अनोखी परंपरा... हैदराबाद की शाम : रूहानियत, खुशबू और सुकून का संगम

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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आधुनिकता की चमक-दमक और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच भी हैदराबाद का पुराना शहर अपनी परंपराओं को संजोए हुए है। यहां की तंग गलियों और ऐतिहासिक हवेलियों में आज भी एक पुरानी रस्म जीवित है, जो हर शाम मगरिब की अजान के साथ निभाई जाती है। यह परंपरा है घर के दरवाजे खोलना और लोबान या अगरबत्ती की खुशबू से पूरे वातावरण को महकाना। जैसे ही मगरिब की अजान की आवाज गूंजती है, पुराने शहर में एक खास तरह की शांति छा जाती है। दिनभर की हलचल मानो थम जाती है और घरों में एक अलग ही माहौल बन जाता है। इस समय घर की महिलाएं या बुजुर्ग खिड़कियां और मुख्य द्वार खोल देते हैं। साथ ही, मिट्टी के धुएंदान में सुलगते कोयलों पर लोबान डाला जाता है या अगरबत्ती जलाई जाती है, जिससे उठने वाला सुगंधित धुआं पूरे घर को एक रूहानी एहसास से भर देता है।

स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा और सुकून लाने का माध्यम है। कुछ लोगों का मानना है कि दिन और रात के संधिकाल में वातावरण में एक विशेष परिवर्तन होता है, जिसे शुभ माना जाता है। इसी कारण खुले दरवाजे उस सकारात्मकता के स्वागत का प्रतीक माने जाते हैं। हालांकि इसका कोई ठोस धार्मिक आधार नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक विश्वास और जीवनशैली का हिस्सा है। यह प्रथा केवल हैदराबाद तक सीमित नहीं है। भारत के कई हिस्सों में शाम के समय अगरबत्ती जलाना या दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे शांति और सकारात्मकता से जोड़ा जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यह रिवायत गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी पेश करती है। जिस समय मुस्लिम परिवारों में लोबान जलाया जाता है, उसी समय हिंदू परिवारों में संध्या के दौरान दीप जलाकर पूजा की जाती है। दोनों ही परंपराओं में शाम का समय पवित्र और शुभ माना गया है।

   हालांकि इस्लामी मान्यताओं के अनुसार मगरिब के समय दरवाजे बंद रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसे संवेदनशील समय माना गया है। ऐसे में दरवाजे खोलने की यह परंपरा अधिकतर सांस्कृतिक रूप में प्रचलित है। इस रस्म के पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं। लोबान का धुआं वातावरण को शुद्ध करने और कीटाणुओं व मच्छरों को दूर रखने में सहायक माना जाता है। वहीं, दरवाजे और खिड़कियां खोलने से घर में ताजी हवा का प्रवाह होता है, जिससे दिनभर की घुटन कम हो जाती है। हैदराबाद की यह परंपरा न केवल सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है, बल्कि जीवन में सुकून और संतुलन का संदेश भी देती है।