युद्ध ने बढ़ाया संकट, मुसीबत में ऑटो सेक्टर
सप्लाई चेन में व्यवधान, दबाव में निर्यात लॉजिस्टिक्स और शिपिंग लागत में वृद्धि उत्पादन लागत बढ़ने का मंडराता खतरा
भारत में निर्मित होने वाली कारों के लिए मध्य पूर्व के देश एक बड़ा और प्रमुख बाजार है। लेकिन वहां लगी युद्ध की आग से कार निर्माता कंपनियां मुसीबत में आ गई हैं। असुरक्षा और बढ़े हुए बीमा शुल्क के कारण टाटा, मारुति और हुंडई जैसी कंपनियों को अपनी शिपमेंट रोकनी या टालनी पड़ रही हैं। हालांकि घरेलू बाजार में कारों की मांग पर अभी कोई असर नहीं पड़ा है, बीते माह यात्री और दोपहिया वाहनों की बिक्री में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है। लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतें और आर्थिक अनिश्चितता अगर बढ़ती है, तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि तमाम लोग नए वाहन खरीदने का फैसला टाल सकते हैं।
देश का ऑटोमोबाइल सेक्टर अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग से गंभीर दबाव में आ गया है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती सप्लाई चेन बनाए रखना और निर्यात की राह में खड़ी बाधाएं हैं। मध्य पूर्व देशों में तनाव और समुद्री रास्तों पर खतरे के कारण भारतीय ऑटो कंपनियों ने मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ देशों में गाड़ियों की शिपमेंट टाल दी हैं। कंपनियों को डर है कि युद्ध के कारण शिपिंग लागत बढ़ सकती है और सुरक्षा का जोखिम भी है। इसी तरह कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से उत्पादन लागत बढ़ना शुरू हो गई है। इनपुट लागत बढ़ने का असर घरेलू बाजार में कारों की कीमतों और ईवी की मांग पर पड़ सकता है।
भारतीय कारों व दो पहिया वाहनों के लिए बड़ा बाजार है मध्य पूर्व
मध्य पूर्व और नार्थ अफ्रीका के करीब 20 देशों का क्षेत्र, जिसे ‘मीना’ कहा जाता है, भारतीय कारों और दो पहिया वाहनों के लिए अहम बाजार है। ऐसे में वैश्विक तनाव से भारतीय ऑटो कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चिंता इन देशों को होने वाले निर्यात तथा माल ढुलाई की लागत बढ़ने को लेकर है। हुंडई इंडिया अपने कुल उत्पादन का लगभग 21 फीसदी इन्हीं देशों को निर्यात करती है। टाटा मोटर्स का भी सबसे ज्यादा कारोबार यहां है। अशोक लेलैंड अपने निर्यात का 35 फीसदी इन देशों को भेजती है, तो बजाज ऑटो भी 15 फीसदी तक निर्यात मध्य पूर्व और नॉर्थ अफ्रीका देशों को करता है। जाहिर है, इस स्थिति में युद्ध लंबा खिंचने से जिन कंपनियों का मध्य पूर्व और नॉर्थ अफ्रीका क्षेत्र में ज्यादा निर्यात है, उनकी बिक्री पर तो सीधा असर पड़ेगा, लेकिन बाकी कंपनियों को भी माल ढुलाई दरें और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से कच्चे माल की लागत बढ़ने का असर झेलना पड़ेगा।
टोयोटा, हुंडई और मारुति ने पिछले, साल किया करोड़ों डॉलर का निर्यात
सीमा शुल्क के आंकड़ों के अनुसार भारत से साल 2025 में 8.8 बिलियन डॉलर मूल्य की कारों का वैश्विक निर्यात किया गया था, जिसका एक चौथाई हिस्सा सिर्फ मध्य पूर्व के देशों के लिए था। टोयोटा ने पिछले साल 47 करोड़ डॉलर का निर्यात किया, जिसमें 30 करोड़ डॉलर की कीमत की कारें सिर्फ मध्य पूर्व के देशों में भेजी गई थीं। इसी तरह हुंडई मोटर ने करीब 75 करोड़ डॉलर का निर्यात खाड़ी देशों को किया था, जबकि मारुति सुजुकी की मिडिल ईस्ट के निर्यात में हिस्सेदारी करीब 45 करोड़ डॉलर थी।
वाहन पुर्जा उद्योग भी मौजूदा, हालात को लेकर परेशान
वाहन पुर्जा उद्योग ने चेताया है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष और लाल सागर में जहाजों के मार्ग में बाधाओं के कारण निर्यात की लॉजिस्टिक लागत बढ़ रही है, खेप भेजने में में देरी हो रही है तथा महत्त्वपूर्ण कच्चे माल का आयात बाधित हो रहा है। इसके साथ ही उत्पादन के लिए जरूरी एलपीजी और पीएनजी की उपलब्धता को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं। ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष विक्रमपति सिंघानिया का कहना है कि निर्यात के उत्पादन से जुड़े प्रमुख इनपुट का निर्यात और आयात दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं।
टायर उद्योग को सता रहा महंगाई की मार का खतरा
मौजूदा संघर्ष से देश के टायर उद्योग की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। सप्लाई चेन पर दबाव आ सकता है। वाहन टायर निर्माताओं के संगठन (एटमा) ने केंद्र सरकार को बताया है कि भारत से पश्चिम एशिया को सालाना लगभग 25-26 करोड़ डॉलर के टायरों का निर्यात होता है। होर्मुज स्ट्रेट और स्वेज नहर सहित प्रमुख समुद्री मार्गों में अस्थिरता यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका को होने वाली खेपों को प्रभावित कर सकती है, जिससे माल भेजने में देरी और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। टायर बनाने में कच्चे माल की लागत का 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा कच्चे तेल से जुड़ा होता है। सिंथेटिक रबर, कार्बन ब्लैक, प्रोसेसिंग ऑयल और टायर कॉर्ड फैब्रिक जैसे मुख्य इनपुट कच्चे तेल से ही आते हैं।
