संपादकीय: विवादों का विश्वकप

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Published By Monis Khan
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पाकिस्तान का कहना है कि वह बांग्लादेश के समर्थन और भारत के विरोध में काली पट्टी बांधकर मैदान में उतरेगा। भारत के खिलाफ मैच का बहिष्कार करेगा। यदि विश्व कप के मैच राजनीतिक बहिष्कार, काली पट्टियों या प्रतीकात्मक विरोधों के बीच खेले जाएं, तो प्रतिस्पर्धा की पवित्रता प्रभावित होगी।

दर्शक खेल कौशल देखना चाहते हैं, न कि सियासी संदेश। आईसीसी के नियम साफ हैं, मैदान राजनीतिक प्रदर्शनों का स्थल नहीं। अतीत में इस तरह की कोशिशों पर जुर्माना और प्रतिबंध लगाए गए हैं। यदि आईसीसी ऐसे कदमों की अनुमति देती है, तो भविष्य में हर विवादित मुद्दा मैदान तक पहुंच जाएगा। खेल का मैदान प्रतीकात्मक विरोध का मंच बना जाएगा। 

पाकिस्तान भारत के खिलाफ मैदान में न उतरकर विरोध दर्ज कराता है, तो यह केवल एक मैच का बहिष्कार नहीं होगा, यह पूरे टूर्नामेंट की संरचना और विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लगाएगा। विश्व कप द्विपक्षीय श्रृंखला नहीं, बल्कि बहुपक्षीय आयोजन है। इसमें भाग लेना नियमों की स्वीकृति के साथ होता है। यदि कोई टीम चुनिंदा मैच खेले और चुनिंदा का बहिष्कार करे तो प्रतियोगिता की निष्पक्षता समाप्त हो जाएगी। 

यदि पाकिस्तान भारत से नहीं खेलता, तो अंक गंवाने से उसका सेमीफाइनल या खिताब जीतने का रास्ता कठिन होगा। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उसका प्राथमिक उद्देश्य प्रतिस्पर्धा है या राजनीतिक संदेश? फिर भी वह औपचारिक रूप से टूर्नामेंट से बाहर होने की घोषणा नहीं करना चाहता, क्योंकि ऐसा करने पर आर्थिक दंड, प्रसारण राजस्व में कटौती और प्रायोजन हानि का भारी जोखिम है। पीसीबी और उसके खिलाड़ियों को विश्व कप से प्रतिष्ठा के अलावा भपूर पैसा भी मिलता है। 

बहिष्कार की स्थिति में खिलाड़ियों की मैच फीस, आईसीसी राजस्व हिस्सेदारी और भविष्य की द्विपक्षीय श्रृंखलाओं पर असर पड़ सकता है, जो तात्कालिक ही नहीं, दीर्घकालिक भी नुकसानदेह होगा। क्रिकेट कूटनीति ने भारत-पाकिस्तान के बीच 1987 की ‘क्रिकेट डिप्लोमेसी’ से लेकर 2004 की ऐतिहासिक श्रृंखला तक, कई बार संवाद के दरवाज़े खोले हैं, लेकिन इस बार टी20 विश्व कप 2026 के संदर्भ में जो घटनाक्रम सामने है, वह उलटी दिशा का संकेत दे रहे हैं। 

यहां क्रिकेट संवाद का माध्यम बनने के बजाय राजनीतिक संदेशों का मंच बनता दिख रहा है। पाकिस्तान की रणनीति का संदेश घरेलू राजनीतिक दबाव के परिणाम स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को घेरने की कोशिश है? वस्तुतः वैश्विक स्तर पर भारत की छवि पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय खेल समुदाय नियम-आधारित व्यवस्था को महत्व देता है। यदि कोई बोर्ड राजनीतिक कारणों से अनुबंधित दायित्वों का पालन नहीं करता, तो प्रश्न उसी पर उठेंगे।

फिलहाल, आईसीसी को इस मामले में सख्त रुख अपनाना चाहिए, वह या तो सभी के लिए सभी मैच खेलना अनिवार्य करे या अनुपालन न करने वाली टीम को बाहर कर दे, यह शर्त टूर्नामेंट की साख के लिए आवश्यक है। इस विवाद का समाधान यही है कि खेल संस्थाएं स्पष्ट आचार संहिता लागू करें। राजनीतिक प्रतीकों और बहिष्कार को अस्वीकार्य घोषित करें।