मिस्र में मिले शैलचित्र का भारतीय संदर्भ में महत्व

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Published By Anjali Singh
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मिस्र के दक्षिणी सिनाई स्थित उम्म अरक पठार पर लगभग 10,000 वर्ष पुराने शैलचित्रों की खोज ने प्रागैतिहासिक कला के वैश्विक इतिहास को नए सिरे से देखने का अवसर दिया है। देखा जाए तो यह हालिया पुरातात्विक खोज केवल मिस्र की सांस्कृतिक धरोहर का विस्तार नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के आरंभिक कलात्मक बोध की एक साझा विरासत की ओर संकेत करती है। भारतीय संदर्भ में देखें तो यह खोज विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो उठती है, क्योंकि भारत में भी शैलकला की समृद्ध और प्राचीन परंपरा विद्यमान है। 

भारत में मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रय विश्वप्रसिद्ध प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का केंद्र है, जिन्हें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है। भीमबेटका की गुफाओं में मानव आकृतियां, शिकार के दृश्य, पशु-पक्षियों की छवियां और सामुदायिक जीवन के संकेत मिलते हैं। आश्चर्यजनक रूप से उम्म अरक के शैलचित्रों में भी समान प्रकार की विषयवस्तु- शिकार, पशु आकृतियां और प्रतीकात्मक चिह्न दिखाई देते हैं। यह समानता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में रहते हुए भी प्रारंभिक मानव समुदायों की संवेदनाएं और अभिव्यक्तियां कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं।

उम्म अरक के चित्रों में जंगली पशुओं और मानव समूहों के दृश्य उस समय की पर्यावरणीय और सामाजिक संरचना का संकेत देते हैं। इसी प्रकार भीमबेटका तथा भारत के अन्य शैलचित्र स्थलों में भी सामुदायिक गतिविधियों, अनुष्ठानों और प्रकृति से गहरे संबंध का बोध मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शैलकला केवल सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि यह जीवनयापन, आस्था और सामाजिक संगठन का दस्तावेज भी थी। भारतीय परिप्रेक्ष्य में शैलचित्रों को केवल ‘कला’ के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति के रूप में भी देखा जाता है। वे उस समय के मनुष्य के मानस, उसकी आशंकाओं, आकांक्षाओं और आध्यात्मिक अनुभवों का दृश्य लेखा हैं। मिस्र के उम्म अरक की खोज इस वैश्विक मान्यता को पुष्ट करती है कि मानव रचनात्मकता की जड़ें अत्यंत प्राचीन और सार्वभौमिक हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु जलवायु और पर्यावरणीय परिवर्तन का है। उम्म अरक के चित्र संकेत देते हैं कि दक्षिणी सिनाई क्षेत्र कभी अधिक हरित और जीवनोपयोगी रहा होगा। इसी प्रकार भारत के कई शैलचित्र स्थल भी ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां आज का पर्यावरण अतीत की तुलना में बिल्कुल भिन्न है। इस प्रकार शैलचित्र केवल कला-इतिहास नहीं, बल्कि पर्यावरणीय इतिहास के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
    
भारतीय कला-दर्शन की दृष्टि से यदि देखें तो ‘मंडल’, ‘चक्र’ और ‘सृष्टि-चेतना’ जैसे प्रतीक, जो बाद की सभ्यताओं में विकसित हुए, उनकी आदिम जड़ें भी संभवतः इन्हीं प्रारंभिक प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों में निहित रही होंगी। दरअसल शैलचित्रों की वृत्तात्मक रचनाएं और समूह-आकृतियां सामूहिकता और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की प्रारंभिक समझ का संकेत देती हैं। उम्म अरक की यह खोज भारत सहित विश्व के अन्य प्रागैतिहासिक स्थलों के तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। इससे यह समझ विकसित होती है कि मानव सभ्यता का विकास किसी एक भूभाग की कहानी नहीं, बल्कि एक साझा मानवीय यात्रा है।

अतः मिस्र के दक्षिणी सिनाई में मिले ये 10,000 वर्ष पुराने शैलचित्र भारतीय शैलकला की परंपरा के साथ संवाद स्थापित करते हैं। हमें यह स्मरण कराते हैं कि मानवता की सांस्कृतिक स्मृति सीमाओं से परे हैं। ऐसे में चाहे वह सिनाई का पठार हो या भीमबेटका की गुफाएं, कला मनुष्य की सार्वभौमिक भाषा रही है, जो समय, भूगोल और संस्कृतियों को जोड़ती है।-सुमन कुमार सिंह, कलाकार/कला लेखक

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