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                <title>Editorials - Amrit Vichar</title>
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                <description>Editorials RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>457 साल बाद बदल गया दुनिया का नक्शा, यूएन ने दी मंजूरी </title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%A1%E0%A4%BE.%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%AE-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9C.jpeg" alt="डा.शिवम भरद्वाज" width="283" height="316" />
डॉ. शिवम भारद्वाज, <br />असिस्टेंट प्रोफेसर, <br />मथुरा

<p style="text-align:justify;">स्कूल की दीवारों, किताबों, अखबार, टेलीविजन तथा इंटरनेट पर दुनिया का नक्शा देखते हुए हम शायद ही कभी यह सोचते हैं कि उसमें दिखाई देने वाली दुनिया और असली दुनिया एक ही चीज नहीं हैं। नक्शा हमें देशों की, जगह और आकार बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस तस्वीर को बनाने वाले ने किन चीजों को सही रखने का फैसला किया और किन चीजों में विकृति स्वीकार की। गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारने की प्रक्रिया में यह संभव ही नहीं कि हर चीज अपने वास्तविक रूप और अनुपात में दिखाई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592698/world-map-changed-after-457-years-un-approved"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/भारत-का-नक्शा.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%A1%E0%A4%BE.%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%AE-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9C.jpeg" alt="डा.शिवम भरद्वाज" width="283" height="316"></img>
डॉ. शिवम भारद्वाज, <br />असिस्टेंट प्रोफेसर, <br />मथुरा

<p style="text-align:justify;">स्कूल की दीवारों, किताबों, अखबार, टेलीविजन तथा इंटरनेट पर दुनिया का नक्शा देखते हुए हम शायद ही कभी यह सोचते हैं कि उसमें दिखाई देने वाली दुनिया और असली दुनिया एक ही चीज नहीं हैं। नक्शा हमें देशों की, जगह और आकार बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस तस्वीर को बनाने वाले ने किन चीजों को सही रखने का फैसला किया और किन चीजों में विकृति स्वीकार की। गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारने की प्रक्रिया में यह संभव ही नहीं कि हर चीज अपने वास्तविक रूप और अनुपात में दिखाई दे।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफ्रीकी देशों की पहल पर चार सितंबर को पारित ‘करैक्ट द मैप’ प्रस्ताव ने इस बहस को फिर अंतर्राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्रों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिनमें अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों का क्षेत्रफल अधिक वास्तविक अनुपात में दिखाई दे। प्रस्ताव के पक्ष में 164 मत पड़े, एक मत विरोध में गया और छह देश मतदान से दूर रहे। यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। यह न तो मर्केटर मानचित्र पर रोक लगाता है और न संयुक्त राष्ट्र ने किसी एक नए मानचित्र को दुनिया का अनिवार्य मानक बनाया है। प्रस्ताव का महत्व इस बात में है कि मानचित्र की तकनीकी बनावट को प्रतिनिधित्व और दृश्य असमानता के सवाल से जोड़ा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने जो प्रक्षेप बनाया था, उसका मकसद समुद्री यात्रियों के लिए दिशाओं को उपयोगी ढंग से दिखाना था। गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारने की मजबूरी में उसने क्षेत्रफल की तुलना में दिशा को प्राथमिकता दी। समुद्री यात्रा के लिए यह एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक चुनाव था, लेकिन किसी चीज का मूल उद्देश्य और उसका बाद का इस्तेमाल हमेशा एक जैसा नहीं रहता। मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्य रेखा से दूरी बढ़ने के साथ क्षेत्रफल की विकृति बढ़ती जाती है। ग्रीनलैंड और अफ्रीका इसका उदाहरण हैं। ग्रीनलैंड लगभग 21.7 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है, जबकि अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3.01 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग चौदह गुना बड़ा है। इसके बावजूद मर्केटर पर आधारित विश्व मानचित्र में दोनों का आकार पहली नजर में बहुत अलग नहीं लगता।</p>
<p style="text-align:justify;">यही मानचित्र की तकनीकी सीमा सामाजिक अर्थ ग्रहण करने लगती है। नक्शा जमीन का आकार नहीं बदलता, लेकिन जमीन के आकार के बारे में हमारी पहली धारणा जरूर बना सकता है। किसी बच्चे को जब पहली बार दुनिया का नक्शा दिखाया जाता है, तो उसे आम तौर पर यह नहीं बताया जाता कि तस्वीर में दिशा, क्षेत्रफल और आकृति के बीच समझौते किए गए हैं। जो सामने है, वही दुनिया का स्वाभाविक रूप लगता है, इसलिए मर्केटर को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। अपने समय और उद्देश्य में उसकी उपयोगिता थी। प्रश्न तब पैदा होता है, जब समुद्री नौवहन के लिए उपयोगी वही प्रक्षेप महाद्वीपों के आकार की तुलना का माध्यम बन जाता है। वहां दिशा की शुद्धता से अधिक क्षेत्रफल का अनुपात महत्वपूर्ण हो सकता है। एक तकनीकी चुनाव को उसके उद्देश्य से अलग करके देखना ही उस भ्रम को जन्म देता है कि एक ही तस्वीर हर तरह की भौगोलिक सच्चाई को समान रूप से दिखा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूरोपीय साम्राज्यवाद मर्केटर मानचित्र की वजह से पैदा नहीं हुआ था, न मर्केटर ने यूरोप को राजनीतिक रूप से बड़ा बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन जिस दौर में यूरोपीय शक्तियां दुनिया के बड़े हिस्से पर राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व कायम कर रही थीं, उसी दौर में दुनिया को दिखाने वाली प्रचलित तस्वीरों में उत्तरी अक्षांशों के भूभाग भी अनुपातहीन रूप से बड़े दिखाई देते रहे। दोनों के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध निकालना गलत होगा, लेकिन उनके ऐतिहासिक सह-अस्तित्व को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">(ये लेखक के निजी विचार हैं।)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 03:09:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Virendra Pandey]]></dc:creator>
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                <title> ‘आसमान में सुराख’ करने वाले दुष्यंत</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%82-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE.jpeg" alt="सुरेश बाबू मिश्रा" width="270" height="298" />
सुरेश बाबू मिश्रा, <br />साहित्यकार

<p style="text-align:justify;">दुष्यंत कुमार को हिंदी गजल का प्रवर्तक माना जाता है। वे हिंदी के पहले कवि हुए, जिन्होंने हिंदी में गजल लिखीं। उस समय उर्दू ग़ज़लों का बोलबाला था। दुष्यंत कुमार की आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई हिंदी गजलें पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुईं।</p>
<p style="text-align:justify;">दुष्यंत कुमार का जन्‍म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जिले की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592693/dushyant-who-made-hole-in-the-sky"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/सुरेश-बाबू-मिश्रा.jpeg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%82-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE.jpeg" alt="सुरेश बाबू मिश्रा" width="270" height="298"></img>
सुरेश बाबू मिश्रा, <br />साहित्यकार

<p style="text-align:justify;">दुष्यंत कुमार को हिंदी गजल का प्रवर्तक माना जाता है। वे हिंदी के पहले कवि हुए, जिन्होंने हिंदी में गजल लिखीं। उस समय उर्दू ग़ज़लों का बोलबाला था। दुष्यंत कुमार की आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई हिंदी गजलें पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुईं।</p>
<p style="text-align:justify;">दुष्यंत कुमार का जन्‍म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जिले की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिंदी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 42 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की।</p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने बीए और हिंदी में एमए किया। उन्हें डॉ. धीरेंद्र वर्मा और डॉ. रामकुमार वर्मा का सानिध्य प्राप्त हुआ। कथाकार कमलेश्वर और मार्कण्डेय तथा कवि मित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेव नारायण साही आदि के संपर्क से उनकी साहित्यिक अभिरुचि को नया आयाम मिला। मुरादाबाद से बीएड करने के बाद 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में आए। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। आपातकाल के समय उनका कविमन क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा, जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई, जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। </p>
<p style="text-align:justify;">30 दिसंबर 1975 की रात्रि में हृदयाघात से उनकी असमय मृत्यु हो गई। उन्हें मात्र 44 वर्ष की अल्पायु मिली। इस अल्प जीवन में उन्होंने अपनी कालजई रचनाओं के माध्यम से पाठकों के मध्य खासी लोकप्रियता और प्रसिद्धि अर्जित की। 1974 में उनका प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह साये में धूप' प्रकाशित हुआ। इसकी ग़ज़लों को इतनी लोकप्रियता हासिल हुई कि उसके कई शेर कहावतों और मुहावरों के तौर पर लोगों द्वारा व्यवहृत होते हैं। 52 ग़ज़लों की इस लघु पुस्तिका को युवा मन की गीता कहा जाए, तो अत्युक्ति नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>दुष्यंत कुमार के कुछ प्रमुख शेर...</strong></p>
<p style="text-align:justify;">यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है<br />चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए</p>
<p style="text-align:justify;">मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही<br />हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए</p>
<p style="text-align:justify;">कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता<br />एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो</p>
<p style="text-align:justify;">कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए<br />मैं ने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है</p>
<p style="text-align:justify;">तू किसी रेल-सी गुज़रती है<br />मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 03:08:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Virendra Pandey]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हमारे भोजन की पर्यावरणीय कीमत कौन चुका रहा है </title>
                                    <description><![CDATA[यूरोप, कनाडा जैसे देशों में 'कार्बन टैक्स' को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रभावी आर्थिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है। हाल में ब्रिटेन और इटली के शोधकर्ताओं ने खाद्य पदार्थों पर कार्बन टैक्स और कार्बन लेबलिंग को लेकर जो अध्ययन प्रकाशित किया है, उसने इस बहस को और तेज कर दिया है। अध्ययन का सार है कि यदि अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले खाद्य पदार्थों पर सीमित कर लगाया जाए और उनके साथ कार्बन लेबल भी लगाए जाएं, तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592690/who-is-paying-the-environmental-price-of-our-food"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/कार्बन.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5.jpeg" alt="कुमार सिद्धार्थ" width="243" height="243"></img>
कुमार सिद्धार्थ,<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">दुनिया जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए अब केवल पर्यावरणीय अपीलों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। पिछले तीन दशकों में यह साफ हो गया है कि केवल लोगों से कम प्रदूषण करने की अपील करना पर्याप्त नहीं है, इसलिए अब जलवायु नीति का नया मंत्र है ‘प्रदूषण की भी एक कीमत होनी चाहिए।’ इसी सोच से निकला है 'कार्बन टैक्स'। आज यूरोप, कनाडा और कुछ अन्य देशों में 'कार्बन टैक्स' को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रभावी आर्थिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है। हाल में ब्रिटेन और इटली के शोधकर्ताओं ने खाद्य पदार्थों पर कार्बन टैक्स और कार्बन लेबलिंग को लेकर जो अध्ययन प्रकाशित किया है, उसने इस बहस को और तेज कर दिया है। अध्ययन का सार है कि यदि अधिक कार्बन उत्सर्जन वाले खाद्य पदार्थों पर सीमित कर लगाया जाए और उनके साथ कार्बन लेबल भी लगाए जाएं, तो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्बन टैक्स यानी यदि कोई उद्योग, ईंधन या उत्पाद अधिक कार्बन उत्सर्जित करता है, तो उसे अधिक आर्थिक कीमत चुकानी होगी। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे  प्रदूषक भुगतान सिद्धांत कहा जाता है। उद्देश्य सरकार की आय बढ़ाना नहीं, बल्कि बाजार को यह संकेत देना है कि प्रदूषण अब मुफ्त नहीं रहेगा। जब अधिक प्रदूषण करने वाले उत्पाद महंगे होंगे, तो उद्योग स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित होंगे और उपभोक्ता अपेक्षाकृत कम प्रदूषण वाले विकल्प चुनेंगे। जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि प्रदूषण फैलाने वाले की वास्तविक लागत समाज उठाता है। कोयला जलाने वाला उद्योग लाभ कमाता है, लेकिन प्रदूषित हवा का असर पूरा समाज झेलता है। बड़े पैमाने पर मांस उत्पादन करने वाली कंपनियां व्यापार करती हैं, लेकिन मीथेन गैस के कारण बढ़ते तापमान की कीमत पूरी दुनिया चुकाती है। कार्बन टैक्स इस असंतुलन को ठीक करने का प्रयास है।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटेन के अध्ययन ने एक दिलचस्प तथ्य सामने रखे। शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल कार्बन टैक्स से बेहतर परिणाम तब मिले, जब उसे कार्बन लेबलिंग के साथ जोड़ा गया। कार्बन लेबलिंग का अर्थ है कि किसी खाद्य उत्पाद पर यह जानकारी लिखी जाए कि उसके उत्पादन में कितना कार्बन उत्सर्जित हुआ है। यानी उपभोक्ता केवल कीमत नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रभाव भी देख सके। इसका संदेश स्पष्ट है, जानकारी और आर्थिक संकेत, दोनों साथ हों तभी व्यवहार बदलता है। यूरोप में कार्बन टैक्स लागू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन भारत जैसे देशों में स्थिति अलग है। यहां करोड़ों परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। यदि खाद्य पदार्थों पर अतिरिक्त कर लगा दिया जाए, तो उसका सबसे अधिक असर गरीब परिवारों पर पड़ेगा। भारत ने अभी तक खाद्य पदार्थों पर कार्बन टैक्स की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है और निकट भविष्य में इसकी संभावना भी कम दिखाई देती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के पास कोई विकल्प नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहला कदम कार्बन लेबलिंग हो सकता है। जिस तरह खाद्य पैकेटों पर पोषण संबंधी जानकारी दी जाती है, उसी तरह कार्बन फुटप्रिंट की जानकारी भी दी जा सकती है। दूसरा, सरकार उन किसानों और कंपनियों को प्रोत्साहन दे सकती है, जो कम कार्बन उत्सर्जन वाली खेती और खाद्य उत्पादन अपनाते हैं। तीसरा, सार्वजनिक खरीद, मिड-डे मील, आंगनबाड़ी और सरकारी पोषण योजनाओं में स्थानीय तथा कम कार्बन उत्सर्जन वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह पहल भारत के लिए चुनौती के साथ अवसर भी बन सकती है। भारत के अधिकांश छोटे किसान अपेक्षाकृत कम कार्बन उत्सर्जन वाली कृषि करते हैं। मोटे अनाज, दालें, मिश्रित खेती और स्थानीय खाद्य प्रणालियां जलवायु की दृष्टि से अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती हैं। यदि भविष्य में वैश्विक बाजार कार्बन लेबलिंग को महत्व देता है, तो भारतीय कृषि को इससे प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी मिल सकता है, हालांकि इसके लिए विश्वसनीय मापन और प्रमाणन प्रणाली विकसित करनी होगी। </p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास बताता है कि किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार केवल टैक्‍स नहीं होता। प्लास्टिक पर प्रतिबंध, ऊर्जा दक्षता, एलईडी बल्ब, सौर ऊर्जा और सार्वजनिक परिवहन इन सभी में कानून, प्रोत्साहन, तकनीक और जनजागरूकता ने मिलकर काम किया। इसके लिए उत्पादन की पद्धति बदलनी होगी, उपभोग की संस्कृति बदलनी होगी और सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो पर्यावरण संरक्षण के साथ सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित करें। कार्बन टैक्स कोई जादुई समाधान नहीं है, लेकिन यह बाजार को सही दिशा में मोड़ने का महत्वपूर्ण आर्थिक औजार बन सकता है। यदि इसे पारदर्शी नीति, कार्बन लेबलिंग, हरित प्रोत्साहनों और गरीब परिवारों की सुरक्षा के साथ लागू किया जाए, तो यह जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने में उपयोगी भूमिका निभा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्बन टैक्स की चर्चा केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसका सीधा संबंध अर्थव्यवस्था, रोजगार और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से भी है। किसी भी देश में जब प्रदूषण पर कीमत लगाई जाती है, तो उद्योगों के सामने दो रास्ते होते हैं— या तो वे अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं पर डालें या अपनी उत्पादन प्रक्रिया को कम प्रदूषण वाला बनाएं, इसलिए सरकार की जिम्मेदारी केवल टैक्स लगाने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की भी है, जिसमें स्वच्छ तकनीक अपनाना कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी हो। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह संतुलन और महत्वपूर्ण है। यहां ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है और बड़ी आबादी अभी भी सस्ती ऊर्जा तथा परिवहन पर निर्भर है। ऐसे में अचानक कठोर कार्बन टैक्स लागू करने के बजाय चरणबद्ध नीति अधिक व्यावहारिक हो सकती है। शुरुआत बड़े प्रदूषणकारी उद्योगों से की जा सकती है और धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा पर सब्सिडी, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और ऊर्जा दक्ष तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अंततः जलवायु नीति की सफलता इस बात से तय होगी कि वह लोगों के जीवन को कठिन बनाए बिना उन्हें बेहतर विकल्प कितनी आसानी से उपलब्ध कराती है। कार्बन टैक्स तभी सफल होगा, जब वह दंड से अधिक बदलाव का माध्यम बने। जलवायु संकट का समाधान केवल प्रयोगशालाओं या संसदों में नहीं मिलेगा। भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न शायद यह नहीं होगा कि हम क्या खा रहे हैं, बल्कि यह होगा कि हमारे भोजन की पर्यावरणीय कीमत कौन चुका रहा है?</p>
<p style="text-align:justify;">(ये लेखक के निजी विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 06 Sep 2026 03:08:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Virendra Pandey]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : यूरोप में रणनीतिक राह</title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की वार्ता भारत की यूरोप-केंद्रित आर्थिक और रणनीतिक नीति तथा बेल्जियम की यूरोपीय संघ में विशिष्ट स्थिति बताती है। जुलाई में भारत-बेल्जियम रणनीतिक संवाद शुरू होना और अब रक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा तथा सुरक्षा तक सहयोग का विस्तार इसी का संकेत है। अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार दोगुना करना महत्वपूर्ण आर्थिक लक्ष्य है। अभी दोनों देशों का व्यापार लगभग 18 अरब डॉलर के आसपास है, जिसमें बेल्जियम को भारत का निर्यात और वहां से आयात—विशेषकर हीरा, रसायन, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स तथा पेट्रो-रसायन महत्वपूर्ण हैं। </p>
<p>दोगुना का महत्वाकांक्षी लक्ष्य असंभव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592620/editorial-strategic-path-in-europe"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/editorial.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर की वार्ता भारत की यूरोप-केंद्रित आर्थिक और रणनीतिक नीति तथा बेल्जियम की यूरोपीय संघ में विशिष्ट स्थिति बताती है। जुलाई में भारत-बेल्जियम रणनीतिक संवाद शुरू होना और अब रक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा तथा सुरक्षा तक सहयोग का विस्तार इसी का संकेत है। अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार दोगुना करना महत्वपूर्ण आर्थिक लक्ष्य है। अभी दोनों देशों का व्यापार लगभग 18 अरब डॉलर के आसपास है, जिसमें बेल्जियम को भारत का निर्यात और वहां से आयात—विशेषकर हीरा, रसायन, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स तथा पेट्रो-रसायन महत्वपूर्ण हैं। </p>
<p>दोगुना का महत्वाकांक्षी लक्ष्य असंभव नहीं है, क्योंकि भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते की वार्ताओं के सफल समापन से नए बाजार खुलने की संभावना है, बशर्ते व्यापार को केवल पारंपरिक हीरा कारोबार पर निर्भर रखने के बजाय फार्मा, जैव-प्रौद्योगिकी, उन्नत सामग्री, डिजिटल तकनीक, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण तक ले जाया जाए। रक्षा सहयोग इस साझेदारी को रणनीतिक गहराई देता है। दोनों देशों ने नियमित सैन्य वार्ता, स्टाफ-स्तरीय आदान-प्रदान, शिक्षा-प्रशिक्षण, अनुसंधान तथा रक्षा उद्योग में साझेदारी के लिए आशय-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इससे सेनाओं में पारस्परिक समझ, समुद्री क्षेत्र में सहयोग और इंडो-पैसिफिक में समन्वय बढ़ेगा। बेल्जियम रक्षा क्षेत्र में बड़ा हथियार-आपूर्तिकर्ता नहीं है, लेकिन उसकी विशेषीकृत तकनीकी क्षमता भारत के लिए उपयोगी है।</p>
<p>बख्तरबंद प्रणालियों, बुर्ज और अग्नि-नियंत्रण, इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स, सेंसर, मिसाइल तकनीक, ड्रोन-रोधी प्रणालियों और रक्षा विनिर्माण में उसके उद्योगों की विशेषज्ञता भारतीय निजी और सार्वजनिक रक्षा कंपनियों के साथ सह-विकास तथा सह-उत्पादन में काम आ सकती है, जिसका लाभ भारतीय विनिर्माण क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने में होगा। साइबर अपराध और संगठित अपराध पर सीबीआई तथा बेल्जियन फेडरल पुलिस का समझौता भी महत्वपूर्ण है। सूचना साझा करने, भगोड़ों का पता लगाने, जांच-पद्धतियों और क्षमता निर्माण में सहयोग से एक से अधिक देशों में नेटवर्क रखने वाले अपराधियों पर कार्रवाई संभव होगी।</p>
<p>स्वच्छ ऊर्जा में सहयोग का दायरा व्यापक है— ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, अपतटीय पवन, जैव-ऊर्जा और पंप्ड-स्टोरेज तक। महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण में बेल्जियम की विशेषज्ञता भारत की आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा मजबूत कर सकती है। सेमीकंडक्टर क्षेत्र में बेल्जियम का सबसे बड़ा लाभ उसका विश्वस्तरीय अनुसंधान केंद्र है। यह सहयोग भारत के चिप उद्योग, नैनोफैब्रिकेशन और उन्नत चिप तकनीक में भारत की क्षमता बढ़ाएगी। दोनों पक्षों ने आतंकवाद पर संयुक्त कार्य समूह की संभावना तलाशने पर सहमति जताई है, यह स्वागतयोग्य है।</p>
<p>समुद्री सुरक्षा में बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, ड्रेजिंग, संपर्क और अपतटीय पवन परियोजनाओं से लेकर सुरक्षित समुद्री मार्गों तक सहयोग का व्यापक अर्थ है। 35 हजार भारतीय मूल के लोग बेल्जियम में रहते हैं, इनके के लिए तेज वीजा सेवाएं, कुशल पेशेवरों और छात्रों के लिए कानूनी गतिशीलता, स्वास्थ्य क्षेत्र में भारतीय नर्सों की आवाजाही और सीधी विमान सेवा की संभावना का सकारात्मक असर होगा।  बेल्जियम भारत के लिए आकार से अधिक तकनीक, यूरोपीय पहुंच और रणनीतिक विश्वसनीयता के कारण महत्वपूर्ण है। चुनौती समझौतों की संख्या नहीं, उन्हें परियोजनाओं में बदलने की है। यदि भारत व्यापार-विस्तार को तकनीक, रक्षा-उत्पादन, ऊर्जा और मानव-गतिशीलता से जोड़ पाया, तो यह संबंध यूरोप में भारत की आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति का प्रभावी आधार बनेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 05:57:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एआई कभी नहीं ले सकेगा शिक्षक का स्थान</title>
                                    <description><![CDATA[एआई शिक्षा की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। ज्ञान और सूचना उपलब्ध करा सकता है पर विवेक, संवेदना, संस्कार, अनुशासन और जीवन-दृष्टि नहीं दे सकता। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592622/ai-will-never-be-able-to-replace-a-teacher"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/ai.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/yogesh.jpg" alt="YOGESH" width="183" height="226"></img>
<strong>योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार</strong>

<p>डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर हर वर्ष पांच सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस हमें स्मरण कराता है कि शिक्षा केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं बल्कि जीवन के उद्देश्य को समझने और उसे सार्थक बनाने की प्रक्रिया है। शिक्षक वह मार्गदर्शक है, जो अज्ञानता से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और असमंजस से विवेक की ओर ले जाता है। आज जब तकनीकी क्रांति ने जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित कर दिया है, तब यह प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) क्या वास्तव में शिक्षकों का स्थान ले पाएगी? पिछले कुछ वर्षों में एआई ने जिस तीव्रता के साथ शिक्षा व्यवस्था में प्रवेश किया है, वह अभूतपूर्व है। गूगल, चैटजीपीटी, मशीन लर्निंग और अन्य जनरेटिव टूल्स ने छात्रों को तुरंत जानकारी प्राप्त करने और असाइनमेंट तैयार करने की सुविधा दी है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि एआई आधारित टूल्स का उपयोग शिक्षा क्षेत्र में लगभग पचास प्रतिशत बढ़ चुका है।</p>
<p>भारत में भी विश्वविद्यालयों से लेकर स्कूलों तक, छात्र अपने प्रोजेक्ट, शोध और होमवर्क में एआई का सहारा ले रहे हैं। इससे एक ओर जहां जानकारी का दायरा व्यापक हुआ है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों के सामने चुनौती यह है कि छात्रों की मौलिकता और रचनात्मकता कहीं खो न जाए। इस बारे में कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि एआई किताब तो उपलब्ध करवा सकता है, लेकिन उसे पढ़ना, समझना और जीवन में उतारना केवल एक शिक्षक ही सिखा सकता है। यह चेतावनी केवल भारत की नहीं बल्कि दुनियाभर की है। </p>
<p>अमेरिका के स्टैनफोर्ड और हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई पर अत्यधिक निर्भरता से छात्रों में विश्लेषण और समस्या-समाधान की क्षमता घट सकती है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एआई अपने आप में एक खतरा नहीं बल्कि अवसर भी है। सही दिशा और सीमाओं में इसका इस्तेमाल शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ा सकता है। सिंगापुर और फिनलैंड जैसे देशों ने पहले ही यह व्यवस्था कर दी है कि शिक्षक स्वयं एआई का प्रशिक्षण लें, ताकि वे इसे सहायक उपकरण की तरह उपयोग कर सकें।</p>
<p>भारत में भी एनसीईआरटी और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा सुझाव दिया गया है कि शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में एआई को शामिल किया जाए। इसका उद्देश्य यह नहीं कि शिक्षक मशीन की जगह छोड़ दें, बल्कि यह है कि वे तकनीक को समझकर उसे अपने शिक्षण के सहायक बना सकें। शिक्षण का मूल सार केवल पाठ्यपुस्तक आधारित ज्ञान देना नहीं है। यह एक संबंध है, एक प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक और छात्र आपसी संवाद से सीखने का वातावरण बनाते हैं। </p>
<p>जब कोई छात्र कक्षा में ऊब जाता है तो शिक्षक उसकी आंखों में देखकर समझ सकता है कि वह क्यों असमंजस में है। जब कोई बच्चा कठिनाई का सामना करता है, तो शिक्षक अपने अनुभव और संवेदना से उसे प्रेरित करता है। यही वह मानवीय जुड़ाव है, जिसे कोई मशीन कभी नहीं दोहरा सकती। एआई भावनाओं की सतह को समझ सकता है, लेकिन संवेदना, करुणा और सहानुभूति का स्थान नहीं ले सकता। यही कारण है कि शिक्षा शास्त्रियों का मानना है कि शिक्षक का महत्व किसी भी युग में कम नहीं हो सकता।</p>
<p>यह भी ध्यान रखना होगा कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत ज्ञान तक सीमित नहीं है। संस्थागत शिक्षा यानी स्कूल और विश्वविद्यालय छात्रों को जीवन का व्यापक अनुभव कराते हैं। यहां वे केवल पाठ्यक्रम नहीं सीखते बल्कि टीमवर्क, सहयोग, खेल, नैतिकता और सामाजिक मूल्यों को आत्मसात करते हैं। यदि कोई बच्चा केवल एआई आधारित घर-परिवार के अध्ययन तक सीमित रहेगा, तो वह इन मूल अनुभवों से वंचित रह जाएगा। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह स्वीकार किया जा रहा है कि शिक्षा का वास्तविक स्वरूप तभी सार्थक है, जब उसमें मानवीय संपर्क और सामाजिक अनुभव शामिल हों।</p>
<p>एआई कभी भी मानव को पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। इसके पास डेटा है, परंतु निर्णय क्षमता नहीं, इसके पास जानकारी है, परंतु प्रेरणा नहीं। कोई मशीन कभी यह नहीं समझ सकती कि कब छात्र को कठोर अनुशासन की आवश्यकता है और कब उसे सहानुभूति और प्रोत्साहन की। शिक्षा केवल तथ्यों का संग्रह नहीं, जीवन जीने की कला है और यह कला केवल वही सिखा सकता है, जो स्वयं जीवन के अनुभवों से गुजरा हो अर्थात शिक्षक।</p>
<p>फिर भी, एआई को नकारना व्यावहारिक नहीं है। यह असंख्य तरीकों से शिक्षकों का सहयोग कर सकता है। उदाहरण के लिए, प्रश्नपत्र तैयार करने, उपस्थिति दर्ज करने, नोट्स बनाने या आभासी वास्तविकता आधारित भ्रमण कराने में एआई अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकता है। इससे शिक्षक का बोझ कम होगा और वे छात्रों पर व्यक्तिगत ध्यान दे पाएंगे। यूनाइटेड किंगडम के शिक्षा विभाग ने कुछ समय पहले एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया कि एआई के उपयोग से शिक्षकों के प्रशासनिक कार्यों का बोझ 30 प्रतिशत तक घटा है और वे छात्रों के साथ संवाद में अधिक समय व्यतीत कर पा रहे हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 05:09:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विकसित भारत की मंजिल और सामने खड़े प्रश्न</title>
                                    <description><![CDATA[विकसित राष्ट्र होना केवल इतना नहीं है कि जीडीपी का आकार बढ़ जाए। बड़ा सवाल यह है कि अगर ऐसा कोई आर्थिक विस्तार होता है, तो उसका असर देश के सामान्य नागरिक के जीवन पर कितना पड़ेगा? ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592621/the-destination-of-developed-india-and-the-questions-facing-it"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/3141.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/mahesh.jpg" alt="MAHESH" width="173" height="231"></img>
प्रो. महेश चंद गुप्ता, शिक्षाविद्

<p>किसी देश के भविष्य के बारे में बात करते हुए उसके सामने कोई बड़ा लक्ष्य रख देना आसान है, लेकिन यह समझ पाना मुश्किल होता है कि ऐसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश ने अब तक कितनी तैयारी की है और जिस रास्ते पर वह चल रहा है, वह वास्तव में उसे वहां ले भी जाएगा या नहीं? भारत के सामने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य है। यानी आजादी के सौ साल पूरे होने तक भारत को उस स्थिति में पहुंचाना है, जहां उसकी अर्थव्यवस्था बड़ी और मजबूत हो, नागरिकों का जीवन बेहतर हो और देश दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी निर्णायक जगह बना चुका हो।</p>
<p>अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले एक शिक्षक के रूप में मुझे लगता है कि विकसित भारत का लक्ष्य सुनने में जितना आकर्षक है, उसकी गंभीरता उतनी ही अधिक है। आखिर विकसित राष्ट्र होना केवल इतना नहीं है कि जीडीपी का आकार बढ़ जाए या देश दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आ जाए। बड़ा सवाल यह है कि अगर ऐसा कोई आर्थिक विस्तार होता है, तो उसका असर देश के सामान्य नागरिक के जीवन पर कितना पड़ेगा? इसी सवाल के उत्तर में विकसित भारत की चर्चा को केवल राजनीतिक नारे या सरकारी उपलब्धियों की सूची से अलग करके देखने की जरूरत महसूस होती है।</p>
<p>पिछले दस-बारह सालों में देश में कई सार्थक बदलाव हुए हैं। डिजिटल तकनीक का विस्तार इसका सबसे दिखाई देने वाला उदाहरण है। जिस देश में कभी बैंक खाता, पहचान और सरकारी सुविधा तक पहुंच अपने आप में बड़ी समस्या हुआ करती थी, वहां डिजिटल भुगतान और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे ने करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के जीवन को किस प्रकार बदल दिया है, यह हमारे सामने है। सड़कों, रेल, बंदरगाहों और हवाई अड्डों के निर्माण की गति भी तीव्र हुई है। रक्षा उत्पादन में घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश हुई है। ऊर्जा के क्षेत्र में नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण बदलाव उस सोच का है, जिसमें भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में देखने के बजाय उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की कोशिश दिखाई देती है। यह बदलाव साधारण नहीं है। </p>
<p>आजादी के बाद लंबे समय तक भारत की आर्थिक बहस में कृषि का संकट और फिर सर्विस सेक्टर की सफलता प्रमुख विषय रहे। मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर अपेक्षित मजबूती से नहीं उभर पाया। चीन की आर्थिक सफलता महत्वपूर्ण है, इसमें हम देख सकते हैं कि बड़े पैमाने पर रोजगार और औद्योगिक क्षमता पैदा किए बिना किसी विशाल आबादी वाले देश को ऊंची आय वाले समाज में बदलना कठिन है, इसलिए सेमीकंडक्टर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, परमाणु ऊर्जा और दूसरी बुनियादी औद्योगिक क्षमताओं में निवेश को केवल कुछ नई फैक्ट्रियों तक सीमित मानना उचित नहीं होगा। इसके पीछे एक बड़े आर्थिक बदलाव की आवश्यकता है। </p>
<p>यह आवश्यक है कि देश अपने लिए जरूरी चीजें बनाने की क्षमता विकसित करे, वैश्विक उत्पादन श्रृंखलाओं में जगह बनाए और ऐसा औद्योगिक ढांचा खड़ा करे, जो आने वाले दशकों में लाखों लोगों के लिए अवसर पैदा कर सके। विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए तो अपरिहार्य है। जब हम विकसित भारत की बात करते हैं तो हमें ऊर्जा को महत्व देकर देखना चाहिए। जाहिर है, औद्योगिकीकरण होगा तो ऊर्जा चाहिए। शहर बढ़ेंगे तो बिजली चाहिए। रेलों को बिजली से चलाने आदि में ट्रांसपोर्ट सिस्टम बदलेगा तो ऊर्जा की दरकार बढ़ेगी, इसलिए परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और दूसरे स्रोतों पर एक साथ विचार करना पड़ेगा। एल्युमिनियम, स्टील जैसी बुनियादी धातुओं और दूसरे औद्योगिक कच्चे माल की क्षमता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।</p>
<p>नि:संदेह देश को विकसित बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बहुत काम करना पड़ेगा। भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी बहुत कम है। चीन और विकसित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के साथ तुलना करें, तो यह अंतर साफ दिखाई देता है। प्रति व्यक्ति आय का यह अंतर कई समस्याओं की जड़ है। हम 2047 तक भारत को विकसित बनाने के लक्ष्य पर एकजुट हो कर काम करें, यह सही है, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी तो सोचना होगा कि आर्थिक विकास के प्रकाश को उस बिंदु तक कैसे ले जाया जाए, जहां उसकी रोशनी समाज के उन अंधकार भरे हिस्सों तक भी पहुंचे, जो आज उससे पूरी तरह लाभान्वित नहीं हो रहे हैं? </p>
<p>हमारे देश में जब बेरोजगारी की बात करते हैं, तो रोजगार का प्रश्न सबसे ज्यादा असहज करने वाला होता है। भारत उन देशों में है, जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है। अगर इस युवा आबादी को लाभ के स्रोत में परिवर्तित करना है, तो उसके लिए शिक्षा चाहिए, कौशल चाहिए और ऐसे रोजगार चाहिए, जिनसे व्यक्ति अपने जीवन को आगे ले जा सके। अगर उद्योग बढ़ता है, लेकिन रोजगार पर्याप्त नहीं बढ़ता, तो विकास की तस्वीर अधूरी रह जाती है। जहां तक इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना है, तो इस पर गंभीरता से काम होना चाहिए। देश में कितने बड़े कारखाने लगे, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनके आसपास कितने छोटे उद्योग खड़े हुए, कितने लोगों को स्थायी काम मिला, कितने कस्बे आर्थिक गतिविधि के नए केंद्र बने और कितने ग्रामीण परिवारों के जीवन में इसका असर पहुंचा।</p>
<p>लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन ‘सप्त धाराओं’ की बात की है, उन्हें इसी बड़े लक्ष्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसे केवल किसी भाषण या सरकार की उपलब्धियों की सूची तक सीमित करना इस विचार को छोटा कर देगा। विकसित भारत मूलत: एक लंबी राष्ट्रीय यात्रा है, जिसमें सरकार के साथ उद्योग, किसान, श्रमिक, वैज्ञानिक, उद्यमी और सामान्य नागरिक सबकी भूमिका है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 05:03:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आजादी के अस्सी बरस बाद भी जिंदा है गांधी का सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[देश आजादी के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अंतरिक्ष में पहुंचते भारत की तस्वीरें आत्मविश्वास जगाती हैं, लेकिन कुछ महिलाएं आज भी दूसरों का मैला अपने हाथों से साफ करने को मजबूर हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592582/gandhis-question-is-still-alive-even-after-eighty-years-of"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2023-08/महात्मा-गांधी.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%B0-%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F.jpeg" alt="सीनियर जर्नलिस्ट" width="208" height="291"></img>
कुमार कृष्णन<br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">देश आजादी के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अंतरिक्ष में पहुंचते भारत की तस्वीरें आत्मविश्वास जगाती हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तेज रफ्तार सड़कें, चमकते शहर और बदलती जीवनशैली विकास की कहानी कहते हैं, लेकिन इसी चमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा भी है, जिसे हम जितना छिपाते हैं, वह उतना ही गहरा दिखाई देता है। कुछ महिलाएं आज भी दूसरों का मैला अपने हाथों से साफ करने के लिए मजबूर हैं। कहीं-कहीं सूखे शौचालय अब भी मौजूद हैं और उनके साथ वह सामाजिक व्यवस्था भी, जिसने जन्म के आधार पर कुछ लोगों के हिस्से में अपमान और कुछ के हिस्से में सुविधा लिख दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह केवल सफाई का सवाल नहीं है। यह मनुष्य की गरिमा का सवाल है। यह संविधान की उस प्रतिज्ञा का सवाल है, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और सम्मान का वादा किया गया है और सबसे बढ़कर यह गांधी के उस भारत का सवाल है, जिसकी कल्पना में अस्पृश्यता के लिए कोई जगह नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">गांधी को याद करने का सबसे सार्थक अवसर शायद यही है। गांधी केवल चरखा, सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन का नाम नहीं हैं। उनके विचार की असली परीक्षा उस मनुष्य के जीवन में होती है, जो समाज की सीढ़ी के सबसे नीचे खड़ा है। गांधी ने अस्पृश्यता को सामाजिक पाप माना था। उन्होंने स्वयं शौचालय साफ किए और समाज के सामने एक असुविधाजनक प्रश्न रखा— जिस काम को हम गंदा कहते हैं, उसे करने वाला मनुष्य गंदा क्यों हो जाता है?</p>
<p style="text-align:justify;">यही प्रश्न आज भी हमारे सामने है। हाल में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर से आई महिलाओं और युवाओं ने दिल्ली में इसी विरोधाभास को सामने रखा। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने ‘इंडिया @ 80’ अभियान शुरू करते हुए दावा किया कि सरकारी घोषणाओं के बावजूद हाथ से मैला साफ करने की प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आंदोलन के अनुसार, इन राज्यों के कम से कम 46 जिलों में ऐसी स्थितियों के प्रमाण और प्रत्यक्ष अनुभव सामने आए हैं। सरकारी सर्वेक्षणों के दावों और जमीन पर मौजूद अनुभवों के बीच का यह अंतर केवल आंकड़ों का विवाद नहीं है। यह उस भारत की दो तस्वीरें हैं, जिसे कागज और जमीन अलग-अलग ढंग से देखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश के सीतापुर से आई सत्तर वर्षीय मुसी देवी ने बताया कि उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा दूसरों का मैला साफ करते हुए बिताया। उनकी इच्छा है कि उनके मरने से पहले यह काम खत्म हो जाए। मध्य प्रदेश की अंगूरी बाई ने बताया कि कम उम्र में विवाह के बाद ससुराल में उन्हें सूखे शौचालय साफ करने के काम में लगा दिया गया। बिहार की चांजोतिया देवी पंद्रह वर्ष की उम्र से यह काम करती रही हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगली पीढ़ी को यह काम न करना पड़े। जम्मू-कश्मीर से आए मुजफ्फर अहमद शेख का कहना है कि वहां भी ऐसी प्रथा मौजूद है, लेकिन सामाजिक दबाव के कारण लोग खुलकर बोल नहीं पाते।</p>
<p style="text-align:justify;">इन आवाजों को सुनते हुए पहला सवाल यही उठता है कि किसी बुराई के खत्म होने की घोषणा और उसके वास्तव में खत्म हो जाने के बीच कितना अंतर होता है? अगर सरकारी सूची में कोई व्यक्ति दिखाई नहीं देता तो क्या उसकी पीड़ा भी समाप्त हो जाती है? अगर किसी सर्वेक्षण में संख्या शून्य हो जाए तो क्या सूखे शौचालय अपने आप खत्म हो जाते हैं? आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन आंकड़ों से बाहर छूट गया मनुष्य उससे कहीं अधिक जरूरी है। यही गांधी की राजनीति और नैतिकता का केंद्रीय आग्रह था। गांधी के लिए किसी व्यवस्था की सफलता का पैमाना यह नहीं था कि वह कितनी बड़ी दिखती है, बल्कि यह था कि उससे सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में क्या बदलता है। उनका ‘अंत्योदय’ इसी कसौटी पर समाज और सत्ता को परखता है, इसलिए मैला ढोने की प्रथा का अंत गांधी की दृष्टि से केवल स्वच्छता का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मनुष्य की मुक्ति का प्रश्न है।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 के सफाई कर्मचारी आंदोलन मामले में सूखे शौचालयों और हाथ से मैला साफ करने की अमानवीय प्रथा को समाप्त करना आवश्यक बताया और इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 17, 21 और 47 की भावना से जोड़ा। अदालत ने पुनर्वास और सम्मानजनक आजीविका की आवश्यकता पर भी जोर दिया। 2013 का कानून भी मैला ढोने की प्रथा पर रोक तथा प्रभावित लोगों के पुनर्वास का प्रावधान करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर सवाल वही है— कानून की किताब और समाज की जमीन के बीच इतनी दूरी क्यों है? कानून किसी प्रथा को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन वह अकेले सामाजिक पूर्वाग्रह को समाप्त नहीं कर सकता। उसके लिए समाज को अपनी आंखों में जमी सदियों पुरानी धूल साफ करनी होगी। मैला ढोने की प्रथा केवल गरीबी से पैदा नहीं होती। इसके पीछे जाति, अस्पृश्यता, पितृसत्ता और श्रम के प्रति घृणा की वह मानसिकता है, जो कुछ कामों को कुछ जातियों की नियति मान लेती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहीं गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। गांधी ने श्रम की गरिमा को सामाजिक बराबरी से जोड़ा था। उनके लिए सफाई का काम नीचा नहीं था; नीचा वह दृष्टिकोण था जो किसी मनुष्य को उसके पेशे और जन्म के आधार पर नीचा समझता है, लेकिन गांधी की विरासत को केवल उद्धरणों में सुरक्षित रख देना पर्याप्त नहीं है। यदि हम गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाते हैं और उसी समाज में किसी महिला को मैला ढोने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह गांधी का सम्मान नहीं, उनके विचार का निषेध है। गांधी की कसौटी पर स्वच्छता का अर्थ यह नहीं कि गंदगी हमारी आंखों से ओझल हो जाए। असली स्वच्छता तब होगी जब गंदगी किसी मनुष्य की नियति न बने। </p>
<p style="text-align:justify;">(ये लेखक के निजी विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 03:09:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Virendra Pandey]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सिंधु का पानी और आतंकवाद का सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[भारत का जवाब स्पष्ट है। अब वह यह मानने को तैयार नहीं है कि सीमा के एक तरफ हिंसा जारी रहे और दूसरी तरफ पुराने समझौतों के तहत सामान्य सहयोग चलता रहे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592585/indus-water-and-the-question-of-terrorism"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/सिंधु-का-पानी.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%B2.jpeg" alt="कांतिलाल वरिष्ठ पत्रकार" width="205" height="298"></img>
कांतिलाल मांडोत <br />वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच केवल पानी के बंटवारे का समझौता नहीं है। यह उस दौर की उपज है, जब दोनों देशों के बीच गहरे राजनीतिक और सुरक्षा मतभेदों के बावजूद एक ऐसा रास्ता तलाशने की कोशिश की गई थी, जिससे नदियों का पानी युद्ध और तनाव से अलग रखा जा सके, लेकिन सात दशक से अधिक समय बाद परिस्थितियां इतनी बदल चुकी हैं कि यह संधि अब केवल जल प्रबंधन का विषय नहीं रह गई है। यह भारत की सुरक्षा, संप्रभुता, सीमा पार आतंकवाद और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का हालिया रुख इसी बदली हुई परिस्थिति को सामने रखता है। अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की एक संस्था द्वारा सिंधु जल संधि और भारत की जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित निर्णय पर भारत ने स्पष्ट किया है कि वह ऐसी कार्रवाई को स्वीकार नहीं करता। नई दिल्ली का तर्क है कि जिस संस्था को भारत ने कभी मान्यता ही नहीं दी और जिसकी कार्रवाई में उसने भाग नहीं लिया, उसके फैसले को भारत पर बाध्यकारी नहीं माना जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या पुराने समझौतों को बदली हुई सुरक्षा परिस्थितियों से पूरी तरह अलग रखकर देखा जा सकता है?</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का जवाब स्पष्ट है। उसके लिए पानी और सुरक्षा अलग-अलग विषय नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ संबंधों में आतंकवाद को लेकर भारत का अनुभव इतना गंभीर रहा है कि अब वह यह मानने को तैयार नहीं है कि सीमा के एक तरफ हिंसा जारी रहे और दूसरी तरफ पुराने समझौतों के तहत सामान्य सहयोग चलता रहे। यही कारण है कि भारत ने बार-बार यह संदेश दिया है कि आतंकवाद और पानी साथ-साथ नहीं चल सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते में सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के जल के उपयोग को लेकर व्यापक व्यवस्था बनाई गई। सतलुज, ब्यास और रावी का अधिकांश जल भारत के उपयोग के लिए निर्धारित किया गया, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी के उपयोग में पाकिस्तान को प्रमुख अधिकार मिले। भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ सीमित उपयोग और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति भी दी गई, लेकिन उसके लिए तकनीकी और परिचालन संबंधी शर्तें तय की गईं।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय इस समझौते को दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया था। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए, संबंधों में उतार-चढ़ाव आया, सीमाओं पर तनाव बढ़ा, लेकिन सिंधु जल संधि लंबे समय तक बनी रही। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी। मगर आज भारत यह संकेत दे रहा है कि किसी समझौते की स्थिरता केवल इस बात से तय नहीं हो सकती कि वह कितने वर्षों से अस्तित्व में है। समय के साथ यदि परिस्थितियां बदलती हैं, तो समझौतों की व्याख्या और उनके क्रियान्वयन के तरीके पर भी नए सिरे से विचार होना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की आपत्ति केवल मध्यस्थता संस्था के फैसले तक सीमित नहीं है। असली प्रश्न यह है कि किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था को भारत की संप्रभु परियोजनाओं और उसके जल संसाधनों के बारे में निर्णय देने का अधिकार कहां तक है। भारत का कहना है कि जिस प्रक्रिया को उसने स्वीकार ही नहीं किया, उसके निष्कर्ष को वह अपने ऊपर लागू नहीं मान सकता। यह रुख अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधि व्यवस्था में भारत की उस व्यापक सोच को भी दर्शाता है, जिसमें किसी भी बाहरी संस्था के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने से पहले उसकी वैधता और संबंधित समझौते की शर्तों को देखा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां पाकिस्तान के लिए भी एक गंभीर चुनौती है। वह लंबे समय से सिंधु जल संधि को भारत के साथ अपने जल संबंधों की सुरक्षा-कवच के रूप में देखता रहा है। पाकिस्तान के लिए सिंधु नदी प्रणाली कृषि, खाद्य सुरक्षा, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इसलिए भारत की ओर से संधि को लेकर अपनाया गया कठोर रुख पाकिस्तान में स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है, लेकिन भारत के दृष्टिकोण से सवाल यह है कि क्या पानी पर सहयोग की अपेक्षा उस समय भी की जा सकती है. जब सीमा पार से आतंकवाद का खतरा लगातार बना रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने इसी विरोधाभास को अपनी नीति का आधार बनाया है। उसका संदेश है कि एक ओर आतंकवाद को भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाए और दूसरी ओर जल समझौते को पूरी तरह सामान्य द्विपक्षीय संबंधों से अलग रखने की अपेक्षा की जाए, यह स्थिति लंबे समय तक स्वीकार्य नहीं हो सकती। भारत की भाषा में कहा जाए तो खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। इस वाक्य का महत्व केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। यह भारत की बदलती रणनीतिक सोच का संकेत है।</p>
<p style="text-align:justify;">(ये लेखक के निजी विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 03:08:18 +0530</pubDate>
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                <title>संपादकीय :आस्था और जवाबदेही</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">सेवानिवृत्त एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाना मंदिर प्रशासन के चरित्र में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। 39 वर्ष से अधिक भारतीय वायुसेना में सेवा कर चुके मिश्रा को 5,585 आवेदनों में से चुना जाना इस बात का संकेत है कि ट्रस्ट अब रोजमर्रा के विशाल संचालन के लिए पेशेवर प्रबंधन चाहता है। </p>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय साधु-संतों के एक वर्ग की सीईओ की नियुक्ति पर आपत्ति के बावजूद यह निर्णय इस संदर्भ में देखना होगा कि भले ही मंदिर धार्मिक संस्था है, इसलिए उसके संचालन में संत-परंपरा, धार्मिक मर्यादा और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592577/ram-mandir-trust-first-ceo-jitendra-mishra"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/ed1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सेवानिवृत्त एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाना मंदिर प्रशासन के चरित्र में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। 39 वर्ष से अधिक भारतीय वायुसेना में सेवा कर चुके मिश्रा को 5,585 आवेदनों में से चुना जाना इस बात का संकेत है कि ट्रस्ट अब रोजमर्रा के विशाल संचालन के लिए पेशेवर प्रबंधन चाहता है। </p>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय साधु-संतों के एक वर्ग की सीईओ की नियुक्ति पर आपत्ति के बावजूद यह निर्णय इस संदर्भ में देखना होगा कि भले ही मंदिर धार्मिक संस्था है, इसलिए उसके संचालन में संत-परंपरा, धार्मिक मर्यादा और श्रद्धालुओं की भावनाओं की केंद्रीय भूमिका आवश्यक है, परंतु धार्मिक नेतृत्व और प्रशासनिक दक्षता परस्पर विरोधी नहीं हैं। लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही, सुरक्षा, दर्शन-व्यवस्था, कर्मचारियों का प्रबंधन, आपदा-प्रबंधन, तकनीक, दान की गणना और विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय जैसे काम अब इतने व्यापक हैं कि केवल परंपरागत व्यवस्था पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं होगा। सैन्य प्रशासन में अनुशासन, स्पष्ट जिम्मेदारी, त्वरित निर्णय, बहु-एजेंसी समन्वय और संकट-प्रबंधन महत्वपूर्ण होते हैं, हालांकि मंदिर प्रशासन को केवल ‘ऑपरेशन’ की तरह नहीं चलाया जा सकता, इसलिए सैन्य दक्षता को संवेदनशील धार्मिक-प्रशासनिक दृष्टि के साथ जोड़ना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। नई व्यवस्था की खासियत केवल सीईओ की नियुक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का संस्थागत विभाजन है। गोविंद देव गिरि को महासचिव और महेश भागचंदका को नया कोषाध्यक्ष बनाया गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार सीईओ और कोषाध्यक्ष महासचिव को रिपोर्ट करेंगे; इसलिए इसे ‘चेयरमैन के नीचे सीधे सीईओ’ वाली सरल संरचना मानना ठीक नहीं होगा। यह व्यवस्था सफल हुई तो धार्मिक नेतृत्व नीति और मूल दिशा संभाल सकता है, जबकि पेशेवर टीम दैनिक संचालन को अधिक व्यवस्थित ढंग से चला सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बदलाव की असली कसौटी विश्वास की पुनर्स्थापना होगी, क्योंकि श्रद्धालु ग्राहक नहीं, धार्मिक आस्थावान लोग हैं। चंदा और चढ़ावा चोरी की घटना के बाद श्रद्धालुओं की संख्या और चढ़ावे में भी खासी कमी आई है। गोविंद देव गिरि ट्रस्ट बनने के बाद से वित्तीय व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, इसलिए कथित चोरी के समय उनकी भूमिका स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक जांच के दायरे में प्रश्न पैदा करती है, लेकिन उनपर किसी दोष या संलिप्तता का प्रमाण नहीं है। नई जिम्मेदारी उनको अपना पक्ष मजबूत करने का अवसर देगी। निर्मला यादव का पहली महिला ट्रस्टी बनना स्वागतयोग्य परिवर्तन है। इससे निर्णय-प्रक्रिया में महिलाओं का अनुभव और दृष्टिकोण आएगा, हालांकि इसका वास्तविक गुणात्मक प्रभाव तभी दिखेगा जब उनकी भागीदारी औपचारिक न होकर सक्रिय हो। </p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक चोरी के मामले में आगे कार्रवाई का प्रश्न है, आठ नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है; अब जांच का अगला चरण यह देखना होना चाहिए कि क्या कोई बड़ी साजिश, मिलीभगत या ट्रस्ट से हुई निगरानी की विफलता थी। नई व्यवस्था तभी सार्थक मानी जाएगी, जब वह आस्था को प्रशासनिक दक्षता और धार्मिक प्रतिष्ठा को पारदर्शी जवाबदेही से जोड़े। राम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं, करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है; इसलिए उसके प्रशासन में सामान्य संस्थाओं से भी ऊंचे नैतिक मानदंड अपेक्षित हैं। आशा है कि ये बदलाव इस कसौटी पर खरे उतरेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 03:08:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Virendra Pandey]]></dc:creator>
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                <title>सैलाब के कारण, विभीषिका और बचाव के उपाय</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में अब कम दिनों में अत्यधिक तीव्र बारिश का एक नया और खतरनाक पैटर्न विकसित हो रहा है। हमारी नदियां-झीलें उस अपार जलराशि को संभालने में असमर्थ हो जाती हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592473/india-flood-climate-change-irregular-monsoon-heavy-rainfall-deaths"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/sailab.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/pankaj-chaturvedi.jpg" alt="Pankaj Chaturvedi" width="153" height="168"></img>
पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

<p style="text-align:justify;">इस बार भले ही आंकड़ों में देश के बड़े हिस्से में औसत से कम बरसात हुई हो, लेकिन जहां भी इंद्र की कृपा हुई, नदी-नाले उफन कर बस्तियों में घुस गए। यह चिंता की बात है कि भारत में जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और अत्यधिक बारिश के कारण बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं का दायरा जिस तरह बीते दो वर्षों में व्यापक हुआ है, उसने देश के नीति निर्माताओं, पर्यावरणविदों और आम जनजीवन के समक्ष एक गंभीर और विकट चुनौती खड़ी कर दी है। वर्ष 2024 और 2025 के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि प्रकृति का यह प्रकोप अब किसी एक क्षेत्र या विशेष मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरे देश के भौगोलिक और सामाजिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया है। </p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2024 के आंकड़ों पर नजर डालें, तो गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान प्राकृतिक आपदाओं, विशेष रूप से बाढ़ और अत्यधिक मौसम के कारण देश भर में 3,080 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में एक डरावनी बढ़ोतरी है। इस एक वर्ष के दौरान देश में लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि बाढ़ के पानी में डूब गई और लगभग 3.64 लाख से अधिक मकानों को आंशिक या पूर्ण रूप से भारी नुकसान पहुंचा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान क्षेत्रीय प्रभाव भी बेहद विनाशकारी रहे, जहां केरल के वायनाड में आए भीषण भूस्खलन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा, वहीं देश के पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों में भी नदियों के उफान पर होने के कारण भारी तबाही देखने को मिली। वायनाड की त्रासदी ने यह साबित कर दिया कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन का मेल कितना घातक साबित हो सकता है। वर्ष 2024 के बाद वर्ष 2025 में स्थिति में सुधार होने के बजाय और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2025 के दौरान मानसून और बेमौसम बारिश ने देश के अधिकांश हिस्सों में अभूतपूर्व तबाही मचाई। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट और मौसम विभाग की रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत ने साल के अधिकांश दिन यानी लगभग 331 दिन किसी न किसी रूप में चरम मौसमी घटनाओं का सामना किया। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की एक भयानक सच्चाई बन चुका है। इस वर्ष मानसून और बाढ़-बारिश जनित हादसों से देश भर में 2,700 से अधिक लोगों की जान चली गई और अकेले मानसून सीजन में ही बाढ़ और भारी बारिश के कारण लगभग 1,528 मौतें दर्ज की गईं।</p>
<p style="text-align:justify;">बाढ़ का दायरा इस कदर बढ़ चुका था कि मानसून के दौरान देश के विभिन्न प्रमुख नदी बेसिनों, विशेषकर गंगा और यमुना बेसिन में 59 से अधिक स्थानों पर उच्च स्तर की विनाशकारी बाढ़ रिकॉर्ड की गई। करोड़ों हेक्टेयर फसलें जलमग्न हो गईं और कृषि क्षेत्र के साथ-साथ पशुधन को भी भारी क्षति उठानी पड़ी, जिसमें हजारों मवेशी काल के गाल में समा गए। राज्यवार असर की बात करें तो पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र इस आपदा से सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों में शामिल रहे। </p>
<p style="text-align:justify;">इन सभी आंकड़ों और घटनाओं का विश्लेषण करने पर जो मुख्य निष्कर्ष सामने आता है, वह यह है कि भारत में अब कम दिनों में अत्यधिक तीव्र बारिश का एक नया और खतरनाक पैटर्न विकसित हो रहा है। मानसून के दिनों की कुल संख्या भले ही कम हुई हो, लेकिन कम समय में बहुत अधिक पानी बरसने के कारण अचानक आने वाली बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड्स और शहरी बाढ़ की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। जब कुछ ही घंटों में महीनों की बारिश हो जाती है, तो हमारी पारंपरिक जल निकासी प्रणालियां, नदियां और झीलें उस अपार जलराशि को संभालने में असमर्थ हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप शहरों से लेकर गांवों तक पानी का सैलाब तबाही मचाता हुआ निकल जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बढ़ते दायरे और विभीषिका के पीछे कई प्रमुख कारण छिपे हैं। सबसे बड़ा कारण अनियंत्रित और अवैज्ञानिक शहरीकरण है। हमारे महानगरों और कस्बों में प्राकृतिक जल निकास मार्गों, तालाबों, झीलों और आद्रभूमि पर अवैध कब्जे कर लिए गए हैं, जिससे पानी के प्राकृतिक बहाव का रास्ता बंद हो चुका है। कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके शहरों में पानी जमीन के भीतर जाने के बजाय सड़कों पर बहता है, जिससे मामूली बारिश भी बाढ़ का रूप ले लेती है। वनों की अंधाधुंध कटाई और पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्यों ने पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ दिया है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में छेड़छाड़ और बांधों के कुप्रबंधन ने भी बाढ़ के संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के तापमान में हो रही वृद्धि और मानसूनी हवाओं के पैटर्न में आ रहा बदलाव इस समस्या को वैश्विक स्तर पर और अधिक जटिल कर रहा है। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 05:49:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मेसी मैदान से विदा हुए, सपनों से नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[मेसी के जाने की खबर उन आंखों को सबसे ज्यादा चुभी, जिन्होंने उन्हें अपना भविष्य माना था। एक गेंद, कच्ची जमीन और उसे ठोकर मारता बच्चा— मेसी ने करोड़ों युवाओं को सपने देखने का हौसला दिया।  
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592472/messi-bid-farewell-to-the-field--not-to-his-dreams"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-09/mesi.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-09/rk-jain.jpg" alt="RK JAIN" width="146" height="197"></img>
<strong>प्रो. आरके जैन, शिक्षक</strong>

<p style="text-align:justify;">मेसी के जाने की खबर उन आंखों को सबसे ज्यादा चुभी, जिन्होंने उन्हें अपना भविष्य माना था। एक गेंद, कच्ची जमीन और उसे ठोकर मारता बच्चा- मेसी ने करोड़ों युवाओं को सपने देखने का हौसला दिया। किसी कमरे में उनकी तस्वीर थी, किसी की चाल में उनकी नकल। उन्हें लगता था, मेसी रहेंगे तो जादू रहेगा- वही तेज कदम, वही बायां पैर, वही असंभव गोल। अब अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास उन्हें कड़वा सच सिखा रहा है- समय किसी नायक के लिए नहीं रुकता। फिर भी यह हार नहीं। मेसी सपने लेकर नहीं गए; अपनी यात्रा की रोशनी युवाओं को सौंप गए। अब उनका जादू उन पैरों में दिखेगा, जो उनकी कहानी से प्रेरित होकर मैदान में उतरेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया ने मेसी को ट्रॉफी उठाते देखा, मगर उनके जीवन का सबसे गहरा खालीपन पिता जॉर्ज के जाने का है। पिता के लिए बेटे को ऊंचाइयों पर देखना सबसे बड़ा सुख, बेटे के लिए उस ऊंचाई पर पिता की आंखों को न पाना सबसे बड़ा दर्द है। जॉर्ज के निधन के बाद मेसी का यह फैसला इसलिए मार्मिक है कि इसमें महान खिलाड़ी से पहले एक बेटे का दर्द दिखता है। विश्व कप फाइनल में स्पेन से हार के दो दिन बाद लिखे उनके शब्दों को भी इसी पीड़ा में समझना चाहिए। युवाओं के लिए यह सबक है— हर सफलता के पीछे परिवार का साथ होता है और सबसे कठिन लड़ाइयां कई बार स्टेडियम में नहीं, भीतर लड़ी जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मेसी के 207 अंतर्राष्ट्रीय मैच और 125 गोल के पीछे वह कहानी है, जो किसी स्कोर बोर्ड पर नहीं लिखी जाती। कितनी हारें मिलीं, कितनी आलोचनाएं सहीं, कितनी जीत हाथ से निकल गई— इनका कोई हिसाब नहीं। यही अनदेखा संघर्ष युवाओं के लिए मेसी की असली पाठशाला है। महान खिलाड़ी वह नहीं जो कभी गिरता नहीं, बल्कि वह है जो गिरकर भी सपने से नाता नहीं तोड़ता। मेसी के पैरों ने जितने गोल किए, उनके संघर्ष ने उससे कहीं ज्यादा युवाओं में विश्वास जगाया। अब उनकी विदाई उस विश्वास को बुझाएगी नहीं; उसे अगली पीढ़ी की जिम्मेदारी बनाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">एक तस्वीर में मेसी विश्व कप थामे खड़े हैं, दूसरी में हार के बाद लौटते हुए। यही दो तस्वीरें बताती हैं कि जिंदगी का कोई अंत हमेशा जीत से नहीं होता। 2022 की विश्व कप जीत ने एक पीढ़ी को लगा था कि मेसी की कहानी पूरी हो गई, लेकिन 2026 के फाइनल में स्पेन से मिली हार ने तस्वीर बदल दी। युवाओं के लिए यही सबसे बड़ा सबक है— सपना पूरा होना अंत नहीं और अधूरा रह जाना हार नहीं। मेसी ने शिखर देखा, हार देखी और फिर मैदान से हटने का फैसला किया। पिता जॉर्ज की मृत्यु के बाद यह निर्णय और मार्मिक हो जाता है। यह उस क्षण की ओर इशारा करता है, जब इंसान को दुनिया की उम्मीदों और अपने भीतर की आवाज में से एक चुनना पड़ता है। मेसी ने इस बार दुनिया नहीं, शायद अपने मन की सुनी।</p>
<p style="text-align:justify;">मेसी के जाने के बाद खाली हुई जगह किसी एक खिलाड़ी से नहीं भरेगी; उसे एक पूरी पीढ़ी भरेगी। कल तक जो बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते थे, आज उनके सामने सवाल है— अब किसकी तरह बनें? शायद जवाब किसी एक नाम में नहीं, मेसी से मिली सीख में है। युवा खिलाड़ियों को अवसर देने की उनकी बात इसी विरासत को आगे बढ़ाती है। उनकी ड्रिब्लिंग की नकल करने वाले बच्चे अब उनके साहस को अपनाएं, उनके गोलों पर खुश होने वाले उनके धैर्य को और उनकी जीत से प्रेरित होने वाले उनकी हार से सीखें। महान खिलाड़ी की असली विरासत रिकॉर्ड नहीं, दूसरों के भीतर जगाया आत्मविश्वास और सपने से होती है। मेसी अब मैदान से ज्यादा उन युवाओं के सपनों में दिखाई देंगे, जो उनकी रोशनी लेकर आगे बढ़ेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">तालियां थम जाने के बाद ही किसी खिलाड़ी की असली कहानी सुनाई देती है। खाली मैदान में घास पर बचे कदमों के निशान जैसे कहते हैं कि मेसी ने अपना जीवन फुटबॉल को सौंप दिया। उनका संन्यास युवाओं को समझाता है कि सपने पाने की कीमत समय, परिवार की उम्मीदों और कई बार अपनी खुशियों से चुकानी पड़ती है। पिता की स्मृति इस त्याग को और गहरा करती है। अब युवा समझ रहे हैं कि महानता केवल तालियां बटोरना नहीं, बल्कि उन रिश्तों और दर्द को साथ लेकर चलना है, जिन्हें दुनिया कभी देख नहीं पाती।</p>
<p style="text-align:justify;">मेसी मैदान से हटे हैं, अर्जेंटीना के दिल से नहीं। उनका यह भाव कि वे हमेशा राष्ट्रीय टीम का हिस्सा रहेंगे, बताता है कि कुछ रिश्ते जर्सी के साथ खत्म नहीं होते। जर्सी उतारी जा सकती है, देश के लिए प्रेम नहीं। खिलाड़ी संन्यास ले सकता है, उसकी स्मृति नहीं। अब युवा अपनी अधूरी उम्मीदें नए चेहरों में तलाशेंगे— किसी की पहली बड़ी जीत में मेसी की मुस्कान, किसी निर्णायक क्षण में उनका साहस और किसी हार के बाद लौटने में उनका धैर्य। सपने किसी एक खिलाड़ी के नहीं होते। एक जाता है, तो वही सपना दूसरे के कंधों पर आगे बढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेसी की असली विदाई उस दिन होगी, जब किसी बच्चे की आंखों में फुटबॉल का सपना बुझ जाएगा, इसलिए उनका आखिरी सलाम अंत नहीं, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपी मशाल है। 207 मैच, 125 गोल, 2022 की विश्व कप जीत, 2026 के फाइनल की हार, पिता जॉर्ज की स्मृति, युवाओं को अवसर देने की पुकार और राष्ट्रीय टीम से अटूट प्रेम— इन सबने एक खिलाड़ी नहीं, अमर विरासत गढ़ी है। अब किसी धूल भरी गली में कोई बच्चा गेंद उठाएगा; उसे शायद पता भी न हो कि उसके पीछे एक पूरा युग खड़ा है। मेसी मैदान से चले गए हैं, उनका सपना नहीं। अब वह सपना उन बच्चों के पैरों में दौड़ेगा। मेसी मैदान से विदा हुए, सपनों से नहीं। <strong>(ये लेखक के निजी विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 05:34:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Chandra Mani]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : आतंक पर दोहरा रवैया </title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिश्केक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंक को रणनीतिक साधन नहीं बनाया जा सकता, यह एक बेहद सशक्त कूटनीतिक वक्तव्य है। मोदी ने आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र- वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित पनाहगाह और तकनीकी साधन मुहैया कराने तथा आतंकवाद पर दोहरे मानदंड अपनाने वालों को एक झटके में उजागर कर दिया। </p>
<p>बिश्केक घोषणा में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के लिए आतंकवादी संगठनों के इस्तेमाल का विरोध और सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की बात शामिल होना भारतीय कूटनीति की बड़ी उपलब्धि है, हालांकि इसकी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/592470/double-stance-editorial-terror"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-08/ed1.jpg" alt=""></a><br /><p>बिश्केक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंक को रणनीतिक साधन नहीं बनाया जा सकता, यह एक बेहद सशक्त कूटनीतिक वक्तव्य है। मोदी ने आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र- वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित पनाहगाह और तकनीकी साधन मुहैया कराने तथा आतंकवाद पर दोहरे मानदंड अपनाने वालों को एक झटके में उजागर कर दिया। </p>
<p>बिश्केक घोषणा में आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के लिए आतंकवादी संगठनों के इस्तेमाल का विरोध और सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की बात शामिल होना भारतीय कूटनीति की बड़ी उपलब्धि है, हालांकि इसकी असली परीक्षा इस बात से होगी कि सदस्य देश अपने यहां मौजूद आतंकवादी नेटवर्क और उनके वित्तीय संरक्षकों के खिलाफ कितना ठोस कदम उठाते हैं। शंघाई सहयोग संगठन की स्थिति इस चुनौती को स्पष्ट करती है। रूस ने मध्य एशिया और अफगानिस्तान से निकलने वाले आतंकवाद के विरुद्ध महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोग दिया, लेकिन अब तालिबान के साथ उसका बढ़ता संपर्क नई जटिलता पैदा करता है। चीन उइगर उग्रवाद और मध्य एशिया की अस्थिरता के प्रति अत्यंत सतर्क है, पर पाकिस्तान के साथ उसके रणनीतिक संबंध आतंकवाद पर एकसमान नीति को कठिन बनाते हैं।</p>
<p>ईरान आईएस और अन्य सुन्नी जिहादी संगठनों का विरोध करता है, किंतु स्वयं पश्चिम और कुछ क्षेत्रीय शक्तियों द्वारा आतंकवाद समर्थक माना जाता है। पाकिस्तान आतंकवाद से अपने नुकसान का हवाला देता है और एससीओ की अध्यक्षता करता है, लेकिन उसके भूभाग से भारत-विरोधी आतंकवादी ढांचे संचालित होते हैं। जाहिर है कि यही शंघाई सहयोग संगठन के देशों की सबसे बड़ी कमजोरी है। आतंकवाद पर बाहरी सहमति तो है, पर आतंकवाद की परिभाषा और राज्य-प्रायोजन पर एकमत नहीं। भारत इसी कथनी करनी के अंतर को पाटने की कोशिश कर रहा है।</p>
<p>भारत ने पिछले दशक में आतंक से जंग को सैन्य कार्रवाई और कूटनीति दोनों को जोड़ा है- 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 का बालाकोट, 2025 का ऑपरेशन सिंदूर, आतंक वित्तपोषण पर दबाव, संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर का वैश्विक आतंकी पदनाम, 26/11 आरोपी तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण और अनेक देशों के साथ आतंकवाद-रोधी कार्यसमूह इसके कुछ प्रमाण हैं। सरकार के अनुसार उसकी कोशिशों से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं बहुत तेजी से घटी हैं। वैश्विक स्तर पर देखें तो सैन्य कार्रवाई आतंकवाद का स्थायी समाधान नहीं।</p>
<p>कट्टरपंथ का सामाजिक आधार, ऑनलाइन भर्ती, ड्रग्स और हवाला, क्रिप्टो-फंडिंग, कमजोर शासन, अफगानिस्तान की अस्थिरता और पश्चिम एशिया के युद्ध आतंकवाद को पुनर्जीवित करने वाली परिस्थितियां हैं। हूती, आईएस या तालिबान जैसे अलग-अलग संगठनों के लिए एक ही रणनीति भी कारगर नहीं हो सकती। दुनिया को आतंकवाद के खिलाफ एक और 'युद्ध' से ज्यादा एक ऐसी स्थायी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें आतंकवादी संगठन, उनके वित्तदाता, हथियार आपूर्तिकर्ता और सुरक्षित पनाह देने वाले-सबकी सज़ा तय हो। </p>
<p>बिश्केक की सफलता इसी में है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ समान नियम, समान जवाबदेही और बिना दोहरे मानदंड वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में अपनी भूमिका बढ़ाए। फिलहाल भारत ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है। अब कूटनीतिक सहमति ठोस कार्रवाई में बदले तो बिश्केक का संदेश आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक मोड़ साबित हो।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 05:00:45 +0530</pubDate>
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