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                <title>शब्द रंग - Amrit Vichar</title>
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                            <item>
                <title>जॉब का पहला दिन : फिर तो ऐसा लगा कि जन्नत मिल गई हो </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सन् 1992 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमएससी रसायन शास्त्र अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था। समाचार पत्र में प्रक्रिया व उत्पाद विकास केन्द्र, कन्नौज में लैब तकनीशियन के तीन पदों का विज्ञापन देखा तो, अप्लाई कर दिया। इस बीच प्रोफेसर वीके वर्मा के निर्देशन में पीएचडी भी शुरू कर दी। नवंबर 1992 के अंतिम सप्ताह में एक पत्र कन्नौज से प्राप्त हुआ। प्रो. वीके वर्मा को दिखाया तो उन्होंने बधाई दी कि तुम्हारी तो नौकरी लग गई है, तुरंत जॉइन करो।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय तो यह भी नहीं पता था कि कन्नौज है कहां? क्योंकि इंटरव्यू कानपुर में हुआ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582123/first-day-on-the-job--then-it-felt-like-i-had-found-heaven"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(3)12.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सन् 1992 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमएससी रसायन शास्त्र अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था। समाचार पत्र में प्रक्रिया व उत्पाद विकास केन्द्र, कन्नौज में लैब तकनीशियन के तीन पदों का विज्ञापन देखा तो, अप्लाई कर दिया। इस बीच प्रोफेसर वीके वर्मा के निर्देशन में पीएचडी भी शुरू कर दी। नवंबर 1992 के अंतिम सप्ताह में एक पत्र कन्नौज से प्राप्त हुआ। प्रो. वीके वर्मा को दिखाया तो उन्होंने बधाई दी कि तुम्हारी तो नौकरी लग गई है, तुरंत जॉइन करो।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय तो यह भी नहीं पता था कि कन्नौज है कहां? क्योंकि इंटरव्यू कानपुर में हुआ था। कानपुर से सुबह की ट्रेन से कन्नौज पहुंचे। वहां केन्द्र की शुरुआत ही हुई थी। मात्र दो इंडस्ट्रियल शेड थे, जिसमें केंद्र संचालित हो रहा था। विभिन्न आधुनिक मशीन और यंत्र आदि लगे थे, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा पोषित थे। कार्यालय में कम्प्यूटर व फोटोकापी मशीन भी थी। यह दोनों चीजें उस समय सर्व सुलभ नहीं थीं। ऐसे में जब डॉ. आलोक लहरी ने कहा कि यह सब अब तुम्हारे अंडर में है, तो मुझे लगा कि मेरी तो लॉटरी लग गई है। वर्ना तो कोई इन्हें छूने भी नहीं देता था। लैब में डॉ. लहरी ने स्टाफ से परिचय कराया कि यह मिस्टर पाल हैं और यह दिलदार, इनसे जो भी काम करवाना हो करवा लेना। इसी दौरान पाल ने पूछा कि साहब चाय बना लाएं, तो मन में लड्डू फूट पड़े कि हम साहब कब से हो गए? अभी तक तो स्टूडेंट्स थे। मात्र चंद घटों में सब कुछ बदल गया। अभी यह सोच ही रहे थे कि डॉ. लहरी बोले, लाओ अपने सारे डॉक्यूमेंट दो, जॉइनिंग पत्र बनवा देते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">मालूम हुआ कि आज निदेशक डॉ. परमार्थी भी आए हैं और उन्हीं के समक्ष जॉइनिंग होगी। जब यह बताया कि हमें तो वाराणसी जाना है, सब ऐसे ही छोड़कर आ गए थे। परिवार में शादी भी है और सारा इंतजाम हमारे जिम्मे है। इस पर निदेशक डॉ. परमार्थी ने कहा कि यह नौकरी है, ऐसे नौकरी नहीं होती। बाकायदा एप्पलीकेशन दी जाती है उसके भी कुछ नियम-कानून है। ज्यादा से ज्यादा दो-तीन दिन की छुट्टी मिल सकती है। पहले काम समझ लो। इसी दौरान पता चला कि संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास कार्यक्रम के अंतर्गत परियोजना से जुड़े विशेषज्ञ शीघ्र आने वाले है। मशीनों की ट्रेनिंग के लिए टर्की जाना है। जल्दी से पासपोर्ट बनवाना है, फिर तो ऐसा लगा कि जन्नत मिल गई हो। </p>
<p style="text-align:justify;">देश और विदेश में सुगंधित तेल से संबंधित प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कन्नौज के इत्र उद्योग और इससे संबंधित उद्योगों की मदद के लिए कई सुगंधित तेलों का मानकीकरण किया। सन् 2003 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बाद प्रसार अधिकारी के रूप में कानपुर विस्तार इकाई में सन् 2004 में तैनाती मिली। 2015 में सहायक निदेशक व प्रभारी विस्तार इकाई कानपुर बनाया गया। इस तरह इस केंद्र में कार्य करते हुए 34 वर्ष हुए है।<br /> </p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>डॉ. भक्ति विजय शुक्ला, सहायक निदेशक व प्रभारी, विस्तार इकाई, सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2026 10:00:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पिकनिक स्पॉट में बदलते तीर्थस्थान, दिलचस्प हैं नतीजे </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बचपन की बात है। हमारा पूरा परिवार हरिद्वार गया था, मेरे माता-पिता, हम तीनों बच्चे और दादी। गर्मी के दिन थे। प्रोग्राम ये बना कि हरिद्वार और आस-पास के तीर्थ तो घूमेंगे ही, साथ में गर्मी से भी थोड़ी मुक्ति मिल जाएगी। उस समय जो देखा वो ये था कि मंदिर और धर्मशालाएं बहुतायत से थीं, होटल भी थे, लेकिन बहुत कम। आना-जाना ज्यादातर पैदल ही होता था, खाने के लिए ज्यादातर ढाबे थे या फिर छोटे-छोटे होटल, जिनमें सामान्य भोजन मिलता था। सबसे न्यारा दृश्य होता था सुबह, शाम और रात को हर की पैड़ी पर होने वाला स्नान</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582122/pilgrimage-sites-turning-into-picnic-spots--the-results-are-interesting"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design12.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बचपन की बात है। हमारा पूरा परिवार हरिद्वार गया था, मेरे माता-पिता, हम तीनों बच्चे और दादी। गर्मी के दिन थे। प्रोग्राम ये बना कि हरिद्वार और आस-पास के तीर्थ तो घूमेंगे ही, साथ में गर्मी से भी थोड़ी मुक्ति मिल जाएगी। उस समय जो देखा वो ये था कि मंदिर और धर्मशालाएं बहुतायत से थीं, होटल भी थे, लेकिन बहुत कम। आना-जाना ज्यादातर पैदल ही होता था, खाने के लिए ज्यादातर ढाबे थे या फिर छोटे-छोटे होटल, जिनमें सामान्य भोजन मिलता था। सबसे न्यारा दृश्य होता था सुबह, शाम और रात को हर की पैड़ी पर होने वाला स्नान और लोगों का कोलाहल। हम लोग भी शाम को लगभग रोज ही वहां जाते थे ढेर सारे आम और लीची के साथ। पोटली मे बांधकर आम और लीची गंगाजी में डुबोकर, जब ठंडी हो जाए तो खाते थे और हर की पैडी के नज़ारे का आनंद लेते थे। भीड़ भाड़ भी बहुत नहीं होती थी। कुल मिलाकर खुशनुमा माहौल था, जिसमे तीर्थ तो माता पिता और दादी ने किया हम बच्चों ने तो घूमने फिरने का आनंद लिया। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(1)11.jpg" alt="Untitled design (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद अभी तीन साल पहले हरिद्वार जाना हुआ। इतना शोर,गंदगी और भीड़-भाड़ कि पूछो मत। गंगा आरती मे जबरदस्त भीड़ और लगातार चंदा मांगते गंगा सेवा समिति के पंडे। मैंने पूछा तो पता चला हर शनिवार, रविवार को दिल्ली तक से लोग हरिद्वार आते हैं, हर तरह की सुविधाओं वाले होटलों मे रुककर पिकनिक मनाकर वापस चले जाते हैं।  देखा जाए तो पिछले 20-25 सालों से तीर्थ यात्रा के पर्यटन में बदल जाने की ये कहानी है बड़ी दिलचस्प, पाठकों मे से जो उम्र दराज होंगे, उनमें से बहुतों ने मेरी तरह इस बदलाव को देखा भी होगा। बदले आर्थिक माहौल ने सारे समाज पर प्रभाव डाला तो तीर्थ पर जाने वाले भी उससे प्रभावित कैसे नहीं होते? पहले तीर्थ पर जाने का मतलब होता था, सारा ध्यान पूजा-पाठ और भक्ति में लगाना और थोड़ा बहुत आस-पास के प्रसिद्ध स्थान भी देखना। जैसा मैंने बताया तीर्थ यात्रा करने के दौरान आरामदेह तरीके से रुकना और स्वादिष्ट खाना-पीना लोगों की प्राथमिकता मे नहीं होता था। हां एक बात और थी तीर्थ स्थानों पर जो पंडे-पुजारी और साधू मिलते थे अधिकांश निर्विकार होते थे, लालची भी थे, लेकिन बहुत कम। तीर्थ यात्रा का ये नजारा मोटे तौर पर सन् 2000 के आस-पास तक जारी रहा। इसके बाद भारतीय समाज ने बदलाव का एक नया दौर देखा। अर्थव्यवस्था में आई संपन्नता की वजह से भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता में बदलाव आया और उसकी प्राथमिकताओं में भी। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(2)13.jpg" alt="Untitled design (2)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">धर्मभीरु भारतीय समाज में तीर्थ यात्रा अभी भी पहली प्राथमिकता रही, लेकिन अब सुख सुविधाओं की तरफ भी लोगों का ध्यान जाने लगा। इस बदलाव की ओर तीर्थ स्थानों में बैठे पंडे- पुजारिओं और व्यापारियों का ध्यान भी गया। अब लोगों की जेब में पैसा था और तीर्थ स्थानों मे बैठे लोगों के पास जमीन, आश्रम और व्यापारी के पास पैसा। नतीजे में तीर्थस्थानों में पर्यटन सरीखी सुविधाएं देने की होड़ शुरू हो गई। नए-नए होटल तो बनने ही लगे आश्रम भी होटल सरीखे ही सुविधा संपन्न होने लगे। खाने-पीने की सुविधाएं भी मिलने लगीं। ये व्यवस्था होने लगी की जो जैसा भोजन चाहे उसे उपलब्ध कराया जाए। इस तरह से पूरा माहौल पिकनिक सरीखा होने लगा। अब एक पंथ दो काज वाला माहौल तीर्थस्थानों पर बन गया। यानी लोग तीर्थ के साथ पर्यटन का आनंद भी लेने लगे। ये बदलाव एक तरीके से सकारात्मक ही रहा, लेकिन धन का स्वभाव है कि वो अपने साथ लालच भी लाता है। तीर्थ स्थानों में भी वही हुआ और अधिक धन की लालच मे तीर्थ स्थानों पर वो सुविधाएं भी मिलने लगीं, जो शुद्ध व्यावसायिक हैं, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और जो उस इलाके के लिए कालांतर मे घातक साबित होंगी , कई जगहों पर ऐसा होने भी लगा है। </p>
<p style="text-align:justify;">अब जैसे ट्रेकिंग को ही लीजिए, पर्यटकों की डिमांड को पूरा करने के लिए तमाम जगहों पर ट्रेकिंग करवाई जाने लगी है, जिनसे पहाड़ों मे कई जगहों पर कूड़े और प्लास्टिक के कचरे के ढेर लगने लगे हैं। इसी हरिद्वार में ही शोभा के लिए गंगा आरती होती थी। उसकी सफलता से प्रेरित होकर अब गंगा आरती को एक तरह से व्यावसायिक रूप दे दिया गया है। भारी भीड़ होने लगी है और आरती खत्म होने के बाद घाटों पर गंदगी का अंबार लग जाता है, इतने से ही संतोष नहीं हुआ, तो लोग अब खास तौर से पहाड़ों वाले तीर्थ स्थानों पर परलोक सुधारने के लिए बसने भी लगे हैं। ऐसे लोगों ने तीर्थों को और प्रदूषित कराना शुरू कर दिया है। अति हर चीज की बुरी होती है। इसलिए जरूरी है कि कुछ हम खुद पर लगाम लगाएं और सरकार की तरफ से नए सिरे से कुछ नियोजन हो। वरना कालांतर में तीर्थ स्थान व्यापार के शुद्ध केंद्र बन जाएंगे और उनका स्वरूप ही बिगड़कर नष्ट हो जाएगा। बदले आर्थिक, सामजिक संदर्भों मे तीर्थ यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलें, ये बात तो समझ मे आती है, लेकिन इन सुविधाओं के कारण तीर्थ स्थान, पर्यटन केंद्र मे बदल जाएं ये न तो तीर्थ यात्रियों के हित मे होगा न ही पर्यटकों के।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>अनेहस शाश्वत</strong></h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 09:00:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>आम नहीं है आम यह है खास</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">फलों की विशाल दुनिया में, आम को जो शाही दर्जा प्राप्त है, वैसा शायद ही किसी और को मिले। फलों का राजा कहे जाने वाले आम न केवल एक स्वादिष्ट उष्णकटिबंधीय फल हैं, बल्कि ऐसा पौष्टिक चमत्कार भी हैं, जो लाजवाब स्वाद और असाधारण स्वास्थ्य लाभों का संगम है। 4000 साल पहले दक्षिण एशिया में उत्पन्न हुए ये जीवंत और रसीले फल सभी महाद्वीपों में फैल चुके हैं और अपने अनोखे स्वाद और पोषक तत्वों के मिश्रण से लोगों का दिल जीतते हुए उनके शरीर को पोषण प्रदान कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सीएसआईआर केंद्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान, गुजरात</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582119/it-is-not-common--it-is-special"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(45)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">फलों की विशाल दुनिया में, आम को जो शाही दर्जा प्राप्त है, वैसा शायद ही किसी और को मिले। फलों का राजा कहे जाने वाले आम न केवल एक स्वादिष्ट उष्णकटिबंधीय फल हैं, बल्कि ऐसा पौष्टिक चमत्कार भी हैं, जो लाजवाब स्वाद और असाधारण स्वास्थ्य लाभों का संगम है। 4000 साल पहले दक्षिण एशिया में उत्पन्न हुए ये जीवंत और रसीले फल सभी महाद्वीपों में फैल चुके हैं और अपने अनोखे स्वाद और पोषक तत्वों के मिश्रण से लोगों का दिल जीतते हुए उनके शरीर को पोषण प्रदान कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सीएसआईआर केंद्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान, गुजरात आम सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि अपनी खास पहचान और कहानी के लिए भी मशहूर हैं। लंगड़ा आम का नाम जहां दिलचस्प कहानी से जुड़ा है, वहीं मालदाआम दुनियाभर में मशहूर है। केसर आम अपनी खुशबू और रंग के लिए जाना जाता है और हापुस आम को जीआई टैग मिला हुआ है। दूसरी ओर तोतापरी आम का उपयोग जूस, पल्प और अचार में अधिक होता है। अलग-अलग किस्मों के कारण आम हर रूप में लोगों की पसंद बना हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">आम (मैंगिफेरा इंडिका) एक उष्णकटिबंधीय फल है, जिसमें मूल्यवान आवश्यक पोषक तत्व और फाइटोकेमिकल घटकों की एक अनूठी संरचना होती है। ऐतिहासिक रूप से, ताजे आम केवल शुष्क मौसम के अंत में ही उपलब्ध होते हैं। हालांकि बेहतर आपूर्ति श्रृंखला और आधुनिक फल प्रसंस्करण/संरक्षण तकनीकों के कारण, वे अब दुनियाभर के किराना स्टोरों में साल भर उपलब्ध रहते हैं। आम की सर्वउपलब्धता, विशेष सुगंध, पौष्टिकता, रसीला स्वाद  तथा आकर्षक रंग के कारण इसे 'फलों का राजा' कहना बिल्कुल सही है।</p>
<h4>भारत में आम की सबसे अधिक किस्में</h4>
<p style="text-align:justify;">भारत में आम की सबसे अधिक किस्में पाई जाती हैं और यह देश की सबसे अधिक व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली फल फसल है। माना जाता है कि आम की उत्पत्ति इंडो-बर्मा क्षेत्र में हुई और स्पेनिश खोजकर्ताओं द्वारा इसे दक्षिण अमेरिका में फैलाया गया। भारत विश्व में आम का सबसे बड़ा उत्पादक है, जो प्रतिवर्ष कई करोड़ टन आम का उत्पादन करता है। बागानों के बढ़ते क्षेत्रफल के कारण भारत में आम का उत्पादन प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। भारत विश्व के कुल आम उत्पादन में 52.63प्रतिशत का योगदान देता है। देश में आम की खेती कुल क्षेत्रफल (5.57 मिलियन हेक्टेयर) का 22.1 प्रतिशत और फलों के कुल उत्पादन (47.94 मिलियन टन) का 22.9 प्रतिशत है। हालांकि आम की खेती के लिए सबसे बड़ा क्षेत्र उत्तर प्रदेश में 0.27 मिलियन हेक्टेयर है, वहीं आंध्र प्रदेश में प्रति हेक्टेयर 12 टन की उच्चतम उत्पादकता है। आंध्र प्रदेश में 3.07 मिलियन टन आम का उत्पादन होता है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में क्रमशः 2.39 मिलियन, 1.79 मिलियन और 0.92 मिलियन टन आम का उत्पादन होता है। आम की मिठास को अक्सर उच्च शर्करा स्तर से भ्रमित किया जाता है और इसे मोटापे और मधुमेह से जोड़ा जाता है, जिससे परहेज की सिफारिशें और व्यवहार उत्पन्न होते हैं। परंतु वैज्ञानिक शोध इन निष्कर्षों का समर्थन नहीं करते और स्पष्ट करते हैं कि आम का सेवन और मधुमेह रोग का संबंध कंडीशनल है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">आम की पृष्ठभूमि</h4>
<p style="text-align:justify;">देश में आम की लगभग 1500 किस्में पाई जाती हैं। हालांकि कुछ विशेष किस्में ही ज्यादा प्रचलित एवं लोकप्रिय हैं। आम की प्रत्येक किस्म का अपना विशेष आकार, आकृति, रंग, बनावट और विशिष्टस्वाद होता है। रंग, स्वाद और सुगंध आम के पकने की अवस्था से भी संबंधित होते हैं। केसर, दशहरी, लंगड़ा या सिंधुरा से लेकर तोते की चोंच के आकार के तोतापुरी तक, आम की कई अनोखी किस्में भारतीय बाजारों में छाई रहती हैं। इसके अलावा, लगभग 300 ग्राम वजन का प्रसिद्ध रत्नागिरी अल्फोंसो (हापुस) और बिहार का अनोखा सुगंध वाला मालदा भी है। भारत में आमों की कई अद्भुत किस्में पाई जाती हैं, जो अप्रैल के मध्य से अगस्त तक बाजारों में छाई रहती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>आम की किस्में</strong></p>
<h4 style="text-align:justify;">तोतापरी</h4>
<p style="text-align:justify;">आम की यह किस्म तोते की चोंच जैसी दिखती है। यह कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पाई जाती है। स्वाद में हल्का और रंग में हरा, इस किस्म में आम का गूदा अन्य किस्मों की तरह मीठा नहीं होता, लेकिन सलाद और अचार के लिए बहुत अच्छा होता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">हापुस</h4>
<p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की मूल यह किस्म अब गुजरात और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी उगाई जाती है। पुर्तगाली जनरल ‘अफोंसो डी अल्बुकर्क’ के नाम पर इसका नाम ‘अल्फांसो’ पड़ा, जिसे महाराष्ट्र में स्थानीय रूप से ‘हापुस’ कहा जाने लगा। हापुस (अल्फोंसो) भारत में पाई जाने वाली प्रमुख आम की किस्मों में से एक है, जो अपने रस और मिठास के लिए प्रसिद्ध है। इसका स्वाद और सुगंध लाजवाब होती है। यह सबसे महंगी किस्मों में एक है इसे निर्यात भी किया जाता है और प्रसंस्करण उद्योगों में भी इसका उपयोग होता है। अल्फोंसो आम दुनिया का सबसे स्वादिष्ट आम है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">चौसा</h4>
<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश और बिहा की यह किस्म शेरशाह सूरी द्वारा सोलहवीं शताब्दी में अपने शासनकाल के दौरान लाई गई थी। बिहार के एक शहर के नाम पर इसका नाम रखा गया है। इस किस्म की विशेषता इसका बेहद मीठा गूदा और चमकीला पीला छिलका है। इसका रंग पीला-सुनहरा होता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">रसपुरी</h4>
<p style="text-align:justify;">कर्नाटक का मैसूरु क्षेत्र में इस किस्म को भारत में आमों की रानी के रूप में जाना जाता है। यह मई महीने में आता है और जून के अंत तक उपलब्ध रहता है। दही, स्मूदी और जैम के रूप में इसका स्वाद सबसे अच्छा होता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">लंगड़ा</h4>
<p style="text-align:justify;">यह उत्तर प्रदेश के आम की एक प्रसिद्ध किस्म है, जिसकी उत्पत्ति के वाराणसी में हुई थी। नाम के अनुसार, इसे लंगड़ा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसकी खेती सबसे पहले एक ऐसे व्यक्ति के खेतों में हुई थी, जिसके पैर नहीं थे। यह जुलाई से अगस्त तक उपलब्ध रहता है। अंडाकार आकार का यह आम पकने पर भी हरे रंग का रहता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">केसर</h4>
<p style="text-align:justify;">आम में गुजरात की सबसे महंगी किस्मों में से एक इस आम के गूदे का रंग केसर जैसा होता है, जिसके नाम पर इसका नाम रखा गया है। इस किस्म की खेती सबसे पहले 1931 में जूनागढ़ के नवाबों द्वारा की गई थी और 1934 में इसका नाम केसर रखा गया था। इसकी सबसे खास पहचान इसकी केसर जैसी खुशबू है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">दशहरी</h4>
<p style="text-align:justify;">यह उत्तर प्रदेश की इस किस्म का नाम लखनऊ के पास स्थित दशहरी गांव के नाम पर रखा गया है। यह उत्तर भारत में एक लोकप्रिय व्यावसायिक किस्म है और हमारे देश की सर्वश्रेष्ठ किस्मों मंा से एक है। इसका फल आकार में छोटा से मध्यम, आयताकार और तिरछा होता है, और पीले रंग का होता है। इस आम की गुणवत्ता उत्कृष्ट होती है और इसका लंबे समय तक भंडारण किया जा सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>डॉ. कांति भूषण पांडेयप्रधान वैज्ञानिक</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 10:21:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्येष्ठ माह और जलदान की सनातन परंपरा  </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">‘जल ही जीवन है’ ज्येष्ठ माह की गर्मी की प्रचंडता इस कहावत को सौ फीसदी सच साबित करती है। सूर्य किरणों की तपन की ज्येष्ठता (प्रचंडता) के कारण हिन्दू पंचांग में वर्ष के तीसरे महीने को ज्येष्ठ कहा जाता है। सर्वाधिक बड़े दिन वाला यह महीना गर्मी के हिसाब से सबसे ज्यादा कष्टकारी होता है। इस महीने में ‘नौतपा’ नक्षत्र भी लगता है। ‘नौतपा’ यानी सर्वाधिक तपने वाले नौ दिन। ज्योतिषीय गणना के अनुसार माना जाता है कि जेठ महीने में सूर्य जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब गर्मी प्रचंड पड़ती है। इन दिनों में वायुमंडल का अधिकतम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581391/the-month-of-jyeshtha-and-the-eternal-tradition-of-offering-water"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(20)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">‘जल ही जीवन है’ ज्येष्ठ माह की गर्मी की प्रचंडता इस कहावत को सौ फीसदी सच साबित करती है। सूर्य किरणों की तपन की ज्येष्ठता (प्रचंडता) के कारण हिन्दू पंचांग में वर्ष के तीसरे महीने को ज्येष्ठ कहा जाता है। सर्वाधिक बड़े दिन वाला यह महीना गर्मी के हिसाब से सबसे ज्यादा कष्टकारी होता है। इस महीने में ‘नौतपा’ नक्षत्र भी लगता है। ‘नौतपा’ यानी सर्वाधिक तपने वाले नौ दिन। ज्योतिषीय गणना के अनुसार माना जाता है कि जेठ महीने में सूर्य जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब गर्मी प्रचंड पड़ती है। इन दिनों में वायुमंडल का अधिकतम तापमान 45 से 48 डिग्री तक पहुंच जाता है। आधुनिक मौसम वैज्ञानिक इसे ‘हीट वेव’ या लू वाले दिन भी कहते हैं। </p>
<h4 style="text-align:justify;">लोककवि घाघ व भड्डरी का सटीक मौसम विज्ञान </h4>
<p style="text-align:justify;">ज्ञात हो कि हमारे भारत की पुरातन कृषि संस्कृति के सदियों पुराने अनुभवों से निकले निष्कर्ष आज के मशीनी युग में भी कितने सही साबित हो रहे हैं, यह विचारणीय बिंदु है। भारतीय लोकजीवन के मौसम विज्ञानी माने जाने वाले महाकवि घाघ और भड्डरी द्वारा मध्ययुग में मौसम, वर्षा और कृषि को लेकर की गईं भविष्यवाणियां आज की इक्कीसवीं सदी में भी उतनी ही सटीक हैं, जो तब थीं जब पर्यावरण संकट और ऋ तु चक्र परिवर्तन जैसी कोई परिकल्पना भी नहीं थी। </p>
<p style="text-align:justify;">जानना दिलचस्प हो कि कहावतों व लोकोक्तियों में की गई इन भविष्यवाणियों में ‘नौतपा’ के बारे में लोककवि घाघ कहते हैं- जेठ मास जो तपे निरासा, तब जानों बरसा की आसा। तपै नवतपा नव दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय।। अर्थात यदि ज्येष्ठ माह में नौतपा खूब तपा तो उस साल बारिश जमकर होगी। वहीं यदि नौतपा के दौरान बारिश हो गई तो इसे ‘नौतपा’ का गलना कहा जाता है। ऐसा होने पर मानसून के दौरान अच्छी बारिश की संभावना नहीं होती। इसी तरह महाकवि घाघ के समकालीन लोककवि भड्डरी भी कहते हैं-  सर्व तपे जो रोहिनी, सर्व तपे जो मूर। परिवा तपे जो जेठ की उपजे सातों तूर।। अर्थात जब जेठ के रोहिणी नक्षत्र की परेवा में गर्मी खूब गर्मी पड़ती है, तो उस वर्ष जमकर वर्षा होती है। वाकई हैरानी की बात है कि इन बातों का कोई वैज्ञानिक आधार न होते हुए भी यदि हम देश के मानसून के बारे में सोचें तो यह अनुमान सही प्रतीत होते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ज्येष्ठ माह के भंडारों की पावन परंपरा</h4>
<p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ माह में सूर्य के प्रचंड ताप के कारण कुएं, नदी, तालाब व पोखर आदि जलस्रोतों के सूख जाने के कारण जल संकट की समस्या गहरा जाती है। हम मनुष्य तो किसी तरह अपने आप को इस भीषण गर्मी से सुरक्षित रख लेते हैं, लेकिन उन निरीह पशु-पक्षियों का क्या जिनके लिए यह आग उगलती गर्मी किसी जानलेवा मुसीबत से कम नहीं होती। भूख और प्यास की वजह से पशु-पक्षियों के दम तोड़ने की सर्वाधिक घटनाएं इसी चिलचिलाती गर्मी के मौसम में होती हैं। इन मूक पशु-पक्षियों का यूं भूखा-प्यासा रहकर दम तोड़ना हमारे प्रकृति चक्र और पर्यावरण के लिए बेहद अशुभ है। आज वैज्ञानिक भी मानते हैं कि भोजन शृंखला के चलते एक जीव का जीवन दूसरे पर और वनस्पती व जीवों का जीवन परस्पर अस्तित्व पर टिका है। </p>
<p style="text-align:justify;">अप्राकृतिक रूप से कोई एक जीव मरता है, तो उससे पूरी शृंखला प्रभावित होती है। ज्ञात हो कि हमारे वैदिक मनीषी मानवी चेतना के मर्मज्ञ होने के साथ प्रकृति संरक्षण के ज्ञान विज्ञान के भी गहन जानकार थे। इसीलिए उन्होंने सदियों पूर्व ही कुदरत के ऋ तु चक्र परिवर्तन के अनुरूप समाज में ऐसी परंपराएं विकसित कर दी थीं ताकि धार्मिक क्रियाकलापों के अनुपालन के साथ जन सामान्य विषम व प्रतिकूल परिस्तिथियों में कुदरत के ताने-बाने को क्षरित होने से बच सके। </p>
<p style="text-align:justify;">‘ज्येष्ठ’ माह में जल संरक्षण के साथ अन्न व जलदान हमारे की महान पूर्वजों द्वारा विकसित ऐसी ही एक श्रेष्ठ परंपरा है, जिसका अनुपालन आज भी हमारी ग्राम्य संस्कृति में देखा जा सकता है। यह हमारी वैदिक महान संस्कृति की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। इस परंपरा के तहत वैशाख व जयेष्ठ मास में जब गांव में फसल का नवीन अन्न आता है, तो पूरे माह भर स्थान पर देव पूजा के साथ भंडारे आयोजित किए जाते हैं। इन भंडारों से अनेक लाभ होते हैं। पहला तो समष्टि के प्रति लोकमंगल की भावना विकसित होती है। दूसरे इन आयोजनों में अमीर-गरीब सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के प्रसाद पाने की व्यवस्था होने से सामाजिक समरसता बढ़ती है तथा तीसरे इनसे बन्दर, कुत्ते, कौए, चिड़िया व चीटीं आदि अनेक मनुष्येत्तर जीवों को भी इस तपती शुष्क ऋ तु में सहजता से पेट भरने लायक आहार उपलब्ध हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>- पूनम नेगी</strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 08:00:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गजलों से पहचान हमीद खिजर </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चार दशक पहले हमीद खिजर को लगा शेर-ओ-शायरी का चस्का, आज जुनून की सूरत अख्तियार कर चुका है। पांच गजल संग्रहों के शायर हमीद खिजर ने अपने जुदा तेवरों वाली शायरी से अलग पहचान बनाई है। अब हमीद का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह अपनी शायराना सलाहियतों के दम पर धीरे-धीरे मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्हें राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर मिर्जा गालिब अवार्ड और अकबर इलाहाबादी अवार्ड मिल चुके हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर के मोहल्ला दिलाजाक में सितंबर 1974 में जन्मे हमीद खां हमीद खिजर को शायरी विरासत में नहीं मिली। गुनगुनाने के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581392/hamid-khizar-is-known-for-his-ghazals"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(21)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चार दशक पहले हमीद खिजर को लगा शेर-ओ-शायरी का चस्का, आज जुनून की सूरत अख्तियार कर चुका है। पांच गजल संग्रहों के शायर हमीद खिजर ने अपने जुदा तेवरों वाली शायरी से अलग पहचान बनाई है। अब हमीद का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह अपनी शायराना सलाहियतों के दम पर धीरे-धीरे मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्हें राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश की ओर मिर्जा गालिब अवार्ड और अकबर इलाहाबादी अवार्ड मिल चुके हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">शाहजहांपुर के मोहल्ला दिलाजाक में सितंबर 1974 में जन्मे हमीद खां हमीद खिजर को शायरी विरासत में नहीं मिली। गुनगुनाने के शौक ने धीरे-धीरे हमीद को गजल तक पहुंचा दिया। उन्होंने कम उम्र में ही बाकायदा गजल लिखना शुरू किया था। उनका मार्गदर्शन पड़ोस में रहने वाले कहानी लेखक व शायर अयूब ‘असर’ ने किया। उन्होंने हमीद की बेतरतीब शायरी को राह दिखाई। हमीद ने अपनी जादुई आवाज से जब शायरी गुनगुनाई तो सभी उनके मुरीद होते चले गए।</p>
<p style="text-align:justify;">हमीद ने अपनी अधूरी गजलों में नौ बरस तक अयूब असर से सही कराईं। बाद में उन्हीं की सलाह पर उस्ताद शायर ‘सागर’ वारसी से जुड़ गए। नए मार्गदर्शक ने उन्हें शायरी की नोक-पलक दुरुस्त करना सिखाया। इससे हमीद ‘खिजर’ की गजलों में नयापन आया। अपनी जादुई आवाज और खूबसूरत कलाम से हमीद शहर में होने वाली महफिलों में छा गए। उन्होंने अपना दिलो-दिमाग शायरी में इस कदर लगाया कि उनके पास गजलों के ढेर लग गए। </p>
<p style="text-align:justify;">हमीद ने इन बिखरी गजलों को संकलन के रूप में छपवाने में काफी मेहनत की। उनका पहला उर्दू गजल संग्रह ‘लम्स-ए-शबनम’ 2002 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह को खूब सराहना मिली। इसके बाद हमीद ने अपने प्रशंसकों के लिए वर्ष 2002 में हिन्दी गजल संग्रह ‘धड़कन’ के नाम से निकाला। ‘धड़कन’ के जरिए हमीद ने अपने और जमाने के सुख-दुख का एहसास कराया है। </p>
<p style="text-align:justify;">हमीद का तीसरा गजल संग्रह उर्दू में ‘लरजते साये’ वर्ष 2015 में, चौथा हिन्दी गजल संग्रह ‘ठंडी हवा के झोंके’ 2016 में और पांचवा गजल संग्रह ‘कर्बे शबनम’ वर्ष 2020 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने एक संग्रह ‘भोर की लालिमा’ 2022 में प्रकाशित कराया, जिसमें बाबा साहेब डा.भीमराव अम्बेडकर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कई रचनाकारों के लेख शामिल हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">लोक निर्माण विभाग शाहजहांपुर में कार्यरत हमीद को शायरी की भूख है। वह चाहे कितने भी मायूस क्यों न हों, लेकिन मुश्किलों को भी झेलने का कलेजा रखकर हमीद, ‘गजल’ का खाका तैयार कर ही लेते हैं। हमीद ने गजल को कई रंग व ढंग देने में ‘उस्तादाना’ फन दिखाया है। हालांकि वह खुद इसे नहीं मानते। पाठकों के बीच उनकी शायरी पसंद की जाए, बस इसी को हमीद अपने लिए सबसे बड़ा इनाम मानते हैं। उनका कहना है कि शायरी ने उन्हें जीने की राह दिखाई है, इसे वह हमेशा लिखते रहेंगे। </p>
<p style="text-align:justify;">हमीद को हिन्दी-उर्दू साहित्य सेवा के लिए उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान की ओर से दो बार पुरस्कार भी मिले। उन्हें मिर्जा गालिब अवार्ड और अकबर इलाहाबादी अवार्ड से नवाजा गया। पुरस्कार मिलने से हमीद के हौसलों को नई उड़ान और नया आकाश मिला। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-राशिद हुसैन जुगनू, शाहजहांपुर </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 10:00:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्राउड से किरदार तक : एक अभिनेता की बेबाक कहानी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मुंबई चमक-दमक, सपनों और संघर्षों की नगरी है, यहीं पर जन्में जाकिर हुसैन खान, जिनकी जड़ें पूर्वांचल के छोटे से जिले बस्ती से जुड़ी हैं। इनकी शुरुआती शिक्षा भी यहीं से हुई। बचपन बस्ती की सादगी, रामलीला और नुक्कड़ नाटकों के बीच बीता, जहां उन्होंने बंदर बनकर पहली बार मंच का स्वाद चखा, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, मायानगरी मुंबई की चकाचौंध ने उन्हें अपनी ओर खींचा और भीड़ भरी सड़कों पर काम की तलाश, छोट-छोटे रोल पाने के लिए लगातार संघर्ष करतें रहे। क्राउड एक्टिंग से सफर शुरू कर धीरे-धीरे टीवी और फिल्मों में अपनी जगह बनाई। जाकिर आज भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581355/an-actors-candid-story-from-crowd-to-character"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(45)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मुंबई चमक-दमक, सपनों और संघर्षों की नगरी है, यहीं पर जन्में जाकिर हुसैन खान, जिनकी जड़ें पूर्वांचल के छोटे से जिले बस्ती से जुड़ी हैं। इनकी शुरुआती शिक्षा भी यहीं से हुई। बचपन बस्ती की सादगी, रामलीला और नुक्कड़ नाटकों के बीच बीता, जहां उन्होंने बंदर बनकर पहली बार मंच का स्वाद चखा, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, मायानगरी मुंबई की चकाचौंध ने उन्हें अपनी ओर खींचा और भीड़ भरी सड़कों पर काम की तलाश, छोट-छोटे रोल पाने के लिए लगातार संघर्ष करतें रहे। क्राउड एक्टिंग से सफर शुरू कर धीरे-धीरे टीवी और फिल्मों में अपनी जगह बनाई। जाकिर आज भी खुद को जमीन से जुड़ा कलाकार मानते हैं। मुंबई की इसी चकाचौंध और उसके पीछे छिपे कड़वे सच को उन्होंने बेबाकी से उजागर किया। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-क्या इंडस्ट्री में आने के लिए संघर्ष करना पड़ा?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">बिल्कुल, मैं सुबह काम की तलाश में घर से निकलता और शाम को निराश होकर घर लौट आता। धीरे-धीरे मुझे क्राउड एक्टिंग में काम मिलने लगा। हंसते हुए, कहीं आग लग गई तो चिल्लाने को कहा जाता,‘टीपू सुल्तान’ में मुझे ‘जय हनुमान’ बोलने को कहा गया। फिर मुझे 1992 में आमिर खान के साथ फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ में काम मिला। उस समय मुझे एक दिन के 50 रुपए और 15 दिन के 750 रुपये मिले थे। आज साढ़े सात करोड़ रुपये मिल जाएं तो भी वो खुशी नहीं मिलेगी, जो उस साढ़े सात सौ रुपए में मिली थी।</p>
<p style="text-align:justify;"><br /><strong>-किन-किन कलाकारों के साथ आपने काम किया?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मैंने हेमा मालिनी, अनिल कपूर, संजय दत्त, अमिताभ बच्चन के साथ पोलियो ऐड के लिए काम किया। इसके अलावा सलमान खान, इरफान खान, जूही चावला, सोनू सूद, कादर खान और परेश रावल जैसे कई कलाकारों के साथ काम किया। टेलीविजन में सीआईडी, पवित्र रिश्ता, चाचा चौधरी,सावधान इंडिया के कई एपिसोड में भी मैंने एक्टिंग की।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-आपको असली पहचान कब मिली?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">1998 में जब सीआईडी सीरियल शुरू हुआ, जिसमें मुझे विलेन का रोल मिला। वहीं से पहचान मिलने शुरू हो गए। मैंने करीब 4000 टीवी एपिसोड और 72 से 75 फिल्मों में काम किया हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-अभिनेता बनना मुश्किल हैं, पर नेता बनना आसान हैं, आपने ऐसा क्यों कहा?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">व्यंग्यात्मक अंदाज में, देखिए, अभिनेता बनने के लिए खूबसूरती, टैलेंट और व्यक्तित्व चाहिए, लेकिन आज के दौर में नेता बनने के लिए सिर्फ बोलने की कला काफी है। हंसते हुए, एक आईएएस की सैलरी दो या ढाई लाख रुपए महीना होती है, जबकि एक सुपरस्टार एक फिल्म के करोड़ों रुपये लेते हैं। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि अभिनेता बनना कितना मुश्किल है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-क्या इंडस्ट्री में नेपोटिज्म हैं? क्या पैसा और बैकग्राउंड भी ज़रुरी हैं?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">आज के समय में टैलेंट के साथ-साथ पैसा भी जरूरी हो गया है। अगर मैं किसी अरबपति बाप का बेटा होता, तो शायद सुपरस्टार बन गया होता। जहां तक नेपोटिज्म की बात है, तो नेपोटिज्म हर जगह है, राजनीति में भी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-कास्टिंग काउच पर आपकी क्या राय है?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">मुझे नहीं लगता कि इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच जैसी कोई चीज भी है। कुछ लोग आगे बढ़ने के लिए खुद समझौता करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-क्या आपको सुपरस्टार न बनने का अफसोस हैं?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">बिल्कुल नहीं, आज मैं ज्यादा सुकून में हूं। स्टार्स के पास सबकुछ होता है, लेकिन प्रेशर भी बहुत होता है। मेरा मानना है ‘जो प्राप्त है, वहीं पर्याप्त’ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुशांत सिंह राजपूत के बारे में आपकी क्या राय है ? शायद वह आपके दोस्त थे?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">जी, सुशांत मुझसे उम्र में काफी छोटे थे पर, मेरी मित्रता थी। उन्होंने बहुत सफलता पाई, लेकिन मैंने उन्हें फ्रस्ट्रेशन में देखा। इसलिए कहते हैं कि शोहरत हमेशा खुशी नहीं देती।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-आपकी एकता कपूर के साथ क्या विवाद था?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">2014 में एकता कपूर की एक सीरियल के शूटिंग के दौरान कलाकारों के बीच विवाद हो गया और मैं बीच-बचाव करने चला गया, जिससे बात बढ़ गई और मामला एकता कपूर और महेश भट्ट तक पहुंच गया। बाद में समझौता हो गया, लेकिन मुझे सिरियल छोड़ना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-कोई यादगार पल?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">एक बार प्रयागराज कुंभ मेले 2019 में परफार्मेंस करने के लिए मेरे पास फोन आया, मुझे लगा कोई मजाक कर रहा है, क्योंकि मैं मुस्लिम हूं, लेकिन एक घंटे के अंदर मेरे एकाउंट में जब 50 हजार रुपये एडवांस आ गए तब मुझे विश्वास हुआ और 15 मिनट परफार्मेंस करने के लिए मुझे डेढ़ लाख रुपये मिले थे। आज तक मैं इस बात को भूला नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-आपके लिए सबसे गर्व का पल?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">जब 2019 में इंडियन सिनेमा का सबसे बड़ा अवार्ड ‘दादा साहेब फाल्के फिल्म फाउंडेशन अवार्ड’ मुझे मिला, वो मेरे लिए सबसे गर्व का पल था। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार ने एक कलाकार के रूप में मुझे सस्ते दाम पर फ्लैट भी उपलब्ध कराया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-आपकी आने वाली फिल्म?</strong></p>
<p style="text-align:justify;">जी, ‘दुनिया तेरे नाम’ एक लव स्टोरी पर आधारित फिल्म है, जिसमें मैं मुख्य विलेन की भूमिका निभा रहा हूं और इस साल के अंत तक फिल्म रिलीज करने की योजना है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-स्टारडम बनने का ख्वाब देखने वाले युवक-युवतियों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे? </strong></p>
<p style="text-align:justify;">आज का दौर डिजिटल का है। अगर आपके भीतर हुनर है, तो बड़े मंच का इंतजार मत कीजिए, अपना खुद का मंच बनाइए। अगर आप साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं, आपका कोई मजबूत आधार नहीं है, तो स्टार बनने का सपना देखना बहुत कठिन डगर है। शोहरत एक नशा है, जो दिखने में आकर्षक है, लेकिन अक्सर इंसान को भटका भी देती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>निशा सिंह </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 10:21:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जॉब का पहला दिन : कर्तव्य के साथ सेवा की शुरुआत </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्ष 2018 का वह दिन आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है, जब मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की जालौन जनपद स्थित कोच शाखा में एग्रीकल्चर एवं वित्त अधिकारी के रूप में अपने जीवन की नई शुरुआत की। वह मेरे जीवन का एक ऐसा मोड़ था, जहां उत्साह, जिज्ञासा और जिम्मेदारी- तीनों एक साथ मेरे मन में उमड़ रहे थे। सच कहूं तो उस दिन मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी नई दुनिया में प्रवेश कर रहा हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह जब मैं पहली बार औपचारिक रूप से कार्यालय पहुंचा, तो दिल की धड़कन कुछ तेज थी। नए सहकर्मी, नया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580623/first-day-of-job--beginning-service-with-duty"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(47).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्ष 2018 का वह दिन आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है, जब मैंने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की जालौन जनपद स्थित कोच शाखा में एग्रीकल्चर एवं वित्त अधिकारी के रूप में अपने जीवन की नई शुरुआत की। वह मेरे जीवन का एक ऐसा मोड़ था, जहां उत्साह, जिज्ञासा और जिम्मेदारी- तीनों एक साथ मेरे मन में उमड़ रहे थे। सच कहूं तो उस दिन मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी नई दुनिया में प्रवेश कर रहा हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह जब मैं पहली बार औपचारिक रूप से कार्यालय पहुंचा, तो दिल की धड़कन कुछ तेज थी। नए सहकर्मी, नया माहौल और अनगिनत अपेक्षाएं- सब कुछ मेरे सामने था। शाखा प्रबंधक और अन्य कर्मचारियों ने मेरा आत्मीय स्वागत किया, जिससे मेरे भीतर का संकोच कुछ कम हुआ। धीरे-धीरे मैंने अपने कार्यक्षेत्र को समझना शुरू किया। फाइलों का ढेर, कंप्यूटर स्क्रीन पर खुली बैंकिंग प्रणाली और ग्राहकों की भीड़- यह सब मेरे लिए एक नया अनुभव था।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले ही दिन ग्राहकों से सीधे संवाद का अवसर मिला। कोई किसान अपनी फसल के लिए ऋ ण चाहता था, तो कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक समस्या लेकर आया था। उनकी आंखों में उम्मीद और विश्वास साफ झलक रहा था। जब मैं उनकी समस्याएं सुनता और समाधान की दिशा में कदम बढ़ाता, तो मेरे भीतर एक अद्भुत संतोष का भाव उत्पन्न होता। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं केवल एक नौकरी नहीं कर रहा, बल्कि समाज की सेवा के अपने बचपन के सपने को साकार कर रहा हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेष रूप से किसानों के साथ संवाद ने मेरे मन को गहराई से छुआ। उनकी मेहनत, संघर्ष और आशाओं को समझते हुए मैंने महसूस किया कि मेरी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। सही मार्गदर्शन और सहयोग से मैं उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता हूं। यह सोच मेरे भीतर एक नई ऊर्जा और समर्पण का संचार कर रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">दिन के अंत तक, थकान जरूर थी, लेकिन उससे कहीं अधिक संतोष और आत्मविश्वास था। मैंने महसूस किया कि यह केवल शुरुआत है- एक ऐसे सफर की, जिसमें चुनौतियां भी होंगी और सीखने के अनगिनत अवसर भी। उस पहले दिन ने मुझे यह सिखा दिया कि सच्ची सफलता केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में है। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो वह पहला दिन मेरे जीवन की सबसे प्रेरणादायक यादों में से एक बन चुका है। उसने मुझे न केवल एक जिम्मेदार अधिकारी बनाया, बल्कि एक संवेदनशील इंसान भी, जो समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को समझता है और उन्हें पूरी निष्ठा के साथ निभाने का प्रयास करता है।-<strong>भानू प्रताप अवस्थी, प्रबंधक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 10:00:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>लेखकों का बाजार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">आज के वक़्त में जब कि सारी दुनिया ही एक बाजार बनती जा रही हो तो फिर हमारे साहित्य की दुनिया ही भला कैसे इस बाजार ‘भाव’ से अछूती रह सकती है। यहां लेखकों के भाव स्थापित करने से लेकर उन्हें गिराने और उठाने तक का कार्य बड़ी ही संजीदगी के साथ किया जाता है। ये सभी क्रियाएं साहित्यिक उत्थान की आड़ में इतनी चतुराई से की जाती हैं कि दाएं हाथ को बाएं हाथ की खबर तक न लग पाए। यही उपलब्धि असली महानता है, जोकि सिर्फ लेखन भर से नहीं आती। पिछले जमाने के साहित्य और साहित्यकारों ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580622/writers--market"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(46).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज के वक़्त में जब कि सारी दुनिया ही एक बाजार बनती जा रही हो तो फिर हमारे साहित्य की दुनिया ही भला कैसे इस बाजार ‘भाव’ से अछूती रह सकती है। यहां लेखकों के भाव स्थापित करने से लेकर उन्हें गिराने और उठाने तक का कार्य बड़ी ही संजीदगी के साथ किया जाता है। ये सभी क्रियाएं साहित्यिक उत्थान की आड़ में इतनी चतुराई से की जाती हैं कि दाएं हाथ को बाएं हाथ की खबर तक न लग पाए। यही उपलब्धि असली महानता है, जोकि सिर्फ लेखन भर से नहीं आती। पिछले जमाने के साहित्य और साहित्यकारों ने भले ही दुनिया को गूढ़ दर्शन दिया हो मगर आज के साहित्य और साहित्यकारों ने न सिर्फ बाजार दिया है, बल्कि लेखक बनाने की विधि से लेकर, किताबें बेचने-खरीदने के लाभप्रद हथकंडे ,उन्नत किस्म की चौर्य प्रणाली आदि के अतिरिक्त, लेखकों के भी खरीद, फरोख्त तक का मार्ग प्रशस्त किया है। ये साहित्य का नवीन उन्नयन काल है। इसी क्रम में पिछले दिनों एक किस्सा कुछ यूं हुआ कि हमारे प्रिय, आत्मीय और धुरंधर लेखक महाराज एक दिन लेखन मंडी के किनारे वाली दुकान पर लेखक तौलवा रहे थे कि वहां लफ्फाज कवि जी आ धमके, आते ही उन्होंने त्यौरियां चढ़ाते हुए लेखक महाराज को टोका ,“अरे महाराज जी! कितने रुपये किलो लिए ,बहुत महंगे नहीं तौलवा लिए आपने!”<strong>-अंशु प्रधान, लेखिका</strong></p><p style="text-align:justify;">महाराज जी ने पूरी बत्तीसी चमकाते हुए कहा, “अजी साहब! क्या करें, किलो दो किलो लेखक घर में रखने पड़ते हैं। अब क्या महंगा और क्या सस्ता, जो ये लिखकर दे देते हैं उसी से लेखन की दाल-रोटी चलती रहती है साहब, वरना इतनी महंगाई में भला कौन खुद लिखके कुछ देता है। न इतना समय है किसी के पास और न इतना भेजा, जो पका -पकाया माल मिल जाता है उसी को थोड़ा और पकाकर बाजार में अपने नाम से ठेल देते हैं।”</p><p style="text-align:justify;">लफ्फाज कवि तो ठहरे ही शब्दों के जादूगर सो वे पुनः महाराज जी से बोले, “अरे! इतनी महंगाई में कहां आप इन महंगे लेखकों के चक्कर में पड़े हैं। अरे मेरी मानों तो अबकी रविवार मेरे साथ साहित्य के चोर बाजार चलना। थोड़ी भीड़- भाड़ ज़रूर रहती है वहां मगर औने-पौने दामों पर ही चोखा माल मिल जाता है।”<br /></p><p style="text-align:justify;">साहित्य के चोर बाजार की बात सुनते ही महाराज जी की आंखें फटी की फटी रह गयीं और कान खड़े हो गए, वे हकलाते हुए बोले- “क्या सच में! क्या वहां सस्ते में बढ़िया लेखक मिल जाएंगे।” लफ्फाज कवि जी ने मुस्कुराते हुए कहा- “और नहीं तो क्या! अरे आप बढ़िया की बात करते हैं, चोर बाजार में एक से एक लेखक मिलेंगे और न सिर्फ बिकने वाले, बल्कि खरीदने वाले भी।” महाराज जी बोले- “वो कैसे”?</p><p style="text-align:justify;">इस पर कवि जी ने बड़े गर्व से कहा- “अभी पिछले सप्ताह ही आधा किलो परसाई, दो किलो बच्चन और ढाई सौ ग्राम निराला तोल कर दिए हैं बाजार में, पुरस्कृत लेखकों को किसी से कहिएगा नहीं मैं कविताई करने के साथ- साथ ये काम भी कर लेता हूं। अब देखना! जब वे इन सब को पानी के साथ खुद के बनाए चून में गूंथ के जब मट्ठे पाग के बाजार में बेचेंगे, तो आप भी कहेंगे कि क्या स्वाद है। अजी मैं तो कहता हूं छोड़िए ये लेखक मंडी के कोने के बाजार को, सीधे चोर मंडी चलते हैं।”</p><p style="text-align:justify;">महाराज जी ने आव देखा न ताव और लगे मूछों को ताव देने। बड़ी ऐठ के साथ वे मंडी के दलाल से बोले ए भई। नीचे रख! हमें नहीं चाहिए इतने महंगे लेखक।<br /></p><p style="text-align:justify;">दलाल ने तभी कवि जी को घूरते हुए महाराज जी से कहा, “अजी साहब! एक दम से ही मूड बिगड़ गया आपका तो। अजी थोड़ा कम लगा लूंगा अब तराजू पर से कम से कम उतरवाईये तो मत। बड़ी मुश्किल से इन लेखकों को तराजू पर चढ़ने को मिलता है वो भी तब जब की आलोचकों की निग़ाह न पड़े साहब।”<br /></p><p style="text-align:justify;">मगर इतनी देर में महाराज जी को कवि जी का चोर बाजार का गणित भा चुका था। उन्होंने अपने गले में पड़े गमछे को ताव देकर फटकारा और थोड़ा आगे चलकर कवि जी को आवाज़ लगाई-“अजी। मैंने कहा कि कुछ जलेवी दही हो जाए अगले रविवार को तो आप और हम मिल ही रहे हैं न चोर बाजार में।” कवि जी मुस्कुराए और लपक के जलेबी- दही के दोने पर टूटते हुए बोले, “क्यों नहीं, क्यों नहीं”।<br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 11:00:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>क्यों स्मार्ट दिखना चाहते हैं अधेड़ हिन्दुस्तानी!</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत में एक अलग तरह की क्रांति दस्तक दे रही है। मध्यम आयु वर्ग के पुरुष और महिलाएं अब अपने आपको अधिक आकर्षक और आत्मविश्वासपूर्ण बनाने के लिए चेहरे की एडवांस सर्जरी करवा रहे हैं। समय के साथ बढ़ती उम्र, व्यस्त जीवनशैली और बदलते सामाजिक-व्यावसायिक माहौल में ये लोग अब केवल स्वस्थ रहने पर ही नहीं, बल्कि बाहरी रूप-सौंदर्य को बनाए रखने पर भी गंभीरतापूर्वक ध्यान दे रहे हैं। इस सर्जरी को डीप प्लेन फेसलिफ्ट सर्जरी कहते हैं। पहले यह सर्जरी सिर्फ बड़े-बड़े सितारों तक ही सीमित थी, लेकिन अब मिडिल क्लास भारतीय भी इसके लिए स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से सलाह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580621/why-do-middle-aged-indians-want-to-look-smart"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(45).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में एक अलग तरह की क्रांति दस्तक दे रही है। मध्यम आयु वर्ग के पुरुष और महिलाएं अब अपने आपको अधिक आकर्षक और आत्मविश्वासपूर्ण बनाने के लिए चेहरे की एडवांस सर्जरी करवा रहे हैं। समय के साथ बढ़ती उम्र, व्यस्त जीवनशैली और बदलते सामाजिक-व्यावसायिक माहौल में ये लोग अब केवल स्वस्थ रहने पर ही नहीं, बल्कि बाहरी रूप-सौंदर्य को बनाए रखने पर भी गंभीरतापूर्वक ध्यान दे रहे हैं। इस सर्जरी को डीप प्लेन फेसलिफ्ट सर्जरी कहते हैं। पहले यह सर्जरी सिर्फ बड़े-बड़े सितारों तक ही सीमित थी, लेकिन अब मिडिल क्लास भारतीय भी इसके लिए स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से सलाह ले रहे हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत में 40 से 65 साल के पुरुष और महिलाएं इस सिद्ध सर्जरी की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। यह सर्जरी चेहरे को नाटकीय तरीके से नहीं, बल्कि बहुत नेचुरल और सूक्ष्म तरीके से जवान बनाती है। लोग अपनी उम्र के साथ आने वाली झुर्रियों, ढीली त्वचा और थकी हुई लुक से छुटकारा पाना चाहते हैं। इस तकनीक को भारत में आगे बढ़ाने वाले दिल्ली के मशहूर फेशियल प्लास्टिक सर्जन डॉ. प्रतीक शर्मा, जो पहले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से जुड़े थे और आजकल राजधानी के एक अस्पताल में कार्यरत हैं, ने एक सेमिनार में बताया कि गहरी लेयर्स को लिफ्ट करने से रिजल्ट ज्यादा लंबे समय तक रहते हैं और चेहरा ज्यादा नैचुरल और संतुलित दिखता है। वे कहते हैं, “ये सिर्फ झुर्रियां मिटाने की बात नहीं है। ये लोगों को आत्मविश्वास वापस लौटाने और दुनिया के सामने नए जोश के साथ खड़े होने में मदद करता है।”-<strong>विवेक  शुक्ला,वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>
<p style="text-align:justify;">डीप प्लेन फेसलिफ्ट आखिर है क्या? साधारण फेसलिफ्ट सर्जरी में सिर्फ ऊपरी स्किन को खींचा जाता है, लेकिन डीप प्लेन फेसलिफ्ट उससे कहीं आगे जाती है। इसमें उम्र के साथ ढीले पड़ चुके मसल्स, फैट पैड्स और कनेक्टिव टिश्यू को भी ध्यान से संभाला जाता है। सर्जन इन सबको एक साथ एक यूनिट के रूप में ऊपर उठाता है। इसमें मिड-फेस, जबड़ा, गाल और गर्दन सब शामिल होते हैं। इससे चेहरा स्मूद हो जाता है, नाक से मुंह तक की गहरी लकीरें कम हो जाती हैं और चेहरे में फिर से जवानी वाली चमक लौट आती है। यह प्रक्रिया चेहरे की गहराई में काम करती है, इसलिए नतीजा बहुत प्राकृतिक लगता है। </p>
<p style="text-align:justify;">वहीं एक अन्य प्लास्टिक सर्जन बताती हैं कि यह प्रोसीजर अब अमीरों की लग्जरी नहीं रह गई है। अब लोअर मिडिल क्लास परिवारों की महिलाएं और पुरुष भी इसे करवा रहे हैं। खास बात यह है कि बदलाव बहुत सूक्ष्म, लेकिन असरदार होता है। आत्मविश्वास बढ़ता है, लेकिन कोई यह नहीं कह पाता कि “इन्होंने कुछ करवाया है”। दोस्त और परिवार वाले बस इतना कहते हैं कि आप बहुत तरोताजा और खुश दिख रहे हैं। विशेषज्ञों के पास परामर्श के लिए हर वर्ग से लोग आ रहे हैं। सरकारी नौकरी वाले, प्राइवेट सेक्टर के मैनेजर, बिजनेसमैन और घरेलू महिलाएं सभी इसमें रुचि ले रहे हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">लोग अब कॉस्मेटिक सर्जरी को दिखावा नहीं, बल्कि अपने इमेज, करियर और वेल-बीइंग में निवेश मानते हैं। उम्र तो सबको लगती है, यह सर्जरी बस उस मैदान को थोड़ा बराबर कर देती है। इसके अलावा, यह सर्जरी गर्दन की त्वचा को भी टाइट करती है, जिससे डबल चिन जैसी समस्या कम हो जाती है। चेहरे पर थकान का भाव कम होता है और आंखों के नीचे की सूजन भी घटती है। रिकवरी का समय भी अब पहले से काफी कम हो गया है। ज्यादातर लोग 10-14 दिनों में सामान्य कामकाज पर लौट आते हैं। सर्जरी से पहले डॉक्टर पूरी जांच करते हैं। ब्लड टेस्ट, हार्ट चेकअप और मेडिकल हिस्ट्री देखी जाती है। सर्जरी जनरल एनेस्थीसिया में होती है और इसमें दो से चार घंटे लगते हैं। बाद में हल्का सूजन और चोट के निशान रह सकते हैं, जो धीरे-धीरे ठीक हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका और यूरोप में यह हॉलीवुड और फैशन जगत की कई हस्तियों का पसंदीदा विकल्प बन चुका है। सोनजा मॉर्गन, रिकी लेक, मैकेंजी वेस्टमोर, जैकी हैरी जैसी सेलिब्रिटीज ने भी इसके नेचुरल रिजल्ट्स की तारीफ की। क्रिस जेनर जैसी हस्तियों के साथ भी इसकी चर्चा रहती है। भारत में भी कई बड़े सितारों ने इस सर्जरी को करवाया है, पर वे इस बात को अज्ञात कारणों से सार्वजनिक नहीं करते। अमेरिका और यूरोप में अधेड़ और उम्र दराज लोग डीप प्लेन फेसलिफ्ट सर्जरी का लाभ लंबे समय से ले रहे हैं। वहां बहुत सारे हॉलीवुड सितारे भी इस सर्जरी को करवाने के बाद अपने करियर को चमका रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी अब जागरूकता बढ़ रही है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चंडीगढ़ जैसे शहरों में अच्छे अस्पताल उपलब्ध हैं। डॉक्टर सलाह देते हैं कि सर्जरी चुनने से पहले हमेशा योग्य और अनुभवी सर्जन से ही संपर्क करें। आज के समय में दिखावे और आत्मविश्वास का महत्व बहुत बढ़ गया है। डीप प्लेन फेसलिफ्ट सर्जरी उन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प बनकर उभरी है, जो अपनी उम्र को महसूस नहीं करना चाहते। यह सर्जरी सिर्फ चेहरे को नहीं, बल्कि जीवन के नए अध्याय को खोलती है। अगर आप भी 45 साल के पार हैं और लगता है कि चेहरा थका हुआ दिख रहा है, तो एक अच्छे सर्जन से सलाह जरूर लें। सही निर्णय से आपका आत्मविश्वास नया जोश पा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 12:00:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अखबारों के ‘सेवक’ और बाल मन के पारखी: डॉ. निरंकार देव </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल कागजों पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के चरित्र में जीवित रहते हैं। बरेली की साहित्यिक विरासत के ऐसे ही एक अनमोल रत्न थे डॉ. निरंकार देव सेवक, जिसने अभावों के बीच रहकर भी बाल साहित्य के माध्यम से बरेली का मान पूरे भारतवर्ष में बढ़ाया। यह कहानी है एक विद्रोही कवि के कोमल बाल साहित्यकार बनने की, एक समर्पित मित्र की और एक ऐसे साधक की जिसने अंत तक अपनी कलम का साथ नहीं छोड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बरेली के इस बाल साहित्यकार की शख्सियत से रू-ब-रू करा रही रतन सिंह</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580620/%22servant%22-of-newspapers-and-expert-on-children-s-minds--dr--nirankar-dev"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(44).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल कागजों पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के चरित्र में जीवित रहते हैं। बरेली की साहित्यिक विरासत के ऐसे ही एक अनमोल रत्न थे डॉ. निरंकार देव सेवक, जिसने अभावों के बीच रहकर भी बाल साहित्य के माध्यम से बरेली का मान पूरे भारतवर्ष में बढ़ाया। यह कहानी है एक विद्रोही कवि के कोमल बाल साहित्यकार बनने की, एक समर्पित मित्र की और एक ऐसे साधक की जिसने अंत तक अपनी कलम का साथ नहीं छोड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बरेली के इस बाल साहित्यकार की शख्सियत से रू-ब-रू करा रही रतन सिंह गुर्जर की विशेष रिपोर्ट... </strong></p>
<p style="text-align:justify;">सादगी और सिद्धांतों का अनूठा संगम-डॉ. निरंकार देव सेवक का जीवन किसी खुली किताब की तरह था, जिसके हर पन्ने पर सादगी और अनुशासन की इबारत लिखी थी। बरेली के सैदपुरिया मोहल्ले में जन्मे सेवक जी के भीतर साहित्य के संस्कार अपने पिता मुंशी रामभरोसे लाल ‘सेवक’ से विरासत में मिले थे। पेशे से अग्रणी वकील होने के बावजूद उनका हृदय साहित्य के लिए धड़कता था। उनकी सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें खाने में कभी स्वाद की परवाह नहीं रही, उनके लिए भोजन केवल शरीर चलाने का साधन था।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चन जी से आत्मीय रिश्ता- साहित्यिक गलियारों में सेवक जी और महाकवि हरिवंशराय बच्चन की मित्रता के किस्से आज भी मशहूर हैं। यह सेवक जी ही थे, जिन्होंने ज्ञान प्रकाश जौहरी के साथ मिलकर बरेली में बच्चन जी और तेजी सूरी की मुलाकात और फिर सगाई तय करवाई थी। बच्चन जी उन्हें ‘भाई साहब’ कहते थे और उन्होंने सेवक जी को करीब 250 पत्र लिखे। बच्चन जी का स्नेह इतना था कि वे अक्सर बरेली आकर बसने की इच्छा व्यक्त करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अखबारों का जुनून और समय की धारा- सेवक जी का दिन सुबह 5 बजे शुरू होता था और घर में 14 अखबारों का अंबार लगता था। जिला जेल के सामने वाले नाले के किनारे अखबार पढ़ते हुए टहलना उनका नियमित क्रम था। वे पढ़ने में इतने मशगूल हो जाते कि उन्हें आसपास की दुनिया का होश नहीं रहता था। यही एकाग्रता उनकी लेखनी में भी दिखती थी। विद्रोह से वैज्ञानिक चेतना तक सेवक जी ने अपने लेखन की शुरुआत ‘चिंगारी’ जैसे विद्रोही कविता संग्रह से की थी। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी के दौर में संतान न पैदा करने का कठिन संकल्प लिया था। हालांकि बाद में पारिवारिक दबाव में उन्होंने गृहस्थ जीवन को अपनाया। बाल साहित्य में उन्होंने एक नई चेतना फूंकी। उन्होंने पौराणिक कथाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखा। वे कहते थे कि धर्म और रूढ़ियां बच्चों के मानसिक विकास में बाधा नहीं बननी चाहिए। उनके 36 प्रकाशित संग्रह आज भी हिंदी साहित्य की अमूल्य थाती हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पारिवारिक त्रासदी और सेवा की मिसाल</h4>
<p style="text-align:justify;">सेवक जी का अंतिम समय काफी कष्टपूर्ण रहा। आंखों की रोशनी चली जाने के कारण उन्हें अपनी थाली का खाना तक नहीं दिखता था, लेकिन उनकी पुत्रवधू पूनम सेवक ने एक बेटी का धर्म निभाते हुए अंत तक अपने हाथों से उन्हें भोजन कराया। साल 1994 में सेवक जी का निधन हुआ और उसके बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। 1999 में उनके पुत्र प्रदीप और पत्नी का देहांत हुआ और बाद में पोते पुनीत को भी नियति ने छीन लिया। आज सेवक जी का वह विशाल 2000 गज का बंगला भले ही वक्त की मार से छोटे से हिस्से में सिमट गया हो, लेकिन उनकी रचनाओं की गूंज आज भी हर उस बच्चे के मन में है, जिसने ‘दूध जलेबी’ या ‘ईसप की गाथाएं’ पढ़ी हैं। डॉ. निरंकार देव सेवक आज भी हमारे बीच अपनी कालजयी रचनाओं और अपनी बेबाक प्रगतिशील सोच के रूप में जीवित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 10:36:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बावनी इमली : वह पेड़ जिस पर क्रांतिकारियों को दी गई थी फांसी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जब भी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की चर्चा होती है, हमारे मन में कुछ तयशुदा नाम उभरते हैं, जैसे रानी लक्ष्मी बाई, मंगल पांडेय, नाना साहब पेशवा आदि। इतिहास की किताबों ने इन्हें बड़े और उभरे अक्षरों में लिखा है, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि हर कथा को कुछ चेहरे चाहिए होते हैं, लेकिन कभी-कभी यही चेहरे इतने बड़े हो जाते हैं कि बाकी कहानी पीछे छूट जाती है। सवाल यह नहीं कि इनका महत्व कम है, बल्कि यह कि क्या कोई क्रांति सचमुच तीन-चार नामों से पूरी हो जाती है?<strong>-   भगवंत अनमोल, वरिष्ठ साहित्यकार </strong></p>
<p style="text-align:justify;">कानपुर के आसपास</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580618/bawni-tamarind--the-tree-on-which-revolutionaries-were-hanged"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(43).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जब भी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की चर्चा होती है, हमारे मन में कुछ तयशुदा नाम उभरते हैं, जैसे रानी लक्ष्मी बाई, मंगल पांडेय, नाना साहब पेशवा आदि। इतिहास की किताबों ने इन्हें बड़े और उभरे अक्षरों में लिखा है, यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि हर कथा को कुछ चेहरे चाहिए होते हैं, लेकिन कभी-कभी यही चेहरे इतने बड़े हो जाते हैं कि बाकी कहानी पीछे छूट जाती है। सवाल यह नहीं कि इनका महत्व कम है, बल्कि यह कि क्या कोई क्रांति सचमुच तीन-चार नामों से पूरी हो जाती है?<strong>-   भगवंत अनमोल, वरिष्ठ साहित्यकार </strong></p>
<p style="text-align:justify;">कानपुर के आसपास के लोग अब अजीमुल्लाह खान, तात्या टोपे या अजीजन बाई जैसे नाम भी जानने लगे हैं, लेकिन अगर आप कानपुर से कुछ ही दूरी पर बसे फतेहपुर की ओर मुड़ें, तो कहानी अचानक धीमी हो जाती है। यहां इतिहास किताबों से ज्यादा लोगों की यादों में बसा है। फतेहपुर जिले में बिंदकी तहसील में एक जगह है- बावनी इमली। नाम सुनकर यह कोई साधारण-सा पेड़ लगता है, लेकिन 28 अप्रैल आते ही यह जगह एक तारीख से जुड़ जाती है और तारीख एक कहानी से।</p>
<p style="text-align:justify;">1857 की हलचल में फतेहपुर भी चुप नहीं बैठा था, चुप नहीं बैठा था कहना सही नहीं होगा, बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। खागा गढ़ी के ताल्लुकेदार ठाकुर दरियाव सिंह के नेतृत्व में इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को मार खदेड़ा था। कहा जाता है कि यह इलाका करीब 34 दिनों तक अंग्रेजों की हुकूमत से मुक्त रहा। यह ‘मुक्ति’ कितनी संगठित थी, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि यहां के वीर सिर्फ दर्शक नहीं थे, इस मिट्टी में भी उतनी ही क्रांति और आग थी, जितनी अन्य स्थानों पर। गंगा-यमुना के दोआब पर बसे इस जिले ने कई वीर दिए, जिनमें ठाकुर दरियाव सिंह, उनके पुत्र सुजान सिंह, भाई निर्मल सिंह, डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्लाह खान, बाबा गयादीन दुबे, ठाकुर शिवदयाल सिंह और ठाकुर जोधा सिंह अटैय्या जैसे नाम उस समय की स्थानीय धड़कन थे, जिन्हें आज भी फतेहपुर के बाहर कम ही लोग जानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जोधा सिंह अटैय्या की कथा तो किसी लोकगाथा जैसी लगती है- लगान देने से इंकार करना, गुरिल्ला युद्ध, तहसीलों और कोषागारों पर हमले, अंग्रेजी सत्ता को लगातार चुनौती और फिर जंगल में घुस जाना। जब मेरठ, कानपुर और झांसी की क्रांति की ज्वाला मंद पड़ गई थी, तो फतेहपुर के इन वीरों की क्रांति अंग्रेजों को हतोत्साहित किए हुए थी। जोधा सिंह अपने साथियों के साथ ऐसे निकलते और ऐसा छुपते थे, जैसे गुफा में छुपा शेर अपना शिकार देखते ही शिकार कर लेता और फिर गुफा में चला जाता। अंग्रेजों की इतनी बुरी हालत हो गई थी कि उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि इस वीर से युद्ध कैसे किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी-कभी ही उनके क्रांतिकारी दिखते और जब दिखते तो इतने संगठित तरीके से कि अंग्रेजों के पास मौका ही न बचता उनके वार से बचने के लिए और फिर गायब, सुदूर अपनी गुफा में। अंग्रेजों ने उन्हें ‘डाकू’ कहा, जो इतिहास में असहमति को छोटा करने का पुराना तरीका रहा है। आखिरकार भीतर से मिली एक सूचना ने उन्हें पकड़वा दिया। इसके बाद 28 अप्रैल 1858 का दिन आया, जब खजुहा में एक इमली के पेड़ के नीचे कर्नल क्रिस्टाइल द्वारा जोधा सिंह सहित 52 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">जोधा सिंह अटैय्या वही क्रांतिकारी थे, जिन्होंने कर्नल नील, मेजर-जनरल हैवलॉक और रेनाल्ड जैसे क्रूर अंग्रेज अफसरों को चकमा दे दिया था और कर्नल पॉवेल का सर धड़ से अलग करके उनके छावनी भेज दिया था। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। स्थानीय लोगों की मानें तो अंग्रेजों ने शवों को ले जाने की अनुमति नहीं दी और लंबे समय तक उस स्थान पर पहरा रहा। 37 दिनों तक वह शव उसी पेड़ पर लटकते रहे और अपने क्रांतिकारी होने की सजा भुगतते रहे। जब शव सड़ने लगे, तो अंग्रेजों को जबरन उस इमली के पेड़ के पास से अपनी फौज हटानी पड़ी। फिर ठाकुर भगवान दास ने 4 अप्रैल 1858 को इन अमर सपूतों का अंतिम संस्कार किया। समय बीतता गया और वह स्थान धीरे-धीरे एक स्मृति में बदलता गया। आज भी वहां इमली का पेड़ खड़ा है, जस का तस, शायद पहले से अधिक शांत, जितना उनका इतिहास हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास का अपना एक स्वभाव होता है, वह याद रखने के मामले में बहुत निर्दयी है, जिनके पास अपने समय के लेखक, कवि और इतिहासकार होते हैं, वे बड़े अक्षरों में दर्ज हो जाते हैं, बाकी लोग जगहों, पेड़ों और किस्सों में छूट जाते हैं। यही कारण है कि दिल्ली की एक छोटी घटना पूरे देश में फैल जाती है और किसी सुदूर गांव की बड़ी घटना अपने इलाके तक सीमित रह जाती है। फतेहपुर के बिंदकी स्थित ‘बावनी इमली’ एक ऐसा ही स्मारक है, जहां एक पेड़ के नीचे खड़े होकर आप समझ सकते हैं कि आजादी की कहानी सिर्फ कुछ नामों की नहीं, बल्कि अनगिनत अनसुने लोगों की भी है। ऐसे वीरों को शत-शत नमन करते हैं, जिनके कारण हम आजादी की सांस ले रहे हैं। अगर आप अपने वजूद को पहचानना चाहते हैं, अपने देश की आजादी की लौ को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार बिंदकी स्थित बावनी इमली के दर्शन जरूर करें और ऐसे वीरों को प्रणाम करें।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 10:27:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जॉब का पहला दिन :   एक नई सोच को स्थापित करने वाला पहला कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो बिना किसी पूर्व सूचना के आ जाते हैं और आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है कि इसी राह पर आपका करियर बनेगा, पर नियति आपको उसी दिशा में मोड़ देती है, जिसके लिए आप बने हैं। बात उन दिनों की है जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी कर नई दिल्ली में एक निजी कंपनी में अपना भविष्य टटोल रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक कंपनी में 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली में ही था। संयोग देखिए - 11 सितंबर 2001, जिस दिन न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर दुनिया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579868/first-day-on-the-job--the-first-step-to-establishing-a-new-mindset"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(36)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो बिना किसी पूर्व सूचना के आ जाते हैं और आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा होता है कि इसी राह पर आपका करियर बनेगा, पर नियति आपको उसी दिशा में मोड़ देती है, जिसके लिए आप बने हैं। बात उन दिनों की है जब मैं मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी कर नई दिल्ली में एक निजी कंपनी में अपना भविष्य टटोल रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक कंपनी में 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली में ही था। संयोग देखिए - 11 सितंबर 2001, जिस दिन न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर दुनिया का सबसे भीषण आतंकी हमला हुआ, उसी दिन छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट से एक संदेश मिला: “आपका चयन मास्टर इन टूरिज्म मैनेजमेंट के पहले बैच में अतिथि शिक्षक के रूप में हो गया है।”  </p>
<p style="text-align:justify;">वही क्षण मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बना, जब मैंने अकादमिक जगत में पहला कदम रखा। मन में हलचल थी, 25 साल की उम्र और सामने लगभग हमउम्र विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी, भीतर कहीं डर भी था, मगर पहली कक्षा के बाद संस्थान के वरिष्ठ शिक्षकों, खासकर निदेशक महोदय और वरिष्ठ प्रोफेसर ने जब कहा, “धीरे-धीरे सब परिपक्व होते हैं,” तो उन्हीं शब्दों ने मेरे भीतर नई ऊर्जा भर दी। -डॉ. सुधांशु राय, असिस्टेंट प्रोफेसर, कानपुर</p>
<p style="text-align:justify;">नौकरी का पहला दिन था। पिताजी ने सहज भाव से कहा, “यह तो प्रोफेसर बन गया।” अगले दो दिन रिश्तेदारों के फोन आते रहे- सब यही दोहराते, “आपका बेटा प्रोफेसर हो गया।” किसी को यह एहसास ही नहीं था कि प्रोफेसर एक बड़ा पद होता है, जबकि मैं तो केवल पार्ट-टाइम गेस्ट फैकल्टी, यानी लेक्चरर के रूप में जुड़ा था। मैं जब स्वयं विद्यार्थी था, तभी से डायरी लिखने का शौक था। जब पुराने पन्ने पलटे तो कहीं नहीं लिखा था कि मुझे शिक्षक बनना है। मैं तो देश-शहर सुधारने के सपने देखता हुआ सिविल या डिफेंस सर्विस में जाना चाहता था। किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बिना हिचक मैंने शिक्षण को अपनाया। पहले ही वर्ष संस्थान में पहचान बनने लगी और दो साल के भीतर मैं नियमित लेक्चरर के पद पर चुन लिया गया। जीवन अनिश्चितताओं और संघर्ष का ही दूसरा नाम है।  मेरा जीवन भी उससे अलग नहीं था। इन्हीं संघर्षों ने मेरे व्यक्तित्व को तराशा, एक नई पहचान दी। वह दौर था जब कई युवा शिक्षक एक साथ आए थे, प्रतिस्पर्धा चरम पर थी। इन्हीं संघर्षों और मेरे शांत स्वभाव ने मुझे स्थायित्व दिया। </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में लगता था कि सब पीछे खींचना चाहते हैं, पर वह केवल भ्रम था। पहले वर्ष से ही  मैंने इसे स्वीकार कर अपने व्यक्तित्व को निखारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नए पड़ाव आते गए। अपने शुरुआती विचारों को साकार करने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय के भीतर रचनात्मकता दिखाने का मौका मिला। विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट सेल, काउंसलिंग सेल, होटल एवं टूरिज्म मैनेजमेंट विभाग की स्थापना और राष्ट्रीय सेवा योजना जैसे नए कॉन्सेप्ट स्थापित किए। </p>
<p style="text-align:justify;">एनएसएस ने समाज के प्रति मेरा दृष्टिकोण व्यापक किया। एक नई विचारधारा जन्मी-शैक्षिक दायित्व के साथ-साथ समाज के प्रति भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, इस सोच के साथ सामाजिक कार्यों में भागीदारी बढ़ी। कुछ ही वर्षों में पर्यटन, सामाजिक विकास और जन-जागरूकता जैसे विषयों पर पकड़ बनी। आज कानपुर शहर को केंद्र में रखकर हैप्पीनेस, स्वास्थ्य और विजन कानपुर पर काम हो रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">“मुस्कुराए कानपुर”, “कानपुर हेल्थ कमेटी” और “कानपुर सुपर 100” जैसी संस्थाएं खड़ी कर शहर के हर क्षेत्र के प्रतिष्ठित नागरिकों को जोड़ते हुए “नव कानपुर, कुशल कानपुर” बनाने का प्रयास जारी है। सामाजिक दृष्टिकोण और प्रबंधन क्षमता के साथ जिला प्रशासन के साथ भी पर्यटन विकास और शहर के विकास में सलाहकार की भूमिका निभाकर आत्मिक संतुष्टि मिल रही है। हर इंसान के जीवन में अलग-अलग पड़ावों पर रोल मॉडल होते हैं। माता-पिता के बाद प्रारंभिक काल में एक सरकारी कार्यालय के अधीक्षक रोल मॉडल थे। </p>
<p style="text-align:justify;">सेवा भाव से भरे हुए, आज कुलपति महोदय की प्रशासनिक क्षमता, कार्य के प्रति समर्पण और दूरदर्शिता मुझे प्रेरित करती है। आज जहां भी खड़ा हूं, अपने परिवार के समर्पण एवं सहयोग से। मैं मानता हूं कि मैंने सब कुछ नहीं पाया, पर काफी हद तक जीवन में संतुष्ट हूं खुश हूं। शैक्षिक दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाते हुए समाज को नया नेतृत्व देने की कोशिश कर रहा हूं। ऐसा नेतृत्व जो अपने शहर कानपुर को “नया कानपुर, खुशहाल कानपुर” बनाने की दिशा में कुछ सार्थक कर सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>शब्द रंग</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 12:00:19 +0530</pubDate>
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