जंगल की दुनिया : मंदारिन बत्तख, पंखों पर उतरती वसंत ऋतु

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Published By Anjali Singh
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वसंत और ग्रीष्म ऋ तु के आगमन के साथ ही प्रकृति मानो अपने सबसे चमकदार रंगों में सज उठती है और इसी रंगीन उत्सव का जीवंत प्रतीक है मंदारिन बत्तख। प्रजनन काल में नर मंदारिन बत्तख के पंख असाधारण रूप से आकर्षक हो जाते हैं। लाल, नारंगी, नीले, हरे और सफेद रंगों का अनूठा संयोजन इसे दूर से ही पहचानने योग्य बना देता है। इसकी सजीली कलगी, पंखों की विशिष्ट बनावट और चमकदार चोंच इसे दुनिया की सबसे सुंदर बत्तखों में स्थान दिलाती है। इसके विपरीत मादा मंदारिन अपेक्षाकृत साधारण होती है। उसके भूरे रंग के पंख और सादी चोंच उसे प्राकृतिक वातावरण में छिपने में मदद करते हैं, जो प्रजनन और सुरक्षा की दृष्टि से उपयोगी है।

प्रजनन काल समाप्त होते ही नर मंदारिन के रंग भी फीके पड़ जाते हैं। उसके पंख भूरे और धूसर रंग के हो जाते हैं, जिससे वह मादा के समान दिखाई देने लगता है। यह परिवर्तन प्रकृति की उस व्यवस्था को दर्शाता है, जहां सौंदर्य केवल आकर्षण का माध्यम नहीं, बल्कि अस्तित्व और संतुलन का हिस्सा भी है। मंदारिन बत्तख का वैज्ञानिक नाम ऐक्स गैलेरिकुलता (Aix galericulata) है। इसकी पहचान सबसे पहले वर्ष 1758 में स्वीडिश वनस्पतिशास्त्री, चिकित्सक और प्राणी विज्ञानी कार्ल लिनिअस ने की थी। अपने अद्वितीय रंगों और सीमित प्राकृतिक खतरों के कारण इसे अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ‘संकट मुक्त’ श्रेणी में रखा गया है। 

सामान्यतः मंदारिन बत्तखें रूस, कोरिया, जापान और चीन के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में प्रजनन करती हैं। समय के साथ इनका विस्तार पश्चिमी यूरोप और अमेरिका तक भी देखा गया है। भारत में इसका पहला रिकॉर्ड वर्ष 1902 में असम के तिनसुकिया जिले के रोंगगोरा क्षेत्र में, डिब्रू नदी के तट पर दर्ज किया गया था। चीन और जापान की मूल निवासी मंदारिन बत्तख न केवल जैव विविधता का अद्भुत उदाहरण है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। नर मंदारिन के मनोहारी रंगों ने सदियों से कलाकारों को प्रेरित किया है, जिसके कारण यह प्राच्य कला और चित्रकला में सौंदर्य, प्रेम और सौभाग्य के प्रतीक के रूप में व्यापक रूप से चित्रित होती रही है।