बचपन का सपना बॉक्स ऑफिस पर धमाल
गुजरात के एक बिल्डर भूपति साखिया के घर में पैदा हुए अंकित को बचपन से ही यह शौक पैदा हुआ कि बड़ा होकर फिल्म बनाऊंगा। घर वालों ने इस शौक का विरोध नहीं किया, लेकिन उसके सामने यह शर्त रखी कि अपनी शिक्षा पूरी करो, फिर जो चाहो करो। पिता चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बने। अंकित ने पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए पढ़ाई की और समय के साथ वह सिविल इंजीनियर बन गया। - शबाहत हुसैन विजेता
फिल्म बनाने पर हुआ मंथन
अंकित सिविल इंजीनियर बन तो गए,लेकिन उसके बाद बचपन की दबी इच्छा ने फिर जोर मारा। उसने कुछ शार्ट फिल्म बनाईं। वेब सीरीज पहला गुलजार का निर्देशन किया, लेकिन सपना तो फिल्म बनाने का था। जैसी सोच वैसे साथी। समय के साथ कारवां बनना शुरू हुआ। धीरे-धीरे 15 लड़के एक जैसी सोच के मिल गए। सभी फिल्म बनाना चाहते थे। फिल्म में क्या बनेगा यह किसी ने नहीं सोचा। सिर्फ यह दिमाग में रखा कि कुछ अलग बनाएंगे। सभी दोस्त साथ में बैठे।
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विषय पर खूब दिमाग लगाया। सोचा ऐसी फिल्म बनाएं, जिसमें भगवान आम आदमी जैसा नजर आए। श्रीमद्भागवत पढ़ी। कृष्ण का किरदार एक हीरो जैसा किरदार लगा। फिर कहानी पर काम शुरू हुआ। कहानी ऐसी जिसमें किसी भी मेहनतकश इंसान की मदद भगवान आम आदमी के रूप करता है। भगवान आता है, समझाता है, रास्ता दिखाता है, डांटता है, तारीफ करता है, उत्साह बढ़ाता है और सफलता के रास्ते पर ले जाता है।
पूरा हुआ बचपन का सपना
कहानी तैयार हो गई। सभी दोस्तों ने पैसा जुटाया। एक दोस्त के फार्म हाउस पर शूटिंग शुरू हुई। अपनी कोशिशों से अच्छा कैमरामैन जुटाया। कुछ बाहर की लोकेशन भी देखीं। रास्ता धीरे-धीरे मंजिल की तरफ बढ़ चला। फिल्म लालो शूट हो गई। लालो यानी लड्डू गोपाल। 50 लाख रुपये खर्च हो गए थे। सपना बगैर धुली रील में बंद था। रील धुलवाकर सपने का सच देखना था। फिर से पैसा जुटाने की कोशिशें शुरू हुईं। सभी दोस्तों ने पैसा जुटाया। कहीं से लोन नहीं लिया। 60 लाख रुपये और खर्च हुए। एक करोड़ 10 लाख रुपये का जुआ खेलने के बाद 600 सिनेमाघरों में एक साथ अपने सपनों की फिल्म लालो रिलीज कर दी। रिलीज होते ही फिल्म ने कमाल कर दिया। 9 जनवरी 2026 को रिलीज हुई फिल्म ने 14 जनवरी तक 120 करोड़ रुपये कमा लिये। बचपन का सपना इस तरह से पूरा होगा अंकित ने सोचा नहीं था। बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने के बाद सभी दोस्त मथुरा में कृष्ण जी का शुक्रिया अदा करने गये। वहां से वापसी में लखनऊ आए।
अंकित की जुबानी
उत्साह से भरे अंकित साखिया बताते हैं कि जिंदगी की कोई भी कोशिश बेकार नहीं जाती है। पिताजी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई थी ताकि उनके बिल्डर के बिजनेस में इजाफा हो जाए, लेकिन मैंने फिल्मों का रुख किया तो यहां भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई काम आई। इंजीनियरिंग में सीखा मेजरमेंट फिल्मों में काम आया। जुगाड़ की तकनीक इंजीनियरिंग से सीखी। इसके अलाबा सामने वाले को समझने की कोशिश और सभी को सुनने की आदत ने सफलता दिलाने में मदद की।
अंकित से जब यह पूछा कि अपना सपना पूरा करने के लिए एक करोड़ 10 लाख रुपये का जुआ खेला था, अगर फिल्म फ्लाप हो जाती तो सपने का क्या होता। वो बोले कि फिल्म फेल हो जाती तो दूसरी फिल्म बनाता, दूसरी फेल हो जाती तो तीसरी बनाता, यह तो जर्नी है, रास्ता तो रिस्क वाला ही है, पैसा कमाना तो मकसद था भी नहीं, अब पैसा कमा लिया है, तो लगता है कि हमने कृष्ण को नहीं चुना, कृष्ण ने ही हमें इस काम के लिए चुना था।
उत्साह से भरे अंकित बताते हैं कि फिल्म में आपको सौराष्ट्र दिखेगा, खूबसूरत लोकेशन और खूबसूरत सोच दिखेगी। सफलता मिली है, तो शांत रहने का फन सीख रहा हूं, जो हासिल हुआ है उसे मेहनत का प्रसाद मान रहा हूं। पहचान बढ़ी है, तो इसमें बढ़ी हुई जिम्मेदारी भी देख पा रहा हूं। मैं पैसे वाले घर में पैदा हुआ हूं, लेकिन अपने शौक के पैसे खुद कमाए हैं। अपनी जरूरतों के लिए प्री वेडिंग शूट से शुरुआत की थी। लोगों की शादियों के वीडियो बनाये थे। फिल्म को सफलता मिली है, तो यह एक टीम की सफलता है। टीम को जोड़े रखना है और आगे बढ़ते जाना है।
