वर्ष 1194 में मुहम्मद गौरी ने इस मंदिर को लूटने के लिए इस मंदिर को तुड़वा दिया था। पुनः इस मंदिर का निर्माण होने के बाद जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने इस मंदिर को तुड़वा दिया था।
काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार अकबर के नौ रत्नों में से एक राजा टोडरमल ने अकबर के आदेश पर नारायण भट्ट की मदद से वर्ष 1585 में कराया था।
इस मंदिर के कपाट रोज 02 बजकर 30 मिनट पर खुलता है। यहां पर पहली आरती सुबह 03 बजे व आखिरी आरती साढ़े 10 बजे होती है। कुवल मिलाकर रोजाना पांच बार आरती होती है।
ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में मौजूद ज्योतिर्लिंग को स्वयं महादेव ने अपने निवास स्थान के लिए स्थापित की थी।
इस मंदिर के गर्भगृह में मंडप और शिवलिंग हैं। जो चांदी की चौकोर वेदी में स्थापित है। वहीं, मंदिर परिसर में कालभैरव, भगवान विष्णु व विरुपाक्ष गौरी के मंदिर स्थापित हैं।
मान्यता ऐसी है कि वाराणसी शहर भगवान के त्रिशूल पर टिका हुआ है। इस मंदिर के गुंबद को सोने से बनाया गया है। जिसे सोने का मंदिर कहा जाता है।
मान्यता ऐसी है कि गंगा नदी में स्नान करने के बाद काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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