शालू के मालिनी अवस्थी में बदलने का सफर
भारतेंदु नाट्य अकादमी के स्वर्ण जयंती समारोह में एक शाम मालिनी अवस्थी के नाम से भी सजी। खचाखच भरे राज बिसारिया प्रेक्षागृह में प्रख्यात लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अभिनय, नृत्य और गायिकी में गुंथी जिंदगी के सफर की स्क्रिप्ट को इस अंदाज में पेश किया कि देखने वाले ठगे से रह गए। मालिनी अवस्थी ने अपने इस दो घंटे के शो में यह साबित किया कि जिंदगी में कोई बड़ा मुकाम हासिल करने के पीछे न जाने कितने बरसों की जद्दोजहद होती है। एक बड़े परिवार में जन्म लेने या बड़े परिवार में शादी हो जाने से मंच तो हासिल हो सकते हैं, लेकिन उन मंचों पर टिके रहने के लिए लगातार कई बरस तक किए गए संघर्ष और अच्छे उस्तादों से हासिल की गई शिक्षा ही काम आती है।
शबाहत हुसैन विजेता/ कला साधना के दौरान उस्ताद राहत अली खान न मिले होते, उस्ताद नगीना साहब का आशीर्वाद न मिला होता, गिरिजा देवी जैसी गुरु न मिली होतीं, तो कन्नौज के एक डॉक्टर के घर जन्मी शालू आईएएस अफसर अवनीश अवस्थी से शादी होकर भी शालू ही रह जातीं, मालिनी अवस्थी न बन पातीं। उन्हें ऐसे उस्ताद मिले, जिन्होंने कहा कि गजल सीखनी है, तो शीन काफ दुरुस्त होना चाहिए। वो सवाल उठाती हैं कि कहां हैं ऐसे उस्ताद जो शागिर्द की डायरी पर गजल लिखकर दें। वो बताती हैं कि ईसाई स्कूल में पढ़ीं, घर में उस्ताद आते थे मुसलमान। गोरखपुर में रहकर संस्कृत सीखी। संस्कृत बीए तक साथ रही। उन्होंने माना कि अनुभव, जज्बात और किस्से कहानियों में भी शिक्षा होती है।

पिता मुख्य चिकित्सा अधीक्षक थे, उस्ताद राहत अली खां से उनके दोस्ताना रिश्ते थे, उन्होंने कहा कि मेरी बेटी को भी सिखा दें, एक दिन वो घर आए भी सिखाने, सबक भी दे गए, लेकिन तीन महीने तक वो लौटे नहीं और शालू वही सबक तीन महीने तक दोहराती रही। उनकी मां ने समझाया कि प्यासे के पास कुआं नहीं आता, प्यासे को जाना पड़ता है कुएं के पास। मां गाडी चलाकर रोज बेटी को ले जातीं राहत अली खां के घर। वो भजन गाते तो लगता मंदिर में बैठे हैं। राम के भजन ऐसे सुनाते वैसे क्या कोई राम भक्त सुनाएगा।
एक तरफ संगीत की शिक्षा चल रही थी, तो दूसरी तरफ मां-बाप को कभी कहना नहीं पड़ा कि पढ़ लो। पढ़ाई ऐसी कि पूरी क्लास में अव्वल आती थीं। लाइट अक्सर गायब हो जाती थी, तो कुप्पी में बैठकर पढ़ाई करती थीं। स्कूली शिक्षा और संगीत ट्रेन के ट्रैक की तरह साथ-साथ चले एक जैसी रफ्तार में। पिता का लखनऊ ट्रांसफर हो गया, तो भातखंडे में तालीम ली, रवींद्रालय में पहली बार गाया, तब धर्मनाथ मिश्र ने हारमोनियम पर संगत की, आज भी वही करते हैं। लखनऊ से हर शनिवार-रविवार गोरखपुर जाकर राहत अली खां से सीखने का क्रम चलता रहा। उस्ताद राहत अली लखनऊ में कार्यक्रम में आए तो उन्होंने अपने कार्यक्रम में शिष्या मालिनी से गवाया। वो उन्हें उस्ताद नगीना साहब का आशीर्वाद दिलाने ले गए।
बड़ीं हुईं तो घर वालों को चिंता हुई कि गाती है, देशभर में कार्यक्रम करने जाती है, शादी कैसे होगी? हालांकि मां हर जगह साथ में जाती थीं, लेकिन उन्हें कैंसर हो गया था। किसी ने कहा कि पड़ोस वाले अवस्थी जी का लड़का आईआईटी में पढ़ रहा है। उनसे बात चलाओ। बात हुई और मारुती वैन में सवार होकर अवस्थी परिवार मालिनी के घर पहुंच गया। उन्हें भातखंडे में क्लास से बुलाकर घर भेजा गया।

अवनीश अवस्थी से हुई शादी
मुलाकात के बाद अवनीश अवस्थी अपने ममेरे भाई के साथ मालिनी से मुलाकात करने आए। रिश्ता पक्का हो गया। उन्होंने कहा कि मेरी और मालिनी की पढ़ाई पूरी हो जाए तब शादी होगी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हुई, तो अवनीश सिविल सर्विस की तैयारी करने लगे। वो आईएएस में सिलेक्ट हुए, सेलेक्शन के बाद अवनीश ने कहा-“सेवा के भाव से आईएएस में जा रहा हूं। हो सकता है तुम्हें वो सुख न दे पाऊं, जो आईएएस की पत्नियों को मिलता है।” मालिनी ने कहा- “तुम सबसे सम्मान से मिलना, फिर इसके बाद शादी हो गई।”
शादी से पहले के दो साल दोनों ने एक दूसरे को खूब चिट्ठियां लिखीं। चिट्ठियां इसलिए लिखीं, क्योंकि पहले महीने इतनी बात की कि 42 हजार रुपये का बिल आ गया। दूसरे महीने भी ऐसा ही होता, तो परिवार जान जाता कि दोनों हरदम बतियाते हैं। शादी के बाद लोगों को लगता था कि आईएएस की पत्नी है इसलिए कार्यक्रम मिलते हैं। लोगों की यह सोच ऐसी चुभी कि घर में ही घुसी रह गईं। अपने दोनों बच्चों के पालन-पोषण में लग गईं। वो कहती हैं कि जीवन आनंद से भरा था, लेकिन अवनीश के पास समय नहीं था, मेरी स्थिति चांद तन्हा है आसमां तन्हा... और शाम वादा था ढल गया सारा... जैसी स्थिति हो गई। प्यार करने वाला पति, दो-दो बच्चों से भरी गोद, फिर भी बहुत कुछ खो गया था। गाना छूट गया था। पिताजी ने आकाशवाणी से बात की फिर से गाने की शुरुआत हुई।
संगीत की दुनिया में शुरू की दूसरी पारी
जो स्लेट कोरी हो गई थी, उसे फिर से लिखने के लिए संवारा, संगीत की दुनिया में फिर से घुटनियों चलना शुरू किया। फिर से आकाशवाणी में काम मिलने लगा। संस्कृति विभाग कार्यक्रम देने लगा। अवनीश जब ललितपुर में डीएम थे, तो असगरी बाई से मिलने कालपी गई थीं। असगरी बाई ने समझाया था कि गाती थीं तो गाती रहो।
लंदन में अंत्याक्षरी के शो ने बदल दिए दिन
टेलीविजन पर गजेन्द्र सिंह अंत्याक्षरी का संचालन कर रहे थे। उन्होंने बुलाया। लंदन में शो हुआ, तो मालिनी अवस्थी और भोजपुरी गायक बालेश्वर ने समां बांध दिया। इसके बाद पीछे मुड़कर देखने का मौका नहीं मिला।
सुपरहिट शो और पद्मश्री जैसे सम्मान
रेलिया बैरिन पिया को लिए जाए रे जैसे गीतों के जरिए मालिनी ने तमाम सुपरहिट शो दिए। उनकी कला साधना ने उन्हें पद्मश्री से पहले यशभारती सम्मान, कालिदास सम्मान और अवध सम्मान दिलाए। उनकी साधना ने उन्हें ऐसी पहचान दी कि पति अपर मुख्य सचिव रहे हों या मौजूदा समय में मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं, लेकिन यह आरोप नहीं लगता कि बड़े अफसर की बीवी हैं, इसलिए सफल हैं, जिसने उनके सुपरहिट शो देखे हैं वो जानता है कि यह सफलता सिफारिश वाली नहीं जबरदस्त रियाज वाली है।
