पौराणिक कथा: सुदामा और श्रीकृष्ण की माया

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Published By Anjali Singh
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एक बार सुदामा ने श्रीकृष्ण से जिज्ञासावश पूछा, “कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूँ। माया वास्तव में होती कैसी है?” श्रीकृष्ण यह प्रश्न टालना चाहते थे, पर सुदामा की जिद के आगे मुस्कराते हुए बोले, “अच्छा, समय आने पर तुम्हें स्वयं दिखा दूंगा।” एक दिन कृष्ण ने कहा, “सुदामा, आओ, गोमती में स्नान करने चलें।” दोनों गोमती नदी के तट पर पहुँचे, वस्त्र उतारकर जल में उतरे। कुछ ही क्षणों में श्रीकृष्ण स्नान कर तट पर लौट आए और अपना पीतांबर पहनने लगे। सुदामा ने सोचा—मैं भी एक डुबकी और लगा लेता हूँ। जैसे ही उसने डुबकी लगाई, भगवान ने उसे अपनी माया के दर्शन करा दिए। 

सुदामा को लगा कि गोमती में अचानक बाढ़ आ गई है और वह बहता जा रहा है। किसी तरह वह एक घाट के पास रुका और बाहर निकला। चारों ओर एक अनजान नगरी थी। वह आगे बढ़ा तो देखा—एक हथिनी आई और उसके गले में फूलों की माला डाल गई। लोग इकट्ठे हो गए और बोले, “हमारे राजा का देहांत हो गया है। परंपरा है कि हथिनी जिसके गले में माला डाल दे, वही राजा होता है। अब आप हमारे राजा हैं।”
   
सुदामा आश्चर्यचकित रह गया। उसका राजतिलक हुआ, राजकन्या से विवाह हुआ और समय के साथ उसके दो पुत्र भी हुए। जीवन सुख से चल रहा था कि एक दिन उसकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार पड़ी और अंततः चल बसी। सुदामा शोक में डूब गया। तभी लोगों ने कहा, “मायापुरी का नियम है- राजा को अपनी रानी के साथ चिता में प्रवेश करना होता है।”

यह सुनते ही सुदामा घबरा गया। उसे लगा- मेरी तो मृत्यु नहीं हुई, फिर मैं क्यों जलूं? अब उसे पत्नी का शोक भूलकर अपनी ही चिंता सताने लगी। उसने कहा, “मैं इस नगरी का निवासी नहीं हूं।” पर कोई नहीं माना। अंत में उसने विनती की- “मृत्यु से पहले मुझे स्नान करने दो।” पहरे के साथ उसे नदी तक ले जाया गया। डर से कांपते हुए सुदामा ने जैसे ही जल में डुबकी लगाई और बाहर आया- मायानगरी लुप्त थी। सामने वही गोमती तट था और श्रीकृष्ण अभी भी पीतांबर पहन रहे थे। सुदामा फूट-फूट कर रोने लगा।

श्रीकृष्ण ने अनजान बनते हुए पूछा, “सुदामा, क्यों रो रहे हो?” सुदामा बोला, “प्रभु, जो मैंने देखा- वह सत्य था या यह?” कृष्ण मुस्कराए-“जो देखा, भोगा वह माया थी, स्वप्न था। सत्य तो मैं हूं। माया अज्ञान है, आत्म-विस्मरण है। जो मुझे जान लेता है, उसे माया बांध नहीं पाती।” सुदामा समझ गया और जो समझ गया, वह श्रीकृष्ण से भिन्न कैसे रह सकता है।

 

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