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                <title>Editorial - Amrit Vichar</title>
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                <description>Editorial RSS Feed</description>
                
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                <title>संपादकीय : शांति की कीमत</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सौ दिनों से अधिक चले संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हुई और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर संकट मंडराने लगा था। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर को मानवता और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है। इस समझौते को किसी पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने की बजाए यदि क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो वास्तविक विजेता शांति होगी। किंतु इतना अवश्य कहा जाएगा कि यह बहुत महंगी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह कि दीर्घकालिक भरोसे से जुड़े प्रश्न अभी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585197/editorial-price-of-peace"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sam-013.jpg" alt=""></a><br /><p>सौ दिनों से अधिक चले संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हुई और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर संकट मंडराने लगा था। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर को मानवता और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए राहत की बात है। इस समझौते को किसी पक्ष की जीत या हार के रूप में देखने की बजाए यदि क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो वास्तविक विजेता शांति होगी। किंतु इतना अवश्य कहा जाएगा कि यह बहुत महंगी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह कि दीर्घकालिक भरोसे से जुड़े प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। अमेरिका को अपने उद्देश्यों में बहुत सीमित और मिश्रित सफलता ही मिली है। कई अमेरिकी अखबार इसे ट्रंप की विफलता का दस्तावेज बता रहे हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन, शासन को कमजोर करने अथवा पूर्ण परमाणु समझौते जैसी महत्वाकांक्षी अमेरिकी अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं। यही कारण है कि परमाणु कार्यक्रम पर अंतिम निर्णय को 60 दिनों की वार्ता पर छोड़ दिया गया है। ईरान ने अभी तक संवर्धित यूरेनियम या बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर निर्णायक रियायत नहीं दी है।</p>
<p>ट्रंप द्वारा ईरान के सीमित मिसाइल अधिकारों को स्वीकार करना भी अमेरिकी लक्ष्य का अधूरा होना है। ईरान के दृष्टिकोण से देखें, तो यह समझौता उसकी महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता प्रतीत होता है। यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है, अवरुद्ध संपत्तियों तक पहुंच बहाल होती है और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ता है, तो तेहरान को बड़ी राहत मिलेगी। कथित 28 लाख करोड़ रुपये के पैकेज अथवा हर्जाने अगर उसे मिल जाता है, तो यह उसकी बड़ी जीत होगी। हालांकि वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रतिबंधों में कितनी और कैसी ढील दी जाती है। इजराइल का प्रश्न अभी भी सबसे बड़ी अनिश्चितता से भरा हुआ है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस समझौते के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखते। यदि भविष्य में चुनावे फायदे के मद्देनजर  लेबनान, गाजा या ईरान से जुड़े मोर्चों पर नेतन्याहू तनाव पैदा करते हैं, तो वर्तमान शांति प्रक्रिया फिर से संकट में पड़ सकती है। इसलिए इस समझौते के बावजूद किसी भी पक्ष द्वारा आगे सैन्य कार्रवाई न करने की पूर्ण गारंटी आज कोई नहीं दे सकता।</p>
<p>भारत के लिए यह समझौता अत्यंत सकारात्मक संकेत लेकर आया है। तेल कीमतों में नरमी से आयात बिल कम हो सकता है, रुपये को समर्थन मिल सकता है और महंगाई पर दबाव घट सकता है। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों के रोजगार और सुरक्षा की स्थिति भी बेहतर हो सकती है। साथ ही चाबहार बंदरगाह और भारत-ईरान संपर्क परियोजनाओं को नई गति मिलने की संभावना बढ़ेगी। कुल मिलाकर यह समझौता हमें याद दिलाता है कि युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं और शांति का सबसे बड़ा लाभ भी उन्हें ही मिलता है, लेकिन पश्चिम एशिया के इतिहास को देखते हुए यह भी सच है कि शांति केवल दस्तावेजों से नहीं टिकती; उसे भरोसे, संयम और सतत संवाद से जीवित रखना पड़ता है। इसलिए इस समझौते का स्वागत अवश्य होना चाहिए, पर उसकी स्थिरता की असली परीक्षा अगले कुछ महीनों में होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 07:05:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pradeep Kumar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय : मित्रता बनाम हित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">वैश्विक राजनीति के इस संक्रमण काल में, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, चीन की बढ़ती सक्रियता, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रतिस्पर्धा ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति बदल दी है। ऐसे माहौल में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की वार्ता को बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह भारत की उम्मीदों को बढ़ाने वाली है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप द्वारा प्रस्तुत इम्पैक्ट यानी “इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सलरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड” की अवधारणा वस्तुतः उस नई वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जिसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, डिजिटल कनेक्टिविटी और आपूर्ति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/585115/editorial--friendship-vs--interest"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy23.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वैश्विक राजनीति के इस संक्रमण काल में, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, चीन की बढ़ती सक्रियता, आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रतिस्पर्धा ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति बदल दी है। ऐसे माहौल में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की वार्ता को बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह भारत की उम्मीदों को बढ़ाने वाली है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप द्वारा प्रस्तुत इम्पैक्ट यानी “इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सलरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड” की अवधारणा वस्तुतः उस नई वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करती है, जिसमें व्यापार, बुनियादी ढांचा, डिजिटल कनेक्टिविटी और आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन-केंद्रित मॉडल से अलग कर बहुध्रुवीय ढांचे में विकसित करने की कोशिश है। भारत और ग्लोबल साउथ के लिए इसका अर्थ है कि उन्हें केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी नवाचार के केंद्र के रूप में भी देखा जाएगा। यह पहल व्यवहार में उतरती है, तो भारत को निवेश, विनिर्माण, बंदरगाह, डिजिटल अवसंरचना और निर्यात के क्षेत्र में महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप का यह कहना कि युद्ध की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा होगा, महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। इसके पीछे चीन का बढ़ता प्रभाव, इंडो-पैसिफिक की रणनीति और पाकिस्तान-चीन सैन्य सहयोग जैसे कारक भी हो सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को मिले चीनी समर्थन ने वाशिंगटन को यह एहसास भी कराया है कि दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका अपरिहार्य है, लेकिन याद रखना चाहिए कि अमेरिकी विदेश नीति स्थायी मित्रता नहीं, स्थायी हितों पर आधारित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका भारत को चीन के संतुलन के रूप में देखता है, जबकि पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्थिरता और कुछ सामरिक उद्देश्यों के लिए उपयोगी मानता है। इसलिए किसी एक बयान को सुरक्षा गारंटी मान लेना उचित नहीं होगा। जहां तक एच-1बी वीजा और भारतीय प्रतिभाओं की बात है, ट्रंप का सकारात्मक रुख उत्साहजनक है, लेकिन अमेरिकी आव्रजन नीति अंततः घरेलू राजनीति से प्रभावित होती है। इसलिए तत्काल किसी बड़े बदलाव की अपेक्षा जल्दबाजी होगी। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री का कहना कि देशों के बीच भरोसा और विश्वास कम हो रहा है, आज की विश्व राजनीति का सबसे सटीक आकलन है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष, व्यापारिक प्रतिबंध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बदलते सैन्य गठबंधनों ने देशों के बीच संदेह बढ़ाया है। भरोसा केवल घोषणाओं से नहीं बढ़ता, इसके लिए नियमों का सम्मान, समझौतों का पालन और दीर्घकालिक नीति-स्थिरता आवश्यक होती है। भारत इसी कारण “रणनीतिक स्वायत्तता” पर जोर देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी की प्रशंसा करते हुए ट्रंप का यह कहना कि “जब तक मोदी हैं, व्हाइट हाउस उनके साथ है” व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों संदेश देता है। निष्कर्षतः यह भारत के प्रति सम्मान का संकेत है। भारत को ट्रंप के बयानों का स्वागत अवश्य करना चाहिए, लेकिन अपनी नीति को घोषणाओं पर नहीं, ठोस समझौतों और वास्तविक क्रियान्वयन पर आधारित रखनी चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मित्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है, किंतु राष्ट्रीय हित उससे भी अधिक अहम होते हैं। यही वह संतुलन है, जिसने आज भारत को आज वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय और स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 05:49:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>संपादकीय : रक्षा से प्रौद्योगिकी तक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा कूटनीतिक औपचारिकता से बढ़ कर रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में उभरती हुई एक नई सामरिक साझेदारी का संकेत है। दोनों देशों द्वारा अपनी साझेदारी को गहरा करते हुए व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना करने, “इनोवेशन रोडमैप 2030” लागू करने तथा एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा पर संयुक्त कार्य समूह बनाने का जो निर्णय लिया गया वह स्वागत योग्य है। खास बात यह है कि दोनों देश “रणनीतिक स्वायत्तता” के पक्षधर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">“भारत-फ्रांस इनोवेशन रोडमैप 2030” यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संकेत है कि भारत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584845/editorial--from-defence-to-technology"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy21.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा कूटनीतिक औपचारिकता से बढ़ कर रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, नवाचार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में उभरती हुई एक नई सामरिक साझेदारी का संकेत है। दोनों देशों द्वारा अपनी साझेदारी को गहरा करते हुए व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना करने, “इनोवेशन रोडमैप 2030” लागू करने तथा एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा पर संयुक्त कार्य समूह बनाने का जो निर्णय लिया गया वह स्वागत योग्य है। खास बात यह है कि दोनों देश “रणनीतिक स्वायत्तता” के पक्षधर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">“भारत-फ्रांस इनोवेशन रोडमैप 2030” यात्रा की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संकेत है कि भारत अब केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी प्रदाता बनना चाहता है। डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई, अंतरिक्ष प्रक्षेपण, वैक्सीन उत्पादन और एआई अनुप्रयोगों में भारत की उपलब्धियों ने फ्रांस को प्रभावित किया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा “भारत इनोवेट्स” कार्यक्रम में भारतीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की प्रशंसा इसी पृष्ठभूमि में समझी जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">द्विपक्षीय व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना कर 16 अरब डॉलर से 32 अरब डॉलर तक ले जाना महत्वाकांक्षी अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को गति देनी होगी, रक्षा और एयरोस्पेस विनिर्माण में संयुक्त निवेश बढ़ाना होगा तथा सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और डिजिटल प्रौद्योगिकी में साझेदारी को विस्तार देना होगा। फ्रांस पहले से भारत में प्रमुख निवेशकों में शामिल है और एक हजार से अधिक फ्रांसीसी कंपनियां भारत में सक्रिय हैं। रक्षा क्षेत्र में लगभग ₹3.25 लाख करोड़ की लागत से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर हालांकि अंतिम समझौता अभी शेष है, लेकिन भारत द्वारा औपचारिक अनुरोध भेजे जाने के बाद परियोजना निर्णायक चरण में पहुंच गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार लगभग 94 विमान भारत में “मेक इन इंडिया” के तहत निर्मित किए जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह पहली बार होगा जब राफेल का बड़े पैमाने पर उत्पादन फ्रांस के बाहर होगा। इससे भारतीय एयरोस्पेस उद्योग, निजी क्षेत्र और आपूर्ति श्रृंखला को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत और फ्रांस का प्रस्तावित ओपन मॉडल भी उल्लेखनीय है। इसका उद्देश्य कुछ बड़ी कंपनियों के स्वामित्व वाले एआई मॉडल्स के विकल्प के रूप में अधिक पारदर्शी, लोकतांत्रिक और बहुभाषी एआई पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है। भारत के लिए इसका विशेष लाभ यह होगा कि भारतीय भाषाओं, स्थानीय डेटा और सार्वजनिक उपयोग के अनुप्रयोगों के लिए एआई विकास की लागत कम होगी तथा स्टार्टअप को वैश्विक मंच मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष क्षेत्र में इसरो और सीएनएएस के बीच सहयोग भी पृथ्वी अवलोकन, समुद्री निगरानी, जलवायु अध्ययन और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े संयुक्त मिशन भारत की तकनीकी क्षमता को और मजबूत करेगा। इससे भारतीय डीप-टेक स्टार्टअप को यूरोपीय निवेश, अनुसंधान नेटवर्क और वैश्विक बाजारों तक पहुंच मिलने की संभावना बढ़ेगी। यह यात्रा भारत को रक्षा, एआई, अंतरिक्ष और उन्नत प्रौद्योगिकी की वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि घोषित योजनाएं समयबद्ध ढंग से लागू होती हैं, तो आने वाले दशक में यह साझेदारी भारत के आर्थिक और सामरिक उदय की प्रमुख आधारशिलाओं में से एक बन सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 05:31:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संपादकीय : हादसा और सबक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">असम के जोरहाट एयरबेस पर भारतीय वायुसेना के एएन-32 परिवहन विमान की दुर्घटना देश की सामरिक परिवहन क्षमता, सैन्य आधुनिकीकरण और रक्षा तैयारियों से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। इस दुर्घटना में पांच वायुयोद्धाओं का बलिदान हुआ, राष्ट्र उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता है, किंतु शोक के साथ-साथ आत्ममंथन भी आवश्यक है। 1980 के दशक में वायु सेना के बेड़े में शामिल सोवियत मूल का एएन-32 वायुसेना का “वर्कहॉर्स” कहाता है। यह हिमालयी क्षेत्रों, ऊंचे हवाई अड्डों और दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में रसद पहुंचाने की अपनी क्षमता के कारण भारतीय सैन्य व्यवस्था की रीढ़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">करगिल युद्ध</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584759/editorial--the-accident-and-the-lesson"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/sampadkiy2.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">असम के जोरहाट एयरबेस पर भारतीय वायुसेना के एएन-32 परिवहन विमान की दुर्घटना देश की सामरिक परिवहन क्षमता, सैन्य आधुनिकीकरण और रक्षा तैयारियों से जुड़े कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। इस दुर्घटना में पांच वायुयोद्धाओं का बलिदान हुआ, राष्ट्र उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करता है, किंतु शोक के साथ-साथ आत्ममंथन भी आवश्यक है। 1980 के दशक में वायु सेना के बेड़े में शामिल सोवियत मूल का एएन-32 वायुसेना का “वर्कहॉर्स” कहाता है। यह हिमालयी क्षेत्रों, ऊंचे हवाई अड्डों और दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में रसद पहुंचाने की अपनी क्षमता के कारण भारतीय सैन्य व्यवस्था की रीढ़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">करगिल युद्ध से लेकर पूर्वोत्तर और लद्दाख तक, इसकी भूमिका निर्विवाद रही है। किंतु अब यह चिंता का विषय है कि जिस विमान पर चार दशक से अधिक समय से अत्यधिक निर्भरता रही है, वह आज अपनी आयु सीमा और तकनीकी चुनौतियों से जूझ रहा है। जोरहाट दुर्घटना को व्यापक संदर्भ में देखें, तो एक चिंताजनक पैटर्न सामने आता है। 2009 में अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम सियांग में एएन-32 दुर्घटना, 2016 में बंगाल की खाड़ी के ऊपर विमान का लापता होना, 2019 में जोरहाट से मेचुका जाते समय हुए हादसे के अलावा कुछ दूसरी बड़ी दुर्घटनाओं के बाद अब 2026 की यह त्रासदी- ये घटनाएं बताती हैं कि परिवहन बेड़े की सुरक्षा और आधुनिकीकरण का प्रश्न आज तक हल नहीं हो सके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि 2009, 2019 और 2026 की दुर्घटनाओं का संबंध सीधे जोरहाट एयरबेस से जुड़ा रहा है, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र में वायुसेना के लिए एक महत्वपूर्ण परिचालन केंद्र है। दुर्घटना के वास्तविक कारणों का पता कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की रिपोर्ट के बाद ही चलेगा, लेकिन जांच में तकनीकी खराबी, संरचनात्मक कमजोरी या रखरखाव संबंधी समस्या सामने आती है, तो यह रक्षा प्रतिष्ठान के लिए गंभीर चेतावनी होगी। यदि कारण मानवीय त्रुटि या प्रतिकूल परिस्थितियां निकलती हैं, तब भी प्रशिक्षण, प्रक्रियाओं और सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा आवश्यक होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सच है कि वायुसेना पिछले कुछ वर्षों से परिवहन बेड़े के आधुनिकीकरण पर काम कर रही है, लेकिन भारत जैसे विशाल और भौगोलिक दृष्टि से जटिल देश में पुराने प्लेटफॉर्म को नए विमानों से बदलने की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाई है। इसीलिए एएन-32 का बड़ा बेड़ा अभी भी सेवा में है और आने वाले वर्षों में भी उसकी आवश्यकता बनी रहेगी। असल में नए विमान खरीदने से ज्यादा जरूरत एक समग्र नीति की है। इसमें समयबद्ध प्रतिस्थापन, स्पेयर पार्ट्स की सुनिश्चित उपलब्धता, स्वदेशी रखरखाव क्षमता, उन्नत सुरक्षा ऑडिट और दुर्घटना जांच रिपोर्टों के निष्कर्षों का कठोर अनुपालन शामिल होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षा क्षेत्र में उपकरणों की विश्वसनीयता केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि सैनिकों के जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। जोरहाट की यह दुर्घटना हमें याद दिलाती है कि सैन्य शक्ति केवल नए हथियारों से नहीं बनती, बल्कि उन प्रणालियों की सुरक्षा और विश्वसनीयता से भी बनती है जिन पर हमारे सैनिक प्रतिदिन भरोसा करते हैं। शहीद वायुयोद्धाओं के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस हादसे से सबक लेकर भारत अपने सैन्य परिवहन तंत्र को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 04:52:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>संपादकीय: युद्धविराम की विराम रेखा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ईरान और इजराइल के बीच हालिया सैन्य टकराव ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को व्यापक युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दो महीने पहले हुए संघर्ष के बाद जिस प्रकार दोनों पक्षों ने अपेक्षाकृत संयम दिखाया था, उससे यह उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र धीरे-धीरे कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा, किंतु हाल के हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम और स्थायी शांति दो अलग-अलग चीजें हैं। लड़ाई थमने की खबर के बावजूद यह शांति से अधिक एक अस्थायी विराम ही प्रतीत होती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल द्वारा अमेरिकी हिदायत के बावजूद सैन्य कार्रवाई से स्पष्ट</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/584374/editorial--the-line-of-pause-in-the-ceasefire"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-06/editorial.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान और इजराइल के बीच हालिया सैन्य टकराव ने एक बार फिर पश्चिम एशिया को व्यापक युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। दो महीने पहले हुए संघर्ष के बाद जिस प्रकार दोनों पक्षों ने अपेक्षाकृत संयम दिखाया था, उससे यह उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र धीरे-धीरे कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ेगा, किंतु हाल के हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया कि युद्धविराम और स्थायी शांति दो अलग-अलग चीजें हैं। लड़ाई थमने की खबर के बावजूद यह शांति से अधिक एक अस्थायी विराम ही प्रतीत होती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इजराइल द्वारा अमेरिकी हिदायत के बावजूद सैन्य कार्रवाई से स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अंतिम निर्णय का अधिकार अपने पास रखना चाहते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि वे ट्रंप के दबाव में नहीं हैं। इस तरह नेतन्याहू इस हमले को घरेलू राजनीति में एक सियासी अवसर के रूप में देख सकते हैं। यही कारण है कि कई बार वाशिंगटन और तेल अवीव के सार्वजनिक बयान एक जैसे नहीं दिखाई देते।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान का जवाब हिजबुल्लाह और अन्य सहयोगी समूहों के प्रति समर्थन प्रदर्शित करने, घरेलू जनमत को संतुष्ट करने और यह दिखाने के लिए था कि वह दबाव में नहीं झुकेगा। युद्ध के अचानक रुकने के पीछे ट्रंप की अपील से बड़ा कारण यह था कि दोनों पक्ष जानते हैं कि लंबा युद्ध अत्यधिक महंगा पड़ेगा। इजराइल की सैन्य शक्ति अत्याधुनिक है, लेकिन वह लंबे समय तक अमेरिकी इंटरसेप्टर मिसाइलों, खुफिया सहयोग, रीफ्यूलिंग विमानों और रसद सहायता के बिना व्यापक क्षेत्रीय युद्ध नहीं लड़ सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर ईरान भी आर्थिक प्रतिबंधों और घरेलू दबावों से जूझ रहा है। युद्धविराम का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच परोक्ष संवाद के कुछ रास्ते खुले हुए हैं। युद्ध के जारी रहते इसका रास्ता अवरुद्ध हो सकता था। यदि ऐसा है तो यह सकारात्मक संकेत होगा, लेकिन खतरा बना हुआ है। किसी भी मिसाइल हमले, सीमा पार कार्रवाई या प्रॉक्सी समूह की गतिविधि से संघर्ष फिर भड़क सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों और व्यापारिक हितों का केंद्र है। यदि संघर्ष दोबारा तेज होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि लगभग निश्चित है। लाल सागर में हूती हमलों या नाकाबंदी के विस्तार से वैश्विक समुद्री व्यापार प्रभावित होगा, जिसका असर भारतीय निर्यात, आयात और माल ढुलाई लागत पर पड़ेगा। महंगा तेल अंततः महंगाई और चालू खाते के घाटे पर भी दबाव डालेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे संकट से सबसे बड़ा सबक यह है कि पश्चिम एशिया में सैन्य विजय की अवधारणा लगातार कमजोर हो रही है। आज कोई भी पक्ष निर्णायक जीत हासिल करने की स्थिति में नहीं दिखता, लेकिन सभी पक्ष एक दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं, इसलिए कूटनीति ही एकमात्र स्थायी रास्ता है। फिलहाल बंदूकों की आवाज धीमी हुई हैं, पर शांति की गारंटी अभी भी दूर है। दुनिया और विशेष रूप से भारत को इस विराम को युद्ध के अंत नहीं, बल्कि अगले मोड़ से पहले की चेतावनी के रूप में देखना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 05:20:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Deepak Mishra]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: आपदाओं का दशक</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नीदरलैंड की धरती से प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘यह दशक दुनिया के लिए आपदाओं का दशक बनता जा रहा है’ बदलती वैश्विक अर्थ-राजनीति का गंभीर आकलन है। कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखलाओं का टूटना, जलवायु आपदाएं और संरक्षणवादी अर्थनीतियां—इन सबने मिलकर विश्व व्यवस्था को जिस तरह अस्थिर कर दिया है, उससे दशकों की विकास उपलब्धियां मिट सकती हैं। नीदरलैंड स्वयं भी इस संकट से अछूता नहीं।</p>
<p>  पिछले वर्षों में उसने भीषण बाढ़, समुद्री तूफानों, ऊर्जा महंगाई और आपूर्ति संकट का सामना किया है। यूरोप में गैस संकट ने उसकी औद्योगिक लागत</p>
<p>विश्व</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/582485/editorial--the-decade-of-disasters"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-05/sampadkiy11.jpg" alt=""></a><br /><p>नीदरलैंड की धरती से प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘यह दशक दुनिया के लिए आपदाओं का दशक बनता जा रहा है’ बदलती वैश्विक अर्थ-राजनीति का गंभीर आकलन है। कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखलाओं का टूटना, जलवायु आपदाएं और संरक्षणवादी अर्थनीतियां—इन सबने मिलकर विश्व व्यवस्था को जिस तरह अस्थिर कर दिया है, उससे दशकों की विकास उपलब्धियां मिट सकती हैं। नीदरलैंड स्वयं भी इस संकट से अछूता नहीं।</p>
<p> पिछले वर्षों में उसने भीषण बाढ़, समुद्री तूफानों, ऊर्जा महंगाई और आपूर्ति संकट का सामना किया है। यूरोप में गैस संकट ने उसकी औद्योगिक लागत बढ़ाई, जबकि वैश्विक व्यापार में मंदी ने उसके बंदरगाह-आधारित व्यापार मॉडल को प्रभावित किया। भविष्य में समुद्री जलस्तर वृद्धि, कृषि पर जलवायु दबाव और साइबर-सुरक्षा संकटों की आशंका, वहां गंभीर नीति-विमर्श का विषय हैं, इसलिए मोदी का ‘आपदाओं का दशक’ वाला कथन शेष दुनिया के साथ डच नेतृत्व के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक था। </p>
<p>विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि महामारी और युद्धों ने करोड़ों लोगों को पुनः गरीबी की ओर धकेला है। महंगाई, ऊर्जा मूल्य वृद्धि और रोजगार संकट का सबसे अधिक असर निम्न एवं मध्यम आय वर्ग पर डालते हैं। भारत में यह चिंता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां अभी भी बड़ी आबादी बहुआयामी गरीबी से जूझ रही है और लगभग 80 करोड़ लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद आय-विषमता, ग्रामीण संकट और अनौपचारिक रोजगार भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोर नसें हैं। </p>
<p>भारत के पास विशाल बाजार, युवा जनसंख्या, डिजिटल अवसंरचना और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप नेटवर्क है, परंतु वैश्विक मंदी, ऊर्जा झटके और व्यापार अवरोध भारतीय निर्यात, रोजगार और निवेश को प्रभावित कर सकते हैं। इन संदर्भों में नीदरलैंड यात्रा का आर्थिक पक्ष महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने डच कंपनियों को भारत में ‘डिजाइन, इनोवेशन और निवेश’ का निमंत्रण दिया है। विशेष रूप से सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, बंदरगाह, जल प्रबंधन, कृषि तकनीक और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत को तकनीकी बढ़त दे सकता है। भारत-नीदरलैंड के बीच हुए 17 समझौतों में सबसे महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर एवं उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग माना जा रहा है। टाटा इलेक्ट्रानिक्स और एएसएमएल के बीच समझौता भारत की चिप निर्माण महत्वाकांक्षा को गति दे सकता है। </p>
<p>यदि भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला में विश्वसनीय केंद्र बनता है, तो इससे विनिर्माण, रोजगार और निर्यात इन तीनों क्षेत्रों को बड़ा लाभ होगा। नीदरलैंड भारत का 11वां सबसे बड़ा व्यापार साझेदार और चौथा सबसे बड़ा निवेशक है। रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक संबंधों का उन्नयन भविष्य में यूरोप के लिए वह भारत के लिए उसका प्रवेश-द्वार और यूरोपीय तकनीक एवं पूंजी का स्रोत बना सकता है। दरअसल, प्रधानमंत्री की चेतावनी का मूल संदेश यही है कि आज का वैश्विक संकट केवल युद्ध या ऊर्जा तक सीमित नहीं, बल्कि यह देशों के विकास मॉडल की परीक्षा है। भारत के लिए चुनौती केवल तेज वृद्धि बनाए रखना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि अगला वैश्विक झटका करोड़ों लोगों को फिर से गरीबी में न धकेल दे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>Editorials</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 08:08:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Amrit Vichar]]></dc:creator>
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                <title>मजदूरों को सम्मान देने में आखिर हर्ज क्या है!</title>
                                    <description><![CDATA[<img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4.jpg" alt="अनिल त्रिगुणायत" />
अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ

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<h5 style="text-align:justify;">चाहे स्वयंसेवी संगठन हों या मजदूर दिवस पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अलंबरदार। आखिर मजदूरों के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? देश में असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की स्थिति तो वैसी ही कि ‘जबरा मारे भी और रोवे भी न दे’</h5>
<p style="text-align:justify;">किसी देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में मजदूरों की भूमिका शरीर में प्रवाहित लहू मानिंद होती है। मजदूर ही हैं, जिसके श्रम की बदौलत राष्ट्र के विकास की ऊंची इमारत खड़ी होती है। सूक्ष्म संरचनाओं से लेकर बड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में यह वर्ग विकास की धूरी होता है। यह सच है</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/579438/what-is-the-harm-in-giving-respect-to-laborers"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-04/अनिल-त्रिगुणायत.jpg" alt=""></a><br /><img src="https://www.amritvichar.com/media/2026-04/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4.jpg" alt="अनिल त्रिगुणायत"></img>
अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ

<h5 style="text-align:justify;"> </h5>
<h5 style="text-align:justify;">चाहे स्वयंसेवी संगठन हों या मजदूर दिवस पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अलंबरदार। आखिर मजदूरों के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? देश में असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की स्थिति तो वैसी ही कि ‘जबरा मारे भी और रोवे भी न दे’</h5>
<p style="text-align:justify;">किसी देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में मजदूरों की भूमिका शरीर में प्रवाहित लहू मानिंद होती है। मजदूर ही हैं, जिसके श्रम की बदौलत राष्ट्र के विकास की ऊंची इमारत खड़ी होती है। सूक्ष्म संरचनाओं से लेकर बड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में यह वर्ग विकास की धूरी होता है। यह सच है कि विकास के लिए संसाधन मायने रखते हैं, किंतु बिना श्रम संसाधन वैसे ही हैं, जैसे ‘बिना इंजन की मर्सिडीज’ गाड़ी। आशय यह कि मजदूर ही वह असल शिल्पकार होता है, जिसके कठोर श्रम से विकास की बगिया लहलहाती है, लेकिन कई दशकों के बाद भी मजदूरों की स्थिति में आमूलचूल सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है। </p>
<p style="text-align:justify;">गांव-जवार, खेत-खलिहान, रिश्ते-नाते, भाई-बंधु छोड़कर देश-प्रदेश के शहरों-कस्बों के उद्योगों तथा प्रतिष्ठानों को गति प्रदान करने वाले मजदूरों के लिए फलदायी योजना क्यों नहीं मूर्तरूप ले पा रही? वह चाहे सरकारें हों या उद्योगों के मालिक। चाहे स्वयंसेवी संगठन हों या मजदूर दिवस पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अलंबरदार। आखिर मजदूरों के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? देश में असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की स्थिति तो वैसी ही कि ‘जबरा मारे भी और रोवे भी न दे’। </p>
<p style="text-align:justify;">मजदूरों के हितों की रक्षा और उनकी बेहतरी को वैसे तो केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने कथित ‘भगीरथ प्रयास’ कर रखे हैं। केंद्रीय श्रम मंत्रालय के अलावा राज्य सरकारों के संबंधित विभागों में अधिकारियों-कर्मचारियों की भारी भरकम फौज मजदूरों की सेवा का दंभ भर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मजदूरों लिए विभागीय कृत्य-प्रयास आज भी या तो फाइलों में हैं या जमीनी हकीकत से कोसों दूर।  </p>
<p style="text-align:justify;">देश में अधिकांश मजदूर कृषि निर्माण और घरेलू कार्यों में लगे रहते हैं। इन असंगठित क्षेत्रों में मजदूरों के साथ न तो कोई लिखित अनुबंध होता है, न ही छुट्टी या स्वास्थ्य बीमा की सुविधा ही दी जाती है। मूल कारण यह कि बाजार में श्रम की आपूर्ति मांग से बहुत अधिक है, इसलिए उद्योगों तथा विनिर्माण क्षेत्र में कम वेतन पर भी मजदूर मिल जाते हैं। एक ही काम के लिए जब ‘दस हाथ’ मिल जाते हैं, तो नियोक्ता की ‘पौ बारह’ हो जाती है। नतीजतन वह मजदूरों को औने-पौने वेतन या मजदूरी पर कार्य कराता है, उनका शोषण करता है। </p>
<p style="text-align:justify;">भारत में वर्ष 1991 में व्यापक आर्थिक सुधार किए गए। श्रम कानूनों को लचीला बनाया गया। निर्मित नीतियों से नियोक्ताओं को कानूनी पाबंदियों से कुछ छूट मिल गई। परिणामस्वरूप मजदूरों का शोषण बढ़ता ही गया। अधिकांश मजदूरों में तकनीकी कौशल या औपचारिक शिक्षा न के बराबर होती है। उनके उपेक्षित होने का यह भी अहम कारण है। तात्पर्य यह कि समाज को समर्पित मजदूरों को ‘समाज’ ने ही तिरस्कृत कर रखा है। </p>
<p style="text-align:justify;">मिल मालिकों द्वारा मजदूरों के शोषण आधारित बालीवुड फिल्में पहले खूब बना करती थीं। मजदूरों के संघर्षों तथा गानों को निर्देशक इतनी संवेदनशीलता के साथ दिखाते थे कि हाल में बैठा दर्शक अपने को मजदूर या मजदूरों का हितैषी ही मान बैठता था। यही हाल आज भी है। भारत में मजदूरों की दशा पर महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की कलम खूब चली। उन्होंने मजदूरों के शोषण पर आधारित फिल्म ‘मिल मज़दूर’ (1934) की पटकथा लिखी, एक छोटी सी भूमिका भी निभाई थी। बताते हैं कि फिल्म का एक डायलाग मजदूरों के हित में इतना असरदार था कि तत्कालीन टेक्सटाइल हब बंबई (अब मुंबई) में श्रमिकों ने मिल मालिकों के खिलाफ जमकर आंदोलन किया था। </p>
<p style="text-align:justify;">एक दौर ऐसा भी था, जब निजी क्षेत्र के मिल मालिकों तथा सरकारी उद्योगों के प्रबंधनों के खिलाफ मजदूर संगठन आक्रोश व्यक्त करते रहते थे। मजदूर संगठनों में शामिल श्रमिकों के साथ जब-जब शोषण की बात सामने आई, तो आंदोलन हुआ। ‘जनता जिंदाबाद, इंकलाब जिंदाबाद, हर जोर-जुल्म की टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है, चाहे जो मजबूरी हो, हमारी मांगे पूरी हों, अभी तो अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है, जो हम से टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा, जैसे जोशीले नारे उद्योगों तथा सरकारी तंत्र के गलियारों में आज भी गूंजते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">असंगठित क्षेत्र का, जीडीपी व रोजगार में योगदान के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान है। देश के कुल श्रमिकों में से शहरी क्षेत्रों में लगभग 72 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में लगे हुए हैं। शहरी विकास में तो इनका योगदान अत्यधिक है। आर्थिक सर्वेक्षण-2025 के अनुसार भारत में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 50 करोड़ श्रमिक हैं, जो देश के कुल कार्यबल का करीब 90 प्रतिशत है। </p>
<p style="text-align:justify;">फैक्ट्रियां, औद्योगिक इकाइयां, होटल, रेस्तरां और कई अन्य प्रतिष्ठान असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की बदौलत ही चलते हैं। इसमें ऊबर और ओला ड्राइवर, राजमिस्त्री, बढ़ई, फूड डिलीवरी बॉय, पेंटर, प्लंबर आदि भी शामिल हैं। कुछ दिन पहले यूपी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी की दर तय करते हुए मजदूरों को राहत दी है, लेकिन मजदूरों के लिए अभी भी काफी कुछ किया जाना शेष है। औद्योगिक स्थलों पर उनकी सुविधाओं की दरकार तो है ही, सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा के भी वे हकदार हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">हालिया दिनों में केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने श्रमिकों के लिए ठोस व तार्किक कार्य किए हैं। श्रम सुधारों को नव स्वरूप दिया है, लेकिन निर्मित गाइडलाइंस तभी प्रासंगिक है, जब उसका लाभ मजदूरों तक सही रूप में प्राप्त हो। चूंकि, असंगठित क्षेत्रों में मजदूरों की अधिकता है, अतएव उनके हितों के लिए निर्मित नियमों का अपेक्षित क्रियान्वयन जरूरी है। उपेक्षा का शिकार बने मजदूरों के लिए आमजन को भी अपनी सोच बदलनी होगी। देश की समृद्धि के लिए अपना खून-पसीना बहाने वाले मजदूरों को उनका अधिकार व मान देने में हमें कोई हर्ज तो नहीं होना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>Special</category>
                                            <category>Special Articles</category>
                                            <category>विशेष लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 00:00:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Amrit Vichar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय:ऊर्जा सुरक्षा पर संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बनता दिख रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी गैस फील्ड साउथ पर्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान द्वारा नौ देशों में तेल और गैस प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना क्षेत्रीय तनाव के साथ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह संकट जितना भू-राजनीतिक है, उतना ही मानवीय भी, क्योंकि इसकी सीधी चोट आम उपभोक्ता की जेब और जीवन पर पड़ेगी। साउथ पर्स, समरेफ रिफाइनरी और कतर का रास लफान जैसे संयंत्र विश्व ऊर्जा आपूर्ति की धुरी हैं।</p>
<p>इन पर हमले से सप्लाई चेन बाधित होती है, बीमा लागत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576042/editorial--crisis-in-energy-security"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/sampadkiy16.jpg" alt=""></a><br /><p>पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक अस्थिरता का केंद्र बनता दिख रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी गैस फील्ड साउथ पर्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान द्वारा नौ देशों में तेल और गैस प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना क्षेत्रीय तनाव के साथ वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह संकट जितना भू-राजनीतिक है, उतना ही मानवीय भी, क्योंकि इसकी सीधी चोट आम उपभोक्ता की जेब और जीवन पर पड़ेगी। साउथ पर्स, समरेफ रिफाइनरी और कतर का रास लफान जैसे संयंत्र विश्व ऊर्जा आपूर्ति की धुरी हैं।</p>
<p>इन पर हमले से सप्लाई चेन बाधित होती है, बीमा लागत बढ़ती है और समुद्री परिवहन जोखिमपूर्ण हो जाता है। परिणामस्वरूप, बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है और कीमतों में उछाल आता है। इंडियन बास्केट का ब्रेंट क्रूड 146 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा, जहां कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात होता है। </p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा फ्रांस, कतर और मलेशिया जैसे देशों के साथ शांति की अपील सकारात्मक कूटनीतिक पहल है। भारत की “संतुलित और संवाद-प्रधान” विदेश नीति इस समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि केवल कूटनीति से तत्काल युद्धविराम हो जाएगा। फिर भी, भारत की अपील है कि नागरिक और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना न बनाया जाए। नैतिक दबाव जरूर बनाती है, विशेषकर तब जब वैश्विक समुदाय भी इसी चिंता को साझा करता है। </p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह आश्वासन कि इजराइल साउथ पर्स पर दोबारा हमला नहीं करेगा, राजनीतिक बयान अधिक प्रतीत होता है। जमीनी हकीकत यह है कि जब तक क्षेत्रीय अविश्वास और प्रतिद्वंद्विता बनी रहेगी, ऐसे हमलों की आशंका बनी रहेगी। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर बहुआयामी होता है। भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों पर तत्काल प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि सरकार करों में कटौती या सब्सिडी के माध्यम से अस्थायी राहत दे सकती है, विशेषकर चुनावी राज्यों में, लेकिन यह राहत स्थायी नहीं होती। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्यान्न, दवाइयां और दैनिक उपभोक्ता वस्तुएं महंगी हो जाती हैं।</p>
<p>महंगाई का यह चक्र अंततः आम आदमी की क्रय शक्ति को कमजोर करता है। यह भी एक यथार्थ है कि चुनावों तक कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश की जाएगी, परंतु वैश्विक बाजार की ताकतें घरेलू नीतियों पर भारी पड़ सकती हैं इसलिए यह मान लेना कि कीमतें नहीं बढ़ेंगी, व्यावहारिक नहीं है। इस संकट से उबरने के लिए भारत को बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी। पहला, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों जैसे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की ओर रुख करना। दूसरा, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को तेजी से बढ़ावा देना, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो। तीसरा, ऊर्जा कूटनीति को और सक्रिय बनाना, ताकि संकट के समय विश्वसनीय साझेदार उपलब्ध रहें। यह केवल तेल और गैस का संकट नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा है। भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में अपने हितों की रक्षा के साथ शांति और सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त करना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 08:14:41 +0530</pubDate>
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                <title>संपादकीय: आग के सबक</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पालम और इंदौर में हुई अग्नि त्रासदियां हमारे शहरी जीवन की असुरक्षित सच्चाइयों का आईना हैं। पालम में नौ और इंदौर में सात लोगों की मौत के यह आंकड़े नहीं, बुझती हुई जिंदगियों की दर्दनाक कहानियां हैं। हर ऐसी घटना के बाद शोक, मुआवजा और आश्वासन का क्रम चलता है, लेकिन इनसे हम कोई सबक नहीं लेते। चिंताजनक यह है कि इस बार आग की ये घटनाएं भीषण गर्मी के चरम से पहले ही सामने आ गईं। यह संकेत है कि समस्या केवल मौसम नहीं, बल्कि हमारी तैयारियों और व्यवस्था की कमी है।</p>
<p>  शहरी इलाकों में ज्वलनशील सामग्री का</p>
<p>विडंबना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/576039/editorial--lessons-from-the-fire"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/sampadkiy15.jpg" alt=""></a><br /><p>पालम और इंदौर में हुई अग्नि त्रासदियां हमारे शहरी जीवन की असुरक्षित सच्चाइयों का आईना हैं। पालम में नौ और इंदौर में सात लोगों की मौत के यह आंकड़े नहीं, बुझती हुई जिंदगियों की दर्दनाक कहानियां हैं। हर ऐसी घटना के बाद शोक, मुआवजा और आश्वासन का क्रम चलता है, लेकिन इनसे हम कोई सबक नहीं लेते। चिंताजनक यह है कि इस बार आग की ये घटनाएं भीषण गर्मी के चरम से पहले ही सामने आ गईं। यह संकेत है कि समस्या केवल मौसम नहीं, बल्कि हमारी तैयारियों और व्यवस्था की कमी है।</p>
<p> शहरी इलाकों में ज्वलनशील सामग्री का अनियंत्रित भंडारण, बिजली के असुरक्षित कनेक्शन, संकरी गलियां और अग्नि सुरक्षा के प्रति उदासीनता-ये सभी मिलकर ऐसी त्रासदियों को जन्म देते हैं। पालम की घटना में रिहायशी इलाके में ही ज्वलनशील पदार्थों का संग्रह होना गंभीर प्रशासनिक चूक है। आखिर ऐसी गतिविधियों की अनुमति कैसे दी गई? स्थानीय निकायों की नियमित निगरानी का क्या हुआ? इंदौर की घटना में आधुनिक तकनीक जैसे ऑटोमैटिक लॉकिंग दरवाजे भी मौत का कारण बने। </p>
<p>विडंबना है कि सुविधा के लिए अपनाई गई तकनीक, संकट के समय जाल बन जाती है। हम तकनीक तो अपना लेते हैं, लेकिन उसके जोखिमों के प्रति जागरूक नहीं होते। इन दोनों घटनाओं में निवासियों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। घरों में ज्वलनशील सामग्री जमा करना, अग्निशमन के प्राथमिक उपायों की अनदेखी करना और आपातकालीन निकास की व्यवस्था न होना। ये सब लापरवाही के उदाहरण हैं, लेकिन नागरिकों की यह लापरवाही भी व्यवस्था की ढिलाई से ही जन्म लेती है, जहां नियमों का पालन न तो सख्ती से होता है और न ही जागरूकता का पर्याप्त प्रसार होता है।</p>
<p>सबसे दुखद है आपदा के समय हमारी तैयारी की पोल खुलना। फायर ब्रिगेड का देर से पहुंचना, उपकरणों का खराब होना और आवश्यक संसाधनों की कमी, ऐसी तकनीकी खामियां जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर हैं। यदि संकरी गलियों में पहुंचने के लिए छोटे फायर टेंडर या वैकल्पिक व्यवस्था होती, यदि हाइड्रोलिक सिस्टम दुरुस्त होता, बचाव के साधन उपलब्ध होते, तो शायद कुछ जानें बचाई जा सकती थीं।</p>
<p>बेशक कुछ लाख रुपये किसी परिवार के खोए हुए सदस्य की भरपाई कर सकते हैं? यह केवल प्रतीकात्मक राहत है, असली आवश्यकता है ऐसी घटनाओं को रोकने की। इन त्रासदियों से स्पष्ट है कि हमें सुधार की त्रिस्तरीय व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है। पहला-प्रशासनिक स्तर पर, सख्त नियम, नियमित निरीक्षण और अवैध गतिविधियों पर तत्काल कार्रवाई। </p>
<p>दूसरा-तकनीकी स्तर पर, भवन निर्माण और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करवना, अग्निशमन व्यवस्था का आधुनिकीकरण करना, जबकि तीसरा सुधार सामाजिक स्तर पर, नागरिकों में जागरूकता, जिम्मेदारी और आपातकालीन तैयारी की संस्कृति विकसित करना। ऐसे अग्निकांड प्राकृतिक नहीं मानवजनित आपदाएं हैं। इसलिए यदि इच्छा और व्यवस्था दोनों मजबूत हों, तो इन्हें रोका जा सकता है। पालम और इंदौर की आग हमें यही याद दिलाती है कि लापरवाही की कीमत हमेशा जान से चुकानी पड़ती है। अब भी समय है कि हम चेतें, वरना अगली खबर फिर किसी और शहर से आएगी और हम सिर्फ शोक और मुआवजे तक सीमित रह जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 08:01:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Amrit Vichar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: राज्यों से राष्ट्रीय संकेत </title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया के अलावा राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य की दिशा भी तय कर सकते हैं। लगभग साढ़े सत्रह करोड़ मतदाता 824 विधानसभा सीटों पर मतदान करेंगे। इन राज्यों से लोकसभा के 116 और राज्यसभा के 51 सदस्य आते हैं, इसलिए इनके नतीजों से मिले सियासी संकेत स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय सत्ता समीकरणों को प्रभावित करेंगे। </p><p>चुनाव वाले राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरलम, असम में सामाजिक संरचना, राजनीतिक परंपराएं और आर्थिक चुनौतियां भिन्न हैं, इसलिए मतदाताओं के मुद्दे भी अलग-अलग हैं। मतदाताओं के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/575622/editorial--national-signals-from-the-states"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/sampadkiy12.jpg" alt=""></a><br /><p>देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया के अलावा राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य की दिशा भी तय कर सकते हैं। लगभग साढ़े सत्रह करोड़ मतदाता 824 विधानसभा सीटों पर मतदान करेंगे। इन राज्यों से लोकसभा के 116 और राज्यसभा के 51 सदस्य आते हैं, इसलिए इनके नतीजों से मिले सियासी संकेत स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय सत्ता समीकरणों को प्रभावित करेंगे। </p><p>चुनाव वाले राज्यों तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरलम, असम में सामाजिक संरचना, राजनीतिक परंपराएं और आर्थिक चुनौतियां भिन्न हैं, इसलिए मतदाताओं के मुद्दे भी अलग-अलग हैं। मतदाताओं के सामने मुख्य मुद्दों में बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सुरक्षा, क्षेत्रीय पहचान और विकास का प्रश्न प्रमुख रहेगा। पिछले वर्षों में रोजगार के अवसरों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई, जबकि जीएसटी संग्रह और विदेशी निवेश में शानदार बढ़ोतरी हुई। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आर्थिक वृद्धि का लाभ आम नागरिक तक किस हद तक पहुंचा है, इसलिए इन चुनावों में मतदाता केवल वैचारिक नारों के बजाय रोज़गार, शिक्षा और बुनियादी सेवाओं जैसे ठोस मुद्दों पर वोट करते दिखाई दे सकते हैं। </p><p>इन चुनावों के किसी दल या गठबंधन को अधिकतर राज्यों में निर्णायक जीत मिलती है, तो उसका प्रभाव लोकसभा और राज्यसभा की रणनीतियों में दिखाई देगा। क्षेत्रीय दलों की मजबूती भी राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सौदेबाज़ी की क्षमता बढ़ा सकती है, फिलहाल राजनीतिक दृष्टि से कुछ राज्यों के मुकाबले दिलचस्प होंगे। तमिलनाडु में द्रविण मुनेत्र कषगम का लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटने का प्रयास हो अथवा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस चौथी बार सत्ता में आने की चुनौती हो या फिर केरल में पारंपरिक सत्ता परिवर्तन की परंपरा को देखते हुए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, मार्क्सवादी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा और कांग्रेस के गठबंधन का सीधा संघर्ष यह देखने लायक होगा, तो वहीं असम और पुडुचेरी में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने सत्ता बरकरार रखने की चुनौती भी दर्शनीय है। </p><p>इन चुनावों के अलावा गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, नगालैंड और त्रिपुरा की आठ विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनावों से यद्यपि इनकी विधानसभाओं का संतुलन बहुत अधिक नहीं बदलेगा, लेकिन यह दलों की लोकप्रियता के संकेत अवश्य देंगे। इन चुनावों के संदर्भ में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बहुतों को संदेह है, तो मतदाता सूची विशेष पुनरीक्षण प्रक्रियाओं में बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं नाम कटने के आरोप भी जायज हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। </p><p>आयोग को पारदर्शिता, निष्पक्षता और समान अवसर सुनिश्चित करके यह साबित करना होगा कि चुनावी मैदान सभी दलों के लिए समान है। लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब भी होते हैं। यदि चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी रहती है तथा राजनीतिक दल विकास और जनकल्याण के वास्तविक मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो यह लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 08:28:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Amrit Vichar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: सामाजिक सहमति जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सुप्रीम कोर्ट ने 1937 के शरिया कानून के प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे निरस्त करने के अनुरोध वाली याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने का समय आ गया है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी वास्तव में अत्यधिक समीचीन है कि सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए अब एक समान कानून की जरूरत विधायिका यानी सरकार को महसूस होनी ही चाहिए। </p>
<p>देश में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में विभिन्न धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। यही विविधता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574681/editorial--social-consensus-is-essential"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/sampadkiy8.jpg" alt=""></a><br /><p>सुप्रीम कोर्ट ने 1937 के शरिया कानून के प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे निरस्त करने के अनुरोध वाली याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने का समय आ गया है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी वास्तव में अत्यधिक समीचीन है कि सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए अब एक समान कानून की जरूरत विधायिका यानी सरकार को महसूस होनी ही चाहिए। </p>
<p>देश में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में विभिन्न धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। यही विविधता समय-समय पर न्यायिक और सामाजिक विवादों का कारण बनती रही है। साफ सी बात है कि पर्सनल लॉ में लैंगिक असमानता बनी रहती है, तो उसका स्थायी समाधान समान नागरिक संहिता ही हो सकती है।</p>
<p>जब समान नागरिक संहिता का विचार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित है और जो राज्य को यह प्रयास करने का निर्देश देता है कि पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू हों, तब इसे बनाने और लागू करने में क्या हर्ज है, गोवा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में लागू हो चुके कानून को देशव्यापी बनाने में क्या कोई राजनीतिक रोड़ा है? यूसीसी से कानून के समक्ष समानता और लैंगिक न्याय को मजबूती मिलेगी। अलग-अलग धार्मिक कानूनों के कारण विवाह, तलाक और संपत्ति अधिकारों में महिलाओं के साथ असमान व्यवहार की शिकायतें दूर हो जाएंगी। </p>
<p>एक समान नागरिक कानून विभिन्न धर्मों के बीच कई असमानताओं को समाप्त कर नागरिकता की समान अवधारणा को मजबूत कर सकता है। इसके अतिरिक्त इससे राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था को भी बल मिलेगा, हालांकि इस कानून के निर्माण में इसका ध्यान रखना पड़ेगा कि देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता अत्यंत व्यापक है और अनेक समुदाय अपने व्यक्तिगत कानूनों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं। </p>
<p>ऐसे में एक समान कानून लागू करने को कुछ लोग धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देख सकते हैं। यदि विधायिका ने इसे ध्यान में रखे बिना कानून बनाया और लागू करने की प्रक्रिया में सामाजिक संवाद और सहमति को शामिल नहीं किया तो इससे सामाजिक तनाव भी पैदा हो सकता है। आखिर संविधान निर्माताओं ने यूसीसी को मौलिक अधिकारों के बजाय नीति निर्देशक तत्वों में इसीलिए रखा था, ताकि इसे समय और सामाजिक परिपक्वता के अनुसार लागू किया जा सके। </p>
<p>आजादी के बाद से इस विषय पर अनेक आयोग, बहसें और न्यायिक टिप्पणियां हुईं, किंतु अभी तक दो राज्यों के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू नहीं किया जा सका है। कई नजरिये से यह स्पष्ट है कि समान नागरिक संहिता केवल कानूनी सुधार का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति का भी विषय है। यदि इसका उद्देश्य वास्तव में लैंगिक न्याय, समानता और आधुनिक नागरिकता की भावना को मजबूत करना है, तो इसे जल्दबाजी के बजाय व्यापक संवाद, संवेदनशीलता और चरणबद्ध सुधारों के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 13:50:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Amrit Vichar]]></dc:creator>
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                <title>संपादकीय: बदलाव का बवंडर</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनेंगे अब तकरीबन तय है। पर उन पर या उनकी सरकार पर कोई टिप्पणी उनके पदासीन होने, सरकार गठन के बाद ही उचित है। फिलहाल उनके दल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रभावशाली प्रदर्शन ने यह बताया है कि नेपाली जनता अब राजनीतिक बदलाव की आकांक्षी है। भ्रष्टाचार, सुस्त विकास, अस्थिर सरकारों से निराश मतदाताओं ने एक अपेक्षाकृत नई राजनीतिक शक्ति को मौका देकर संदेश दिया है कि पारंपरिक राजनीति के विकल्प की तलाश अब केवल बौद्धिक चर्चा नहीं, जनभावना बन चुकी है। </p>
<p>पार्टी ने चुनाव प्रचार में पारदर्शिता, सुशासन और विकासोन्मुख प्रशासन को अपना मुख्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/574377/editorial--a-whirlwind-of-change"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2026-03/sampadkiy5.jpg" alt=""></a><br /><p>बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनेंगे अब तकरीबन तय है। पर उन पर या उनकी सरकार पर कोई टिप्पणी उनके पदासीन होने, सरकार गठन के बाद ही उचित है। फिलहाल उनके दल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के प्रभावशाली प्रदर्शन ने यह बताया है कि नेपाली जनता अब राजनीतिक बदलाव की आकांक्षी है। भ्रष्टाचार, सुस्त विकास, अस्थिर सरकारों से निराश मतदाताओं ने एक अपेक्षाकृत नई राजनीतिक शक्ति को मौका देकर संदेश दिया है कि पारंपरिक राजनीति के विकल्प की तलाश अब केवल बौद्धिक चर्चा नहीं, जनभावना बन चुकी है। </p>
<p>पार्टी ने चुनाव प्रचार में पारदर्शिता, सुशासन और विकासोन्मुख प्रशासन को अपना मुख्य एजेंडा बनाया। यह वही मुद्दे हैं, जिन पर दशकों से नेपाली जनता पारंपरिक दलों से असंतुष्ट रही है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार-विरोधी और सत्ता-विरोधी नारों ने मतदाताओं के बीच पैठ बनाई। शुरुआती विश्लेषणों बताते थे कि पहले से बेहतर प्रदर्शन के बावजूद आरएसपी तीसरे स्थान से आगे नहीं बढ़ पाएगी, क्योंकि नेपाल की राजनीति में संगठनात्मक जड़ें, स्थानीय नेटवर्क और जातीय-क्षेत्रीय समीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। परिणामों ने इन धारणाओं को गलत साबित कर दिया। </p>
<p>आरएसपी ने शहरी क्षेत्रों के साथ ग्रामीण और सुदूर इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन किया। इससे संकेत मिला कि पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष केवल शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह देशव्यापी भावना बन चुका है। बार-बार की राजनीतिक अस्थिरता, गठबंधन सरकारों की विफलता, रोजगार के अवसरों की कमी और व्यापक भ्रष्टाचार ने आम नेपाली नागरिक को निराश किया है। यही कारण है कि पारंपरिक दलों के दशकों पुराने शासन के प्रति असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक विकल्प की तलाश में बदल गया। </p>
<p>इस सफलता के पीछे युवा मतदाताओं की भूमिका अहम रही, जो वैश्विक राजनीति और प्रशासनिक मॉडल से परिचित होने के साथ पारंपरिक राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने के लिए अधिक मुखर है। पारंपरिक दलों के प्रति उनका अविश्वास इस चुनाव में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। युवाओं ने आरएसपी को केवल एक पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन के प्रतीक के रूप में देखा। केवल युवा ही नहीं बड़ी उम्र के मतदाताओं और ग्रामीण समाज ने भी परिवर्तन की आवश्यकता को महसूस किया। </p>
<p>इसके अतिरिक्त वैश्विक नेपाली प्रवासी समुदाय और डिजिटल डायस्पोरा की सक्रियता भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण कारक रही। विदेशों में रहने वाले लाखों नेपाली सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक बहस में सक्रिय रहे और उन्होंने परिवर्तन के विचार को व्यापक समर्थन दिया। फिर भी इस अप्रत्याशित सफलता के साथ कई चुनौतियां भी सामने हैं। किसी भी नई पार्टी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा सत्ता में आने के बाद शुरू होती है। </p>
<p>आरएसपी के पास वास्तव में मजबूत जनादेश है, उसे पारदर्शी प्रशासन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और विकास के ठोस परिणाम दिखाने होंगे। साथ ही उसे संगठनात्मक मजबूती, नीति-निर्माण की क्षमता और अनुभवी नेतृत्व की कमी जैसी चुनौतियों से भी जूझना होगा, बहरहाल नेपाल की जनता ने परिवर्तन की इच्छा व्यक्त कर दी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 15:43:22 +0530</pubDate>
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