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                <title>Editorials - Amrit Vichar</title>
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                <description>Editorials RSS Feed</description>
                
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                <title>संपादकीय : इस जीत का संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[फीफा विश्व कप 2026 में स्पेन की ऐतिहासिक जीत, फुटबॉल की मजबूत प्रणाली और भारतीय फुटबॉल के भविष्य पर पढ़ें सटीक संपादकीय विश्लेषण।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/588282/editorial-message-of-this-victory"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-011.jpg" alt=""></a><br /><p>फीफा विश्व कप 2026 का फाइनल परिणाम की दृष्टि से ऐतिहासिक रहा, मुकाबला रणनीतिक रक्षात्मक खेल और बार-बार हुए फाउल से पैदा हुई रुकावटों के कारण निराशाजनक और थकाऊ भले लगा, लेकिन स्पेन 1-0 की ऐतिहासिक जीत के साथ एक ही समय में पुरुष और महिला दोनों विश्व कप अपने नाम रखने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। स्पेन की यह कीर्तिमानी उपलब्धि बताती है कि किसी एक स्वर्णिम पीढ़ी या खिलाड़ी विशेष का औचक चमत्कार नहीं, बल्कि दशकों से विकसित की गई फुटबॉल संस्कृति, जमीनी अकादमियों, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और स्पष्ट खेल-दर्शन का परिणाम है। उसने एक बार फिर सिद्ध किया कि विश्व कप केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि मजबूत प्रणाली से जीते जाते हैं, लेकिन विश्व कप की इस जीत ने एक पुराने प्रश्न को फिर जीवित कर दिया।</p>
<p>1930 से अब तक 23 विश्व कप टूर्नामेंटों में 80 से अधिक देशों ने भाग लिया है, फिर भी केवल आठ देशों ने ही यह खिताब जीता है। ब्राज़ील, इटली, जर्मनी, इंग्लैंड, अर्जेंटीना, उरुग्वे, फ्रांस और स्पेन— आखिर यही देश बार-बार विश्व चैंपियन क्यों बनते रहे हैं? कोई नया देश इस सूची में क्यों नहीं जुड़ पाता? किसी देश के लिए विश्व कप जीतने का वास्तविक सूत्र क्या है? क्या इसका आधार आर्थिक समृद्धि, विशाल जनसंख्या, लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती, फुटबॉल के प्रति जन-दीवानगी, पुरुषों का शारीरिक सौष्ठव अथवा विदेशों से प्रतिभा लाना या फिर फुटबॉल के विकास की सुदृढ़ व्यवस्था है? जापान जैसे देशों ने विश्व रैंकिंग में उल्लेखनीय छलांग कैसे लगाई? कुराकाओ की आबादी मात्र डेढ़ लाख और काबो वर्डे की लगभग छह लाख है। दोनों की आबादी भारत के एक छोटे जिले से भी कम है, फिर भी वे विश्व फुटबॉल में सम्मानजनक उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। दूसरी ओर, भारत आज तक विश्व कप के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर पाता।</p>
<p>सफलता का कारण केवल आर्थिक समृद्धि या बड़ी आबादी होता तो चीन और सऊदी अरब फुटबॉल के महाशक्ति बन जाते। उरुग्वे जैसा छोटा देश चार प्रमुख वैश्विक खिताब नहीं जीत पाता। छोटे-छोटे देशों का विश्व मंच पर प्रभावशाली प्रदर्शन उनकी मजबूत फुटबॉल संरचना का ही परिणाम है। सफलता का वास्तविक सूत्र है स्कूल स्तर पर प्रतिभा की पहचान, मजबूत स्थानीय क्लब संस्कृति, प्रशिक्षकों का निरंतर विकास, प्रतिस्पर्धी घरेलू लीग और दीर्घकालिक खेल नीति। जापान जे-लीग की स्थापना, विद्यालयों और क्लबों के बीच मजबूत तालमेल, विदेशी विशेषज्ञों की मदद तथा युवाओं पर निरंतर निवेश से ही विश्व फुटबॉल की सम्मानजनक शक्ति बना है। आज जापानी खिलाड़ी यूरोप की शीर्ष लीगों में खेल रहे हैं।</p>
<p>भारत को यदि फीफा के नक्शे पर अपनी जगह बनानी है, तो सरकार और ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन को दो दशकों का स्पष्ट विज़न रोडमैप तैयार कर बुनियादी स्तर पर क्रांतिकारी बदलाव करने के अलावा कॉर्पोरेट और सरकारी सहयोग से आत्मनिर्भर तथा पेशेवर फुटबॉल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा, अन्यथा1.4 अरब की आबादी के लिए विश्व कप केवल टीवी स्क्रीन तक ही सीमित रहेगा। स्पेन की जीत और छोटे देशों का उभार बताता है कि सही दृष्टि, मजबूत संस्थागत व्यवस्था एवं दीर्घकालिक समर्पण के साथ कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 07:02:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेजन का संकट और वैश्विक उदासीनता  </title>
                                    <description><![CDATA[अमेज़न को पृथ्वी के ‘फेफड़े’ कहा जाता है। यह क्षेत्र वैश्विक जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही जंगल आज आर्थिक हितों और संगठित अपराध के दबाव में लगातार सिकुड़ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/588277/the-amazon-crisis-and-global-apathy"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/640.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-07/513.jpg" alt="5" width="154" height="154"></img>
कुमार सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">किसी युद्ध की कल्पना करते ही आंखों के सामने टैंक, लड़ाकू विमान, मिसाइलें और धधकते शहरों की तस्वीर उभरती है, लेकिन इक्कीसवीं सदी का एक ऐसा युद्ध भी है, जो बिना औपचारिक घोषणा के लगातार जारी है। इसमें न सेनाएं आमने-सामने हैं, न सीमाओं पर गोलाबारी हो रही है और न ही किसी देश ने युद्ध का एलान किया है। फिर भी इस संघर्ष में हर साल हजारों वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं, समुदाय विस्थापित हो रहे हैं और पर्यावरण की रक्षा करने वाले लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। यह युद्ध दक्षिण अमेरिका के अमेज़न वर्षावनों में चल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेज़न को पृथ्वी के ‘फेफड़े’ कहा जाता है। विश्व के सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में शामिल यह क्षेत्र वैश्विक जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। करोड़ों टन कार्बन को अपने भीतर समेटे यह वन केवल ब्राज़ील की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा धरोहर है, लेकिन यही जंगल आज आर्थिक हितों और संगठित अपराध के दबाव में लगातार सिकुड़ रहा है। अमेज़न केवल दुनिया का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन नहीं है। लगभग 67 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला यह वन पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण आधार है। दुनिया के शेष उष्णकटिबंधीय वनों का लगभग आधा हिस्सा यहीं स्थित है। </p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक स्तर पर ज्ञात जैव विविधता की लगभग 10 प्रतिशत प्रजातियां अमेज़न में पाई जाती हैं। करीब 4.7 करोड़ लोग, जिनमें 350 से अधिक आदिवासी समुदाय शामिल हैं, इसी पारिस्थितिकी तंत्र पर अपनी आजीविका और संस्कृति के लिए निर्भर हैं, इसलिए अमेज़न का संकट किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता का संकट है। लंबे समय तक जंगलों को विकास में बाधा माना जाता रहा। सड़कें, खनन, बड़े कृषि फार्म और औद्योगिक परियोजनाएं आर्थिक प्रगति के प्रतीक बन गईं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह स्पष्ट हुआ है कि प्रकृति की कीमत पर हासिल विकास अंततः समाज और अर्थव्यवस्था दोनों को असुरक्षित बना देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्राज़ील के अमेज़न क्षेत्र में यही स्थिति दिखाई देती है। जंगलों को साफ कर कृषि भूमि बनाई जा रही है, खनिजों के दोहन के लिए बड़े पैमाने पर खनन हो रहा है और लकड़ी का अवैध कारोबार लगातार फैल रहा है। इन गतिविधियों के साथ भूमि पर कब्ज़े, हिंसा और संगठित अपराध का गठजोड़ भी मजबूत हुआ है। जहां जंगल कमज़ोर पड़ता है, वहां लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमज़ोर होती दिखाई देती हैं। ब्राज़ील के पास्टोरल लैंड कमीशन (CPT) के अनुसार हाल के वर्षों में देश में दर्ज ग्रामीण भूमि-संघर्षों में आधे से अधिक मामले अकेले अमेज़न क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। वर्ष 2024 में 2,185 भूमि-संघर्ष दर्ज किए गए, जिनमें 1,180 मामले अमेज़न क्षेत्र के थे। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है; यह प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी जंगल जीवन का आधार थे, आज वे पूंजी का आधार बनते जा रहे हैं। भूमि पर नियंत्रण का अर्थ अब केवल खेती नहीं रह गया है। उसके साथ खनिज संपदा, जल संसाधन, जैव विविधता, कार्बन बाज़ार, परिवहन मार्ग और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव भी जुड़ गए हैं। इसी कारण जंगलों में अवैध खनन, लकड़ी की तस्करी, मादक पदार्थों के नेटवर्क और धन शोधन जैसी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ती जा रही हैं। पर्यावरण अपराध अब अलग-थलग अपराध नहीं रहे; वे संगठित आर्थिक तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यही वजह है कि अमेज़न के अनेक हिस्सों में राज्य की औपचारिक सत्ता से अधिक प्रभाव अपराधी समूहों का दिखाई देता है। नदियां परिवहन के प्राकृतिक मार्ग होने के कारण अवैध व्यापार की राह बन जाती हैं और जंगलों के भीतर बसे समुदाय सबसे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। जंगलों की रक्षा करने वाले लोग ही सबसे अधिक खतरे में हैं। आदिवासी समुदाय, नदी किनारे रहने वाले परिवार, वन उत्पादों पर निर्भर समाज और पर्यावरण कार्यकर्ता वर्षों से इन क्षेत्रों की रक्षा करते आए हैं। वे जंगल को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानते हैं, लेकिन जब जंगल आर्थिक हितों का केंद्र बन जाता है, तो यही समुदाय सबसे पहले निशाने पर आते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरण कार्यकर्ता चिको मेंडेस की हत्या 1988 में हुई थी। वे रबर उत्पादक समुदायों और जंगलों के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे थे। उनकी हत्या ने दुनिया का ध्यान अमेज़न की ओर खींचा, लेकिन हिंसा रुकी नहीं। आज भी पर्यावरण रक्षकों की हत्या, धमकी और झूठे मुकदमे अनेक देशों में सामान्य घटना बन चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि दुनिया भर में पर्यावरण और भूमि अधिकारों की रक्षा करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए सबसे जोखिम वाले क्षेत्रों में अमेज़न शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेज़न का संकट केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। जंगलों की कटाई से वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ती है। वर्षा चक्र प्रभावित होता है और सूखे तथा अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं बढ़ने लगती हैं। दूसरी ओर, जब पानी और उपजाऊ भूमि की उपलब्धता घटती है, तो प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष तेज़ हो जाता है। यानी जलवायु परिवर्तन और हिंसा एक-दूसरे को बढ़ाने वाले कारक बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरण का विनाश केवल पारिस्थितिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का भी कारण बन रहा है। यह मान लेना आसान होगा कि अमेज़न का संकट केवल ब्राज़ील की नीतियों का परिणाम है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। दुनिया भर के बाज़ारों में पहुंचने वाला गोमांस, सोयाबीन, लकड़ी और खनिजों का एक हिस्सा उन इलाकों से आता है, जहां वनों की कटाई और भूमि संघर्ष जारी हैं।<strong> (ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 05:59:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : अंतरिक्ष का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की वैज्ञानिक क्षमता और दूरदृष्टि का पर्याय रहा है, किंतु अब भारत ने एक नई ऐतिहासिक छलांग लगाई है। निजी कंपनी द्वारा विकसित स्वदेशी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम के सरकारी मॉडल से सार्वजनिक-निजी साझेदारी वाले नए व्यावसायिक युग में प्रवेश का उद्घोष है। यह उपलब्धि असाधारण है, क्योंकि अब भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में आ गया है, जहां निजी क्षेत्र केवल उपग्रह या पुर्जे नहीं बनाता, बल्कि स्वयं कक्षीय प्रक्षेपण की क्षमता रखता है। इसका अर्थ है कि भारत वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/588124/new-chapter-of-editorial-space"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-011.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की वैज्ञानिक क्षमता और दूरदृष्टि का पर्याय रहा है, किंतु अब भारत ने एक नई ऐतिहासिक छलांग लगाई है। निजी कंपनी द्वारा विकसित स्वदेशी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम के सरकारी मॉडल से सार्वजनिक-निजी साझेदारी वाले नए व्यावसायिक युग में प्रवेश का उद्घोष है। यह उपलब्धि असाधारण है, क्योंकि अब भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में आ गया है, जहां निजी क्षेत्र केवल उपग्रह या पुर्जे नहीं बनाता, बल्कि स्वयं कक्षीय प्रक्षेपण की क्षमता रखता है। इसका अर्थ है कि भारत वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण बाजार में अब केवल इसरो के भरोसे नहीं, बल्कि अनेक प्रतिस्पर्धी निजी कंपनियों के साथ उतर रहा है। यही परिपक्व अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की पहचान होती है।</p>
<p>कुछ महीने पहले गैलेक्सआई के 'मिशन दृष्टि' के अंतर्गत दुनिया के पहले ऑप्टोसार उपग्रह की सफलता ने यह संकेत दिया था कि भारतीय निजी कंपनियां कम लागत में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी विकसित कर सकती हैं। अब विक्रम-1 ने उस विश्वास को अगले स्तर पर पहुंचा दिया है। तय हुआ कि भारत निजी क्षेत्र के माध्यम से संपूर्ण अंतरिक्ष मूल्य-श्रृंखला—रॉकेट, उपग्रह, प्रक्षेपण और अंतरिक्ष सेवाओं में प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में पहुंच रहा है। विशेष रूप से पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों से प्राप्त दृश्य आंकड़ों का वैश्विक बाजार अत्यंत तेज़ी से बढ़ रहा है। उच्च गुणवत्ता वाले उपग्रह चित्र आज कृषि, बीमा, खनन, शहरी नियोजन, सीमा सुरक्षा, जल संसाधन, मौसम पूर्वानुमान तथा रक्षा जैसे क्षेत्रों की आधारभूत आवश्यकता बन चुके हैं। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में स्पेस-आधारित डेटा सेवाएं स्वयं प्रक्षेपण उद्योग से कहीं बड़ा आर्थिक अवसर बनेंगी। भारत की निजी कंपनियां यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ इन आंकड़ों का विश्लेषण जोड़ती हैं, तो वे वैश्विक डेटा-इंटेलिजेंस बाजार में भी महत्वपूर्ण स्थान बना सकती हैं।</p>
<p>2020 में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने तथा इन-स्पेस जैसी संस्थागत व्यवस्था बनाने का परिणाम अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आज देश में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हैं। कोई प्रक्षेपण यान विकसित कर रहा है, कोई उपग्रह, कोई प्रणोदन प्रणाली, तो कोई अंतरिक्ष-आधारित डेटा सेवाएं या रक्षा अनुप्रयोग विकसित कर रहा है। कई भारतीय कंपनियां विदेशी ग्राहकों के लिए भी उपग्रह और अंतरिक्ष प्रणालियां बना रही हैं। सरकार का लक्ष्य 2033 तक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को लगभग 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने तथा निर्यात को 11 अरब डॉलर तक ले जाने का है।</p>
<p>यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी अवश्य है, किंतु निजी निवेश, वैश्विक मांग और इसरो की विश्वसनीयता इसे यथार्थवादी आधार प्रदान करती है। श्रीहरिकोटा के विस्तार तथा तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में दूसरे स्पेसपोर्ट का निर्माण भी इसी रणनीति का हिस्सा है। अधिक प्रक्षेपण स्थल उपलब्ध होने से निजी कंपनियों को समय, लागत और संचालन में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। गगनयान मिशन की संभावित सफलता इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में निवेशकों का विश्वास और बढ़ाएगी। भारत अब केवल अंतरिक्ष तक पहुंचने की नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, ऑर्बिटल अवसंरचना और गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण में दीर्घकालिक नेतृत्व की तैयारी कर रहा है। विक्रम-1 की उड़ान इसी भविष्य की पहली व्यावसायिक दस्तक है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 07:01:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : त्रिभाषा की चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[अमृत विचार संपादकीय: सीबीएसई के त्रिभाषा सूत्र, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दृष्टिकोण पर पढ़ें सटीक विश्लेषण।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587927/editorial-three-language-challenge"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-012.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत में भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और राजनीति का संवेदनशील विषय है। ऐसे में सीबीएसई के त्रिभाषा सूत्र और इस पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दृष्टिकोण को मात्र 'हिंदी बनाम अंग्रेजी' के विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति की उस भावना को लागू करना है, जो विद्यार्थियों को बहुभाषी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना चाहती है। न्यायालय का हस्तक्षेप भी इसी बात को रेखांकित करता है कि भाषाई नीति संवैधानिक मूल्यों, छात्रों के हितों के लिए उचित और अनुकूल तो है, पर तीसरी भाषा का पाठ्यक्रम उसे नवीं कक्षा से आरंभ करने के बजाए शुरुआती कक्षाओं से ही लागू करना चाहिए।</p>
<p>वास्तव में त्रिभाषा सूत्र के तीन स्पष्ट स्तर हैं, पहला- मातृभाषा में बौद्धिक विकास; दूसरा, किसी अन्य भारतीय भाषा के जरिए राष्ट्रीय व सांस्कृतिक जुड़ाव; और तीसरा, वैश्विक अवसरों के लिए अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा का ज्ञान। वैज्ञानिक शोध भी मानते हैं कि मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा बच्चों की मौलिक समझ और रचनात्मकता को मजबूत करती है। बहुभाषी विद्यार्थी भविष्य के वैश्विक रोजगार बाजार में अधिक सक्षम साबित होते हैं। आज एआई, अनुवाद, कूटनीति, पर्यटन और डिजिटल अर्थव्यवस्था में बहुभाषिकता एक बड़ी ताकत है। ऐसे में सरकारी दावे 'भाषाई मुक्ति' का अर्थ अंग्रेजी से पूर्णतः दूरी बनाना नहीं, बल्कि केवल अंग्रेजी की निर्भरता से आगे बढ़कर अपनी भाषाओँ में भी सक्षम होना है, हालांकि व्यावहारिक चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। यदि अंग्रेजी को सामान्य 'विदेशी भाषा' मानकर इसकी भूमिका को कमतर किया गया, तो यह हमारे छात्रों के हित में नहीं होगा। आज उच्च शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और न्यायपालिका की मुख्य कार्यभाषा अंग्रेजी ही है, इसलिए यदि कोई छात्र अंग्रेजी, हिंदी और एक क्षेत्रीय भाषा चुनता है, तो उसे त्रिभाषा सूत्र की मूल भावना के अनुरूप ही माना जाना चाहिए। ऐसा न हो कि अन्य विदेशी भाषाएं जैसे जापानी, फ्रेंच या जर्मन उसे चौथी भाषा के तौर पर उसी स्कूल या उससे बाहर अलग से व्यय कर के सीखनी पड़े। इससे छात्रों, अभिभावकों पर अतिरिक्त शैक्षणिक और आर्थिक बोझ पड़ेगा। सबसे बड़ी चिंता इसके क्रियान्वयन की है। कक्षा छह से तीन भाषाएं पढ़ाने का विचार तभी सफल होगा, जब पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण पाठ्य पुस्तकें और बुनियादी ढांचा तैयार हो। बिना ठोस तैयारी के इस नीति को थोपने से इसका मूल उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा। यह आशंका कि त्रिभाषा सूत्र सांस्कृतिक वर्चस्व थोपने का माध्यम है, केवल राजनीतिक लचीलेपन से दूर हो सकती है। </p>
<p>यदि राज्यों और विद्यार्थियों को भारतीय भाषाओं के चयन की पूरी स्वतंत्रता मिले, तो यह विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा। कुल मिलाकर भारत को एक ऐसी व्यावहारिक बहुभाषा नीति चाहिए, जो हमारी मातृभाषा की जड़ों को मजबूत करे, अन्य भारतीय भाषाओं से जुड़ाव बढ़ाए और अंग्रेजी के माध्यम से वैश्विक अवसरों के द्वार भी खुले रखे। शिक्षा का उद्देश्य भाषाई संघर्ष पैदा करना नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो अपनी जड़ों से जुड़ी हो और दुनिया से आत्मविश्वास के साथ संवाद कर सके। संभव है सरकार और शिक्षा शास्त्री इस बारे में गंभीरता और उदारता से सोचेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 07:00:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय : टैरिफ की राजनीति</title>
                                    <description><![CDATA[संपादकीय: रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका के 100% टैरिफ बिल का भारत के व्यापार, रक्षा और विदेश नीति पर क्या असर होगा? पढ़ें सटीक विश्लेषण।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587762/editorial-tariff-politics"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-011.jpg" alt=""></a><br /><p>रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का संशोधित अमेरिकी विधेयक व्यापार का कम भू-राजनीति का औजार ज्यादा है। यह अभी विचाराधीन है पर इसके पारित होने की अधिक आशंका भारत के लिए चिंतनीय है। कम ही संभावना है कि प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया, राष्ट्रपति के विवेकाधिकार और व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते इसको बदला जाए। जहां पूर्व प्रस्तावित 500 फीसद का टैरिफ अव्यावहारिक था, वहीं अधिकतम 100 प्रतिशत का टैरिफ भी कठोर और बस दबाव बाने के काम का है। वास्तव में विधेयक का उद्देश्य राजस्व जुटाना नहीं, भारत, चीन जैसे तेल खरीदारों को रूस से ऊर्जा आयात घटाने पर मजबूर करना है। </p>
<p>100 प्रतिशत टैरिफ लागू हुआ, तो भारत का अमेरिका को निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा। विशेष रूप से फार्मा, वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और रसायन जैसे क्षेत्रों की हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ेगी। भारत पर टैरिफ की धमकी, व्यापार वार्ता में दबाव बनाने और अमेरिकी शर्तों पर समझौता कराने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर अरबों डॉलर की बचत की है, लेकिन भविष्य में अमेरिकी टैरिफ लागू हुए तो निर्यात हानि, ऊंचे व्यापार लागत और आपूर्ति शृंखला व्यवधान के चलते बचत का दस गुना नुकसान संभव है। रक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा, क्योंकि भारत की सैन्य प्रणालियों का महत्वपूर्ण हिस्सा अभी भी रूसी मूल का है। यदि रूस से रक्षा उपकरणों और पुर्जों के लेन-देन पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगते हैं, तो रखरखाव और आधुनिकीकरण की लागत बढ़ सकती है। अमेरिका ने अपने कथित मित्र और घोषित शत्रु, भारत और चीन को एक ही श्रेणी में इसलिए रखा है, क्योंकि दोनों रूस के सबसे बड़े तेल खरीदारों में हैं। वह खरीदार देशों पर द्वितीयक आर्थिक दबाव बनाना चाहता है, लेकिन कुछ यूरोपीय देशों के लिए छूट का प्रावधान इस बहाने से रखा गया है कि वे रूस पर अपनी ऊर्जा निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं। यह यूरोपीय सहयोगियों के साथ टकराव सीमित रखने के लिए शुद्ध कूटनीतिक उपक्रम है, समान मानदंड नहीं। भारत को यह भी समझना होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही व्यक्तिगत स्तर पर प्रधानमंत्री से दोस्ताना जताएं, पर जब बात व्यापार या विदेश नीति की आती है, तो वे भारत को उस नजरिए से नहीं देखते। ट्रंप कभी भारत को पाकिस्तान के समकक्ष रख देते हैं, तो कभी चीन के खाने में।</p>
<p>यदि यह टैरिफ वास्तव में लागू होता है, तो उसका अंतिम बोझ केवल निर्यातकों पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों पर भी पड़ेगा— रोजगार, निवेश, विनिर्माण और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में भारत की प्रतिक्रिया न तो टकरावपूर्ण होनी चाहिए और न ही दबाव के आगे झुकने वाली। भारत को स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी ऊर्जा और रक्षा खरीद उसके राष्ट्रीय हितों पर आधारित है, किसी तीसरे देश के विरुद्ध नहीं। साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की वार्ता जारी रखते हुए निर्यात बाजारों का विविधीकरण, ऊर्जा स्रोतों का विस्तार और रक्षा आयात का स्वदेशीकरण तेज करना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 07:01:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय : भारत पर युद्धभार</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका टकराव से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और नागरिकों पर गहरा असर पड़ रहा है। पढ़ें सटीक विश्लेषण।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587676/editorial-war-burden-on-india"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-012.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत के लिए पश्चिम एशिया में ईरान–अमेरिका के सैन्य टकराव की कीमत बढ़ती ही जा रही है। इसका सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, उर्वरक आपूर्ति, निर्यात, समुद्री कर्मियों की सुरक्षा और विदेश नीति पर दिखाई दे रहा है। भारत द्वारा ईरान के समक्ष होर्मुज क्षेत्र में जहाजों पर हमले रोकने का कड़ा विरोध इसी बढ़ते संकट का संकेत है। यह कूटनीतिक रूप से आवश्यक था, किंतु यथार्थ यह है कि युद्ध के बीच केवल विरोध दर्ज कराने से मिसाइलें और ड्रोन नहीं रुकते। यदि किसी अमेरिकी कार्रवाई से भारतीय जहाज या नागरिक प्रभावित होते हैं, तो भारत को उसी स्पष्टता और दृढ़ता के साथ अपना विरोध युद्ध में शामिल अमेरिका के समक्ष भी दर्ज कराना होगा।</p>
<p>भारत की विदेश नीति का आधार किसी पक्ष का समर्थन नहीं, बल्कि अपने नागरिकों और राष्ट्रीय हितों की रक्षा होना चाहिए। 28 फरवरी के बाद खाड़ी क्षेत्र में भारतीय नागरिकों की मौत, लापता होने और घायल होने की घटनाएं बताती हैं कि संकट अब गहरा रहा है। ऐसे में सरकार द्वारा प्रत्येक भारतीय नाविक की 24 घंटे निगरानी, परिवारों के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति तथा विदेश मंत्रालय, नौसेना, महानिदेशक नौवहन, पेट्रोलियम मंत्रालय और भारतीय दूतावासों के बीच समन्वित तंत्र बनाना स्वागतयोग्य कदम है। इससे संकट की स्थिति में त्वरित संपर्क, सूचना साझा करने और बचाव की गति बढ़ेगी, हालांकि यह व्यवस्था हमलों को रोक नहीं सकती; यह केवल उनके दुष्परिणामों को सीमित कर सकती है। भारत पहले भी संकल्प, राहत, गंगा, कावेरी और सिंधु जैसे अभियानों के माध्यम से अपने नागरिकों की सुरक्षित निकासी की क्षमता प्रदर्शित कर चुका है, किंतु यदि युद्ध क्षेत्र में सक्रिय रूप से अमेरिकी, ईरानी और संभवतः इजरायली सेनाएं आमने-सामने हों, तो भारतीय नौसेना की भूमिका मुख्यतः एस्कॉर्ट, निगरानी, मानवीय सहायता और सुरक्षित निकासी तक सीमित रहेगी। किसी सैन्य संघर्ष में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भारत की घोषित नीति नहीं है। समुद्री कर्मियों की जान के साथ ही आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ रही है। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे खाड़ी देशों को भारत का लगभग 93 हजार करोड़ रुपये का निर्यात, होर्मुज मार्ग से होने वाला ऊर्जा आयात तथा उर्वरक कच्चे माल की निर्भरता दांव पर लगी है। भारत लगभग 43 प्रतिशत यूरिया, 44 प्रतिशत सल्फर और 25 प्रतिशत अमोनिया इसी समुद्री मार्ग से प्राप्त करता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो खरीफ सीजन में उर्वरक आपूर्ति प्रभावित होगी। लंबा व्यवधान कीमतों और उपलब्धता दोनों पर दबाव बढ़ाएगा। भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता स्पष्ट है— अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति का विविधीकरण, रणनीतिक तेल भंडार का विस्तार, वैकल्पिक समुद्री मार्गों की तैयारी तथा सभी पक्षों से समान दूरी रखते हुए शांति की कूटनीति।</p>
<p>युद्ध में सबसे महंगी कीमत वही देश चुकाते हैं, जो युद्ध नहीं लड़ रहे होते, लेकिन जिनकी अर्थव्यवस्था और नागरिक उसकी चपेट में आ जाते हैं। भारत को इस चुनौती का सामना दूरदृष्टि, संयम और निर्णायक तैयारी के साथ करना होगा। सुरक्षित और स्वतंत्र नौवहन के लिए संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन, जी-20 तथा प्रमुख समुद्री शक्तियों को भी शीघ्र सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 07:04:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : समुद्री संप्रभुता का संघर्ष</title>
                                    <description><![CDATA[<p>होर्मुज जलडमरूमध्य अब केवल तेल आपूर्ति का मार्ग नहीं रहा, बल्कि समुद्री संप्रभुता, अंतर्राष्ट्रीय कानून और शक्ति-संतुलन की नई प्रयोगशाला बन चुका है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच ओमान और ईरान द्वारा जहाजों की आवाजाही के लिए वैकल्पिक नौवहन गलियारे तथा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन की मध्यस्थता में अस्थायी समुद्री कॉरिडोर की पहल यह संकेत देती है कि युद्ध के बीच भी कूटनीति पूरी तरह समाप्त नहीं होती, किंतु इन प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष इन्हें सुरक्षा व्यवस्था मानते हैं या अपनी-अपनी संप्रभुता का विस्तार।</p>
<p>जहाजों के आवागमन को अलग-अलग</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587437/editorial-conflict-of-maritime-sovereignty"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-012.jpg" alt=""></a><br /><p>होर्मुज जलडमरूमध्य अब केवल तेल आपूर्ति का मार्ग नहीं रहा, बल्कि समुद्री संप्रभुता, अंतर्राष्ट्रीय कानून और शक्ति-संतुलन की नई प्रयोगशाला बन चुका है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच ओमान और ईरान द्वारा जहाजों की आवाजाही के लिए वैकल्पिक नौवहन गलियारे तथा अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन की मध्यस्थता में अस्थायी समुद्री कॉरिडोर की पहल यह संकेत देती है कि युद्ध के बीच भी कूटनीति पूरी तरह समाप्त नहीं होती, किंतु इन प्रयासों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष इन्हें सुरक्षा व्यवस्था मानते हैं या अपनी-अपनी संप्रभुता का विस्तार।</p>
<p>जहाजों के आवागमन को अलग-अलग दिशा में नियंत्रित करने के लिए दो नौवहन गलियारों का विचार तकनीकी दृष्टि से व्यावहारिक है। इससे दुर्घटना तथा सैन्य टकराव की आशंका घटती है। व्यवस्था अस्थाई ही सही पर आईएमओ के समन्वय से अब तक 136 फंसे हुए जहाजों तथा लगभग 2,900 नाविकों को चरणबद्ध तरीके से सुरक्षित बाहर निकाला जाना सुखद है, किंतु सबसे बड़ी चुनौती यह है कि होर्मुज के उत्तरी तट पर प्रभावी नियंत्रण ईरान का है, जबकि दक्षिणी जलक्षेत्र ओमान के अधिकार में आता है। यदि ईरान जहाजों की आवाजाही पर अपनी स्वीकृति या शुल्क व्यवस्था लागू करना चाहता है और अमेरिका, ओमान निर्बाध नौवहन की व्यवस्था पर जोर देता है, तो यह विवाद यातायात प्रबंधन का नहीं, बल्कि अधिकार-क्षेत्र का बन जाता है। फलस्वरूप होर्मुज के भीतर एक प्रकार का ‘दूसरा होर्मुज’ के उभरने से एक मामूली समुद्री घटना भी व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का कारण बन सकती है। इतिहास बताता है कि अनेक बड़े युद्ध छोटे समुद्री विवादों से ही शुरू हुए थे। भारत के लिए यह संकट अत्यंत संवेदनशील है। देश के ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी से आता है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो युद्ध जोखिम बीमा, मालभाड़ा और सुरक्षा लागत में 40 से 50 प्रतिशत तक की वृद्धि का बोझ अंततः भारतीय रिफाइनरियों और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। कुछ भारतीय जहाजों को पहले ही अपना मार्ग बदलना पड़ा है तथा कई टैंकरों ने यात्रा स्थगित या वापस लौटने का निर्णय लिया है। इसके अलावा भारतीय नाविकों की सुरक्षा की चिंता सामने है। हजारों भारतीय समुद्री कर्मचारी खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत हैं। मिसाइल, ड्रोन, समुद्री सुरंगों और जहाजों पर हमलों के बीच उनका जीवन सीधे तौर पर जोखिम में है, इसलिए सरकार की प्राथमिकता केवल तेल नहीं, अपने नागरिकों की सुरक्षा भी होनी चाहिए। </p>
<p>भारत की रणनीति बहुआयामी होनी चाहिए। पहला, दोनों पक्षों से समान दूरी रखते हुए ओमान, आईएमओ और खाड़ी देशों के साथ समुद्री सुरक्षा समन्वय बढ़ाया जाए। दूसरा, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विवेकपूर्ण उपयोग और रूस, अफ्रीका तथा अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आयात बढ़ाकर आपूर्ति का विविधीकरण किया जाए। तीसरा, भारतीय नौसेना की एस्कॉर्ट क्षमता तथा समुद्री निगरानी को और मजबूत किया जाए, ताकि भारतीय ध्वज वाले जहाज सुरक्षित आवागमन कर सकें। होर्मुज का संकट केवल समुद्री मार्ग का प्रश्न नहीं है। यह तय करेगा कि 21वीं सदी में वैश्विक समुद्री व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय कानून से चलेगी या क्षेत्रीय शक्ति-राजनीति से। भारत जैसे समुद्री व्यापार पर निर्भर देश के लिए यही सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 07:00:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय : नई सामरिक साझेदारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूज़ीलैंड यात्रा ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत की कूटनीति को एक नया आयाम दिया है। लगभग चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह यात्रा केवल औपचारिक राजनयिक आयोजन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति के बीच दो लोकतांत्रिक देशों के संबंधों को ‘सामरिक साझेदारी’ तक ले जाने का प्रयास है। मुक्त व्यापार समझौते के क्रियान्वयन, रोडमैप-2030, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, कृषि, शिक्षा, खेल और उभरती प्रौद्योगिकियों में हुए समझौते इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश अब केवल व्यापारिक भागीदार नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा रणनीतिक हितों वाले सहयोगी बनना चाहते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587336/editorial--a-new-strategic-partnership"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sampadkiy24.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूज़ीलैंड यात्रा ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत की कूटनीति को एक नया आयाम दिया है। लगभग चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह यात्रा केवल औपचारिक राजनयिक आयोजन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति के बीच दो लोकतांत्रिक देशों के संबंधों को ‘सामरिक साझेदारी’ तक ले जाने का प्रयास है। मुक्त व्यापार समझौते के क्रियान्वयन, रोडमैप-2030, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, कृषि, शिक्षा, खेल और उभरती प्रौद्योगिकियों में हुए समझौते इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश अब केवल व्यापारिक भागीदार नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा रणनीतिक हितों वाले सहयोगी बनना चाहते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच अब तक व्यापार अपेक्षाकृत सीमित रहा है, लेकिन दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को लगभग दोगुना कर 35,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य, उम्मीद बढ़ाने वाला है। न्यूज़ीलैंड डेयरी, कृषि प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रसंस्करण, नवीकरणीय ऊर्जा और शिक्षा के क्षेत्र में हमारा विश्वसनीय साझेदार बन सकता है, जबकि न्यूज़ीलैंड का आकर्षण हमारा बढ़ता बड़ा उपभोक्ता बाजार है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुक्त व्यापार समझौता यदि प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो भारतीय औषधि, सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग वस्तुओं, वस्त्र, समुद्री उत्पाद तथा सेवा क्षेत्र को नए अवसर मिलेंगे। दूसरी ओर न्यूज़ीलैंड के कृषि और डेयरी उत्पादों को भारतीय बाजार तक बेहतर पहुंच प्राप्त होगी। यहीं एक बड़ी चुनौती भी है। भारतीय डेयरी से करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका जुड़ी है। न्यूज़ीलैंड विश्व के सबसे प्रतिस्पर्धी डेयरी निर्यातकों में है। यदि आयात प्रबंधन, शुल्क संरचना और चरणबद्ध बाजार-खोलने की नीति में संतुलन नहीं रखा गया, तो घरेलू उत्पादकों पर दबाव बढ़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">देखना होगा कि सरकार व्यापार उदारीकरण और किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाएगी। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, लॉजिस्टिक समर्थन, हाइड्रोग्राफी और नियमित समुद्री संवाद पर सहमति भारत की समुद्री रणनीति को मजबूती देती है। न्यूज़ीलैंड भले सैन्य महाशक्ति न हो, किंतु दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में उसका प्रभाव महत्वपूर्ण है। दोनों देशों का सहयोग नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था और सुरक्षित समुद्री मार्गों को बल देगा।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुसंधान, नवाचार, शिक्षा और स्टार्टअप सहयोग भविष्य के संबंधों का वास्तविक आधार बन कर भारत की विशाल तकनीकी क्षमता और न्यूज़ीलैंड की नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था मिलकर कृषि-तकनीक, जलवायु-अनुकूल तकनीक, जैव-अर्थव्यवस्था और डिजिटल सेवाओं में नए अवसर उत्पन्न करेगी। वहां तीन लाख भारतीय मूल के लोगों की उपस्थिति भी दोनों देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक सेतु का कार्य करेगी। </p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि महज समझौतों से इतिहास नहीं बदलता। भारत ने अनेक देशों के साथ महत्वाकांक्षी घोषणाएं की हैं, लेकिन बहुत बार उनका अपेक्षित क्रियान्वयन नहीं हो पाया। समझौतों की सफलता व्यापार लक्ष्य, निवेश, तकनीकी सहयोग, रक्षा परियोजनाएं और शिक्षा साझेदारी कितनी तेजी से धरातल पर उतरना होता है। भारत और न्यूज़ीलैंड के संबंध भावनात्मक निकटता से आगे बढ़कर रणनीतिक उपयोगिता के चरण में प्रवेश कर चुके हैं। दोनों देश राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत समन्वय और समयबद्ध कार्यान्वयन बनाए रखते हैं, तो यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों को ही नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, संतुलित वैश्वीकरण और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं को भी नई दिशा दे सकती है। यही इस यात्रा की सार्थक उपलब्धि होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/587336/editorial--a-new-strategic-partnership</link>
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                <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 05:42:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : रणनीति से समृद्धि</title>
                                    <description><![CDATA[<p>ऑस्ट्रेलिया दौरे पर हुए समझौते बदलती वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा असुरक्षा, चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं की चुनौती और प्रौद्योगिकी-प्रधान विश्व व्यवस्था के बीच उभरती नई रणनीतिक साझेदारी के संकेत हैं। दोनों देश मिलकर आने वाले दशक की आर्थिक, सामरिक और तकनीकी चुनौतियों का साझा समाधान विकसित करने के लिए प्रयासरत दिखते हैं। रक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, साइबर प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और खेल जैसे क्षेत्रों में घोषित पहलें इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं।</p>
<p>मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के इस दौर में ऊर्जा महज आर्थिक विषय नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है। तेल, गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति जोखिम का सीधा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587132/prosperity-through-editorial-strategy"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-012.jpg" alt=""></a><br /><p>ऑस्ट्रेलिया दौरे पर हुए समझौते बदलती वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा असुरक्षा, चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं की चुनौती और प्रौद्योगिकी-प्रधान विश्व व्यवस्था के बीच उभरती नई रणनीतिक साझेदारी के संकेत हैं। दोनों देश मिलकर आने वाले दशक की आर्थिक, सामरिक और तकनीकी चुनौतियों का साझा समाधान विकसित करने के लिए प्रयासरत दिखते हैं। रक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, साइबर प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और खेल जैसे क्षेत्रों में घोषित पहलें इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं।</p>
<p>मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के इस दौर में ऊर्जा महज आर्थिक विषय नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है। तेल, गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति जोखिम का सीधा प्रभाव भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है, ऐसे में भारत-ऑस्ट्रेलिया संयुक्त ऊर्जा सुरक्षा वक्तव्य महत्वपूर्ण है। इसमें केवल कोयला, गैस और तरल ईंधन की स्थिर आपूर्ति का आश्वासन ही नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा संक्रमण और विश्वसनीय सप्लाई चेन पर भी बल दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया पहले से भारत के लिए कोयला, एलएनजी और कुछ पेट्रोलियम उत्पादों का महत्वपूर्ण स्रोत है, यह दृष्टिकोण अल्पकालीन ऊर्जा सुरक्षा और दीर्घकालीन ऊर्जा परिवर्तन के बीच संतुलन बनाएगा। दीर्घकालीन ऊर्जा व्यापार और निवेश सहयोग से भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण कर सकेगा। इससे किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता कम होगी, जो आज की अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में अत्यंत आवश्यक है। प्रस्तावित क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर भी महत्वपूर्ण है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग की रीढ़ लिथियम,  कोबाल्ट,  निकेल और दुर्लभ मृदा तत्व के वैश्विक उत्पादन और प्रसंस्करण पर सीमित देशों का वर्चस्व है।</p>
<p>ऑस्ट्रेलिया के विशाल खनिज भंडार और भारत की विनिर्माण क्षमता का संयोजन दोनों देशों को वैश्विक मूल्य शृंखला में मजबूत स्थान दिलाएंगे। विश्वसनीय डिजिटल अवसंरचना और सुरक्षित डेटा पारिस्थितिकी भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनने जा रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और डिजिटल रेजिलिएंस में संयुक्त अनुसंधान के लिए बना ऑस्ट्रेलिया-भारत साइबर, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन पार्टनरशिप भारत को केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि विकासकर्ता बनाने की दिशा में सहायक होगा। ऑस्ट्रेलिया विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में है और अब दीर्घकालीन आपूर्ति व्यवस्था भारत की 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता में व्यापक वृद्धि की योजना को ईंधन उपलब्ध करा सकती है। ऑस्ट्रेलिया के जुड़ने से आपूर्ति स्रोत अधिक सुरक्षित और विविध होंगे। कोकोस द्वीप पर गगनयान मिशन के लिए स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल की स्थापना भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए रणनीतिक उपलब्धि है। हिंद महासागर क्षेत्र में बेहतर ट्रैकिंग और संचार क्षमता मिशन की सुरक्षा और सफलता दोनों बढ़ाएगी। दूसरी ओर खेल सहयोग रोडमैप युवा आदान-प्रदान, खेल विज्ञान, कोचिंग और अवसंरचना के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलेगा।</p>
<p>पर सबसे बड़ी चुनौती इन घोषणाओं को धरातल पर उतारने की है। इसके लिए समयबद्ध कार्ययोजना, निजी निवेश, उद्योग-अनुसंधान संस्थानों की साझेदारी, नियामकीय सरलता, राज्यों की सक्रिय भागीदारी और नियमित प्रगति समीक्षा आवश्यक होगी। कूटनीति की वास्तविक सफलता दस्तावेजों से नहीं, बल्कि उन परियोजनाओं से मापी जाती है, जो उद्योग, रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय सामर्थ्य में स्थायी परिवर्तन लाती हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया के सामने यही अगली और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 07:03:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : जंग के मुहाने पर</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पश्चिम एशिया एक बार फिर जंग के उस मुहाने पर है, जहां एक गलत सैन्य कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को गहरे संकट में गिरा सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम का टूटना तथा उसके बाद अमेरिकी हमलों में ईरान के लगभग 90 सैन्य ठिकानों—मिसाइल भंडार, रडार नेटवर्क और तटीय सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाना, इस बात का संकेत है कि संघर्ष अब केवल सीमित प्रतिशोध तक नहीं रह गया है। पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध न भी हो पर यह साफ है कि अब सैन्य टकराव पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाएगा।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/587067/on-the-verge-of-editorial-war"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sam-012.jpg" alt=""></a><br /><p>पश्चिम एशिया एक बार फिर जंग के उस मुहाने पर है, जहां एक गलत सैन्य कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को गहरे संकट में गिरा सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम का टूटना तथा उसके बाद अमेरिकी हमलों में ईरान के लगभग 90 सैन्य ठिकानों—मिसाइल भंडार, रडार नेटवर्क और तटीय सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाना, इस बात का संकेत है कि संघर्ष अब केवल सीमित प्रतिशोध तक नहीं रह गया है। पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध न भी हो पर यह साफ है कि अब सैन्य टकराव पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाएगा। इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। यहां अस्थिरता का अर्थ है तेल, गैस, बीमा, शिपिंग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर व्यापक दबाव।</p>
<p>यह घटनाक्रम अमेरिकी कूटनीति की भी कठिन परीक्षा है। यदि युद्धविराम कुछ ही समय में ढह जाए और बातचीत के स्थान पर फिर सैन्य कार्रवाई हावी हो जाए, तो यह स्पष्ट संकेत है कि केवल सैन्य दबाव स्थायी समाधान नहीं दे सकता। कूटनीति की विफलता का मूल्य अंततः पूरी दुनिया चुकाती है। यह केवल अमेरिका और ईरान का संघर्ष नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें युद्ध और कूटनीति के बीच संतुलन लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। यदि पश्चिम एशिया में स्थिरता बहाल नहीं होती, तो इसकी कीमत पूरी दुनिया—और विशेषकर अपनी कच्चे तेल की लगभग 85 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी करने वाले भारत को चुकानी पड़ेगी। यदि कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर जाती हैं, तो पेट्रोलियम आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते का घाटा बढ़ेगा, महंगाई पर दबाव आएगा और रुपये पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। ऊर्जा महंगी होने से परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण लागत भी बढ़ेगी। परिणामस्वरूप भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में शीघ्र राहत देना कठिन हो सकता है। चाबहार बंदरगाह पर हमले की खबरें भी भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाती हैं। यह परियोजना केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक भारत की वैकल्पिक पहुंच का आधार है। यदि वहां अस्थिरता बनी रहती है, तो भारत की दीर्घकालिक क्षेत्रीय संपर्क नीति प्रभावित हो सकती है। विदेश नीति के स्तर पर भी मामला जटिल है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार है, वहीं ईरान ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण सहयोगी है। ऐसे में भारत द्वारा किसी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संयम, संवाद और कूटनीति पर जोर देना व्यावहारिक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी शक्ति रही है और वर्तमान परिस्थितियों में भी यही सबसे विवेकपूर्ण विकल्प है।</p>
<p>यदि संकट लंबा खिंचता है, तो रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने, आयात स्रोतों का और अधिक विविधीकरण करने, दीर्घकालिक एलएनजी अनुबंधों को मजबूत करने, नवीकरणीय ऊर्जा एवं हरित हाइड्रोजन में निवेश तेज करने तथा भारतीय जहाजरानी और बीमा तंत्र को अतिरिक्त सुरक्षा देने की आवश्यकता होगी। साथ ही रुपये की स्थिरता और महंगाई नियंत्रण के लिए वित्तीय तथा मौद्रिक नीति में समन्वित तैयारी भी उसके लिए अनिवार्य होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 07:03:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : पूर्व का नया पुल</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा ने भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई दिशा दी है। ब्रह्मोस मिसाइल सौदा, समुद्री सुरक्षा, सबांग बंदरगाह, यूपीआई, रेयर-अर्थ खनिज और डिजिटल सहयोग से हिंद-प्रशांत में भारत की रणनीतिक भूमिका और मजबूत होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586881/editorial--the-east-s-new-bridge"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sampadkiy23.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत और इंडोनेशिया के संबंध तकरीबन दो हजार साल पुराने समुद्री संपर्क और सांस्कृतिक विश्वास की विरासत पर आधारित हैं। बोरोबुदुर मंदिर और प्रंबानन मंदिर आज भी इस ऐतिहासिक निकटता के साक्षी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा ने इस सांस्कृतिक आधार को 21 वीं सदी की सामरिक, आर्थिक और प्रौद्योगिकीय साझेदारी में बदलने की दिशा में एक निर्णायक कदम बढ़ाया है। रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अवसंरचना, रेयर-अर्थ खनिज और भुगतान प्रणालियों से जुड़े समझौते इस बात का संकेत हैं कि दोनों लोकतंत्र अब केवल मित्र नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत की स्थिरता के साझेदार बन रहे हैं। 5,000 करोड़ रुपये के रक्षा समझौते का महत्व केवल हथियारों की बिक्री तक सीमित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">इंडोनेशिया द्वारा भारत निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने का निर्णय भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। फिलिपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया ब्रह्मोस खरीदने वाला दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा और कुल तीसरा देश बन गया है, जबकि अस्त्र मिसाइल का यह पहला विदेशी ग्राहक होगा। अस्त्र मिसाइलों को इंडोनेशिया के रूसी मूल के सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत करने के बाद भारतीय रक्षा तकनीक के लिए एशिया और अफ्रीका के उन देशों का बाजार खुलेगा, जो रूसी मूल के लड़ाकू विमान संचालित करते हैं। इस यात्रा का सबसे दूरगामी सामरिक पहलू मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित सबांग बंदरगाह का संयुक्त विकास है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर मलक्का जलडमरूमध्य स्थित इस बंदरगाह से स्थित विश्व व्यापार का 25 फीसद यहीं से गुजरता है। सबांग में भारत की बढ़ती उपस्थिति उसे समुद्री व्यापार मार्गों की निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत और समुद्री सुरक्षा में नई क्षमता देगी। यह चीन की बढ़ती नौसैनिक सक्रियता के बीच हिंद-प्रशांत में शक्ति-संतुलन बनाए रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। रक्षा सहयोग के साथ-साथ डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, यूपीआई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ईवीएम निर्माण और रेयर-अर्थ खनिजों पर हुए समझौते भारत की आर्थिक कूटनीति को नई दिशा देंगे। यदि इंडोनेशिया में यूपीआई जैसी प्रणालियां लागू होती हैं, तो व्यापार, पर्यटन और निवेश को नई गति मिलेगी। रेयर-अर्थ खनिजों में सहयोग भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इंडोनेशिया में बसे लगभग एक लाख भारतीय मूल के लोगों के लिए भी यह यात्रा अवसर लेकर आई है। व्यापार, शिक्षा, डिजिटल सेवाओं और निवेश के बढ़ते सहयोग से प्रवासी भारतीयों की आर्थिक गतिविधियां और सांस्कृतिक भूमिका दोनों सशक्त होंगी। भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति अब केवल सांस्कृतिक संपर्क का कार्यक्रम नहीं रही, वह सामरिक साझेदारी, समुद्री सुरक्षा और तकनीकी सहयोग की व्यापक नीति बन चुकी है। इंडोनेशिया के साथ हुए ये समझौते बताते हैं कि भारत अब हिंद-प्रशांत में केवल एक भौगोलिक शक्ति नहीं, बल्कि विश्वसनीय सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और विकास साझेदार के रूप में उभर रहा है। समझौतों का प्रभावी क्रियान्वयन इस यात्रा को भारत-इंडोनेशिया संबंधों का स्वर्णिम अध्याय लिख सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 04:05:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय :  श्रुति-स्मृति की स्वरगाथा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>तीजन बाई का निधन केवल भारतीय लोकसंगीत की एक युगांतकारी आवाज़ का मौन हो जाना नहीं है, बल्कि भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक परंपरा की गहरी क्षति है, जिसमें ज्ञान पुस्तकों से अधिक स्मृति, वाणी और अनुभव के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहा है। उनके साथ मानो भारतीय लोकजीवन की वह सजीव पाठशाला भी विदा हुई, जो बिना किसी औपचारिक विश्वविद्यालय के महाभारत जैसे महाकाव्य को जन-जन तक पहुंचाती रही। इस अर्थ में उन्हें भारत की प्राचीन श्रुति-स्मृति परंपरा की सबसे सशक्त प्रतिनिधियों में गिना जाना चाहिए। तीजन बाई इस बात का जीवंत प्रमाण थीं कि ज्ञान का मूल्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/586689/editorial--song-of-shruti-smriti"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-07/sampadkiy22.webp" alt=""></a><br /><p>तीजन बाई का निधन केवल भारतीय लोकसंगीत की एक युगांतकारी आवाज़ का मौन हो जाना नहीं है, बल्कि भारत की उस जीवंत सांस्कृतिक परंपरा की गहरी क्षति है, जिसमें ज्ञान पुस्तकों से अधिक स्मृति, वाणी और अनुभव के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहा है। उनके साथ मानो भारतीय लोकजीवन की वह सजीव पाठशाला भी विदा हुई, जो बिना किसी औपचारिक विश्वविद्यालय के महाभारत जैसे महाकाव्य को जन-जन तक पहुंचाती रही। इस अर्थ में उन्हें भारत की प्राचीन श्रुति-स्मृति परंपरा की सबसे सशक्त प्रतिनिधियों में गिना जाना चाहिए। तीजन बाई इस बात का जीवंत प्रमाण थीं कि ज्ञान का मूल्य केवल डिग्रियों से नहीं, बल्कि उसकी आत्मसात करने की क्षमता से तय होता है। </p>
<p>पांचवीं कक्षा तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाली इस लोकगायिका को महाभारत का विशाल आख्यान लगभग कंठस्थ था। यही नहीं, देश-विदेश के विश्वविद्यालयों ने उन्हें अनेक मानद डीलिट् उपाधियों से सम्मानित किया। यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक संदेश है कि लोकबुद्धि, अनुभव और परंपरागत ज्ञान किसी विश्वविद्यालय की चारदीवारी से कम महत्वपूर्ण नहीं होते।</p>
<p>उनकी दमदार आवाज़, ओजस्वी प्रस्तुति और अद्भुत अभिनय ने महाभारत को केवल सुनाया नहीं, बल्कि मंच पर जीवंत कर दिया। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियां भाषा की सीमाएं पार कर फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, अमेरिका और अनेक देशों तक पहुंचीं। उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह भी रही कि उन्होंने पंडवानी की पुरुष-प्रधान कापालिक शैली में प्रस्तुति देकर सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी।</p>
<p>इसके कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा, यह भारतीय समाज में प्रतिभा और समान अवसर के पक्ष में दिया गया सांस्कृतिक प्रतिरोध था। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा का सम्मान तभी संभव है, जब उसमें परिवर्तन का साहस भी हो। तीजन बाई की कला मनोरंजन से कहीं आगे थी। उनके लिए महाभारत केवल युद्ध का आख्यान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था।</p>
<p>भीम, अर्जुन, कुंती, द्रौपदी और कृष्ण के प्रसंगों के माध्यम से वे साहस, न्याय, मातृत्व, कर्तव्य और नैतिकता का संदेश देती थीं। उनके गायन में लोक शिक्षा, लोक दर्शन और लोक संस्कार का अद्भुत संगम दिखाई देता था। इस दृष्टि से वे लोक कलाकार से अधिक लोक शिक्षक थीं। तीजन बाई जैसी ऊर्जस्वी प्रस्तुति, स्वर की गूंज और अभिनय का सम्मिलित प्रभाव विरल था, इसलिए उनके बाद कापालिक शैली का भविष्य केवल शिष्यों पर नहीं, बल्कि संस्थागत संरक्षण पर भी निर्भर करेगा। </p>
<p>आवश्यकता है कि सरकार लोककलाओं को केवल पुरस्कारों तक सीमित न रखे। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लोकसंगीत के अध्ययन को बढ़ावा दिया जाए, डिजिटल अभिलेखागार बनें, वरिष्ठ लोक कलाकारों के प्रदर्शन का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण हो तथा युवा कलाकारों के लिए छात्रवृत्तियां और राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएं। समाज को भी यह समझना होगा कि लोककलाएं केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की आधारशिला हैं।</p>
<p>तीजन बाई चली गईं, किंतु उनकी आवाज़ भारतीय लोकस्मृति में लंबे समय तक गूंजती रहेगी। उन्हें केवल महान लोकगायिका के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं होगा। वे उस जीवित परंपरा की प्रहरी थीं, जिसने सिद्ध किया कि जब स्मृति, साधना और संस्कृति एक हो जाएं, तब लोककला इतिहास नहीं बनती— वह पीढ़ियों का भविष्य गढ़ती है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 05:28:05 +0530</pubDate>
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