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                <title>अंतस - Amrit Vichar</title>
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                <title>गर्भाधान संस्कार की प्रासंगिकता  </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585633/relevance-of-the--garbhadhan-sanskar---conception-ritual"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(14)17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सामान्य अर्थ में संस्कार का अर्थ है निखारना, जिस क्रिया के द्वारा किसी वस्तु के दोष, मैल और अशुद्धि को दूर करके उसमें गुणों का आधान किया जाए, उसे संस्कार कहा जाता है। जैसे सुनार सोने को तपाकर और शुद्ध करके कुंदन बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए संस्कारों की व्यवस्था की गई है। हमारे ग्रंथों में 16 तथा 48 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। संस्कार निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, सदाचार और देवत्व का विकास करता है। जिस प्रकार सुंदर चित्र को पूर्णता प्रदान करने के लिए उसमें रंग भरे जाते हैं, उसी प्रकार व्यक्तित्व और चरित्र के समग्र विकास के लिए संस्कार आवश्यक हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">संस्कारों के माध्यम से मनुष्य का आंतरिक परिष्कार होता है और उसका पुनर्जन्म जैसा आध्यात्मिक उत्थान माना जाता है। गर्भ से लेकर मृत्यु तक जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण को संस्कारित करने के लिए हमारे ऋषियों ने विभिन्न संस्कारों की व्यवस्था की है। आज आधुनिक विज्ञान भी भारतीय संस्कार परंपरा के अनेक पक्षों को स्वीकार करने लगा है। कर्णवेध संस्कार के आधार पर विकसित एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर जैसी चिकित्सा पद्धतियां इसका उदाहरण हैं। पूर्वकाल में चूड़ाकरण संस्कार के अंतर्गत शिखा रखने की परंपरा भी शरीर की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी मानी जाती थी। किंतु पाश्चात्य प्रभाव के कारण संस्कारों के प्रति समाज की आस्था कमजोर हुई है और अनेक संस्कार लुप्तप्राय हो गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सोलह संस्कारों में गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है। दुर्भाग्य से आज यह लगभग विस्मृत हो चुका है। भारतीय संस्कृति में संतानोत्पत्ति को केवल भोग का विषय नहीं, बल्कि एक पवित्र यज्ञ माना गया है। गर्भाधान का उद्देश्य केवल संतान प्राप्ति नहीं, बल्कि श्रेष्ठ, गुणवान और संस्कारित संतति का निर्माण है। इसीलिए शास्त्रों में गर्भाधान के लिए विशेष नियम, संयम और आध्यात्मिक तैयारी का विधान किया गया है। प्राचीन परंपरा के अनुसार पति-पत्नी संतान के स्वरूप और गुणों का विचार करते हुए देवपूजन, जप, तप, संयम और प्रार्थना द्वारा स्वयं को मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से तैयार करते थे। वे अपने भीतर ओज, तेज और पवित्रता का विकास करते हुए शुभ मुहूर्त में गर्भाधान करते थे। यही आध्यात्मिक उपचार संस्कार कहलाता है। इसका उद्देश्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी श्रेष्ठ संतति का निर्माण करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे यहां विवाह भी एक संस्कार माना गया है। यह केवल दांपत्य जीवन का आरंभ नहीं, बल्कि संयम, उत्तरदायित्व और धर्ममय जीवन का प्रवेश द्वार है। विवाह का उद्देश्य परिवार और समाज के लिए आदर्श संतति का निर्माण भी माना गया है। इसी कारण विवाह और गर्भाधान दोनों में समय, परिस्थिति और मानसिक स्थिति को महत्व दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री और पुरुष के शरीर तथा मन की स्वस्थता, पवित्रता और प्रसन्नता से ही श्रेष्ठ संतान उत्पन्न होती है। गर्भाधान के समय माता-पिता की मानसिक अवस्था का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। महर्षि चरक ने भी उल्लेख किया है कि गर्भाधान के समय माता-पिता के मन में जो भाव होते हैं, वे बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक बनते हैं। इसलिए उस समय धार्मिक, विद्वान, शूरवीर और सद्गुणी संतानों की कामना करते हुए वैसा ही चिंतन करने की प्रेरणा दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्रों में गर्भाधान के लिए समय और काल का भी विशेष महत्व बताया गया है। ऋ तुकाल, नक्षत्र, तिथि तथा अन्य ज्योतिषीय परिस्थितियों का विचार करके गर्भाधान करने का विधान है। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि दंपति संयमित जीवन जीते हुए संतुलित मनः स्थिति में रहें। शास्त्रों ने दिन के समय गर्भाधान को अनुचित बताया तथा रात्रि के उपयुक्त समय को श्रेष्ठ माना है। गर्भावस्था में माता के आहार, विचार और व्यवहार को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह विश्वास रहा है कि गर्भस्थ शिशु पर माता के वातावरण और चिंतन का गहरा प्रभाव पड़ता है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय परंपरा में प्रह्लाद और अभिमन्यु के उदाहरण दिए जाते हैं, जिन्होंने गर्भावस्था में ही श्रेष्ठ संस्कार और ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए गर्भवती स्त्री को सत्संग, सद्ग्रंथों का अध्ययन, शुभ चिंतन और सकारात्मक वातावरण में रहने की सलाह दी गई है। संस्कारों का मूल उद्देश्य मनुष्य को संयमित, सदाचारी और आध्यात्मिक बनाना है। आज भोगवादी जीवनशैली और असंयम के कारण अनेक पारंपरिक संस्कार उपेक्षित हो गए हैं। परिणामस्वरूप जीवन में नैतिकता, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है। आवश्यकता इस बात की है कि संस्कारों के वास्तविक उद्देश्य को समझा जाए और उन्हें अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन के परिष्कार की प्रक्रिया के रूप में देखा जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे शास्त्र यह भी बताते हैं कि संतान की श्रेष्ठता संख्या में नहीं, गुणों में होती है। इतिहास में अनेक महान व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अकेले ही समाज और राष्ट्र को नई दिशा दी। भगवान श्रीराम, भीष्म आदि शंकराचार्य तथा प्रह्लाद जैसे महापुरुषों का महत्व उनकी संख्या नहीं, बल्कि उनके गुण, चरित्र और आदर्शों के कारण है। संस्कारों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को उत्कृष्ट बनाना है। विशेष रूप से गर्भाधान संस्कार का मर्म यही है कि भावी पीढ़ी शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ बने।</p>
<h5 style="text-align:justify;">आचार्य प्रदीप द्विवेदी आध्यात्मिक लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 09:00:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>बहुत शुभ होती है वैजयंती की माला</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585631/the-vaijayanti-mala-is-considered-highly-auspicious"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(13)16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदू देवताओं में वैजयंती के फूल भगवान विष्णु को बहुत पसंद हैं। शंख चक्र, गदा और पद्म के साथ वह गले में वैजयंती फूलों की माला भी पहनते हैं। विष्णु के अवतारों को भी वैजयंती की माला पसंद है। वैजयंती यानी विजय दिलाने वाला पुष्प। किसी ने लिखा है- मोर मुकुट, कटि काछनी, गल वैजयंती माल।। /यो वानक मो मन बस्यो सदा बिहारी लाल।। वैजयंती के सुगंधित फूलों की माला बनती ही इतनी खूबसूरत है कि पहनने वाले के तन से मोहक सुगंध आने लगती है। पुराणों में कथा आती है कि एक बार महर्षि दुर्वासा कहीं जा रहे थे, तो उन्हें रास्ते में देवराज इंद्र आते दिखाई दिए। </p>
<p style="text-align:justify;">महर्षि दुर्वासा ने उन्हें सर्वत्र विजय के लिए वैजयंती फूलों की माला दी। अहंकार बस इंद्र ने वैजयंती माला अपने हाथी ऐरावत के मस्तक पर डाल दी। ऐरावत हाथी ने वह माला अपने पैरों के नीचे कुचल दी। यह देख सुनकर महर्षि दुर्वासा क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र को श्री हीन होने का श्राप दे दिया। बाद में इंद्र को बहुत कष्ट उठाने पड़े और दुर्वासा ऋषि से माफी मांगनी पड़ी। कहते हैं, जो भी वैजयंती फूलों की माला पहनता है, उसके घर लक्ष्मी जी का निवास होता है, उसे हर जगह विजय मिलती है। वैजयंती के फूल लक्ष्मी जी को बहुत पसंद हैं। भगवान कृष्ण भी वैजयंती के फूलों की माला पहनते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वैजयंती या केना एक बहुवर्षीय पौधा है। इसकी पत्ते केले की भांति चिकने,हरे या ताम्र रंग के या चित्तीदार, पीली धारियों वाले होते हैं। फूल असंगत, विचित्र आकार के  चमकीले होते हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगते हैं। पुष्प भड़कीले व कई रंग में सामूहिक रूप से खिलते हैं। यह नम स्थानों, झील, तालाब और झरनों के किनारे बहुलता से पाया जाता है। मुख्यतया इसको उद्यानों एवं बागों अर्द्ध-छायादार स्थानों में लगाया जाता है। फूल के बाह्य दल हरे या ताम्र रंग के तथा पंखुड़ियां, बाह्य दल की तरह हरी अथवा रंगीन होती हैं। फूल के रंगीन भाग को स्टॉमिनाडिया कहते हैं, पुंकेसर स्टॉमिनाडिया का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पुष्प का अलंकृत भाग होता है। केना की लगभग 50 जातियां, प्राय: उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्ण देशों में पाई जाती हैं, जिनमें वैजयंती प्रमुख है। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके कड़े व काले बंदूक की गोली समान बीज के कारण इसे साधारणतया ‘इंडियन शॉट’ कहते हैं। संस्कृत में देवकिली, कृष्णातामारासर्वज्दया, सर्वाजया, काला फूल (बंगाली), देवकली (मराठी), हुदिंगाना (कन्नड़), काल्वालाई, पुवालाई (तमिल), कृष्णातमाय (तेलुगु) तथा काटुवाला मलयालम में कहते हैं। इसका वनस्पतिक नाम केना इंडिका है, जो एक बीजपत्री कुल-केनेसी में आता है। यह एक बहुवर्षीय शाक पात है।</p>
<p style="text-align:justify;">जड़ें प्रकंदीय, 2.5 मी. तक लंबी, तना गोलाकार, मांसल, चिकना, पत्तियां आयताकार, ऊपरी छोर पतला तथा निशिताय: पुष्प-युग्म शीर्षस्थ, छोटा: पुष्य सहपत्र चक्राकार, पुष्प पतला तथा उच्छीर्ण, दल लगभग 4 सेमी. लंबे, ऊपरी स्टॉमिनाडिया, गहरा लाल, लगभग पांच सेमी. लंबा होता है। वर्तमान में वैजयंती की जो जातियां उद्यान, पुष्प-प्रेमियों के मध्य पाई जाती हैं। वह केना इंडिका, केना पलासिड, केना इरिडिफ्लोरा, केना ग्लाउको तथा केना वासीविस्जी के संस्करण से उत्पन्न हुई हैं। संकर प्रजातियों के पुण्य बड़े, विभिन्न आकार एवं रंग के होते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">सामान्यता पुष्प वर्ष भर आते हैं, लेकिन जनवरी से अप्रैल तक अधिक फूल आते हैं। पौध को लगाने के लिए प्रकंद यानी जड़ के टुकड़ों द्वारा जुलाई में रोपण करते हैं। बीज द्वारा रोपण के लिए बीज को गर्म पानी या गोबर की खाद में 3-4 दिनों तक भिगो देते हैं, कड़े छिलके मुलायम हो जाते हैं। उसके बाद चाकू से बीज के ऊपर पतला लंबा चीरा लगाकर मिट्टी में रोपित करने से पौधे अंकुरित हो जाते हैं। वैजयंती के फूलों की सुंदरता दुनियाभर में विख्यात है। सुंदर फूलों के अलावा वैजयंती के पौधे से अनेक लाभ लिए जा सकते हैं। इसके तने के रेशे से सुतली तथा बोरा अथवा थैला बनाया जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">शिवचरण चौहान, लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 12:00:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585554/the-glorious-cultural-tradition-of-ayodhya"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(14)16.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अयोध्या केवल भगवान श्रीराम की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता का जीवंत केंद्र भी रही है। सदियों के उतार-चढ़ाव और ऐतिहासिक परिवर्तनों के बीच इसकी अनेक प्राचीन धरोहरें समय की धूल में ओझल होती चली गईं। वर्ष 1902 में गठित एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा ने इन विरासत स्थलों की खोज कर उन्हें नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। सभा द्वारा चिह्नित 148 तीर्थ स्थल आज भी अयोध्या की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के साक्षी हैं। अब इन प्राचीन स्थलों के पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयास अयोध्या को उसके त्रेतायुगीन वैभव से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सदियों से सनातन का केंद्र रही अयोध्या को नई पहचान सवा सौ साल पहले मिली, जब अंग्रेजी हुकूमत में साल 1902 में अंग्रेजों ने एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया। सभा ने बड़ा दुरूह कार्य किया। अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े स्थलों की खोज शुरू की। अयोध्या और उसके आसपास चार जिलों में फैले तीर्थ स्थलों को खोजा। उन पर प्रस्तर शिलालेख लगवाए। बहुत से ऐसे भी स्थल होंगे, जहां तक सभा की दृष्टि नहीं पहुंची और उन पर प्रस्तर शिला लेख नहीं लग पाए। सभा ने अयोध्या के 148 प्राचीन और ऐतिहासिक स्थलों को चिह्नित किया था। इन्हें अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा के तहत माना जाता है। बताते हैं कि इन स्थलों की खोज के लिए कई धार्मिक ग्रंथों का भी सहारा लिया गया था। ये 148 वह स्थान हैं, जिनकी पहचान आर्ष ग्रंथों में बताई गई है। तीन अन्य ऐसे स्थल तो अब भी हैं, जो उसी काल के हैं, लेकिन इन पर प्रस्तर शिलालेख नहीं लग पाए थे। त्रेतायुग में इन स्थल की महिमा, गरिमा और भव्यता आज से ज्यादा रही है। इन स्थलों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। केंद्र और प्रदेश की सरकार इसके लिए प्रयासरत है। प्रदेश सरकार से त्रेतायुग जैसी अयोध्या बनाने के लिए कार्य चल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">श्रीराम जानकी मंदिर के महंत सत्येंद्र दास वेदांती बताते है कि मुगल काल में जब हिंदुओं की आस्था से जुड़े स्थलों के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद जब अंग्रेजों की सत्ता आई, तो लोगों के प्रयास से तत्कालीन सरकार के प्रशासकों से एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया गया। इसे पुनः जीवित करने का कार्य किया गया। वर्तमान सरकार इन सभी स्थलों का जीर्णोद्धार करा रही है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ऐतिहासिक स्थल</h4>
<p style="text-align:justify;">अयोध्या के सांस्कृतिक सीमा 84 कोसी परिक्रमा के तहत 148 धार्मिक स्थानों को चिह्नित किया गया। इसमें श्रीराम जन्मभूमि के साथ लोमश मुनि, सीताकूप, सुमित्रा भवन, कैकयी भवन, रत्नमंडप, श्रीराम दुर्ग, हनुमानगढ़ी, रामसभा, दंतधावन कुंड, सुग्रीव किला, क्षीरसागर, क्षीरेश्वर नाथ, रुक्मणि कुंड, अंगद टीला, कुबेर टीला, वशिष्ठ कुंड, वामदेव आश्रम, सागर कुंड, गवाक्ष, दधि मुख, दुर्गेश्वर, शतवलि, गंधमादन, ऋषभ, शरभ, पनस, विभीषण मंदिर, विभीषण कुंड, सरमाजी, विघ्नेश, पिंडारक, मत्तगयंद, द्विविद, सप्तसागर, मैन्द, जामवंत किला, केशरी किशोर मंदिर, प्रमोदवन, रामघाट, सुग्रीव कुंड, हनुमान कुंड, स्वर्ण खनि कुंड, यज्ञवेदि, सरयू तिलोदकी संगम, सीताकुंड, अग्नि कुंड, विद्या कुंड, खरजू कुंड, मणि पर्वत, गणेश कुंड, दशरथ कुंड, कौशल्या कुंड, सुमित्रा कुंड, भरत कुंड, दुरर्सर, महाभरसर, बृहस्पति कुंड, धनयक्ष कुंड, उर्वशी कुंड, चुटकी देवी, विष्णु हरि, चक्रतीर्थ, ब्रम्हा कुंड, सुमित्रा घाट, कौशल्या घाट, कैकयी घाट, ऋणमोचन घाट, पापमोचन घाट, सहस्त्र धारा घाट, स्वर्गद्वार, चंद्र हरि, नागेश्वर नाथ, धर्महारि, जानकी घाट, वैतरणी, सूर्यकुंड, नर कुंड, नारायण कुंड, रति कुंड, कुसुमायुध कुंड, दुर्गा कुंड, गिरिजा कुंड, मंत्रेश्वर, सरोवर, शीतलादेवी, निर्मला कुंड, गुप्तार घाट, गुप्तहरि, चक्रहरि, यमस्थल, विघ्नेश्वर महादेव, योगिनी कुंड, शक्र कुंड, बंदी कुंड, मनोरमा, मखस्थान, रामरेखा, श्रृंगीऋषि, वाल्मीकि, विल्वहरिघाट, त्रिपुरारी, पुण्यहरि, राम कुंड, दुग्धेश्वर, भैरव कुंड, तमसा नदी, मांडव्याश्रम, श्रवण आश्रम, पाराशराश्रम, च्यवनाश्रम, गौतमाश्रम, पिशाचमोचन, मानस तीर्थ, गया कुंड, नंदीग्राम, कालिका देवी जटा कुंड, शत्रुघ्न कुंड, अजित कुंड, रमणकाश्रम, घृताची कुंड, सरयू घाघरा संगम, वराह क्षेत्र, जंबूतीर्थ, अगस्त्य, तुंडिलजी, गोकुलातीर्थ श्री कुंड, लक्ष्मी, स्वप्नेश्वरी, कुटिला वरस्रोत संगम, सरयू कुटिला संगम तीर्थ स्थल हैं। वर्तमान में इनमें से कई स्थल तो विलुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्त होने के कगार पर हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">प्रस्तुति- सत्यप्रकाश, अयोध्या</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 18:17:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>क्यों वर्जित है सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि झाड़ू के उपयोग और उसके रख-रखाव से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। वास्तु के अनुसार घर की सफाई हमेशा मुख्य द्वार से शुरू करनी चाहिए और धीरे-धीरे घर के अंदरूनी हिस्सों की ओर बढ़ना चाहिए। मान्यता है कि मुख्य द्वार से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, इसलिए वहीं से सफाई आरंभ करना शुभ माना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584858/why-is-sweeping-after-sunset-prohibited"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(2)11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वास्तु शास्त्र में झाड़ू को केवल सफाई का साधन नहीं माना गया है, बल्कि इसे माता लक्ष्मी का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि झाड़ू के उपयोग और उसके रख-रखाव से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। वास्तु के अनुसार घर की सफाई हमेशा मुख्य द्वार से शुरू करनी चाहिए और धीरे-धीरे घर के अंदरूनी हिस्सों की ओर बढ़ना चाहिए। मान्यता है कि मुख्य द्वार से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, इसलिए वहीं से सफाई आरंभ करना शुभ माना जाता है। इसके विपरीत, घर के अंदर से बाहर की ओर झाड़ू लगाने को उचित नहीं माना जाता, क्योंकि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि बाहर चली जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">झाड़ू लगाने के लिए सुबह का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त में की गई सफाई घर में शुद्धता और सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। वहीं सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। यदि किसी कारणवश शाम के समय सफाई करनी पड़े, तो उस समय घर का कचरा बाहर नहीं फेंकना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इससे आर्थिक नुकसान और धन संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सफाई के बाद कचरे को लंबे समय तक घर में जमा करके रखना भी शुभ नहीं माना जाता। कचरे को समय पर बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि गंदगी और अव्यवस्था नकारात्मकता को बढ़ावा देती हैं। वास्तु शास्त्र झाड़ू के सम्मान पर भी विशेष बल देता है। झाड़ू को कभी पैर नहीं लगाना चाहिए और न ही उसे खुले स्थान पर खड़ा रखना चाहिए। इसे हमेशा ऐसी जगह पर रखना चाहिए जहां बाहरी लोगों की नजर आसानी से न पड़े। इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि सुरक्षित बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">नई झाड़ू का उपयोग शुरू करने के लिए शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन नई झाड़ू घर में लाने और उसका प्रयोग करने से आर्थिक स्थिरता तथा सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। हालांकि ये मान्यताएं धार्मिक और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित हैं, फिर भी इनका मूल उद्देश्य घर में स्वच्छता, अनुशासन और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना है, जो किसी भी परिवार के सुखी जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 12:00:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरक कथा :  विषयों में दुर्गंध</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।</p>
<p style="text-align:justify;">घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584857/inspirational-story--the-stink-in-the-subjects"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(1)10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक धर्मनिष्ठ राजा एक महात्मा की पर्णकुटी पर जाया करते थे। उन्होंने एक बार महात्मा को अपने महल में पधारने के लिए विनती की, परंतु महात्मा ने यह कहकर टाल दिया कि मुझे तुम्हारे महल में बड़ी दुर्गंध आती है, इसलिए मैं नहीं जाता। राजा को बड़ा अचरज हुआ, उन्होंने मन ही मन विचार किया कि महल में तो इत्र छिड़का रहता है, वहां दुर्गंध कैसे आ सकती है? महात्माजी यह कैसे कहते हैं, पता नहीं?’ राजा ने संकोच से पुनः कुछ नहीं कहा। एक दिन महात्माजी राजा को साथ लेकर घूमने निकले।</p>
<p style="text-align:justify;">घूमते हुए चर्मकारों की बस्ती में पहुंच गए और वहा एक पीपल वृक्ष की छाया में खड़े हो गए। पास के घरों में चमड़ा कमाया जा रहा था, कहीं सूख रहा था, तो कहीं नया चमड़ा सिद्ध किया जा रहा था। हर घर में चमड़ा था और उसमें से बडी दुर्गंध आ रही थी। वायु प्रवाह भी उधर ही था। दुर्गंध के मारे राजा की नाक फटने लगी। </p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने महात्माजी से कहा, “भगवन! दुर्गंध के कारण खड़ा नहीं रहा जाता, कृपया यहां से चलें।” महात्माजी बोले, “तुम्हीं को दुर्गंध आती है? देखो आसपास के घरों की ओर, कितने पुरुष, स्त्रियां और बाल-बच्चे हैं। कोई कार्य कर रहें हैं, कोई खा-पी रहे हैं, सब हंस-खेल रहे हैं। किसी को तो दुर्गंध नहीं आती, मात्र तुम्हीं को दुर्गंध आ रही है।” राजा ने कहा, “भगवन! चमड़े से कमाते-कमाते तथा चमड़े में रहते-रहते इनका अभ्यास हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इनकी नाक ही ऐसी हो गई है कि इन्हें चमड़े की दुर्गंध नहीं आती, परंतु मैं तो इसका अभ्यासी नहीं हूं। अतः शीघ्र चलें, अब तो एक क्षण भी यहां नहीं ठहरा जाता।” महात्मा ने हंसकर कहा, “राजन, यही दशा तुम्हारे राज प्रासाद की भी है। विषय भोगों में रहते-रहते तुम्हें उनमें दुर्गंध नहीं आती है, तुम्हें अभ्यास हो गया है, परंतु मुझको तो ये सांसारिक विषय भोग देखते ही उल्टी-सी आती है। इसी से मैं तुम्हारे घर नहीं जाता था।” राजा ने रहस्य समझ लिया था, जो महात्मा हंसकर राजा को साथ लिए वहां से चल दिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />प्रमोद श्रीवास्तव</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:00:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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                <title>ज्योतिष शास्त्रोक्त विज्ञान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सनातन काल से ही मनुष्य को अपने भविष्य को पूर्व में ही जान लेने की इच्छा रही है। व्यक्ति किसी भी स्तर का हो कितना ही ज्ञानी अथवा पढ़ा लिखा हो डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस हो किसी भी धर्म का हो, जब उसे पता लगता है कि सामने बैठा व्यक्ति ज्योतिष का जानकार है। वह अपने भविष्य जानने की जिज्ञासा कर बैठता है। अथवा अपना हाथ आगे बढ़ा कर पूछता है कि मेरे बारे में कुछ बताइए। कुछ लोग ज्योतिष में अविश्वास भी करते हैं। विचारणीय विषय यह है कि यदि ज्योतिष में कुछ सत्यता नहीं होती, तो इस विद्या का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584856/astrology--the-science-of-yoga"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सनातन काल से ही मनुष्य को अपने भविष्य को पूर्व में ही जान लेने की इच्छा रही है। व्यक्ति किसी भी स्तर का हो कितना ही ज्ञानी अथवा पढ़ा लिखा हो डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस हो किसी भी धर्म का हो, जब उसे पता लगता है कि सामने बैठा व्यक्ति ज्योतिष का जानकार है। वह अपने भविष्य जानने की जिज्ञासा कर बैठता है। अथवा अपना हाथ आगे बढ़ा कर पूछता है कि मेरे बारे में कुछ बताइए। कुछ लोग ज्योतिष में अविश्वास भी करते हैं। विचारणीय विषय यह है कि यदि ज्योतिष में कुछ सत्यता नहीं होती, तो इस विद्या का इतना प्रसार नहीं होता। आज कोई गांव, नगर ऐसा नहीं होगा जहां थोड़ा बहुत ज्योतिष जानने वाला न हो। जन्मपत्री बनाने वाले पंडित जी तो हर मंदिर में मिल जाएंगे। प्रत्यक्ष देखने में आता है कि ज्योतिष का प्रभाव बढ़ रहा है।</p><p style="text-align:justify;">हर घर के कंप्यूटर में कुंडली बनाने वाला सॉफ्टवेयर होता ही है, जो कुंडली बनाने व देखने में सक्षम हैं, लोगों की रूचि इस विद्या के अध्ययन में बढ़ रही है। विदेशों में भी इसका प्रसार खूब हो रहा है। अब तो विद्यालयों में भी इस विद्या को पढ़ाया जा रहा है, जिस प्रकार ब्रह्मांड के एक भाग में पृथ्वी और तीन भाग में जल है, उसी प्रकार हमारा शरीर भी एक सूक्ष्म ब्रह्मांड है और इसमें भी एक भाग में मांस एवं तीन भाग में जल है। </p><p style="text-align:justify;">जिस प्रकार ब्रह्मांड में सारे ग्रह विचरण करते हैं, उसी प्रकार इन ग्रहों का अंश हमारे षरीर के विभिन्न भागों में विचरण करता है और ब्रह्मांड के ग्रहों से प्रभावित होता है। हमारे शरीर में ग्रहों की स्थिति, उसका आकार हमारे जन्म के समय ही तय हो जाता है और वही जन्मकुंडली में अंश के साथ में प्रतिपादित होता है। ग्रहों के साथ-साथ शरीर में नक्षत्रों का भी स्थान होता है और समय-समय पर जीवनभर ब्रह्मांड के नक्षत्रों से प्रभावित होता है।</p><p style="text-align:justify;">इसी प्रकार राशियों का भी गुण-धर्म होता है। प्राणियों में रोग भी इन्हीं ग्रहों के कारण होते हैं और इन्हीं से उपचार भी संभव है। सभी ग्रह विभिन्न राशियों में विचरण करते रहते हैं और समय-समय पर हमारे अंदर स्थित ग्रहों को प्रभावित करते रहते हैं, जिससे जीवन में उतार चढ़ाव आते है। ज्योतिष शास्त्र एक वैज्ञानिक तथ्य है और उन्हें झूठलाया नहीं जा सकता। ज्योतिष के दो भाग होते हैं, एक गणित, दूसरा फलित।</p><p style="text-align:justify;">विविध राशियां भी प्रभाव डालती हैं और इन राशियों का हमारे शरीर पर प्रभाव पड़ता है। इस विद्या को प्राचीन समय में ऋ षियों मुनियों ने उच्चतम स्तर तक और आज आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से और उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। ज्योतिष का यह भाग है एक प्रकार दूसरा फलित।</p><p style="text-align:justify;">गणित पूर्णत्या एक सिद्ध विज्ञान है, जिसे सनातन काल से भारत जानता है और इसी के बल पर हजारों वर्ष पहले के और बाद के ग्रह नक्षत्रों की स्थिति को बताया जा सकता है, जो कि ज्योतिष का आधार है और जो पुरातन ग्रंथों में वर्णित है। ज्योतिष सीखने से पहले गणित ही सिखाया जाता था। आजकल तो ज्योतिषियों को इसकी भी जरूरत नहीं पड़ती, कंप्यूटर ने उनका यह काम बहुत आसान कर दिया है। बटन दबाते ही कोई भी कुंडली प्राप्त की जा सकती है। इसकी गणित में दोष की संभावनाएं बहुत कम ही देखी गई है।</p><p style="text-align:justify;">अब बात करते हैं फलित की, जिस प्रकार कोई मात्र डॉक्टर की डिग्री लेकर इलाज नहीं कर सकता, उसी प्रकार कोई व्यक्ति मात्र कुंडली बनाकर फलादेश नहीं बता सकता है। जिस प्रकार डॉक्टर व इंजीनियर को अपना कार्य करने के लिए अनुभव की आवश्यकता है। उसी प्रकार फलित बताने के लिए भी ज्योतिषी को अनुभव, गुरु एवं ईष्ट की आवश्यकता होती है।</p><p style="text-align:justify;">कंप्यूटर द्वारा बताए गए फलित को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है, फलित ज्योतिष में ग्रहों का फल बताने के लिए ग्रह स्पष्ट, भाव ग्रहों की स्थिति आदि जानकर फल बताया जाता है। इसके अतिरिक्त गुण-धर्म, दृष्टि आदि अनेक बातों को भी ध्यान में रखा जाता है। ग्रहों की स्थिति आदि से बनने वाले विभिन्न योगों पर ध्यान देकर, देश-काल अवस्था का ध्यान रखते हुए फल बताना चाहिए।</p><p style="text-align:justify;">जिस प्रकार कभी किसी डॉक्टर से इलाज कराने पर लाभ नहीं होता, उसी प्रकार फलादेश भी कई बार साफ नहीं निकलते हैं। डॉक्टर के इलाज से लाभ न होने पर, जिस प्रकार विज्ञान गलत नहीं होता, उसी प्रकार फलादेश सत्य न होने पर ज्योतिष शास्त्र को गलत बता देना ठीक नहीं है। इसका कारण ज्योतिषी ज्ञान और अनुभव अलग फल परिस्थितियों एवं ग्रहों का पूर्ण विचार का अभाव भी होता है। ज्योतिष ज्ञान केवल अनुभव व ईष्ट सिद्धि से ही बढ़ता है।<br />भाग्य उसी का साथ देता है, जो पुरुषार्थ करता है</p><p style="text-align:justify;">ज्योतिष शास्त्र केवल संकेत मात्र है। अब यह भविष्य वक्ता के अनुभव पर निर्भर करता है कि देश, काल, अवस्था के अनुसार वह संकेतों से कैसा फलादेश कहता है। ज्योतिष यह तो बता सकता है कि अमुक प्राणी शिक्षा प्राप्त करेगा या उच्च शिक्षा प्राप्त करेगा, परंतु यह नहीं बता सकता कि बीए पास करेगा या एमए। हां यह संकेत अवश्य मिल जाएगा कि तकनीकी ज्ञान प्राप्त करेगा या अन्य यह ज्योतिषी को अपनी बुद्धि से विचारना पड़ता है कि असल बात क्या हो सकती है? अगर धुआं हो, तो क्या यह अग्नि है अथवा भाप या कोहरा। सूक्ष्म अंतर्ज्ञान एवं दृष्टि ही किसी ज्योतिषी को सफल भविष्य वक्ता बना सकती है। ज्योतिषी को यह सूक्ष्म अंतर्ज्ञान एकाग्र-चिंतन एवं शांतिपूर्वक संकेतों पर मनन करने से प्राप्त होता है। इसके लिए ज्ञान, धर्मनिष्ठा एवं ईश्वर में पूर्ण विश्वास होना जरूरी होता है, जो इच्छा शक्ति को प्रबल बनाता है और निश्चय पूर्वक विचारने की एवं फलित कहने की शक्ति प्रदान करता है। यह शंका भ्रमित करने वाली एवं निर्मूल है कि जब ऐसा फल होना ही है, तो क्यों कोशिश की जाए? ध्यान रहे कि बिना पुरुषार्थ किए देव भी फल नहीं देते हैं। पूर्व जन्म में किए गए कार्यों को देव/भाग्य कहा जाता है। इस जन्म में किए गए कार्यों को पुरुषार्थ। शरीर रूपी गाड़ी को चलाने के लिए देव एवं पुरुषार्थ दो पहिए हैं। भाग्य उसी का साथ देता है, जो पुरुषार्थ करता है।</p><p style="text-align:justify;">नाकारा का भाग्य भी रुक जाता है। आपके पूर्व संचित कर्म बैंक में जमा राशि की तरह हैं, जिन्हें आप पुरुषार्थ के द्वारा खर्च कर सकते हैं, जो भी कर्म आपने पूर्व जन्म में किए हैं, उनका फल कर्मानुसार इस जन्म में प्राप्त होता है। यह फल ग्रहों की स्थिति विचारने से दृष्टि गोचर होता है। जब कुंडली में बुरे समय का ज्ञान हो, तो समझ लो कि पूर्व जन्म के बुरे कर्म उदय हो रहे हैं। इसका निवारण जप और धैर्य द्वारा किया जा सकता है और जब कुंडली में शुभ समय का ज्ञान हो, तो शुभ कार्य करने के कार्य में सफलता प्राप्त होती है। विदेशों में भविष्य वक्ताओं की बहुत पूछ है, क्योंकि ज्योतिषियों ने अमेरिका में सन् 61 में 12 भविष्यवाणियां की, जिनमें से कई सत्य साबित हो चुकी हैं। जॉन कैनेडी के बारे में 6 मास पूर्व ही बता दिया गया था कि वह राष्ट्रपति बनेंगे। इंग्लैंड की लेडी गाडमैन की भविष्यवाणियां जग प्रसिद्ध हैं और उनके नाम पर वहां ज्योतिष का रिसर्च इंस्टीटयूट भी है। आजकल तो यह धनोपार्जन का भी एक अच्छा साधन बन गया है।<br /></p><h4 style="text-align:justify;">अशोक सूरी, आध्यात्मिक लेखक</h4>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 13:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विदेशों में है बिहार योग पद्धति की धूम</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अपनी अंतरात्मा में स्वयं को अनुभव करने से बड़ा कोई सुख नहीं है। सदियों से योग मनुष्य के भीतर शांति, संतुलन और आत्मबोध जागृत करने का माध्यम रहा है। आज जब मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और भौतिक संसाधनों में मानसिक शांति खोजने का प्रयास कर रहा है, तब योग का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। बीसवीं सदी में योग को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने वाले जिन महापुरुषों का नाम सर्वाधिक सम्मान से लिया जाता है, उनमें परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।- कुमार कृष्णन, वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र </p>
<h4 style="text-align:justify;">वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र</h4>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584855/the-bihar-school-of-yoga-method-is-making-waves-abroad"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design1.png" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अपनी अंतरात्मा में स्वयं को अनुभव करने से बड़ा कोई सुख नहीं है। सदियों से योग मनुष्य के भीतर शांति, संतुलन और आत्मबोध जागृत करने का माध्यम रहा है। आज जब मनुष्य बाहरी उपलब्धियों और भौतिक संसाधनों में मानसिक शांति खोजने का प्रयास कर रहा है, तब योग का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। बीसवीं सदी में योग को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करने वाले जिन महापुरुषों का नाम सर्वाधिक सम्मान से लिया जाता है, उनमें परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।- कुमार कृष्णन, वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र </p>
<h4 style="text-align:justify;">वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र</h4>
<p style="text-align:justify;">योगी, आध्यात्मिक गुरु, चिकित्सक तथा वेदांत के प्रकांड विद्वान स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग को आश्रमों और साधकों की सीमाओं से निकालकर सामान्य जनजीवन तक पहुंचाया। वर्ष 1963 में मुंगेर में स्थापित बिहार योग विद्यालय उनके इसी दूरदर्शी प्रयास का परिणाम था। यह संस्थान आगे चलकर वैश्विक योग पुनर्जागरण का केंद्र बना और आज भी विश्वभर में योग के प्रामाणिक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। स्वामी सत्यानंद के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कहते हैं, “स्वामी सत्यानंद ने योग को नया जीवन और नया जन्म दिया। उन्होंने योग का पुनरुद्धार किया, अन्यथा यह धीरे-धीरे लुप्त हो गया होता। इसलिए वे आधुनिक युग के पतंजलि हैं।” स्वामी सत्यानंद ने अपने गुरु स्वामी शिवानंद द्वारा प्रतिपादित ‘संश्लेषण योग’ की अवधारणा को आधार बनाकर वेदांत, योग और तंत्र के व्यावहारिक पहलुओं का समन्वय किया। इसी से बिहार योग अथवा सत्यानंद योग प्रणाली का विकास हुआ। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें योग की विभिन्न शाखाओं को एक समग्र और व्यवस्थित पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस योग प्रणाली की नींव हठ योग, राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग पर आधारित है, जो क्रमशः शरीर, मन, बुद्धि, भावनाओं और कर्मक्षमता का विकास करते हैं। इसके अतिरिक्त मंत्र योग, नाद योग, क्रिया योग, कुंडलिनी योग तथा लय योग जैसी अनेक शाखाओं को भी इसमें समाहित किया गया है। इस प्रकार साधक का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित होता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पतंजलि के योगसूत्रों की आधुनिक व्याख्या</h4>
<p style="text-align:justify;">स्वामी सत्यानंद सरस्वती की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने प्राचीन योग और तांत्रिक परंपराओं में सुरक्षित अनेक दुर्लभ एवं गूढ़ साधनाओं को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने अभ्यासों के क्रम, स्तर और प्रगतिशील अवस्थाओं को स्पष्ट करते हुए उन्हें सरल और सुरक्षित बनाया। परिणामस्वरूप योग पहली बार आम लोगों के लिए व्यावहारिक और सुलभ बन सका। उन्होंने यह अनुभव किया कि आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच सरल, किंतु नियमित अभ्यास ही लोगों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। इसी दृष्टिकोण ने योग को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वामी सत्यानंद ने ऋ षि पतंजलि के योगसूत्रों की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत की और योग को केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं, बल्कि जीवन-विकास के विज्ञान के रूप में स्थापित किया। उन्होंने योग पर छाए रहस्यवाद के आवरण को हटाकर इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया। 1970 के दशक में उन्होंने योग के प्रभावों पर वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित किया। उनके मार्गदर्शन में अनेक शोध परियोजनाएं प्रारंभ हुईं, जिनसे यह समझ विकसित हुई कि योग शरीर, मन और भावनाओं को किस प्रकार प्रभावित करता है तथा मनुष्य की सुप्त क्षमताओं को कैसे जागृत कर सकता है। इन अध्ययनों ने यह भी स्पष्ट किया कि योग केवल स्वास्थ्य संवर्धन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने वाला विज्ञान है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मानव चेतना के विकास का माध्यम</h4>
<p style="text-align:justify;">अस्थमा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर तथा गर्भावस्था जैसी अनेक परिस्थितियों में योग के चिकित्सीय उपयोगों पर किए गए अध्ययनों ने चिकित्सा जगत का ध्यान आकर्षित किया। यही कारण है कि आज विश्व के अनेक अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में योग को सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। स्वामी सत्यानंद की सबसे महत्वपूर्ण देनों में से एक है ‘योग निद्रा’। तंत्रशास्त्र की प्राचीन न्यास पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित कर उन्होंने योग निद्रा का स्वरूप प्रदान किया। आज यह तकनीक तनाव, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप तथा गंभीर रोगों के उपचार में सहायक सिद्ध हो रही है। आधुनिक शोधों से भी प्रमाणित हुआ है कि योग निद्रा मस्तिष्क की तरंगों को संतुलित कर मानसिक एवं भावनात्मक तनाव को कम करती है। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती के अनुसार, “योग निद्रा आज विश्वभर में प्रचलित अभ्यास बन चुकी है। अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमंत्री भी इसका अभ्यास कर रहे हैं। जैसे घर की सफाई प्रतिदिन आवश्यक है, वैसे ही मन की सफाई भी जरूरी है और योग निद्रा इसमें अत्यंत सहायक है।” इसी प्रकार स्वामी सत्यानंद ने पवनमुक्तासन श्रृंखला का विकास किया, जिसने योग को चिकित्सा और फिजियोथेरेपी के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई। गठिया, जोड़ों के दर्द और पाचन संबंधी विकारों में इन अभ्यासों के उल्लेखनीय लाभ देखे गए हैं। उनके प्रयासों का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने योग को मानव चेतना के विकास का माध्यम माना और इसे समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का कार्य किया। अमेरिका, स्वीडन और भारत सहित कई देशों में कैदियों और बंदियों के पुनर्वास कार्यक्रमों में भी बिहार योग पद्धति का सफल उपयोग किया गया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">56 से अधिक देशों में प्रचलित योग परंपरा</h4>
<p style="text-align:justify;">आज बिहार योग या सत्यानंद योग परंपरा विश्व के 56 से अधिक देशों में प्रचलित है। विशेष रूप से फ्रांस में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। वहां के विद्यालयों, महाविद्यालयों और यहां तक कि किंडरगार्टन स्तर पर भी बिहार योग की शिक्षाएं अपनाई जा रही हैं। मुंगेर से प्रशिक्षित योग शिक्षक बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लगभग छह दशकों तक स्वामी सत्यानंद ने योग की ऐसी समग्र प्रणाली विकसित की, जो शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन को एक साथ विकसित करती है। बाह्य योग के रूप में हठ योग, राज योग और क्रिया योग का प्रशिक्षण दिया जाता है, जबकि आश्रम जीवन की प्रेरणा से कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग के आंतरिक पक्षों का विकास होता है। यह समन्वित संरचना साधक को मस्तिष्क, हृदय और कर्म—तीनों स्तरों पर संतुलित बनाती है। यही योग का वास्तविक उद्देश्य है, जहां व्यक्ति अपने भीतर सामंजस्य स्थापित कर जीवन की उच्चतर संभावनाओं को साकार कर सके।</p>
<h4 style="text-align:justify;">संतुलित जीवनशैली का विज्ञान</h4>
<p style="text-align:justify;">स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पुस्तक ‘आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध’ आज भी विश्वभर के अनेक योग संस्थानों में मानक पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है। इसका अनुवाद अनेक भाषाओं में हो चुका है और यह योग साधकों के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका मानी जाती है। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने योग को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया है। उनकी पुस्तक ‘धारणा दर्शन’ में तंत्र और उपनिषदों से संकलित अनेक एकाग्रता अभ्यासों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने ‘योग कैप्सूल’ की अवधारणा भी विकसित की, जिसमें 10 से 20 मिनट में किए जाने वाले सरल अभ्यासों को सम्मिलित किया गया है। इनका उद्देश्य आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी लोगों को योग से जोड़ना है। स्वामी निरंजनानंद का स्पष्ट मत है कि योग को केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह मानसिक एकाग्रता, भावनात्मक स्थिरता और संतुलित जीवनशैली का विज्ञान है। उनका मानना है कि योग के बढ़ते व्यावसायीकरण के बीच उसके मूल उद्देश्य और आध्यात्मिक सार को संरक्षित रखना आवश्यक है। सत्यानंद योग परंपरा ने विश्व को योग के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराया है। यह केवल योग और आध्यात्मिक अनुभवों की व्याख्या नहीं करती, बल्कि उन्हें जीवन में उतारने की कला भी सिखाती है। आज परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ‘भारत योग यात्रा’ के माध्यम से इसी योग प्रसाद को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। वास्तव में स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने प्राचीन योग विज्ञान को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप रूपांतरित कर मानवता को एक अमूल्य विरासत प्रदान की है। योग के वैश्विक विस्तार और उसके वैज्ञानिक स्वरूप की स्थापना में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 10:34:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हमारे शरीर और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं मंत्र</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मंत्र संस्कृत के शब्दों का एक विशेष संयोजन है, जो ध्वनि तरंगों और ऊर्जा के माध्यम से मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालता है। ये ध्वनियां न केवल आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हैं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इनकी शक्ति को समझा जा सकता है। मंत्रों की उत्पत्ति वैदिक ऋ षियों द्वारा की गई थी, जिन्होंने इन्हें ध्यान और तपस्या के माध्यम से खोजकर समाज को दिया, एक अनोखा उपहार है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने आपको साधारण से आसाधारण बना सकता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मंत्र क्या है</h4>
<p style="text-align:justify;">मंत्र एक प्रकार की वह शक्ति होती है, जिसकी तुलना हम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584292/mantras-have-a-profound-impact-on-our-body-and-mind"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(3)6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मंत्र संस्कृत के शब्दों का एक विशेष संयोजन है, जो ध्वनि तरंगों और ऊर्जा के माध्यम से मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालता है। ये ध्वनियां न केवल आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हैं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इनकी शक्ति को समझा जा सकता है। मंत्रों की उत्पत्ति वैदिक ऋ षियों द्वारा की गई थी, जिन्होंने इन्हें ध्यान और तपस्या के माध्यम से खोजकर समाज को दिया, एक अनोखा उपहार है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपने आपको साधारण से आसाधारण बना सकता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मंत्र क्या है</h4>
<p style="text-align:justify;">मंत्र एक प्रकार की वह शक्ति होती है, जिसकी तुलना हम गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय या विद्युत शक्ति से कर सकते है। मंत्र सिद्ध होने पर साधक को उस देवता या आदि शक्ति की विशेष कृपा मिलती है। प्रत्येक मंत्र की एक निश्चित ऊर्जा, फ्रिक्वेंसी और वेवलेंथ होती है। एक तरह से मंत्र चमत्कारिक शक्ति होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मंत्र की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों – मानस (मन) और त्रं (उपकरण) से बना है। मंत्र वह ध्वनि (वेव) जो अक्षरों एवम् शब्दों के समूहों से बनती है। यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक तारंगात्मक ऊर्जा से व्याप्त है, जिसके दो प्रकार है- शब्द (नाद) और प्रकाश।   जो मन के भाव से सीधे उत्पन हुए हो, जो स्वयं उत्पन हुआ हो। हमारे शास्त्रों में मंत्रो के चमत्कार का वर्णन है। हमारे वेदों की ऋ चाओं के प्रत्येक छंद को मंत्र कहा जाता है। शास्त्रों में मंत्र के बारे में कहा गया है कि मन को तारने वाली ध्वनि ही मंत्र है जैसे– श्री , ॐ आदि शब्द होते हुए भी मंत्र है। ये बीज मंत्र है, जो अपने अंदर बहुत कुछ समेटे हुए हैं। यदि आप बीज मंत्रों का भी जाप करते हैं, तो इन मंत्रों का चमत्कार आप स्वयं देख सकते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मंत्रों का वैज्ञानिक आधार </h4>
<p style="text-align:justify;">मंत्र एक विशेष ध्वनि-स्पंदन होते हैं, जिनका निरंतर उच्चारण हमारे मस्तिष्क की तरंगों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से मंत्र जाप करता है, तो उसके मस्तिष्क में अल्फा और थीटा तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो शांति और ध्यान की स्थिति को बढ़ावा देती हैं। ध्वनि की ऊर्जा हमारे शरीर की कोशिकाओं, मनोविज्ञान और ऊर्जा चक्रों (चक्र सिस्टम) को प्रभावित करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब मंत्र उच्चारित किया जाता है, तो यह कंपन उत्पन्न करता है, जिससे हमारे शरीर की ऊर्जा प्रणाली सक्रिय होती है और हम अधिक सकारात्मकता अनुभव करते हैं। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, मंत्रों की ध्वनि तरंगें मानव मस्तिष्क और शरीर के ऊर्जा चक्रों को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, गायत्री मंत्र के उच्चारण से प्रति सेकंड 1,10,000 ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो मस्तिष्क की गतिविधियों को सक्रिय करती हैं और मानसिक शांति प्रदान करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ध्वनि विज्ञान  के अनुसार, मंत्रों की ध्वनि शरीर के विभिन्न अंगों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। उदाहरण के लिए, “ॐ” का उच्चारण नाभि, हृदय और मस्तिष्क को सक्रिय करता है, जिससे शरीर में ऊर्जा का संतुलन करता हैं। मंत्रों को न केवल शारीरिक और मानसिक शांति के लिए, बल्कि आत्मिक जागरूकता बढ़ाने के लिए भी उपयोग किया जाता है। मंत्रों के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार  और ध्यान की गहरी अवस्था प्राप्त की जा सकती है। </p>
<h4 style="text-align:justify;">सही तरीके से मंत्र जाप ऐसे करें</h4>
<h4 style="text-align:justify;">शुद्ध उच्चारण का ध्यान रखें- </h4>
<p style="text-align:justify;">मंत्रों का सही उच्चारण उनकी ऊर्जा को बढ़ाता है। मंत्रों का सही उच्चारण उनकी शक्ति को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, “ॐ” का उच्चारण “अ-उ-म” के तीन भागों में होना चाहिए, जो नाभि, हृदय और मस्तिष्क को सक्रिय करता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">नियमितता बनाए रखें-</h4>
<p style="text-align:justify;">मंत्र जाप को एक दिनचर्या बनाएं ताकि उसका अधिकतम लाभ प्राप्त हो। मंत्र जाप का नियमित अभ्यास करने से उनका प्रभाव बढ़ता है। प्रतिदिन सुबह या शाम के समय मंत्र जाप करना उत्तम माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक शांत स्थान चुनें- जहां बाहरी शोर न हो और ध्यान केंद्रित किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">ध्यान और भावना के साथ जाप करें- मंत्रों के अर्थ को समझकर जाप करें, जिससे उनका प्रभाव बढ़ता है। मंत्र जाप करते समय मन को एकाग्र रखना और श्रद्धा भाव रखना आवश्यक है। यह मंत्रों की ऊर्जा को ग्रहण करने में मदद करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">माला का उपयोग करें - मन को केंद्रित रखने के लिए तुलसी या रुद्राक्ष माला का उपयोग करें। मंत्र जाप के लिए 108 मनकों की माला का प्रयोग किया जाता है। यह संख्या पवित्र मानी जाती है और मंत्रों की शक्ति को बढ़ाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मंत्रों की शक्ति न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि वैज्ञानिक शोधों द्वारा भी प्रमाणित है। इनका सही उच्चारण और नियमित अभ्यास मन, शरीर और आत्मा के संतुलन के लिए अत्यंत लाभकारी है। यदि आप भी मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति चाहते हैं, तो मंत्र जाप को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। अपने जीवन में मंत्रों को अपनाएं और उनके चमत्कारी प्रभावों का अनुभव करें।</p>
<h5 style="text-align:justify;">- अनिल सुधांशु, आध्यात्मिक लेखक</h5>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:29:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बृहस्पति :  बुद्धि और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के सर्वोच्च प्रतीक </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिंदू धर्म और वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को देवताओं के गुरु, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उन्हें नवग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माना जाता है, जो भाग्य, धन और विस्तार (प्रगति) के कारक हैं। बृहस्पति के प्रभाव व्यापक हैं। बृहस्पति उच्च शिक्षा, दर्शन और धार्मिक ज्ञान के स्वामी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/untitled-design-(1)6.jpg" alt="Untitled design (1)" width="1200" height="720" /></p>
<p style="text-align:justify;">यह शिक्षकों, सलाहकारों और मार्गदर्शकों के स्वामी हैं। यह बच्चों, विशेषकर प्रथम संतान और स्त्री की कुंडली में पति के प्रमुख कारक हैं, जैसा कि शास्त्रीय पराशरी पद्धति में देखा जाता है। यह दीर्घकालिक धन और समृद्धि के स्वामी हैं।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584288/jupiter--the-supreme-symbol-of-wisdom-and-spiritual-guidance"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदू धर्म और वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को देवताओं के गुरु, ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उन्हें नवग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माना जाता है, जो भाग्य, धन और विस्तार (प्रगति) के कारक हैं। बृहस्पति के प्रभाव व्यापक हैं। बृहस्पति उच्च शिक्षा, दर्शन और धार्मिक ज्ञान के स्वामी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-06/untitled-design-(1)6.jpg" alt="Untitled design (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p style="text-align:justify;">यह शिक्षकों, सलाहकारों और मार्गदर्शकों के स्वामी हैं। यह बच्चों, विशेषकर प्रथम संतान और स्त्री की कुंडली में पति के प्रमुख कारक हैं, जैसा कि शास्त्रीय पराशरी पद्धति में देखा जाता है। यह दीर्घकालिक धन और समृद्धि के स्वामी हैं। यकृत, वसा चयापचय, प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की कोशिकीय स्तर पर वृद्धि और विस्तार की क्षमता के भी स्वामी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बृहस्पति का गुण केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता भी है: सत्य, अच्छाई और न्याय को परखने की क्षमता और आवेग, लालसा या भय के बजाय उस विवेक के आधार पर कार्य करना। कुंडली में बृहस्पति जहां भी स्थित होते हैं, वह अपने क्षेत्र को उसकी उच्चतम अभिव्यक्ति की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं। सातवें भाव में बृहस्पति केवल जीवनसाथी का संकेत नहीं देता, बल्कि यह एक बुद्धिमान, नैतिक रूप से सुदृढ़ साझेदारी की संभावना को दर्शाता है। दसवें भाव में बृहस्पति केवल करियर का संकेत नहीं देता, बल्कि यह सामाजिक कल्याण, ज्ञान या न्याय की ओर उन्मुख करियर का संकेत देता है। इसी तरह बारह भावों में उनके फल की विवेचना की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पौराणिक ग्रंथों के अनुसार देवगुरु बृहस्पति की उत्पत्ति महर्षि अंगिरा और उनकी पत्नी स्मृति (या सुरूपा) के यहां पुत्र के रूप में हुई थी। वे परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि अंगिरा के वंशज और देवताओं के सर्वोच्च ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।<br />उत्पत्ति और जन्म से जुड़ी प्रमुख कथा</p>
<h4 style="text-align:justify;">तपस्या का फल:</h4>
<p style="text-align:justify;">महर्षि अंगिरा को जब काफी समय तक कोई संतान नहीं हुई, तब उन्होंने और उनकी पत्नी ने मिलकर ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर उन्हें ‘पुंसवन’ व्रत करने का आशीर्वाद दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें तीन तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए - संवर्त, उतथ्य और जीव (जिन्हें आगे चलकर देवगुरु बृहस्पति कहा गया)</p>
<h4 style="text-align:justify;">देवगुरु कैसे बने :</h4>
<p style="text-align:justify;">बचपन से ही मेधावी और शांत स्वभाव वाले ‘जीव’ ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी इस कठिन परीक्षा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ज्ञान, बुद्धि और देवताओं के सर्वोच्च गुरु (देवगुरु) का पद प्रदान किया।</p>
<p style="text-align:justify;">सामान्य गोचर ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार बृहस्पति एक राशि में लगभग 12 महीने यानी लगभग एक वर्ष रहते हैं, परंतु अतिचारी गति के कारण कर्क राशि में </p>
<p style="text-align:justify;">2 जून के प्रवेश के बाद बृहस्पति 31 अक्टूबर 2026 को मेदिनीय ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार बृहस्पति का जल्दी-जल्दी राशि परिवर्तन करना, वक्री, मार्गी होना, जड़-चेतन में विशेष परिवर्तन की सूचना देता है। वर्तमान में देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि में हैं, 2 जून 2026 में देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। गौरतलब है कि बृहस्पति वर्ष 2025 में कुछ समय के लिए अपनी उच्च कर्क राशि में थे, फिर दिसंबर 2025 के प्रारंभ में कर्क राशि से लौटकर मिथुन राशि में प्रवेश कर गए। आगामी जून 2026 के प्रारंभ में मिथुन राशि से फिर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">2026 में बृहस्पति का मिथुन, कर्क और सिंह, तीन राशियों में गोचर बहुत लोगों का भाग्य बदल देगा। 12 राशियों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। गोचर में बृहस्पति देवता जब किसी की जन्म राशि से चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव में गोचर करते हैं, तो वह समय उसे व्यक्ति के लिए कष्टप्रद होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैदिक ज्योतिष में अतिचारी चाल का अर्थ है कि बहुत तेज चलना और गुरु आने वाले 8 सालों तक यानी साल 2032 तक अतिचारी चाल चलने वाले हैं। आमतौर पर गुरु एक राशि से दूसरी राशि में जाने पर 12 से 13 महीनों का समय लगाते हैं, लेकिन इस बार गुरु एक साल में तीन बार राशि बदलने वाले हैं। ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को ज्ञान, धर्म और अर्थव्यवस्था का कारक माना जाता है। जब बृहस्पति अतिचारी (सामान्य से तेज गति) होते हैं, तो वे अपनी शुभता खोकर देश-दुनिया में तेजी से बड़े, अप्रत्याशित और उथल-पुथल भरे बदलाव लाते हैं, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, मौसम और शासन-व्यवस्था पर पड़ता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">देश और दुनिया पर प्रभाव</h4>
<p style="text-align:justify;">अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव: अतिचारी बृहस्पति के प्रभाव से वैश्विक बाजारों और वित्तीय नीतियों में अचानक बदलाव देखने को मिल सकता है। मुद्रास्फीति और मंदी के दबाव से जनता और व्यापारिक जगत को जूझना पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राकृतिक और जलवायु परिवर्तन: अतिचारी गति के कारण मौसम के चक्र में अनिश्चितता आती है। असामयिक बारिश, तापमान में भारी उतार-चढ़ाव या प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल: विश्व स्तर पर सत्तातंत्र (राजाओं और राजनेताओं) पर दबाव बढ़ता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शक्ति का संतुलन बदलता है और कई देशों में आंतरिक कलह या जन-विद्रोह की स्थिति बन सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक और सामाजिक मतभेद: अतिचारी गुरु के कारण धार्मिक मामलों में उग्रता आ सकती है। दुनियाभर में धर्म या विचारधारा को लेकर विवाद और वैचारिक टकराव बढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य और चिकित्सा: चिकित्सा क्षेत्र में कुछ अजीबो-गरीब बीमारियों का प्रकोप देखने को मिल सकता है, हालांकि इसके समाधान और नई दवाओं के आविष्कार भी तेजी से होंगे।</p>
<h4 style="text-align:justify;">प्रलयंकारी जलवायु: </h4>
<p style="text-align:justify;">गुरु चूंकि जीवन और शीतलता के कारक हैं, उनकी बिगड़ी चाल बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन लाएगी। कर्क राशि (जल तत्व) में उनकी स्थिति विनाशकारी बाढ़, समुद्री तूफान और जल संकट का कारण बन सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्ञान के नए द्वार: हर विनाश अपने साथ सृजन भी लाता है। जैसे महाभारत के बीच ‘गीता’ का जन्म हुआ, वैसे ही इस कठिन समय में आध्यात्मिक जागृति और विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी खोजें भी होंगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">महाभारत काल की पुनरावृत्ति</h4>
<p style="text-align:justify;">इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि लगभग 5000 साल पहले महाभारत युद्ध के समय भी गुरु 7 वर्षों तक अतिचारी रहे थे। यही स्थिति प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी देखी गई थी। हाल ही में 2018 से 2022 के बीच जब गुरु अतिचारी हुए, तो पूरी दुनिया ने ‘कोरोना’ जैसी वैश्विक विभीषिका और आर्थिक मंदी का सामना किया। अब वैसी ही स्थिति फिर से दस्तक दे रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><br />पं.मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य, आध्यात्मिक लेखक, कानपुर</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 10:20:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टूटे घट का रहस्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बहुत समय पहले की बात है, एक गुरुकुल में आचार्य चाणक्य के शिष्य देवव्रत शिक्षा पा रहे थे। देवव्रत स्वभाव से बहुत सीधे और सरल थे, लेकिन उनकी एक समस्या थी, उन्हें चीजें बहुत जल्दी भूल जाती थीं। गुरुजी जो भी श्लोक या पाठ पढ़ाते, वह उनके दिमाग से रेत की तरह फिसल जाता। देवव्रत इस बात से हमेशा उदास रहते थे। एक दिन, आचार्य ने देवव्रत को अपने पास बुलाया और मिट्टी के दो घड़े दिए।</p><p style="text-align:justify;">पहला घड़ा बिल्कुल नया, सुंदर और मजबूत था। दूसरा घड़ा पुराना था और उसमें नीचे एक छोटा सा छेद (दरार) था। आचार्य ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584294/mystery-of-broken-down"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(4)6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बहुत समय पहले की बात है, एक गुरुकुल में आचार्य चाणक्य के शिष्य देवव्रत शिक्षा पा रहे थे। देवव्रत स्वभाव से बहुत सीधे और सरल थे, लेकिन उनकी एक समस्या थी, उन्हें चीजें बहुत जल्दी भूल जाती थीं। गुरुजी जो भी श्लोक या पाठ पढ़ाते, वह उनके दिमाग से रेत की तरह फिसल जाता। देवव्रत इस बात से हमेशा उदास रहते थे। एक दिन, आचार्य ने देवव्रत को अपने पास बुलाया और मिट्टी के दो घड़े दिए।</p><p style="text-align:justify;">पहला घड़ा बिल्कुल नया, सुंदर और मजबूत था। दूसरा घड़ा पुराना था और उसमें नीचे एक छोटा सा छेद (दरार) था। आचार्य ने कहा, “देवव्रत, आज से तुम्हारा काम केवल इतना है कि तुम रोज सुबह नदी से इन दोनों घड़ों में पानी भरकर आश्रम के रसोईघर तक लाओगे।”</p><p style="text-align:justify;">देवव्रत ने आज्ञा का पालन किया। वह रोज सुबह नदी पर जाते, दोनों घड़ों को पानी से भरते और कंधे पर लादकर आश्रम लौटते, लेकिन हर बार एक ही बात होती। मजबूत घड़ा पूरा पानी बचाकर आश्रम पहुंचता। टूटा हुआ घड़ा अपने छेद के कारण रास्ते में आधा पानी गिरा देता और आश्रम पहुंचते-पहुंचते खाली हो जाता। ऐसा चलते हुए कई महीने बीत गए। देवव्रत को लगने लगा कि वह अपनी कमजोरी (भूलने की बीमारी) की तरह ही इस टूटे घड़े के साथ भी व्यर्थ का श्रम कर रहे हैं। आखिरकार, एक दिन उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने आचार्य के सामने सिर झुकाकर कहा- “गुरुदेव, मैं स्वयं को अपराधी मानता हूं। मेरी बुद्धि भी इस टूटे घड़े की तरह है, जिसमें कोई ज्ञान नहीं टिकता। इस घड़े के कारण आपकी आधी मेहनत और पानी भी रोज बर्बाद हो जाता है। मुझे इस व्यर्थ के काम से मुक्त कर दीजिए।”</p><p style="text-align:justify;">आचार्य मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, “देवव्रत, तुम जिसे बर्बादी समझ रहे हो, जरा उस रास्ते को ध्यान से देखो, जिससे तुम रोज पानी लेकर आते हो। कल सुबह आते समय रास्ते के दोनों किनारों को देखना।”</p><p style="text-align:justify;">अगले दिन सुबह, जब देवव्रत नदी से पानी भरकर लौट रहे थे, तो उन्होंने रास्ते पर ध्यान दिया। वह यह देखकर हैरान रह गए कि  जिस तरफ वह मजबूत घड़ा लेकर चलते थे, उस तरफ की जमीन सूखी और बंजर थी, लेकिन जिस तरफ वह टूटा हुआ घड़ा लेकर चलते थे, उस तरफ रंग-बिरंगे, सुंदर फूलों के पौधे लहलहा रहे थे और पूरा रास्ता सुगंध से महक रहा था।</p><p style="text-align:justify;">आचार्य ने उन्हें समझाते हुए कहा- “देवव्रत, मैं जानता था कि इस घड़े में दरार है। इसलिए मैंने उस तरफ के रास्ते पर फूलों के बीज बो दिए थे। तुम रोज अनजाने में ही सही, अपनी कमजोरी (टूटे घड़े) से उन बीजों को सींचते रहे। आज तुम्हारी इसी ‘कमजोरी’ के कारण आश्रम का रास्ता इतना सुंदर और जीवंत बन सका है।”</p><p style="text-align:justify;">कहानी की सीख- हम सब के अंदर कोई न कोई कमी या कमजोरी होती है। कोई पढ़ने में धीमा होता है, तो कोई किसी काम में निपुण नहीं होता, लेकिन इस कहानी से हमें दो बातें सीखने को मिलती हैं। यदि हम सही दिशा में प्रयास करते रहें, तो हमारी कमियां भी किसी न किसी रूप में संसार को सुंदर बनाने के काम आ सकती हैं। देवव्रत की भूलने की आदत ने उन्हें लगातार अभ्यास करना सिखाया और उनकी उसी निरंतरता ने रास्ते को फूलों से भर दिया। स्वयं को कभी भी ‘टूटा हुआ घड़ा’ समझकर कमतर न आंकें।</p><h5 style="text-align:justify;">प्रमोद श्रीवास्तव<br />📚📚📚📚📚📚<br /></h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/584294/mystery-of-broken-down</link>
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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 09:00:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पौराणिक कथा :  भगवान ने तोड़ा अहंकार</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">द्वारका में एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिय रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट ही उनके वाहन गरुड़ और दिव्य अस्त्र सुदर्शन चक्र भी उपस्थित थे। समय के साथ तीनों के मन में अपने-अपने गुणों का सूक्ष्म अहंकार जन्म ले चुका था। सत्यभामा को अपनी अद्वितीय सुंदरता पर गर्व था। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभु, त्रेतायुग में माता सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी अधिक सुंदर थीं?”</p>
<p style="text-align:justify;">उसी समय गरुड़ ने भी अपने मन की बात कह दी, “क्या संसार में मुझसे अधिक वेग से उड़ने वाला कोई है?” सुदर्शन चक्र भी बोले, “मैंने अनेक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/583654/mythology--god-breaks-the-ego"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(6)1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">द्वारका में एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रिय रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे। निकट ही उनके वाहन गरुड़ और दिव्य अस्त्र सुदर्शन चक्र भी उपस्थित थे। समय के साथ तीनों के मन में अपने-अपने गुणों का सूक्ष्म अहंकार जन्म ले चुका था। सत्यभामा को अपनी अद्वितीय सुंदरता पर गर्व था। उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा, “प्रभु, त्रेतायुग में माता सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी अधिक सुंदर थीं?”</p>
<p style="text-align:justify;">उसी समय गरुड़ ने भी अपने मन की बात कह दी, “क्या संसार में मुझसे अधिक वेग से उड़ने वाला कोई है?” सुदर्शन चक्र भी बोले, “मैंने अनेक युद्धों में आपको विजय दिलाई है। क्या मुझसे अधिक शक्तिशाली कोई हो सकता है?” भगवान श्रीकृष्ण सब समझ गए। उन्होंने तीनों का अहंकार दूर करने का निश्चय किया। </p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने गरुड़ को आदेश दिया कि वे हनुमानजी को बुलाकर लाएं और कहें कि भगवान राम माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। इधर श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीराम का रूप धारण किया और सत्यभामा को सीता का रूप धारण करने को कहा। सुदर्शन चक्र को महल के द्वार पर पहरा देने की जिम्मेदारी दी गई। गरुड़ हनुमानजी के पास पहुंचे और उन्हें चलने का निमंत्रण दिया। </p>
<p style="text-align:justify;">हनुमानजी ने विनम्रता से कहा, “आप चलिए, मैं पीछे आता हूं।” गरुड़ मन ही मन सोचने लगे कि वे अवश्य पहले पहुंचेंगे। किंतु जब वे द्वारका पहुंचे, तो देखकर आश्चर्यचकित रह गए कि हनुमानजी पहले से ही भगवान के सामने बैठे हैं। भगवान राम रूप में श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए पूछा, “हनुमान, तुम्हें द्वार पर किसी ने रोका नहीं?” हनुमानजी ने विनम्रतापूर्वक अपने मुख से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के चरणों में रख दिया और बोले, “प्रभु, इन्होंने मुझे रोकना चाहा था, इसलिए मैं इन्हें साथ ही ले आया।” </p>
<p style="text-align:justify;">अब सुदर्शन चक्र का गर्व टूट चुका था। तभी हनुमानजी ने सत्यभामा की ओर देखकर पूछा, “प्रभु, आज माता सीता के स्थान पर आपने किस दासी को अपने पास बैठा रखा है?” यह सुनते ही सत्यभामा का सौंदर्य-अभिमान भी समाप्त हो गया। गरुड़, सुदर्शन चक्र और सत्यभामा तीनों समझ गए कि प्रभु के सामने किसी का भी अहंकार टिक नहीं सकता। वे विनम्र होकर भगवान के चरणों में झुक गए।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 09:00:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राम ने बनवाए थे दो शिव मंदिर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भगवान शिव के दो मंदिर बनवाए थे। एक मंदिर तो सभी जानते हैं कि समुद्र किनारे रामेश्वरम में बनवाया था। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी और मंदिर स्थापित किया था। लिंग थाप विधिवत कर पूजा। भगवान राम ने भगवान शिव की विधिवत पूजा की थी। भगवान शिव का दूसरा मंदिर भगवान राम ने राघवेश्वर मंदिर बनवाया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि राघवेश्वर मंदिर कहां हैं? </p><p style="text-align:justify;">राघवेश्वर मंदिर कन्याकुमारी जिले के पास बना हुआ है। कन्याकुमारी  जिले के पास नगर कोइल से 12 किलोमीटर दूर या मंदिर बना हुआ है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584289/rama-built-two-shiva-temples"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/untitled-design-(2)7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भगवान शिव के दो मंदिर बनवाए थे। एक मंदिर तो सभी जानते हैं कि समुद्र किनारे रामेश्वरम में बनवाया था। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी और मंदिर स्थापित किया था। लिंग थाप विधिवत कर पूजा। भगवान राम ने भगवान शिव की विधिवत पूजा की थी। भगवान शिव का दूसरा मंदिर भगवान राम ने राघवेश्वर मंदिर बनवाया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि राघवेश्वर मंदिर कहां हैं? </p><p style="text-align:justify;">राघवेश्वर मंदिर कन्याकुमारी जिले के पास बना हुआ है। कन्याकुमारी  जिले के पास नगर कोइल से 12 किलोमीटर दूर या मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर के पास ही पायाझार नदी कल-कल कर बहती है। राघवेश्वर मंदिर में शिवलिंग की स्थापना भी भगवान राम ने की थी और पूजा की थी। दोनों मंदिर बहुत नयनाभिराम हैं। ऐसी जनश्रुति है कि राक्षसी ताड़का का वध करने के बाद राम को स्त्री हत्या का पाप लगा था। </p><p style="text-align:justify;">इसी पाप का निवारण करने के लिए राम ने भगवान शिव का मंदिर बनवाकर उनकी पूजा की थी और स्त्री हत्या के पाप से मुक्त हुए थे। राघवेश्वर मंदिर के पास पहाड़ियों में ताड़का की विशाल मूर्ति बनी हुई है। पत्थरों पर चरण चिन्ह बने हुए हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह पद चिन्ह भगवान राम के ही हैं। आसपास के गांव वाले राम का शिव मंदिर कहकर पूजा अर्चना करते हैं। राघवेश्वर मंदिर में शिवलिंग और मां पार्वती की मूर्ति भी स्थापित है और इसी परिसर में श्री गणेश तथा कार्तिकेय की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। यह मंदिर ग्रेनाइट पत्थर से बना हुआ है।</p><h5 style="text-align:justify;">शिवचरण चौहान</h5>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>अंतस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 10:28:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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