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                <title>शिवरात्री - Amrit Vichar</title>
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                <description>शिवरात्री RSS Feed</description>
                
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                <title>छोटा कैलाश: नंगे पांव खड़ी चढ़ाई चढ़ भक्तों ने मांगी भगवान शिव से मन्नतें</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>अमृत विचार, हल्द्वानी।</strong> उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भीमताल में भगवान शंकर का भव्य मंदिर है, जिसे छोटा कैलाश के नाम से जाना जाता है। भोलेनाथ के भक्त यहां पूजा-अर्चना और उनके दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि के दौरान भी श्रद्धालुओं की यहां लाखों की संख्या में भीड़ देखने को मिली। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु पूरे भक्ति भाव से यहां आता है और भगवान शिव का ध्यान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कैलाश में लाखों की संख्या में महाशिवरात्रि के दिन भक्त पहुंचे। कई भक्त ऐसे भी थे, जिन्होंने 5 किलोमीटर की खड़ी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/524722/chhota-kailash-climbed-barefoot-and-offered-prayers-from-lord-shiva"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-02/img-20250226-wa0409.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>अमृत विचार, हल्द्वानी।</strong> उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भीमताल में भगवान शंकर का भव्य मंदिर है, जिसे छोटा कैलाश के नाम से जाना जाता है। भोलेनाथ के भक्त यहां पूजा-अर्चना और उनके दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि के दौरान भी श्रद्धालुओं की यहां लाखों की संख्या में भीड़ देखने को मिली। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु पूरे भक्ति भाव से यहां आता है और भगवान शिव का ध्यान करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कैलाश में लाखों की संख्या में महाशिवरात्रि के दिन भक्त पहुंचे। कई भक्त ऐसे भी थे, जिन्होंने 5 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई नंगे पांव यात्रा की। </p>
<p>नैनीताल के पिनरों गांव की एक पहाड़ी पर स्थित है भोलेनाथ का यह मंदिर। हल्द्वानी से अमृतपुर जो लगभग 35 किमी की दूरी पर है। यहां पहुंचने के बाद पहाड़ की चोटी तक 4 से 5 किमी खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। रास्ते में भक्तों के कुछ देर बैठने की भी उचित व्यवस्था की गई है। पिनरों गांव के ऊंचे पर्वत पर विराजमान छोटा कैलाश मंदिर श्रद्धालुओं में सदैव आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है।</p>
<p><strong>4 किलोमीटर नंगे पांव खड़ी चढ़ाई चढ़ कर भक्तों ने मांगी भगवान शिव से मन्नत</strong></p>
<p>छोटा कैलाश में हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और इस बार भी वहां श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में थी। भगवान भोलेनाथ से यहां जिस भी श्रद्धालुओं ने सच्चे मन से अपनी मन्नत मांगी उनकी मन्नत जरूर भोलेनाथ ने पूरी की। यही वजह है कि यहां हर साल भक्तों का महाशिवरात्रि के दिन तांता लगा रहता है। लेकिन कई ऐसे भक्त भी हैं जो नंगे पांव खड़ी चढ़ाई पार कर भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए यहां पहुंचे। यह वही भक्त थे जिनकी मुरादे भगवान भोलेनाथ ने पूरी की, ऐसा माना जाता है कि जो भी भक्त यहां पर अपनी मुराद मांगता है और उसकी मुराद पूरी होने के बाद यहां वह भक्त महाशिवरात्रि के दिन नंगे पांव भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए पहुंचता है। कई ऐसे भी भक्त थे जो अपनी मन्नत पूरा करने के लिए यहां पर नंगे पांव भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए पहुंचे। </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p><strong>रास्ते में होती है यह कठिनाइयां लेकिन भोले बाबा के जयकारों से हो जाती है दूर </strong></p>
<p>आपको बता दें कि छोटा कैलाश में भगवान शिव के नंगे पांव दर्शन करना आसान बात नहीं है, क्योंकि यह रास्ता बेहद कठिनाई पूर्ण है। रास्ते में नुकीले पत्थर और काटो का भी सामना करना पड़ता है, क्योंकि यह पूरा रास्ता जंगल का है। लेकिन भक्त भगवान शिव के जयकारों के साथ अपना यह रास्ता आसानी से पार कर लेते हैं और जब भगवान शिव के मंदिर पर पहुंचते है तो अपनी सारी पीड़ा भूल जाते हैं, मानों वहां पहुंचने के बाद कुछ चमत्कार सा हो जाता है। भगवान भोलेनाथ के दर्शन के बाद भक्त अपनी सारी पीड़ा भूल जयकारों के साथ बाबा भोलेनाथ के दर्शन करते हैं। भोले बाबा अपने भक्तों की सभी मन्नते पूरी करते हैं। </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तराखंड</category>
                                            <category>हल्द्वानी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Feb 2025 20:17:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Pawan Singh Kunwar]]></dc:creator>
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                <title>जंगल किनारे आस्था का ज्वार, महादेव की जय-जयकार</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>  हल्द्वानी, अमृत विचार :</strong> सावन में बाबा भोले का खूब सत्कार किया जाता है। दूध, दही से उन्हें स्नान कराया जाता है और फिर भांग, धतूरे का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि भांग, धतूरा बाबा भोले को अतिप्रिय है। भगवान भोले का ऐसा ही एक सिद्ध मंदिर टांडा जंगल की दहलीज पर बना है, जिसकी कहानी 160 साल पुरानी है। ये किस्सा योगी बेलबाबा से जुड़ा है और सावन के दिनों में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।  </p>
<p><br />हल्द्वानी से रुद्रपुर की ओर जाते वक्त रास्ते में घना टांडा जंगल है। हल्द्वानी की सीमा में जहां</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.amritvichar.com/article/524362/mahadevs-cheering-of-faith-on-the-forest"><img src="https://www.amritvichar.com/media/400/2025-02/5.jpeg" alt=""></a><br /><p><strong> हल्द्वानी, अमृत विचार :</strong> सावन में बाबा भोले का खूब सत्कार किया जाता है। दूध, दही से उन्हें स्नान कराया जाता है और फिर भांग, धतूरे का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि भांग, धतूरा बाबा भोले को अतिप्रिय है। भगवान भोले का ऐसा ही एक सिद्ध मंदिर टांडा जंगल की दहलीज पर बना है, जिसकी कहानी 160 साल पुरानी है। ये किस्सा योगी बेलबाबा से जुड़ा है और सावन के दिनों में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।  </p>
<p><br />हल्द्वानी से रुद्रपुर की ओर जाते वक्त रास्ते में घना टांडा जंगल है। हल्द्वानी की सीमा में जहां से इस जंगल की शुरुआत होती, उसी किनारे पर बेलबाबा का भव्य मंदिर है। इस मंदिर में स्थापित भगवान शिव और बेलबाबा के प्रति लोगों का अटूट विश्वास है। ऐसी मान्यता है कि अब से करीब 160 साल पहले जहां मंदिर है, वह स्थान घने जंगल का हिस्सा था। इस घने जंगल में योगी बेलबाबा वास करते थे। एक बार क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा। खेती-बाड़ी और जंगल उजाड़ होने लगे। ऐसे में स्थानीय लोग बेलबाबा के पास पहुंचे। सूखे की मार झेल रहे लोगों ने बाबा से गुहार लगाई और सूखे से उबरने का उपाय पूछा। कहा जाता है कि बाबा ने लोगों से कहाकि उनके जाने के बाद यहां बरसात होगी। </p>
<p><br />अगले दिन बाबा अचानक गायब हो गए और फिर किसी को कभी नजर नहीं आए। बाबा के गायब होते ही क्षेत्र में जमकर बरसात हुई और फिर एक बार खेती-बाड़ी और जंगल हरियाली से लहलहाने लगे। तभी से लोगों की बेलबाबा के प्रति आस्था बढ़ी। बेलबाबा एक योगी और भगवान शिव के परम भक्त थे। ऐसे में वर्ष 1966 में उसी स्थान पर बेलबाबा मंदिर का निर्माण कराया गया, जहां बेलबाबा ने अंतिम बार स्थानीय लोगों को दर्शन दिए थे। इस स्थान पर सबसे पहले शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। बाद में बेलबाबा की प्रतिमा स्थापित की गई। इसके बाद मंदिर का स्वरूप लगातार बढ़ता रहा और आज यहां महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोले के दर्शन के लिए कई-कई किलोमीटर लंबी लाइन लगती है।  </p>
<p><br /><strong>मनोकामना पूरी होने पर भक्त कराते हैं भंडारा</strong><br />हल्द्वानी : मंदिर में वैसे तो प्रति दिन सैकड़ों भक्त दर्शन करने आते हैं, लेकिन सावन में मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। मंदिर में पूजा की विशेष व्यवस्था की जाती है। बाबा का मुख्य प्रसाद बेलपत्र और दूध है। यहां मंदिर पर दूध भी चढ़ाने की प्रथा है। हजारों भक्त इस मंदिर में दूध चढ़ाने आते हैं और मनोकामना करते हैं। मंदिर में लोग अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद भंडारा कराते हैं। कहा जाता है एक बार जो बाबा के दर्शन कर ले वह फिर बाबा के पास जरूर पहुंचता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तराखंड</category>
                                            <category>हल्द्वानी</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Feb 2025 19:34:38 +0530</pubDate>
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