Gen Z की IQ में गिरावट: पहली बार माता-पिता से कम बुद्धिमान हो रही नई पीढ़ी- न्यूरोसाइंटिस्ट ने सीनेट में खोला राज

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
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नई दिल्ली: दशकों तक इंसानी बुद्धिमत्ता (IQ) में लगातार बढ़ोतरी होती रही है, जिसे 'फ्लिन इफेक्ट' के नाम से जाना जाता है। बेहतर शिक्षा, पोषण और चुनौतीपूर्ण माहौल ने हर पीढ़ी को पिछले से ज्यादा तेज दिमाग वाला बनाया। लेकिन अब यह ट्रेंड उलट गया है। न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जेरेड कूनी हॉरवाथ ने अमेरिकी सीनेट कमिटी के सामने खुलासा किया कि जेन Z (1997-2012 के बीच जन्मे युवा) पहली ऐसी पीढ़ी है, जिसका संज्ञानात्मक स्तर (cognitive performance) अपने माता-पिता (मिलेनियल्स) से कम है।

डॉ. हॉरवाथ, जो पूर्व शिक्षक और अब LME Global के डायरेक्टर हैं, ने जनवरी 2026 में सीनेट कमिटी ऑन कॉमर्स, साइंस एंड ट्रांसपोर्टेशन के सामने गवाही दी। उन्होंने 80 से ज्यादा देशों के डेटा (PISA, TIMSS, PIRLS जैसे अंतरराष्ट्रीय टेस्ट) का हवाला देते हुए बताया कि जेन Z ध्यान केंद्रित करने, याददाश्त, पढ़ाई, गणित, समस्या समाधान और सामान्य IQ में पिछड़ रही है। यह गिरावट 2010 के आसपास शुरू हुई, जब स्कूलों में डिजिटल टेक्नोलॉजी और एडटेक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल बढ़ा।

मुख्य कारण: स्क्रीन पर अत्यधिक निर्भरता  

डॉ. हॉरवाथ ने कहा कि मानव मस्तिष्क गहराई से पढ़ने, आमने-सामने बातचीत और लंबे फोकस से सीखने के लिए बना है, न कि छोटे-छोटे वीडियो, शॉर्ट फॉर्म कंटेंट या स्क्रीन-बेस्ड लर्निंग से। स्कूलों में टैबलेट, लैपटॉप और ऐप्स के बढ़ते उपयोग ने असल सीखने की प्रक्रिया को बाधित किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि जेन Z के युवा अपनी बौद्धिक क्षमता को लेकर जरूरत से ज्यादा कॉन्फिडेंट हैं, जबकि वास्तव में वे कमजोर पड़ रहे हैं।

कई देशों ने लिया एक्शन  

- स्वीडन ने स्कूलों से डिजिटल डिवाइस हटाकर वापस पेपर-बेस्ड पढ़ाई शुरू की।  

- फ्रांस, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन और फिनलैंड जैसे देश टैबलेट-लैपटॉप के इस्तेमाल को सीमित कर रहे हैं।  

- यूनेस्को की रिपोर्ट भी कहती है कि तकनीक तभी फायदेमंद है, जब वह सीखने में असल मदद करे, न कि उसकी जगह ले।

यह 'रिवर्स फ्लिन इफेक्ट' दुनिया भर में देखा जा रहा है। अमेरिका और ब्रिटेन में बच्चों के किताब पढ़ने के आंकड़े गिरे हैं, खासकर कोविड के बाद। लगातार स्क्रॉलिंग, सोशल मीडिया और शॉर्ट वीडियो से ध्यान भटकना, नींद प्रभावित होना और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ना आम हो गया है।

डॉ. हॉरवाथ का मानना है कि अगर स्कूलों में स्क्रीन-हैवी एजुकेशन जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियों का संज्ञानात्मक विकास और खतरे में पड़ सकता है। अब समय है कि शिक्षा में बैलेंस लाएं - टेक्नोलॉजी को टूल बनाएं, मास्टर नहीं।

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