Bareilly: गांव की गलियों से पहले ''ट्रांसफर आर्डर'' जान गए सचिव

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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बरेली, अमृ़त विचार। जनपद में बार-बार सचिवों के तबादलों ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर जहां फाइलों को निपटाने की रफ्तार दोगुनी होनी चाहिए, वहां सचिवों के तबादलों ने पूरी व्यवस्था को पटरी से उतार दिया है। शासन की स्पष्ट नीति है कि विषम परिस्थिति को छोड़कर केवल अप्रैल से जून माह के स्थानांतरण सत्र में होंगे और वह भी कुल संख्या के मात्र दस प्रतिशत तक सीमित रहेंगे। लेकिन, यहां शासन की नीति को दरकिनार कर अधिकारियों की अपनी ही ''विशेष नीति'' चलती दिखाई दे रही है। बीते 10 मार्च को हुए नौ ग्राम विकास अधिकारियों और दो ग्राम पंचायत अधिकारियों के स्थानांतरण ने इस चर्चा को और हवा दे दी है।

सचिव बताते हैं कि एक साल में तीन से चार बार ट्रांसफर किए जा चुके हैं। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि नया सचिव जब तक गांव की गलियों और वहां की बुनियादी समस्याओं को समझने की कोशिश करता है, तब तक उसके हाथ में रवानगी का आदेश थमा दिया जाता है। इस अदला-बदली के खेल में मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजनाएं और ग्रामीणों की छोटी-बड़ी समस्याएं कागजों में ही दफन होकर रह गई हैं। 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तबादलों की आंधी में वरिष्ठता को भी दरकिनार कर दिया गया है। जानकारों का कहना है कि कुछ दिन पहले कुछ ब्लॉकों में अनुभवी और वरिष्ठ सचिवों को छोड़कर चहेते जूनियरों सचिवों को मलाईदार गांव का प्रभार दिया गया, जो सीधे तौर पर नियमों की धज्जियां उड़ाने जैसा है। इधर, बीते एक साल का लेखा-जोखा देखें तो ग्राम विकास अधिकारियों के तबादलों की संख्या सबसे अधिक रही है, जबकि ग्राम पंचायत अधिकारियों पर मेहरबानी बरकरार है। इस भेदभावपूर्ण रवैये से सचिवों में गहरा असंतोष व्याप्त है। फिलहाल, वित्तीय वर्ष के समापन माह में हुए तबादलों ने विभाग के माहौल को गर्मा दिया है।

यह है तबादलों के पीछे की त्रिस्तरीय व्यवस्था
सूत्रों की मानें तो इन तबादलों के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण सक्रिय हैं। पहला, स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दबाव, जिनके इशारे पर अधिकारी सचिवों की कुर्सियां बदलते हैं। दूसरा, खुद सचिवों की साठगांठ, जो मलाईदार पंचायतों में जाने के लिए जोड़-जुगाड़ बिठाते हैं। तीसरा कारण शिकायतों के आधार पर की जाने वाली कार्रवाई है।

तबादलों के खेल में पुरानी ''''परंपरा'''' का निर्वाह
जनपद में सचिवों के तबादलों का यह खेल कोई नया नहीं है, बल्कि यह उस पुरानी परंपरा का हिस्सा है जो पूर्व डीडीओ अरुण कुमार के दौर में भी परवान चढ़ी थी। उस वक्त प्रशासनिक अराजकता इस कदर बढ़ गई थी कि तत्कालीन सीडीओ जगप्रवेश को हस्तक्षेप कर ''''बिना अनुमोदन ट्रांसफर'''' पर हंटर चलाना पड़ा था। आज फिर वही इतिहास खुद को दोहरा रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अफसर बदल सकते हैं, लेकिन मर्जी से सिस्टम को हांकने की रवैया आज भी जस की तस है।


 जिला विकास अधिकारी दिनेश यादव ने बताया कि सचिवों के ये फेरबदल मनमाने नहीं, बल्कि उच्चाधिकारियों के अनुमोदन और ग्राम पंचायतों की आवश्यकतानुसार किए गए हैं। स्थानांतरण नीति की नियमावली में ऐसा कहीं उल्लेख नहीं है कि विशेष परिस्थितियों या कार्यहित में बीच सत्र में सचिवों का तबादला नहीं किया जा सकता। सचिवों का तबादला प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है ताकि विकास कार्यों में सुगमता बनी रहे।

जिला पंचायत राज अधिकारी कमल किशोर ने बताया कि विभाग में तबादले पूरी तरह शुचिता और नियमों के अधीन हैं। हालिया दो तबादले गंभीर शिकायतों की पुष्टि के बाद सुधारात्मक कदम के रूप में उठाए गए थे। पूरे वर्ष में केवल 4-5 सचिवों पर ही अनुशासनात्मक कार्रवाई के तहत गाज गिरी है, जबकि शेष फेरबदल पिछले स्थानांतरण सत्र में नियमानुसार ही संपन्न हुए थे।

 

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