Uttrakhand: लकड़ी के चूल्हे, तंदूर और बुक्खारी पर बन रहा कुमाऊंनी व्यंजन
हल्द्वानी, अमृत विचार। कुमाऊं के पर्यटन स्थलों में गैस सिलेंडर की कमी का असर अब होटल और रिजॉर्ट के किचन तक पहुंच गया है। व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति बाधित होने के बाद शीतला, मुक्तेश्वर और जागेश्वर के कई होटल-रिजॉर्ट संचालकों ने पारंपरिक देसी तरीकों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। अब यहां लकड़ी के चूल्हे, तंदूर और बुक्खारी पर खाना बनाया जा रहा है।
इस देसी अंदाज में रोटी, दाल, चावल के साथ-साथ कुमाऊंनी व्यंजन-भट्ट की चुटकानी, आलू के गुटके, मंडवे की रोटी और मटन करी तक तैयार किए जा रहे हैं। तंदूर में तंदूरी रोटी और चिकन भी बनाया जा रहा है, जबकि कुछ जगहों पर इंडक्शन का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। वेस्ट एशिया में चल रहे संकट के कारण देशभर में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कमी बताई जा रही है, जिसका असर होटल, रिजॉर्ट और रेस्टोरेंट कारोबार पर पड़ा है। कई रेस्टोरेंट में सिलेंडर नहीं मिलने के कारण ताले तक लग गए हैं।
दिल्ली से शीतला मुक्तेश्वर पहुंचे पर्यटक राजेश शर्मा का कहना है कि लकड़ी के चूल्हे और बुक्खारी में बना भोजन बेहद स्वादिष्ट होता है और सेहत के लिए भी अच्छा लगता है। हिमालयन ओजस्वी रिजॉर्ट के स्वामी नील अक्षय पांडे के अनुसार सिलेंडर नहीं मिलने की स्थिति में उन्होंने लकड़ी के चूल्हे और बुक्खारी का विकल्प अपनाया। इससे रिजॉर्ट का संचालन भी जारी है और पर्यटकों को पारंपरिक स्वाद भी मिल रहा है। उन्होंने बताया कि एक बुक्खारी की कीमत करीब 35 हजार रुपये तक होती है, जबकि छह किलोवाट का इंडक्शन करीब 16 हजार रुपये में मिल जाता है।
