संपादकीय:दूरगामी विधायी पहल

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Published By Monis Khan
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संसद में पेश किए जा रहे तीन अहम विधेयक— विशेषकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम, परिसीमन से जुड़े प्रावधान और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रतिनिधित्व संशोधन, सिर्फ विधायी पहल नहीं, बल्कि आने वाले दशक की भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाले अत्यंत निर्णायक कदम हैं। इनकी महत्ता जितनी व्यापक है, विवाद भी उतना ही गहरा है।

इसके लिए राज्यों में चुनावों के बीच अचानक बुलाए विशेष सत्र की ‘हड़बड़ी’ पर विपक्ष सवाल उठाते हुए इसे असामान्य और चुनावी नैरेटिव सेट करने की रणनीति के रूप में देख रहा है। महिला आरक्षण जैसे लोकप्रिय और नैतिक रूप से अजेय मुद्दे को केंद्र में रखकर सत्ता पक्ष द्वारा राजनीतिक बढ़त लेना कहीं से अनुचित नहीं, ऐसे में विपक्ष द्वारा इसे ‘टाइमिंग की राजनीति’ कहकर सवाल उठाना बहुत तार्किक नहीं लगता। 


महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रस्ताव, लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसद सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना, सैद्धांतिक रूप से सर्वसम्मति का विषय है, पर इसके लागू होने को ताजा जनगणना और परिसीमन से जोड़ देना इसे विवादास्पद बनाता है। विपक्ष का आरोप है कि यह शर्त आरक्षण को अनिश्चितकाल तक टालने का माध्यम बन सकती है। प्रस्ताव में ताजा जनगणना का आशय 2011 की जनगणना से लिया जा रहा है, इसे आधार बना कर महिला आरक्षण को लागू करना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि पिछले 15 वर्षों में जनसंख्या, शहरीकरण और सामाजिक संरचना में भारी बदलाव आया है।

बेहतर विकल्प यही प्रतीत होता है कि 2027 के आसपास नई जनगणना के बाद परिसीमन हो जाने के बाद इस आरक्षण को लागू किया जाए, लेकिन इससे सरकार के लिए तत्काल राजनीतिक लाभ की संभावना समाप्त हो जाती है। महिला आरक्षण को बिना परिसीमन समाप्त हुए अगले चुनाव से भी लागू किया जा सकता है, सही है कि इससे सीटों के रोटेशन और प्रतिनिधित्व में असमानता के प्रश्न खड़े होंगे फिर भी, इसे अंतरिम व्यवस्था के रूप में तो अपनाया ही जा सकता है, जिसकी उम्मीद नहीं है।

आरक्षण के बाद संसद में महिलाओं की संख्या 283 तक पहुंचने से भारतीय लोकतंत्र में ऐतिहासिक बदलाव होगा। नीति-निर्माण में लैंगिक दृष्टिकोण मजबूत होगा, विशेषकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में, लेकिन केवल सीटें बढ़ाने से महिलाओं की समस्याएं हल नहीं होंगी। राजनीतिक सशक्तीकरण के साथ सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण भी जरूरी है। पंचायत स्तर पर आरक्षण के अनुभव बताते हैं कि वास्तविक प्रभाव तब आता है, जब महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता और संसाधन मिलते हैं। 


फिलहाल इस विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को व्यापक समर्थन जुटाना होगा। संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। महिला आरक्षण के नैतिक दबाव के कारण विपक्ष के लिए खुला विरोध करना कठिन है, इसलिए इस विधेयक का पारित होना संभव दिखता है, भले ही उसके क्रियान्वयन की समय सीमा पर अस्पष्टता बनी रहे।

महिला आरक्षण भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में ऐतिहासिक अवश्य है, परंतु इसे परिसीमन और जनगणना से जोड़ना इसकी समय सीमा को अनिश्चित बना देगा और यह पहल त्वरित और प्रभावी क्रियान्वयन तक शीघ्र नहीं पहुंच सकेगी और इसके दीर्घकालिक वादा बने रहने का संशय बरकरार रहेगा।