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                <title>ग्लैमवर्ल्ड - Amrit Vichar</title>
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                <title>एनिवर्सरी 2026 </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">एनिवर्सरी एक पॉलिटिकल थ्रिलर के रूप में प्रस्तुत की गई फिल्म है, लेकिन उच्च रेटिंग और आकर्षक नाम के बावजूद यह दर्शकों को भ्रमित कर सकती है। कहानी एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और उसके होटलियर पति के सुखी परिवार से शुरू होती है। उनकी शादी की सालगिरह पर बेटा अपनी मंगेतर से मिलवाता है, जो कभी उसकी मां की छात्रा रह चुकी होती है। धीरे-धीरे खुलासा होता है कि यह युवती बेहद क्रांतिकारी विचारधारा की समर्थक रही है, जिसे जनतंत्र विरोधी गतिविधियों के कारण विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था और इसमें मां की भी भूमिका थी।</p>
<p style="text-align:justify;">  संघर्ष तब गहराता</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577690/anniversary-2026"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(27)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एनिवर्सरी एक पॉलिटिकल थ्रिलर के रूप में प्रस्तुत की गई फिल्म है, लेकिन उच्च रेटिंग और आकर्षक नाम के बावजूद यह दर्शकों को भ्रमित कर सकती है। कहानी एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और उसके होटलियर पति के सुखी परिवार से शुरू होती है। उनकी शादी की सालगिरह पर बेटा अपनी मंगेतर से मिलवाता है, जो कभी उसकी मां की छात्रा रह चुकी होती है। धीरे-धीरे खुलासा होता है कि यह युवती बेहद क्रांतिकारी विचारधारा की समर्थक रही है, जिसे जनतंत्र विरोधी गतिविधियों के कारण विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था और इसमें मां की भी भूमिका थी।</p>
<p style="text-align:justify;"> संघर्ष तब गहराता है, जब उस युवती की लिखी किताब “The Change” लोकप्रिय हो जाती है और उसके विचार समाज में व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की लहर पैदा करते हैं। मां, जो यथास्थितिवादी सोच रखती है, इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाती और परिवार के भीतर वैचारिक टकराव तेज हो जाता है। फिल्म राजनीति, विचारधाराओं के टकराव और उनके पारिवारिक रिश्तों पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाने की कोशिश करती है। यह भी दर्शाती है कि उम्र, जड़ता, भावनात्मक जुड़ाव और मानसिक द्वंद्व किस तरह व्यक्ति की सोच को प्रभावित करते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि फिल्म एक डिस्टोपियन (काल्पनिक) परिवेश में आधारित है, जहां पात्र और उनका व्यवहार काफी असामान्य और अतिरंजित प्रतीत होता है। कई स्थितियों में उनकी प्रतिक्रियाएं अप्रत्याशित लगती हैं, जिससे कहानी से जुड़ाव कमजोर हो जाता है। कुल मिलाकर, एनिवर्सरी (2026) एक गंभीर विषय उठाती है, लेकिन उसकी प्रस्तुति उतनी प्रभावशाली नहीं बन पाती। यह फिल्म यह भी याद दिलाती है कि रेटिंग्स हमेशा किसी फिल्म की वास्तविक गुणवत्ता का सही पैमाना नहीं होतीं।-समीक्षक-ब्रज राज नारायण सक्सेना</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 10:00:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> ओटीटी : चिरैया</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">“चिरैया” Chirayya एक ऐसी फिल्म है, जो मनोरंजन से अधिक आपको सोचने पर मजबूर करती है। डिज्नी+ हॉटस्टार पर रिलीज इस फिल्म का मुख्य विषय मैरिटल रेप जैसा संवेदनशील और विवादित मुद्दा है, जिस पर भारत में अब भी स्पष्ट कानून नहीं है। फिल्म एक शादीशुदा जोड़े के रिश्ते के जरिए यह सवाल उठाती है कि क्या शादी के बाद भी महिला की इच्छा और सहमति का महत्व बना रहता है। विषय निस्संदेह गंभीर है, लेकिन फिल्म का ट्रीटमेंट कमजोर प्रतीत होता है। किरदारों की प्रस्तुति कई जगह अस्वाभाविक लगती है, जिससे दर्शक उनसे जुड़ नहीं पाता। </p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म में पितृसत्ता,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577688/ott--chiraiya"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(26)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">“चिरैया” Chirayya एक ऐसी फिल्म है, जो मनोरंजन से अधिक आपको सोचने पर मजबूर करती है। डिज्नी+ हॉटस्टार पर रिलीज इस फिल्म का मुख्य विषय मैरिटल रेप जैसा संवेदनशील और विवादित मुद्दा है, जिस पर भारत में अब भी स्पष्ट कानून नहीं है। फिल्म एक शादीशुदा जोड़े के रिश्ते के जरिए यह सवाल उठाती है कि क्या शादी के बाद भी महिला की इच्छा और सहमति का महत्व बना रहता है। विषय निस्संदेह गंभीर है, लेकिन फिल्म का ट्रीटमेंट कमजोर प्रतीत होता है। किरदारों की प्रस्तुति कई जगह अस्वाभाविक लगती है, जिससे दर्शक उनसे जुड़ नहीं पाता। </p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म में पितृसत्ता, फेमिनिज्म और LGBTQ जैसे मुद्दों को भी छूने की कोशिश की गई है, लेकिन इनका चित्रण कई बार एकतरफा और अतिरंजित लगता है। इससे कहानी का संतुलन बिगड़ता है और संदेश स्पष्ट नहीं हो पाता। तकनीकी पक्ष की बात करें, तो एडिटिंग सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आती है। सीन का फ्लो टूटता है और कई जगह घटनाक्रम समझना मुश्किल हो जाता है। निर्देशन, बैकग्राउंड म्यूजिक और स्क्रीनप्ले भी प्रभाव छोड़ने में असफल रहते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">क्लाइमैक्स भी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। जहां संवाद और पारिवारिक हस्तक्षेप से समाधान की उम्मीद होती है, वहां फिल्म दहेज कानून जैसे मुद्दों को जोड़कर कहानी को उलझा देती है। हालांकि यह फिल्म एक महत्वपूर्ण सामाजिक बहस जरूर शुरू करती है और दर्शकों को असहज, क्रोधित और विचारशील बनाती है, लेकिन एक प्रभावशाली फिल्म बनने के लिए सिर्फ विषय का बड़ा होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका संतुलित और सशक्त प्रस्तुतीकरण भी आवश्यक है। कुल मिलाकर, “चिरैया” एक जरूरी मुद्दा उठाती है, पर एक मजबूत फिल्म नहीं बन पाती। <strong>समीक्षक-पंकज मुद्गल एनिवर्सरी (2026)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 10:00:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हर सूट के साथ परफेक्ट इयररिंग्स से दिखें आकर्षक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">इयररिंग्स का अपना अलग ही महत्व है। सही इयररिंग्स न केवल आपके लुक को संपूर्ण बनाते हैं, बल्कि आपकी पर्सनैलिटी में भी आकर्षण जोड़ते हैं। आज के समय में बाजार में इयररिंग्स के अनेक डिजाइन उपलब्ध हैं, जिन्हें आप चाहें तो खुद बनाकर भी उपयोग कर सकती हैं या फिर इन्हें बेचकर अच्छी आमदनी का साधन भी बना सकती हैं। झुमका, चांदबाली, स्टड, हूप्स और लॉन्ग इयररिंग्स जैसे कई विकल्प सूट के साथ बेहद आकर्षक लगते हैं और हर मौसम में इनकी मांग बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">    झुमका इयररिंग- यह पारंपरिक और सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला डिजाइन है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577687/look-stunning-with-the-perfect-earrings-for-every-suit"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(25)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इयररिंग्स का अपना अलग ही महत्व है। सही इयररिंग्स न केवल आपके लुक को संपूर्ण बनाते हैं, बल्कि आपकी पर्सनैलिटी में भी आकर्षण जोड़ते हैं। आज के समय में बाजार में इयररिंग्स के अनेक डिजाइन उपलब्ध हैं, जिन्हें आप चाहें तो खुद बनाकर भी उपयोग कर सकती हैं या फिर इन्हें बेचकर अच्छी आमदनी का साधन भी बना सकती हैं। झुमका, चांदबाली, स्टड, हूप्स और लॉन्ग इयररिंग्स जैसे कई विकल्प सूट के साथ बेहद आकर्षक लगते हैं और हर मौसम में इनकी मांग बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">    झुमका इयररिंग- यह पारंपरिक और सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला डिजाइन है। सिल्क, कॉटन या पार्टी वियर सूट के साथ यह बेहद खूबसूरत लगता है। मोती, बीड्स और धातु से इसे बनाकर बेचना भी आसान है।</p>
<p style="text-align:justify;">    चांदबाली इयररिंग- मुगलकालीन शैली से प्रेरित यह डिजाइन खासकर शादी और त्योहारों में पहना जाता है। इसकी लोकप्रियता हमेशा बनी रहती है, जिससे यह एक अच्छा बिजनेस विकल्प बन सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">    स्टड इयररिंग-छोटे और साधारण स्टड रोजमर्रा के उपयोग के लिए उपयुक्त होते हैं। पर्ल, स्टोन या मिरर वर्क से तैयार किए गए स्टड की अच्छी बिक्री होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">    ऑक्सिडाइज्ड इयररिंग- ये आजकल ट्रेंड में हैं और कॉटन व इंडो-वेस्टर्न सूट के साथ काफी स्टाइलिश लगते हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इनकी अच्छी डिमांड है।</p>
<p style="text-align:justify;">    टसल इयररिंग- रंग-बिरंगे धागों से बने ये इयररिंग युवतियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं और कैजुअल लुक को खास बना देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>Fashion and Trends</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 10:01:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राष्ट्रवाद की चाशनी में लिपटी धुरंधर-2 पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">इस दौर में राष्ट्रवाद की चाशनी में लपेटकर बनाई जा रही फिल्में क्या वास्तव में जनता के अंदर राष्ट्रवाद पैदा करना चाहती हैं या फिर ऐसी फिल्में किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत बनाई जाती हैं? क्या इन दिनों राष्ट्रवाद भुनाने के लिए फिल्में बनाई जा रही हैं ? क्या इन दिनों राष्ट्रवाद को एक फार्मूला बना दिया गया है ? क्या इन दिनों फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रवाद को बेचा जा रहा है ? क्या ऐसी फिल्मों के माध्यम से सच्चे अर्थों में जनता के अंदर राष्ट्रवाद पैदा हो सकता है ? सवाल कई हैं लेकिन ऐसी जनता जिनकी आंखों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577686/questions-raised-over--dhruvandhar-2-%E2%80%94coated-in-the-syrup-of-nationalism"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(24)6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इस दौर में राष्ट्रवाद की चाशनी में लपेटकर बनाई जा रही फिल्में क्या वास्तव में जनता के अंदर राष्ट्रवाद पैदा करना चाहती हैं या फिर ऐसी फिल्में किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत बनाई जाती हैं? क्या इन दिनों राष्ट्रवाद भुनाने के लिए फिल्में बनाई जा रही हैं ? क्या इन दिनों राष्ट्रवाद को एक फार्मूला बना दिया गया है ? क्या इन दिनों फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रवाद को बेचा जा रहा है ? क्या ऐसी फिल्मों के माध्यम से सच्चे अर्थों में जनता के अंदर राष्ट्रवाद पैदा हो सकता है ? सवाल कई हैं लेकिन ऐसी जनता जिनकी आंखों पर पर्दा पड़ा है, वह न ही तो इन सवालों के उत्तर जानता चाहती है और न ही वह ऐसी फिल्मों के पीछे लगे दिमाग को पढ़ पाती है। इन दिनों फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ चर्चा में है। </p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म धुरंधर-2 विवादों में आ गई है। अनेक लोग इस फिल्म को देश की एक बड़ी हकीकत मान रहे हैं, तो कई लोग इसे प्रोपेगेंडा फिल्म मान रहे हैं। यह फिल्म निर्देशक आदित्य धर की चर्चित एक्शन फिल्म धुरंधर का दूसरा भाग है। इस फिल्म की कहानी कराची के लियारी इलाके की पृष्ठभूमि पर केन्द्रित है। फिल्म में अंडरवर्ल्ड और खूफिया क्रियाकलापों के संसार को दिखाया गया है। इस फिल्म में कई घटनाओं के संदर्भ भी हैं जैसे कंधार हाईजैक, भारतीय संसद पर हमला और 2008 का मुबंई हमला। इस फिल्म में मुख्य भूमिका रणवीर सिंह ने निभाई है। </p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही अर्जुन रामपाल, आर माधवन, संजय दत्त, राकेश बेदी जैसे कलाकारों ने भी फिल्म में काम किया है। तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव से पहले इस फिल्म पर रोक लगाने की मांग को लेकर मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह की फिल्म का प्रदर्शन आचार संहिता के उल्लंघन की आशंका पैदा करता है। आदित्य धर के निर्देशन में बनी फिल्म धुरंधर-2 सिनेमाघरों में 19 मार्च को रिलीज हुई थी। बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन करने वाली यह फिल्म अब विवादों में आ गई है। </p>
<p style="text-align:justify;">अब इस फिल्म पर गुरबानी का अपमान करने और सिख भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप भी लग रहा है। आरोप है कि फिल्म के एक दृश्य में गुरबानी के एक पवित्र श्लोक का अनुचित प्रयोग किया गया है। साथ ही एक दृश्य में  रणवीर सिंह को बढ़ी हुई दाढ़ी, हाथ में कड़ा और पगड़ी पहने हुए दिखाया गया है। आरोप है कि इस दृश्य और लुक से सिखों और गुरु गोविंद सिंह का अपमान हुआ है। इस मुद्दे पर ‘सिख इन महाराष्ट’ संगठन के अध्यक्ष सरकार गुरज्योत सिंह ने फिल्म निर्माताओं से माफी मांगने की मांग की है। </p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस आपत्ति के बाद आर माधवन ने माफी मांगी है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस फिल्म के जरिए दूसरों दलों को बदनाम करने का आरोप लगाया है। इस फिल्म में अतीक अहमद की तरह दिखते एक चरित्र के पाकिस्तानी खूफिया एजेंसी आईएसआई और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के साथ संबंधों को दिखाया गया है। अब इस मुद्दे पर अतीक अहमद को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। निश्चित रूप से अतीक अहमद कोई संत नहीं था। वह अपराधी था, लेकिन उस अपराधी को पाकिस्तान से जोड़ना संदेह पैदा करता है। सवाल यह है कि यदि अतीक अहमद के काफी सालों से पाकिस्तान से संबंध थे और वह वहां से हथियार ले रहा था तो सरकारें क्या कर रही थीं?</p>
<p style="text-align:justify;">एक तरफ कई लोग धुरंधर-2 में फिल्म की कास्टिंग, बैकग्राउंड म्यूजिक, डारेक्शन और रणवीर सिंह के अभिनय की की प्रशंसा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ कई लोग इस फिल्म को भाजपा सरकार की प्रशंसा का प्रोपेगेंडा बता रहे हैं। हालांकि इस फिल्म में सीधेतौर पर किसी राजनेता या अन्य व्यक्तित्व के बारे में कुछ नहीं दिखाया गया है, लेकिन चरित्र छिपाए हुए ही बहुत कुछ कह देते हैं। यानी छिपाते हुए वास्तविक चरित्र पर पहुंचा गया है। दर्शक यह चालाकी समझ भी लेते हैं। फिल्म के शुरू में ही यह बता दिया जाता है कि इस फिल्म के सभी पात्र काल्पनिक हैं, लेकिन काल्पनिक पात्र दरअसल काल्पनिक नहीं हैं। दरअसल बाजार फिल्म बनाने वालों से न जाने क्या-क्या करा देता है। इस प्रक्रिया में कई स्तरों पर राजनीति की भूमिका भी होती है।- रोहित कौशिक</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 10:00:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जिंदगी का सफर:  पॉप की गॉडेस नाजिया हसन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन दक्षिण एशिया की सबसे लोकप्रिय और यादगार गायिकाओं में से एक थीं। उन्हें अक्सर “क्वीन ऑफ पॉप” और उपमहाद्वीप की पहली पॉप स्टार कहा जाता है। बहुत कम उम्र में उन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया, जो बड़े-बड़े कलाकार भी नहीं कर पाते। उनकी मधुर आवाज़, आधुनिक अंदाज़ और अलग पहचान ने भारत, पाकिस्तान और दुनिया भर के संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह बनाई। नाज़िया हसन केवल एक गायिका ही नहीं थीं, बल्कि एक संवेदनशील, शिक्षित और समाजसेवी व्यक्तित्व भी थीं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<h5 style="text-align:justify;">जन्म और प्रारंभिक जीवन</h5>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन का जन्म 3 अप्रैल 1965 को कराची, पाकिस्तान में हुआ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577684/the-journey-of-life--pop-goddess-nazia-hassan"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(23)5.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">नाजिया हसन दक्षिण एशिया की सबसे लोकप्रिय और यादगार गायिकाओं में से एक थीं। उन्हें अक्सर “क्वीन ऑफ पॉप” और उपमहाद्वीप की पहली पॉप स्टार कहा जाता है। बहुत कम उम्र में उन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया, जो बड़े-बड़े कलाकार भी नहीं कर पाते। उनकी मधुर आवाज़, आधुनिक अंदाज़ और अलग पहचान ने भारत, पाकिस्तान और दुनिया भर के संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह बनाई। नाज़िया हसन केवल एक गायिका ही नहीं थीं, बल्कि एक संवेदनशील, शिक्षित और समाजसेवी व्यक्तित्व भी थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">जन्म और प्रारंभिक जीवन</h5>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन का जन्म 3 अप्रैल 1965 को कराची, पाकिस्तान में हुआ था। उनका परिवार शिक्षित और संस्कारी था। बचपन से ही उनमें कला और संगीत के प्रति रुचि दिखाई देने लगी थी। वे अपने भाई ज़ोहेब हसन के साथ बहुत करीब थीं, और आगे चलकर यही भाई-बहन की जोड़ी संगीत जगत में बेहद मशहूर हुई। नाज़िया की परवरिश पाकिस्तान और लंदन—दोनों वातावरणों में हुई, जिससे उनके व्यक्तित्व में आधुनिकता और गहराई दोनों आईं।   </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">गायन करियर की शुरुआत</h5>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन ने बहुत कम उम्र में गायन की दुनिया में कदम रखा। उनका सबसे बड़ा ब्रेक तब मिला जब उन्होंने 1980 में भारतीय फिल्म कुर्बानी के लिए मशहूर गीत “आप जैसा कोई” गाया। उस समय उनकी उम्र केवल 15 वर्ष थी। यह गीत रिलीज़ होते ही सुपरहिट हो गया और नाज़िया रातों-रात स्टार बन गईं। इसी गाने के लिए उन्होंने 1981 में Filmfare Award for Best Female Playback Singer जीता। वे यह सम्मान पाने वाली पहली पाकिस्तानी गायिका और बहुत कम उम्र में यह पुरस्कार जीतने वाली कलाकारों में शामिल रहीं।   </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">लोकप्रियता और सुपरहिट एल्बम</h5>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन की लोकप्रियता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही। 1981 में उनका प्रसिद्ध एल्बम “Disco Deewane” रिलीज़ हुआ, जिसने पूरे एशिया में तहलका मचा दिया। यह एल्बम बहुत बड़ी सफलता साबित हुआ और उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने अपने भाई ज़ोहेब हसन के साथ मिलकर कई हिट एल्बम दिए, जैसे:</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>• Disco Deewane (1981)</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>• Boom Boom (1982)</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>• Young Tarang (1984)</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>• Hotline (1987)</strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>• Camera Camera (1992</strong>)</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके गाने जैसे “डिस्को दीवाने”, “बूम बूम”, “दम दम देदे” और “आंखें मिलाने वाले” आज भी बेहद पसंद किए जाते हैं। उन्होंने पॉप संगीत को एक नया रूप दिया और युवा पीढ़ी की आइकन बन गईं।   </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">पढ़ाई और सामाजिक कार्य</h5>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन सिर्फ एक सफल गायिका ही नहीं थीं, बल्कि वे पढ़ाई में भी अच्छी थीं। उन्होंने कानून (Law) की पढ़ाई की और बाद में सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहीं। वे बच्चों, महिलाओं और गरीबों के लिए काम करती थीं। वे कई सामाजिक संगठनों से जुड़ीं और समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास करती रहीं। उनके व्यक्तित्व की यही बात उन्हें और भी खास</div>
<div style="text-align:justify;">बनाती है कि शोहरत मिलने के बाद भी वे जमीन से जुड़ी रहीं।   </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">विवाह और निजी जीवन</h5>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन की शादी 1995 में व्यवसायी मिर्ज़ा इश्तियाक बेग से हुई थी। कुछ स्रोतों में उनकी शादी की तारीख 30 मार्च 1995 भी बताई जाती है। शादी के बाद उनके जीवन में खुशियों के साथ कई कठिनाइयाँ भी आईं। उनका वैवाहिक जीवन आसान नहीं रहा और समय के साथ इसमें तनाव बढ़ता गया। नाज़िया का एक बेटा भी हुआ, जिसका नाम आरेज़ हसन बताया जाता है। बाद में उनके वैवाहिक संबंध खराब हो गए और 2000 में उनका तलाक़ हो गया या अलगाव की स्थिति बन गई कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार यह उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<h5 style="text-align:justify;">बीमारी और निधन</h5>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन के जीवन का सबसे दुखद दौर तब आया जब वे फेफड़ों के कैंसर (Lung Cancer) से पीड़ित हो गईं। उन्होंने इस बीमारी से लंबे समय तक संघर्ष किया। इलाज के दौरान भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, लेकिन बीमारी लगातार गंभीर होती गई। अंततः 13 अगस्त 2000 को लंदन, इंग्लैंड में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र केवल 35 वर्ष थी। उनकी असमय मृत्यु ने भारत, पाकिस्तान और पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों को गहरा दुख दिया।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नाजिया हसन का जीवन छोटा था, लेकिन उनकी उपलब्धियाँ बहुत बड़ी थीं। उन्होंने बहुत कम उम्र में पॉप संगीत को नई पहचान दी और यह साबित किया कि प्रतिभा की कोई सीमा नहीं होती। उनकी आवाज़, उनकी सादगी और उनका संगीत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। नाजिया हसन केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी प्रेरणा, जो आज भी नई पीढ़ी को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 10:00:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बॉलीवुड की वो अदाकाराएं, जो यादों में हैं जिंदा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हिंदी सिनेमा में कई ऐसे कलाकार रहे, जिन्होंने सीमित अवसरों के बावजूद अपनी अदाकारी और प्रतिभा से अमिट छाप छोड़ी। विनीता भट्ट उर्फ यास्मीन और नृत्यांगना शीला वाज इसी परंपरा की दो महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। यास्मीन ने ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ जैसे गीतों में अपनी चंचलता से दर्शकों को आकर्षित किया, वहीं शीला वाज ने ‘रमैया वस्तावैया’ जैसे गीतों में अपने नृत्य से यादगार पहचान बनाई। भले ही इन्हें मुख्यधारा में लंबा समय न मिला हो, लेकिन इनकी स्क्रीन उपस्थिति और कलात्मक योगदान ने इन्हें सिनेमा प्रेमियों के बीच आज भी जीवंत बनाए रखा है<strong>।– डॉ. मीता गुप्ता</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(22)5.jpg" alt="वायरल तस्वीर (22)" /></strong></p>
<p style="text-align:justify;">विनीता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/577681/the-bollywood-actresses-who-live-on-in-our-memories"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/वायरल-तस्वीर-(21)5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदी सिनेमा में कई ऐसे कलाकार रहे, जिन्होंने सीमित अवसरों के बावजूद अपनी अदाकारी और प्रतिभा से अमिट छाप छोड़ी। विनीता भट्ट उर्फ यास्मीन और नृत्यांगना शीला वाज इसी परंपरा की दो महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। यास्मीन ने ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ जैसे गीतों में अपनी चंचलता से दर्शकों को आकर्षित किया, वहीं शीला वाज ने ‘रमैया वस्तावैया’ जैसे गीतों में अपने नृत्य से यादगार पहचान बनाई। भले ही इन्हें मुख्यधारा में लंबा समय न मिला हो, लेकिन इनकी स्क्रीन उपस्थिति और कलात्मक योगदान ने इन्हें सिनेमा प्रेमियों के बीच आज भी जीवंत बनाए रखा है<strong>।– डॉ. मीता गुप्ता</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(22)5.jpg" alt="वायरल तस्वीर (22)"></img></strong></p>
<p style="text-align:justify;">विनीता भट्ट, जिन्हें यास्मीन के नाम से भी जाना जाता है, 1950 के दशक में भारतीय सिनेमा में एक छोटी, लेकिन यादगार पहचान थीं, जिन्हें ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’ (1955) और ‘ऊटपटांग’ (1955) जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है। उनकी विरासत कुछ यादगार रोल्स पर टिकी है, खासकर जॉनी वॉकर के साथ मजेदार ‘जाने कहां मेरा जिगर गया जी’ गीत, जिसने यास्मीन की शोख अदाओं और आकर्षक अंदाज़ को क्लासिक बॉलीवुड के शौकीनों के बीच आज भी जिंदा रखा है| </p>
<p style="text-align:justify;">विनिता भट्ट (यास्मीन) का जन्म 3 अप्रैल, 1937 को रावलपिंडी में हिंदू-अंग्रेज़ माता-पिता के यहां हुआ था। उन्होंने हिल-स्टेशन स्कूलों में पढ़ाई की और बैंगलोर में अपना सीनियर कैम्ब्रिज पूरा किया। वे बैंगलोर एमेच्योर ड्रामेटिक सोसाइटी में शामिल हुईं और टैगोर के बलिदान और जे. बी. प्रीस्टली जैसे नाटकों में काम किया, शायद यहीं उनके एक महान अदाकारा बनाने का अंकुर फूटा| मशहूर फिल्म निर्माता, निर्देशक गुरुदत्त ने उन्हें देखा और अपनी अगली फिल्म में रोल ऑफर किया और उनसे बॉम्बे आने को कहा। कुछ वजहों से, उन्होंने यह ऑफर एक्सेप्ट नहीं किया। बाद में विनीता बॉम्बे गईं, जहाँ उनकी मुलाकात एक्ट्रेस नरगिस के भाई अनवर हुसैन से हुई। विनीता का परिवार अनवर हुसैन को जानता था।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि विनीता बहुत खूबसूरत थीं, इसलिए अनवर हुसैन ने उन्हें रंजीत स्टूडियो के मालिक चंदूलाल शाह से मिलवाया, जिन्होंने उन्हें फिल्म ‘ऊटपटांग’ (1955) में एक छोटा सा रोल दिया। फिल्म की शूटिंग मशहूर महबूब स्टूडियो में हुई थी। गुरु दत्त भी वहीं शूटिंग कर रहे थे। दोनों रेस्ट पीरियड में मिले। फिर से गुरु दत्त ने उन्हें अपनी फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ में रोल ऑफर किया। इस बार वे मना नहीं कर सकीं और ऑफर एक्सेप्ट कर लिया। बहुत ही खूबसूरत और चार्मिंग यास्मीन को गुरुदत्त ने अपनी सुपरहिट फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ में जॉनी वॉकर के साथ साइड हीरोइन के तौर पर चुना था। गुरुदत्त ने फिल्म मिस्टर एंड मिसेज 55 के लिए विनीता बट का नाम बदलकर यास्मीन कर दिया था। पॉपुलर गाना ‘जाने कहां मेरा जिगर गया जी’ यास्मीन और जॉनी वॉकर पर फिल्माया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय फिल्मियाटन की सिनेमास्कोप और टेक्नीकलर फिल्म ‘थ्री हेडेड कोबरा’ आई थी, जिसका पहले नाम ‘बॉम्बे फ्लाइट 417’ था। विनीता भट्ट ने इस फिल्म में रुक्मिणी का रोल किया था, जिसके मेकअप मैन जिमी वाइनिंग थे। दोनों को प्यार हो गया। अपनी अच्छी शुरुआत, जिनमें रुस्तम सोहराब, कैप्टन किशोर जैसी फिल्मों के बावजूद, विनीता भट्ट फिल्मों में ज्यादा दिन नहीं टिकीं और पॉपुलर मेकअप मैन जिमी वाइनिंग से शादी कर ली और बॉलीवुड छोड़कर विदेश में बस गईं। आज भी वे बॉलीवुड के इतिहास में पुरानी यादों की एक मिसाल बनी हुई हैं एक ऐसी एक्ट्रेस जो थोड़े समय के लिए चमकीं, लेकिन अपनी ज़िंदादिल स्क्रीन प्रेज़ेंस से एक गहरी छाप छोड़ गईं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">बेजोड़ नृत्यांगना शीला </h5>
<p style="text-align:justify;">अपनी नृत्य भंगिमाओं से सबको प्रभावित करने वाली शीला वाज़ ने 1953 से 1960 तक हिंदी फिल्मों में डांसर के रूप में काम किया। उनका परिवार गोवा से था और उनका जन्म 1934 में हुआ था और वे दादर, मुंबई में पली-बढ़ीं। उन्होंने छोटी उम्र से ही डांस सीखा था, लेकिन जब उन्होंने फिल्मों में आना चाहा, तो उन्हें अपने परिवार से बहुत विरोध का सामना करना पड़ा।  किशोर साहू की मयूर पंख (1954) और किदार शर्मा की गुनाह (1953) के साथ, उन्होंने 1960 तक बहुत सारी फिल्मों में डांस किया। उनकी कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों में श्री 420 (1955) शामिल है, जिसमें उन्होंने न केवल रमैया वस्तावैया (उनका अब तक का सबसे प्रसिद्ध गीत) पर यादगार नृत्य किया, बल्कि दिल का हाल सुने दिलवाला, सीआईडी (1956), जॉनी वॉकर (1957), तुमसा नहीं देखा (1957), मिस्टर एक्स (1957), सोलवां साल (1958), कागज़ के फूल (1959) और बहना (1960) में भी नृत्य किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बहुत से लोग उन्हें नाम से नहीं जानते, क्योंकि उन दिनों डांसर्स के नाम हमेशा फिल्म क्रेडिट्स में नहीं आते थे, लेकिन इससे हर गाने को खास बनाने के लिए इन डांसर्स के योगदान या कड़ी मेहनत को कम नहीं किया जा सकता। शीला वाज़ कई मशहूर गानों से जुड़ी हुई हैं और इन गानों से जुडने के उनके चेहरे हमारे दिमाग में बस गए हैं। अगर शीला को याद करना है, तो रमैया वस्तावैया को मिस नहीं किया जा सकता। मशहूर जोहरा सहगल का कोरियोग्राफ किया हुआ यह गाना वर्ली सी फेस में शूट किया गया था, उस समय उस जगह पर ऊंची इमारतें और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स नहीं थे। आज का बॉम्बे-वर्ली सी लिंक उसी जगह पर बना है। गाने में उनकी एक मिनट की स्क्रीन प्रेजेंस के बावजूद, कोई उनके एक्सप्रेशन और परफॉर्मेंस को नहीं भूल सकता। </p>
<p style="text-align:justify;">लेके पहला पहला प्यार में भी, देव आनंद और शकीला के साथ स्क्रीन शेयर करने के बावजूद, शीला सबसे अलग दिखती हैं। यहां तक कि यूट्यूब वीडियो के कमेंट सेक्शन में भी लोग उनकी तारीफ़ कर रहे हैं, और बता रहे हैं कि कैसे मोहम्मद रफ़ी, शमशाद बेगम और आशा भोसले का गाना उनके डांस से अमर हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">बॉलीवुड की हिंदी-केंद्रिक फ़िल्ममेकिंग की वजह से, शीला वाज़ को नुकसान हुआ-उन्हें यह भाषा नहीं आती थी। इसलिए, उनके डांस के लिए, उन्हें रोमन स्क्रिप्ट में लिखे लिरिक्स दिए जाते थे। उन्होंने लगभग 70 फ़िल्मों में काम किया| शुरुआत शोखियां (1951) में बैकग्राउंड डांसर के तौर पर उनके काम से हुई, और फिर माँ (1952) में एक पूरा नंबर किया। </p>
<p style="text-align:justify;">1961 में बॉलीवुड छोड़ने और अपना नाम बदलकर राम लखनपाल रखने के बावजूद, शीला को इंडस्ट्री में अपने समय को याद करना बहुत पसंद था। 2009 में उनका इंटरव्यू लेने वाले फिल्म मेकर करण बाली लिखते हैं, “उनका चेहरा खिल उठा, जब उन्होंने हमें बताया कि आज भी जब उनके गाने टीवी पर दिखाए जाते हैं, तो यंगस्टर्स और पड़ोसी उनके पास आते हैं और बताते हैं कि उन्हें उनके डांस कितने पसंद आए!” इस महान अदाकारा का देहांत 29 जून 2022 को हुआ, किंतु उनके नृत्य ने उन्हें अमर बना दिया| हिंदी फिल्मों के दो गानों में अभिनय करने वाली हीरोइनें अपनी शानदार अदाकारी से अमर हो गईं। उन्होंने बाद में कोई बड़ी फिल्म तो नहीं की, लेकिन सिर्फ इन गानों की वजह से वह जानी जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 13:45:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जंजीर जिसने बदल दी अमिताभ बच्चन की तकदीर </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">11 मई 1973 को रिलीज हुई ‘जंजीर’  एक ऐसी फिल्म थी, जिसने अमिताभ बच्चन के करियर को पूरी तरह से बदलकर, उन्हें बॉलीवुड में एंग्री यंग मैन के रूप में स्थपित किया। इस फिल्म ने फिल्म इंडस्ट्री को एक नया सुपरस्टार दिया। गौरतलब है कि सलीम-जावेद द्वारा लिखित और प्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित इस फिल्म को पहले कई बड़े अभिनेताओं ने ठुकरा दिया था। जावेद अख्तर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जंजीर धर्मेंद्र को लेकर लिखी गई थी, लेकिन धर्मेंद्र ने किन्हीं कारणों से फिल्म करने से मनाकर दिया था<strong>। - दीपक नौगांई</strong></p>
<p style="text-align:justify;">अमिताभ बच्चन ने 1969</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576124/-zanjeer---the-film-that-changed-amitabh-bachchan-s-destiny"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(17)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">11 मई 1973 को रिलीज हुई ‘जंजीर’  एक ऐसी फिल्म थी, जिसने अमिताभ बच्चन के करियर को पूरी तरह से बदलकर, उन्हें बॉलीवुड में एंग्री यंग मैन के रूप में स्थपित किया। इस फिल्म ने फिल्म इंडस्ट्री को एक नया सुपरस्टार दिया। गौरतलब है कि सलीम-जावेद द्वारा लिखित और प्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित इस फिल्म को पहले कई बड़े अभिनेताओं ने ठुकरा दिया था। जावेद अख्तर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जंजीर धर्मेंद्र को लेकर लिखी गई थी, लेकिन धर्मेंद्र ने किन्हीं कारणों से फिल्म करने से मनाकर दिया था<strong>। - दीपक नौगांई</strong></p>
<p style="text-align:justify;">अमिताभ बच्चन ने 1969 में फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उनकी 11 फिल्में रिलीज हुई, जिनमें भुवन सोम, परवाना, रेशमा और शेरा, प्यार का घर आदि शामिल हैं, पर कोई भी बड़ी हिट साबित नहीं हुई। 1971 में आई फिल्म आनंद जरूर सफल रही पर सारा क्रेडिट राजेश खन्ना ले गए।</p>
<p style="text-align:justify;">जंजीर में इंस्पेक्टर विजय खन्ना के किरदार ने अमिताभ बच्चन को एक गुस्सैल, कड़क पुलिस अधिकारी के रूप में पेश किया, जिसे तब के युवा दर्शकों ने खूब पसंद किया और फिल्म की सफलता के बाद अमिताभ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस फिल्म के बाद अमिताभ बच्चन की तकदीर बदल गई और उन्होंने कई हिट फिल्में दीं। फिल्म में अमिताभ बच्चन और प्राण पर फिल्माया गया गाना ‘यारी है ईमान मेरी’ आज भी बहुत पसंद किया जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">अमिताभ बच्चन को जंजीर इतनी आसानी से नहीं मिली। वे इस फिल्म के लिए पहली पसंद तो कतई नहीं थे। इससे पहले उनकी कई फिल्में फ्लॉप हो चुकी थीं। धर्मेंद्र के बाद राजकुमार और देवानंद ने भी निजी कारणों से फिल्म करने से मनाकर दिया था। एक दिन प्रकाश मेहरा ‘मुंबई टू गोवा’ फिल्म देख रहे थे। अमिताभ की एक्टिंग देख उन्होंने तय किया कि उनकी फिल्म के हीरो वही होंगे। कहते हैं कि प्राण ने भी प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था।<br />जंजीर की कहानी सलीम खान और जावेद अख्तर की मशहूर जोड़ी ने लिखी थी। </p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म की कहानी, डायलॉग और सीन लोगों को इतने पसंद आए की फिल्म सुपरहिट साबित हुई और अमिताभ भी रातों-रात स्टार बन गए। इसके बाद इस जोड़ी ने अमिताभ के साथ कई हिट फिल्में दीं, जिनमें शोले, दीवार, काला पत्थर, शान, त्रिशूल, डॉन आदि शामिल हैं। जंजीर में अमिताभ बच्चन इंस्पेक्टर विजय खन्ना के रोल में थे, जबकि जया बच्चन उनकी प्रेमिका माला तथा प्राण ने शेर खान का रोल निभाया था। </p>
<p style="text-align:justify;">इनके अतिरिक्त इस फिल्म में अजीत, ओमप्रकाश, इफ्तिखार, केस्टो मुखर्जी, बिंदु आदि कलाकार भी शामिल थे। फिल्म में संगीत कल्याण जी आनंद जी का था। यह फिल्म लगभग 90 लाख की बजट में बनी थी और इस फिल्म ने 17 करोड़ से ज्यादा की कमाई की। फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई। जंजीर के लिए उस साल अमिताभ बच्चन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था, लेकिन पुरस्कार बॉबी के लिए ऋ षि कपूर को मिला था।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 10:00:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जिंदगी का सफर </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">होली के हिंदी फिल्मी गीतों के संग्रह में शायद ही किसी के पसंदीदा गानों में ‘जोगी जी धीरे-धीरे...’ न हो! इसे या ‘नदिया के पार’ के अन्य गीतों को सुनते हुए अक्सर ख्याल आता था कि भारत के पूर्वी क्षेत्र की मिठास लिए यह सरल, जादुई आवाज किसकी है, जो यूपी-बिहार के गांवों की भाषा और भावों को इतनी सहज और सुंदर अभिव्यक्ति देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर जब यह पता चला कि यह मधुर आवाज एक पंजाबी गायक जसपाल सिंह जी की है तो और ताज्जुब होना ही था। एक पंजाबी पृष्ठभूमि की आवाज और भारत के पूर्वी क्षेत्र की भाषाई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576122/the-journey-of-life"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(16)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">होली के हिंदी फिल्मी गीतों के संग्रह में शायद ही किसी के पसंदीदा गानों में ‘जोगी जी धीरे-धीरे...’ न हो! इसे या ‘नदिया के पार’ के अन्य गीतों को सुनते हुए अक्सर ख्याल आता था कि भारत के पूर्वी क्षेत्र की मिठास लिए यह सरल, जादुई आवाज किसकी है, जो यूपी-बिहार के गांवों की भाषा और भावों को इतनी सहज और सुंदर अभिव्यक्ति देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर जब यह पता चला कि यह मधुर आवाज एक पंजाबी गायक जसपाल सिंह जी की है तो और ताज्जुब होना ही था। एक पंजाबी पृष्ठभूमि की आवाज और भारत के पूर्वी क्षेत्र की भाषाई मिठास इतनी खूबसूरती से संजोये हुए। फिर लगा शायद हिंदी क्षेत्र से कोई संबंध रहा हो। मगर ऐसा भी कोई उल्लेख कहीं मिला नहीं। </p>
<p style="text-align:justify;">उनका जन्म 23 मार्च 1943 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उन्हें स्कूल और कॉलेज के दिनों में ही गायन का शौक हो गया था। वे पढ़ाई के दौरान कई संगीत प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे। जसपाल जी मोहम्मद रफी साहब के बहुत बड़े प्रशंसक थे और बचपन से ही उनके गाने-सुनते और मौका मिलते ही गाते थे।  गायन के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए वे मुंबई चले गए, जहां उनकी बहन रहती थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी प्रतिभा को सर्वप्रथम 1968 में प्रसिद्ध महिला गायिका और संगीतकार ऊषा खन्ना जी ने पहचाना और पहला ब्रेक दिया। इनके संगीत निर्देशन में इन्होंने ‘बंदिश’ और ‘अनजान है कोई’ फिल्मों में गाने गए। मगर न इन फिल्मों को ज्यादा सफलता मिली न इन्हें कोई विशेष पहचान। मगर इनका सही वक्त अभी आना शेष था। राजश्री की फिल्म ‘गीत गाता चल’ में संगीतकार रविन्द्र जैन जी के निर्देशन में उनकी आवाज पूरे देश में छा गई। इसके बाद उन्होंने ‘नदिया के पार’, ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘सावन को आने दो’ जैसी कई हिट बॉलीवुड फिल्मों के लिए गाया।</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि उस समय के सभी ख्यात गायक अलग-अलग लोकप्रिय नायकों के साथ जुड़े हुए थे। इस कारण नायक सचिन को ब्रेक देने वाली आवाज के रूप में पार्श्व गायन करने के लिए नए गायक जसपाल सिंह को चुना गया था। मगर यह सफलता उनके राह की बाधा भी बन गई। नायक के रूप में सचिन का कैरियर बहुत सफल और लंबा नहीं रहा, जबकि जसपाल जी सचिन की आवाज के रूप में सीमित पहचान में बंधते चले गए। आने वाला दौर हिंदी सिनेमा में पार्श्व गायन के स्तर में गिरावट का भी रहा, जो जसपाल जी जैसे प्रतिभावान गायकों के लिए अनुकूल नहीं रहा और वो इस नए दौर में गुमनामी में खोते गए।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके कंठ से निकले कुछ यादगार गीतों में-धरती मेरी माता, पिता आसमान, गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल, मंगल भवन अमंगल हारी (फिल्म- गीत गाता चल), कौन दिशा में लेके चला रे, साची कंहे तोरे आवन से हमरे (फिल्म-  नदिया के पार), जब-जब तू मेरे सामने आए (फिल्म- श्याम तेरे कितने नाम), सावन को आने दो (फिल्म- सावन को आने दो) आदि शामिल हैं।  सफलता-असफलता से परे उनके दिल से गाए गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हैं और आगे भी उनकी उपस्थिति का अहसास बन फिजाओं में गूंजते रहेंगे।<strong>- अभिषेक मिश्रा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>Fashion and Trends</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 09:00:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>67 साल बाद एक गीत की वापसी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:left;"><span style="color:rgb(230,126,35);">Choo, choo train, a-chugging down the track</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Gotta travel on, never coming back</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Whoo-oo-hoo, got a one way ticket to the blues</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Bye, bye love, my baby’s leaving me</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Now lonely teardrops are all that I can see</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Whoo-oo-hoo, got a one way ticket to the blues </span></p>
<p style="text-align:justify;">यह गीत हाल के समय में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 67 साल बाद अचानक फिर से वायरल हो गया है, जो यह दर्शाता है कि संगीत की कोई समय सीमा नहीं होती। 1959 में नील सेडका द्वारा लोकप्रिय बनाया गया यह गीत अपने भावनात्मक बोल और मधुर धुन के कारण पहले भी श्रोताओं</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576120/the-return-of-a-song-after-67-years"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(15)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:left;"><span style="color:rgb(230,126,35);">Choo, choo train, a-chugging down the track</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Gotta travel on, never coming back</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Whoo-oo-hoo, got a one way ticket to the blues</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Bye, bye love, my baby’s leaving me</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Now lonely teardrops are all that I can see</span><br /><span style="color:rgb(230,126,35);">Whoo-oo-hoo, got a one way ticket to the blues </span></p>
<p style="text-align:justify;">यह गीत हाल के समय में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 67 साल बाद अचानक फिर से वायरल हो गया है, जो यह दर्शाता है कि संगीत की कोई समय सीमा नहीं होती। 1959 में नील सेडका द्वारा लोकप्रिय बनाया गया यह गीत अपने भावनात्मक बोल और मधुर धुन के कारण पहले भी श्रोताओं के दिलों में खास जगह बना चुका था, लेकिन आज की डिजिटल दुनिया ने इसे एक नई पहचान दी है। आजकल सोशल मीडिया पर सैकड़ों की संख्या में इसके एआई वर्जन और लोगों द्वारा बनाई गई रील्स वायरल हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस गीत के वायरल होने का सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे इंस्टाग्राम और टिक टॉक हैं, जहां लोग पुराने गानों को नए ट्रेंड्स के साथ जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। खासतौर पर रील्स और शॉर्ट वीडियो में इस गाने के इस्तेमाल ने इसे युवा पीढ़ी तक पहुंचाया, जो शायद पहले इस गीत से परिचित नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">गीत की धुन में एक तरह की उदासी और सादगी है, जो आज के तेज-तर्रार और शोर-भरे संगीत के बीच एक अलग ही सुकून देती है। यही कारण है कि लोग इसे बार-बार सुनना पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा, इस गाने के बोल, जो एकतरफा प्रेम और बिछड़ने की पीड़ा को व्यक्त करते हैं, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने समय में थे। यह भावनात्मक जुड़ाव ही इसकी लोकप्रियता का मूल कारण है। वायरल होने का एक और पहलू यह है कि लोग अब रेट्रो चीजों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पुराने गाने, फैशन और स्टाइल एक बार फिर ट्रेंड में आ रहे हैं और </p>
<p style="text-align:justify;">One Way Ticket to the Blues  इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। यह नॉस्टैल्जिया और नवीनता का एक अनोखा संगम प्रस्तुत करता है। अंततः इस गीत का दोबारा लोकप्रिय होना यह साबित करता है कि अच्छी कला कभी पुरानी नहीं होती। समय बदलता है, माध्यम बदलते हैं, लेकिन भावनाएं और सच्चा संगीत हमेशा जीवित रहते हैं। यह वायरल ट्रेंड न केवल एक पुराने गीत को नया जीवन देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि नई पीढ़ी भी क्लासिक संगीत को उतनी ही सराहना देती है।  -राजेश श्रीनेत,, समूह संपादक</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 09:00:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Dhurandhar: The Revenge Film Review:  नए भारत की कूटनीति को बयां करती फिल्म</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">धुरंधर: द रिवेंज, एक ऐसी फिल्म, जिसे आप दम साधे पूरी देखना चाहेंगे। कोई डिस्टरबेंस आप को पसंद नहीं आएगा, आप की नजरें रुपहले पर्दे पर ही टिकी होगी, जिज्ञासा चरम पर होगी इसके बाद क्या? आप बस यही सोचेंगे, इसके सिवाय कुछ नहीं... यदि आप ने धुरंधर का पहला भाग देखा है, तो आप अनुभूत करेंगे कि ये उस से कहीं बेहतर है, फिल्म की एडीटिंग गजब की है, स्क्रिप्ट भी बेहतरीन और एक्टिंग तो ऐसी की, भाई सभी कलाकारों को सैल्यूट करने को जी करता है। ये भारतीय सिनेमा की सफल और बेहतरीन फिल्मों की सूची में अपना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576125/dhurandhar--the-revenge-film-review--a-film-that-portrays-the-diplomacy-of--new-india"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(18)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धुरंधर: द रिवेंज, एक ऐसी फिल्म, जिसे आप दम साधे पूरी देखना चाहेंगे। कोई डिस्टरबेंस आप को पसंद नहीं आएगा, आप की नजरें रुपहले पर्दे पर ही टिकी होगी, जिज्ञासा चरम पर होगी इसके बाद क्या? आप बस यही सोचेंगे, इसके सिवाय कुछ नहीं... यदि आप ने धुरंधर का पहला भाग देखा है, तो आप अनुभूत करेंगे कि ये उस से कहीं बेहतर है, फिल्म की एडीटिंग गजब की है, स्क्रिप्ट भी बेहतरीन और एक्टिंग तो ऐसी की, भाई सभी कलाकारों को सैल्यूट करने को जी करता है। ये भारतीय सिनेमा की सफल और बेहतरीन फिल्मों की सूची में अपना नाम अवश्य दर्ज कराएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सन 2014 के बाद का भारत, अब केवल बदला नहीं लेता, घर में घुसकर मारता भी है। मोदी जी, टीवी पर नोटबंदी की घोषणा करते हैं और बर्बाद पाकिस्तान होता है, ये फिल्मी शोशा नहीं, हकीकत थी। कराची में आईएसआई के इशारे पर बड़े पैमाने पर फेक करेंसी यानी नकली नोट बड़े पैमाने पर छपते और ये नेपाल या कश्मीर के रास्ते से भारत लाया जाता। ठीक है फिल्म की कहानी में कुछ नाटकीयता है, किंतु इसके बाद भी ये फिल्म, कराची के इस सदी के प्रथम दशक की कहानी बयां करती है। </p>
<p style="text-align:justify;">रॉ के लोग पहले भी पाकिस्तान में सक्रिय थे, वे सूचना भेजते, किंतु उस पर कड़ी कार्यवाही नहीं होती थी, पर अब अजीत डोभाल देश की सुरक्षा संभाल रहे है, जो स्वयं कभी पाकिस्तान में भारत के जासूस रहे है, अब जो इनपुट हमारे एजेंट्स वहां से भेजते हैं, उस पर तुरंत कार्यवाही होती है। यूपी के माफिया अतीक अहमद, पाकिस्तान की संस्थाएं, दाऊद सबका गठबंधन सच्चाई है और यही इस फिल्म का आधार है। बीते वर्ष में अनेक मोस्ट वांटेड आतंकी या उनके अन्नदाता जो पाकिस्तान में थे, अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा कत्ल कर दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">यही है नया भारत। जमील साहब यानी राकेश बेदी साहब की एक्टिंग तो कमाल की है, आर माधवन, सान्याल साहब के रूप में, संजय दत्त एसपी चौधरी के रूप में, फिल्म का हीरो रणवीर सिंह, सब ने अपने रोल के साथ न्याय किया है, अर्जुन रामपाल (मेजर इकबाल) क्रूरता घृणा चेहरे से झलकी, गजब की एक्टिंग, दो कमियां भी बताते चलूं, अत्याधिक वीभत्स हिंसक सीन और कुछ अश्लील संवाद, इसलिए सेंसर बोर्ड ने ए सर्टिफिकेट दिया है, निर्देशक इसके बिना भी यदि फिल्म बनाते तो वो उतनी ही प्रभावशाली होती, इसकी जरूरत नहीं थी। यह फिल्म निश्चित ही सुपरहिट होगी और भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में अपना स्थान बनाएगी। निर्देशक और पटकथा लेखन, दोनों आदित्य धर ने किया, वे निश्चित ही बधाई के पात्र हैं और पुरस्कार के भी।- डॉ.संजय अनंत </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 12:42:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हाथ की उंगलियों में पहनी जाने वाली खूबसूरत अंगूठियां</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अंगूठी एक ऐसा आभूषण है, जो सदियों से सुंदरता और आकर्षण का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी अपने हाथों की उंगलियों में अंगूठी पहनना पसंद करते हैं। यह केवल सजावट का साधन नहीं है, बल्कि कई बार यह प्यार, रिश्ते और भावनाओं का प्रतीक भी होती है। खासकर सगाई और शादी में अंगूठी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजकल बाजार में अंगूठियों की बहुत सारी सुंदर डिजाइन मिलती हैं। सोने, चांदी, हीरे और अलग-अलग रंगों के पत्थरों से बनी अंगूठियां हाथों की खूबसूरती को और भी बढ़ा देती हैं। कुछ लोग साधारण और हल्की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576118/exquisite-rings-worn-on-the-fingers"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(10)13.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अंगूठी एक ऐसा आभूषण है, जो सदियों से सुंदरता और आकर्षण का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी अपने हाथों की उंगलियों में अंगूठी पहनना पसंद करते हैं। यह केवल सजावट का साधन नहीं है, बल्कि कई बार यह प्यार, रिश्ते और भावनाओं का प्रतीक भी होती है। खासकर सगाई और शादी में अंगूठी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजकल बाजार में अंगूठियों की बहुत सारी सुंदर डिजाइन मिलती हैं। सोने, चांदी, हीरे और अलग-अलग रंगों के पत्थरों से बनी अंगूठियां हाथों की खूबसूरती को और भी बढ़ा देती हैं। कुछ लोग साधारण और हल्की अंगूठी पहनना पसंद करते हैं, जबकि कुछ लोग भारी और डिजाइनर अंगूठियां पहनना पसंद करते हैं। हर व्यक्ति अपनी पसंद और स्टाइल के अनुसार अंगूठी चुनता है।<strong>-नूर हिना खान लेखिका</strong></p>
<h5 style="text-align:justify;">अंगूठियों की डिजाइन</h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-03/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(11)13.jpg" alt="वायरल तस्वीर (11)"></img></p>
<p style="text-align:justify;">अंगूठियों की डिजाइन समय के साथ बदलती रहती है। पहले साधारण गोल डिजाइन अधिक पसंद किए जाते थे, लेकिन आजकल फ्लावर डिजाइन, हार्ट शेप, क्राउन डिजाइन और मिनिमल स्टाइल की अंगूठियां बहुत ट्रेंड में हैं। खासकर युवतियां पतली और स्टाइलिश अंगूठियां पहनना पसंद करती हैं, जो उनके हाथों को और भी आकर्षक बनाती हैं। आज के समय में अंगूठियां केवल आभूषण नहीं रह गई हैं, बल्कि यह फैशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। किसी भी पार्टी, शादी या खास अवसर पर एक सुंदर अंगूठी पूरे लुक को और भी खास बना देती है। इसलिए कहा जा सकता है कि अंगूठी छोटी जरूर होती है, लेकिन इसकी सुंदरता और महत्व बहुत बड़ा होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">साधारण अंगूठी</h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-03/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(12)11.jpg" alt="वायरल तस्वीर (12)"></img></p>
<p style="text-align:justify;">यह हल्की और सादी डिजाइन की होती है। इसे रोजमर्रा में पहनना आसान होता है। ऑफिस, घर या सामान्य काम करते समय ऐसी अंगूठियां सबसे अच्छी रहती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">डिजाइनर अंगूठी</h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-03/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(13)13.jpg" alt="वायरल तस्वीर (13)"></img></p>
<p style="text-align:justify;">डिजाइनर अंगूठियों में अलग-अलग स्टाइल, नक्काशी और नए फैशन की डिजाइन होती हैं। इन्हें पार्टी, शादी, त्योहार या किसी खास मौके पर पहनना ज्यादा अच्छा लगता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">स्टोन या रत्न वाली अंगूठी</h5>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-03/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0-(14)13.jpg" alt="वायरल तस्वीर (14)"></img></p>
<p style="text-align:justify;">इन अंगूठियों में अलग-अलग रत्न लगे होते हैं, जैसे पन्ना, माणिक, मोती या नीलम। कई लोग इन्हें ज्योतिष के अनुसार पहनते हैं, क्योंकि माना जाता है कि सही रत्न जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">सगाई या शादी की अंगूठी</h5>
<p style="text-align:justify;">यह सबसे खास अंगूठी मानी जाती है। सगाई और शादी में जो अंगूठी पहनाई जाती है वह रिश्ते और प्यार का प्रतीक होती है। अक्सर इसमें हीरा या सुंदर पत्थर लगा होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;">फैशन अंगूठी</h5>
<p style="text-align:justify;">फैशन अंगूठियां ट्रेंड के अनुसार बनाई जाती हैं। आजकल पतली, मिनिमल और स्टैकिंग (एक साथ कई अंगूठियां पहनना) स्टाइल बहुत लोकप्रिय है। युवतियां इन्हें कैजुअल और पार्टी दोनों में पहनती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;">कैसे चुनें अच्छी अंगूठी</h5>
<p style="text-align:justify;">अच्छी अंगूठी चुनते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले अंगूठी का साइज सही होना चाहिए ताकि पहनने में आराम रहे। दूसरा, उसकी डिजाइन आपके हाथों और स्टाइल पर सूट करनी चाहिए। तीसरा, उसकी क्वालिटी अच्छी होनी चाहिए ताकि वह जल्दी खराब न हो। कुल मिलाकर अंगूठी एक छोटा सा आभूषण है, लेकिन यह व्यक्ति की खूबसूरती और व्यक्तित्व को और भी निखार देती है। सही अंगूठी सही समय पर पहनी जाए, तो हाथों की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                            <category>Fashion and Trends</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 12:25:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Anjali Singh]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>ओटीटी  सूबेदार 2026</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सेना का एक सूबेदार (अनिल कपूर) जो सेना में देश रक्षा के कर्तव्यवश अपने परिवार की अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पाता है और यह अपराध बोध उसके मन पर छाया रहता है, जिसे वह किसी से भी बांट नहीं पाता, जब अपने गांव लौटता है, तो व्यवस्था के प्रति उसका क्रोध किस तरह फूटता है यह कहानी है सूबेदार की।</p>
<p style="text-align:justify;">सूबेदार का अपराधबोध जन्य क्रोध उसे अपनी बेटी (राधिका मदान) से भी खुलने नहीं देता, जो दोनों के बीच एक अविश्वास को पैदा कर देता है। यह एक सब प्लॉट है सूबेदार का। एक दोस्त है सूबेदार का (सौरभ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574348/ott-subedar-2026"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/वायरल-तस्वीर-(11)2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सेना का एक सूबेदार (अनिल कपूर) जो सेना में देश रक्षा के कर्तव्यवश अपने परिवार की अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पाता है और यह अपराध बोध उसके मन पर छाया रहता है, जिसे वह किसी से भी बांट नहीं पाता, जब अपने गांव लौटता है, तो व्यवस्था के प्रति उसका क्रोध किस तरह फूटता है यह कहानी है सूबेदार की।</p>
<p style="text-align:justify;">सूबेदार का अपराधबोध जन्य क्रोध उसे अपनी बेटी (राधिका मदान) से भी खुलने नहीं देता, जो दोनों के बीच एक अविश्वास को पैदा कर देता है। यह एक सब प्लॉट है सूबेदार का। एक दोस्त है सूबेदार का (सौरभ शुक्ला) जो हर हाल में साथ है, जो एक से हालात में रहने से पैदा हुई सहानुभूति को दर्शाता है और दूसरी तरफ व्यवस्था में भ्रष्टाचार (कोऑपरेटिव बैंक का माहौल) और गुंडागर्दी ( मोना सिंह, आदित्य रावल और फैसल मलिक) है, जिससे सूबेदार को निपटना है। कुल मिलाकर सारे के सारे चरित्र अधकचरे हैं सिवाय सूबेदार के और वह भी फिल्म में खुद को जस्टिफाई करने में असफल है। </p>
<p style="text-align:justify;">लगता है कि निर्देशक और लेखक का एक मात्र उद्देश्य अनिल कपूर को एक्शन हीरो दिखाकर ओटीटी की दुनिया में जमाना और शायद वह उसमें सफल हुए हैं और इस चक्कर में सौरभ शुक्ला और मोना सिंह जैसे दो बहुत अच्छे एक्टर्स कुर्बान हो गए। दोनों को कुछ डायलॉग्स और सींस मिले हैं, पर दोनों करीब-करीब बेअसर। मोना सिंह कई बार सुरेखा सीकरी की याद दिलाती है, मुझे लगता है वह धीरे-धीरे लुक्स और डायलॉग डिलीवरी में उसके जैसी होती जा रही है, इसे प्रशंसा समझें पर सूबेदार में तो व्यर्थ हो गई हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">राधिका मदान ने अच्छा रोल किया है, परंतु कमजोर लेखन और निर्देशन की गलतियों के कारण उसका चरित्र स्थापित ही नहीं हो पाता। खुशबू और नाना को दिखाने की आवश्यकता ही क्या थी? बाकी लोगों ने बेकार में खूब फुटेज खाया है। निर्देशक बहुत समय तक फिल्म में अपने उद्देश्य को ही नहीं बता पाता। कुछ भी क्यों हो रहा है बस आप सोचते रहिए, बल्कि अंत तक कहानी के टुकड़े जोड़ना ही कठिन है। अंत ने तो उद्देश्य रहित लेखन की पोल ही खोल दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ अनिल कपूर हैं फिल्म में। ओढ़िये या बिछाइए। पार्श्व संगीत कहीं-कही प्रभावित करता है पर लाउड है। संवाद एकदम बेकार हैं। दृश्यंकन में कल्पना का अभाव है , आसमान में ऊंचे हवाई जहाज की परछाईं जमीन पर आपने देखी है? अगर अनिल और राधिका से आपका मन भरे, एक्शन आपको भाता हो, तो देखिए सूबेदार, कहानी तो बेदम है। सोचिए, क्या हमें फिल्मों में कबीर सिंह, एनिमल, गर्लफ्रेंड के नायकों के अतिचारी चरित्रों से बचना इतना कठिन होता जा रहा है कि कहानी के और कोमल अंगों पर ध्यान ही न दिया जा सके? क्या-क्या और बर्बाद कर के दम लेंगे हम? <strong><span style="color:rgb(186,55,42);">समीक्षक</span> -ब्रज राज नारायण सक्सेना</strong></p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मनोरंजन</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>ग्लैमवर्ल्ड</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 09:00:59 +0530</pubDate>
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