विचारधीन कैदी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है: उच्च न्यायालय

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नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी के आरोपी एक व्यक्ति को जमानत देते हुए कहा कि एक विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है और जेल का उद्देश्य दंडात्मक या निवारक नहीं है।

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न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि आरोपी के खिलाफ जिस अपराध का आरोप लगाया गया है उसके लिए अधिकतम सात साल की कैद की सजा। अदालत ने कहा कि दो साल जेल में बिता चुके इस आरोपी को सुनवाई में लगने वाले पूरे समय को जेल में बिताने के लिए नहीं कहा जा सकता खासकर तब जब सुनवाई के पूरा होने में काफी समय लगने की संभावना हो।

अदालत ने कहा कि आरोपी को और समय तक जेल में रखना उसे उसके रक्षा के अधिकार से वंचित कर देगा। न्यायाधीश ने कहा कि जेल का मकसद सुनवाई के दौरान उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना है न कि यह दंडात्मक और निरोधक है।

अदालत ने कहा कि किसी को उसकी आजादी से वंचित करना एक दंड माना गया है। आरोपी को कथित अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता के तहत धोखाधड़ी और सूचना तकनीकी कानून के तहत दर्ज प्राथिमकी के तहत गिरफ्तार किया गया था।

प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि आरोपी व्यक्तियों ने बेईमानी की मंशा से कुछ सालों से खत्म हो चुकी बीमा पॉलिसी पर बोनस राशि और इंश्योरेंस ग्रैच्युटी देने के बहाने एक व्यक्ति को दिये गये बैंक खाते में 39 लाख रुपये जमा कराने के लिए प्रेरित किया था।

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