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                <title>अंतस - Amrit Vichar</title>
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                            <item>
                <title>  पौराणिक कथा :  धर्म और मर्यादा का मार्ग</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विवाह के पश्चात भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी द्वारका में सुखपूर्वक निवास कर रहे थे। एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि परम प्रतापी एवं शीघ्र क्रोधित होने वाले ऋ षि दुर्वासा द्वारका के समीप पधारे हैं। भारतीय परंपरा में संतों और ऋ षियों का आशीर्वाद नवविवाहित दंपति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसलिए श्री कृष्ण और रुक्मिणी जी स्वयं ऋ षि दुर्वासा के आश्रम पहुंचे और उन्हें आदरपूर्वक अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">ऋ षि दुर्वासा ने निमंत्रण स्वीकार किया, लेकिन एक कठिन शर्त रखी। उन्होंने कहा कि उनके रथ को कोई घोड़ा, हाथी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591833/mythological-tale-path-righteousness-propriety"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/mythological-tale1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विवाह के पश्चात भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी द्वारका में सुखपूर्वक निवास कर रहे थे। एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि परम प्रतापी एवं शीघ्र क्रोधित होने वाले ऋ षि दुर्वासा द्वारका के समीप पधारे हैं। भारतीय परंपरा में संतों और ऋ षियों का आशीर्वाद नवविवाहित दंपति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसलिए श्री कृष्ण और रुक्मिणी जी स्वयं ऋ षि दुर्वासा के आश्रम पहुंचे और उन्हें आदरपूर्वक अपने महल में भोजन के लिए आमंत्रित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">ऋ षि दुर्वासा ने निमंत्रण स्वीकार किया, लेकिन एक कठिन शर्त रखी। उन्होंने कहा कि उनके रथ को कोई घोड़ा, हाथी या बैल नहीं खींचेगा, बल्कि स्वयं श्री कृष्ण और रुक्मिणी ही उनके रथ को खींचकर द्वारका ले जाएंगे। भगवान श्री कृष्ण अंतर्यामी थे। वे ऋ षि की परीक्षा और स्वभाव को समझते हुए मुस्कुराए और उनकी शर्त स्वीकार कर ली। रथ पर ऋ षि दुर्वासा विराजमान हुए और श्री कृष्ण तथा माता रुक्मिणी रथ खींचते हुए द्वारका की ओर चल पड़े।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ मास की प्रचंड गर्मी थी। तपती धरती और कठिन मार्ग के कारण रुक्मिणी जी अत्यंत थक गईं। प्यास के कारण उनका गला सूखने लगा और वे व्याकुल हो उठीं। माता रुक्मिणी की स्थिति देखकर श्री कृष्ण ने अपने चरण के अंगूठे से धरती को स्पर्श किया, वहां से पवित्र जल की धारा प्रकट हुई। श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी को जल पीने का संकेत किया और उन्होंने अपनी प्यास बुझाई, लेकिन इसी दौरान उनसे एक भूल हो गई। उन्होंने पहले ऋ षि दुर्वासा को जल अर्पित नहीं किया और स्वयं जल पी लिया। ऋ षि ने इसे अपना अनादर समझा और क्रोधित होकर रुक्मिणी जी को श्राप दे दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">ऋ षि दुर्वासा के श्राप के कारण रुक्मिणी जी को कुछ समय के लिए श्रीकृष्ण से वियोग सहना पड़ा और द्वारका की भूमि के जल के संबंध में भी श्राप दिया गया। रुक्मिणी जी ने इस परिस्थिति को स्वीकार करते हुए भगवान विष्णु की तपस्या की। श्राप की अवधि पूर्ण होने के बाद उनका पुनः श्री कृष्ण से मिलन हुआ। इसी लोककथा को द्वारका स्थित रुक्मिणी देवी मंदिर की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। द्वारकाधीश मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित रुक्मिणी देवी का मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह कथा हमें बताती है कि धर्म और मर्यादा के मार्ग पर छोटी-सी भूल भी महत्वपूर्ण संदेश दे सकती है और सच्ची भक्ति, धैर्य तथा तपस्या अंततः व्यक्ति को अपने लक्ष्य तक पहुंचाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 12:00:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title> भद्रा नहीं बनेगी बाधा,  जानें राखी बांधने का सही समय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन सनातन परंपरा का वह पर्व है, जो भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर मनाए जाने वाले इस त्योहार में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। वहीं भाई बहनों की रक्षा और हर परिस्थिति में उनका साथ देने का संकल्प लेते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस बार त्योहार इसलिए भी खास है, क्योंकि इसी दिन वर्ष का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण लगने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591836/bhadra-obstacle-right-time-rakhi"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/bhadra-won&#039;t-be-an-obstacle.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन सनातन परंपरा का वह पर्व है, जो भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर मनाए जाने वाले इस त्योहार में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। वहीं भाई बहनों की रक्षा और हर परिस्थिति में उनका साथ देने का संकल्प लेते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस बार त्योहार इसलिए भी खास है, क्योंकि इसी दिन वर्ष का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण लगने वाला है। हालांकि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। ऐसे में भारत में इसका धार्मिक प्रभाव नहीं माना जाएगा और सूतक काल भी मान्य नहीं होगा। इसलिए चंद्र ग्रहण को लेकर रक्षाबंधन के पर्व में किसी तरह की बाधा नहीं आएगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कब से कब तक रहेगी पूर्णिमा तिथि?</h3>
<p style="text-align:justify;">द्रिक पंचांग के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजकर 08 मिनट से शुरू होगी और 28 अगस्त को सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि को महत्व दिए जाने के कारण रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाना श्रेष्ठ माना गया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">राखी बांधने का शुभ मुहूर्त</h3>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने के लिए सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक का समय उत्तम माना गया है। इस दौरान बहनें विधि-विधान से भाई की आरती उतारकर उसके माथे पर तिलक लगा सकती हैं और फिर दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भद्रा का नहीं रहेगा प्रभाव</h3>
<p style="text-align:justify;">रक्षाबंधन पर भद्रा काल को लेकर भी विशेष सावधानी बरती जाती है। धार्मिक मान्यताओं में भद्रा को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना गया है। इस वर्ष रक्षाबंधन के दिन भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए दिन में राखी बांधने के समय भद्रा का कोई प्रभाव नहीं रहेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">राखी बांधते समय बोलें यह मंत्र</h3>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में रक्षा सूत्र बांधते समय एक विशेष मंत्र के उच्चारण का विधान बताया गया है। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए कह सकती है-</p>
<h4 style="text-align:justify;">“येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।<br />तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे मा चल मा चलः॥”</h4>
<p style="text-align:justify;">मान्यता है कि इस मंत्र के साथ बांधा गया रक्षा सूत्र भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प को मजबूत करता है। इस तरह रक्षाबंधन केवल राखी बांधने का पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों में स्नेह, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने की भावना को मजबूत करने वाला उत्सव है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 07:00:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पटना देवकली : जहां शुक्राचार्य ने की थी 8 शिवलिंग की स्थापना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बात जरा चौकाने वाली है, लेकिन किंवदंतियों में सच है। शाहजहांपुर की कलान तहसील क्षेत्र के गांव पटना देवकली में दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने 8 हजार साल तक भगवान शिव के लिए तपस्या की थी। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने कलान के पटना देवकली में आठ शिवलिंग की स्थापना की थी। यहां पूजा के लिए लंकापति रावण भी आया था। हजारों साल पुराने पटना देवकली मंदिर में स्थापित आठ शिवलिंग की पूजा के लिए यूपी ही नहीं, दूसरे प्रदेशों से भी श्रद्धालुगण कांवड़ लेकर आते हैं। इस मंदिर में मानी गईं मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु हैंडंपप लगवाते हैं। यह मंदिर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591831/patna-devkali-shukracharya-installed-8-shivlings"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/_shukracharya-installed-8-shivlings.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बात जरा चौकाने वाली है, लेकिन किंवदंतियों में सच है। शाहजहांपुर की कलान तहसील क्षेत्र के गांव पटना देवकली में दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने 8 हजार साल तक भगवान शिव के लिए तपस्या की थी। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने कलान के पटना देवकली में आठ शिवलिंग की स्थापना की थी। यहां पूजा के लिए लंकापति रावण भी आया था। हजारों साल पुराने पटना देवकली मंदिर में स्थापित आठ शिवलिंग की पूजा के लिए यूपी ही नहीं, दूसरे प्रदेशों से भी श्रद्धालुगण कांवड़ लेकर आते हैं। इस मंदिर में मानी गईं मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु हैंडंपप लगवाते हैं। यह मंदिर करीब बीस सालों तक डकैतों की शरणस्थली भी रहा। पुलिस भी यहां आने से कतराती थी। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-08/_shukracharya-8-shivlings.jpg" alt="_Shukracharya 8 Shivlings" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">सावन और महाशिवरात्रि पर पटना देवकली मंदिर पर मेला लगता है। इस प्राचीन शिवमंदिर पर भी आस्था का सैलाब देखने को मिलता है। किवदंती है कि यहां आकर गुरु वृहस्पति के पुत्र कक्ष ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या भी सीखी थी। शाहजहांपुर जिले की कलान तहसील के गांव पटना देवकली में प्राचीन शिवमंदिर की महत्ता दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। मंदिर के महंत ने बताया कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य की तपोभूमि पटना देवकली शिव मंदिर पर साल भर में दो बार मेला लगता है। फाल्गुन माह के महाशिवरात्रि पर तथा सावन में पूरे माह मेला लगता है। </p>
<p style="text-align:justify;">मेले में लाखों की संख्या में दूर-दूर से भक्त आते हैं। महंत ने बताया कि गुरु शुक्राचार्य ने अपने हाथों से आठ अंश के शिवलिंग की स्थापना की थी। कानपुर-मुरादाबाद हाईवे से लगे हुए ऊंचे टीले पर स्थिति इस मंदिर में शुक्राचार्य ने आठ हजार वर्ष तक तपस्या की थी। शिव के उपासक लंकापति रावण ने यहां आकर कई बार पूजा-अर्चना की है। गुरु वृहस्पति के पुत्र कक्ष ने इसी शिव मंदिर पर आकर गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या सीखी थी। प्राचीन शिव मंदिर होने के कारण यहां लाखों की संख्या में भक्त आकर अपनी मनौती मांगते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष भर में दो बार लगने वाले विशाल मेले में डहरपुर, बदायूं, बरेली, मुरादाबाद, एटा, फर्रूखाबाद, दिल्ली, पंजाब आदि स्थानों से शिव भक्त आते हैं। मंदिर की फील्ड में सैंकड़ों की संख्या में भक्तों ने मनौती पूर्ण होने पर हैंडपंप लगवाए हैं। मनौती पूरी होने पर यहां बड़े-बड़े घंटे भी श्रद्धालु टंगवाते हैं। शाहजहांपुर के कल्लू-नज्जू, रानी ठाकुर, लाल जैसे डकैतों के टंगवाए गए घंटे भी यहां आज भी लटक रहे हैं। पूर्व में दिल्ली के उद्योगपति विमल कुमार शर्मा ने मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए लाखों रुपये खर्च किए थे। साथ ही एक भक्तों के ठहरने के लिए दो मंजिला धर्मशाला का निर्माण कराया है। </p>
<h3 style="text-align:justify;">भर गई सब की झोलियां कोई खाली न गया</h3>
<p style="text-align:justify;">पटना देवकली मंदिर आने श्रद्धालु अपनी मनौतियां भोलेनाथ से मांगते हैं। मनौतियां पूरी होने पर हैंडपंप लगवाने की बात कहते। फिर हैंडपंप मेला परिसर में लगवाते हैं। पटना देवकली में हजारों की संख्या में नल लगे हुए हैं। मंदिर के पड़ोस में एक प्राचीन झील थी, लेकिन उस झील पर लोगों की नजर लग गई है, जिस पर कब्जा कर है, जिससे झील पर अस्तित्व खो रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">प्रदीप सिंह</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 11:00:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ज्ञान एवं नैतिक मूल्यों की स्रोत संस्कृत </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">णिनि व्याकरण के अनुसार सम् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु में क्त प्रत्यय के योग से संस्कृत शब्द की सिद्धि होती है अर्थात् ऐसा शब्द या ऐसी भाषा जो दोष रहित, संस्कारित, परिमार्जित, परिनिष्ठित, सुव्यवस्थित तथा वैज्ञानिक हो। संस्कृत भाषा दैवी वाक् होने से देवभाषा के नाम से भी लोकप्रसिद्ध है। इसका व्याकरण तर्कपूर्ण, व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक होने से, लोक कल्याण कारक सत्साहित्य एवं गूढ़ दर्शन शास्त्रों के होने से यह विश्व की सभी भाषाओं में श्रेष्ठ स्थान पर विराजित है और भारोपीय भाषा परिवार की भाषाओं में संस्कृत का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591828/sanskrit-source-knowledge-moral-values"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/sanskrit-a-source-of-knowledge-and-moral-values.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">णिनि व्याकरण के अनुसार सम् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु में क्त प्रत्यय के योग से संस्कृत शब्द की सिद्धि होती है अर्थात् ऐसा शब्द या ऐसी भाषा जो दोष रहित, संस्कारित, परिमार्जित, परिनिष्ठित, सुव्यवस्थित तथा वैज्ञानिक हो। संस्कृत भाषा दैवी वाक् होने से देवभाषा के नाम से भी लोकप्रसिद्ध है। इसका व्याकरण तर्कपूर्ण, व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक होने से, लोक कल्याण कारक सत्साहित्य एवं गूढ़ दर्शन शास्त्रों के होने से यह विश्व की सभी भाषाओं में श्रेष्ठ स्थान पर विराजित है और भारोपीय भाषा परिवार की भाषाओं में संस्कृत का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत श्रावणी पूर्णिमा, रक्षाबंधन पर्व के दिन से नव शैक्षिक सत्र एवं वेदाध्ययन प्रारंभ होता था। इसी कारण इस दिन को सन् 1969 से तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में संपूर्ण भारत में संस्कृत दिवस मनाए जाने का आदेश किया गया, जो आज विश्व संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा है। 15 अक्टूबर 1970 में ही इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही संस्कृत सहित राजभाषा हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार निमित्त भारत में स्थापित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम् वर्तमान में बहुपरिसरीय केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ ही संस्कृत भारती संगठन के प्रसार-प्रचार से यह दिवस भारत सहित जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, लंदन सहित कई पाश्चात्य देशों में भी आयोजित हो रहा है। इसी दौरान संस्कृत सप्ताह भी आयोजित होता, जिसमें संस्कृत परक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगितायें आयोजित होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान की राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय तथा वैश्विक समस्याओं के निदान में संस्कृत भाषा एवं इसका साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान-नैतिक परंपरा को समझने, कर्तव्यबोध को बढ़ाने, भौतिक-खगोलशास्त्र,  उच्च प्रबंधन एवं मानव शरीर विज्ञानाच्छादित योग को सीखने समझने में वेदोपनिषद् -ब्राह्मण- आरण्यण, चरक-सुश्रुत रचित आयुर्वेद ग्रंथ, गीत-संगीत-नृत्य-नाकट विधा, चाणक्य एवं भर्तृहरि जैसे नीतिज्ञों की नीति, जीवन मार्गदर्शक श्रीमद्भगवद्गीता सहित भारतीय षड्दर्शनों की मूल आधार भूत संस्कृत भाषा ही है। संस्कृत भाषा ज्ञान के बिना मूलतः उक्त को समझाना संभव नहीं है। विश्व प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण, महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत-पुराणादि अमर कृतियों की भाषा भी संस्कृत ही रही है। </p>
<p style="text-align:justify;">सर्वे भवंतु सुखिन:, वसुधैव कुटुंबकम्, स्वस्तिपन्थामनुचरेम, मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:, न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते, श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्,  माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:, समानो मन्त्र: समिति: समानी,सह नाववतु सह नौ भुनक्तु, मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, स्वाध्यायान्मा प्रमद:, असतो मा सद्गमय, दशपुत्रसमो द्रुम:, शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्, आचार: परमो धर्म:, सा विद्या या विमुक्तये आदि अगणित लोक मांगलिक- नैतिक-चारित्रिक और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विभिन्न समसामयिक समस्याओं के निदान एवं उच्च आदर्श- उदात्त भावना से युक्त शिक्षा संस्कृतभाषा में लिखे विविधात्मक सत्साहित्य दर्शनों में प्रतिपग पर प्राप्त होती है और सर्वोत्कृष्ट व्यवस्थित पाणिनि व्याकरण होने से नासा के वैज्ञानिकों ने संस्कृत भाषा को कम्प्यूटर की सर्वोत्तम भाषा के रूप में स्वीकार किया है यह सर्वविदित है।</p>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत भाषा में निहित सर्वविध ज्ञान-विज्ञान को विद्यालयीय- महाविद्यालयीय- विश्वविद्यालयीय पाठ्य-पुस्तकों से बाहर लाकर केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के द्वारा लोककल्याण के निमित्त अपनी नीति, कार्यक्रमों एवं आचरणों से समाज में लाने के लिए नितांत प्रयास किए जाने आवश्यकीय हैं। विशेष रूप से भारत में प्रतिदिन निजस्वार्थपूर्ति, स्वकर्तव्य विमुखता, भ्रष्टाचार, अपराध, पर्यावरण क्षरण, तापमान वृद्धि, राजनैतिक तुष्टिकरण, धार्मिक उन्माद- कट्टरवाद, जातिगत विभेद, आर्थिक असमानतायें आदि नि:संदेह बढ़ रहे हैं, जबकि देश में उपाधिधारक शिक्षितों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ने में ही है। यह संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य विचारणीय विषय होना चाहिए कि देश में साक्षरता बढ़ने पर  सामाजिक समस्याएं बढ़ने का क्या कारण हैं?<br /> <br />वस्तुत: पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के प्रभाव से भारत में केवल आजीविका प्राप्ति की शिक्षा देने के लिए ही वर्तमान में प्रयास किए जाते रहे हैं जिस कारण देश में घटित हो रही पारिवारिक-सामाजिक- राष्ट्रीय समस्याओं को अनुभव किया जा सकता है। नई शिक्षा नीति- 2023 के द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के द्वारा देश में संस्कृत - संस्कृति, प्राचीन ज्ञान परंपरा, विरासत, नैतिक-चारित्रिक शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने की अनुशंसा एवं नियम किए गए हैं, जो स्वागत योग्य कदम हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज समसामयिक समस्याओं के निवारण के लिए आत्मिक रूप से संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में इस भाषा के व्यापक महत्व को सभी को समझते हुए आत्मसात् करने की आवश्यकता है। विकसित भारत बनाने में संस्कृत एक महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है तथा सरकारी सहित निजी शैक्षिक संस्थाओं में इस भाषा के सत्साहित्य को पढ़ने के लिए व्यवस्थाएं बनाना वर्तमान की आवश्यकता अनुभूत होती है, जिसमें केवल आजीविका प्राप्ति उद्देश्य न होकर समग्र व्यक्तित्व निर्माण उद्देश्य होना चाहिए, जिसमें शिक्षा प्रदाता भी उच्च नैतिक मूल्यों से युक्त होकर ‘इदं राष्ट्राय इदं न मम’ की भावना से भावी पीढ़ी का चरित्र निर्माण कर सकें इसी में लोकमंगल है इसी से विश्व कल्याण संभव है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>--डॉ. हेमन्त कुमार जोशी,  शिक्षक, नैनीताल</strong></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 16:52:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>व्रत-त्योहार : सावन में मंगला गौरी व्रत का महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सावन मास में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की आराधना का भी विशेष महत्व है। देवी गौरी को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक मंगलवार मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। इस सावन यह व्रत 4, 11, 18 और 25 अगस्त को पड़े रहा है। विशेष बात यह है कि 11 अगस्त को मासिक शिवरात्रि और 25 अगस्त को भौम प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है, जिससे शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष फल प्राप्त होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कंद पुराण के अनुसार मंगला गौरी व्रत से सौभाग्य, सुख-समृद्धि, दांपत्य जीवन में मधुरता तथा विवाह संबंधी बाधाओं और मंगल दोष से मुक्ति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589766/fasts-and-festivals--significance-of-the-mangala-gauri-vrat-in-the-month-of-sawan"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/fasts-and-festivals.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सावन मास में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की आराधना का भी विशेष महत्व है। देवी गौरी को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक मंगलवार मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। इस सावन यह व्रत 4, 11, 18 और 25 अगस्त को पड़े रहा है। विशेष बात यह है कि 11 अगस्त को मासिक शिवरात्रि और 25 अगस्त को भौम प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है, जिससे शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा का विशेष फल प्राप्त होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कंद पुराण के अनुसार मंगला गौरी व्रत से सौभाग्य, सुख-समृद्धि, दांपत्य जीवन में मधुरता तथा विवाह संबंधी बाधाओं और मंगल दोष से मुक्ति की मान्यता है। व्रत के दिन प्रातः स्नान कर संकल्प लें, माता मंगला गौरी की प्रतिमा स्थापित कर दीप, धूप, चंदन, पुष्प और नैवेद्य से पूजा करें। परंपरा के अनुसार 16 प्रकार की पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। अंत में व्रत कथा का श्रवण कर एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 07:25:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>मनोकामना मंदिर:  जहां बारहों मास उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिंदू मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ और सावन माह तीर्थाटन अथवा देवी देवताओं के दर्शन और मनौतियों का होता है। ऐसे में देखा जा रहा है कि इस समय श्रद्धालु देवी-देवताओं के दर्शन हेतु बड़ी संख्या में निकले हुए हैं। श्रद्धालुओं का कोई जत्था भारत में स्थित शक्ति पीठों के दर्शनार्थ निकला हुआ है, तो कोई अपने पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में स्थित देवी-देवताओं के दर्शनार्थ चल पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल को हिमालयी राष्ट्र भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में दुनियाभर में जितने भी देव स्थल है, उसमें नेपाल का भी जिक्र प्रमुखता से आता है। नेपाल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591149/manokamna-mandir-crowds-devotees-flock-round"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/manokamna-temple.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदू मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ और सावन माह तीर्थाटन अथवा देवी देवताओं के दर्शन और मनौतियों का होता है। ऐसे में देखा जा रहा है कि इस समय श्रद्धालु देवी-देवताओं के दर्शन हेतु बड़ी संख्या में निकले हुए हैं। श्रद्धालुओं का कोई जत्था भारत में स्थित शक्ति पीठों के दर्शनार्थ निकला हुआ है, तो कोई अपने पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में स्थित देवी-देवताओं के दर्शनार्थ चल पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल को हिमालयी राष्ट्र भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में दुनियाभर में जितने भी देव स्थल है, उसमें नेपाल का भी जिक्र प्रमुखता से आता है। नेपाल में हिंदुओं की आस्था के प्रमुख धर्मस्थलों में काठमांडू स्थित बाबा पशुपतिनाथ का प्रमुख स्थान है। उसके बाद सुदूर पहाड़ों पर वास करने वाले प्रभु नाथ, मुक्ति नाथ, सूपा देवराली और मनोकामना देवी मंदिर का नाम आता है। इन सभी देवी-देवताओं की अपनी अपनी महत्ता और महात्म्य है। इन दिनों नेपाल के इन सभी देव स्थलों के दर्शनार्थ भारतीय श्रद्धालुओं का जत्था निकला हुआ है। काठमांडू के बाबा पशुपतिनाथ को छोड़ लगभग सभी देवस्थल तक पहुंचना आसान नहीं है, फिर भी श्रद्धा और भक्ति भाव से लबरेज श्रद्धालु सुदूर पहाड़ों पर स्थित देवी-देवताओं तक पहुंच ही जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">नेपाल के सुदूरवर्ती पहाड़ पर स्थित देवी स्थानों में एक मनोकामना देवी का मंदिर भी है। नेपाल के गोरखा जिले में स्थित एक हजार तीन सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित मनोकामना मंदिर देवी भगवती यानी पार्वती के अवतार को समर्पित एक विख्यात और पवित्र हिन्दू शक्ति पीठ है। मनोकामना का शाब्दिक अर्थ है मन की इच्छा पूरी करने वाली! जाहिर है श्रद्धालु जब नेपाल के देव स्थलों के दर्शनार्थ जाते हैं, तो मनोकामना मंदिर का दर्शन उनकी प्राथमिकताओं में होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रहस्यमयी कथाओं से भरा है मंदिर का इतिहास </h3>
<p style="text-align:justify;">जनश्रुति के अनुसार इस मंदिर की स्थापना 17 वीं शताब्दी यानी 1678 ईसवी में गोरखा के राजा राम शाह के शासन काल में हुआ है। पौराणिक कथाओं और स्थानीय निवासियों के अनुसार राजा राम शाह की पत्नी अलौकिक दिव्य शक्तियों की रानी थीं। इसकी जानकारी केवल उनके भक्त लखन थापा को थी। ऐसा कहा जाता है कि राजा राम शाह अपनी रानी के इस रहस्यमयी शक्तियों से नावाकिफ थे। राजा राम शाह को जब रानी में इस दिव्य शक्ति की जानकारी हुई तो कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। उस वक्त सती प्रथा का प्रचलन था सो रानी अपने पति की चिता के साथ सती हो गईं। इस घटना से रानी के भक्त लखन थापा को बहुत कष्ट हुआ था। सती होने के पहले रानी ने लखन थापा को वचन दिया था कि वह किसी न किसी रूप में एक बार फिर प्रकट होंगी। लखन थापा इसी दिन की प्रतीक्षा में गोरखा जिले के पहाड़ों पर भटकता रहा तभी उसे एक दिन खबर मिली कि पहाड़ के ही एक किसान को अपने खेत में ऐसा पत्थर मिला है, जिसमें दूध और रक्त एक साथ बह रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">लखन थापा यह खबर सुनते ही उस किसान के खेत में पंहुच गया। खून और दूध के रिसाव वाले पत्थर को देख उसे दिव्य शक्तियों वाली रानी का दिया हुआ वचन याद आ गया कि “किसी भी रूप में वे एक बार फिर प्रकट होंगी”। लखन थापा ने रानी का स्मरण करते हुए उस स्थान पर तप और साधना प्रारंभ कर दी। लखन थापा के साधना के कुछ ही दिन बाद पत्थर से दूध और रक्त का रिसाव बंद हो गया। बाद में इसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण हुआ, जिसे मनोकामना मंदिर कहा गया। इस मंदिर के प्रारंभिक पुजारी लखन थापा थे। जैसा कि बताया गया कि आज भी मनोकामना मंदिर के जो पुजारी हैं वे लखन थापा के ही वंशज हैं, जो मगर समुदाय से आते हैं। बताते हैं कि नेपाल के जनक पृथ्वी नारायण शाह ने इस मंदिर का दर्शन कर नेपाल के प्रथम राजा के दायित्व की शुरुआत की थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मंदिर तक पंहुचने के लिए केबल कार है सुरक्षित माध्यम </h3>
<p style="text-align:justify;">इस मंदिर तक पंहुचने के लिए मुगलिंग नामक स्थान से केबल कार से जाना होता है। मुगलिंग नेपाल का ऐसा सेंटर है, जहां चाहे जिस ओर से काठमांडू जाइए, यहां आना ही होता है। मुगलिंग से काठमांडू की दूरी सौ किलोमीटर है और काठमांडू से मनोकामना मंदिर की दूरी 140 किलोमीटर है, जबकि मुगलिंग से मनोकामना मंदिर की दूरी 40 किलोमीटर है, जो पहाड़ों के ऊपर होकर जाता है। मुगलिंग से ही मंदिर तक जाने के लिए मनोकामना केबल कार की सुविधा उपलब्ध है, जो 15-20 मिनट में मंदिर के निकट तक पहुंचा देती है। मनोकामना मंदिर के दर्शन के लिए यूं तो कोई खास समय तय नहीं है, लेकिन दशहरा के समय यहां भारी भीड़ उमड़ती है। दशहरा नेपाल का प्रमुख हिंदू पर्व है, जो पूरे दस दिन तक मनाया जाता है। इस दौरान नेपाल के सरकारी संस्थाओं में पूरे दस दिन तक छुट्टियां रहती हैं। अष्टमी के दिन मनोकामना मंदिर पर बलि चढ़ाने की परंपरा आज भी कायम है। मनोकामना मंदिर तक जाने के लिए केबल कार के अलावा सड़क मार्ग भी है, लेकिन यह काफी जोखिम भरा होता है यहां दुर्घटनाओं की संभावना सदैव बनी रहती है। इसलिए लोग केबल कार से ही जाना पसंद करते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">यशोदा श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 06:00:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>बोधकथा :  असली धन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक गाँव में हरिदास नाम का एक किसान रहता था। वह मेहनती था, लेकिन हमेशा इस चिंता में डूबा रहता कि उसके पास धन कम है। गाँव का साहूकार धनवान था, इसलिए हरिदास उसे देखकर सोचता, “काश! मेरे पास भी इतना पैसा होता, तो मैं सबसे सुखी व्यक्ति होता।”</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन खेत में हल चलाते समय हरिदास को मिट्टी के भीतर एक पुराना घड़ा मिला। उसने घड़ा खोला तो उसमें सोने के सिक्के थे। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह घड़ा घर ले आया और पत्नी से बोला, “अब हमारे सारे दुख दूर हो गए।”</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उस रात हरिदास</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591155/parable--true-wealth"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/true-wealth.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक गाँव में हरिदास नाम का एक किसान रहता था। वह मेहनती था, लेकिन हमेशा इस चिंता में डूबा रहता कि उसके पास धन कम है। गाँव का साहूकार धनवान था, इसलिए हरिदास उसे देखकर सोचता, “काश! मेरे पास भी इतना पैसा होता, तो मैं सबसे सुखी व्यक्ति होता।”</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन खेत में हल चलाते समय हरिदास को मिट्टी के भीतर एक पुराना घड़ा मिला। उसने घड़ा खोला तो उसमें सोने के सिक्के थे। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह घड़ा घर ले आया और पत्नी से बोला, “अब हमारे सारे दुख दूर हो गए।”</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उस रात हरिदास सो नहीं सका। उसे डर सताने लगा कि कहीं कोई सिक्के चुरा न ले। अगले दिन उसने खेत जाना छोड़ दिया और दिन-रात धन की रखवाली करने लगा। कुछ ही दिनों में उसका खेत सूखने लगा। फसल खराब होने लगी और घर में अनाज की कमी हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन गाँव का बूढ़ा शिक्षक उसके घर आया। उसने हरिदास को उदास देखकर कारण पूछा। हरिदास ने सारी बात बता दी।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षक मुस्कुराकर बोला, “जिस धन के कारण तुम्हारी नींद, मेहनत और संतोष चला गया, वह धन तुम्हारे किस काम का?”</p>
<p style="text-align:justify;">हरिदास ने कहा, “लेकिन यह सोना तो मुझे अमीर बना सकता है।”</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षक ने उत्तर दिया, “सोना तभी धन है, जब वह जीवन को बेहतर बनाए। यदि वही भय और चिंता का कारण बन जाए, तो वह बोझ है।”</p>
<p style="text-align:justify;">हरिदास को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने कुछ सिक्के बेचकर खेत के लिए बीज, सिंचाई का साधन और खेती के उपकरण खरीदे। बाकी धन सुरक्षित रख दिया। वह फिर मेहनत से खेती करने लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ महीनों बाद खेत लहलहा उठा। घर में अनाज भर गया और हरिदास के चेहरे पर फिर वही संतोष लौट आया। उसने शिक्षक से कहा, “अब समझ आया कि धन का मूल्य उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग में है।” शिक्षक बोले, “और याद रखो, मेहनत से कमाया संतोष ही मनुष्य का सबसे बड़ा धन है।” कथा की सीख धन तभी सार्थक है, जब वह जीवन में सुख, सुरक्षा और संतोष बढ़ाए। लालच और भय से बचकर धन का सदुपयोग करना ही सच्ची समृद्धि है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 09:31:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>व्यक्ति जैसे होंगे वैसा ही समाज बनेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">आधुनिक वातावरण में पनप रहे परिवारों में आए दिन खींचतान, आपाधापी, द्वेष-दुर्भाव का विकृत वातावरण बना रहता है। परिणामतः उस घुटन में जो भी रहते-पलते हैं, दुर्बुद्धि ग्रसित होते जाते हैं। यदि इस स्थिति को बदला जा सके और परिवार की इस पाठशाला में सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों के आधार पर दैनिक कार्य-व्यवहार का ढांचा खड़ा किया जा सके, तो घर का हर व्यक्ति श्रमशीलता, स्वच्छता, मधुरता, मितव्ययिता, सहायता और ईमानदारी जैसे सद्गुणों को अपनाता और पनपता चला जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिवारों की नर्सरी में ठीक तरह उगाया गया पौधा जिस बगीचे में भी लगेगा, जहां भी फलेगा-फूलेगा, अपने सुंदर फूलों और मधुर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591154/the-society-will-be-like-the-people"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/society-takes.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आधुनिक वातावरण में पनप रहे परिवारों में आए दिन खींचतान, आपाधापी, द्वेष-दुर्भाव का विकृत वातावरण बना रहता है। परिणामतः उस घुटन में जो भी रहते-पलते हैं, दुर्बुद्धि ग्रसित होते जाते हैं। यदि इस स्थिति को बदला जा सके और परिवार की इस पाठशाला में सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों के आधार पर दैनिक कार्य-व्यवहार का ढांचा खड़ा किया जा सके, तो घर का हर व्यक्ति श्रमशीलता, स्वच्छता, मधुरता, मितव्ययिता, सहायता और ईमानदारी जैसे सद्गुणों को अपनाता और पनपता चला जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिवारों की नर्सरी में ठीक तरह उगाया गया पौधा जिस बगीचे में भी लगेगा, जहां भी फलेगा-फूलेगा, अपने सुंदर फूलों और मधुर फलों से वातावरण को सुखद बनाएगा। परिवारों का सृजन और संचालन अध्यात्म दृष्टिकोण अपनाकर किया जाए, तो उसमें सद्भावना हिलोरें ले रही होंगी और परंपराएं पनप रही होंगी। किंतु यदि वासना के लिए विवाह, मोह के लिए संतान, लोभ के लिए उपार्जन और अहंकार का आधिपत्य चरितार्थ किया जा रहा होगा, तो प्रत्येक घर में नारकीय वातावरण ही बना रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">आत्मचिंतन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारदीवारों पर आत्मिक प्रगति का भवन खड़ा होता है। हवाई किला बनाकर कल्पना की उड़ानें तो भरी जा सकती हैं, पर मजबूत महल बनाना है, तो जमीन पर सुदृढ़ आधारशिला रखनी होगी। ईश्वरीय अनुग्रह की अमृत वर्षा सर्वत्र अनवरत रूप में होती रहती है। साधना का उद्देश्य आत्मशोधन है। दुष्कर्म से स्थूल शरीर, दुर्बुद्धि से सूक्ष्म शरीर और दुर्भावों से समूचे व्यक्तित्व में विकृतियां भर जाती हैं। कठोर चट्टान पर अनवरत वर्षा होते हुए भी हरियाली उत्पन्न नहीं होती। </p>
<p style="text-align:justify;">बादलों से अनुरोध करना व्यर्थ है, चट्टान को ही कोमल रेत में बदलना पड़ेगा। सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व पाने वाला मनुष्य इस धरती को स्वर्ग बना सकने की संभावनाओं से पूरी तरह सुसज्जित है। यहां निर्वाह ही नहीं, आनंद और उल्लास के साधन भी पग-पग पर उपलब्ध हैं। फिर भी मनुष्य अनेक ऐसी गुत्थियों में जकड़ा है, जो सुलझने का नाम नहीं लेतीं। सिंह-व्याघ्र, सांप-बिच्छू और प्रकृति-प्रकोप के भय को समझा जा सकता है, पर मनुष्य ही मनुष्य के शोषण और आतंक का कारण बने, यह स्थिति भयावह है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें समझना होगा कि समाज की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, व्यक्तियों का समूह ही समाज है। व्यक्ति जैसे होंगे, वैसा ही समाज बनेगा। वैयक्तिक समस्याएं ही इकट्ठी होकर सामाजिक समस्याएं बन जाती हैं। स्वाभाविक स्नेह-सद्भाव घट जाने से संयुक्त परिवार प्रणाली का आनंद खो गया है। दांपत्य जीवन को कृत्रिम आकर्षणों के सहारे मधुर बनाने के प्रयोग असफल हो रहे हैं और परिवार संस्था टूट रही है। संतान और अभिभावकों के बीच स्नेह-श्रद्धा के सूत्र भी दुर्बल पड़ गए हैं। परिवार में यदि परस्पर सहयोग, विश्वास और आत्मीयता का वातावरण बने, तो छोटी-छोटी कठिनाइयां भी सहजता से दूर की जा सकती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">घर के बड़े अपने आचरण से बच्चों को जो संस्कार देते हैं, वही आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और व्यवहार की आधारशिला बनते हैं। धन-संपत्ति एक प्रकार की आग है, जिसे अध्यात्मवाद के चिमटे से ही पकड़ा जाना चाहिए। वासना, तृष्णा, लोभ-मोह और संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा व्यक्ति साधन-संपन्न होकर भी अपनी उपलब्धियों का सदुपयोग नहीं कर सकेगा। ज्ञान-विज्ञान और उद्योग की दिशा में गगनचुंबी प्रगति हो रही है, किंतु आवश्यकता उस सद्भावना और दूरदर्शिता की भी है, जिसके सहारे इन उपलब्धियों का सदुपयोग किया जा सके। भौतिक साधनों की वृद्धि तभी सार्थक है, जब उनका उपयोग मानव कल्याण, सेवा और सामाजिक सुख-शान्ति के लिए किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">कमी साधनों की नहीं, कठिनाई एक ही है कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण की उपेक्षा की गई। अध्यात्म को व्याख्याओं में धूमिल कर दिया गया है। इसलिए आवश्यक है कि उसके वास्तविक स्वरूप से जनसाधारण को परिचित कराया जाए। सामाजिक सुख-शांति की धुरी आध्यात्मिकता ही है। उसे कहने-सुनने की विडंबना बनाकर नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन में उतारकर ही परिवार, समाज और राष्ट्र को स्वस्थ बनाया जा सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />आचार्य प्रदीप द्विवेदी, आध्यात्मिक लेखक</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 09:02:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जयंती पर विशेष :  जेहि गावत तुलसी भए तुलसी तुलसीदास </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भले अन्य रचनाकार अप्रासंगिक हो जाएं, किंतु तुलसीदास कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। जब से उनकी रामचरितमानस जन-जन में पहुंची, तब से वह राम की ही तरह लोकप्रिय हैं। गांव-गांव, गली-मोहल्ले में मानस का पाठ होता है। इसकी चौपाइयां और दोहे लोग पूजा में मंत्र की तरह प्रयोग करते हैं। न जाने कितने विद्वान रामकथा सुनाकर जीवनयापन कर रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीयों ने भी रामचरितमानस के सहारे अपनी संस्कृति और आस्था को जीवित रखा। गिरमिटिया भारतीय अपने साथ मानस की प्रतियां लेकर मॉरीशस जैसे दुर्गम टापुओं तक गए और उसे अपना संबल बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">गोस्वामी तुलसीदास की जन्मतिथि और जन्मस्थान</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591152/special-birth-anniversary-%E2%80%8B%E2%80%8Bsinging-tulsidas--tulsi"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/tulsidas.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भले अन्य रचनाकार अप्रासंगिक हो जाएं, किंतु तुलसीदास कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। जब से उनकी रामचरितमानस जन-जन में पहुंची, तब से वह राम की ही तरह लोकप्रिय हैं। गांव-गांव, गली-मोहल्ले में मानस का पाठ होता है। इसकी चौपाइयां और दोहे लोग पूजा में मंत्र की तरह प्रयोग करते हैं। न जाने कितने विद्वान रामकथा सुनाकर जीवनयापन कर रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीयों ने भी रामचरितमानस के सहारे अपनी संस्कृति और आस्था को जीवित रखा। गिरमिटिया भारतीय अपने साथ मानस की प्रतियां लेकर मॉरीशस जैसे दुर्गम टापुओं तक गए और उसे अपना संबल बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">गोस्वामी तुलसीदास की जन्मतिथि और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। इसके बावजूद सावन शुक्ल पक्ष की सप्तमी को तुलसीदास जयंती मनाई जाती है। उनके जीवन के प्रामाणिक विवरण भी बहुत कम मिलते हैं। नाभादास के भक्तमाल तथा बेनी माधवदास के मूल गोसाईं चरित में तुलसी के जीवन से जुड़ी अनेक बातें मिलती हैं, किंतु उनमें से कई प्रमाणित नहीं हैं। रत्नावली की फटकार-“अस्थि चर्म मय देह में तामें ऐसी प्रीत, ऐसी जो रघुनाथ में होत न तव भवभीति”-ने तुलसीदास के जीवन की दिशा बदल दी और वह राम के होकर रह गए। भवभूति के राम परमपुरुष, वाल्मीकि के राम मर्यादा पुरुषोत्तम और अध्यात्म रामायण के राम विष्णु के अवतार हैं, तो तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी उनके आराध्य हैं। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में अंतर होते हुए भी दोनों ग्रंथों में संगीतात्मकता और विविध रसों की अद्भुत अभिव्यक्ति मिलती है। </p>
<p style="text-align:justify;">तुलसी ने मानव चरित्र की मर्यादा में रहकर राम का चरित्र चित्रण किया। तुलसीदास ऐसे समय में हुए जब भारत राजनीतिक और सामाजिक विखंडन से गुजर रहा था। उन्होंने रामचरितमानस के माध्यम से समाज को जोड़ने, नैतिकता जगाने और आध्यात्मिक मार्ग दिखाने का प्रयास किया। नवधा भक्ति से लेकर परिवार, समाज, प्रजा, साधु-संत, मित्र-शत्रु और शासन तक उन्होंने जीवन के अनेक पक्षों पर अपनी दृष्टि व्यक्त की। “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी” कहकर उन्होंने आदर्श शासन की कल्पना रखी और “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहू नहि व्यापा” के माध्यम से रामराज्य का स्वरूप प्रस्तुत किया।</p>
<p style="text-align:justify;">तुलसीदास महज कवि नहीं, लोकनायक और समाजद्रष्टा भी हैं। ग्रियर्सन, रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने उनके लोकमहत्व को स्वीकार किया। आज मुद्रित पुस्तकों से लेकर इंटरनेट और सोशल मीडिया तक उनकी रचनाएं सहज उपलब्ध हैं। यही तुलसी और रामचरितमानस की विशेषता है कि समय बदलता जाता है, किंतु उनकी प्रासंगिकता निरंतर बढ़ती जाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिवचरण चौहान, लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 09:00:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खुद में सदियों का इतिहास समेटे सूरजकुंड</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बदायूं शहर से दातागंज मार्ग पर लगभग तीन किमी दूर गांव मझिया के पास स्थित 12 वीं सदी का ऐतिहासिक सूरजकुंड (सूर्यकुंड) है, जिसका संबंध राजा महीपाल के शासनकाल से है। उस समय सती प्रथा का प्रचलन था। पति की मौत के बाद महिलाएं यहां बने कुंड में स्नान के बाद सती होती थीं और उनकी मठिया बना दी जाती थी। बाहर शिलापट पर जानकारी लिखी जाती थी। सतियों की मठिया आज भी हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में जर्जर हालत में पहुंच गईं हैं। उस क्षेत्र के अलावा पूरा सूरजकुंड पर्यटन स्थल बन चुका है। लोग सुकून पाने के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/591150/surajkund-contains-centuries-of-history-in-itself"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/surajkund.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बदायूं शहर से दातागंज मार्ग पर लगभग तीन किमी दूर गांव मझिया के पास स्थित 12 वीं सदी का ऐतिहासिक सूरजकुंड (सूर्यकुंड) है, जिसका संबंध राजा महीपाल के शासनकाल से है। उस समय सती प्रथा का प्रचलन था। पति की मौत के बाद महिलाएं यहां बने कुंड में स्नान के बाद सती होती थीं और उनकी मठिया बना दी जाती थी। बाहर शिलापट पर जानकारी लिखी जाती थी। सतियों की मठिया आज भी हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में जर्जर हालत में पहुंच गईं हैं। उस क्षेत्र के अलावा पूरा सूरजकुंड पर्यटन स्थल बन चुका है। लोग सुकून पाने के लिए आते हैं। बताया जाता है कि सूरजकुंड के साक्ष्य लखनऊ के संग्रहालय में भी रखे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><br />सूरजकुंड का इतिहास</h3>
<p style="text-align:justify;">साक्ष्यों के अनुसार 12वीं सदी में राजा महीपाल ने अपने शासनकाल में इस धार्मिक स्थल का निर्माण कराया था। जहां भगवान शिव के छोटे मंदिर बने और शिवलिंग भी थे, जिसके अवशेष आज भी मिलते हैं। एक बड़ा कुंड बनवाया, जिसमें उतरने के लिए 18 सीढ़ियां थीं। 9 ऊपर और 9 पानी के नीचे। कार्तिक महीने में मेला लगाया जाता था। यहां साल में दो बार बड़ा मेला लगता था, जिसमें देशभर से लोग पहुंचते थे। माघ पूर्णिमा पर भव्य यज्ञ होता था। वहीं राजा महीपाल के प्रधानमंत्री ने वेदों के अध्ययन के लिए यहां एक महाविद्यालय की स्थापना कराई थी। आज भी यहां गुरुकुल संचालित किया जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">चीनी यात्री फाहियान के सन् 415 में तलाशने का दावा</h3>
<p style="text-align:justify;">सूरजकुंड को लेकर आज दो मत हैं। एक पक्ष का माना है कि राजा महीपाल के बनवाए गए इस स्थान पर शिव मंदिर था, वहीं दूसरे पक्ष का मानना है कि भगवान बौद्ध ने यहां वर्षावास किया था, जिसके चलते सूरजकुंड को सम्राट अशोक बुद्ध पर्यटन स्थल के नाम से भी जाना जाता है। दूसरे पक्ष के अनुसार इस स्थान को पहली बार चीनी यात्री फाहियान ने यात्रा के दौरान इस स्थान को खोजा था। इसी स्थान पर शाक्य मुनि भगवान बुद्ध ने वर्षावास किया था। पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर बौद्ध भिक्षुओं और उपासकों को धम्मदेशता दी थी। सम्राट अशोक के समय इसी स्थान पर बौद्ध बिहार बनवाए थे। राजा महीपाल ने भव्य सूरजकुंड बनवाया। चारों ओर चौरासी बौद्ध मठ भी बनवाए। </p>
<h4 style="text-align:justify;">साल 2016 में कराया गया था सूरजकुंड का सौंदर्यीकरण </h4>
<p style="text-align:justify;">सूरजकुंड का इतिहास बहुत पुराना है। लगातार अनदेखी के चलते इसका अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा था, जिसके चलते पूर्व में बदायूं और वर्तमान में आजमगढ़ सांसद धर्मेंद्र यादव ने सूरजकुंड का सौंदर्यीकरण कराया था। 30 अप्रैल 2016 को शिलान्यास हुआ। कार्यदायी संस्था ग्रामीण अभियंत्रण विभाग ने काम कराया था, जिसके बाद 99.06 लाख रुपये से जिले के पूर्व प्रभारी मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने सौंदर्यीकरण के काम का शिलान्यास किया।  धार्मिक और पर्यटन स्थल सुरक्षित रखने के लिए सूरजकुंड के मंदिर से बुद्धि के खेत तक 15 लाख रुपये की लागत से 215 की चारदीवारी बनवाई गई।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सुकून पाने के लिए पहुंचते हैं लोग</h3>
<p style="text-align:justify;">सौंदर्यीकरण के बाद कुंड की स्थित दुरुस्त की गई थी। परिसर में जगह-जगह लाइटिंग की व्यवस्था की गई। हाईमास्ट लाइट भी लगाई गईं। टाइलीकरण किया गया था। कुंड को चारों ओर से पक्की सीढ़ियां लगाकर सही कराया गया था। बैठने के लिए हट बनाकर सीटें बनवाई गईं। लोगों के टहलने के लिए भी इंटरलॉकिंग कराई गई। फलवारी भी लगाई गईं, जिसके चलते आज सुकून पाने के लिए लोग इस पर्यटन स्थल पर पहुंचते हैं। सुबह से लेकर शाम तक लोगों की भीड़ रहती है। कुंड में भरा पानी और उसकी मछलियां मन को सुकून देते हैं। कहा जाता है कि उसमें मौजूद मछलियां को दाना खिलाने से पुण्य मिलता है। किनारे पर कुछ डालने से मछलियां पास में चली आती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">-ऋषिदेव गंगवार, बदायूं</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 16:54:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बाबा भूतनाथ मंदिर की रहस्यमयी लोकपरंपराएं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">लखीमपुर खीरी जिले में छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ शिवभक्ति की उस पावन परंपरा का केंद्र है, जहां सावन माह में आस्था अपने चरम पर दिखाई देती है। प्रसिद्ध गोकर्णनाथ मंदिर के अलावा यहां अनेक प्राचीन शिवालय और सिद्ध स्थल श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इन्हीं में से एक है बाबा भूतनाथ का अनोखा जुड़वा मंदिर, जो अपनी लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं और रहस्यमयी परंपराओं के कारण विशेष पहचान रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नगर से लगभग दो किलोमीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे वन क्षेत्र से सटा यह मंदिर सावन के दिनों में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन जाता है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/590499/mysterious-folk-traditions-of-the-baba-bhootnath-temple"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/baba-bhootnath-temple.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लखीमपुर खीरी जिले में छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ शिवभक्ति की उस पावन परंपरा का केंद्र है, जहां सावन माह में आस्था अपने चरम पर दिखाई देती है। प्रसिद्ध गोकर्णनाथ मंदिर के अलावा यहां अनेक प्राचीन शिवालय और सिद्ध स्थल श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इन्हीं में से एक है बाबा भूतनाथ का अनोखा जुड़वा मंदिर, जो अपनी लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं और रहस्यमयी परंपराओं के कारण विशेष पहचान रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नगर से लगभग दो किलोमीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे वन क्षेत्र से सटा यह मंदिर सावन के दिनों में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन जाता है। नागपंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार को यहां विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोक संस्कृति, लोकविश्वास और सामाजिक परंपराओं का भी जीवंत उत्सव है। बाबा भूतनाथ मंदिर में आने वाले श्रद्धालु एक अनूठी परंपरा निभाते हैं। मंदिर परिसर स्थित प्राचीन कुएं में गिटकी फेंककर "हू-हू" की आवाज लगाई जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से बाबा तक भक्तों की प्रार्थना पहुंचती है। इसके बाद श्रद्धालु आसपास लगी पतावर में अपनी मनोकामना व्यक्त करते हुए गांठ बांधते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है तो वे पुनः यहां आकर गांठ खोलते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक बनी हुई है। सावन के दिनों में मंदिर परिसर में बंधी हजारों गांठें भक्तों के विश्वास की कहानी कहती नजर आती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रावण और चरवाहे की लोककथा</h3>
<p style="text-align:justify;">बाबा भूतनाथ मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा लंकापति रावण और भगवान शिव से संबंधित है। लोकश्रुति के अनुसार, रावण ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। प्रसन्न होकर शिवजी रावण के साथ लंका चलने को तैयार हुए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि यदि यात्रा के दौरान उन्हें कहीं धरती पर रख दिया गया तो वे वहीं स्थापित हो जाएंगे कहते हैं कि इस स्थान पर पहुंचने पर शिव की माया से रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ। उसने पास में पशु चरा रहे एक चरवाहे को अपनी कांवड़ पकड़ाते हुए कहा कि उसे जमीन पर न रखे। इसी बीच शिवजी ने अपना भार इतना बढ़ा दिया कि चरवाहा उसे अधिक देर तक संभाल नहीं सका और कांवड़ धरती पर रख दी। परिणामस्वरूप भगवान शिव यहीं स्थापित हो गए। लौटकर आने पर रावण ने जब यह दृश्य देखा तो वह क्रोधित हो उठा और चरवाहे का पीछा किया। भयभीत चरवाहा पास के कुएं में कूद गया। मान्यता है कि उसी घटना के बाद यह स्थान बाबा भूतनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।</p>
<h4 style="text-align:justify;">संत बाबा भूतनाथ और नाग विद्या की कथा</h4>
<p style="text-align:justify;">मंदिर से जुड़ी एक दूसरी किवदंती भी स्थानीय जनमानस में प्रचलित है। इसके अनुसार सरस्वती नदी के तट पर शैव संप्रदाय के सिद्ध संत बाबा भूतनाथ का आश्रम था। बाबा सर्प विद्या के अद्भुत ज्ञाता माने जाते थे और उनके आश्रम में अनेक प्रजातियों के नाग और सर्प विचरण करते थे। लोकमान्यता है कि महाभारत काल में महाराजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय द्वारा देवकली तीर्थ में आयोजित नाग यज्ञ के दौरान बाबा भूतनाथ ने अपनी सर्प विद्या का प्रभाव दिखाया था। नागपंचमी के अवसर पर उनके आश्रम में विशाल मेला लगता था, जिसमें हजारों श्रद्धालु जुटते थे। बाबा के पंचतत्व में विलीन होने के बाद यह मेला नागपंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार को आयोजित होने लगा। शिव के अनन्य भक्त बाबा भूतनाथ की स्मृति में स्थापित शिवलिंग आज भी उनके नाम से पूजी जाती है और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जुड़वा शिव मंदिर की अनोखी पहचान</h3>
<p style="text-align:justify;">बाबा भूतनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका जुड़वा स्वरूप है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस प्रकार का जुड़वा शिव मंदिर देश में विरले ही देखने को मिलता है। मंदिर परिसर के निकट स्थित प्राचीन कुआं भी श्रद्धालुओं के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना स्वयं मंदिर। सावन के महीने में यहां का वातावरण शिवमय हो उठता है। हर-हर महादेव के जयघोष, घंटों की ध्वनि, श्रद्धालुओं की भीड़ और लोकविश्वासों से जुड़ी परंपराएं इस स्थान को एक अद्भुत आध्यात्मिक पहचान प्रदान करती हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आस्था और लोकसंस्कृति का संगम</h3>
<p style="text-align:justify;">बाबा भूतनाथ मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि लोकजीवन और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत केंद्र है। यहां की कथाएं, मान्यताएं, मेले और परंपराएं क्षेत्र की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। यही कारण है कि सावन आते ही हजारों श्रद्धालुओं के कदम स्वतः इस पवित्र धाम की ओर बढ़ जाते हैं। आस्था, इतिहास, लोककथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का अद्भुत संगम समेटे बाबा भूतनाथ मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए विश्वास का ऐसा केंद्र है, जहां हर वर्ष सावन में भक्ति की नई कहानी लिखी जाती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">गांठों में बंधा विश्वास</h3>
<p style="text-align:justify;">मंदिर परिसर में बंधी हजारों गांठें भक्तों की मनोकामनाओं का प्रतीक हैं। स्थानीय मान्यता है कि बाबा भूतनाथ के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु गांठ बांधते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर वापस आकर उसे खोलते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />विकास शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/590499/mysterious-folk-traditions-of-the-baba-bhootnath-temple</link>
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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 09:00:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>नाथ नगरी का तुलसी मठ और रामभक्ति की विरासत</title>
                                    <description><![CDATA[<h6 class="MsoNormal">अलखनाथ मंदिर के पास स्थित तुलसी मठ आस्था, इतिहास और आध्यात्मिक परंपरा का अनोखा संगम है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने यहां तपस्या की और राम भक्ति का संदेश दूर-दूर तक फैलाया। कभी घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र साधु-संतों की तपस्थली रहा, जहां रामगंगा के निकट होने से साधना के लिए अनुकूल वातावरण मिलता था। समय के साथ यह स्थान तुलसी मठ और राम दरबार मंदिर के रूप में बरेली की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। श्रद्धालु यहां आते हैं और इस पावन स्थल पर भक्ति, शांति के साथ आध्यात्मिक विरासत का अनुभव करते हैं। कहा</h6>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/589761/the-tulsi-math-of--nath-nagari--and-the-legacy-of-devotion-to-lord-ram"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/nath-nagari.jpg" alt=""></a><br /><h6 class="MsoNormal">अलखनाथ मंदिर के पास स्थित तुलसी मठ आस्था, इतिहास और आध्यात्मिक परंपरा का अनोखा संगम है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने यहां तपस्या की और राम भक्ति का संदेश दूर-दूर तक फैलाया। कभी घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र साधु-संतों की तपस्थली रहा, जहां रामगंगा के निकट होने से साधना के लिए अनुकूल वातावरण मिलता था। समय के साथ यह स्थान तुलसी मठ और राम दरबार मंदिर के रूप में बरेली की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। श्रद्धालु यहां आते हैं और इस पावन स्थल पर भक्ति, शांति के साथ आध्यात्मिक विरासत का अनुभव करते हैं। कहा जाता है कि तुलसीदास के आगमन के बाद ही इसे तुलसी मठ की पहचान मिलरी थी।<br /> <br /><span style="color:rgb(186,55,42);">नाथ नगरी बरेली के किला क्षेत्र में स्थित तुलसी मठ का इतिहास बहुत पुराना माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास ने इस जगह पर तपस्या की और रामभक्ति का संदेश जन-जन तक पहुंचाया। प्राचीन समय में यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों और रामगंगा के निकट होने के कारण साधु-संतों की तपोस्थली हुआ करती थी। मठ में प्राचीन शिवालय, श्रीराम दरबार और हनुमानजी के दुर्लभ स्वरूप श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। कई भाषाओं के जानकार महंत नीरज नयन दास के अनुसार,  तुलसी मठ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बरेली की सांस्कृतिक पहचान भी है। यह मठ रामचरितमानस की परंपरा, राम दरबार की उपासना, गुरुकुल परंपरा और सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। नित्य यहां भजन-कीर्तन होता है। दशहरा, गुरुपूर्णिमा और गोवर्धन पूजा जैसे पर्वों पर विशेष आयोजन किए जाते हैं।</span></h6>
<h4 class="BriefBoxHead"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जुड़े</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरबार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंदिर</span></h4>
<p class="BriefBoxmatter"><span lang="hi" xml:lang="hi">महंत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बताते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसीदास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आगमन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पहचान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हुई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लगभग</span><span> 1600 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ई</span><span>. </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आसपास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसीदास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साधना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थली</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बनाया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनकी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भक्ति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंपरा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभाव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फैला।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शहर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भीतर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरबार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंदिर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महत्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span><span>, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">माता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सीता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्मण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विराजमान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कारण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरबार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंदिर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जुड़ा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हुआ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">माना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जाता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्षेत्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बरेली</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पहचान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महत्वपूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हिस्सा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मुगल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंग्रेजी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शासनकाल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बरेली</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महत्वपूर्ण</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रहा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दौरान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थलों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विकास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हुआ।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरबार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंदिर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केवल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्थल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नहीं</span><span>, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बरेली</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विरासत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span></p>
<h3 class="BriefBoxHead"><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">साधु</span><span>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">संत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नित्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">करते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">थे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभू</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा</span></h3>
<p class="BriefBoxmatter"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मभूमि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नाता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रहा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महंत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नीरज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नयन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बताते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रामानंदीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संप्रदाय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मंदिर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अयोध्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कनक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वरूप</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दरबार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिष्ठित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्व</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्यों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शताब्दियों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मभूमि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा</span><span>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अर्चना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एवं</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुखता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मभूमि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पहले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अधीन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">थी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आचार्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पुजारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बारी</span><span>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">बारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जन्मभूमि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आते</span><span>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जाते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रहते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">थे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रामानंदीय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वैष्णव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंपरा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तहत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मोही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अखाड़े</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वैष्णव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देखते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">थे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संचालित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुकुल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">छात्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश</span><span>-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">विदेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नाम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रोशन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रहे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्ष</span><span> 1950 </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महंत</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वामी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमोदवन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बिहारीदास</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्वहन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बाद</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अयोध्या</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निर्मोही</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अखाड़े</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संतों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सौंप</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">थी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">झंडे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निशान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चित्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उसमें</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सूर्य</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भगवान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विराजमान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span></p>
<h3 class="BriefBoxHead"><span lang="hi" xml:lang="hi">सांप्रदायिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सौहार्द</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मिसाल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शिवालय</span></h3>
<p class="BriefBoxmatter"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शिवालय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सांप्रदायिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सौहार्द</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्लाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतीक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चिह्न</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">चांद</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">तारा</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">विपरीत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिशा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लगवाया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आज</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिखाई</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">देता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">महंत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बताते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आसिफउद्दौला</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दोबारा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">था</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चरणों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रोने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लगा।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पूछने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्ञात</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हुआ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">वह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भयंकर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व्याधि</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ित</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">महात्मा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीराम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सुमिरन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सलाह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दी।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रतिम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिव्यता</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">से</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अभिभूत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यवन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">होते</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हुए</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">भी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">रातभर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">राम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">लिया।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मनोकामना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्ण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हुई।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">देना</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">चाहा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वीकार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिया।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">बाद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संतान</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">को</span> 12 <span lang="hi" xml:lang="hi">गांवों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">जमींदारी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंपने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आग्रह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">संत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">ने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">इसे</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्वीकार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दिया।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाब</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">काफी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विनय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">करने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शिवालय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्माण</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">में</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सहयोग</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वीकार</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">किया</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">था।</span></p>
<h3 class="BriefBoxHead"><span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मठ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बातें</span></h3>
<p class="BriefBoxmatter" style="margin-left:8.5pt;text-indent:-8.5pt;"><span style="font-size:8.5pt;font-family:Wingdings;color:#ff0125;">n<span> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्राचीन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शिवालय</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">हनुमानजी</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">दुर्लभ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विग्रह</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">मौजूद</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">यहां</span></p>
<p class="BriefBoxmatter" style="margin-left:8.5pt;text-indent:-8.5pt;"><span style="font-size:8.5pt;font-family:Wingdings;color:#ff0125;">n<span> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गतिविधियों</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">व</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">शैक्षिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम</span></p>
<p class="BriefBoxmatter" style="margin-left:8.5pt;text-indent:-8.5pt;"><span style="font-size:8.5pt;font-family:Wingdings;color:#ff0125;">n<span> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">गुरुपूर्णिमा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दशहरा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">गोवर्धन</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">पर</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आयोजन</span></p>
<p class="BriefBoxmatter" style="margin-left:8.5pt;text-indent:-8.5pt;"><span style="font-size:8.5pt;font-family:Wingdings;color:#ff0125;">n<span> </span></span><span lang="hi" xml:lang="hi">बरेली</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">की</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">आध्यात्मिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">विरासत</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">का</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र</span></p>
<p class="BriefBoxmatter" style="margin-left:8.5pt;text-indent:-8.5pt;"> </p>
<p class="BriefBoxmatter" style="margin-left:8.5pt;text-indent:-8.5pt;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong><span style="font-size:20pt;line-height:115%;">– </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:20pt;line-height:115%;" xml:lang="hi">दिग्विजय</span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:20pt;line-height:115%;" xml:lang="hi"> </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:20pt;line-height:115%;" xml:lang="hi">मिश्रा</span></strong><strong><span style="font-size:20pt;line-height:115%;">, </span></strong><strong><span lang="hi" style="font-size:20pt;line-height:115%;" xml:lang="hi">बरेली</span></strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 07:25:51 +0530</pubDate>
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