ढाका से चुना गया पहला हिंदू सांसद: बीएनपी नेतृत्व से भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की उम्मीद
दिल्ली। बांग्लादेश के 13वें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव में शुक्रवार को अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के वरिष्ठ बीएनपी नेता गायेश्वर चंद्र रॉय ने ढाका सीट से जीत हासिल की। सरकारी समाचार एजेंसी 'बीएसएस' की खबर के अनुसार, रॉय ने ढाका-3 सीट पर 99,163 मत हासिल कर जमात-ए-इस्लामी के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी मोहम्मद शाहिनुर इस्लाम को हराया। देश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के सदस्यों के कथित उत्पीड़न की पृष्ठभूमि में पूर्व मंत्री की ढाका सीट से जीत हुई है। दिसंबर में युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद से इस समुदाय को कई हमलों का सामना करना पड़ा है, जिनमें से कुछ घातक भी रहे हैं।
ढाका निर्वाचन क्षेत्र से बीएनपी के हिंदू नेता की जीत
भारत बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हो रहे हमलों को लेकर चिंता व्यक्त करता रहा है। इसके अलावा, कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी द्वारा मैदान में उतारे गये एकमात्र हिंदू उम्मीदवार को खुलना-1 निर्वाचन क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा।
इस चुनावी मुकाबले में कृष्णा नंदी को 70,346 मत मिले, जबकि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के उम्मीदवार आमिर एजाज खान को 1,21,352 मत मिले। बांग्लादेश में 13वें संसदीय चुनाव में एक ऐसी सरकार का चुनाव होगा, जो मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की जगह लेगी। बीएनपी संसदीय चुनावों में व्यापक जीत की ओर बढ़ रही है और दो दशकों के अंतराल के बाद सत्ता में वापसी करने जा रही है।
बांग्लादेश के राष्ट्रीय चुनावों में जीत के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक रहमान को शुक्रवार सुबह बधाई देने वाले भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पड़ोसी नेता के साथ संबंध विकसित करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर प्रयास कर सकते हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार के साथ भारत की असहजता जगजाहिर रही है।
संबंध तब और निचले स्तर पर पहुंच गए थे जब यह संदेह जताया गया था कि वर्तमान शासन ने बांग्लादेश में भारतीय मिशनों के बाहर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए थे, जिनमें हमले की घटनाएं भी शामिल थीं। हालांकि, विश्लेषकों को तुरंत बहुत अधिक आत्मीयता बढ़ने की उम्मीद नहीं है, बल्कि वे एक नपे-तुले और व्यवस्थित दृष्टिकोण की आशा करते हैं। वहीं रहमान द्वारा भारत के साथ संबंधों को सुधारने में बहुत तेजी दिखाने की भी संभावना कम है।
बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भारत-विरोधी भावना लंबे समय से एक शक्तिशाली राजनीतिक हथियार रही है। भारत के साथ बहुत अधिक उत्सुकता दिखाने की किसी भी धारणा से उनके राजनीतिक विरोधियों को हथियार मिल सकता है, जो नयी सरकार को राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने वाली सरकार के रूप में चित्रित करने की कोशिश करेंगे। नतीजतन, दो सबसे संवेदनशील द्विपक्षीय मुद्दों, व्यापार और नदी जल बंटवारे, पर स्थिर प्रगति होने की उम्मीद है।
बांग्लादेश ने लगातार बाजार तक व्यापक पहुंच और लंबे समय से लंबित जल-बंटवारा समझौतों के समाधान की मांग की है। भारत अपनी ओर से सुरक्षा सहयोग और क्षेत्रीय रणनीतिक तालमेल के बारे में चिंतित रहता है। एक प्रमुख बांग्लादेश बुद्धिजीवी और संपादक ज़फ़र शोभन का तर्क है कि आने वाली बीएनपी सरकार के सामने विदेश नीति के पुनर्गठन के अलावा भी कई चुनौतियां हैं। वह कहते हैं, "भारत के साथ संबंध निश्चित रूप से उनमें से एक है, लेकिन यह कई बड़ी परीक्षाओं में से केवल एक है।"
दूसरी बड़ी चुनौती अवामी लीग के राजनीतिक भविष्य को संभालना होगा। बीएनपी ने लंबे समय से अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पर प्रतिबंधों की मांग की है। हालांकि, पूरी तरह से राजनीतिक बहिष्करण में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोखिम हैं। राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक साख बनाए रखने के लिए अंततः कुछ हद तक सामंजस्य आवश्यक साबित हो सकता है। सबसे संवेदनशील मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से जुड़ा है।
हसीना को बांग्लादेश वापस लाना राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो सकता है। इससे घरेलू तनाव बढ़ सकता है, लोग सड़कों पर उतर सकते हैं और ढाका की आंतरिक राजनीति इस हद तक जटिल हो सकती है कि सरकार में अचानक बदलाव की स्थिति बन जाए। इतना ही नहीं, इससे भारत के साथ संबंध भी जटिल हो सकते हैं, जहां वह वर्तमान में रह रही हैं। इसके साथ ही बीएनपी राजनीतिक रूप से कमजोर दिखे बिना खुले तौर पर भारत में उनके निरंतर प्रवास की वकालत भी नहीं कर सकती है।
इसलिए नयी सरकार के लिए, हसीना को विदेश में ही रहने देना सबसे कम अस्थिरता वाला विकल्प हो सकता है और उनकी वापसी की पुरानी यूनुस सरकार की मांग के प्रति औपचारिक सहानुभूति जताई जाती रहे। आने वाले हफ्तों में बीएनपी की राजनीतिक कुशलता की परीक्षा होगी। उसे घरेलू मतदाताओं को आश्वस्त करना होगा, एक ध्रुवीकृत राजनीतिक परिदृश्य को स्थिर करना होगा और विनम्र दिखे बिना भारत के साथ संबंधों को फिर से व्यवस्थित करना होगा।
ढाका में चर्चा है कि अंतरिम सरकार के कई शीर्ष सलाहकार बंगलादेश छोड़ देंगे, जबकि अन्य यहीं रुककर विश्वविद्यालय शिक्षक, मीडियाकर्मी या एनजीओ कार्यकर्ता के रूप में अपने पेशों में वापस लौट जाएंगे। विधि सलाहकार आसिफ नजरुल शोध कार्य में वापस जाना चाहते हैं। विदेश सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन लेखन पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, जबकि खाद्य और भूमि सलाहकार अली इमाम मजूमदार फिर से स्तंभकार बन जाएंगे। यूनुस की कैबिनेट की दो महिलाएं अपने एनजीओ में वापस जाना चाहती हैं। समाज कल्याण सलाहकार शरमीन एस. मुर्शिद मानवाधिकार मुद्दों पर काम करने के लिए अपने एनजीओ 'ब्रती' में लौटने की संभावना रखती हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन सलाहकार सैयदा रिज़वाना हसन अपने कानूनी एनजीओ 'बेला' में लौट जायेंगी।
