बोध कथा: लालच का अंत
एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में रामू नाम का किसान रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन उसकी एक बुरी आदत थी-उसे हमेशा और अधिक पाने की लालसा रहती थी, जो उसके पास था, उससे वह कभी संतुष्ट नहीं होता था। एक दिन खेत में काम करते हुए उसे जमीन के अंदर एक चमकती हुई सोने की मूर्ति मिली।
रामू की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने सोचा, “अब तो मेरी किस्मत बदल गई।” वह मूर्ति को घर ले आया और उसे बेचकर बहुत सारा धन कमा लिया। अब उसके पास अच्छे कपड़े, बड़ा घर और ढेर सारी सुविधाएं थीं, लेकिन कुछ ही दिनों में उसका मन फिर असंतुष्ट हो गया। उसने सोचा, “अगर मुझे एक मूर्ति मिल सकती है, तो और भी मिल सकती हैं।”
लालच में आकर वह रोज अपने खेत की खुदाई करने लगा। वह खेती पर ध्यान देना भूल गया। दिन बीतते गए, खेत बर्बाद हो गया, फसल नष्ट हो गई और घर का खर्च भी बढ़ता गया, जो पैसा उसने मूर्ति से कमाया था, वह धीरे-धीरे खत्म होने लगा। अब रामू के पास न खेत बचा, न पैसा। एक दिन वह थककर बैठ गया और सोचने लगा, “मैंने क्या खो दिया?” तभी उसके गांव का एक बुजुर्ग उसके पास आया और बोला, “रामू, प्रकृति ने तुम्हें मेहनत से कमाने का रास्ता दिया था, लेकिन तुमने लालच में आकर उसे छोड़ दिया।”
रामू को अपनी गलती समझ में आ गई। उसने फिर से अपने खेत को संवारना शुरू किया, मेहनत की और धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरने लगी। अब उसने तय कर लिया कि वह जो मिलेगा, उसमें संतोष रखेगा और मेहनत से ही आगे बढ़ेगा। कथा से सीख मिलती है कि लालच इंसान को उसके मूल रास्ते से भटका देता है। सच्ची सफलता मेहनत और संतोष में ही छिपी होती है।
