हल्द्वानी: लक्ष्मी कीचड़ में सनी थी और ऊपर चढ़कर पीट रहे थे दंगाई

हल्द्वानी: लक्ष्मी कीचड़ में सनी थी और ऊपर चढ़कर पीट रहे थे दंगाई

हल्द्वानी, अमृत विचार। उस शाम दंगे की घटना के बाद इलाके की लाइट काट दी गई, चारों ओर अंधेरा था, हर तरफ आग के गोले और धुएं का गुबार था। लोग चीखते-पुकारते यहां-वहां भाग रहे थे। ढहाए गए मदरसा के पास ही कुछ जवान लड़के एक महिला पुलिसकर्मी को बुरी तरह पीट रहे थे।

पुलिसकर्मी पूरी तरह कीचड़ में लथपथ थी, उसके ऊपर चढ़कर लड़के उन्हें पीट रहे थे। वह बार-बार चिल्ला रही थीं कि मैं लड़की हूं, मैंने कुछ नहीं किया है, मुझे छोड़ दो, लेकिन उन्मादी सुनने को तैयार नहीं थे। पुलिसकर्मी के सिर के बाल छोटे थे, इसलिए उनकी बात पर लड़कों को यकीन नहीं हो रहा था और वो बार-बार यही कह रहती थी कि मैं लड़की हूं...

उस समय मैं अपनी 5 साल की बेटी के साथ घर को आ रहा था। महिला पुलिसकर्मी को मारने के लिए एक लड़के ने बड़ा-सा पत्थर भी उठा लिया था। तभी मैंने लड़-झगड़कर किसी तरह उन्हें बचाने की कोशिश की। मुश्किल से उन्हें अपने घर तक ला पाया, भीड़ ने मेरा पीछा किया, मुझे भी मारा-पीटा, मेरे पेट व हाथ में चोटें आई हैं। भीड़ जब मोहल्ले में दाखिल हुई तो मोहल्ले वालों ने उन्मादियों को समझाया कि यहां की ओर कोई नहीं आया।

मैंने घर के दरवाजे अंदर से बंद कर दिए व मेरी पत्नी ने उन्हें बाथरूम में छुपा दिया। हम भी डर गए थे कि कहीं भीड़ हमारे घर में तोड़फोड़ या जला ने दे। महिला पुलिसकर्मी को बेरहर्मी से पीटा गया था, उन्हें सिर व शरीर पर कई चोटें आई थीं, वह बोल नहीं पा रही थीं, वह कंपकंपा रही थीं। मेरी पत्नी ने उनकी मदद की। 

मेरे पास जितने भी पुलिस वालों के नंबर थे, मैं लगातार उनसे संपर्क कर रहा था कि आपकी एक पुलिसकर्मी मेरे घर पर सुरक्षित है। इस दौरान किसी ने हमारे घर के बाहर पेट्रोल बम फेंक दिया, जिसकी बहुत जोर की आवाज अंदर तक आई। रात में करीब 11.30 बजे कई पुलिसवाले आए व उन्हें यहां से सुरक्षित लेकर गए।
(पुराना चील घर, बनभूलपुरा निवासी आबिद सिद्दीकी ने जैसा संवाददाता ललित पांडे को बताया) 


इसलिए घर पर लिखवा दिया लक्ष्मी का नाम
हल्द्वानी : जब दूसरे-तीसरे दिन इलाके में सर्च अभियान चलाया जाने लगा तो दर्जनों पुलिस वाले मेरे घर आए व दंगों का अभियुक्त करार देते हुए मुझे भी उठाकर ले जाने लगे।  मेरी पत्नी ने उनसे कहा कि हमने आपकी एक महिला पुलिसकर्मी को बचाया और आप हम पर अत्याचार कर रहे हो।

पुलिसकर्मियों को मेरी पत्नी की बात पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ तो मैंने उन्हें अपने घर पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज दिखाई, जिसमें हमारा परिवार उस महिला पुलिसकर्मी की मदद करते दिख रहा था। पूरा वीडियो देखने के बाद ही उन्होंने मुझे छोड़ा। फिर से पुलिसवाले परेशान न करें, इसलिए मैंने घर के दरवाजे पर लिखवा दिया- ये घर वो है जिन्होंने कांस्टेबल की जान बचाई है, लक्ष्मी उनका नाम है।

प्रशासन ने हाल तक नहीं पूछा
पुराना चील घर, बनभूलपुरा के आबिद सिद्दीकी कहते हैं कि नफरत हारती है व इंसानियत हमेशा जीतती है। उन्होंने कहा कि दंगों के बीच एक पुलिसकर्मी की जान बचाने की वजह से आज मैं व मेरा परिवार महफूज हैं। लेकिन, उन्हें प्रशासन से शिकायत भी है। वह कहते हैं कि अब तक कोई हमारा हालचाल पूछने नहीं आया, हम अपनी ओर से लोगों को राशन आदि बांट रहे हैं। 


महिला पुलिसकर्मी बेहद घायल अवस्था में थीं, उनका बीपी लो हो गया था, मैंने कॉफी बनाकर उन्हें दी। वह दर्द से कराह रही थीं और बार-बार यही कह रही थीं कि मैं मर जाऊंगी।
- मेहरीन, आबिद सिद्दीकी की पत्नी

उस समय भीड़ बेकाबू थी। किसी तरह मोहल्ले के लोगों ने उन्हें समझाया कि यहां कोई नहीं है। मोहल्ले के सभी लोगों ने बहुत मदद की। वे कौन लोग थे, नहीं पता।
- फिरदौस, पड़ोसी

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