Bareilly : ट्रैवल एजेंट की मौत के बाद गाड़ी ट्रांसफर की पोल खुलने पर हड़कंप

Amrit Vichar Network
Published By Pradeep Kumar
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एडीजी के आदेश पर ट्रैवल एजेंट की पत्नी ने देवर और अज्ञात परिवहन कर्मियों पर के खिलाफ दर्ज कराई है एफआईआर

बरेली, अमृत विचार। संभागीय परिवहन कार्यालय का यह हाल है कि यहां नियमों की नहीं, बल्कि दलालों की चलती है। ताजा मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां एक ट्रैवल एजेंट की मौत के पूरे एक साल बाद उसकी कार उसके भाई के नाम ट्रांसफर कर दी गई। न किसी को मौत दिखी, न दस्तावेजों की जांच जरूरी समझी गई। बस फाइल चली, दस्तखत हुए और गाड़ी ट्रांसफर हो गई। जैसे यह कोई सामान्य औपचारिकता हो। एडीजी के आदेश पर जब बुधवार को कैंट थाने में ट्रैवल एजेंट के भाई और परिवहन विभाग के अज्ञात कर्मियों पर रिपोर्ट दर्ज हुई तो आरटीओ कार्यालय में हड़कंप मचा है। यह मामला सिर्फ गाड़ी ट्रांसफर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोल रहा है।

यह घटनाक्रम पांच साल पुराना है, इसलिए पटल सहायक से लेकर तत्कालीन एआरटीओ तक की भूमिका संदिग्ध है। आरटीओ कार्यालय के बाहर खुलेआम बैठे दलाल हर काम की गारंटी देते हैं-चाहे वह गाड़ी ट्रांसफर हो, परमिट हो या लाइसेंस। अधिकारी सिर्फ हस्ताक्षर करने तक सीमित रह जाते हैं, मानो नियमों से उनका कोई लेना-देना ही न हो। इस प्रकरण में मुकदमा दर्ज होने के बाद विडंबना यह है कि विभागीय अधिकारी इसे पुराने अधिकारियों और कर्मचारियों की करतूत बताकर खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि अगर मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो सिर्फ बाबू ही नहीं, बल्कि तत्कालीन एआरटीओ और जिम्मेदार अफसरों तक आंच आना तय है। फिलहाल आरटीओ में हालात यही है-यहां सब चलता है, बस नियम नहीं चलते।

यह है मौत के बाद गाड़ी ट्रांसफर का नियम
मोटर वाहन अधिनियम के तहत किसी वाहन स्वामी की मृत्यु के बाद गाड़ी का ट्रांसफर तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है। नियमों के मुताबिक, वाहन मालिक की मृत्यु होने पर उसके कानूनी उत्तराधिकारी को निर्धारित समय के भीतर आरटीओ में आवेदन देना होता है। इसके लिए मृत्यु प्रमाण-पत्र, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र या सक्षम न्यायालय की ओर से जारी वारिसान प्रमाण-पत्र, वाहन के मूल दस्तावेज, बीमा और पहचान संबंधी कागजात अनिवार्य होते हैं। यदि एक से अधिक उत्तराधिकारी हों, तो सभी की सहमति जरूरी मानी जाती है। बिना इन दस्तावेजों के न तो स्वामित्व बदला जा सकता है और न ही वाहन का वैध ट्रांसफर संभव है। नियम यह भी कहते हैं कि आरटीओ स्तर पर दस्तावेजों का सत्यापन किया जाना अनिवार्य है। किसी भी प्रकार की शिथिलता, आंख मूंदकर हस्ताक्षर या अपूर्ण जांच न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। यही वजह है कि नियमों की अनदेखी कर किया गया ट्रांसफर सीधे तौर पर फर्जीवाड़ा माना जाता है।

फर्जी ट्रांसफर पर एआरटीओ की अजीब दलील
एआरटीओ प्रशासन डा. पीके सरोज का कार ट्रांसफर फर्जीवाड़े पर तर्क सिस्टम की लापरवाही पर तंज बनकर खड़ा हो गया है। उनका कहना है कि मामला संज्ञान में आते ही गाड़ी को काली सूची में डाल दिया गया है, जिससे जांच पूरी होने तक आगे कोई ट्रांसफर नहीं हो सकेगा। साथ ही इसे पारिवारिक विवाद से जुड़ा बताते हुए यह दलील भी दी गई कि संभव है ट्रैवल एजेंट और उसके भाई की शक्ल आपस में मिलती-जुलती हो, इसलिए वाहन सीन करते समय गंभीरता से पकड़ नहीं हो सकी। सवाल यह है कि क्या परिवहन विभाग में पहचान दस्तावेजों की जगह शक्ल-सूरत से काम होता है? ''शक्ल मिलना'' जैसी दलीलें यह साफ कर रही हैं कि नियम नहीं, बहाने सिस्टम चला रहे हैं। विवेचक के आने पर सहयोग का दावा भी महज औपचारिकता लगता है।

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