कैंपस का पहला दिन: एक दिन, जो उम्र भर साथ चला

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

कॉलेज जीवन की उन यादों में शामिल है, जो समय बीतने के साथ और भी अधिक चमकदार हो जाती हैं। कॉलेज के पहले दिन स्वयं को किसी रियासत का राजकुमार समझते हुए जब बरेली कॉलेज, बरेली की अंग्रेज़ी शासनकाल की विशाल और भव्य इमारत के भीतर प्रवेश किया, तो मन में एक अद्भुत रोमांच भर उठा। ऊंची छतें, लंबे बरामदे और इतिहास की गवाही देती दीवारें मानो नए सपनों का स्वागत कर रही थीं।

विद्यालय के अनुशासित, सीमित और नियमबद्ध वातावरण से निकलकर महाविद्यालय के खुले, उन्मुक्त माहौल में कदम रखते ही लगा कि जीवन ने जैसे नई उड़ान भरने का अवसर दे दिया हो। बिना किसी यूनिफॉर्म के छात्र-छात्राओं की टोलियां परिसर में इधर-उधर घूम रही थीं। कहीं हंसी-ठिठोली थी, कहीं नए परिचयों की झिझक और कहीं भविष्य के सपनों की हलचल। उस क्षण यह एहसास गहराई से हुआ कि जीवन वास्तव में आज ही से शुरू हुआ है।

इसी दौरान कॉलेज के फीस काउंटर के पास एक बुजुर्ग मिले, जो मेरे बड़े भाई को जानते थे। उन्होंने स्नेह से पूछ लिया, “तुम उनके भाई हो?” यही एक छोटा-सा संवाद आगे चलकर गहरी मित्रता की नींव बन गया। अगले कुछ ही मिनटों में अपनापन इतना बढ़ गया कि वह रिश्ता वर्षों तक परम मित्रता में बदल गया और आज भी हम एक-दूसरे के परिवार में बेटे की तरह जुड़े हुए हैं।

अभी इस आत्मीयता की गर्माहट मन में थी कि कुछ सीनियर छात्रों के समूह ने हमें रोक लिया। वे हमें कॉलेज की कैंटीन में ले गए, जहां हल्के-फुल्के सवाल-जवाब हुए और परिचय के नाम पर कोई न कोई गतिविधि करने को कहा गया, किसी से गाना, किसी से नाच, तो किसी से चुटकुला। जब मेरी बारी आई और मैंने चुटकुला सुनाया, तो पूरा वातावरण हंसी के ठहाकों से गूंज उठा। प्रसन्न होकर सीनियर छात्रों ने सभी को जलपान भी कराया। तब तक शाम ढल चुकी थी। महाविद्यालय का वह पहला दिन मेरी स्मृतियों में सदा के लिए अंकित हो गया। आज भी जब उस दिन को याद करता हूं, तो अतीत की वे तस्वीरें मन में ताज़ा हो जाती हैं और होंठों पर अनायास ही मुस्कान बिखर जाती है।-धर्मेंद्र सिंह चौहान, हल्द्वानी

संबंधित समाचार