अंतरिक्ष में वायरस और बैक्टीरिया की जंग

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Published By Anjali Singh
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एक नए अध्ययन में पाया गया कि पृथ्वी पर रहने वाले बैक्टीरिया-संक्रमित करने वाले वायरस अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन की लगभग वज़न-रहित ‘माइक्रोग्रैविटी’ स्थिति में भी अपने ई. कोलाई होस्ट को संक्रमित करने में सफल रहे, लेकिन वायरस-बैक्टीरिया की आपसी लड़ाई पृथ्वी से काफी अलग थी।

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अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन के फिल हस और उनके साथियों के नतीजे बीती 13 जनवरी, 2026 को ओपन-एक्सेस जर्नल ‘एलओएस बायोलॉजी’ में प्रकाशित हुए। एक प्रयोग के दौरान जब वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस को अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर भेजा, तो ये सूक्ष्म जीव पृथ्वी पर जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा नहीं किया।

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माइक्रोग्रैविटी (कम गुरुत्वाकर्षण) में संक्रमण तो हुआ, लेकिन समय के साथ वायरस और बैक्टीरिया दोनों ही अलग-अलग तरीके से विकसित हुए। जेनेटिक बदलाव आए, जिनसे वायरस बैक्टीरिया से चिपकने का तरीका बदल गया और बैक्टीरिया ने खुद को बचाने के नए हथियार विकसित कर लिए। ये खोज फेज थेरेपी (वायरस से बैक्टीरिया को मारने की तकनीक) को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, खासकर दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों के खिलाफ।- डॉ. इरफान ह्यूमन

एक पृथ्वी, तो दूसरा अंतरिक्ष में

फेज यानी वो वायरस जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं और उनके होस्ट के बीच की लड़ाई सूक्ष्मजीवीय पारिस्थितिकी (माइक्रोबियल इकोसिस्टम) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसे अक्सर एक ‘एवोल्यूशनरी आर्म्स रेस’ (विकास की हथियार दौड़) कहा जाता है, जहां बैक्टीरिया वायरस से बचने के लिए डिफेंस सिस्टम बनाते हैं और वायरस उन डिफेंस को तोड़ने के नए तरीके ईजाद करते हैं। पृथ्वी पर इस लड़ाई का अध्ययन हो चुका है, लेकिन माइक्रोग्रैविटी बैक्टीरिया की फिजियोलॉजी (शरीर क्रिया) और वायरस-बैक्टीरिया के टकराव की भौतिकी को बदल देती है, जिससे सामान्य इंटरैक्शन बिगड़ जाते हैं, अब पता चला है। फिर भी, माइक्रोग्रैविटी में फेज-बैक्टीरिया की डायनामिक्स पर बहुत कम अध्ययन हुए हैं। इस कमी को दूर करने के लिए हस और उनके साथियों ने दो सेट बैक्टीरियल ई. कोलाई सैंपल्स लिए, जिनमें टी-7 नाम का फेज संक्रमित किया गया, एक सेट पृथ्वी पर रखा और दूसरा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर।

संक्रमण की गति में बदलाव 

शुरुआत में संक्रमण धीमा हुआ, क्योंकि माइक्रोग्रैविटी बैक्टीरिया की फिजियोलॉजी (शरीर क्रिया) और फेज-बैक्टीरिया के टकराव की भौतिकी को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए गुरुत्वाकर्षण की कमी से बैक्टीरिया की कोशिकाएं अलग-अलग तरीके से इकट्ठा होती हैं, जिससे फेज का लगाव (अटैचमेंट) मुश्किल हो जाता है।

आनुवंशिक उत्परिवर्तन 

अंतरिक्ष के फेज में ऐसे उत्परिवर्तन यानी म्यूटेशन्स जमा हुए, जो उनकी संक्रमण क्षमता या बैक्टीरियल संग्राहक यानी रिसेप्टर्स से चिपकने की ताकत बढ़ाते हैं। वहीं, बैक्टीरिया ने बचाव और अंतरिक्ष में जीवित रहने के नए आनुवंशिक बदलाव विकसित किए। डीप म्यूटेशनल स्कैनिंग तकनीक से पता चला कि फेज का रिसेप्टर बाइंडिंग प्रोटीन (आरबीपी) स्पेस में अलग तरीके से बदलता है।

नए रहस्य 

ये बदलाव पृथ्वी से अलग ‘ट्रेजेक्टरी’ (राह) पर होते हैं यानी स्पेस माइक्रोबियल इकोसिस्टम को नए तरीके से आकार देता है। उदाहरण के लिए स्पेस के फेज पृथ्वी पर दवा-प्रतिरोधी ई. कोलाई (जो यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन पैदा करते हैं) के खिलाफ ज्यादा प्रभावी साबित हुए। इससे पता चलता है कि माइक्रोग्रैविटी बैक्टीरिया-फेज की को-इवोल्यूशन (सह-विकास) को रीशेप करती है, जो सूक्ष्मजीवों के अनुकूलन के बुनियादी सिद्धांतों को चुनौती देती है। यह रिसर्च पहली बार आईएसएस पर फेज-बैक्टीरिया की लंबी अवधि की डायनामिक्स को ट्रैक करती है, जो पहले की जमीन आधारित सिमुलेशन्स से आगे जाती है।

अंतरिक्ष अन्वेक्षण में उपयोगिता

अंतरिक्ष अन्वेक्षण में सूक्ष्मजीव एक बड़ी चुनौती हैं, क्योंकि वे अंतरिक्ष यान (स्पेसक्राफ्ट) को दूषित कर सकते हैं और क्रू की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। यह रिसर्च इन रहस्यों से कई फायदे दे सकती है-

क्रू हेल्थ प्रोटेक्शन 

लॉन्ग-टर्म मिशन्स (जैसे मंगल यात्रा) में माइक्रोग्रैविटी बैक्टीरिया को ज्यादा विरुलेंट (खतरनाक) बना सकती है, लेकिन फेज उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं। अध्ययन दिखाता है कि स्पेस में फेज बैक्टीरिया के साथ अनुकूलित होकर नए बचाव तरीके ईजाद करते हैं, जो स्पेस में माइक्रोबियल कंट्रोल के लिए नए टूल्स दे सकता है। 

ग्रहीय सुरक्षा

स्पेस में सूक्ष्मजीवों के अनुकूलन को समझने से हम अन्य ग्रहों (जैसे मंगल) पर पृथ्वी के जीवों को फैलने से रोक सकते हैं। फेज रिसर्च से पता चलता है कि माइक्रोग्रैविटी बैक्टीरिया के जीनोम में बदलाव लाती है, जो स्पेसक्राफ्ट स्टरलाइजेशन के नए तरीके सुझा सकती है। भविष्य में यह ज्ञान हमारी ग्रहीय सुरक्षा (प्लैनेटरी प्रोटेक्शन) के काम आएगा।

भविष्य के मिशन 

नासा और ईएसए जैसे संगठन अंतरिक्ष में माइक्रोबायोलॉजी को समझने के लिए आईएसएस का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह रिसर्च अर्टेमिस या मंगल मिशन्स में क्रू को बैक्टीरियल संक्रमणों से बचाने के लिए फेज-आधारित थेरेपी विकसित करने में मदद करेगी। कुल मिलाकर, ये रहस्य अंतरिक्ष अन्वेक्षण को सुरक्षित और टिकाऊ बनाते हैं, क्योंकि सूक्ष्मजीव अंतरिक्ष में अप्रत्याशित तरीके से व्यवहार करते हैं।

मानव स्वास्थ्य के लिए उपयोगिता

पृथ्वी पर, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक वैश्विक संकट है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, 2050 तक इससे 10 मिलियन मौतें हो सकती हैं। यह शोध मानव स्वास्थ्य में क्रांति ला सकता है। आइए जानते हैं कैसे-

बेहतर फेज थेरेपी 

स्पेस में हुए म्यूटेशन्स से फेज को इंजीनियर करके दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया (जैसे एमडीआर ई. कोलाई) के खिलाफ ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है। अध्ययन में पाया गया कि अंतरिक्ष के फेज यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई) पैदा करने वाले स्ट्रेन्स को बेहतर तरीके से मारते हैं। इससे फेज थेरेपी को क्लिनिकल स्तर पर मजबूत किया जा सकता है, जो एंटीबायोटिक्स का विकल्प है।

नई अंतर्दृष्टि 

माइक्रोग्रैविटी बैक्टीरिया की प्रतिरक्षा (इम्यूनिटी) और फेज की इवोल्यूशन को अलग तरीके से प्रभावित करती है, जो पृथ्वी पर संक्रमणों के मॉडल्स को सुधार सकती है। 

व्यापक प्रभाव 

यह रिसर्च जैव चिकित्सा उन्नति को बढ़ावा देगी, जैसे कैंसर थेरेपी या वैक्सीन विकास में फेज का इस्तेमाल। शोधकर्ताओं का कहना है कि अंतरिक्ष-प्रेरित बदलावों से पृथ्वी पर ‘फार सुपीरियर एक्टिविटी’ वाले फेज बनाए जा सकते हैं। इससे अस्पतालों में सुपरबग्स से लड़ना आसान हो सकता है।

 

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