाले को शर्म और न लेने वाले को शर्म। अब बच्चे शर्मा जी और शर्माइन की चिलमपो से बहुत परेशान हो चुके थे। बेटा बोला मम्मी तुम्हारी आदत भी गंदी है दौड़-भाग के चक्कर में कपड़ों में चिमटी नहीं लगती हो, जिससे पूरे मोहल्ले में जगहंसाही होती है और पापा आपकी कंजूसी और सामान वापस करने की आदत से हमारा बाहर जाना मुश्किल हो गया है।  शर्मा और शर्माइन अब एक हो गए और बच्चों पर बरसते हुए बोले तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी मां उत्तर भारतीय बिल्कुल बेफिक्र और मैं दक्षिण भारतीय सोच समझकर चलने वाला और तुम हाइब्रिड बच्चे हो तुम्हें भी हमारे रंग में रंग जाना चाहिए था। तुम उल्टा हमें ही सुना रहे हो। घोर कलयुग है। बच्चे मां-बाप को समझाने लग गए हैं। हम लड़ते नहीं हैं। हम यह तो घर के माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखने के लिए खट्टी-मीठी नोकझोंक है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- बीना नयाल, स्वतंत्र लेखिका</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पॉजिटिव स्टोरीज</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 05:00:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
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                <title>मुरीद रूमी के लिए ईरान से तुर्की पहुंचे शम्स</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मुरीद रूमी के लिए ईरान से तुर्की पहुंचे शम्स शम्स तबरेजी 13 वीं सदी के एक महान फारसी सूफी संत, दार्शनिक और कवि थे, जिन्हें प्रसिद्ध कवि जलालुद्दीन रूमी के आध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है। मौलाना शम्स अल-दीन मुहम्मद इब्ने मलिकदादे तब्रीजी का जन्म लगभग 1184 ईस्वी में ईरान के अजरबैजान प्रांत की राजधानी तब्रीज में हुआ था।<strong> -करन सिंह मौर्य, बरेली</strong></p>
<p style="text-align:justify;">‘शम्स’ अरबी शब्द है, जिसका अर्थ सूरज होता है और वे सचमुच अपने समय के आध्यात्मिक आकाश में सूर्य की भांति चमके। उनके पिता का नाम इमाम अलाउद्दीन या अली बताया जाता है, जबकि उनके</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/578248/shams-arrives-from-iran-to-turkey%E2%80%94a-disciple-for-rumi"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मुरीद रूमी के लिए ईरान से तुर्की पहुंचे शम्स शम्स तबरेजी 13 वीं सदी के एक महान फारसी सूफी संत, दार्शनिक और कवि थे, जिन्हें प्रसिद्ध कवि जलालुद्दीन रूमी के आध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है। मौलाना शम्स अल-दीन मुहम्मद इब्ने मलिकदादे तब्रीजी का जन्म लगभग 1184 ईस्वी में ईरान के अजरबैजान प्रांत की राजधानी तब्रीज में हुआ था।<strong> -करन सिंह मौर्य, बरेली</strong></p>
<p style="text-align:justify;">‘शम्स’ अरबी शब्द है, जिसका अर्थ सूरज होता है और वे सचमुच अपने समय के आध्यात्मिक आकाश में सूर्य की भांति चमके। उनके पिता का नाम इमाम अलाउद्दीन या अली बताया जाता है, जबकि उनके दादा मलिक दाद थे। उस समय का परिवेश राजनीतिक और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। धर्मयुद्ध, मंगोल आक्रमण और सत्ता परिवर्तन ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">बाल्यावस्था में ही शम्स को शिक्षा हेतु शेख अबू बक्र-ए-सल्लह बाफ के सुपुर्द कर दिया गया। उन्होंने अपने गुरु से आध्यात्मिक साधना के अनेक आयाम सीखे, किंतु स्वयं शम्स का मानना था कि उनके भीतर कुछ ऐसा था, जिसे कोई पूरी तरह पहचान नहीं सका। ईश्वर की खोज की तीव्र लगन उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती रही, इसी कारण वे “शैख परिंदा” अर्थात उड़ता हुआ संत कहे जाने लगे। वे साधारण जीवन जीते हुए भी गहन आध्यात्मिक ज्ञान के धनी थे। फारसी और अरबी साहित्य, सूफी दर्शन, इस्लामी कानून तथा विज्ञान में उनकी गहरी पकड़ थी।</p>
<p style="text-align:justify;">युवावस्था में शम्स ईश्वर प्रेम में इतने डूब जाते थे कि कई-कई दिनों तक भोजन की सुध तक नहीं रहती थी। वे दरवेशों और सूफी संतों के साथ समय बिताते और परमात्मा से एक ऐसी आत्मा की प्रार्थना करते, जो उनके प्रेम और अनुभूति को समझ सके। अंततः 21 नवंबर 1244 को तुर्की के कोन्या में उनकी मुलाकात जलालुद्दीन रूमी से हुई। यह ऐतिहासिक मिलन दोनों के जीवन में परिवर्तन का कारण बना। शम्स ने रूमी को केवल एक विद्वान मौलवी से उठाकर प्रेम और भक्ति में डूबे महान सूफी कवि में परिवर्तित कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">रूमी शम्स के व्यक्तित्व और उनके दिव्य प्रेम से इतने प्रभावित हुए कि वे पूरी तरह उनके समर्पित हो गए। किंतु रूमी के शिष्यों और स्थानीय विद्वानों को यह संबंध स्वीकार नहीं हुआ। ईर्ष्या और विरोध के कारण शम्स को कोन्या छोड़ना पड़ा। उनके जाने से रूमी गहरे विरह में डूब गए। बाद में जब यह ज्ञात हुआ कि शम्स दमिश्क में हैं, तो रूमी ने अपने पुत्र वलद को उन्हें वापस लाने के लिए भेजा। शम्स पुनः कोन्या लौटे, किंतु विरोध की भावना समाप्त नहीं हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">अंत में परिस्थितियां ऐसी बनीं कि शम्स एक बार फिर कोन्या से चले गए और फिर कभी दिखाई नहीं दिए। उनके जीवन के अंतिम चरण को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं, किंतु सत्य आज भी रहस्य बना हुआ है। शम्स का जीवन सादगी, आत्मिक खोज और ईश्वर प्रेम का प्रतीक था। वे बाहरी आडंबर से दूर, केवल आंतरिक साधना में विश्वास रखते थे। उनका संपूर्ण जीवन इस सत्य को उजागर करता है कि सच्ची आध्यात्मिकता बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में बसती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 13:00:54 +0530</pubDate>
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