पीलीभीत: करोड़ों खर्च होने के बाद भी कुपोषण से जंग लड़ रहे नौनिहाल, अप्रैल में ही मिले 2646 बच्चे अतिकुपोषित

पीलीभीत: करोड़ों खर्च होने के बाद भी कुपोषण से जंग लड़ रहे नौनिहाल, अप्रैल में ही मिले 2646 बच्चे अतिकुपोषित

पीलीभीत, अमृत विचार: नौनिहालों में कुपोषण को खत्म करने के लिए सरकार की ओर से तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। मगर जिले में यह योजना दम तोड़ती दिख रही है। करोड़ों खर्च होने के बाद भी नौनिहालों पर कुपोषण भारी पड़ रहा है। बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार एक माह में 9862 बच्चे कुपोषित मिले हैं।

जिनमें 40 फीसदी बच्चों का इलाज एनआरसी में हो रहा है। जिस वजह से एनआरसी  के बेड फुल हो रखे हैं। जहां एक-एक बेड पर दो बच्चों को रखा जा रहा है।  स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो अतिकुपोषित बच्चों को कम से कम 15 दिनों तक भर्ती कर इलाज किया जाता है ऐसे में अन्य कुपोषित बच्चों के लिए आगे का समय दिया जा रहा है।

जिले में कुपोषण को खत्म करने के लिए और जागरुक करने का जिम्मा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग को दिया गया है। जिले में 1960 आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन किया जा रहा है। जहां करीब एक लाख से अधिक बच्चे पंजीकृत हैं। इन केंद्रों पर शिक्षा के अलावा बच्चों का कुपोषण को देखते हुए वजन आदि कराया जाता है। कुपोषित बच्चों का इलाज करने के लिए मेडिकल कॉलेज में एनआरसी केंद्र बनाया गया है। जिसमें अति कुपोषित बच्चों का इलाज किया जाता है। 

आंगनबाड़ी के अलावा स्वास्थ्य विभाग की ओर से आरबीएसके (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) टीम भी गठित की गई है। जोकि रोजाना केंद्रों पर जाकर बच्चों की जांच कर गंभीर कुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराती है। साथ ही ग्रामीणों को जागरूक भी करती है, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी कुपोषण कम होने की जगह तेजी से बढ़ रहा है।  साल 2024  की  बात करें तो अब तक 80 अति कुपोषित बच्चे एनआरसी में भर्ती हुए हैं। इनमें अकेले मई में 28 बच्चे यहां पहुंचे हैं। जिनमें करीब 15 बच्चों का इलाज अभी भी चल रहा है। 

आलम यह है कि एनआरसी में 10 बेड की व्यवस्था है, लेकिन संख्या अधिक होने के कारण एक बेड पर दो-दो बच्चों को भर्ती कर इलाज किया जा रहा है। इन बच्चों में निमोनिया, डायरिया, खांसी, जुकाम, बुखार के भी लक्षण मिल रहे हैं। जिस वजह से बीसलपुर क्षेत्र के दो बच्चों को इलाज पीडियाट्रिक विभाग में इलाज चल रहा है। जबकि साल 2023 में 268 बच्चे ही भर्ती हुए थे।  इधर, बाल विकास एंव पुष्टाहार विभाग की ओर से कराए गए सर्वे में अप्रैल में चौंकानें वाला आंकड़ा सामने आया है। 

सिर्फ अप्रैल में 9862 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इनमें 2646 अतिकुपोषित श्रेणी में है, जबकि 7216 कुपोषित श्रेणी के निकले हैं। एनआरसी के स्टाफ की मानें तो इस बार कुपोषित बच्चों की संख्या बरखेड़ा और शहरी क्षेत्र में निकलकर आ रही है।

एनआरसी में आरबीएसके टीम के द्वारा भेजे जा रहे हैं। जहां उनका इलाज के साथ उन्हें पौष्टिक आहार दिया जा रहा है। एनआरसी की प्रभारी डॉ. नीता सक्सेना ने बताया कि 58 फीसदी नौनिहालों (6 से 23 माह के बच्चों) को पूरा आहार नहीं मिल पाता है। 94 फीसदी के भोजन में विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व मौजूद नहीं होते हैं। यही वजह है कि वह कुपोषित हो जाते हैं।    

जंक फूड और महिलाओं में जागरूकता की कमी बन रही वजह
- बदलते रहन सहन और फास्ट फूड के बढ़ते चलन से महिलाओं के शरीर में रक्त और आयरन की कमी बढ़ रही है। इससे अधिकतर महिलाओं को गर्भधारण में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यही नहीं गर्भधारण के बाद भी नवजात शिशु कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो अधिकतर महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करती है। जिस वजह से बच्चा कमजोर रह जाता है। 

मेडिकल कॉलेज की डॉ. नीता सक्सेना का कहना है कि महिलाएं जंक फूड का इस्तेमाल अधिक कर रही हैं। उन्हें और गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए कष्टकारी साबित होता है। जंक फूड खाने की वजह से महिलाओं में पेट संबधी बीमारी हो जाती है। इसलिए महिलाएं गर्भधारण से कम से कम तीन माह पहले विशेष रूप से अपने शरीर का ध्यान जरूर रखें। 

रक्त की कमी को पूरा करने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, दूध और दही रोजाना खाएं। वहीं गुड़, चने को भी अपने आहार में शामिल करें। शरीर के अंदर आयरन को अवशोषित करने के लिए रोजाना तुलसी के पत्ते को चबाएं और विटामिन सी लें। इससे शरीर के अंदर रक्त प्रवाह को गति मिलती है। बच्चे का जन्म होने के बाद नवजात को स्तनपान अवश्य कराएं। तभी एक बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ रह सकता है।

बीते साल की तुलना तेजी से बढ़ा कुपोषण का ग्राफ
बाल विकास एवं पुष्टाहार की ओर से कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों का सर्वे कराया जाता है। आरबीएसके की टीम आंगनबाड़ी केंद्रों पर पहुंचकर बच्चों का वजन और जांचें करती है। जिससे कुपोषित का पता लगाया जाता है। बीते सालों की तुलना इस साल कुपोषण तेजी से बढ़ा है। साल 2022 की बात करें तो जिले में अति कुपोषित बच्चों की संख्या 2200 रह गई थी। 

वहीं साल 2023 में 1400 से  1578 के बीच रह गया था। मगर अब विभाग की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल माह के सर्वे में ही 2646 बच्चे अतिकुपोषित मिले हैं। हालांकि विभाग का तर्क है कि प्रचंड गर्मी पड़ रही है इसलिए बच्चे निमोनिया और डायरिया के शिकार हो रहे हैं। जिस वजह से कुपोषण बढ़ा है। टीमें लगी हुई है सभी को आंगनबाड़ी केंद्र पर सरकार की ओर से मिलने वाली सुविधा दी जा रही है। ताकि उन्हें कुपोषण से मुक्त किया जा सके।

एनआरसी में भर्ती मरीजों का आंकड़ा
जनवरी- 09, फरवरी- 21, मार्च - 10, अप्रैल- 12, मई में 29 अप्रैल तक- 28

कुपोषित बच्चों के आहार
- तीन साल के बच्चे को 24 घंटे में 2 कप दूध, दो कटोरी दाल,
- 3-4 कटोरी मिक्स अनाज 6 से 8 बार खिलाना ठीक रहता है।
- बच्चों को साफ पानी ही देना चाहिए।
- कोई भी संक्रमण होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
- छह माह के बच्चों को मां के दूध के अलावा दो कटोरी मसला हुआ खाना दिनभर में थोड़-थोड़ा करके खिलाना चाहिए।
- आठ से दस महीनों के बच्चों को मां के दूध के अलावा तीन कटोरी प्रोटीन युक्त खाना दिनभर में खिला देना चाहिए।
- हर मौसम में विभिन्न मौसमी फलों या उनके रस को बच्चों को दें।

कुपोषण के लक्षण
- जन्म के समय दो किलो से कम वजन होना
- बच्चे में चिड़चिड़ापन और सुस्ती रहना
- बार-बार बीमारियों की चपेट में आना
- बच्चे में उम्र के साथ वजन न बढ़ना
- कई बच्चे ऐसे होते हैं, जो खाया पिया नहीं पचा पाते

अति कुपोषित और कुपोषित बच्चों का आंगनबाड़ी केंद्र पर लंबाई ऊंचाई के साथ वजन कराया जाता है। अगर कोई कमी मिलती है तो उसे एनआरसी में भर्ती कराते हैं। बच्चों की निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। अगर कोई बच्चा कुपोषित मिलता है तो आवश्यकतानुसार इलाज मुहैया कराया जाता है- युगल किशोर सांगुड़ी, जिला कार्यक्रम अधिकारी

एनआरसी में 10 बेड आरक्षित हैं। जहां अति कुपोषित बच्चों का इलाज किया जाता है। वर्तमान में बेड फुल चल रहे हैं। कुपोषित बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। जो बच्चे भर्ती है उनका इलाज कराया जा रहा है। किसी बच्चे या उसके परिवार को कोई दिक्कत नहीं होने दी जा रही है- डॉ. संजीव सक्सेना, सीएमएस पुरुष अस्पताल विंग मेडिकल कॉलेज

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