पौराणिक कथा: मौन का वरदान

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Published By Anjali Singh
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प्राचीन काल में सरस्वती नदी के तट पर एक समृद्ध राज्य था। उस राज्य में देवदत्त नाम का एक विद्वान ब्राह्मण रहता था। शास्त्रों का उसे गहरा ज्ञान था, वाणी में अद्भुत प्रभाव था, किंतु उसका स्वभाव अत्यधिक वाचाल था। वह हर सभा में बोलता, हर विषय पर अपनी राय देता और प्रायः बिना सोचे-समझे कठोर वचन कह बैठता। उसकी विद्या के कारण लोग उसका सम्मान करते थे, पर उसके वचनों से कई मन आहत भी होते थे। एक दिन देवदत्त ज्ञान-यज्ञ के लिए वन की ओर गया। वहां उसे एक तपस्वी मिले, जो वर्षों से मौन व्रत धारण किए हुए थे। 

देवदत्त ने उन्हें बार-बार प्रश्न किए, पर वे शांत रहे। उनकी निःशब्द उपस्थिति ने देवदत्त को विचलित कर दिया। अंततः उसने उपहास करते हुए कहा, “हे मुनिवर, यदि आप बोल नहीं सकते तो तपस्या का क्या लाभ?” तभी उस तपस्वी का तेजस्वी रूप प्रकट हुआ। वे स्वयं बृहस्पति थे- देवताओं के गुरु। उन्होंने मधुर स्वर में कहा, “वत्स, वाणी ईश्वर का वरदान है, किंतु उसका संयम उससे भी बड़ा तप है।”

यह कहकर बृहस्पति ने देवदत्त को वरदान दिया- “एक दिन के लिए तुम्हारे मुख से केवल वही वचन निकलेंगे, जो सत्य और कल्याणकारी होंगे।” देवदत्त हंस पड़ा। उसे लगा यह तो साधारण-सा वरदान है। पर जैसे ही वह नगर लौटा, उसे अनुभव हुआ कि वह बिना सोचे कुछ भी नहीं बोल पा रहा है। जहां पहले वह तुरंत प्रतिक्रिया देता था, वहां अब उसे मौन रहना पड़ रहा था। कई बार लोग उससे प्रश्न करते, पर वह उत्तर देने से पहले भीतर झांकता कि क्या उसका वचन किसी को चोट तो नहीं पहुंचाएगा। 

दिन ढलते-ढलते देवदत्त को अनुभूति हुई कि मौन में एक अद्भुत शांति है। उसके शब्द अब कम थे, पर प्रभावशाली थे। जिन स्थानों पर वह पहले विवाद उत्पन्न करता था, वहां अब सौहार्द बन रहा था। संध्या समय बृहस्पति पुनः प्रकट हुए। देवदत्त ने विनम्र होकर कहा, “गुरुदेव, आज मैंने जाना कि अनियंत्रित वाणी अज्ञान है और संयमित मौन ही सच्चा ज्ञान।” बृहस्पति मुस्कराए और अंतर्धान हो गए। उस दिन से देवदत्त ने व्रत लिया कि वह बोलेगा तो सोचकर, और मौन रखेगा तो समझकर।