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                <title>अंतस - Amrit Vichar</title>
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                <title>छोटी काशी का नवोदय आस्था,  इतिहास और आधुनिकता का अद्भुत संगम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश के तराई अंचल में बसा गोला गोकर्णनाथ केवल एक नगर नहीं, बल्कि सनातन आस्था का ऐसा तीर्थ है, जहां हर श्वास में शिव का स्मरण और हर कण में उनकी उपस्थिति का अनुभव होता है। वर्षों से ‘छोटी काशी’ के नाम से विख्यात यह पावन धाम अब एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। शिव मंदिर कॉरिडोर का निर्माण केवल पत्थरों और भवनों का विस्तार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था को आधुनिक स्वरूप देने का एक दिव्य प्रयास है। गोला गोकर्णनाथ की पहचान उसके पौराणिक शिव मंदिर तक सीमित नहीं है। नगर के चारों दिशाओं में शिव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586710/chhoti-kashi-s-navodaya--a-wonderful-confluence-of-faith--history--and-modernity"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/untitled-design-(2)3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश के तराई अंचल में बसा गोला गोकर्णनाथ केवल एक नगर नहीं, बल्कि सनातन आस्था का ऐसा तीर्थ है, जहां हर श्वास में शिव का स्मरण और हर कण में उनकी उपस्थिति का अनुभव होता है। वर्षों से ‘छोटी काशी’ के नाम से विख्यात यह पावन धाम अब एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। शिव मंदिर कॉरिडोर का निर्माण केवल पत्थरों और भवनों का विस्तार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था को आधुनिक स्वरूप देने का एक दिव्य प्रयास है। गोला गोकर्णनाथ की पहचान उसके पौराणिक शिव मंदिर तक सीमित नहीं है। नगर के चारों दिशाओं में शिव की उपासना के अनेक प्राचीन केंद्र आज भी इतिहास और श्रद्धा की अमिट गाथा सुनाते हैं। खुटार मार्ग पर स्थित क्लेशहरणनाथ, दक्षिण में गोमती तट के बाबा टेढ़ेनाथ, पूर्व दिशा के बाबा भूतनाथ, त्रिलोकगिरिनाथ और बाबा तुरंतनाथ जैसे मंदिर इस धरती को शिवमय बना देते हैं। मानो पूरा नगर ही भगवान भोलेनाथ की दिव्य परिक्रमा हो।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/untitled-design-(4)3.jpg" alt="Untitled design (4)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">पुराणों में वर्णित कथा इस भूमि को और भी अलौकिक बना देती है। कहा जाता है कि वैराग्य की भावना से प्रेरित होकर भगवान शिव मृग रूप धारण कर इस वन प्रदेश में विचरण करने आए थे। यहां की प्राकृतिक छटा ने उन्हें इतना आकर्षित किया कि वे यहीं रम गए। जब ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र उनकी खोज में पहुंचे, तो उन्होंने एक विशाल मृग को विश्राम करते देखा। जैसे ही देवता निकट पहुंचे, मृग भागने लगा। उसके सींग को पकड़ते ही वह तीन भागों में विभक्त हो गया। सींग का मूल भाग भगवान विष्णु ने यहीं स्थापित किया, जो आज गोकर्णनाथ के रूप में पूजित है। दूसरा भाग ब्रह्मा ने बिहार के श्रंगवेश्वर में और तीसरा भाग देवराज इंद्र अमरावती ले गए। यही कारण है कि गोकर्णनाथ धाम को शिव की दिव्य उपस्थिति का प्रत्यक्ष प्रतीक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अन्य लोककथा इस धाम की महिमा को और भी विलक्षण बना देती है। लंकापति रावण अपनी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव को लंका ले जाना चाहता था। शिव ने शर्त रखी कि मार्ग में जहां उन्हें धरती पर रखा जाएगा, वहीं वे स्थिर हो जाएंगे। यात्रा के दौरान गोला गोकर्णनाथ पहुंचकर रावण को लघुशंका के लिए रुकना पड़ा। उसने शिवलिंग एक चरवाहे को सौंप दिया, लेकिन अधिक देर होने पर चरवाहे ने उसे भूमि पर रख दिया। लौटकर रावण ने पूरा बल लगा दिया, पर शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। क्रोधित होकर उसने अंगूठे से उसे भूमि में दबा दिया। आज भी श्रद्धालु मानते हैं कि गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग पर रावण के अंगूठे का निशान उसी घटना का साक्षी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मंदिर की एक और विशेषता श्रद्धालुओं को विनम्रता का संदेश देती है। गर्भगृह में स्थित शिवलिंग भूतल से लगभग नौ फीट नीचे स्थापित है। यहां दर्शन के लिए भक्तों को झुकना पड़ता है, मानो स्वयं महादेव यह संदेश दे रहे हों कि उनके द्वार तक पहुंचने का मार्ग अहंकार से नहीं, बल्कि विनम्रता से होकर गुजरता है। मंदिर के समीप स्थित गोकर्ण तीर्थ भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आस्था का दृश्य बनता जा रहा है शिव मंदिर कॉरिडोर</h4>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/untitled-design-(3)2.jpg" alt="Untitled design (3)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">समय बदल रहा है और उसी के साथ बदल रही है छोटी काशी की तस्वीर भी। वर्ष 2022 में मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद काशी विश्वनाथ धाम की तर्ज पर शिव मंदिर कॉरिडोर का सपना आकार लेने लगा। दिसंबर 2024 में शुरू हुआ निर्माण कार्य आज तेजी से आगे बढ़ रहा है। विशाल प्रवेश द्वार, दिव्यांगजन के लिए रैंप, आकर्षक पार्क, परिक्रमा पथ, पार्किंग व्यवस्था और भव्य दीवारों पर उकेरी गई शिव कथाएं इस पूरे परिसर को आध्यात्मिक भव्यता का नया आयाम दे रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कॉरिडोर का सबसे आकर्षक केंद्र 20 टन वजनी श्री नंदीश्वर महाराज की भव्य प्रतिमा है, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा ने इस धाम की दिव्यता में नया अध्याय जोड़ दिया है। वहीं दीवारों पर उकेरी गई भगवान शिव परिवार, दशानन रावण की तपस्या, सेतुबंध रामेश्वरम्, सप्तऋषि और नटराज स्वरूप की मनोहारी कलाकृतियां श्रद्धालुओं को केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गौरवगाथा का भी साक्षात्कार कराती हैं। गोला गोकर्णनाथ आज उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहां पौराणिक विरासत और आधुनिक विकास एक-दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ रहे हैं। यह कॉरिडोर केवल ईंट-पत्थरों का निर्माण नहीं, बल्कि आस्था के उस दीप को और अधिक प्रज्वलित करने का प्रयास है, जिसकी ज्योति सदियों से इस भूमि को आलोकित करती आई है। आने वाले वर्षों में जब देश-विदेश से श्रद्धालु इस छोटी काशी में पहुंचेंगे, तब वे केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, पुराण, संस्कृति और आधुनिकता के अद्भुत संगम का दर्शन करेंगे, जहां हर कदम पर शिव हैं, हर दिशा में शिव हैं और हर हृदय में शिव ही शिव हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">छोटी काशी की खास पहचान</h4>
<p style="text-align:justify;">    पौराणिक महत्व: वराह पुराण, शिव पुराण, वामन पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है गोकर्णनाथ धाम का उल्लेख।</p>
<p style="text-align:justify;">    अनूठा शिवलिंग: मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भूतल से करीब नौ फीट नीचे स्थित है। श्रद्धालु दंडवत होकर भगवान के दर्शन करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">    रावण से जुड़ी मान्यता: लोककथा के अनुसार शिवलिंग पर आज भी रावण के अंगूठे का निशान मौजूद माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">    शिवमय परिक्रमा: क्लेशहरणनाथ, टेढ़ेनाथ, भूतनाथ, त्रिलोक गिरिनाथ और तुरंतनाथ जैसे प्राचीन शिव मंदिर इस क्षेत्र की धार्मिक गरिमा बढ़ाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">    नई पहचान: काशी विश्वनाथ धाम की तर्ज पर बन रहा शिव मंदिर कॉरिडोर छोटी काशी को राष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान देने की ओर अग्रसर है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<h5 style="text-align:justify;">विकास शुक्ल, लखीमपुर खीरी</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"><br /><br /></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 11:03:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> बोध कथा : सच्ची दौलत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक छोटे से गांव में दो मित्र रहते थे- मोहन और सोहन। दोनों बचपन से साथ पढ़े, खेले और बड़े हुए। समय के साथ मोहन मेहनत करके एक सफल व्यापारी बन गया, जबकि सोहन गांव में रहकर खेती करने लगा। मोहन के पास धन-दौलत, बड़ा मकान और कई नौकर-चाकर थे, जबकि सोहन साधारण जीवन जीता था। फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा संतोष और मुस्कान रहती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन मोहन कई वर्षों बाद गांव आया। उसने देखा कि सोहन पुराने घर में रह रहा है और साधारण कपड़े पहनता है। मोहन ने हंसते हुए कहा, “तुमने पूरी जिंदगी मेहनत की,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586111/bodh-katha--true-wealth"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(47)4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक छोटे से गांव में दो मित्र रहते थे- मोहन और सोहन। दोनों बचपन से साथ पढ़े, खेले और बड़े हुए। समय के साथ मोहन मेहनत करके एक सफल व्यापारी बन गया, जबकि सोहन गांव में रहकर खेती करने लगा। मोहन के पास धन-दौलत, बड़ा मकान और कई नौकर-चाकर थे, जबकि सोहन साधारण जीवन जीता था। फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा संतोष और मुस्कान रहती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन मोहन कई वर्षों बाद गांव आया। उसने देखा कि सोहन पुराने घर में रह रहा है और साधारण कपड़े पहनता है। मोहन ने हंसते हुए कहा, “तुमने पूरी जिंदगी मेहनत की, लेकिन तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। अगर मेरी तरह शहर जाकर व्यापार किया होता, तो आज अमीर होते।” सोहन मुस्कुराया और बोला, “धन ही सब कुछ नहीं होता, मित्र। मेरे पास परिवार का प्यार, गांव का सम्मान और मन की शांति है।”</p>
<p style="text-align:justify;">मोहन ने उसकी बात को हल्के में लिया। अगले दिन दोनों पास के जंगल में घूमने निकले। अचानक रास्ते में तेज बारिश शुरू हो गई। मोहन के महंगे कपड़े भीग गए और वह परेशान हो गया। तभी सोहन ने पास की एक झोपड़ी में शरण ली। वहां रहने वाले एक गरीब बुजुर्ग ने दोनों को सूखे कपड़े दिए, गर्म खाना खिलाया और रात भर आराम करने की जगह भी दी। सुबह मोहन ने बुजुर्ग से पूछा, “आप हमें जानते भी नहीं थे, फिर भी इतनी मदद क्यों की?” बुजुर्ग मुस्कुराकर बोले, “बेटा, इंसान की सबसे बड़ी पूंजी उसका दयालु स्वभाव होता है। धन कभी भी साथ छोड़ सकता है, लेकिन अच्छे कर्म और लोगों का विश्वास जीवनभर साथ रहते हैं।”  </p>
<p style="text-align:justify;">यह बात मोहन के दिल को छू गई। उसे एहसास हुआ कि उसने धन कमाने की दौड़ में रिश्तों और इंसानियत की कीमत को कम आंक लिया था। गांव लौटकर उसने सोहन से कहा, “आज समझ आया कि अमीरी केवल पैसे से नहीं होती। सच्चा अमीर वही है, जिसके पास प्रेम, संतोष और दूसरों की मदद करने का भाव हो।” उस दिन के बाद मोहन ने अपने व्यवहार में बदलाव लाया। उसने जरूरतमंद लोगों की सहायता शुरू की और अपने परिवार के साथ अधिक समय बिताने लगा। धीरे-धीरे उसे वह खुशी मिलने लगी, जो अपार धन होने के बावजूद कभी नहीं मिली थी। कहानी से शिक्षा मिलती है- धन-संपत्ति से अधिक मूल्यवान अच्छे संस्कार, संतोष, दया और मानवता होती है। सच्ची दौलत वही है, जो दूसरों के जीवन में भी खुशियां बांट सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 09:00:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Amarnath Yatra 2026: 'बम-बम भोले' के जयघोष के साथ शुरू हुई अमरनाथ यात्रा, बालटाल और नुनवान बेस कैंप से रवाना हुए श्रद्धालु</title>
                                    <description><![CDATA[बारिश के बीच दोनों मार्गों से श्रद्धालुओं का पहला जत्था रवाना, 57 दिनों तक चलने वाली यात्रा 28 अगस्त को होगी संपन्न।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586323/amarnath-yatra-2026-started-balatal-nunwan-base-camp-pilgrims-departure"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/muskan-dixit-(26).png" alt=""></a><br /><p><strong>श्रीनगर। </strong>दक्षिण कश्मीर हिमालय में समुद्र तल से लगभग 3,880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवित्र अमरनाथ गुफा के लिए वार्षिक अमरनाथ यात्रा शुक्रवार से विधिवत शुरू हो गई। यात्रा के पहले दिन श्रद्धालुओं के जत्थे बालटाल और नुनवान (पहलगाम) आधार शिविरों से पवित्र गुफा की ओर रवाना हुए।</p>
<p>अधिकारियों के अनुसार, रुक-रुककर हो रही बारिश के बावजूद यात्रा निर्धारित समय पर दोनों मार्गों से शुरू हुई। श्रद्धालु 48 किलोमीटर लंबे पारंपरिक नुनवान-पहलगाम मार्ग और 14 किलोमीटर लंबे बालटाल मार्ग से बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए निकले।</p>
<p>यात्रा में पुरुष, महिलाएं और साधु-संत बड़ी संख्या में शामिल हुए। सुबह होते ही दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले स्थित नुनवान आधार शिविर और मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के सोनमर्ग स्थित बालटाल आधार शिविर से श्रद्धालुओं को रवाना किया गया। संबंधित जिलों के उपायुक्तों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों ने हरी झंडी दिखाकर यात्रा को आगे बढ़ाया। इस दौरान 'बम-बम भोले' के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।</p>
<p>इससे पहले गुरुवार को जम्मू के भगवती नगर आधार शिविर से उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 4,809 से अधिक श्रद्धालुओं के पहले जत्थे को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। दोपहर में यह जत्था कश्मीर घाटी पहुंचा, जहां प्रशासन और स्थानीय लोगों ने श्रद्धालुओं का गर्मजोशी से स्वागत किया।</p>
<p>श्रद्धालु अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से निर्मित पवित्र हिम शिवलिंग के दर्शन और पूजा-अर्चना करेंगे।</p>
<p>यात्रा को सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) तथा अन्य अर्धसैनिक बलों के हजारों जवान विभिन्न स्थानों पर तैनात किए गए हैं। इसके साथ ही पूरे यात्रा मार्ग पर हवाई निगरानी की भी व्यवस्था की गई है।</p>
<p>57 दिनों तक चलने वाली यह वार्षिक अमरनाथ यात्रा 28 अगस्त को संपन्न होगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://www.amritvichar.com/article/586321/up-weather-update-today-alert-issued-for-heavy-rainfall-in-up--possibility-of-a-storm-as-well">UP Weather Update Today : आज भी यूपी के 45 जिलों में बारिश का अलर्ट, अगले चार-पांच दिन सुहाना रहेगा मौसम</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 10:08:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Muskan Dixit]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>निरंतर बदलता रहा है मन </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम है कि वह खुद को वही मान लेता है, जो बदलता रहता है, जैसे शरीर, भावनाएं या विचार। जब बदलने वाली चीजों को हम अपनी पहचान मान लेते हैं, तो दु:ख हमारी नियति बन जाता है, जबकि सच यह है कि हम शरीर नहीं हैं, मन नहीं हैं और भावनाएं भी नहीं हैं। वास्तव में हम वह चेतना हैं, जो इन सबको देख रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">चेतना शुद्ध जागरूकता है, जो हमें किसी चीज के होने का अहसास कराती है, जबकि मन विचारों, यादों और भावनाओं का एक ऐसा प्रवाह है, जिसे इस चेतना के माध्यम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586110/mind-is-constantly-changing"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(46)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम है कि वह खुद को वही मान लेता है, जो बदलता रहता है, जैसे शरीर, भावनाएं या विचार। जब बदलने वाली चीजों को हम अपनी पहचान मान लेते हैं, तो दु:ख हमारी नियति बन जाता है, जबकि सच यह है कि हम शरीर नहीं हैं, मन नहीं हैं और भावनाएं भी नहीं हैं। वास्तव में हम वह चेतना हैं, जो इन सबको देख रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">चेतना शुद्ध जागरूकता है, जो हमें किसी चीज के होने का अहसास कराती है, जबकि मन विचारों, यादों और भावनाओं का एक ऐसा प्रवाह है, जिसे इस चेतना के माध्यम से अनुभव किया जाता है। इस तरह चेतना स्थिर और शाश्वत है, जबकि मन पल-पल बदलता रहता है। आपका मन बचपन में अलग था और बुढ़ापे में अलग होता है, लेकिन आपकी चेतना स्वयं के होने का भाव हमेशा वही रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि मन वह सब कुछ है, जिसका अनुभव किया जाता है, तो चेतना उस सब कुछ का अनुभव कराती है, जिसका अनुभव किया जाता है। यही अपरिवर्तनीय तत्व चेतना है। मन निरंतर बदलता रहता है, परंतु जो इस परिवर्तन से अवगत होता है, वह नहीं बदलता। यदि मन किसी फिल्म की सामग्री है, तो चेतना वह पर्दा है, जिस पर फिल्म चलती है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है, जब आप सिनेमाघर में बैठकर फिल्म देखते हैं, तो पर्दे पर कभी प्रेम, कभी हंसी-खुशी तो कभी दुख या आग और हिंसा के दृश्य होते हैं, लेकिन क्या पर्दा जलता और फटता है, क्या पर्दा कभी रोता या हंसता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में पर्दा केवल देखने का आधार है। इसी तरह हमारे भीतर की चेतना भी पर्दे की तरह ही है। भावनाएं और विचार फिल्म की तरह आते-जाते रहते हैं, लेकिन हम उनसे आहत या जख्मी तभी होते हैं, जब हम खुद को फिल्म समझ लेते हैं। इसी तरह आसमान पर बादल आते-जाते हैं। कभी काले-भूरे या सफेद, लेकिन क्या इनका आसमान पर कोई असर होता है, नहीं। इसी तरह चेतना पर भी कोई भाव कभी स्थायी छाप नहीं छोड़ता।</p>
<p style="text-align:justify;">मन और चेतना को लेकर दार्शनिक कहते हैं कि यह आपकी परिभाषा पर निर्भर करता है। उनके अनुसार मन वह हिस्सा है, जो आपका नहीं है, यह दी गई वस्तु जैसा है। इस तरह मन का अर्थ है, वह जो बनाया गया है, जो समाज ने तुम्हारे भीतर भर दिया है, जबकि वह तुम नहीं हो। चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है, मन बस एक परिधि है, जिसे समाज द्वारा, तुम्हारी संस्कृति या शिक्षा द्वारा तुम्हारे आसपास एक परिधि के रूप में निर्मित किया गया है। मन का अर्थ संस्कार है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी क्रम में आचार्य रजनीश का कथन है कि तुम्हारे पास एक हिंदू मन हो सकता है, पर तुम्हारे पास एक हिंदू चेतना नहीं हो सकती। तुम्हारे पास एक ईसाई मन हो सकता है, पर तुम्हारे पास एक ईसाई चेतना नहीं हो सकती। चेतना एक होती है, वह बंट नहीं सकती। </p>
<p style="text-align:justify;">न्यूरोसाइंस के प्रयोगों (जैसे लिबेट का प्रयोग) से पता चलता है कि आपके निर्णय लेने से पहले ही आपका अवचेतन मन फैसला ले चुका होता है। आपको बस बाद में यह भ्रम होता है कि ‘यह फैसला मैंने लिया’। इसी तरह हमें लगता है कि हमारा ‘मैं’ या ‘अहंकार’ एक सिंगल इकाई है, लेकिन दिमाग के अलग-अलग हिस्से (यादें, भावनाएं, दृश्य) अलग-अलग काम करते हैं और अंत में एक कहानी बुनकर आपको ‘एक होने’ का अहसास कराते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिक यह तो समझ सकते हैं कि दिमाग के न्यूरॉन्स कैसे सिग्नल भेजते हैं, लेकिन भौतिक न्यूरॉन्स मिलकर एक ‘अंदरूनी जीवंत अनुभव’ या भावना (जैसे लाल रंग को देखकर कैसा महसूस होता है) कैसे पैदा करते हैं, यह आज भी विज्ञान के लिए एक अनसुलझा भ्रम है। इसके मुकाबले भारतीय दर्शन जैसे अद्वैत वेदांत और बौद्ध धर्म हजारों सालों से यह कहता चला आ रहा है कि मन और विचार लगातार बदलते रहते हैं, इसलिए वे स्थायी सत्य नहीं, बल्कि एक भ्रम (माया) हैं। सच्ची चेतना वह साक्षी है, जो इस पूरे भ्रम को बिना जुड़े हुए देखती है। भगवद्गीता और भारतीय दर्शन में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">नमिता त्रिपाठी, जबलपुर</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 09:00:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>एआई, क्वांटम विज्ञान और सनातन दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वर्तमान दर्शन के अनुसार मानव जीवन में अनंत काल से ही अपने अस्तित्व को लेकर जिज्ञासा रही है। जीवन का यह कौतूहल कि यह जीवन कहां से आया? इस जीवन के बाद क्या है और इसे बनाने वाला कौन है? यह प्रश्न मानव मस्तिष्क के परिष्कृत होने साथ ही सबसे पहले कौतूहल उसके बाद जिज्ञासा फिर आस्था, फिर दर्शन और उसके उपरांत विज्ञान के आविष्कार का कारण बना, परंतु आज आधुनिक विज्ञान की नित नई खोजों एवं नित नई टेक्नोलॉजी के विस्तार के बाद भी ‘मै कौन हूं’, ‘मेरा अस्तित्व क्या है’, ‘मरने के बाद हमारा क्या होता है’ तथा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586109/ai--quantum-science--and-sanatan-philosophy"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(45)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान दर्शन के अनुसार मानव जीवन में अनंत काल से ही अपने अस्तित्व को लेकर जिज्ञासा रही है। जीवन का यह कौतूहल कि यह जीवन कहां से आया? इस जीवन के बाद क्या है और इसे बनाने वाला कौन है? यह प्रश्न मानव मस्तिष्क के परिष्कृत होने साथ ही सबसे पहले कौतूहल उसके बाद जिज्ञासा फिर आस्था, फिर दर्शन और उसके उपरांत विज्ञान के आविष्कार का कारण बना, परंतु आज आधुनिक विज्ञान की नित नई खोजों एवं नित नई टेक्नोलॉजी के विस्तार के बाद भी ‘मै कौन हूं’, ‘मेरा अस्तित्व क्या है’, ‘मरने के बाद हमारा क्या होता है’ तथा ‘ईश्वर है कि नहीं’ और ‘अगर है, तो उसका स्वरूप क्या है’। ये प्रश्न आज भी जस के तस बने हुए हैं, आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी से अंतरिक्ष एवं चंद्रमा तक चहलकदमी के साथ-साथ आज मानव अनंत ब्रह्मांड की गहराइयों में जाकर विशाल गैलेक्सियों, उनमें स्थित अरबों विशाल तारों ग्रहों की खोजों, सूर्य एवं मंगल गृह के जारी अपने अभियानों से सुदूर अंतरिक्ष तक अपनी तकनीकी से पहुंच बना चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज मानव आधुनिक टेक्नोलॉजी से अनंत ब्रह्मांड की गहराइयों को तो नाप ही रहा है। साथ ही सूक्ष्म विज्ञान में भी नित नई खोजों के साथ सूक्ष्म परमाणु विज्ञान से लेकर आज क्वांटम भौतिकी के माध्यम से अति सूक्ष्म विज्ञान के क्षेत्र में भी काफी प्रगति कर चुका है, परंतु आज भी उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर से वह अभी काफी दूर है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन काल से ही मानव अस्तित्व एवं ईश्वर के अस्तित्व के इस यक्ष प्रश्न का उत्तर मानव समाज और सभ्यताएं खोजती रही है, उनमें से कई सभ्यताएं विस्मृत होकर काल के गाल में भी समा गईं। हजारों वर्षों के काल खंड कई सभ्यताएं स्थानांतरित होकर एक दूसरें में इतनी घुल मिल गईं कि उनकी पहचान और संस्कृति अपने प्राचीन मूल स्वरूप से काफी परिवर्तित हो गई है तथा समय के साथ ही बदलते-बदलते विभिन्न मानव सभ्यताएं आज के आधुनिक स्वरूप में स्थापित हुई है, परंतु आज भी आधुनिक विज्ञान की खोजों के साथ यह प्रश्न विशाल और विस्तृत होता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रसिद्ध दार्शनिक प्लूटो का यह कथन कि “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।” यह भी इन सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों और जिज्ञासाओं के फलस्वरूप हो रही प्रगति पर सटीक लगता हैं। वर्तमान समय के विज्ञान का मुख्य आधार दर्शन और इससे उत्पन्न जिज्ञासा से उपजे भौतिक विज्ञान, उसके बाद आधुनिक विज्ञान, टेक्नोलॉजी तथा जैसे-जैसे मानव को विचारों को मापने के लिए गणितीय गणनाओं की आवश्यकता पड़ी तथा प्रयोगात्मक विषयों की विशाल गणितीय गणनाएं मानव मस्तिष्क की क्षमता से  बाहर होने लगीं, तो उन गणनाओं की आवश्यकता की पूर्ति ने कंप्यूटर का आविष्कार किया। इसके उपरांत तीव्र गणना करने वाले सुपर कंप्यूटर तथा उससे भी आगे अत्यंत आधुनिक टेक्नोलॉजी ए आई और वर्तमान में क्वांटम भौतिकी से लेकर क्वांटम कंप्यूटर तक के सफर के कारण आज मानव समझ को अत्यंत सूक्ष्म स्तर तक अध्ययन करने का भी अवसर मिला है, जिसके फलस्वरूप विशाल ब्रह्मांडीय गणना के साथ-साथ पदार्थ की सूक्ष्म से सूक्ष्म गणना करना भी संभव हो गया है। क्वांटम </p>
<p style="text-align:justify;">एआई से भौतिक विज्ञान की क्षमता और अधिक बढ़ने की उमीद है। हाल में हुई खोजों ने आज यह साबित कर दिया है। आज आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी की अभूतपूर्व प्रगति  ने विज्ञान और भारतीय सनातन संस्कृति के अध्यात्म को काफी करीब ला दिया हैं। भारतीय शास्त्रों और मनीषियों द्वारा लिखे गए धर्म ग्रंथों में वर्णित ज्ञान को कपोल कल्पित कहने वाले आज उसकी सच्चाई को स्वीकारने लगे हैं। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर इस हेतु लंबी बहस छिड़ी रहती है। क्वांटम भौतिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति ने मानव को सूक्ष्म विज्ञान को समझने में सहायता की है, जहां एक ओर ईश्वर है कि नहीं, मैं कौन हूं से प्रारंभ हुई मानव जिज्ञासा को आज सूक्ष्मता से समझने के लिए अनेक दार्शनिकों के विचारों, वैज्ञानिकों की खोजों का विशेष योगदान है, जिनकी आज एक लंबी लिस्ट है, जिन्होंने आज हमें इस मुकाम पर लाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय सनातन संस्कृति का ज्ञान सत्य ज्ञान है और विज्ञान की खोज भी सत्य की खोज के लिए है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">मोहन सिंह बिष्ट,  पत्रकार</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 09:00:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>श्रद्धालुओं में आस्था का केंद्र मुक्तिनाथ धाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">नेपाल का मुस्तांग जिला इन दिनों मुख्यतः दो कारणों से सुर्खियों में है। एक, यहां के लंबे और ऊंचे पहाड़ के बड़े हिस्से में यूरेनियम सहित बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता और दूसरे हिंदू और बौद्ध समुदाय के आस्था का केंद्र मुक्तिनाथ धाम। बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता वाले पहाड़ के हिस्से को हासिल करने में भारत, चीन और अमेरिका में होड़ है, जबकि मुक्तिनाथ धाम में भारत के हजारों श्रद्धालुओं में दर्शन और गंडकी नदी से निकलने वाली पवित्र जलधारा में स्नान कर मोक्ष पाने की जद्दोजहद है। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/untitled-design-(43)5.jpg" alt="Untitled design (43)" width="1200" height="720" /></p>
<p style="text-align:justify;"><br />समुद्र तल से मुक्ति नाथ धाम की ऊंचाई चार हजार मीटर के आसपास</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586107/muktinath-dham-center-of-faith-among-devotees"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(44)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नेपाल का मुस्तांग जिला इन दिनों मुख्यतः दो कारणों से सुर्खियों में है। एक, यहां के लंबे और ऊंचे पहाड़ के बड़े हिस्से में यूरेनियम सहित बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता और दूसरे हिंदू और बौद्ध समुदाय के आस्था का केंद्र मुक्तिनाथ धाम। बेशकीमती धातुओं की उपलब्धता वाले पहाड़ के हिस्से को हासिल करने में भारत, चीन और अमेरिका में होड़ है, जबकि मुक्तिनाथ धाम में भारत के हजारों श्रद्धालुओं में दर्शन और गंडकी नदी से निकलने वाली पवित्र जलधारा में स्नान कर मोक्ष पाने की जद्दोजहद है। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/untitled-design-(43)5.jpg" alt="Untitled design (43)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;"><br />समुद्र तल से मुक्ति नाथ धाम की ऊंचाई चार हजार मीटर के आसपास है। मुक्तिनाथ मंदिर को स्थानीय लोग मोक्ष का द्वार कहते हैं। पहाड़ों पर बारिश तो आम बात है, तपती गर्मी के महीने में भी यहां का पानी बर्फ जैसा है और ठंडी दिसंबर जनवरी जैसी।</p>
<p style="text-align:justify;">पहाड़ों पर जहां कहीं भी हमारे देव स्थल है, जाहिर है वहां के रास्ते दुर्गम और डरावने होते हैं। नेपाल की धरती हिंदू धर्म की दृष्टि से देवधरा है। काठमांडू में स्थित बाबा पशुपतिनाथ का मंदिर सबसे सरल स्थल पर है। जहां पर शरीर को कष्ट दिए बिना आसानी से पहुंचा जा सकता है, जबकि सूपा देउराली हो, मनोकामना मंदिर हो या फिर मुक्तिनाथ मंदिर, यहां पहुंचना एक चैलेंज है, फिर भी श्रद्धालु यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकते। अनुमानतः प्रतिदिन सौ सवा सौ से अधिक भारतीय श्रद्धालु मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुंच रहे हैं। वह भी तब, जब यहां कड़ाके की ठंड के साथ आक्सीजन का भी जोखिम रहता है। <br />काठमांडू से उतर पश्चिम कोण पर  तिब्बत (चीन) अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित मस्तांग जिला एक स्वतंत्र शाही साम्राज्य था 18 वीं शताब्दी के अंत में यह साम्राज्य नेपाल के अधीन हो गया, लेकिन नेपाल के गोरखा राजाओं ने मस्तांग की स्वायत्तता बरकरार रखने दी मुस्तांग के अंतिम राजा जिग्मे दोरजे पलबर बिस्ता थे। 2008 में नेपाल के राजशाही मुक्त के बाद मुस्तांग की राजशाही आधिकारिक रूप से समाप्त कर दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">मुस्तांग के शिखर पर स्थित कोरला दर्रा वह अंतर्राष्ट्रीय सीमा है, जो नेपाल को चीन (तिब्बत) की सीमा से जोड़ता है। काठमांडू से मुस्तांग की दूरी साढ़े चार सौ किलोमीटर के करीब है। भारतीय श्रद्धालु भारत नेपाल सीमा के किसी भी अधीकृत बार्डर से जा सकते हैं। पोखरा एक ऐसा जंक्शन है, जहां से वाया जोमसोम मुक्तिनाथ मंदिर का रास्ता जाता है। नेपाल के श्रद्धालुओं को भी इसी मार्ग से वहां तक पहुंचना होता है।  उत्तर प्रदेश से लगने वाली नेपाल सीमा से मुक्तिनाथ पंहुचने के लिए सड़क मार्ग से 18 -20 घंटे का समय लगता है। </p>
<p style="text-align:justify;">जाहिर है सड़क मार्ग से लगातार इतनी लंबी यात्रा दुष्कर है, इसलिए श्रद्धालुओं को पोखरा में एक रात का विश्राम करना ही होता है। आते वक्त भी और जाते वक्त भी। काठमांडू और पोखरा से जोमसोम के लिए डोमेस्टिक फ्लाइटें भी हैं। पोखरा से जोमसोम के लिए टैक्सी और छोटी बसें हमेशा उपलब्ध रहती हैं। पोखरा से जोमसोम तक करीब 12 घंटे का समय लगता है। जोम सोम से रानी पोवा मुक्ति नाथ मंदिर के वेस तक पहुंचने में डेढ़ दो घंटे लगता है। यहां से मंदिर तक एक डेढ़ किलो मीटर पैदल चलना पड़ता है। अमूमन लोग मुक्तिनाथ मंदिर जाने से पहले जोमसोम में भी एक रात का विश्राम करते हैं और यही अच्छा होता है। </p>
<p style="text-align:justify;">खास बात यह है कि जिस तरह गंगटोक से नाथूला दर्रा तक जाने के लिए विशेष परमिट की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह जोमसोम से मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए अन्नपूर्णा कंजर्वेशन एरिया प्रोजेक्ट (एसीएपी) परमिट लेना अनिवार्य है। बिना इस परमिट के आगे की यात्रा संभव नहीं होती। यदि आप किसी होटल में ठहरे हैं, तो अधिकांश होटल प्रबंधन नेपाल टूरिज्म बोर्ड के माध्यम से यह परमिट बनवाने में आपकी मदद कर देते हैं। इससे आपका समय भी बचता है और अनावश्यक भागदौड़ से भी राहत मिलती है। वहीं यदि आप अपने निजी वाहन से यात्रा कर रहे हैं, तो यह पूरी प्रक्रिया आपको स्वयं पूरी करनी पड़ती है, जिसमें संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने जैसी औपचारिकताएं शामिल होती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">मेरा निजी अनुभव कहता है कि यदि आप चार, छह या उससे अधिक लोगों के समूह में यात्रा कर रहे हैं, तो नेपाल की स्थानीय टैक्सी किराए पर लेना अधिक सुविधाजनक और व्यावहारिक विकल्प है। इससे न केवल यात्रा आरामदायक हो जाती है, बल्कि रास्ते में पड़ने वाली पुलिस चौकियों, परमिट जांच और अन्य प्रशासनिक औपचारिकताओं की चिंता भी नहीं रहती। इन सभी प्रक्रियाओं का जिम्मा टैक्सी चालक स्वयं संभाल लेता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी है खास</h4>
<p style="text-align:justify;">मुक्तिनाथ मंदिर हिंदुओं के लिए आस्था का केंद्र है ही, बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए भी खास है। बौद्ध धर्म गुरुओं के अनुसार तिब्बती बौद्ध धर्म के संस्थापक गुरु रिनपोचे ने 12 वीं सदी में तिब्बत जाते समय यहां ध्यान किया था और यहीं पर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। सुदूर पहाड़ों पर स्थित इस मंदिर की प्राचीनता क्या है, इसका सटीक विवरण किसी को नहीं पता, हां पैगोडा शैली में निर्मित इस मंदिर का निर्माण 1815 वीं इसवी में होने की बात बताई जाती है। स्थानीय पुजारियों के अनुसार मंदिर का निर्माण नेपाल के तत्कालीन राजा राणा बहादुर शाह की पत्नी सुवर्ण प्रभा द्वारा कराया गया है। मंदिर के मुख्य परिसर में 108 गोमुख बने हुए हैं, जिसमें पवित्र गंडकी नदी की जलधाराएं निरंतर झरती रहती हैं। किंवदंती है कि इन जलधाराओं से स्नान कर श्रद्धालुओं के पाप धुलते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर के ठीक पीछे एक छोटा मंदिर हैं, जहां से चमत्कारिक रूप से जल का रिसाव और आग की लपटें निकलती है। हिंदू मान्यताओं में इसे ज्वाला देवी कहते हैं। बौद्ध धर्मावलंबी इसे आग जल और पृथ्वी का अद्भुत संगम मानते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या है मुक्तिनाथ मंदिर का महात्म्य </h4>
<p style="text-align:justify;">हिंदू धर्मावलंबियों के अनुसार यहां पर भगवान विष्णु ने जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से मुक्ति पाई थी। इस मंदिर के मुक्तिनाथ नामकरण के पीछे यही वजह बताई जाती है। भागवत पुराण में वर्णित है कि यह स्थान 108 शक्ति पीठों में से एक है। मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का मस्तक गिरा था। मंदिर के निकट स्थित काली गंडकी नदी को शालिग्राम का उद्गम स्थल कहा जाता है। शालिग्राम को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">- यशोदा श्रीवास्तव लेखक</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:22:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बोध कथा :  स्वयं को तराशना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक दिन उनका एक युवा शिष्य कीर्ति, जिससे सोमदेव बहुत स्नेह करते थे, अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया। उसने हाथ जोड़कर प्रार्थना की- “गुरुदेव! मैंने वर्षों आपसे मूर्तिकला सीखी है। मुझे धन का लोभ नहीं है, पर मेरी आत्मा यह जानने के लिए व्याकुल है कि आपकी सर्वश्रेष्ठ कृतियां, जिन्हें दुनिया कभी देख नहीं पाती, वो दिखती कैसी हैं? कृपया मुझे एक बार उस तहखाने में ले चलें।” सोमदेव ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा और कहा- “ठीक है, आज रात तुम्हारी यह इच्छा पूरी होगी।”</p>
<p style="text-align:justify;">रात के सन्नाटे में सोमदेव अपने शिष्य को लेकर तहखाने में उतरे। दीपक की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585635/inspirational-story--sculpting-oneself"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(15)17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक दिन उनका एक युवा शिष्य कीर्ति, जिससे सोमदेव बहुत स्नेह करते थे, अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया। उसने हाथ जोड़कर प्रार्थना की- “गुरुदेव! मैंने वर्षों आपसे मूर्तिकला सीखी है। मुझे धन का लोभ नहीं है, पर मेरी आत्मा यह जानने के लिए व्याकुल है कि आपकी सर्वश्रेष्ठ कृतियां, जिन्हें दुनिया कभी देख नहीं पाती, वो दिखती कैसी हैं? कृपया मुझे एक बार उस तहखाने में ले चलें।” सोमदेव ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा और कहा- “ठीक है, आज रात तुम्हारी यह इच्छा पूरी होगी।”</p>
<p style="text-align:justify;">रात के सन्नाटे में सोमदेव अपने शिष्य को लेकर तहखाने में उतरे। दीपक की मद्धम रोशनी में कीर्ति ने जो देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए। वहां कतार से पांच मूर्तियां रखी थीं, लेकिन वे मूर्तियां किसी देवी-देवता, राजा या अप्सरा की नहीं थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहली मूर्ति एक अत्यंत क्रूर, भयानक चेहरे वाले डाकू की थी, जिसकी आंखों में हिंसक चमक थी। वहीं दूसरी मूर्ति एक ऐसे व्यक्ति की थी, जो ईर्ष्या और जलन की आग में झुलस रहा था, उसके चेहरे पर विकृति थी। तीसरी मूर्ति एक लालची व्यापारी की थी, जो अपनी मुट्ठी में कुछ सिक्के भींचे हुए था और उसके चेहरे पर भय था। चौथी मूर्ति एक अहंकारी राजा की थी, जिसका सिर घमंड से तना हुआ था। कीर्ति हैरान रह गया। उसने डरते-डरते पूछा, “गुरुदेव! आप इतने महान कलाकार हैं। आप चाहें, तो सौंदर्य और दिव्यता की प्रतिमूर्तियां बना सकते हैं। फिर आपने अपने जीवन के बहुमूल्य व र्ष इन कुरूप, पापी और विकृत इंसानों की मूर्तियां बनाने में क्यों नष्ट कर दिए?” सोमदेव शांत रहे। उन्होंने आखिरी मूर्ति पर से कपड़ा हटाया। वह मूर्ति हूबहू सोमदेव की अपनी थी, जिसमें उनका चेहरा अत्यंत शांत, सौम्य और ध्यानमग्न दिखाई दे रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">सोमदेव ने कीर्ति के कंधे पर हाथ रखा और कहा- “पुत्र! लोग सोचते हैं कि मूर्तिकार केवल बाहर के पत्थरों को तराशता है, लेकिन वास्तव में, कला मेरे लिए स्वयं को तराशने का माध्यम है। जब मेरे भीतर किसी के प्रति क्रोध या हिंसा का विचार आया, तो मैंने उस क्रोध को अपने भीतर दबाने के बजाय पत्थर पर उतार दिया और वह डाकू बन गया। जब मुझे किसी की सफलता देखकर क्षणिक ईर्ष्या हुई, मैंने उसे पत्थर में ढाल दिया और वह विकृत चेहरा बन गया। जब मेरे भीतर संसार का लोभ जागा, तो मैंने उस लोभ को बाहर निकालकर लालची व्यापारी की मूर्ति बना दी और जब मुझे अपनी कला पर थोड़ा भी घमंड हुआ, तो मैंने उस अहंकार को घमंडी राजा के रूप में तराश कर खुद से अलग कर दिया।”</p>
<p style="text-align:justify;">सोमदेव ने अपनी खुद की शांत मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा- “इन सारी कमियों और विकारों को एक-एक करके अपने भीतर से निकालकर पत्थर में डाल देने के बाद, जो अंत में मेरे भीतर बचा, वह यह शांत स्वरूप है। यह तहखाना मेरी कला का संग्रह नहीं, मेरे भीतर के कचरे का कब्रिस्तान है।”</p>
<p style="text-align:justify;">कथा की सीख है कि हम अक्सर अपनी कमियों, अपने क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को छुपाने की कोशिश करते हैं या उन्हें दूसरों में ढूंढते हैं। सच्ची शिक्षा और आत्मसुधार यह है कि हम अपने भीतर के विकारों को पहचानें, उन्हें स्वीकार करें और उन्हें अपने व्यक्तित्व से इस तरह तराश कर बाहर निकाल दें कि अंत में केवल हमारी आत्मा का शुद्ध और शांत स्वरूप ही शेष बचे। दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं को तराशना ही जीवन की सबसे बड़ी शिल्पकला है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 09:00:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गर्भाधान संस्कार की प्रासंगिकता  </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585633/relevance-of-the--garbhadhan-sanskar---conception-ritual"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(14)17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने के लिए उसमें रंग भरे जाते हैं, उसी प्रकार व्यक्तित्व और चरित्र के समग्र विकास के लिए संस्कार आवश्यक हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">संस्कारों के माध्यम से मनुष्य का आंतरिक परिष्कार होता है और उसका पुनर्जन्म जैसा आध्यात्मिक उत्थान माना जाता है। गर्भ से लेकर मृत्यु तक जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण को संस्कारित करने के लिए हमारे ऋषियों ने विभिन्न संस्कारों की व्यवस्था की है। आज आधुनिक विज्ञान भी भारतीय संस्कार परंपरा के अनेक पक्षों को स्वीकार करने लगा है। कर्णवेध संस्कार के आधार पर विकसित एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर जैसी चिकित्सा पद्धतियां इसका उदाहरण हैं। पूर्वकाल में चूड़ाकरण संस्कार के अंतर्गत शिखा रखने की परंपरा भी शरीर की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी मानी जाती थी। किंतु पाश्चात्य प्रभाव के कारण संस्कारों के प्रति समाज की आस्था कमजोर हुई है और अनेक संस्कार लुप्तप्राय हो गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सोलह संस्कारों में गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है। दुर्भाग्य से आज यह लगभग विस्मृत हो चुका है। भारतीय संस्कृति में संतानोत्पत्ति को केवल भोग का विषय नहीं, बल्कि एक पवित्र यज्ञ माना गया है। गर्भाधान का उद्देश्य केवल संतान प्राप्ति नहीं, बल्कि श्रेष्ठ, गुणवान और संस्कारित संतति का निर्माण है। इसीलिए शास्त्रों में गर्भाधान के लिए विशेष नियम, संयम और आध्यात्मिक तैयारी का विधान किया गया है। प्राचीन परंपरा के अनुसार पति-पत्नी संतान के स्वरूप और गुणों का विचार करते हुए देवपूजन, जप, तप, संयम और प्रार्थना द्वारा स्वयं को मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से तैयार करते थे। वे अपने भीतर ओज, तेज और पवित्रता का विकास करते हुए शुभ मुहूर्त में गर्भाधान करते थे। यही आध्यात्मिक उपचार संस्कार कहलाता है। इसका उद्देश्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी श्रेष्ठ संतति का निर्माण करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां विवाह भी एक संस्कार माना गया है। यह केवल दांपत्य जीवन का आरंभ नहीं, बल्कि संयम, उत्तरदायित्व और धर्ममय जीवन का प्रवेश द्वार है। विवाह का उद्देश्य परिवार और समाज के लिए आदर्श संतति का निर्माण भी माना गया है। इसी कारण विवाह और गर्भाधान दोनों में समय, परिस्थिति और मानसिक स्थिति को महत्व दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री और पुरुष के शरीर तथा मन की स्वस्थता, पवित्रता और प्रसन्नता से ही श्रेष्ठ संतान उत्पन्न होती है। गर्भाधान के समय माता-पिता की मानसिक अवस्था का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। महर्षि चरक ने भी उल्लेख किया है कि गर्भाधान के समय माता-पिता के मन में जो भाव होते हैं, वे बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक बनते हैं। इसलिए उस समय धार्मिक, विद्वान, शूरवीर और सद्गुणी संतानों की कामना करते हुए वैसा ही चिंतन करने की प्रेरणा दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में गर्भाधान के लिए समय और काल का भी विशेष महत्व बताया गया है। ऋ तुकाल, नक्षत्र, तिथि तथा अन्य ज्योतिषीय परिस्थितियों का विचार करके गर्भाधान करने का विधान है। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि दंपति संयमित जीवन जीते हुए संतुलित मनः स्थिति में रहें। शास्त्रों ने दिन के समय गर्भाधान को अनुचित बताया तथा रात्रि के उपयुक्त समय को श्रेष्ठ माना है। गर्भावस्था में माता के आहार, विचार और व्यवहार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह विश्वास रहा है कि गर्भस्थ शिशु पर माता के वातावरण और चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ता है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय परंपरा में प्रह्लाद और अभिमन्यु के उदाहरण दिए जाते हैं, जिन्होंने गर्भावस्था में ही श्रेष्ठ संस्कार और ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए गर्भवती स्त्री को सत्संग, सद्ग्रंथों का अध्ययन, शुभ चिंतन और सकारात्मक वातावरण में रहने की सलाह दी गई है। संस्कारों का मूल उद्देश्य मनुष्य को संयमित, सदाचारी और आध्यात्मिक बनाना है। आज भोगवादी जीवनशैली और असंयम के कारण अनेक पारंपरिक संस्कार उपेक्षित हो गए हैं। परिणामस्वरूप जीवन में नैतिकता, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है। आवश्यकता इस बात की है कि संस्कारों के वास्तविक उद्देश्य को समझा जाए और उन्हें अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन के परिष्कार की प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे शास्त्र यह भी बताते हैं कि संतान की श्रेष्ठता संख्या में नहीं, गुणों में होती है। इतिहास में अनेक महान व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अकेले ही समाज और राष्ट्र को नई दिशा दी। भगवान श्रीराम, भीष्म आदि शंकराचार्य तथा प्रह्लाद जैसे महापुरुषों का महत्व उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनके गुण, चरित्र और आदर्शों के कारण है। संस्कारों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को उत्कृष्ट बनाना है। विशेष रूप से गर्भाधान संस्कार का मर्म यही है कि भावी पीढ़ी शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ बने।</p>
<h5 style="text-align:justify;">आचार्य प्रदीप द्विवेदी आध्यात्मिक लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 09:00:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहुत शुभ होती है वैजयंती की माला</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585631/the-vaijayanti-mala-is-considered-highly-auspicious"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(13)16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे, तो उन्हें रास्ते में देवराज इंद्र आते दिखाई दिए। </p>
<p style="text-align:justify;">महर्षि दुर्वासा ने उन्हें सर्वत्र विजय के लिए वैजयंती फूलों की माला दी। अहंकार बस इंद्र ने वैजयंती माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दी। ऐरावत हाथी ने वह माला अपने पैरों के नीचे कुचल दी। यह देख सुनकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र को श्री हीन होने का श्राप दे दिया। बाद में इंद्र को बहुत कष्ट उठाने पड़े और दुर्वासा ऋषि से माफी मांगनी पड़ी। कहते हैं, जो भी वैजयंती फूलों की माला पहनता है, उसके घर लक्ष्मी जी का निवास होता है, उसे हर जगह विजय मिलती है। वैजयंती के फूल लक्ष्मी जी को बहुत पसंद हैं। भगवान कृष्ण भी वैजयंती के फूलों की माला पहनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वैजयंती या केना एक बहुवर्षीय पौधा है। इसकी पत्ते केले की भांति चिकने,हरे या ताम्र रंग के या चित्तीदार, पीली धारियों वाले होते हैं। फूल असंगत, विचित्र आकार के  चमकीले होते हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगते हैं। पुष्प भड़कीले व कई रंग में सामूहिक रूप से खिलते हैं। यह नम स्थानों, झील, तालाब और झरनों के किनारे बहुलता से पाया जाता है। मुख्यतया इसको उद्यानों एवं बागों अर्द्ध-छायादार स्थानों में लगाया जाता है। फूल के बाह्य दल हरे या ताम्र रंग के तथा पंखुड़ियां, बाह्य दल की तरह हरी अथवा रंगीन होती हैं। फूल के रंगीन भाग को स्टॉमिनाडिया कहते हैं, पुंकेसर स्टॉमिनाडिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पुष्प का अलंकृत भाग होता है। केना की लगभग 50 जातियां, प्राय: उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्ण देशों में पाई जाती हैं, जिनमें वैजयंती प्रमुख है। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके कड़े व काले बंदूक की गोली समान बीज के कारण इसे साधारणतया ‘इंडियन शॉट’ कहते हैं। संस्कृत में देवकिली, कृष्णातामारासर्वज्दया, सर्वाजया, काला फूल (बंगाली), देवकली (मराठी), हुदिंगाना (कन्नड़), काल्वालाई, पुवालाई (तमिल), कृष्णातमाय (तेलुगु) तथा काटुवाला मलयालम में कहते हैं। इसका वनस्पतिक नाम केना इंडिका है, जो एक बीजपत्री कुल-केनेसी में आता है। यह एक बहुवर्षीय शाक पात है।</p>
<p style="text-align:justify;">जड़ें प्रकंदीय, 2.5 मी. तक लंबी, तना गोलाकार, मांसल, चिकना, पत्तियां आयताकार, ऊपरी छोर पतला तथा निशिताय: पुष्प-युग्म शीर्षस्थ, छोटा: पुष्य सहपत्र चक्राकार, पुष्प पतला तथा उच्छीर्ण, दल लगभग 4 सेमी. लंबे, ऊपरी स्टॉमिनाडिया, गहरा लाल, लगभग पांच सेमी. लंबा होता है। वर्तमान में वैजयंती की जो जातियां उद्यान, पुष्प-प्रेमियों के मध्य पाई जाती हैं। वह केना इंडिका, केना पलासिड, केना इरिडिफ्लोरा, केना ग्लाउको तथा केना वासीविस्जी के संस्करण से उत्पन्न हुई हैं। संकर प्रजातियों के पुण्य बड़े, विभिन्न आकार एवं रंग के होते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">सामान्यता पुष्प वर्ष भर आते हैं, लेकिन जनवरी से अप्रैल तक अधिक फूल आते हैं। पौध को लगाने के लिए प्रकंद यानी जड़ के टुकड़ों द्वारा जुलाई में रोपण करते हैं। बीज द्वारा रोपण के लिए बीज को गर्म पानी या गोबर की खाद में 3-4 दिनों तक भिगो देते हैं, कड़े छिलके मुलायम हो जाते हैं। उसके बाद चाकू से बीज के ऊपर पतला लंबा चीरा लगाकर मिट्टी में रोपित करने से पौधे अंकुरित हो जाते हैं। वैजयंती के फूलों की सुंदरता दुनियाभर में विख्यात है। सुंदर फूलों के अलावा वैजयंती के पौधे से अनेक लाभ लिए जा सकते हैं। इसके तने के रेशे से सुतली तथा बोरा अथवा थैला बनाया जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिवचरण चौहान, लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 12:00:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585554/the-glorious-cultural-tradition-of-ayodhya"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(14)16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सदियों से सनातन का केंद्र रही अयोध्या को नई पहचान सवा सौ साल पहले मिली, जब अंग्रेजी हुकूमत में साल 1902 में अंग्रेजों ने एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया। सभा ने बड़ा दुरूह कार्य किया। अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े स्थलों की खोज शुरू की। अयोध्या और उसके आसपास चार जिलों में फैले तीर्थ स्थलों को खोजा। उन पर प्रस्तर शिलालेख लगवाए। बहुत से ऐसे भी स्थल होंगे, जहां तक सभा की दृष्टि नहीं पहुंची और उन पर प्रस्तर शिला लेख नहीं लग पाए। सभा ने अयोध्या के 148 प्राचीन और ऐतिहासिक स्थलों को चिह्नित किया था। इन्हें अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा के तहत माना जाता है। बताते हैं कि इन स्थलों की खोज के लिए कई धार्मिक ग्रंथों का भी सहारा लिया गया था। ये 148 वह स्थान हैं, जिनकी पहचान आर्ष ग्रंथों में बताई गई है। तीन अन्य ऐसे स्थल तो अब भी हैं, जो उसी काल के हैं, लेकिन इन पर प्रस्तर शिलालेख नहीं लग पाए थे। त्रेतायुग में इन स्थल की महिमा, गरिमा और भव्यता आज से ज्यादा रही है। इन स्थलों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। केंद्र और प्रदेश की सरकार इसके लिए प्रयासरत है। प्रदेश सरकार से त्रेतायुग जैसी अयोध्या बनाने के लिए कार्य चल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">श्रीराम जानकी मंदिर के महंत सत्येंद्र दास वेदांती बताते है कि मुगल काल में जब हिंदुओं की आस्था से जुड़े स्थलों के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद जब अंग्रेजों की सत्ता आई, तो लोगों के प्रयास से तत्कालीन सरकार के प्रशासकों से एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया गया। इसे पुनः जीवित करने का कार्य किया गया। वर्तमान सरकार इन सभी स्थलों का जीर्णोद्धार करा रही है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ऐतिहासिक स्थल</h4>
<p style="text-align:justify;">अयोध्या के सांस्कृतिक सीमा 84 कोसी परिक्रमा के तहत 148 धार्मिक स्थानों को चिह्नित किया गया। इसमें श्रीराम जन्मभूमि के साथ लोमश मुनि, सीताकूप, सुमित्रा भवन, कैकयी भवन, रत्नमंडप, श्रीराम दुर्ग, हनुमानगढ़ी, रामसभा, दंतधावन कुंड, सुग्रीव किला, क्षीरसागर, क्षीरेश्वर नाथ, रुक्मणि कुंड, अंगद टीला, कुबेर टीला, वशिष्ठ कुंड, वामदेव आश्रम, सागर कुंड, गवाक्ष, दधि मुख, दुर्गेश्वर, शतवलि, गंधमादन, ऋषभ, शरभ, पनस, विभीषण मंदिर, विभीषण कुंड, सरमाजी, विघ्नेश, पिंडारक, मत्तगयंद, द्विविद, सप्तसागर, मैन्द, जामवंत किला, केशरी किशोर मंदिर, प्रमोदवन, रामघाट, सुग्रीव कुंड, हनुमान कुंड, स्वर्ण खनि कुंड, यज्ञवेदि, सरयू तिलोदकी संगम, सीताकुंड, अग्नि कुंड, विद्या कुंड, खरजू कुंड, मणि पर्वत, गणेश कुंड, दशरथ कुंड, कौशल्या कुंड, सुमित्रा कुंड, भरत कुंड, दुरर्सर, महाभरसर, बृहस्पति कुंड, धनयक्ष कुंड, उर्वशी कुंड, चुटकी देवी, विष्णु हरि, चक्रतीर्थ, ब्रम्हा कुंड, सुमित्रा घाट, कौशल्या घाट, कैकयी घाट, ऋणमोचन घाट, पापमोचन घाट, सहस्त्र धारा घाट, स्वर्गद्वार, चंद्र हरि, नागेश्वर नाथ, धर्महारि, जानकी घाट, वैतरणी, सूर्यकुंड, नर कुंड, नारायण कुंड, रति कुंड, कुसुमायुध कुंड, दुर्गा कुंड, गिरिजा कुंड, मंत्रेश्वर, सरोवर, शीतलादेवी, निर्मला कुंड, गुप्तार घाट, गुप्तहरि, चक्रहरि, यमस्थल, विघ्नेश्वर महादेव, योगिनी कुंड, शक्र कुंड, बंदी कुंड, मनोरमा, मखस्थान, रामरेखा, श्रृंगीऋषि, वाल्मीकि, विल्वहरिघाट, त्रिपुरारी, पुण्यहरि, राम कुंड, दुग्धेश्वर, भैरव कुंड, तमसा नदी, मांडव्याश्रम, श्रवण आश्रम, पाराशराश्रम, च्यवनाश्रम, गौतमाश्रम, पिशाचमोचन, मानस तीर्थ, गया कुंड, नंदीग्राम, कालिका देवी जटा कुंड, शत्रुघ्न कुंड, अजित कुंड, रमणकाश्रम, घृताची कुंड, सरयू घाघरा संगम, वराह क्षेत्र, जंबूतीर्थ, अगस्त्य, तुंडिलजी, गोकुलातीर्थ श्री कुंड, लक्ष्मी, स्वप्नेश्वरी, कुटिला वरस्रोत संगम, सरयू कुटिला संगम तीर्थ स्थल हैं। वर्तमान में इनमें से कई स्थल तो विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने के कगार पर हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">प्रस्तुति- सत्यप्रकाश, अयोध्या</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 18:17:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>क्यों वर्जित है सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि झाड़ू के उपयोग और उसके रख-रखाव से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। वास्तु के अनुसार घर की सफाई हमेशा मुख्य द्वार से शुरू करनी चाहिए और धीरे-धीरे घर के अंदरूनी हिस्सों की ओर बढ़ना चाहिए। मान्यता है कि मुख्य द्वार से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, इसलिए वहीं से सफाई आरंभ करना शुभ माना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584858/why-is-sweeping-after-sunset-prohibited"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(2)11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि झाड़ू के उपयोग और उसके रख-रखाव से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। वास्तु के अनुसार घर की सफाई हमेशा मुख्य द्वार से शुरू करनी चाहिए और धीरे-धीरे घर के अंदरूनी हिस्सों की ओर बढ़ना चाहिए। मान्यता है कि मुख्य द्वार से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, इसलिए वहीं से सफाई आरंभ करना शुभ माना जाता है। इसके विपरीत, घर के अंदर से बाहर की ओर झाड़ू लगाने को उचित नहीं माना जाता, क्योंकि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि बाहर चली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">झाड़ू लगाने के लिए सुबह का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त में की गई सफाई घर में शुद्धता और सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। वहीं सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि किसी कारणवश शाम के समय सफाई करनी पड़े, तो उस समय घर का कचरा बाहर नहीं फेंकना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इससे आर्थिक नुकसान और धन संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सफाई के बाद कचरे को लंबे समय तक घर में जमा करके रखना भी शुभ नहीं माना जाता। कचरे को समय पर बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि गंदगी और अव्यवस्था नकारात्मकता को बढ़ावा देती हैं। वास्तु शास्त्र झाड़ू के सम्मान पर भी विशेष बल देता है। झाड़ू को कभी पैर नहीं लगाना चाहिए और न ही उसे खुले स्थान पर खड़ा रखना चाहिए। इसे हमेशा ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां बाहरी लोगों की नजर आसानी से न पड़े। इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि सुरक्षित बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">नई झाड़ू का उपयोग शुरू करने के लिए शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन नई झाड़ू घर में लाने और उसका प्रयोग करने से आर्थिक स्थिरता तथा सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। हालांकि ये मान्यताएं धार्मिक और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित हैं, फिर भी इनका मूल उद्देश्य घर में स्वच्छता, अनुशासन और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना है, जो किसी भी परिवार के सुखी जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 12:00:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरक कथा :  विषयों में दुर्गंध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।</p>
<p style="text-align:justify;">घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584857/inspirational-story--the-stink-in-the-subjects"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(1)10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।</p>
<p style="text-align:justify;">घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच गए और वहा एक पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए। पास के घरों में चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था, तो कहीं नया चमड़ा सिद्ध किया जा रहा था। हर घर में चमड़ा था और उसमें से बडी दुर्गंध आ रही थी। वायु प्रवाह भी उधर ही था। दुर्गंध के मारे राजा की नाक फटने लगी। </p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने महात्माजी से कहा, “भगवन! दुर्गंध के कारण खड़ा नहीं रहा जाता, कृपया यहां से चलें।” महात्माजी बोले, “तुम्हीं को दुर्गंध आती है? देखो आसपास के घरों की ओर, कितने पुरुष, स्त्रियां और बाल-बच्चे हैं। कोई कार्य कर रहें हैं, कोई खा-पी रहे हैं, सब हंस-खेल रहे हैं। किसी को तो दुर्गंध नहीं आती, मात्र तुम्हीं को दुर्गंध आ रही है।” राजा ने कहा, “भगवन! चमड़े से कमाते-कमाते तथा चमड़े में रहते-रहते इनका अभ्यास हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनकी नाक ही ऐसी हो गई है कि इन्हें चमड़े की दुर्गंध नहीं आती, परंतु मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हूं। अतः शीघ्र चलें, अब तो एक क्षण भी यहां नहीं ठहरा जाता।” महात्मा ने हंसकर कहा, “राजन, यही दशा तुम्हारे राज प्रासाद की भी है। विषय भोगों में रहते-रहते तुम्हें उनमें दुर्गंध नहीं आती है, तुम्हें अभ्यास हो गया है, परंतु मुझको तो ये सांसारिक विषय भोग देखते ही उल्टी-सी आती है। इसी से मैं तुम्हारे घर नहीं जाता था।” राजा ने रहस्य समझ लिया था, जो महात्मा हंसकर राजा को साथ लिए वहां से चल दिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />प्रमोद श्रीवास्तव</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:00:16 +0530</pubDate>
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