Uttrakhand: फ्योंली, बुरांश की खुशबू संग घर की देहरी पर दस्तक बच्चों की दस्तक

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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हल्द्वानी, अमृत विचार। चैत्र मास की संक्रांति के साथ ही रविवार को देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों और मैदानों में लोक पर्व फूलदेई का त्योहार मनाया गया। बसंत के आगमन का स्वागत करते हुए नन्हे-मुन्ने बच्चों ने फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार के पारंपरिक गीतों के साथ हर घर की देहरी पर दस्तक दी।

फूलों की इस महक और बच्चों की मासूमियत ने पूरे वातावरण को उत्सव के रंग में सराबोर कर दिया। सुबह होते ही बच्चे अपनी रिंगाल की टोकरियों और थालियों में फ्योंली, बुरांश, बासिंग और सरसों के ताजे फूलों को लेकर घरों से निकल पड़े।

परंपरा के अनुसार, बच्चों ने गांव और मोहल्लों के हर घर की चौखट पर फूल बिखेरे और घर की सुख-समृद्धि की कामना की। इन पारम्परिक पंक्तियों फूलदेई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार, यो देली सौं बार नमस्कार के साथ बच्चों ने यह संदेश दिया कि प्रकृति और इंसान का रिश्ता अटूट है।

फूलदेई के इस पावन अवसर पर घर के बड़ों ने बच्चों का स्वागत तिलक लगाकर किया। पुरानी परंपरा को निभाते हुए हर घर से बच्चों को उपहार स्वरूप गुड़, चावल, सूजी, शक्कर और भेंट (पैसे) दिए गए। मान्यता है कि बच्चों के रूप में स्वयं देवतुल्य शक्तियां द्वार पर आती हैं।

शाम को इन्हीं एकत्रित किए गए चावलों और गुड़ से विशेष तौर पर ''''''''सई'''''''' (एक पारंपरिक पकवान) बनाया गया, जिसे प्रसाद के रूप में पूरे परिवार और आस-पड़ोस में बांटा जाता है। चैत्र के महीने में जब पहाड़ बुरांश की लाली और फ्योंली के पीले रंग से सज जाते हैं, तब यह पर्व आपसी प्रेम और सद्भाव की खुशबू फैलाता है।

 

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