<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.amritvichar.com/category/521916/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%B8" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Amrit Vichar RSS Feed Generator</generator>
                <title>अंतस - Amrit Vichar</title>
                <link>https://www.amritvichar.com/category/521916/rss</link>
                <description>अंतस RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>पौराणिक कथा :  सत्य और भक्ति की परीक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्राचीन समय में एक गरीब ब्राह्मण भगवान श्रीकृष्ण का परम भक्त था। वह प्रतिदिन नदी से जल लाकर मंदिर में भगवान का अभिषेक करता और सच्चे मन से पूजा करता था। उसके पास धन-संपत्ति नहीं थी, फिर भी वह कभी दुखी नहीं रहता था। गांव के लोग उसकी गरीबी का मजाक उड़ाते और कहते, “इतनी पूजा से क्या मिलेगा?”</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन गांव में भयंकर अकाल पड़ा। खेत सूख गए, पशु मरने लगे और लोगों के घरों में अन्न समाप्त हो गया। सभी लोग परेशान होकर इधर-उधर सहायता खोजने लगे। उस ब्राह्मण के पास भी भोजन नहीं बचा था, लेकिन उसने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582450/mythological-tale--a-test-of-truth-and-devotion"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(3)14.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्राचीन समय में एक गरीब ब्राह्मण भगवान श्रीकृष्ण का परम भक्त था। वह प्रतिदिन नदी से जल लाकर मंदिर में भगवान का अभिषेक करता और सच्चे मन से पूजा करता था। उसके पास धन-संपत्ति नहीं थी, फिर भी वह कभी दुखी नहीं रहता था। गांव के लोग उसकी गरीबी का मजाक उड़ाते और कहते, “इतनी पूजा से क्या मिलेगा?”</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन गांव में भयंकर अकाल पड़ा। खेत सूख गए, पशु मरने लगे और लोगों के घरों में अन्न समाप्त हो गया। सभी लोग परेशान होकर इधर-उधर सहायता खोजने लगे। उस ब्राह्मण के पास भी भोजन नहीं बचा था, लेकिन उसने अपनी पूजा और भगवान पर विश्वास नहीं छोड़ा। उस रात उसे स्वप्न में श्रीकृष्ण ने दर्शन दिए और कहा, “कल प्रातः नदी किनारे जाना, तुम्हारी सहायता होगी।” </p>
<p style="text-align:justify;">अगले दिन ब्राह्मण वहां पहुंचा तो उसे रेत में दबा एक घड़ा मिला, जो सोने के सिक्कों से भरा था। उसने उस धन को केवल अपने लिए नहीं रखा, बल्कि पूरे गांव में अन्न और पानी की व्यवस्था करवाई। गांव वाले उसकी दया और भक्ति देखकर चकित रह गए। तब ब्राह्मण ने कहा, “सच्ची भक्ति वही है, जो केवल अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए हो।”</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/582450/mythological-tale--a-test-of-truth-and-devotion</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/582450/mythological-tale--a-test-of-truth-and-devotion</guid>
                <pubDate>Fri, 22 May 2026 10:00:15 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%283%2914.jpg"                         length="85682"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अधिक मास : सौर और चंद्र गणना का संतुलन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष में एक बार पुरुषोत्तम मास आता है। इसे अधिक मास भी कहते है। पहले हम ये जान लेते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या के बीच में कोई संक्रांति न पड़े उसे अधिक मास कहते हैं। संक्रांति का अर्थ सूर्य का राशि परिवर्तन से है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ही संक्रांति कहते हैं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का होता है तथा एक चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना जाता है। सौर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582447/adhik-maas--balancing-solar-and-lunar-calculations"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(2)15.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष में एक बार पुरुषोत्तम मास आता है। इसे अधिक मास भी कहते है। पहले हम ये जान लेते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या के बीच में कोई संक्रांति न पड़े उसे अधिक मास कहते हैं। संक्रांति का अर्थ सूर्य का राशि परिवर्तन से है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ही संक्रांति कहते हैं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का होता है तथा एक चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना जाता है। सौर वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना को बराबर करने के लिए अधिक मास की उत्पत्ति हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">‘मलमास’ हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष पर आने वाला अधिक मास। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 12 महीने होते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि हिंदुओं की मान्यता के अनुसार प्रत्येक तीन साल में एक साल 13 महीनों का होता है? आपको यकीन भले न हो, लेकिन यह सच है। चलिए हम आपको बताते हैं इससे जुड़ी सच्चाई। हर तीसरे साल, जो तेरहवां महीना आता है, उस महीने को मलमास कहा जाता है। अंग्रेजी में इस माह का जिक्र नहीं है, लेकिन हिंदुओं की मान्यता के अनुसार एक माह मलमास का होता है, इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">मलमास नाम पुरुषोत्तम मास पड़ने की कहानी भी रोचक है। मलमास ने क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास जाकर प्रार्थना की कि भगवान अगर मैं इतना ही बुरा हूं, तो मुझे बनाया ही क्यों? क्योंकि हर नक्षत्र, हर दिन, हर ग्रह का कोई न कोई स्वामी है, परंतु मेरा कोई स्वामी न होने के कारण कोई भी इस मास में शुभ कार्य नहीं करता। तब भगवान ने वरदान दिया कि आज से तुम मेरे नाम से जाने जाओगे अर्थात पुरुषोत्तम के नाम से तथा इस माह में मेरी भक्ति करने वालों को असंख्य पुण्य की प्राप्ति होगी और भव सागर से मुक्ति पाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पुरुषोत्तम मास में पूजा पाठ का विशेष महत्व है। जो जातक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उपवास, पूजा पाठ दान कर्म करता है। उसे पुण्य की प्राप्ति एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार मास प्रारंभ के समय भगवान विष्णु की आराधना लाल चंदन, लाल फूल और अक्षत सहित पूजन करना चाहिए। भगवान को घी, गुड़ और गेहूं के आटे से मीठे पूवे बनाकर कांस्य पात्र में फल-फूल दक्षिणा वस्त्र के साथ भोग लगाकर दान करना चाहिए।<br />धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में शुभ कार्यों को वर्जित कहा गया है। जैसे नामकरण, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार, मुंडन, विवाह, नववधू प्रवेश, गाड़ी खरीदना, नीव पूजन आदि। इस माह में तामसिक भोजन से भी बचना चाहिए जैसे मास-मदिरा, लहसुन-प्याज आदि। इस मास में किए जाने वाले कार्य हैं वार्षिक श्राद्ध, मृत्यु तुल्य कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रुद्राभिषेक, गर्भधान संस्कार, दान, जप, पुंसवन संस्कार व सीमन्तोन्नयन संस्कार हो सकता है। पुरुषोत्तम मास में भूमि <br />पर शयन करना चाहिए, सादा और सात्विक भोजन करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भागवत पुराण के 6 स्कंध में 15 अध्याय हैं। पहले पांच अध्याय में हिरण्यकश्यप की कथा आती है। उसने एक बार ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर के उनसे ऐसा वरदान मांगा कि आपकी बनाई गई सृष्टि के किसी महीने में न मरूं, ऊपर मरूं न नीचे मरूं, बाहर मरूं, न अंदर मरुं। ब्रह्मा जी ने खुश होकर तथास्तु कह दिया। उसी हिरण्यकशिपु को मारने के लिए एवं भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए, नरसिंह अवतार लेकर इस अधिक मास में ही दुष्ट को संहार कर अधर्म का नाश किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">पौराणिक भारतीय ग्रंथ वायु पुराण के अनुसार मगध सम्राट बसु द्वारा बिहार के राजगीर में ‘वाजपेयी यज्ञ’ कराया गया था। उस यज्ञ में राजा बसु के पितामह ब्रह्मा सहित सभी देवी-देवता राजगीर पधारे थे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की जरूरत पड़ी थी। कहा जाता है कि ब्रह्मा के आह्वान पर ही अग्निकुंड से विभिन्न तीर्थों का जल प्रकट हुआ था। उस यज्ञ का अग्निकुंड ही आज का ब्रह्मकुंड (राजगीर, बिहार) है। उस यज्ञ में बड़ी संख्या में ऋ षि-महर्षि भी आए थे।<br />राजगीर में इस अवसर पर भव्य मेला भी लगता है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस माह में लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों प्राची, सरस्वती और वैतरणी के अलावा गर्म जलकुंडों, ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, न्यासकुंड, मार्कंडेय कुंड, गंगा-यमुना कुंड, काशीधारा कुंड, अनंतऋ षि कुंड, सूर्य-कुंड, राम-लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड, गौरी कुंड और नानक कुंड में स्नान कर भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर में आराधना करते हैं। वर्षभर इन कुंडों में निरंतर उष्ण जल गिरता रहता है। इस जल का श्रोत आज भी अज्ञात है।</p>
<p style="text-align:justify;">पुरुषोत्तम मास, सर्वोत्तम मास में यहां अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति की महिमा है। किंवदंती है कि भगवान ब्रह्मा से राजा हिरण्यकशिपु ने वरदान मांगा था कि रात-दिन,सुबह-शाम और उनके द्वारा बनाए गए बारह मास में से किसी भी मास में उसकी मौत न हो। इस वरदान को देने के बाद जब ब्रह्मा को अपनी भूल का अहसास हुआ, तब वे भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने विचारोपरांत हिरण्यकशिपु के अंत के लिए तेरहवें महीने का निर्माण किया। धार्मिक मान्यता है कि इस अतिरिक्त एक महीने को मलमास या अधिक मास कहा जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />डॉ.विपिन शर्मा</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/582447/adhik-maas--balancing-solar-and-lunar-calculations</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/582447/adhik-maas--balancing-solar-and-lunar-calculations</guid>
                <pubDate>Thu, 21 May 2026 11:00:45 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%282%2915.jpg"                         length="116304"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भगवान शांतिनाथ के अद्वितीय संदेश प्रकाश स्तंभ</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान श्री 1008 शांतिनाथ जी का जीवन मानवता के लिए शांति, करुणा और आत्मसंयम का अद्वितीय संदेश देता है। उनका नाम ही शांतिनाथ इस बात का प्रतीक है, उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से संसार को आंतरिक शांति का मार्ग दिखाया। जैन धर्म के अनुसार श्री शांतिनाथ भगवान सोलहवें तीर्थंकर और पंचम चक्रवर्ती के साथ-साथ कामदेव पद के भी धारक थे।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवान शांतिनाथ का जीव जब सर्वार्थ सिद्धि से माता एरा देवी के गर्भ में आया, तो स्वर्ग के देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया। नौ महीने व्यतीत हो जाने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582445/lord-shantinath-s-unique-message--beacon-of-light"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design14.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर भगवान श्री 1008 शांतिनाथ जी का जीवन मानवता के लिए शांति, करुणा और आत्मसंयम का अद्वितीय संदेश देता है। उनका नाम ही शांतिनाथ इस बात का प्रतीक है, उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से संसार को आंतरिक शांति का मार्ग दिखाया। जैन धर्म के अनुसार श्री शांतिनाथ भगवान सोलहवें तीर्थंकर और पंचम चक्रवर्ती के साथ-साथ कामदेव पद के भी धारक थे।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवान शांतिनाथ का जीव जब सर्वार्थ सिद्धि से माता एरा देवी के गर्भ में आया, तो स्वर्ग के देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया। नौ महीने व्यतीत हो जाने के बाद हस्तिनापुर के राजा श्री विश्व सेन और रानी श्रीमती एरा देवी के घर ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन प्रातः काल में तीन लोक के नाथ ने जन्म लिया। भगवान शांतिनाथ जी का जन्म हस्तिनापुर में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। देवों ने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक महोत्सव मनाया और उनका नाम शांतिनाथ रखा। </p>
<p style="text-align:justify;">शांतिनाथ भगवान की आयु एक लाख वर्ष की थी, शरीर 40 धनुष ऊंचा था और बदन स्वर्ण के समान था और उनका चिन्ह हिरण है। उनके पिता महाराज विश्वसेन एक प्रतापी और न्यायप्रिय शासक थे, जबकि माता एरा देवी अत्यंत धर्मनिष्ठ और आदर्श नारी थीं। भगवान की यौवन अवस्था आने पर उनके पिता ने अनेक कन्याओं के साथ उनका विवाह कर दिया। इस तरह भगवान के कुमार काल के पच्चीस हजार वर्ष व्यतीत हो गए तब महाराज विश्व सेन ने अपना राज्य सौंपकर भोगों से विरक्ति ले ली। जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष और व्यतीत हो गए, तब उनकी आयुधशाला में चक्रवर्ती के वैभव को प्रकट करने वाला चक्र रत्न उत्पन्न हो गया। चक्र रत्न आदि को लेकर भगवान दिग्विजय के लिए निकल गए और विधिवत्त दिग्विजय करके इस भरत क्षेत्र में एक छत्र शासन किया। </p>
<p style="text-align:justify;">चक्रवर्ती की छियानवे हजार रानियां थीं और चक्रवर्ती के वैभव से परिपूर्ण थीं। जब भगवान के पच्चीस हजार वर्ष साम्राज्य पद में व्यतीत हो गए,तब एक समय स्वयं को दर्पण में देखते हुए, उन्हें अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो गया, तब भगवान शरीर संसार और भोगों के स्वरूप का विचार करते हुए विरक्त हो गए। शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हुआ, भौतिक सुख क्षणिक हैं और वास्तविक आनंद आत्मा की शुद्धि में है। इस अनुभूति ने उन्हें संसार के मोह-माया से दूर होकर दीक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कठोर ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मज्ञान की दिशा में प्रगति की। वैराग्य होने पर लौकांतिक देवों ने आकर उनकी पूजा स्तुति की और उस समय इंद्र भी उपस्थित हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">भगवान ने अपने नारायण नामक पुत्र का राज्याभिषेक करके राज्य सौंप दिया। इंद्र ने दीक्षाभिषेक करके सरवर सिद्धि नाम की पालकी में विराजमान कर मनुष्य और देव हस्तिनापुर के बाहर वन में ले गए। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को नियम लेकर भगवान ने पंचमुखी केश लोच करके नम: सिद्ध कहते हुए जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली और संपूर्ण परिग्रह का त्याग करके ध्यान में स्थिर हो गए। भगवान को तीन ज्ञान तो जन्म से ही थे, दीक्षा ग्रहण करते ही चौथ ज्ञान मनः पर्यय भी प्राप्त हो गया। दीर्घकालीन तपस्या के पश्चात उन्हें केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई। फिर पौष शुक्ल दशमी के दिन 13 वें गुणस्थान में पहुंचकर केवल ज्ञान से विभूषित हो गए। तुरंत ही इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने समोसरण की रचना कर दी। भगवान के समोसरण में छत्तीस गणधर थे। </p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार भगवान ने बहुत काल तक समस्त जीवों के कल्याण के लिए धर्मोपदेश देना प्रारंभ किया। उन्होंने स्पष्ट किया, मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अपना क्रोध, लोभ और अहंकार है। इन पर विजय प्राप्त कर ही व्यक्ति सच्ची शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है। जब भगवान की आयु एक माह शेष रह गई तब सम्मेद शिखर आए और अपनी साधना पूर्ण की और चारों अघातिया कर्मों का नाश करके ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन लोक के अग्रभाग पर जाकर विराजमान हो गए यानी मोक्ष को प्राप्त किया। उत्तर पुराण में कहते हैं, संसार में श्री शांतिनाथ जिनेंद्र को छोड़कर अन्य तीर्थंकरों में ऐसा कौन है, जिसने पूर्व प्रत्येक भव में बहुत भारी धर्म वृद्धि प्राप्त की हो अर्थात कोई नहीं, इसीलिए सबका भला करने वाले श्री शांतिनाथ भगवान का निरंतर ध्यान करना सभी को सदैव शांति एवं शक्ति प्रदान करता है।  </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(1)13.jpg" alt="Untitled design (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />प्रो. रवि जैन/ डॉ. अर्चना जैन</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/582445/lord-shantinath-s-unique-message--beacon-of-light</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/582445/lord-shantinath-s-unique-message--beacon-of-light</guid>
                <pubDate>Wed, 20 May 2026 09:00:20 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design14.jpg"                         length="71626"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रामवाटिका :  जहां तुलसी की वाणी में उतरा था बालराम का सौंदर्य</title>
                                    <description><![CDATA[<h4 style="text-align:justify;">मौजूद है सुंदरकांड की पांडुलिपि</h4>
<p style="text-align:justify;">दुलही गांव में रामचरित मानस के सुंदरकांड की पांडुलिपि जागेश्वर दयाल तिवारी के परिवार में सुरक्षित है। बताया जाता है कि अटकोहना निवासी पंडित भवानी प्रसाद तिवारी को तुलसीदास ने पांडुलिपि उपहार में दी थी। उनके न रहने के बाद उत्तराधिकारी उदय शंकर तिवारी को मिली। कुछ समय बाद वह अटकोहना छोड़कर दुलही में आ बसे। उनके परिवार में सुंदरकांड की यह दुर्लभ पांडुलिपि बतौर विरासत सदियों से चली आ रही है। बताते हैं कि पांडुलिपि भोजपत्र पर काली स्याही से मोटे अक्षरों में लिखी है। हर पन्ने पर सीता राम लिखी गोल मुहर लगी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582444/ramvatika--where-tulsi-s-words-captured-the-beauty-of-balram"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(45)8.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">मौजूद है सुंदरकांड की पांडुलिपि</h4>
<p style="text-align:justify;">दुलही गांव में रामचरित मानस के सुंदरकांड की पांडुलिपि जागेश्वर दयाल तिवारी के परिवार में सुरक्षित है। बताया जाता है कि अटकोहना निवासी पंडित भवानी प्रसाद तिवारी को तुलसीदास ने पांडुलिपि उपहार में दी थी। उनके न रहने के बाद उत्तराधिकारी उदय शंकर तिवारी को मिली। कुछ समय बाद वह अटकोहना छोड़कर दुलही में आ बसे। उनके परिवार में सुंदरकांड की यह दुर्लभ पांडुलिपि बतौर विरासत सदियों से चली आ रही है। बताते हैं कि पांडुलिपि भोजपत्र पर काली स्याही से मोटे अक्षरों में लिखी है। हर पन्ने पर सीता राम लिखी गोल मुहर लगी हुई है। पांडुलिपि पर संवत 1672 अंकित है। बताते हैं कि गोरखपुर गीता प्रेस संचालक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने जिले में आकर पांडुलिपि के तुलसीदास की हस्तलिखित होने की पुष्टि की थी। उन्होंने कल्याण के वर्ष 13, अंक तीन मानसांक खंड तीन में इस पांडुलिपि का जिक्र करते हुए इसे मौलिक और प्रामाणिक बताया था।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(46)8.jpg" alt="Untitled design (46)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">रामवाटिका पहुंचते ही लगता है मानो समय ठहर गया हो और सदियों पुरानी तपस्या की गूंज अब भी वृक्षों की छांव में सुनाई देती हो। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार लगभग 470 वर्ष पूर्व संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने इस स्थान पर चातुर्मास व्यतीत किया था। इसी दौरान उन्होंने प्रभु श्रीराम के बाल स्वरूप की दिव्य लीलाओं को शब्दों में पिरोते हुए बालकांड के अंशों की रचना की। कहा जाता है कि साधना के उन्हीं दिनों में तुलसीदास ने यहां अपनी दातून भूमि में गाड़ दी थी। समय बीतता गया और वह दातून आज एक विशाल वटवृक्ष के रूप में खड़ी है। उसकी फैली शाखाएं और गहरी जड़ें मानो बीते युगों की साक्षी बनकर आज भी इतिहास सुनाती हैं। रामवाटिका की हवा में लोकविश्वास और अध्यात्म का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर और श्रीराम दरबार मंदिर को लेकर भी लोगों की गहरी आस्था है। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(47)9.jpg" alt="Untitled design (47)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">रामवाटिका केवल इतिहास या किंवदंतियों का स्थल नहीं, बल्कि वह भावभूमि है, जहां साहित्य और भक्ति एकाकार हो जाते हैं। यहां आने वाला हर व्यक्ति प्रकृति की नीरवता में तुलसी की चौपाइयों की अनुगूंज महसूस करता है। वटवृक्ष की छांव, मंदिरों की घंटियां और सरयू अंचल की स्मृतियां मिलकर ऐसा वातावरण रचती हैं, जो मन को सहज ही आध्यात्मिक शांति से भर देता है। हर वर्ष होली के अवसर पर यहां लगने वाला मेला इस स्थान की जीवंत परंपरा को आज भी संजोए हुए है। दूर-दूर से श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं। कोई तुलसी की तपोभूमि के दर्शन करने आता है, तो कोई उस वटवृक्ष के नीचे खड़े होकर इतिहास को महसूस करना चाहता है, जिसने सदियों का सफर तय किया है। तेजी से बदलते समय में रामवाटिका जैसी धरोहरें केवल धार्मिक महत्व नहीं रखतीं, बल्कि वे भारतीय संस्कृति, लोकविश्वास और साहित्यिक विरासत की अमूल्य निधि हैं। यह वह स्थान है, जहां तुलसी की भक्ति, प्रकृति की नीरवता और लोकआस्था मिलकर एक ऐसा अध्याय रचती हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने की प्रेरणा देता रहेगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">तुलसीदास के ठहरने के हैं प्रमाण</h4>
<p style="text-align:justify;">धौरहरा के वाजिबुलअर्ज में जांगड़ा राजा खड़ग सिंह का एक आलेख मिलता है, जिसमें लिखा है कि फकीर बैरागी तुलसीदास सरजू किनारे भ्रमण करते हुए जंगल में आए। उन्होंने यहां रामचरित मानस के कुछ अंश रचे। तुलसीदास की रचना स्थली रामबटी धौरहरा में ठाकुरद्वारा के रूप में आज भी मौजूद है। यहां एक मंदिर में तुलसीदास द्वारा स्थापित राम, लक्ष्मण और सीता की प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">धौरहरा रियासत के जांगड़ा राजा जोत सिंह को तुलसीदास के आगमन का समाचार मिला, तो वे उनसे मिलने रामवाटिका पहुंचे। उस समय संत तुलसीदास सरयू स्नान के लिए गए हुए थे। प्रतीक्षा करते हुए राजा उनके आसन पर बैठ गए। जब तुलसीदास लौटे और अपने आसन पर राजा को बैठे देखा, तो वे अप्रसन्न हो उठे और राजा को शाप दे दिया। लोककथाएं कहती हैं कि उसी समय उन्होंने अपनी दातून भूमि में रोप दी थी, जो आज विशाल वटवृक्ष के रूप में श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है। श्रीराम वाटिका गोस्वामी तुलसीदास की रचनास्थली रही है। यहीं पर प्रवास करते हुए गोस्वामी जी ने भगवान राम के बाल रूप की बालकांड के रूप में रचना की थी। इसकी पुष्टि दुलही गांव में रखी, उनकी पांडुलिपि प्रति के साथ गीता प्रेस के लोग भी कर चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>-विद्यासागर, पुजारी हनुमान मंदिर, श्रीराम वाटिका धाम</strong></h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/582444/ramvatika--where-tulsi-s-words-captured-the-beauty-of-balram</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/582444/ramvatika--where-tulsi-s-words-captured-the-beauty-of-balram</guid>
                <pubDate>Tue, 19 May 2026 10:27:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%2845%298.jpg"                         length="165211"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सौभाग्य और पतिव्रता का महापर्व वट सावित्री व्रत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या वट सावित्री अमावस्या कहलाती है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए वट सावित्री व्रत रखकर वटवृक्ष तथा यमदेव की पूजा करती हैं। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक एवं पर्याय बन चुका है। वट सावित्री व्रत में वट और सावित्री, दोनों का विशेष महत्व है। इस वर्ष यह पर्व 16 मई शनिवार को मनाया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर भारत में ‘बरगदाही’ के नाम से पुकारे जाने वाले सनातन संस्कृति के उत्कृष्ट सनातन जीवन मूल्यों के परिचायक इस व्रत से जुड़ी सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा से प्रायः हर सनातनधर्मी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581665/vat-savitri-vrat--a-great-festival-of-good-fortune-and-devotion-to-husband"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(40)6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या वट सावित्री अमावस्या कहलाती है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए वट सावित्री व्रत रखकर वटवृक्ष तथा यमदेव की पूजा करती हैं। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक एवं पर्याय बन चुका है। वट सावित्री व्रत में वट और सावित्री, दोनों का विशेष महत्व है। इस वर्ष यह पर्व 16 मई शनिवार को मनाया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर भारत में ‘बरगदाही’ के नाम से पुकारे जाने वाले सनातन संस्कृति के उत्कृष्ट सनातन जीवन मूल्यों के परिचायक इस व्रत से जुड़ी सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा से प्रायः हर सनातनधर्मी भली-भांति परिचित हैं। वैदिक युग का वह अद्भुत घटनाक्रम आज भी पढ़ने-सुनने वाले दोनों को अभिभूत कर देता है। ऐसा विलक्षण उदाहरण किसी अन्य धर्म-संस्कृति में मिलना दुर्लभ है। कहते हैं कि महासती सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही मृत्यु के देवता यमराज से अपने मृत पति का पुनर्जीवन हासिल किया था। तभी से वट वृक्ष हिन्दू धर्म में देववृक्ष के रूप में पूज्य हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">तात्विक दृष्टि से विचार करें तो वट पूजन के इस महाव्रत में स्त्री शक्ति की प्रबल जिजीविषा की विजय के महाभाव के साथ हमारे जीवन में वृक्षों की महत्ता व पर्यावरण संरक्षण का पुनीत संदेश भी छुपा है। कथा के अनुसार सावित्री राजा अश्वपति की पुत्री थी, जिसे राजा ने बहुत कठिन तपस्या करने के उपरांत देवी सावित्री की कृपा से प्राप्त किया था। इसलिए राजा ने उनका नाम ‘सावित्री’ रखा था। सावित्री बहुत गुणवान और रूपवान थी, लेकिन उसके अनुरूप योग्य वर न मिलने के कारण सावित्री के पिता दु:खी रहा करते थे। इसलिए उन्होंने अपनी कन्या को स्वयं अपना वर तलाश करने भेज दिया और इस तलाश में एक दिन वन में सावित्री ने सत्यवान को देखा और उसके गुणों के कारण मन में ही उसे वर के रूप में वरण कर लिया। सत्यवान साल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, लेकिन उनका राज्य किसी ने छीन लिया था और काल के प्रभाव के कारण सत्यवान के माता- पिता अंधे हो गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">सत्यवान व सावित्री के विवाह से पूर्व ही नारद मुनि ने यह सत्य सावित्री को बता दिया था कि सत्यवान अल्पायु है, अतः वह उससे विवाह न करे। यह जानते हुए भी सावित्री ने सत्यवान से विवाह करने का निश्चय किया और देवर्षि नारद से कहा-भारतीय नारी जीवन में मात्र एक बार पति का वरण करती है, बारंबार नहीं। अतः मैंने एक बार ही सत्यवान का वरण किया है और यदि उसके लिए मुझे मृत्यु से भी लड़ना पड़े तो मैं यह करने को तैयार हूं। उसकी मृत्यु का समय निकट आने पर मृत्यु से तीन दिन पूर्व ही सावित्री ने अन्न-जल का त्याग कर दिया। मृत्यु वाले दिन जंगल में जब सत्यवान लकड़ी काटने के लिए गए तो सावित्री भी उनके साथ गई और जब मृत्यु का समय निकट आ गया तथा सत्यवान के प्राण हरने लिए यमराज आए तो सावित्री भी उनके साथ चलने लगी। यमराज के बहुत समझाने पर भी वह वापस लौटने को तैयार नहीं हुई। तब यमराज ने उससे सत्यवान के जीवन को छोड़कर अन्य कोई भी वर मांगने को कहा।</p>
<p style="text-align:justify;">उस स्थिति में सावित्री ने अपने अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति और ससुर का खोया हुआ राज्य मांग लिया, किंतु वापस लौटना स्वीकार न किया। उसकी अटल पतिभक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने जब पुनः उससे वर मांगने को कहा तो उसने सत्यवान के पुत्रों की मां बनने का बुद्धिमत्तापूर्ण वर मांगा, यमराज के तथास्तु कहते ही मृत्युपाश से मुक्त होकर वटवृक्ष के नीचे पड़ा हुआ सत्यवान का मृत शरीर जीवित हो उठा। तब से अखंड सौभाग्य प्राप्ति के लिए इस व्रत की परंपरा आरंभ हो गई और इस व्रत में वटवृक्ष और यमदेव की पूजा का विधान बन गया। महर्षि श्री अरविंद ने भी इस कथा को मध्य में रखते हुए सावित्री महाकाव्य का रचना की है, जिसमें उन्होंने सावित्री की कथा को आध्यात्मिक जीवन की यात्रा व उसकी अनुभूतियों के रूप में पिरोया है। उसे सावित्री-साधना का आध्यात्मिक ग्रंथ भी कह सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वटवृक्ष के कई दृष्टिकोण: वटवृक्ष कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है, सबसे पहले यह वृक्ष अपनी विशालता के लिए प्रसिद्ध है। दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए, तो यह वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक है, क्योंकि इसी वृक्ष के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ ने बुद्धत्व को प्राप्त किया और भगवान बुद्ध कहलाए। बोध ज्ञान को प्राप्त करने के कारण इस अक्षय वटवृक्ष को बोधिवृक्ष भी कहते हैं, जो गया तीर्थ में स्थित है। इसी तरह वाराणसी में भी ऐसे वटवृक्ष हैं, जिन्हें अक्षयवट मानकर पूजा जाता है। वटवृक्ष वातावरण को शीतलता व शुद्धता प्रदान करता है और आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह अत्यंत लाभकारी है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पीपल के समान वट वृक्ष</h4>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों के अनुसार पीपल वृक्ष के समान वट वृक्ष यानी बरगद का वृक्ष भी विशेष महत्व रखता है। पुराणों के अनुसार-वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु व अग्रभाग में शिव का वास माना गया है। अत: ऐसा माना जाता है कि इसके नीचे बैठकर पूजन और व्रतकथा आदि सुनने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह वृक्ष लंबे समय तक अक्षय रहता है, इसलिए इसे अक्षयवट भी कहते हैं। जैन और बौद्ध भी अक्षयवट को अत्यंत पवित्र मानते हैं। जैनों का मानना है कि उनके तीर्थकर भगवान ऋ षभदेव ने अक्षयवट के नीचे बैठकर तपस्या की थी। प्रयाग में इस स्थान को ऋ षभदेव तपस्थली या तपोवन के नाम से जाना जाता है। हमारी अरण्य संस्कृति में वृक्षों को जीवंत देवताओं की संज्ञा दी गई है। </p>
<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(40)6.jpg" alt="Vat Savitri Vrat, a great festival of good fortune and devotion to husband" width="1280" height="720"></img>
Vat Savitri Vrat, a great festival of good fortune and devotion to husband

<p style="text-align:justify;">वैदिक मनीषा कहती है कि हवा के झोंकों से झूमते घने छायादार वृक्ष और उनसे गले मिलती लताएं प्रकृति का श्रंगार ही नहीं, जीवन का अज्रस स्रोत भी हैं। हमारे देश की समग्र सभ्यता, संस्कृति, धर्म एवं अध्यात्म-दर्शन का विकास वनों में ही हुआ था। वैदिक भारत में लोग वनदेवी की नियमित उपासना किया करते थे। स्मृति ग्रथों में वन संपदा को नष्ट करने वालों के लिए कठोर दंड का विधान किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्ञात हो कि वृक्ष-वनस्पति हमें हरियाली और फल-फूल देने के साथ ही अपनी प्राणवायु से हमें जीवन और अच्छे स्वास्थ्य का वरदान भी देते हैं। इनका न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में अमूल्य योगदान है, वरन ये ग्रह व वास्तुदोष भी दूर करते हैं। हमारे समूचे पर्यावरण की सेहत इन्हीं मूक देववाओं की कृपा पर टिकी है। इसीलिए तो वृक्ष-वनस्पति के प्रति गहरी श्रद्धा व लगाव भारतीय संस्कृति की अति पुरातन व संवेदनशील परंपरा रही है। अत: वट सावित्री व्रत के रूप में वटवृक्ष की पूजा का यह विधान भारतीय संस्कृति की गौरव-गरिमा का एक प्रतीक है और इसके द्वारा वृक्षों के औषधीय महत्व व उनके देवस्वरुप का भी ज्ञान होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>–पं मनोज कुमार द्विवेदी</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/581665/vat-savitri-vrat--a-great-festival-of-good-fortune-and-devotion-to-husband</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/581665/vat-savitri-vrat--a-great-festival-of-good-fortune-and-devotion-to-husband</guid>
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 08:00:53 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%2840%296.jpg"                         length="224143"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोमनाथ : आस्था संकल्प और पुनर्जागरण की अनंत धारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हन्यते हन्यमाने शरीरे अर्थात शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में निहित भाव और भारतीय सभ्यता की सनातन चेतना का सबसे जीवंत स्वरूप गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के दक्षिणी तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर में दिखाई देता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ ने इतिहास में अनेक आक्रमणों और विनाश को सहा, लेकिन हर बार फिर खड़ा हुआ और उसकी आरती, घंटियों और श्रद्धा की ध्वनि कभी थमी नहीं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">प्राचीन काल से प्रभास पाटन महान तीर्थभूमि  </h4>
<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(39)6.jpg" alt="Somnath" width="1200" height="720" />
Somnath

<p style="text-align:justify;">भारतीय इतिहास के हजारों वर्षों में सनातन धर्म ने कई तरह की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/581663/somnath-faith-resolution-and-endless-stream-of-renaissance"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(34)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हन्यते हन्यमाने शरीरे अर्थात शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में निहित भाव और भारतीय सभ्यता की सनातन चेतना का सबसे जीवंत स्वरूप गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के दक्षिणी तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर में दिखाई देता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ ने इतिहास में अनेक आक्रमणों और विनाश को सहा, लेकिन हर बार फिर खड़ा हुआ और उसकी आरती, घंटियों और श्रद्धा की ध्वनि कभी थमी नहीं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">प्राचीन काल से प्रभास पाटन महान तीर्थभूमि  </h4>
<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-(39)6.jpg" alt="Somnath" width="1280" height="720"></img>
Somnath

<p style="text-align:justify;">भारतीय इतिहास के हजारों वर्षों में सनातन धर्म ने कई तरह की चुनौतियों का सामना किया। राजनीतिक परिवर्तन, आक्रमण और सत्ता परिवर्तन के दौर में मंदिरों, मठों और ज्ञान केंद्रों को नुकसान पहुंचाया गया, उनकी संरचनाएं बदली गईं और उन्हें संरक्षण देने वाली व्यवस्थाएं भी प्रभावित हुईं। इसके बावजूद भारतीय आध्यात्मिक परंपरा न केवल जीवित रही, बल्कि समय के साथ स्वयं को पुनर्स्थापित भी करती रही। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यही रही कि संस्थागत क्षति और राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद इसकी आत्मा कभी समाप्त नहीं हुई। </p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं थे, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के भी केंद्र थे। राजसत्ता से उनके गहरे संबंध के कारण वे युद्ध और संघर्ष के समय सबसे पहले निशाने पर आए। महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ पर किया गया आक्रमण इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है। फारसी ग्रंथों में इसे विजय के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि भारतीय परंपरा में इसे पीड़ा, संघर्ष और पुनर्निर्माण की कथा के रूप में याद किया गया, लेकिन ऐतिहासिक सत्य यह है कि सोमनाथ कभी श्रद्धा से विलुप्त नहीं हुआ। चालुक्य शासकों सहित अनेक राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया और यह निरंतर आस्था का केंद्र बना रहा। ऐसी अनेक घटनाएं भारत के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">सोमनाथ का इतिहास केवल एक आक्रमण की कहानी नहीं है। प्राचीन काल से ही प्रभास पाटन एक महान तीर्थभूमि रहा है। इसे विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में प्रभास-पट्टन, शिव-पट्टन और प्रभास-तीर्थ जैसे नामों से जाना गया। यहां तीन पवित्र नदियों का संगम होता है और यही वह स्थान माना जाता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ। निकट ही वैराग्य क्षेत्र और गोपी तालाब स्थित हैं, जहां से गोपी चंदन प्राप्त होता है। इस संपूर्ण क्षेत्र की यात्रा को भारतीय तीर्थ परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। काठियावाड़ और गुजरात की प्राचीन धरोहरों पर आधारित कई ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्विक रिपोर्टों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">शैव और वैष्णव परंपराओं का केंद्र</h4>
<p style="text-align:justify;">सोमनाथ भारत की समावेशी सांस्कृतिक परंपरा का भी प्रतीक है। यह शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत संगम का केंद्र है और हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय संस्कृति हमेशा से बहुलतावादी और समावेशी रही है। स्वतंत्र भारत में सोमनाथ के पुनर्जागरण का आधुनिक अध्याय 12 नवंबर 1947, दीपावली के दिन आरंभ हुआ, जब देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस पवित्र स्थल का दौरा किया। विभाजन की पीड़ा के बीच सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। यह केवल एक मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करने का एक ऐतिहासिक प्रयास था। इसके बाद सोमनाथ को एक सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य प्रारंभ हुआ। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में प्रातः काल संपन्न हुई प्राण-प्रतिष्ठा ने पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति और आत्मविश्वास को नई शक्ति प्रदान की।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आधुनिक समाज को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास</h4>
<p style="text-align:justify;">आज जब भारत ‘भारत @ 2047’ की ओर बढ़ रहा है, तब सोमनाथ से जुड़े ये सभ्यतागत मूल्य और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। तकनीकी बदलाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में भारत दुनिया को यह संदेश देता है कि विकास का अर्थ करुणा को त्यागना नहीं है और शक्ति का अर्थ संयम को छोड़ देना नहीं है। सोमनाथ हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल सामर्थ्य से नहीं, बल्कि स्मृति, विवेक और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से निर्मित होता है। इसी दृष्टि से “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026-27” की परिकल्पना की गई है। यह वर्षभर चलने वाला राष्ट्रीय आयोजन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की आध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत चेतना को समर्पित है। सदियों तक अनेक बार विध्वंस झेलने के बाद भी जिस प्रकार समाज के सामूहिक संकल्प से सोमनाथ पुनः स्थापित होता रहा, वह भारत की सांस्कृतिक आत्मशक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान का जीवंत उदाहरण है। </p>
<p style="text-align:justify;">8 से 11 जनवरी 2026 के बीच प्रारंभ हुए इस पर्व के माध्यम से दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ावों को स्मरण किया गया। 1026 में सोमनाथ पर हुए प्रथम दर्ज आक्रमण के एक हजार वर्ष और स्वतंत्रता के बाद 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर के पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष। इस आयोजन का उद्देश्य सोमनाथ को राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक स्मृति के प्रतीक के रूप में स्थापित करना है। 11 मई 2026 को आयोजित होने वाले प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रम तक देशभर में यात्राएं, सांस्कृतिक आयोजन, संवाद, शैक्षिक कार्यक्रम और विभिन्न ज्योतिर्लिंगों, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, जिलों और शिवालयों में समन्वित गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं, सोमनाथ ने एक नए पुनर्जागरण का दौर देखा है। प्रशासनिक सुधार, आधारभूत संरचना का विकास, धरोहर संरक्षण और सांस्कृतिक पहलों ने सोमनाथ को एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र के रूप में और अधिक सशक्त किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरणीय संतुलन और महिला-सशक्तिकरण आधारित सेवा पहलों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि भारतीय सभ्यतागत मूल्य आधुनिक जिम्मेदारियों और समावेशिता के साथ कैसे आगे बढ़ सकते हैं। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व आधुनिक समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक प्रयास है। यह हमें याद दिलाता है कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति उन मूल्यों, परंपराओं और जिम्मेदारियों में है, जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता रहा है। इसी कारण आज सोमनाथ केवल पुनर्निर्मित मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत तीर्थ है। इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ते भारत के लिए सोमनाथ एक महत्वपूर्ण संदेश देता है - कोई भी सभ्यता तब मजबूत रहती है, जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे, समय के साथ स्वयं को ढालती रहे और सभी को साथ लेकर चले। सोमनाथ की यह विरासत हमें निरंतर प्रेरित करती रहे- उद्देश्यपूर्ण निर्माण करने के लिए, संतुलित आचरण के लिए और अपनी पहचान के प्रति सजग रहते हुए आगे बढ़ने के लिए।</p>
<h5 style="text-align:justify;">- <strong>गजेंद्र सिंह शेखावत,  केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार </strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/581663/somnath-faith-resolution-and-endless-stream-of-renaissance</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/581663/somnath-faith-resolution-and-endless-stream-of-renaissance</guid>
                <pubDate>Tue, 12 May 2026 10:11:31 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%2834%298.jpg"                         length="127431"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पीपल के नीचे दीपक जलाने से जीवन में आती है समृद्धि</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">पीपल के पेड़ के नीचे पांच मुखी (पंचमुखी) दीपक जलाना ज्योतिषीय और धार्मिक रूप से अत्यंत शुभ माना जाता है, जो मुख्य रूप से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया के अशुभ प्रभावों को कम करता है। यह शनिवार को धन-समृद्धि, सुख-शांति, और पितृ दोष से मुक्ति पाने का एक उपाय है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।<strong>- अनिल सुधांशु ज्योतिषाचार्य </strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">शनि दोष और साढ़ेसाती में राहत </h5>
<p style="text-align:justify;">पीपल को शनिदेव का प्रतीक माना जाता है, इसलिए शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और मानसिक शांति मिलती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">धन और सुख-समृद्धि</h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580927/lighting-a-lamp-under-a-peepal-tree-brings-prosperity-to-life"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(2)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पीपल के पेड़ के नीचे पांच मुखी (पंचमुखी) दीपक जलाना ज्योतिषीय और धार्मिक रूप से अत्यंत शुभ माना जाता है, जो मुख्य रूप से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया के अशुभ प्रभावों को कम करता है। यह शनिवार को धन-समृद्धि, सुख-शांति, और पितृ दोष से मुक्ति पाने का एक उपाय है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।<strong>- अनिल सुधांशु ज्योतिषाचार्य </strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">शनि दोष और साढ़ेसाती में राहत </h5>
<p style="text-align:justify;">पीपल को शनिदेव का प्रतीक माना जाता है, इसलिए शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और मानसिक शांति मिलती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">धन और सुख-समृद्धि</h5>
<p style="text-align:justify;">मान्यता है कि पीपल के पेड़ के नीचे नियमित या शनिवार को दीपक जलाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">पितृ दोष से मुक्ति, पीपल के नीचे शाम के समय दीपक जलाने से पितर शांत होते हैं और पितृ दोष दूर हो सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">पंच तत्वों का संतुलन-</h5>
<p style="text-align:justify;">पंचमुखी दीपक (5 मुखी) पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश) का प्रतीक माना जाता है, जो जीवन में संतुलन लाता है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">दीपक जलाने के नियम</h4>
<p style="text-align:justify;">समय- शाम के समय (गोधूलि बेला) दीपक जलाना सबसे उत्तम है।<br />तेल- सरसों के तेल या घी का उपयोग करें।<br />परिक्रमा - दीपक जलाने के बाद पीपल के पेड़ की 7 बार परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।<br />पीपल के पेड़ के नीचे पंचमुखी दीपक  जलाना एक बेहद असरदार उपाय माना गया है, दीपक की लौ सिर्फ रौशनी नहीं देती, ये सूर्य तत्व का प्रतीक है। यही लौ जब पीपल के नीचे जलती है, तो ये सूर्य, शनि, राहु-केतु जैसे ग्रहों के बीच संतुलन बनाती है। इससे जीवन में स्थिरता और शांति आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हिंदू धर्म में पंचमुखी दीपक (पांच मुख वाला दीपक) का विशेष आध्यात्मिक और वास्तु महत्व है। यह पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और दिशाओं का प्रतीक है। इसे जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार, वास्तु दोष का निवारण, सुख-समृद्धि की वृद्धि और शत्रु-बाधा से मुक्ति मिलती है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">पंचमुखी दीपक का महत्व और लाभ</h4>
<p style="text-align:justify;">लक्ष्मी और बरकत:  यह दीपक अष्ट लक्ष्मी (धन, समृद्धि, आदि) को आकर्षित करता है, जिससे घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती।<br />वास्तु दोष दूर करना:  घर के मुख्य द्वार पर या पूजा घर में इस दीपक को जलाने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />हनुमान जी की कृपा:  विशेष रूप से मंगलवार या शनिवार को हनुमान जी के सामने पंचमुखी दीपक जलाने से हनुमान जी के पंचमुखी अवतार की कृपा प्राप्त होती है, जिससे कष्ट दूर होते हैं और साहस व सुरक्षा मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>पांच दिशाओं की सुरक्षा:-</strong></p>
<p style="text-align:justify;">यह दीपक पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ईशान कोण, इन पांचों दिशाओं से आने वाली बाधाओं को दूर करता है।<br />प्रयोग विधि: ---इसे आमतौर पर शाम के समय (प्रदोष काल) में गाय के शुद्ध घी या सरसों के तेल में जलाना सबसे उत्तम माना जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सावधानी: -पंचमुखी दीपक को जलाते समय ध्यान रखें कि सभी पांचों मुख अलग-अलग दिशाओं में हों।</strong> </p>
<p style="text-align:justify;">सरसों का तेल: पीपल की जड़ में या उसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना सबसे महत्वपूर्ण है, इसमें कुछ काले तिल भी डालें।<br />काला कपड़ा : पीपल के पेड़ में काला कपड़ा या मौली (कलावा) बांधने से पितृ दोष, शनि और राहु-केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।<br />काले तिल और उड़द की दाल: जल में काले तिल मिलाकर अर्पित करें।<br />गुड़: गुड़ मिला जल या गुड़ का भोग अर्पित करने से सूर्य-शनि का दोष कम होता है।<br />कच्चा सूत: पीपल के पेड़ के चारों ओर 5 या 7 बार कच्चा सूत लपेटें।<br />धूप/अगरबत्ती: सुगंधित धूप से नकारात्मकता दूर होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/580927/lighting-a-lamp-under-a-peepal-tree-brings-prosperity-to-life</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/580927/lighting-a-lamp-under-a-peepal-tree-brings-prosperity-to-life</guid>
                <pubDate>Fri, 08 May 2026 10:00:24 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%282%293.jpg"                         length="167146"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पौराणिक कथा : गांधारी को 100 पुत्रों का वरदान </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हस्तिनापुर समय के साथ आगे बढ़ रहा था। माता सत्यवती और पितामह भीष्म अब अतीत की स्मृतियों को पीछे छोड़ वर्तमान में स्थिर हो चुके थे। भीष्म ने अपनी महान प्रतिज्ञा के अनुसार स्वयं को पूरी तरह हस्तिनापुर और उसके सिंहासन की रक्षा में समर्पित कर दिया था, वहीं सत्यवती भी इस गौरवशाली कुरुवंश की मर्यादा और सुरक्षा में तल्लीन थीं। धृतराष्ट्र और पांडु दोनों का विवाह संपन्न हो चुका था और अब राजवंश में नई पीढ़ी के आगमन की आशा जाग उठी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">वैशंपायन ने वर्णन किया कि महाराज पांडु ने अपनी पत्नियों कुंती और माद्री के साथ कुछ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580926/mythological-story--gandhari-was-blessed-with-100-sons"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(1)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हस्तिनापुर समय के साथ आगे बढ़ रहा था। माता सत्यवती और पितामह भीष्म अब अतीत की स्मृतियों को पीछे छोड़ वर्तमान में स्थिर हो चुके थे। भीष्म ने अपनी महान प्रतिज्ञा के अनुसार स्वयं को पूरी तरह हस्तिनापुर और उसके सिंहासन की रक्षा में समर्पित कर दिया था, वहीं सत्यवती भी इस गौरवशाली कुरुवंश की मर्यादा और सुरक्षा में तल्लीन थीं। धृतराष्ट्र और पांडु दोनों का विवाह संपन्न हो चुका था और अब राजवंश में नई पीढ़ी के आगमन की आशा जाग उठी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">वैशंपायन ने वर्णन किया कि महाराज पांडु ने अपनी पत्नियों कुंती और माद्री के साथ कुछ समय सुखपूर्वक व्यतीत किया, किंतु शीघ्र ही उन्होंने राज्य की बागडोर भीष्म के संरक्षण में सौंपकर दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। वे जिस दिशा में गए, वहां के अनेक राज्यों को अपने पराक्रम से जीत लिया। कहीं उन्होंने मैत्री संधियां स्थापित कीं, तो कहीं अन्यायी राजाओं को हटाकर न्यायपूर्ण शासन की स्थापना की। कई महीनों तक चले इस अभियान के बाद वे अपार धन-संपदा, स्वर्ण और रत्न लेकर हस्तिनापुर लौटे।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके लौटने पर नगर में उत्सव का वातावरण था। भीष्म ने उन्हें स्नेहपूर्वक आलिंगन किया, विदुर ने आशीर्वाद दिया और धृतराष्ट्र ने उनके पराक्रम की सराहना की। माताओं ने स्नेह बरसाया और कुंती-माद्री ने आरती उतारकर उनका स्वागत किया। पांडु द्वारा लाया गया धन राजकोष को समृद्ध कर गया। उन्होंने बड़ों को आभूषण भेंट किए और प्रजा में भी उदारता से दान वितरित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद पांडु अपनी पत्नियों के साथ वन की ओर चले गए, जहां वे सरल और शांत जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें शिकार का विशेष शौक था और जब वे धनुष-बाण तथा शस्त्रों से सुसज्जित होकर वन में निकलते, तो उनका तेज किसी देवता के समान प्रतीत होता। नगरवासी और वनवासी दोनों ही उनसे अत्यंत प्रेम और सम्मान करते थे। धृतराष्ट्र की अनुमति से उन्हें वन में सभी आवश्यक सुख-सुविधाएं भी भेजी जाती थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">इधर हस्तिनापुर में भी घटनाएं चलती रहीं। भीष्म ने एक सुशील कन्या से विदुर का विवाह कराया, जिनसे आगे चलकर बुद्धिमान संतानों का जन्म हुआ। उसी समय गांधारी भी गर्भवती हुईं। उनके विषय में कहा जाता है कि उन्हें शिव से सौ पुत्रों का वरदान प्राप्त था। एक दिन जब वे इस वरदान के विषय में चिंतन कर रही थीं, तभी महर्षि वेदव्यास महल में पधारे। थकान और कष्ट के बावजूद गांधारी ने उनकी अत्यंत श्रद्धा से सेवा की। प्रसन्न होकर व्यास ने उन्हें वर मांगने को कहा। तब गांधारी ने अपने पति के समान सौ पुत्रों की कामना व्यक्त की। व्यास के आशीर्वाद से उन्होंने गर्भ धारण किया और अपने सौ पुत्रों के जन्म की प्रतीक्षा करने लगीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/580926/mythological-story--gandhari-was-blessed-with-100-sons</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/580926/mythological-story--gandhari-was-blessed-with-100-sons</guid>
                <pubDate>Thu, 07 May 2026 10:00:30 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%281%293.jpg"                         length="120887"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बोध कथा:पत्थर और बांसुरी </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक बहुत ही कुशल मूर्तिकार था, जो पहाड़ों से पत्थर चुनकर सुंदर मूर्तियां बनाया करता था। एक दिन वह जंगल में गया और उसे दो बड़े पत्थर मिले। उसने सोचा, इनसे मैं दो महान कलाकृतियां बनाऊंगा। उसने पहले पत्थर पर अपनी छेनी से वार करना शुरू किया। जैसे ही पहली चोट पड़ी, पत्थर के भीतर से एक दर्द भरी कराह निकली- “रुको! मुझे बहुत दर्द हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृपया मुझ पर वार मत करो, मुझे वैसे ही रहने दो जैसा मैं हूं।” मूर्तिकार दयालु था, उसने उस पत्थर को छोड़ दिया। वह दूसरे पत्थर के पास गया। जब उसने उस</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580925/bodhi-katha--stone-and-flute"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक बहुत ही कुशल मूर्तिकार था, जो पहाड़ों से पत्थर चुनकर सुंदर मूर्तियां बनाया करता था। एक दिन वह जंगल में गया और उसे दो बड़े पत्थर मिले। उसने सोचा, इनसे मैं दो महान कलाकृतियां बनाऊंगा। उसने पहले पत्थर पर अपनी छेनी से वार करना शुरू किया। जैसे ही पहली चोट पड़ी, पत्थर के भीतर से एक दर्द भरी कराह निकली- “रुको! मुझे बहुत दर्द हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कृपया मुझ पर वार मत करो, मुझे वैसे ही रहने दो जैसा मैं हूं।” मूर्तिकार दयालु था, उसने उस पत्थर को छोड़ दिया। वह दूसरे पत्थर के पास गया। जब उसने उस पर काम शुरू किया, तो वह पत्थर भी कांप रहा था, लेकिन उसने एक शब्द नहीं कहा। मूर्तिकार ने उसे तराशना जारी रखा। हफ्तों की कड़ी मेहनत, चोट और घर्षण के बाद, उस साधारण पत्थर ने एक अत्यंत सुंदर बांसुरी बजाते हुए बालक की मूर्ति का रूप ले लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ समय बाद, उस जंगल के पास एक भव्य मंदिर बना। मूर्तिकार ने वह ‘बांसुरी बजाते बालक’ की मूर्ति मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दी। लोग दूर-दूर से उस मूर्ति की सुंदरता देखने और दर्शन करने आने लगे। तभी मंदिर के कर्मचारियों को अहसास हुआ कि मंदिर के द्वार पर एक ऐसे पत्थर की जरूरत है, जिस पर लोग अपने जूते-चप्पल उतार सकें। मूर्तिकार को याद आया कि जंगल में एक पत्थर उसने बीच में ही छोड़ दिया था। वह उसे उठा लाया और मंदिर की सीढ़ियों के पास रख दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक रात, जब मंदिर के पट बंद हो गए, तो नीचे रखे उस पत्थर ने ऊपर विराजमान मूर्ति से पूछा- “यह कैसा अन्याय है? हम दोनों एक ही पहाड़ के टुकड़े थे, एक ही दिन यहां लाए गए, लेकिन आज लोग तुम्हारी पूजा कर रहे हैं, तुम्हें फूलों का हार पहना रहे हैं, और मुझ पर धूल-मिट्टी झाड़कर निकल जाते हैं। ऐसा क्यों?”</p>
<p style="text-align:justify;">मूर्ति ने बड़ी शालीनता से उत्तर दिया- “मित्र, याद करो वह दिन जब कलाकार ने पहली चोट तुम पर की थी। तुमने दर्द से बचने के लिए संघर्ष को ठुकरा दिया और उसी अवस्था में रहना चुना, जिसमें तुम थे। मैंने उस हर चोट को सहा, हर घाव को अपनी प्रगति माना और खुद को तराशने दिया। आज मैं इसलिए पूजा जा रहा हूं, क्योंकि मैंने ‘चोट’ सहने का साहस दिखाया और तुम इसलिए पैर रखने के काम आ रहे हो, क्योंकि तुमने आराम को विकास से ऊपर रखा।”</p>
<p style="text-align:justify;">कथा से सीख मिलती है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां और संघर्ष वास्तव में ईश्वर की ‘छेनी और हथौड़ी’ हैं, जो हमें एक बेहतर इंसान के रूप में तराश रही होती हैं। यदि हम आज के संघर्ष से भागेंगे, तो हम कल की ऊंचाई कभी नहीं छू पाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><span style="color:rgb(186,55,42);"><strong>-प्रमोद श्रीवास्तव</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/580925/bodhi-katha--stone-and-flute</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/580925/bodhi-katha--stone-and-flute</guid>
                <pubDate>Wed, 06 May 2026 09:00:45 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design3.jpg"                         length="136883"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>योग-साधना की चरम अवस्था है समाधि</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">साधना का सार है समाधि। सर्वस्व है, उपसंहार है। निष्कर्ष है। फल है। प्रतिफल है। परिणाम है। समाधि दो शब्दों से मिलकर बना है- सम और धी। सम यानि सम्यक या एक जैसा होना। धी यानी बुद्धि या प्रज्ञा। इस प्रकार समाधि का अर्थ हुआ बुद्धि का एक समान स्तर पर होना। समत्व की स्थिति में होना। समदर्शी होना। समदृष्टि होना। स्थिरबुद्धि होना। इसका एक अर्थ है समय आधि अर्थात समय के पार जाना। योग-साधना की चरम अवस्था है समाधि, लेकिन ध्यान रहे समाधि मंजिल नहीं है, यह केवल एक पड़ाव है। आध्यात्म की असली यात्रा इसके बाद ही शुरू</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580923/samadhi-is-the-ultimate-state-of-yoga-practice"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/untitled-design-(43)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">साधना का सार है समाधि। सर्वस्व है, उपसंहार है। निष्कर्ष है। फल है। प्रतिफल है। परिणाम है। समाधि दो शब्दों से मिलकर बना है- सम और धी। सम यानि सम्यक या एक जैसा होना। धी यानी बुद्धि या प्रज्ञा। इस प्रकार समाधि का अर्थ हुआ बुद्धि का एक समान स्तर पर होना। समत्व की स्थिति में होना। समदर्शी होना। समदृष्टि होना। स्थिरबुद्धि होना। इसका एक अर्थ है समय आधि अर्थात समय के पार जाना। योग-साधना की चरम अवस्था है समाधि, लेकिन ध्यान रहे समाधि मंजिल नहीं है, यह केवल एक पड़ाव है। आध्यात्म की असली यात्रा इसके बाद ही शुरू होती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">त्रिगुणात्मक प्रकृति के प्रभाव से परे</h5>
<p style="text-align:justify;">यदि कोई साधक समाधि की अवस्था को उपलब्ध है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि साधक सम अवस्था में है। वह सुख-दुख, हानि-लाभ, मान-अपमान आदि द्वंदों से मुक्त है, परे है। उस स्थिति में साधक का कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। साधक का ब्रह्म में अवस्थान हो जाता है। भगवान की सत्ता, चैतन्य और आनंद अपने आप साधक की वाणी, भाव और कार्य के द्वारा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगते हैं। समाधि की अवस्था में प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति आदि चित्तवृत्तियां मिट जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">समाधि की अवस्था को पा लेने पर साधक जीवमात्र को जीवन-मरण और संसारचक्र में घुमाने वाले महादुखदायक अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश आदि पंचक्लेशों से मुक्त हो जाता है, पर यह अवस्था पाना आसान नहीं है। कई पड़ाव पार करने होते हैं। एक लंबी अवधी की प्रक्रिया है। आत्मा के ऊपर से अविद्या, अज्ञान का आवरण हट जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस प्रकार बादलों के आवरण से मुक्त होते ही सूर्य का तेज प्रकट हो जाता है, वैसे ही अविद्या, अज्ञान का आवरण हटते ही, मिटते ही आत्मा अपने यर्थास्वरूप को पहचानकर परमात्मा में स्थित हो जाती है। साधक सत, रज, तम आदि त्रिगुणात्मक प्रकृति के प्रभाव से परे हो जाता है। वह शब्द, रूप, रस, गंध आदि तन्मात्राओं के प्रभाव से भी परे हो जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">समाधि के चरण</h5>
<p style="text-align:justify;">समाधि के दो चरण या स्तर बताये गए हैं- संप्रज्ञता व असंप्रज्ञता। संप्रज्ञता समाधि के 4 प्रकार हैं- पहला है सवितर्क समाधि। यह समाधि का वह रूप है जिसमें स्थूल विषय पर ध्यान लगाया जाता है। उदाहरणस्वरूप मूर्ति पर ध्यान जमाने को सवितर्क समाधि कहा जाता है। दूसरी है सविचार समाधि। यह समाधि का वह रूप है, जिसमें सूक्ष्म विषय पर ध्यान लगाया जाता है। इस समाधि में कभी-कभी तन्मात्रा भी ध्यान का विषय होती है। तीसरी है सानंद समाधि। इस समाधि में ध्यान का विषय इंद्रियां रहती हैं। हमारी इंद्रियां 11 हैं- 5 ज्ञानेन्द्रियां, 5 कर्मेन्द्रियां और मन। इन्हीं पर ध्यान लगाया जाता है। चौथी है सस्मित समाधि। इस अवस्था में ध्यान का विषय अहंकार है। अहंकार को अस्मिता कहा जाता है। कुछ विद्वानों का कहना है कि संप्रज्ञता समाधि वैराग्य से धुले हुए निर्मल चित्त की परिणिती है। इस समाधि में चित्त शुद्ध तो होता है, पर चित्त में कर्मों के संस्कारों के बीज अभी भी शेष रहते हैं। इसलिए इसे सबीज समाधि भी कहते हैं। इसलिए इस सबीज को निर्बीज करने के लिये समाधि के अगले चरण में प्रवेश करना होता है, जिसे असंप्रज्ञता या निर्बीज समाधि कहते हैं। असंप्रज्ञता समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति हो जाती है। मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किए रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार समाधि का पहला चरण अर्थात संप्रज्ञता समाधि- शुचिता का है। समाधि का दूसरा चरण अर्थात असंप्रज्ञता समाधि- विलीनता का है। समाधि के प्रथम चरण अर्थात संप्रज्ञता समाधि में साधक के मन की सारी अशुद्धि तिरोहित हो जाती है। सभी विकार व बुराइयां मिट जाती हैं। पर चित्त में कर्म संस्कारों के बीज बने रहते हैं। समाधि के दूसरे चरण अर्थात असंप्रज्ञता समाधि में कर्म संस्कारों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं और चित्तवृत्तियों का पूर्णतः निरोध हो जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">असंप्रज्ञता समाधि की अवस्था में बुराई भी गिर जात है और अच्छाई भी। यहां तक कि अच्छाई या शुद्ध अवस्था को धारण करने वाला मन भी समाप्त हो जाता है। यह अ-मन की अवस्था है। मन की यह समाप्ति प्रकारांतर से देहबोध की समाप्ति है। इस अवस्था में दे हके पृथक होने का एहसास होता है। इस अवस्था में आत्मा अपने यथार्थस्वरूप को पहचान लेती है। और आत्मा का संपर्क विभिन्न विषयों से छूट जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है। नियत समय, नियम स्थान, नियमित साधना व सात्विक आहार-विहार व संयम का पालन करते हुये कोई भी साधक इस परम आनंद, परम सुख की अवस्था को पा सकता है। बशर्ते उसे पूर्णगुरू का सानिध्य मिले तब। अन्यथा भटकाव निश्चित है।<strong>-आचार्य प्रदीप द्विवेदी, आध्यात्मिक लेखक</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><br /> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/580923/samadhi-is-the-ultimate-state-of-yoga-practice</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/580923/samadhi-is-the-ultimate-state-of-yoga-practice</guid>
                <pubDate>Tue, 05 May 2026 10:38:11 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-05/untitled-design-%2843%291.jpg"                         length="79065"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बोध कथा :  खाली कटोरे का सच</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक छोटे से गांव में हरिदास नाम का एक वृद्ध संत रहता था। लोग दूर-दूर से उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आते और संत उन्हें सरल शब्दों में जीवन का मार्ग दिखाते। एक दिन एक धनवान व्यापारी उसके पास आया। वह बहुत चिंतित और असंतुष्ट दिख रहा था। व्यापारी बोला, “गुरुदेव, मेरे पास धन-दौलत, बड़ा घर, परिवार सब कुछ है, फिर भी मन में शांति नहीं है। मुझे हर समय किसी न किसी बात की चिंता रहती है। कृपया मुझे कोई उपाय बताइए।” </p>
<p style="text-align:justify;">संत हरिदास मुस्कुराए और बोले, “पहले तुम मेरे लिए एक काम करो। सामने रखे इस कटोरे में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580174/bodhi-katha--the-truth-of-an-empty-bowl"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(4)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक छोटे से गांव में हरिदास नाम का एक वृद्ध संत रहता था। लोग दूर-दूर से उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आते और संत उन्हें सरल शब्दों में जीवन का मार्ग दिखाते। एक दिन एक धनवान व्यापारी उसके पास आया। वह बहुत चिंतित और असंतुष्ट दिख रहा था। व्यापारी बोला, “गुरुदेव, मेरे पास धन-दौलत, बड़ा घर, परिवार सब कुछ है, फिर भी मन में शांति नहीं है। मुझे हर समय किसी न किसी बात की चिंता रहती है। कृपया मुझे कोई उपाय बताइए।” </p>
<p style="text-align:justify;">संत हरिदास मुस्कुराए और बोले, “पहले तुम मेरे लिए एक काम करो। सामने रखे इस कटोरे में पानी भरकर ले आओ।” व्यापारी ने कटोरा उठाया और पास के कुएं से पानी भरकर ले आया। संत ने कटोरे को देखा और बोले, “अब इसमें थोड़ा और पानी भरो।” व्यापारी ने कहा, “गुरुदेव, यह कटोरा तो पहले ही पूरा भर चुका है, अब इसमें और पानी नहीं आ सकता।” संत ने शांत स्वर में कहा, “यही तुम्हारे मन की स्थिति है। तुमने अपने मन को इच्छाओं, चिंताओं और लालच से इतना भर लिया है कि उसमें शांति के लिए कोई जगह ही नहीं बची।”</p>
<p style="text-align:justify;">व्यापारी चुप हो गया। संत ने आगे कहा, “जब तक तुम अपने मन के इस कटोरे को खाली नहीं करोगे, तब तक उसमें सुकून नहीं भर सकता। तुम्हें अपनी अनावश्यक इच्छाओं को त्यागना होगा और जो है, उसमें संतोष करना सीखना होगा।” व्यापारी ने विनम्रता से पूछा, “गुरुदेव, यह कैसे संभव है?” संत ने उत्तर दिया, “हर दिन कुछ समय अपने लिए निकालो। </p>
<p style="text-align:justify;">अपनी उपलब्धियों के लिए आभार प्रकट करो और उन चीजों को छोड़ना सीखो, जो तुम्हें भीतर से बोझिल बनाती हैं। धीरे-धीरे तुम्हारा मन हल्का होने लगेगा और शांति अपने आप उसमें स्थान बना लेगी।” व्यापारी ने संत के चरणों में झुककर प्रणाम किया। उस दिन के बाद उसने अपने जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करने शुरू किए। समय के साथ उसकी चिंताएँ कम होने लगीं और वह पहले से अधिक संतुष्ट और शांत रहने लगा। सीख- जब तक मन इच्छाओं और चिंताओं से भरा रहेगा, तब तक उसमें शांति के लिए स्थान नहीं बन सकता। संतोष ही सच्चे सुख का आधार है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/580174/bodhi-katha--the-truth-of-an-empty-bowl</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/580174/bodhi-katha--the-truth-of-an-empty-bowl</guid>
                <pubDate>Sat, 02 May 2026 10:00:26 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-%284%298.jpg"                         length="180326"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> पौराणिक कथा: जहां भाव, वहां भगवान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बहुत समय पहले वृंदावन में एक कृष्णदास नाम के बाबा रहते थे। एक बार उन्होंने किसी ग्रंथ में पढ़ा कि यदि कोई सेवा बिना नागा किए लगातार बारह वर्ष तक की जाए, तो साधक को मनचाहा फल अवश्य मिलता है। बाबा ने निश्चय किया- वे बारह वर्ष तक प्रतिदिन ठाकुर जी को माला पहनाएंगे, और फलस्वरूप बस यही चाहेंगे कि तेरहवें वर्ष के पहले दिन स्वयं ठाकुर जी उनकी कुटिया पर आकर उनसे माला ग्रहण करें<strong>।-प्रमोद श्रीवास्तव</strong></p>
<p style="text-align:justify;">उस दिन से बाबा की सेवा आरंभ हो गई। वे प्रतिदिन मंदिर जाते, प्रेम से माला पहनाते और मुस्कुराकर कहते—“लाला, अब इतने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/580172/mythology--where-there-is-devotion--there-is-god"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/untitled-design-(3)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बहुत समय पहले वृंदावन में एक कृष्णदास नाम के बाबा रहते थे। एक बार उन्होंने किसी ग्रंथ में पढ़ा कि यदि कोई सेवा बिना नागा किए लगातार बारह वर्ष तक की जाए, तो साधक को मनचाहा फल अवश्य मिलता है। बाबा ने निश्चय किया- वे बारह वर्ष तक प्रतिदिन ठाकुर जी को माला पहनाएंगे, और फलस्वरूप बस यही चाहेंगे कि तेरहवें वर्ष के पहले दिन स्वयं ठाकुर जी उनकी कुटिया पर आकर उनसे माला ग्रहण करें<strong>।-प्रमोद श्रीवास्तव</strong></p>
<p style="text-align:justify;">उस दिन से बाबा की सेवा आरंभ हो गई। वे प्रतिदिन मंदिर जाते, प्रेम से माला पहनाते और मुस्कुराकर कहते—“लाला, अब इतने दिन हो गए, बस इतने दिन और।” समय बीतता गया और देखते-देखते बारह वर्ष पूर्ण होने को आए। अंतिम दिन बाबा ने बड़े विश्वास से कहा—“मेरी सेवा पूर्ण हुई, अब कल आपको मेरी  कुटिया पर आना ही होगा। मैं छप्पन भोग सजाकर प्रतीक्षा करूंगा।”</p>
<p style="text-align:justify;">अगले दिन बाबा भोर में उठे, स्नान किया, कुटिया सजाई और छप्पन भोग तैयार कर दिए। फिर वे पूरे दिन ठाकुर जी की राह देखते रहे। समय बीतता गया- दोपहर, संध्या, फिर रात्रि… यहां तक कि मंदिर में शयन आरती भी हो गई, पर ठाकुर जी नहीं आए। अब बाबा का हृदय टूट गया। वे क्रोध और वेदना में भर उठे</p>
<p style="text-align:justify;">—“मेरी ही भूल थी, मैं किसी और की आराधना करता तो अच्छा होता!” क्रोध में उन्होंने कुटिया उजाड़ दी, उपवन नष्ट कर दिया और छप्पन भोग की पोटली बांधकर चल पड़े।</p>
<p style="text-align:justify;">चलते-चलते उन्होंने सोचा-“बारह वर्ष कृष्ण को दिए, अब बारह दिन श्रीजी को देकर देखता हूं।” और वे बरसाना की ओर बढ़ चले। मार्ग में अचानक गायों का विशाल झुंड आ गया। बाबा किनारे खड़े हो गए। समय बीतता गया, पर गायों का अंत न हुआ। तभी एक नन्हा ग्वाला दिखाई दिया। बाबा ने पूछा- “ये किसकी गायें हैं?” ग्वाले ने हंसकर कहा- “नंद भवन की हैं, पूरी नौ लाख। अभी देर लगेगी, आप बैठ जाइए।”</p>
<p style="text-align:justify;">बाबा थके और भूखे थे। ग्वाले ने उनकी पोटली से आती सुगंध पाकर कहा- “मुझे भी थोड़ा खाने को दे दो।” बाबा ने पोटली खोली। ग्वाले ने कहा- “मेरे हाथ गंदे हैं, आप अपने हाथ से खिला दीजिए।” जैसे ही बाबा ने पहला कौर उसके मुख में रखा, उसकी आंखें भर आईं। बाबा ने पूछा—“क्या हुआ?” ग्वाला बोला—“आज सुबह से प्रतीक्षा कर रहा था, किसी ने मुझे माला नहीं पहनाई।” इतना सुनते ही बाबा चौंक उठे- “अरे, कन्हैया तू!” और वे उसे गले से लगा बैठे।</p>
<p style="text-align:justify;">ठाकुर जी ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया। बाबा भाव-विभोर हुए, पर अगले ही क्षण बोले-“अब समझा, आज तू क्यों आया है। जब तेरी ओर से हटकर मैंने श्रीजी की ओर कदम बढ़ाया, तब तू दौड़ा चला आया। जब एक कदम पर तू मिल गया, तो यदि मैं उनके चरणों में ही समर्पित हो जाऊं, तो क्या होगा!” यह कहकर बाबा बरसाना की ओर दौड़ पड़े। ठाकुर जी उन्हें रोकने के लिए पीछे-पीछे भागे। अंततः बाबा ने शेष जीवन श्रीजी के चरणों में समर्पित कर दिया और कृष्णदास से किशोरीदास बन गए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/580172/mythology--where-there-is-devotion--there-is-god</link>
                <guid>https://www.amritvichar.com/article/580172/mythology--where-there-is-devotion--there-is-god</guid>
                <pubDate>Fri, 01 May 2026 10:00:41 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/untitled-design-%283%298.jpg"                         length="191017"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        