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                <title>Festival News - Amrit Vichar</title>
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                <description>Festival News RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>हृदय में प्रकाशित होने वाली ज्योति ही राम हैं, राम के जीवन से प्राप्त मुख्य शिक्षा-अनुशासन</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> भगवान राम ने एक अच्छे पुत्र, शिष्य और राजा के गुणों का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया, जिससे वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। राम सहज हैं, सरल हैं लेकिन दृढ़निश्चयी हैं। अपने मित्रों के ही हितैषी नहीं हैं, बल्कि अपनी शरण में आए शत्रुओं को भी अभय देने वाले हैं। राम एक पुत्र, एक भाई, एक पति, एक मित्र और एक राजा, सभी रूपों में अनुकरणीय हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। दरअसल राम हमारे भीतर प्रकाशित होती ज्योति के प्रतीक हैं।</p>
<p><strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी</strong> ने बताया कि राम माने आत्म-ज्योति। जो हमारे हृदय</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/531713/jyoti-which-is-published-in-the-heart-is-the-main"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-04/pavan-tiwari-(1)1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> भगवान राम ने एक अच्छे पुत्र, शिष्य और राजा के गुणों का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया, जिससे वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। राम सहज हैं, सरल हैं लेकिन दृढ़निश्चयी हैं। अपने मित्रों के ही हितैषी नहीं हैं, बल्कि अपनी शरण में आए शत्रुओं को भी अभय देने वाले हैं। राम एक पुत्र, एक भाई, एक पति, एक मित्र और एक राजा, सभी रूपों में अनुकरणीय हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। दरअसल राम हमारे भीतर प्रकाशित होती ज्योति के प्रतीक हैं।</p>
<p><strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी</strong> ने बताया कि राम माने आत्म-ज्योति। जो हमारे हृदय में प्रकाशित है, वही राम हैं। राम हमेशा हमारे हृदय में जगमगा रहे हैं। श्रीराम का जन्म माता कौशल्या और पिता राजा दशरथ के यहां हुआ था। संस्कृत में ‘दशरथ’ का अर्थ होता है— ‘दस रथों वाला।’ यहां दस रथ हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों और पांच कर्मेंद्रियों के प्रतीक हैं। ‘कौशल्या’ का अर्थ है— ‘वह जो कुशल है।’ राम का जन्म वहीं हो सकता है, जहां पांच ज्ञानेंद्रियों और पांच कर्मेंद्रियों के संतुलित संचालन की कुशलता हो। राम का जन्म अयोध्या में हुआ था, जिसका शाब्दिक अर्थ है—‘वह स्थान जहां कोई युद्ध नहीं हो सकता।’ जब मन किसी भी द्वंद्व की अवस्था से मुक्त हो, तभी हमारे भीतर ज्ञान रूपी प्रकाश का उदय होता है।</p>
<p>राम हमारी आत्मा के प्रतीक हैं। लक्ष्मण सजगता के प्रतीक हैं। सीताजी मन का प्रतीक हैं। रावण अहंकार तथा नकारात्मकता का प्रतीक है। जैसे पानी का स्वभाव है बहना, मन का स्वभाव है डगमगाना, तो मन रूपी सीताजी सोने के मृग के प्रति मोहित हो गईं। हमारा मन वस्तुओं में मोहित होकर उनकी ओर आकर्षित हो जाता है। अहंकार रूपी रावण मन रूपी सीताजी का हरण कर लेता है। इस प्रकार मन रूपी सीताजी, आत्मारूपी राम से दूर हो जाती हैं। हनुमानजी को ‘पवन’ पुत्र कहा जाता है। वे सीताजी को वापस लाने में राम की सहायता करते हैं।</p>
<p>तो श्वास और सजगता (हनुमान और लक्ष्मण) की सहायता से, मन (सीता) का आत्मा (राम) के साथ पुनर्मिलन होता है। इस तरह पूरी रामायण हमारे भीतर नित्य घटित हो रही है।</p>
<p><strong>राम के जीवन से प्राप्त मुख्य शिक्षा है- अनुशासन</strong></p>
<p>अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना कोई भी कार्य नहीं हो सकता। दूसरी ओर, रचनात्मकता को भी कुछ स्थान चाहिए। इसे स्वतंत्रता की आवश्यकता है। उत्पादकता अनुशासन पर निर्भर करती है। स्वतंत्रता के बिना रचनात्मकता दबी रह जाती है। जीवन रचनात्मकता और उत्पादकता के बीच का संतुलन है। आप शानदार विचार रख सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए आपको अनुशासन की आवश्यकता है।</p>
<p>एक राजा के रूप में भगवान राम के राज्य में ऐसे गुण थे, जो राज्य को विशेष बनाते थे। नरेंद्र मोदी ने भी ‘रामराज्य’ के समान एक आदर्श समाज की परिकल्पना की है, जहां प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा किया जाए। रामराज्य एक अपराध मुक्त समाज का निर्माण करता है।</p>
<p>राजाओं की भूमिका में कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले गुरु से मार्गदर्शन लेने की परंपरा सम्मिलित थी। यदि राम भरत के साथ लौट आते तो रामायण कभी नहीं बनती। यदि रामजी ने स्वर्ण-मृग का पीछा नहीं किया होता, तो यह एक अलग कहानी होती। तब तो हनुमानजी की कभी कोई भूमिका ही नहीं रहती। यदि हनुमान नहीं तो रामायण नहीं।</p>
<p>पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि ये घटनाएं चुनौतीपूर्ण अवश्य प्रतीत होती हैं, लेकिन शायद उस युग के लोगों के लिए आदर्श के रूप में, एक महान उद्देश्य को पूरा करती हैं। इसीलिए भगवान राम के निर्णयों की जटिलताओं ने इस महाकाव्य को और अधिक समृद्ध बना दिया। भगवान राम ने एक अच्छे पुत्र, शिष्य और राजा के गुणों का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया, जिससे वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। आज भी उनका नाम उन कार्यों के लिए ‘रामबाण’ जैसे शब्दों में लिया जाता है, जिनमें असफलता की कोई गुंजाइश नहीं होती।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/531675/ram-is-in-the-name-of-ram-know-why-ram#gsc.tab=0">राम नाम में है गूढ़ रहस्य; जानिए अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं...</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Apr 2025 13:39:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राम नाम में है गूढ़ रहस्य; जानिए अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं...</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong>  राम शब्द संस्कृत के दो धातुओं, रम् और घम से बना है। रम् का अर्थ है रमना या निहित होना और घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान। इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, “रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते” अर्थात, योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं। </p>
<h5><strong>अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं </strong></h5>
<p><strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी</strong> ने बताया कि 'राम-राम' शब्द जब भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/531675/ram-is-in-the-name-of-ram-know-why-ram"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-04/pavan-tiwari-(1).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> राम शब्द संस्कृत के दो धातुओं, रम् और घम से बना है। रम् का अर्थ है रमना या निहित होना और घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान। इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, “रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते” अर्थात, योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं। </p>
<h5><strong>अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं </strong></h5>
<p><strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी</strong> ने बताया कि 'राम-राम' शब्द जब भी अभिवादन करते समय बोल जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण माना जाता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है। वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है,क्योंकि हिंदी वर्णमाला में ''र" 27वां अक्षर है।'</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-04/pavan-tiwari-(1).jpg" alt="Pavan Tiwari (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p>आ' की मात्रा दूसरा अक्षर और 'म' 25वां अक्षर, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है 27 + 2 + 25 = 54, अर्थात एक “राम” का योग 54 हुआ। और दो बार राम राम कहने से 108 हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है। लेकिन सिर्फ "राम-राम" कह देने से ही पूरी माला का जाप हो जाता है।</p>
<p><strong>'राम' शब्द के संदर्भ में स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा</strong></p>
<p>करऊँ कहा लगि नाम बड़ाई।<br />राम न सकहि नाम गुण गाई ।।</p>
<p>स्वयं राम भी 'राम' शब्द की व्याख्या नहीं कर सकते,ऐसा राम नाम है। 'राम' विश्व संस्कृति के अप्रतिम नायक है। वे सभी सद्गुणों से युक्त है। वे मानवीय मर्यादाओं के पालक और संवाहक है। अगर सामाजिक जीवन में देखें तो- राम आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श पति, आदर्श शिष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। अर्थात् समस्त आदर्शों के एक मात्र न्यायादर्श 'राम' है। </p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/531665/loot-or-extortion-i-just-want-money#gsc.tab=0">लूट मार करो या उगाही मुझे बस पैसा चाहिए...कानपुर के ककवन थाने में तैनात पुलिसकर्मियों ने थानेदार पर लगाए गंभीर आरोप</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Apr 2025 11:44:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ईद-नवरात्र पर ड्रोन व सीसीटीवी से होगी निगरानी; कानपुर में मंदिरों और मस्जिदों पुलिस की चाकचौबंद व्यवस्था, जगह-जगह बैरिकेडिंग</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> ईद और नवरात्र पर शहर की मस्जिदों और मंदिरों में सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था की गई है। मंदिर और मस्जिदों के आसपास पुलिस, पीएसी, क्यूआरटी, एलआईयू का पहरा रहेगा। ड्रोन से लेकर सीसीटीवी से पल-पल की निगरानी की जाएगी। पुलिस लाइन, कार्यालय, रिजर्व फोर्स समेत एक हजार अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। </p>
<p>पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की है। कोतवाली में अस्थाई कंट्रोल रूम बनाया जाएगा, वहीं सोशल मीडिया पर लगातार मानीटरिंग के निर्देश दिए गए हैं। भड़काऊ बयानबाजी और असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसको लेकर अपर पुलिस आयुक्त कानून</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/530655/drone-and-cctv-on-eid-navratri-will-be-monitored-by-temples"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-03/eid-ul-fitr-navrat.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> ईद और नवरात्र पर शहर की मस्जिदों और मंदिरों में सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था की गई है। मंदिर और मस्जिदों के आसपास पुलिस, पीएसी, क्यूआरटी, एलआईयू का पहरा रहेगा। ड्रोन से लेकर सीसीटीवी से पल-पल की निगरानी की जाएगी। पुलिस लाइन, कार्यालय, रिजर्व फोर्स समेत एक हजार अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है। </p>
<p>पुलिस ने कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की है। कोतवाली में अस्थाई कंट्रोल रूम बनाया जाएगा, वहीं सोशल मीडिया पर लगातार मानीटरिंग के निर्देश दिए गए हैं। भड़काऊ बयानबाजी और असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसको लेकर अपर पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था हरीश चंदर ने मंदिर और मस्जिद कमेटी के पदाधिकारियों से वार्ता की। </p>
<p>पूर्वी, पश्चिम, सेंट्रल और दक्षिण जोन के मंदिर और मस्जिदों में सुरक्षा व्यवस्था देखी गई। वहां आने और जाने वाले मार्ग का निरीक्षण किया। वहां लगे सीसीटीवी को पुलिस के कैमरों के साथ जोड़ा गया। अपर पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था हरीश चंदर ने बताया कि सभी प्रमुख मंदिरों में क्षेत्रीय पुलिस के साथ ही पीएसी, आरएएफ, क्यूआरटी और होमगार्ड के जवान रहेंगे। एडीसीपी, एसीपी, थानेदारों और चौकी इंचार्ज की ड्यूटी लगाई गई है। </p>
<p>मस्जिदों और नमाज वाली जगहों पर एक हजार अतिरिक्त फोर्स लगेगा। इसमें पांच कंपनी पीएसी, क्यूआरटी और रिजर्व बल शामिल हैं। जोनल और सेक्टर मजिस्ट्रेट बनाए गए हैं। यही फोर्स नवरात्र मेले से रामनवमी तक मुस्तैद रहेगा। डायल 112 और बीट पुलिस के स्टॉफ को भी सक्रिय रहने के निर्देश दिए है। </p>
<h5><strong>तेज लाउडस्पीकर बजाने पर कार्रवाई</strong></h5>
<p>अपर पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था के अनुसार शहर में धारा 163 लागू है। ऐसे में तेज लाउड स्पीकर बजाने और बिना वजह भीड़ लगाने पर पाबंदी है। लाउड स्पीकर वालों को निर्देशित कर दिया गया है कि धार्मिक आयोजन के लिए दो लाउड स्पीकर से अधिक किसी को नहीं दिए जाएं। अगर ऐसी कहीं शिकायत मिलती है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सुअर पालकों को भी ईद के समय जानवरों को बाड़े के अंदर रखने के निर्देश दिए गए हैं। कई पालकों को नोटिस भी जारी हुआ है।</p>
<h5><strong>डीएम ने देखीं नवरात्र और ईद की तैयारियां </strong></h5>
<p>नवरात्र और ईद की तैयारियों को लेकर जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने बिरहाना रोड तपेश्वरी देवी, वैभव लक्ष्मी मंदिर परिसर व संपर्क मार्गों का जायजा लिया। जिलाधिकारी ने तपेश्वरी माता, राधा-कृष्ण, शिवजी और वैभव लक्ष्मी मंदिर में दर्शन भी किया। इसके बाद बेनाझाबर स्थित बड़ी ईदगाह का निरीक्षण कर तैयारियों की जानकारी ली। अधिकारियों को साफ-सफाई, चूना छिड़काव, आवागमन मार्ग से अतिक्रमण हटवाने और पैचवर्क के निर्देश दिए। जिलाधिकारी ने ईदगाह कमेटी के पदाधिकारियों से बातचीत कर जानकारी ली।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/530651/kanpur-metro-launch-seventh-tbm-from-tunnel-construction-launching-shaft#gsc.tab=0">Kanpur Metro: रावतपुर से काकादेव तक अप-लाइन में टनल निर्माण, लॉन्चिंग शाफ्ट से सातवीं टीबीएम लांच</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/530655/drone-and-cctv-on-eid-navratri-will-be-monitored-by-temples</link>
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                <pubDate>Sun, 30 Mar 2025 14:11:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Kanpur: 30 मार्च से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्र; कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त, यह काम करने से मां लक्ष्मी होती है प्रसन्न</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार 30 मार्च को रेवती नक्षत्र और ऐन्द्र योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग में चैत्र मास के वासंतिक नवरात्र कलश स्थापना के साथ शुरू होंगे। इसी दिन से विक्रम संवत और हिंदू पंचांग का नववर्ष शुरू होता है. इस दिन विक्रम संवत 2082 की शुरुआत होगी।पंचांग गणना अनुसार, 30 मार्च को कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त है। 30 मार्च को घटस्थापना सुबह 06 बजकर 02 मिनट से लेकर 10 बजकर 09 मिनट के मध्य कर सकते हैं। इसके बाद अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापना के लिए शुभ समय है। </p>
<p>अगर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/530112/kanpur-is-happy-to-do-two-auspicious-time-for-the"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-03/chaitya-navrarti-20251.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार 30 मार्च को रेवती नक्षत्र और ऐन्द्र योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग में चैत्र मास के वासंतिक नवरात्र कलश स्थापना के साथ शुरू होंगे। इसी दिन से विक्रम संवत और हिंदू पंचांग का नववर्ष शुरू होता है. इस दिन विक्रम संवत 2082 की शुरुआत होगी।पंचांग गणना अनुसार, 30 मार्च को कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त है। 30 मार्च को घटस्थापना सुबह 06 बजकर 02 मिनट से लेकर 10 बजकर 09 मिनट के मध्य कर सकते हैं। इसके बाद अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापना के लिए शुभ समय है। </p>
<p>अगर साधक किसी कारणवश सुबह के समय घटस्थापना नहीं कर पाते हैं, तो अभिजीत मुहूर्त में 11 बजकर 48 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 38 मिनट तक कलश स्थापना कर सकते हैं। तिथि का क्षय होने के कारण इस बार नवरात्र आठ दिन के ही होंगे।</p>
<p><strong>पं. मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य</strong> ने बताया कि देवी भागवत के अनुसार, जब नवरात्र रविवार से प्रारंभ होता है तो जगदंबा हाथी पर सवार होकर आती हैं। यह बेहद शुभ माना जाता है। हाथी को सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। माता भक्तों को यश-वैभव, धन-संपदा प्रदान करती हैं। इस वर्ष के राजा और मंत्री सूर्य हैं।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-03/manoj-dwivedi-pandit-(1).jpg" alt="manoj dwivedi pandit (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p>अष्टरात्रि में होगी देवी आराधना : पंचांग अनुसार नवसंवत्सर 2082 में देवी आराधना का पर्व आठ रात्रि तक मनाया जाएगा क्योंकि चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया 'क्षय' तिथि है। शास्त्रानुसार जो तिथि दो सूर्योदय स्पर्श ना करे उसे पंचांगों में क्षय तिथि माना जाता है। </p>
<p>चैत्र शुक्ल तृतीया का प्रारंभ दिनांक 31 मार्च 2025 को प्रात: 09 बजकर 13 मि. से होगा एवं समाप्ति दिनांक 01 अप्रैल 2025 को प्रात: 05 बजकर 42 मि. होगी, जबकि 31 मार्च एवं 01 अप्रैल दोनों ही दिन सूर्योदय क्रमश: प्रात: 06 बजकर 03 मि. एवं प्रात: 06 बजकर 02 मि. पर होगा अर्थात सूर्योदय के समय दोनों ही दिन तृतीया तिथि नहीं होने से 'तृतीया' क्षय तिथि होगी।तृतीया तिथि के क्षय होने से इस वर्ष चैत्र नवरात्रि में देवी आराधना आठ रात्रि में होगी। दुर्गाष्टमी दिनांक 05 अप्रैल 2025 को एवं श्रीराम नवमी 06 अप्रैल 2025 को रहेगी।</p>
<p>नवरात्र के पहले दिन घर के मुख्‍य द्वार के दोनों तरफ स्‍वास्तिक बनाएं और दरवाजे पर आम के पत्ते का तोरण लगाएं। क्योंकि माता इस दिन भक्तों के घर में आती हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्‍मी भी प्रसन्‍न होती हैं और आपके घर में निवास करती हैं।</p>
<p>नवरात्र में माता की मूर्ति को लकड़ी की चौकी या आसन पर स्थापित करना चाहिए। जहां मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें वहां पहले स्वास्तिक का चिह्न बनाएं। उसके बाद रोली और अक्षत से टीकें और फिर वहां माता की मूर्ति को स्‍थापित करें। उसके बाद विधिविधान से माता की पूजा करें।वास्‍तुशास्त्र के अनुसार, उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को पूजा के लिए सर्वोत्तम स्‍थान माना गया है। आप भी अगर हर साल कलश स्‍थापना करते हैं तो आपकी इसी दिशा में कलश रखना चाहिए और माता की चौकी सजानी चाहिए।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/530101/campaign-will-run-against-unregistered-e-rickshaws-more-than-1#gsc.tab=0">अपंजीकृत ई रिक्शों के खिलाफ चलेगा अभियान; कानपुर में 1 लाख से अधिक ई रिक्शे यातायात के लिए बने मुसीबत </a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Mar 2025 17:29:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>30 मार्च से शुरू होंगे चैत्र नवरात्र; पंचग्रही योग में ग्रहों का सत्ता परिवर्तन, सूर्य देव होंगे नवसंवत्सर के राजा और मंत्री</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> पंचांगीय गणना के अनुसार हर साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवसंवत्सर का प्रारंभ होता है। इस बार भारतीय नववर्ष 2082 की शुरुआत रविवार 30 मार्च से होगी। इस दिन सूर्य, चंद्रमा, शनि, बुध और राहु एक साथ मीन राशि में रहेंगे, जिससे पंचग्रही योग का निर्माण होगा।</p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि पंचांगीय गणना के अनुसार हर साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवसंवत्सर का प्रारंभ होता है। इस बार भारतीय नववर्ष विक्रम संवत 2082 की शुरुआत रविवार 30 मार्च से होगी। इस दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र व ब्रह्मयोग का संयोग भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/529474/chaitra-navratri-panchgrahi-yoga-will-start-the-power-of-planets"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-03/pavan-tiwari-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> पंचांगीय गणना के अनुसार हर साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवसंवत्सर का प्रारंभ होता है। इस बार भारतीय नववर्ष 2082 की शुरुआत रविवार 30 मार्च से होगी। इस दिन सूर्य, चंद्रमा, शनि, बुध और राहु एक साथ मीन राशि में रहेंगे, जिससे पंचग्रही योग का निर्माण होगा।</p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि पंचांगीय गणना के अनुसार हर साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवसंवत्सर का प्रारंभ होता है। इस बार भारतीय नववर्ष विक्रम संवत 2082 की शुरुआत रविवार 30 मार्च से होगी। इस दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र व ब्रह्मयोग का संयोग भी रहेगा। नव संवत्सर का नाम सिद्धार्थी (सिद्धार्थ) होगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस दिन से संवत्सर की शुरुआत होती है, वह दिन या दिनाधिपति उस वर्ष का राजा होता है।</p>
<p>रविवार के दिन के मान से इस साल के राजा सूर्यदेव होंगे। खास बात यह कि इस बार नव संवत्सर के राजा और मंत्री दोनों ही सूर्य होंगे। इस समय राजा का पद मंगल के पास है। नव वर्ष के पहले दिन पंच ग्रही योग बन रहा है। इस दिन सूर्य, चंद्रमा, शनि, बुध और राहु एक साथ मीन राशि में रहेंगे, जिससे पंचग्रही योग का निर्माण होगा। इन योगों के प्रभाव से कुछ राशियों के जातकों के लिए नववर्ष शुभ फल देने वाला रहेगा।</p>
<p><strong>संवत् 2082 का ये है मंत्री मंडल</strong></p>
<p>राजा व मंत्री : सूर्य<br />सस्येश : बुध<br />धान्येश : चन्द्र<br />मेघेश : सूर्य<br />रसेश : शुक्र<br />नीरसेश : बुध<br />फलेश : शनि<br />धनेश : मंगल<br />दुर्गेश : शनि</p>
<p><strong>संवत् का फल</strong></p>
<p>प्रजा ज्ञान, वैराग्य से युक्त होती है। संपूर्ण पृथ्वी पर प्रसन्नता रहती है। जल-अन्न की वृद्धि होती है। प्रतिकूल जलवायु के बाद भी धान्यादि का उत्पादन होगा।</p>
<p>सूर्य के राजा संवत का राजा होने से अल्पवृष्टि होने से धान्य-फल-दुग्ध का उत्पादन कम होने के आसार है। जनता को पीड़ा, चोर-अग्नि की बाधा व शासकों को कष्ट होगा। दुधारू पशुओं की क्षमता कम होगी। धान्य, गन्ना आदि फसलों, वृक्षों पर फल-पुष्पादि का उत्पादन कम होगा। जनता में क्रोध, उत्तेजना, कलह व नेत्र विकार बढेंगे।</p>
<p>सूर्य के मंत्री होने से जनता में रोग, चोर व राज का भय बढ़ेगा। अन्न का प्रचुर उत्पादन, गम्भीर रोगों से जनता त्रस्त होगी। पेयजल, गुड़, दूध, तेल, ईख, फल, सब्जियों, चीनी इत्यादि रसयुक्त वस्तुओं की कमी से इनके भाव बढ़ेंगे। जनता मंहगाई से त्रस्त होगी।</p>
<p>चैत्र कृष्ण अमावस्या, 29 मार्च, शनिवार को गणितानुसार शाम 04 बजकर 28 मिनट पर नववर्ष का प्रवेश होगा, लेकिन यह 30 मार्च को सूर्योदय व्यापिनी तिथि के दिन से प्रारम्भ होगा। नववर्ष का शुभारंभ सिंह लग्न में होगा। वर्षलग्न का स्वामी सूर्य अष्टम भाव में पंचग्रही योग में सम्मिलित होने से आने वाला वर्ष राजनीतिक दलों के लिए परस्पर संघर्षपूर्ण, व्यक्तिगत आकांक्षा और अनेक नेताओं की छवि को धूमिल करने वाला होगा।</p>
<p>चोरों, तस्करों, लुटेरों से जनता त्रस्त होगी। बम-विस्फोट, भीषण रेल दुर्घटना, समुद्री तूफान एवं बाढ़ से जन-धन की हानि होगी। भारत के दक्षिणी हिस्सों में अतिवृष्टि होने से खड़ी फसलों की हानि, पश्चिमी भागों में स्वर्ण आदि धातुओं के भावों में तेजी आएगी। उत्तर भाग में अतिवृष्टि से हानि व दुर्घटनाएं होगी।</p>
<p>इस वर्ष में श्रेष्ठ वर्षा के योग बनेंगे। जून-जुलाई में गुरु ग्रह का अस्त व उदय भी इसमें सहायक होगा। मंगल-शनि का षडाष्टक योग तथा मंगल राहु के सम-सप्तक योग के साथ 13 जुलाई से साढ़े चार महीने तक शनि का वक्रत्व काल कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, तूफान, भूस्खलपन, बाढ़, भूकंप आदि प्राकृतिक प्रकोप करेगा। शीतकाल में शुक्र का अस्त व उदय तथा धनु व मकर राशि में चतुर्ग्रही योग बनने से ओलावृष्टि, तूफान से हानि होगी।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/529471/now-the-colors-will-be-colored-according-to-the-e-rickshaw#gsc.tab=0">अब ई-रिक्शे रूट के हिसाब से कलर होंगे; इस एप्प से होगा वेरीफिकेशन, कानपुर में मंडलायुक्त ने बैठक कर दिये ये निर्देश...</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Mar 2025 14:38:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Chaitra Navratri 2025; इस दिन से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्र, ऐसे करें मां दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी जी की पूजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> हमें अपने हिंदू वैदिक नववर्ष को ही वैदिक रीति से मनाना चाहिए जिसके पीछे पूर्ण वैज्ञानिकता छिपी हुई है। भारतीय पर्व परंपरा में नवसंवत्सरोत्सव का विशेष महत्व है। ज्योतिष के 'हिमाद्रि ग्रंथ' में यह श्लोक आया है- </p>
<p>चैत्र मासे जगद ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेअहानि। <br />शुक्ल पक्षे समग्रंतु, तदा सूर्योदये सति।। <br />चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा ने जगत की रचना की।</p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि भास्कराचार्य कृत 'सिद्घांत शिरोमणि' का यह श्लोक-लंकानगर्यामुदयाच्च भानोस्त स्यैव वारे प्रथमं बभूव। </p>
<p>मधे: सितादेर्दिन मास वर्ष युगादिकानां युगपत्प्रवृत्ति:।।  लंका नगरी में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/529267/chaitra-navratri-2025-worshiping-maa-durga-saraswati-lakshmi-ji-starting"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-03/chaitya-navrarti-2025.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> हमें अपने हिंदू वैदिक नववर्ष को ही वैदिक रीति से मनाना चाहिए जिसके पीछे पूर्ण वैज्ञानिकता छिपी हुई है। भारतीय पर्व परंपरा में नवसंवत्सरोत्सव का विशेष महत्व है। ज्योतिष के 'हिमाद्रि ग्रंथ' में यह श्लोक आया है- </p>
<p>चैत्र मासे जगद ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेअहानि। <br />शुक्ल पक्षे समग्रंतु, तदा सूर्योदये सति।। <br />चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा ने जगत की रचना की।</p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि भास्कराचार्य कृत 'सिद्घांत शिरोमणि' का यह श्लोक-लंकानगर्यामुदयाच्च भानोस्त स्यैव वारे प्रथमं बभूव। </p>
<p>मधे: सितादेर्दिन मास वर्ष युगादिकानां युगपत्प्रवृत्ति:।।  लंका नगरी में सूर्य के उदय होने पर उसी के वार अर्थात् आदित्य रविवार में चैत्र मास शुक्ल पक्ष के प्रारंभ में दिन मास वर्ष युग आदि एक साथ प्रारंभ हुए।</p>
<p><strong>चैत्रशुदि प्रतिपदा सृष्टि का प्रारंभ, भगवान का मत्स्यावतार दिवस</strong></p>
<p>ब्रह्म पुराण में ऐसा प्रमाण मिलता है कि 'ब्रह्माजी ने इसी तिथि को (सूर्योदय के समय) सृष्टि की रचना की थी।'  स्मृति कौसतुभकार के मतानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र के 'निष्कुंभ योग' में भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार लिया था। आर्यों के सृष्टि संवत, वैवस्वतादि संवंतरारंभ, सतयुगादि युगारंभ, विक्रमी संवत, कलिसंवत:, चैत्रशुदि प्रतिपदा से प्रारंभ होते हैं।  इस दिन से ही पूरे वर्ष भर के अनुष्ठानों, पर्वों आदि के शुभ मुहूर्त तय किए जाते हैं।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-03/pavan-tiwari-(1)1.jpg" alt="Pavan Tiwari (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p><strong>मधुमास के पुष्प प्रकृति की ख़ुशहाली के संकेत हैं</strong></p>
<p>चैत्र के मास में ही वसंत ऋतु में सर्वत्र पुष्प खिले होते हैं। इन पुष्पों का खिलना नवसंवत्सरारंभ की मानो सूचना है। पुष्पों का खिलना सृष्टि के महायज्ञ के प्रारंभ होने का संदेशवाहक है। </p>
<p><strong>वैज्ञानिक आधर पर यह पर्व</strong></p>
<p>इस समय मानव मन स्वयं ही हर्षित और उल्लसित हो नवीनता एवं नूतनता का हर्ष विभोर के साथ स्वागत कर कह उठता है- "स्वागत है, स्वागत है नये वर्ष का। समय है उल्लास और हर्ष का, काल के अनंत पट पर, युग सरिता के तट पर, मन्वंतर के घट पर, नव संदेश देता है नवसंवत्सर, अपकर्ष का नहीं मानव के उत्कर्ष का। स्वागत है, स्वागत है नये वर्ष का।"</p>
<p>भारत में विक्रमी संवत महाराजा विक्रमादित्य के राज्याभिषेक की तिथि है। उनका अपनी प्रजा के प्रति प्रेम और न्यायपूर्ण व्यवहार स्मरण करने का दिवस है।  विक्रम संवंत् सबसे अधिक प्रासंगिक, सार्वभौमिक और वैज्ञानिक कैलेंडर है। यह सौर्य और चंद्रमा की गणना पर आधारित है।  हिंदू पंचांग की गणना के आधार पर यह हजारों साल पहले बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय पर सूर्यग्रहण होगा।  यह प्रमाणित हुआ है कि युगों बाद भी यह गणना सही और सटीक साबित हो रही है।</p>
<p><strong>नवरात्रि में करते हैं माँ दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी जी की पूजा</strong></p>
<p>नवरात्रि के पहले तीन दिन, हम सुरक्षा देवी दुर्गा की असीम ऊर्जा और अपार शक्तियों की पूजा करते हैं।  अगले तीन दिन धन वैभव की देवी लक्ष्मी जी को। अंतिम तीन दिन ज्ञान विद्या बुद्धि की देवी सरस्वती जी को समर्पित किये जाते हैं। कुछ मान्यताओं में ५ वें और ७ वें दिन देवी सरस्वती की; ४ थे और ६ वें दिन देवी लक्ष्मी जी की; आठवें दिन देवी महागौरी और नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। सामान्यतः नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ रूपों- क्रमशः माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री की विशेष पूजाएँ की जाती हैं।</p>
<p><strong>शरीर के भीतर मौजूद ऊर्जा केंद्रों (शक्ति चक्रों) को जागृत करें</strong></p>
<p>देवी दुर्गा के विभिन्न रूप हमारे शरीर के अंदर स्थित विभिन्न शक्ति-चक्रों से संबंधित हैं। इन ऊर्जा केंद्रों को इन नौ दिनों में जागृत किया जाता है। अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके और अपनी ऊर्जा का सही उपयोग किया जा सकता है। <br />प्रकृति की शक्तिदेवी माँ के रूप में पूजा की जाती है।<br />प्रथम तीन दिन क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर चक्रों पर ध्यान<br />प्रथम दिवस- मूलाधार में ध्यान कर माँ शैलपुत्री के स्वरूप का ध्यान कर इनके इस मंत्र को जपते हैं। <br />बीज मंत्र- "ह्रीं शिवायै नम: ।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।'<br />द्वतीय दिवस- माँ ब्रह्मचारिणी संयम, तप, वैराग्य तथा विजय प्राप्ति दायिका हैं।  स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है।<br />बीज मंत्र- "ह्रीं श्री अम्बिकायै नम: ।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।'<br /> तृतीय दिवस- माँ चंद्रघंटा कष्टों से मुक्ति तथा मोक्ष प्रदायिनी देवी हैं। मणिपुर चक्र में इनका ध्यान किया जाता है। <br />बीज मंत्र- "ऐं श्रीं शक्तयै नम: ।। <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:।'<br />४, ५, ६ दिनों में क्रमशः अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा चक्रों पर ध्यान<br />चतुर्थ दिवस- माँ कुष्माण्डा शेर की सवारी करती हैं और उनकी आठ भुजाएं हैं। ये रोग, दोष, शोक की निवृत्ति तथा यश, बल व आयु की दात्री मानी गई हैं। अनाहत चक्र में ध्यान कर इनकी साधना की जाती है। <br />बीज मंत्र- "ऐं ह्री देव्यै नम: ।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडायै नम:।'<br />पंचम दिवस- मां स्कंदमाता पूजन, विशुद्ध चक्र में ध्यान साधना। ये सुख-शांति व मोक्ष की दायिनी हैं। <br />बीज मंत्र- "ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम: ।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:।'<br />छठा दिवस- मां कात्यायनी पूजा, आज्ञा चक्र ध्यान। मां कात्यायिनी दुर्गा जी का उग्र रूप है जो साहस का प्रतीक हैं। शेर पर सवार उनकी चार भुजाएं हैं। ये भय, रोग, शोक-संतापों से मुक्ति दिलाती<br />बीज मंत्र- "क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम: ।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनायै नम:।'<br />सातवें और आठवें दिन आज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित करें<br />सातवाँ दिवस- उग्र रूप धारी मां कालरात्रि पूजा, आज्ञा चक्र (ललाट) ध्यान। पौराणिक कथा के अनुसार जब मां पार्वती ने शुंभ-निशुंभ नामक राक्षसों का वध किया था, तब उनका रंग काला हो गया था।  मां काली शत्रुओं का नाश, कृत्या बाधा दूर कर साधक को सुख-शांति प्रदान कर मोक्ष देती हैं। आज्ञा चक्र (ललाट) पर ध्यान किया जाता है। <br />बीज मंत्र- "क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम: ।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:।' <br />आठवां दिवस- –मां महागौरी दुर्गा पूजा, आज्ञा चक्र (मस्तिष्क) ध्यान। माता का यह रूप शांति और ज्ञान की देवी का प्रतीक है। इनकी साधना से अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होने के साथ साथ असंभव से असंभव कार्य भी पूर्ण होते हैं। मस्तिष्क में ध्यान कर इनके इस मंत्र को जपा जाता है।<br />बीज मंत्र- "श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:।'<br />नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना और सहस्त्रार चक्र ध्यान करें<br />नौवाँ दिवस- आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना और सहस्त्रार चक्र ध्यान। सच्चे मन से माँ की पूजा आराधना करने वाले को हर प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां सिद्धिदात्री कमल के फूल पर विराजमान हैं और उनकी चार भुजाएं हैं। सहस्त्रार चक्र (मध्य कपाल) में इनका ध्यान किया जाता है। <br />बीज मंत्र- "ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।।" <br />मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्यै नम:।'</p>
<p><strong>लक्ष्मी देवी शक्ति के आठ रूपों की हम पर बौछार हो</strong></p>
<p>आदि लक्ष्मी - यह रूप आपके मूल स्रोत का स्मरण कराती है। जब हम भूल जाते हैं कि हम इस ब्रह्मांड का हिस्सा है, तो हम खुद को छोटे और असुरक्षित मानते हैं। आदि लक्ष्मी यह रूप आपको अपने मूल स्रोत से जोड़ता है, जिससे अपने मन में सामर्थ्य और शांति का उदय होता है। <br />धन लक्ष्मी - यह भौतिक समृद्धि का एक रूप है।  <br />विद्या लक्ष्मी - यह ज्ञान, कला और कौशल का एक रूप है।  <br />धान्य लक्ष्मी - अन्न-धान्य के रूप यह रूप प्रकट होता है।<br />नवरात्रि के तीन दिन (४, ५, ६) देवी लक्ष्मी को समर्पित हैं<br />संतान लक्ष्मी - यह रूप प्रजनन क्षमता और सृजनात्मकता के रूप में प्रकट होता है । जो लोग रचनात्मक और कलात्मक होते हैं, उनपर लक्ष्मी के ये रूप की कृपा होती है। <br />धैर्य लक्ष्मी - शौर्य और निर्भयता के रूप में प्रकट होती है।  विजय लक्ष्मी - जय, विजय के रूप में प्रकट होती है।  भाग्य लक्ष्मी - सौभाग्य और समृद्धि के रूप में प्रकट होती है। <br /> इन विभिन्न रूपों में देवी लक्ष्मी हम सब पर प्रसन्न हों, संपत्ति और समृद्धि की बौछार करें।<br />नवरात्रि के ७, ८ और ९ वें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित<br />देवी सरस्वती हमें 'आत्मज्ञान' देती हैं। देवी सरस्वती हमारी अपनी चेतना का स्वरुप है, जो विभिन्न बाते सीखने को उद्युक्त करती है।  यह अज्ञान दूर करनेवाली ज्ञान और आध्यात्मिक प्रकाश का स्रोत है।  सरस्वती जी का वाहन 'विवेक का प्रतीक' हंस, तंतु वाद्य वीणा से निकलती मधुर ध्वनि मन को शांति देने वाली है, देवी का आसन पाषाण है जिसकी तरह अचल और निश्चल हमारा ज्ञान हो। </p>
<p><strong>नव दुर्गा के स्वरूप-महत्व </strong></p>
<p>शैलपुत्री- सम्पूर्ण जड़ पदार्थ भगवती का पहला स्वरूप हैं पत्थर मिट्टी जल वायु अग्नि आकाश सब शैल पुत्री का प्रथम रूप हैं। इस पूजन का अर्थ है प्रत्येक जड़ पदार्थ में परमात्मा को अनुभव करना। <br />ब्रह्मचारिणी - जड़ में ज्ञान का प्रस्फुरण, चेतना का संचार भगवती के दूसरे रूप का प्रादुर्भाव है। जड़ चेतन का संयोग है। प्रत्येक अंकुरण में इसे देख सकते हैं। <br /> <br /><strong>चन्द्रघण्टा - </strong>भगवती का तीसरा रूप है यहाँ जीव में वाणी प्रकट होती है जिसकी अंतिम परिणिति मनुष्य में बैखरी (वाणी) है।  <br /><strong>कूष्मांडा -</strong> अर्थात अंडे को धारण करने वाली; स्त्री ओर पुरुष की गर्भधारण, गर्भाधान शक्ति है जो भगवती की ही शक्ति है, जिसे समस्त प्राणीमात्र में देखा जा सकता है।</p>
<p>सुख-शांति व मोक्ष दायिनी, कफ रोग-नाशक देवी स्कंदमाता पांचवां स्वरूप हैं। कंठ रोग- शमन,भय, रोग, शोक-संतापों से मुक्ति दायिनी देवी कात्यायनी पुत्रवती माता-पिता का स्वरूप है अथवा प्रत्येक पुत्रवान माता-पिता स्कन्द माता के रूप में वही भगवती कन्या की माता-पिता हैं। आज्ञा चक्र स्वामिनी, भय, रोग, शोक, मस्तिष्क विकार-नाशक कालरात्रि देवी भगवती का सातवां रूप, जिससे सब जड़ चेतन मृत्यु को प्राप्त होते हैं ओर मृत्यु के समय सब प्राणियों को इस स्वरूप का अनुभव होता है।  भगवती के इन सात स्वरूपों के दर्शन सबको प्रत्यक्ष सुलभ होते हैं परन्तु आठवां ओर नौवां स्वरूप सुलभ नहीं है।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/529223/live-cm-yogi-reached-kanpur-convention-center-and-metro-preparation#gsc.tab=0">LIVE CM Yogi ने कन्वेंशन सेंटर और मेट्रो स्टेशन का किया निरीक्षण; अफसरों के साथ की बैठक...बिठूर महोत्सव में करेंगे शिरकत</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/529267/chaitra-navratri-2025-worshiping-maa-durga-saraswati-lakshmi-ji-starting</link>
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                <pubDate>Sun, 23 Mar 2025 14:05:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>होलिका दहन का मुहूर्त रात 11.26 से 12.18 तक; इतने बजे तक रहेगी भद्रा करण, परिक्रमा के समय यह डालने से आती सुख-समृद्धि...</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> भद्रा करण समाप्त होने पर गुरुवार रात्रि 11.26 के बाद होलिका दहन होगा। होलिका दहन के बाद परिवार सहित परिक्रमा करना शुभ होता है। परिक्रमा के समय होलिका में चना, मटर, गेहूं, अलसी डालने से सुख-समृद्धि आती है। </p>
<p>ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी व पूर्णिमा तिथि दोनों 13 मार्च गुरुवार को रहेगी। सुबह 10.35 तक चतुर्दशी इसके बाद पूर्णिमा तिथि शुरू होगी। भद्रा करण सुबह 10.35 से रात 11.26 तक रहेगी। ऐसे में होलिका दहन गुरुवार रात्रि 11.26 के बाद होगा। व्रत की पूर्णिमा भी 13 मार्च को रहेगी।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/527415/the-muhurta-of-holika-dahan-will-remain-from-1126-to"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-03/holika-dahan-20252.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> भद्रा करण समाप्त होने पर गुरुवार रात्रि 11.26 के बाद होलिका दहन होगा। होलिका दहन के बाद परिवार सहित परिक्रमा करना शुभ होता है। परिक्रमा के समय होलिका में चना, मटर, गेहूं, अलसी डालने से सुख-समृद्धि आती है। </p>
<p>ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी व पूर्णिमा तिथि दोनों 13 मार्च गुरुवार को रहेगी। सुबह 10.35 तक चतुर्दशी इसके बाद पूर्णिमा तिथि शुरू होगी। भद्रा करण सुबह 10.35 से रात 11.26 तक रहेगी। ऐसे में होलिका दहन गुरुवार रात्रि 11.26 के बाद होगा। व्रत की पूर्णिमा भी 13 मार्च को रहेगी। </p>
<p>उन्होंने बताया कि धर्मशास्त्रों में भद्रा में होलिका दहन निषेध माना गया है। भद्रा के बाद ही होलिका दहन धर्मसम्मत है। होलिका दहन का मुहूर्त 11.26 से रात 12.18 मिनट तक रहेगा। 14 मार्च को पुण्यदायिनी फाल्गुनी पूर्णिमा दोपहर 12.23 तक रहेगी। इसके बाद चैत्र कृष्ण प्रतिपदा प्रारंभ होगी। इस तरह 14 मार्च दोपहर के बाद रंग वाली होली होगी। </p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/527350/kanpur-holi-colors-are-associated-with-the-colors-of-holi#gsc.tab=0">Kanpur: होली के रंगों से जुड़े हैं आध्यात्मिक रहस्य, आपके जीवन पर डालते हैं गहरा असर, यहां जानें... होली के रंगों का महत्व</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Mar 2025 13:14:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>होलिका दहन नौ ग्रहों की लकड़ी से करें; ग्रह पीड़ा मुक्ति के लिए होली पर विशेष स्नान...</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार। </strong>होली की अग्नि और भस्‍म का शास्‍त्रों में खास महत्‍व है। भस्म के अनेक प्रयोग वर्णित हैं। प्रत्येक ग्रह का संबंध प्रकृति की वनस्पतियों से है। अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए उनसे संबंधित वनस्पतियों का प्रयोग हवन में करने से सुख-समृद्धि बढ़ती है। </p>
<p>नवग्रह वाटिका में प्रत्येक ग्रह से संबंधित लकड़ी का उल्लेख शास्त्रीय ग्रन्थों में वर्णित है। यदि कोई ग्रह अनिष्टकारक हो, तो उससे संबंधित लकड़ी से हवन, होम आदि करना विशेष फलप्रद रहता है और अगर यह हवन, आहुति होलिका की अग्नि में दी जाए तो अनिष्ट ग्रहों के शमन के लिए विशेष कारगर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/525590/holika-dahan-should-do-a-special-bath-on-holi-for"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-03/pavan-tiwari-(1).jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार। </strong>होली की अग्नि और भस्‍म का शास्‍त्रों में खास महत्‍व है। भस्म के अनेक प्रयोग वर्णित हैं। प्रत्येक ग्रह का संबंध प्रकृति की वनस्पतियों से है। अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए उनसे संबंधित वनस्पतियों का प्रयोग हवन में करने से सुख-समृद्धि बढ़ती है। </p>
<p>नवग्रह वाटिका में प्रत्येक ग्रह से संबंधित लकड़ी का उल्लेख शास्त्रीय ग्रन्थों में वर्णित है। यदि कोई ग्रह अनिष्टकारक हो, तो उससे संबंधित लकड़ी से हवन, होम आदि करना विशेष फलप्रद रहता है और अगर यह हवन, आहुति होलिका की अग्नि में दी जाए तो अनिष्ट ग्रहों के शमन के लिए विशेष कारगर व प्रभावशाली रहता है। </p>
<p>अगर आपके ऊपर सूर्य ग्रह की महादशा चल रही हो और सूर्य आपको कष्ट दे रहा हो अथवा आपका सूर्य जन्मपत्री में कमजोर हो, नीच राशि का हो, राहु से ग्रस्त हो, अथवा सूर्य के कारण मारकेश आदि का भय हो तो होलिका की अग्नि में मदार की लकड़ी अर्पित कर परिक्रमा कर अनिष्ट सूर्य शांति हेतु प्रार्थना करें।</p>
<p>इसी प्रकार चन्द्रमा, राहु से ग्रसित हो अथवा जन्मकुण्डली में अशुभ स्थानों पर बैठे चन्द्रमा की महादशा पीड़ा दे रही हो या फिर नीच राशि का चन्द्रमा मानसिक उलझन प्रस्तुत कर रहा हो तो चन्द्रमा के अनिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए पलाश की लकड़ी को होलिका की अग्नि में अर्पित कर चन्द्रमा शांति की प्रार्थना करें।</p>
<p><strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी </strong>ने बताया कि  इसी प्रकार मंगल को अनुकूल बनाने के लिए खैर (खादिर) वनस्पति, बुध के अनिष्ट को शांत करने के लिए अपामार्ग की लकड़ी, बृहस्पति के विपरीत प्रभाव को दूर करने के लिए पीपल की लकड़ी, शुक्र के अनिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए गूलर की लकड़ी, शनि को अनुकूल बनाने के लिए शमी की लकड़ी, राहु की शांति के लिए दूब और केतु की शांति हेतु कुशा को होलिका की अग्नि में समर्पित कर उस ग्रह की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-03/pavan-tiwari-(1).jpg" alt="Pavan Tiwari (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p>अगर किसी के पास अपनी जन्म पत्रिका नहीं है अथवा किसी को अपनी ग्रह दशा का ज्ञान नहीं है, तो भी सुख-समृद्धि व मंगल कामना के लिए होलिका की नौ परिक्रमा लगाएं, पहली परिक्रमा में मदार की लकड़ी, दूसरी परिक्रमा में पलाश की लकड़ी, तीसरी परिक्रमा में खैर (खादिर) वनस्पति, चौथी परिक्रमा में अपामार्ग की लकड़ी, पांचवी में पीपल की लकड़ी, छठी में गूलर की लकड़ी, सातवीं परिक्रमा में शमी की लकड़ी, आठवीं में दूब तथा नवीं परिक्रमा में कुशा को होलिका में अर्पित कर नवग्रहों को एक साथ नमन करें और अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए प्रार्थना करें। यह भी संभव न हो तो सभी ग्रहों का प्रतिनिधित्व करने वाली लकड़ियों को एक साथ एकत्र कर गांठ बांध लें और अपनी सिर से नौ बार उतारकर होलिका की परिक्रमा कर होलिका में अर्पण करें।</p>
<p><br />होली पर पानी में ये औषधि मिलाकर स्नान करने से नवग्रहों की शांति होती है। इस दिन अगर आप होली खेलने के बाद नहाने के पानी में कुछ औषधी डालते हैं तो नवग्रह इससे शांत रहते हैं और शुभ फल प्रदान करते हैं। ग्रह से संबंधित औषधि स्नान होली और चंद्र ग्रहण में बेहद उपयोगी  है। </p>
<p>औषधि स्नान उस ग्रह से संबंधित वार में कभी भी प्रारंभ किया जा सकता है, लेकिन होली पर्व पर अथवा ग्रहण काल में स्नान करना विशेष उपयोगी होता है। होली से पूर्व ग्रहों के अनुसार जो औषधि बताई जा रही है, उन्हें इकट्ठा करना चाहिए। </p>
<p>यह औषधियां किसी पंसारी के यहां आसानी से मिल जाती हैं। औषधि को कूटकर अथवा पाउॅडर बनाकर उन्हें कम से कम 3 घंटे अथवा अधिक से अधिक 24 घंटे पहले किसी शुद्ध पात्र में जल में भिगो देना चाहिए। जब इन औषधियों का गुण पानी में आ जाये तो पानी को छान कर किसी पात्र में भर लेना चाहिए, स्नान करते समय मुख पूर्व की तरफ होना चाहिए।</p>
<p><strong>औषधी स्नान</strong></p>
<p><strong>ग्रह पीड़ा मुक्ति के लिए होली पर विशेष स्नान</strong></p>
<p>ग्रह पीड़ा से शांति प्राप्ति के लिए रत्न धारण, मंत्र जप, पूजा-पाठ के समान ही औषधीय स्नान भी बहुत प्रभावशाली तथा चमत्कारिक  है। आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान द्वारा स्पष्ट है कि औषधियों में विशेष शक्ति पाई जाती है। ज्योतिष शास्त्र में औषधि स्नान एवं उससे मिलने वाले लाभ का वृहद वर्णन प्राप्त है। अपनी विशेषता के अनुसार प्रत्येक ग्रह से संबंधित औषधि का प्रयोग, शुभ उर्जा को आकर्षित करके उस ग्रह से पीड़ित व्यक्ति की व्यथा शांत करती है।</p>
<p>यदि आपका सूर्य खराब चल रहा हो तो केसर, खस, इलायची, कमल, कुकुंम, मुलहठी, देवदार, मैनसिल, मधु, साठी चावल तथा लाल रंग के पुष्प (गुलाब/गुड़हल) मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से सूर्यकृत पीड़ा का निवारण होता है।<br />यदि आपका चंद्रमा खराब चल रहा हो तो पंचगव्य, शंख जल, चांदी बुरादा, मोती तथा सफेद चन्दन आदि से युक्त जल के द्वारा स्नान करने से चन्द्रकृत पीड़ा का निवारण होता है।</p>
<p>यदि आपका मंगल खराब चल रहा हो तो लाल चंदन, लाल पुष्प, हींग, बेलपत्र के वृक्ष की छाल, मौलसिरी के फूल, सौंफ, सोंठ, जटामासी तथा मालसांगरी के फूल आदि के मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से मंगलकृत पीड़ा का शमन होता है।<br />यदि आपका बुध खराब चल रहा हो तो आंवला, पान का पत्ता, अमरूद, चावल, गोरोचन, सोना, मोती (मोती व सोने को बाद में निकालकर रख लें, फेकें नहीं) आदि के मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से बुधकृत पीड़ा का शमन होता है।<br />यदि आपका बृहस्पति खराब चल रहा हो तो पीली सरसों, मालती के फूल, मुलहठी, मधु, हरिद्रा (हल्दी), भृंगराज की जड़ तथा चमेली के पुष्प आदि के मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से गुरुकृत पीड़ा का शमन होती है।</p>
<p><br />यदि आपका शुक्र खराब चल रहा हो तो मूली के बीज, इलायची, चीनी, जायफल, सफेद चन्दन तथा किसी भी सुगन्ध देने वाले वृक्ष या लता की जड़ आदि के मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से शुक्रकृत पीड़ा का शमन होता है।</p>
<p>यदि आपका शनि खराब चल रहा हो तो काला तिल, लोबान, सुरमा, शमी वृक्ष की लकड़ी का बुरादा, गोंद आदि के मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से शनिकृत पीड़ा का शमन होता है।</p>
<p>यदि आपका राहु खराब चल रहा हो तो लोबान, नागरमोथा, तिलपत्र, कुम्भ पर्व अथवा तीर्थ स्थल का जल आदि मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से राहुकृत पीड़ा का शमन होता है।</p>
<p>यदि आपका केतु खराब चल रहा हो तो लाल चन्दन, जटामासी, लोबान आदि के मिश्रित जल द्वारा स्नान करने से केतुकृत पीड़ा का शमन होता है।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/525516/kpls-first-match-in-kanpur-was-full-of-entertainment-of#gsc.tab=0">कानपुर में KPL का पहला मैच सुपरओवर के मनोरंजन से भरपूर रहा: गंगा बिठूर ने सीसामऊ सुपरकिंग्स को हराया</a></strong></p>
<p><br /> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/525590/holika-dahan-should-do-a-special-bath-on-holi-for</link>
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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 13:06:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>26 फरवरी को मनाई जाएगी महाशिवरात्रि: श्रवण नक्षत्र में सुबह से शाम तक रहेगा प्रभाव, अपनी राशि से भगवान शिव को ऐसे करें प्रसन्न...</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि पर श्रवण नक्षत्र का संयोग बन रहा है श्रवण नक्षत्र इस दिन सुबह से लेकर शाम 5:08 बजे तक प्रभावी रहेगा। <strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी </strong>ने बताया कि इस दिन बुध, शनि और सूर्य तीनों कुंभ राशि में विराजमान होंगे ऐसे में बुधादित्य योग, त्रिग्रही योग का निर्माण हो रहा है जो कई राशियों के लिए शुभ साबित होगा।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-02/pavan-tiwari-(1)2.jpg" alt="Pavan Tiwari (1)" width="1200" height="720" /></p>
<p>फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शंकर का माता पार्वती से विवाह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/521985/mahashivaratri-will-be-celebrated-on-26-february-in-shravan-nakshatra"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-02/pavan-tiwari-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि पर श्रवण नक्षत्र का संयोग बन रहा है श्रवण नक्षत्र इस दिन सुबह से लेकर शाम 5:08 बजे तक प्रभावी रहेगा। <strong>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी </strong>ने बताया कि इस दिन बुध, शनि और सूर्य तीनों कुंभ राशि में विराजमान होंगे ऐसे में बुधादित्य योग, त्रिग्रही योग का निर्माण हो रहा है जो कई राशियों के लिए शुभ साबित होगा।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-02/pavan-tiwari-(1)2.jpg" alt="Pavan Tiwari (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p>फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शंकर का माता पार्वती से विवाह हुआ था।</p>
<p>शिवरात्रि का हर क्षण शिव कृपा से भरा होता है वैसे तो ज्यादातर लोग प्रातःकाल पूजा करते हैं, लेकिन शिवरात्रि पर रात्रि की पूजा सबसे अधिक फलदायी होती है और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है- चार पहर की पूजा ये पूजा संध्या से शुरू होकर ब्रह्म मुहूर्त तक की जाती है इसमें रात्रि का सम्पूर्ण प्रयोग किया जाता है।</p>
<p><strong>पहले पहर की पूजा</strong></p>
<p>चार पहर पूजन से धर्म अर्थ काम और मोक्ष, सब प्राप्त हो जाते हैं यह पूजा आमतौर पर संध्याकाल में होती है प्रदोष काल में शाम 06.00 बजे से 09.00 बजे के बीच की जाती है इस पूजा में शिव जी को दूध अर्पित करते हैं जल की धारा से उनका अभिषेक किया जाता है इस पहर की पूजा में शिव मंत्र का जप कर सकते हैं।</p>
<p><strong>दूसरे पहर की पूजा </strong></p>
<p>यह पूजा रात लगभग 09.00 बजे से 12.00 बजे के बीच की जाती है इस पूजा में शिव जी को दही अर्पित की जाती है साथ ही जल धारा से उनका अभिषेक किया जाता है दूसरे पहर की पूजा में शिव मंत्र का जप करें इस पूजा से व्यक्ति को धन और समृद्धि मिलती है।</p>
<p><strong>तीसरे पहर की पूजा</strong></p>
<p>यह पूजा मध्य रात्रि में लगभग 12.00 बजे से 03.00 बजे के बीच की जाती है इस पूजा में शिव जी को घी अर्पित करना चाहिए इसके बाद जल धारा से उनका अभिषेक करना चाहिए इस पहर में शिव स्तुति करना विशेष फलदायी होता है शिव जी का ध्यान भी इस पहर में लाभकारी होता है इस पूजा से व्यक्ति की हर मनोकामना पूर्ण होती है।</p>
<p><strong>चौथे पहर की पूजा</strong></p>
<p>यह पूजा सुबह लगभग 03.00 बजे से सुबह 06.00 बजे के बीच की जाती है इस पूजा में शिव जी को शहद अर्पित करना चाहिए इसके बाद जल धारा से उनका अभिषेक होना चाहिए इस पहर में शिव मंत्र का जप और स्तुति दोनों फलदायी होती है इस पूजा से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी हो जाता है।</p>
<p>"रूद्राभिषेकं प्रकृर्वन्ति दुःखनाशो भवेद् ध्रुवम्" के अनुसार रूद्राभिषेक से निश्चित दुःख का नाश होता है। शिवरात्रि के दिन शिव जी का अभिषेक जिसे रूद्राभिषेक कहा जाता है, कराना बेहद कारगर सिद्ध होता है, रूद्राभिषेक विभिन्न कामनाओं के लिए रामबाण उपाय है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर चार बार पूजन का चार प्रहर में विधान आता है और चार बार रुद्राभिषेक भी सम्पन्न करना चाहिए, प्रथम प्रहर में दुग्ध द्वारा शिव के ईशान स्वरूप को, द्वितीय प्रहर में दधि द्वारा अघोर स्वरूप को, तृतीय प्रहर में घृत द्वारा वामदेव रूप को तथा चतुर्थ प्रहर में मधु द्वारा सद्योजात स्वरूप का अभिषेक कर पूजन करना चाहिए। यदि साधक चार बार पूजन न भी कर सके तो प्रथम प्रहर में एक बार तो पूजन अवश्य ही करे।</p>
<p><strong>अपनी राशि से भगवान शिव को प्रसन्न करें </strong></p>
<p>मेष : शहद एवं चीनी<br />वृष : दही एवं, दूध, घी<br />मिथुन : बेलपत्र एवं लाल फूल<br />कर्क : दूध, सफेद वस्त्र<br />सिंह : शहद एवं गुड़<br />कन्या : बेलपत्र एवं शहद<br />तुला : गन्ने का रस, घी<br />वृश्चिक : लाल फूल, गंगा जल<br />धनु : चंदन, पीला फूल<br />मकर : बेल पत्र एवं गंगा जल<br />कुंभ : मलाई एवं मिश्री<br />मीन : शहद, बेर का फल</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/521979/on-the-occasion-of-maghi-purnima-in-kanpur-devotees-took#gsc.tab=0">कानपुर में माघी पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी...DM ने भी परिवार संग किया गंगा स्नान</a></strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/521985/mahashivaratri-will-be-celebrated-on-26-february-in-shravan-nakshatra</link>
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                <pubDate>Wed, 12 Feb 2025 13:42:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शिव योग और सिद्ध योग में इस दिन मनाया जाएगा वसंत पंचमी का पर्व: जानें- पूजा का महत्व, सही डेट और शुभ मुहूर्त</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 02 फरवरी 2025 को सुबह 09 बजकर 14 मिनट पर होगी और अगले दिन 03 फरवरी 2025 को सुबह 06 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी। 3 फरवरी को सूर्योदय का स्पर्श होते ही पंचमी तिथि समाप्त हो रही है।</p>
<p>जिससे माघ शुक्ल पंचमी तिथि का क्षय भी माना जा रहा है। इसलिए शास्त्र सम्मत विधान के अनुसार 2 फरवरी को दोपहर के समय माघ शुक्ल पंचमी तिथि व्याप्त होने से वसंत पंचमी मनाई जाएगी। 2 फरवरी को पंचमी तिथि त्रिमुहूर्त व्यापिनी होने से 2 फरवरी को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/519507/know-the-festival-of-vasant-panchami-on-this-day-in"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-01/vasanti-panchmi-11.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 02 फरवरी 2025 को सुबह 09 बजकर 14 मिनट पर होगी और अगले दिन 03 फरवरी 2025 को सुबह 06 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी। 3 फरवरी को सूर्योदय का स्पर्श होते ही पंचमी तिथि समाप्त हो रही है।</p>
<p>जिससे माघ शुक्ल पंचमी तिथि का क्षय भी माना जा रहा है। इसलिए शास्त्र सम्मत विधान के अनुसार 2 फरवरी को दोपहर के समय माघ शुक्ल पंचमी तिथि व्याप्त होने से वसंत पंचमी मनाई जाएगी। 2 फरवरी को पंचमी तिथि त्रिमुहूर्त व्यापिनी होने से 2 फरवरी को वसंत पंचमी मनाई जाएगी। 2 फरवरी को प्रातः काल 9 बजकर 14 मिनट तक शिव योग रहेगा और इसके पश्चात पूरे दिन सिद्ध योग व्याप्त रहेगा। इन योगों में पूजन से मनोवांछित फल मिलेगा।</p>
<p><strong>वसंत पंचमी की पूजा का महत्‍व</strong></p>
<p>वसंत पंचमी पर शिक्षा और संगीत से जुड़े लोग मां सरस्वती की पूजा करते हैं। वे ज्ञान की देवी से बुद्धि और विद्या की कामना करते हैं। यह त्योहार पूरे देश में मनाया जाता है। शिक्षक और छात्र दोनों ही इस दिन सरस्वती पूजा में शामिल होते हैं। </p>
<p>वसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान और कला की देवी, मां सरस्वती को समर्पित है। इस दिन लोग विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। मां सरस्वती से ज्ञान और बुद्धि की वृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। </p>
<p><strong>ज्योतिषाचार्य पं. मनोज कुमार द्विवेदी</strong> ने बताया कि ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार, कई बार घर में वास्तु-दोष होने के कारण विद्यार्थी को शिक्षा में उचित परिणाम नहीं मिलते हैं। ऐसे में उन्हें वसंत पंचमी के दिन से ही पूर्व, उत्तर या पूर्वोत्तर के दिशा में पढ़ाई करना चाहिए। इस दिशा को ध्यान एवं शांति का केंद्र भी माना जाता है। इस दिशा में पढ़ाई करने से विद्यार्थी का मन एवं मस्तिष्क एकाग्रचित रहता है।</p>
<p>दाम्पत्य जीवन में प्यार बरकरार रखना चाहते हैं तो वसंत पंचमी के दिन भगवति रति और कामेदव की पूजा करते हुए उन्हें पुष्प अर्पित करने चाहिए। जिन छात्रों को पढ़ाई में कई प्रकार के समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है या वह एकाग्रता से नहीं पढ़ पा रहे हैं, उन्हें वसंत पंचमी के दिन ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः’ मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि मंत्र का जाप स्वच्छ आसन पर बैठकर और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही किया जाए।</p>
<p>इस दिन विद्यार्थी माता सरस्वती को केसर या पीले चंदन का टीका लगाएं और पीले रंग के वस्त्र जरूर अर्पित करें। साथ ही पूजा स्थल पर किताब और कलम अवश्य रखें। ऐसा करने से मां सरस्वती की कृपा सदैव बनी रहती है और विद्यार्थी को ज्ञान, बुद्धि एवं विवेक का आशीर्वाद मिलता है।</p>
<p>‘वसंत पंचमी’ के दिन छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर काले रंग की स्लेट पर कुछ न कुछ जरूर लिखवाना चाहिए। दरअसल, इस क्रिया को ‘अक्षराम्भ’ कहते हैं। ऐसा करने से पढ़ाई के क्षेत्र में बच्चा शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा करेगा। माता शारदा के पूजन के लिये भी बसंत पंचमी का दिन विशेष शुभ रहता है।</p>
<p>इस दिन 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को पीले-मीठे चावलों का भोजन कराया जाता है, तथा उनकी पूजा की जाती है। मां शारदा और कन्याओं का पूजन करने के बाद पीले रंग के वस्त्र और आभूषण कुमारी कन्याओं व ब्राह्मण को दान करने से परिवार में ज्ञान, कला व सुख-शान्ति की वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त इस दिन पीले फूलों से शिवलिंग की पूजा करना भी विशेष शुभ माना जाता है।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/519468/when-is-2-or-3-february-vasant-panchamudur-should-chant#gsc.tab=0">2 या 3 फरवरी कब है वसंत पंचमी...दूर करें कन्फ्यूजन: मां सरस्वती की पूजा करने के दौरान इन मंत्रों का करें जाप</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/519507/know-the-festival-of-vasant-panchami-on-this-day-in</link>
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                <pubDate>Fri, 31 Jan 2025 15:30:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2 या 3 फरवरी कब है वसंत पंचमी...दूर करें कन्फ्यूजन: मां सरस्वती की पूजा करने के दौरान इन मंत्रों का करें जाप</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> इस साल वसंत पंचमी की तारीख को लेकर लोगों में कन्फ्यूजन की स्थिति बन गई है इस बार वसंत पंचमी 2 फरवरी को है या 3 फरवरी को? इसकी सबसे बड़ी वजह है वसंत पंचमी के लिए जरूरी माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी ति​थि य​ह तिथि 2 फरवरी और 3 फरवरी दोनों दिन प्राप्त हो रही है ऐसे में कहीं 2 फरवरी को तो कहीं 3 फरवरी को वसंत पंचमी की तारीख बताई जा रही है। </p>
<p>वसंत पंचमी के लिए उदयातिथि की मान्यता है पंचांग के अनुसार देखा जाए तो इस साल वसंत पंचमी के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/519468/when-is-2-or-3-february-vasant-panchamudur-should-chant"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-01/वसंत-पंचमी.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> इस साल वसंत पंचमी की तारीख को लेकर लोगों में कन्फ्यूजन की स्थिति बन गई है इस बार वसंत पंचमी 2 फरवरी को है या 3 फरवरी को? इसकी सबसे बड़ी वजह है वसंत पंचमी के लिए जरूरी माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी ति​थि य​ह तिथि 2 फरवरी और 3 फरवरी दोनों दिन प्राप्त हो रही है ऐसे में कहीं 2 फरवरी को तो कहीं 3 फरवरी को वसंत पंचमी की तारीख बताई जा रही है। </p>
<p>वसंत पंचमी के लिए उदयातिथि की मान्यता है पंचांग के अनुसार देखा जाए तो इस साल वसंत पंचमी के लिए माघ शुक्ल पंचमी तिथि 2 फरवरी को दिन में 11 बजकर 53 मिनट से शुरू होगी और 3 फरवरी को सुबह 9 बजकर 39 मिनट तक रहेगी 3 फरवरी को सूर्योदय 06:40 AM पर होगा ऐसे में उदयातिथि के आधार पर वसंत पंचमी 3 फरवरी सोमवार को मनाना शास्त्र सम्मत है उस दिन ही सरस्वती पूजा होगी।</p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि 2 फरवरी को पंचमी ति​थि सूर्योदय के बाद प्राप्त हो रही है सूर्योदय के समय जो तिथि होती है, वहीं पूरे दिन मान्य होती है ऐसे में माघ शुक्ल पंचमी तिथि 3 फरवरी को होगी, न कि 2 फरवरी को।</p>
<p><img src="https://www.amritvichar.com/media/2025-01/pavan-tiwari-(1)3.jpg" alt="Pavan Tiwari (1)" width="1280" height="720"></img></p>
<p><strong>वसंत पंचमी वाले दिन </strong></p>
<p>ब्रह्म मुहूर्त 04:57 ए एम से 05:48 ए एम तक है<br />उस दिन का शुभ समय यानि <br />अभिजीत मुहूर्त ​11:50 ए एम से दोपहर 12:34 पी एम तक है।<br />सरस्वती पूजा पर अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त 06:40 ए एम से 08:03 ए एम तक <br />शुभ-उत्तम मुहूर्त 09:26 ए एम से 10:49 ए एम तक है चर-सामान्य मुहूर्त 01:35 पी एम से 02:58 पी एम तक लाभ-उन्नति मुहूर्त 02:58 पी एम से 04:21 पी एम तक है।</p>
<p>सरस्वती पूजा का मुहूर्त सुबह  7 बजकर 7 मिनट से 8 बजकर 38 मिनट तक है<br />दूसरा मुहूर्त 10 बजकर 06 मिनट से दोपहर 1 बजकर 39 मिनट तक है।</p>
<p>इस वर्ष 3 फरवरी को वसंत पंचमी 2 शुभ योग में है वसंत पंचमी के दिन साध्य और रवि योग बन रहे हैं। रवि योग सुबह में 6 बजकर 40 मिनट से बनेगा, जो रात में 11 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। वसंत पंचमी को प्रात:काल में साध्य योग बनेगा जो 4 फरवरी को तड़के 3 बजकर 3 मिनट तक रहेगा उसके बाद से शुभ योग रहेगा। वसंत पंचमी के अवसर पर रेवती नक्षत्र है रेवती नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 11 बजकर 16 मिनट तक है उसके बाद से अश्विनी नक्षत्र है।</p>
<p>वसंत पंचमी के दिन ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा होगी इस दिन को श्री पंचमी के नाम से भी जानते हैं वसंत पंचमी के अवसर पर कामदेव और रति की भी पूजा करते हैं वसंत पंचमी को देवी सरस्वती का प्रकाट्य हुआ था, इसलिए इसे सरस्वती जयंती भी कहते हैं इस दिन मां सरस्वती की पूजा करने से ज्ञान में वृद्धि होती है।</p>
<p><strong>मां सरस्वती की पूजा करने के दौरान मंत्र जाप</strong></p>
<p>या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता<br />या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।<br />या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता<br />सा मां पातु सरस्वती भगवती  निःशेषजाड्यापहा।।</p>
<p><strong>सरस्वती बीज मंत्र का करें जाप</strong></p>
<p>मां सरस्वती की पूजा करने के दौरान बीज मंत्र का जाप विशेष रूप से करें।</p>
<p>ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै नमः</p>
<p>सरस्वती पूजा करने के दौरान करें सरस्वती गायत्री का जाप</p>
<p>ॐ वाग्दैव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि।<br />तन्नो देवी प्रचोदयात्।।</p>
<p>ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः</p>
<p>ॐ ऐं नमः</p>
<p>ॐ ऐं क्लीं सौः</p>
<p>ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः</p>
<p>सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने।<br />विद्यारूपे विशालाक्षी विद्यां देहि नमोस्तुते।।</p>
<p>ॐ अर्हं मुख कमल वासिनी पापात्म क्षयम्कारी, वद वद वाग्वादिनी सरस्वती ऐं ह्रीं नमः स्वाहा।<br />सरस्वती पुराणोक्त मंत्र का करें जाप</p>
<p>मां सरस्वती की पूजा करने के दौरान पुराणोक्त मंत्र का जाप करें।</p>
<p>या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥</p>
<p>वसंत पंचमी पर वैसे तो पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है। लेकिन व्यक्ति अपनी राशि अनुसार कुछ खास रंग के कपड़े धारण करता है, तो उसे देवी से मनोवांछित फल मिलता है।</p>
<p>हिंदू धर्म के लोगों के लिए बसंत पंचमी के पर्व का खास महत्व है, जिसका त्योहार हर साल माघ मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन मनाया जाता है। वसंत पंचमी पर मां सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसलिए इस शुभ दिन ज्ञान, शिक्षा, वाणी और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है। मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए वसंत पंचमी पर अधिकतर लोग पीले रंग के कपड़े धारण करते हैं। लेकिन ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि पीला रंग हर किसी के लिए शुभ नहीं होता है। इसलिए आज हम आपको उन रंगों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें व्यक्ति अपनी राशि अनुसार धारण करता है, तो उसे मां सरस्वती से मनचाहा वरदान मिल सकता है।</p>
<p><strong>मेष राशि</strong></p>
<p>वसंत पंचमी पर मेष राशि के लोगों के लिए पीले रंग के कपड़े पहनना शुभ रहेगा।</p>
<p><strong>वृषभ राशि</strong></p>
<p>गुलाबी रंग के कपड़े वसंत पंचमी के दिन वृषभ राशि के लोगों के लिए धारण करना शुभ रहेगा।</p>
<p><strong>मिथुन राशि</strong></p>
<p>मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए बसंत पंचमी के दिन मिथुन राशि के जातक हरे रंग के कपड़े पहन सकते हैं।</p>
<p><strong>कर्क राशि</strong></p>
<p>वसंत पंचमी पर कर्क राशि के लोगों के लिए पीले रंग के कपड़े धारण करना शुभ रहेगा।</p>
<p><strong>सिंह राशि</strong></p>
<p>वसंत पंचमी पर मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए सिंह राशि के जातक नारंगी रंग के वस्त्र धारण कर सकते हैं।</p>
<p><strong>कन्या राशि</strong></p>
<p>हरे रंग के कपड़े बसंत पंचमी पर कन्या राशि के जातकों के लिए पहनना शुभ रहेगा।</p>
<p><strong>तुला राशि</strong></p>
<p>मां सरस्वती को खुश करने के लिए वसंत पंचमी पर तुला राशि के जातक गुलाबी रंग के कपड़े पहन सकते हैं।</p>
<p><strong>वृश्चिक राशि</strong></p>
<p>यदि आप मां सरस्वती से मनचाहा वरदान पाना चाहते हैं, तो वसंत पंचमी पर लाल रंग के कपड़े धारण करें।</p>
<p><strong>धनु राशि</strong></p>
<p>पीले रंग के कपड़े धनु राशि के जातकों के लिए वसंत पंचमी पर धारण करना शुभ रहेगा।</p>
<p><strong>मकर राशि</strong></p>
<p>मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए मकर राशि के जातक काले रंग के कपड़े धारण करेंगे, तो अच्छा रहेगा।</p>
<p><strong>कुंभ राशि</strong></p>
<p>काले रंग के कपड़े पहनना वसंत पंचमी पर कुंभ राशि के जातकों के लिए शुभ रहेगा।</p>
<p><strong>मीन राशि</strong></p>
<p>यदि आप मां सरस्वती से मनचाहा वरदान पाना चाहते हैं, तो वसंत पंचमी पर पीले रंग के कपड़े धारण करें।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/519329/despite-the-stampede-the-enthusiasm-of-the-devotees-remained-enthusiastic#gsc.tab=0">भगदड़ के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह रहा बरकरार, भीड़ के चलते कानपुर सेंट्रल पर अतिरिक्त सुरक्षा के इंतजाम</a></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.amritvichar.com/article/519468/when-is-2-or-3-february-vasant-panchamudur-should-chant</link>
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                <pubDate>Fri, 31 Jan 2025 13:15:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitesh Mishra]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पहली गुप्त नवरात्रि 30 जनवरी से होगी शुरू: सालभर में चार बार होती है...सिद्धि के लिए माना जाता महत्वपूर्ण</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> साल की पहली गुप्त नवरात्रि 30 जनवरी से शुरू होगी गुप्त नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक गुप्त अनुष्ठान किये जाते हैं इन दिनों देवी दुर्गा के दस रूपों की पूजा की जाती है। वहीं इसका समापन शुक्रवार 7 फरवरी, को होगा। गुप्त नवरात्रि को गुप्त साधना और विद्याओं की सिद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p><strong>सालभर में होती चार नवरात्रि</strong></p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि पूरे वर्ष में चार नवरात्रि होती हैं, जिसमें दो गुप्त नवरात्रि और दो प्रकट नवरात्रि होती हैं माघ और आषाढ़ माह में गुप्त</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/519141/the-first-secret-navratri-will-start-from-january-30-four"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-01/pavan-tiwari-(1)2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>कानपुर, अमृत विचार।</strong> साल की पहली गुप्त नवरात्रि 30 जनवरी से शुरू होगी गुप्त नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक गुप्त अनुष्ठान किये जाते हैं इन दिनों देवी दुर्गा के दस रूपों की पूजा की जाती है। वहीं इसका समापन शुक्रवार 7 फरवरी, को होगा। गुप्त नवरात्रि को गुप्त साधना और विद्याओं की सिद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p><strong>सालभर में होती चार नवरात्रि</strong></p>
<p>संस्थापक अध्यक्ष ज्योतिष सेवा संस्थान के आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि पूरे वर्ष में चार नवरात्रि होती हैं, जिसमें दो गुप्त नवरात्रि और दो प्रकट नवरात्रि होती हैं माघ और आषाढ़ माह में गुप्त नवरात्रि होती हैं और प्रकट नवरात्रि में चैत्र नवरात्रि तथा आश्विन माह की शारदीय नवरात्रि होती है देवी भागवत महापुराण में मां दुर्गा की पूजा के लिए इन चार नवरात्रियों का उल्लेख है।</p>
<p>माघ शुक्ल प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 29 जनवरी 2025 को शाम 6:05 मिनट से हो रही है, इस तिथि का समापन 30 जनवरी को शाम 4:01 मिनट पर होगा उदया तिथि के अनुसार माघ गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ 30 जनवरी 2025 के दिन से होगा।</p>
<p>30 जनवरी से माघ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, इस दिन श्रवण और धनिष्ठा नक्षत्र के साथ व्यतीपात योग बन रहा है, जो पूजा पाठ के लिए बेहद शुभ है। इस दिन कलश स्थापना के लिए आपको दो शुभ मुहूर्त प्राप्त होंगे।</p>
<p>पहला मुहूर्त सुबह 9:25 मिनट से सुबह 10:46 मिनट तक है।<br />दूसरा शुभ मुहूर्त दोपहर में 12:13 मिनट से दोपहर 12:56 मिनट तक है।</p>
<p>प्रत्यक्ष नवरात्रि में मां भगवती की पूजा जहां माता के ममत्व के रूप में की जाती है तो वहीं गुप्त नवरात्रि में देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा शक्ति रूप में की जाती है।  गुप्त नवरात्रि में देवी साधना किसी को बता कर नहीं की जाती है इसलिए इन दिनों को नाम ही गुप्त दिया गया है  इन नवरात्रि में देवी साधना से शीघ्र प्रसन्न् होती हैं और मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।</p>
<p>जितनी अधिक गोपनीयता इस साधना की होगी उसका फल भी उतनी ही जल्दी मिलेगा देवी के मां कालिके, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी देवी, भुनेश्वरी देवी, मां धूम्रावती, बगलामुखी माता, मातंगी माता, छिन्न मस्ता, त्रिपुर भैरवी और देवी कमला की गुप्त नवरात्रि में पूजा की जाती है मंत्र जाप, श्री दुर्गा सप्तशती, हवन के द्वारा इन दिनों देवी साधना करते हैं।</p>
<p>यदि आप हवन आदि कर्मकांड करने में असहज हों तो नौ दिन का किसी भी तरह का संकल्प जैसे सवा लाख मंत्रों का जाप कर अनुष्ठान कर सकते हैं या फिर राम रक्षा स्त्रोत, देवी भागवत आदि का नौ दिन का संकल्प लेकर पाठ कर सकते हैं अखंड जोत जलाकर साधना करने से माता प्रसन्न होती हैं।</p>
<p>गुप्त नवरात्रि के दौरान तांत्रिक और अघोरी मां दुर्गा की आधी रात में पूजा करते हैं मां दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर लाल रंग का सिंदूर और सुनहरे गोटे वाली चुनरी अर्पित की जाती है। इसके बाद मां के चरणों में पूजा सामग्री को अर्पित किया जाता है मां दुर्गा को लाल पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है सरसों के तेल से दीपक जलाकर 'ॐ दुं दुर्गायै नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। </p>
<p><strong>ये भी पढ़ें- <a href="https://www.amritvichar.com/article/519102/kanpur-saden-death-incidents-increased-patients-in-cardiology-viral-video#gsc.tab=0">Kanpur: ‘सडेन डेथ’ की घटनाओं से कार्डियोलॉजी में बढ़े मरीज, वायरल वीडियो ने बढ़ाई दहशत, सीने में जरा भी दर्द होने पर लोग गंभीर</a></strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>कानपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2025 19:09:36 +0530</pubDate>
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