संपादकीय: बिहार में नई धुरी
बिहार की सत्ता में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनना महज कुर्सी पर चेहरे का नहीं, बल्कि राजनीतिक शैली और सामाजिक समीकरणों में संभावित बदलाव का संकेत है। सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने ‘स्थिरता के साथ परिवर्तन’ का संदेश दिया है। यानी कुछ राज्यों में प्रयोगधर्मी चौंकाऊ चेहरा देने के बजाय एक परिचित, संगठन-सिद्ध नेता पर भरोसा।
मध्य प्रदेश, हरियाणा या राजस्थान की तरह ‘सरप्राइज फैक्टर’ से परहेज़ के पीछे स्पष्ट कारण हैं। बिहार की राजनीति अत्यंत जटिल जातीय-सामाजिक संतुलनों पर टिकी है, जहां अचानक चेहरा बदलना जोखिम भरा हो सकता था। भाजपा ने यहां क्रमिक उभार और स्वीकार्यता को प्राथमिकता दी। सम्राट चौधरी पहले से प्रदेश संगठन, सत्ता और प्रशासन- तीनों का अनुभव रखते हैं; इसलिए वे संक्रमण काल में भरोसेमंद विकल्प बने।
सम्राट चौधरी की नियुक्ति के पीछे सियासी गणित साफ है, वे ओबीसी- विशेषकर कुशवाहा, कोइरी समुदाय से आते हैं, वहां उनका प्रभाव बिहार के सामाजिक समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाता है। इससे भाजपा का न केवल पारंपरिक मतदाता आधार मजबूत होता है, बल्कि जदयू और राजद के बीच ‘मंडल बनाम कमंडल’ की पुरानी बहस में एक नया संतुलन भी सधता है। उनको पहले डिप्टी सीएम और फिर मुख्यमंत्री बनाकर संगठन को संदेश दिया है कि निरंतरता और प्रदर्शन के आधार पर शीर्ष पद शीघ्र हासिल किया जा सकता है।
सम्राट चौधरी का रिकॉर्ड बताता है कि वे विभिन्न दलों में रहते हुए भी शासन-तंत्र से परिचित रहे हैं। यही उनकी ताकत और चुनौती दोनों है। ताकत इसलिए कि उन्हें सिस्टम की समझ है; चुनौती इसलिए कि उन्हें ‘स्थायी प्रतिबद्धता’ और ‘नीतिगत स्पष्टता’ साबित करनी होगी, जो नीतीश कुमार की पहचान रही है। बेहतर शासन का दावा तभी टिकेगा, जब वे कानून-व्यवस्था, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर ठोस परिणाम दें। सम्राट की राजनीतिक यात्रा विभिन्न दलों में मंत्री रहने से लेकर भाजपा में नौ वर्षों में मुख्यमंत्री बनने तक यह दिखाती है कि वे अवसर और संगठन दोनों को साधने में दक्ष हैं।
उनकी पारिवारिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि ने शुरुआती पहचान जरूर दी, परंतु मौजूदा मुकाम तक पहुंचने में संगठनात्मक सक्रियता और आक्रामक राजनीति की भूमिका भी कम नहीं रही, हालांकि नए मुख्यमंत्री के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। बेरोजगारी, प्रवासन, शिक्षा-स्वास्थ्य का ढांचा और कानून-व्यवस्था- ये सभी मुद्दे बिहार के मतदाता की प्राथमिकता में हैं। साथ ही, केंद्र-राज्य तालमेल का लाभ उठाकर निवेश आकर्षित करना भी एक बड़ी परीक्षा होगी।
इस बदलाव के बाद जदयू स्वाभाविक रूप से सीमित होती दिखेगी, जबकि राजद आक्रामक विपक्ष की भूमिका में लौटेगी। सामाजिक न्याय और आर्थिक असमानता के मुद्दों को तेज करेगी। आने वाले समय में त्रिकोणीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तीखी हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर यह फैसला भाजपा के ‘क्षेत्रीय अनुकूलन’ की रणनीति को रेखांकित करता है, जहां पार्टी स्थानीय नेतृत्व को आगे कर राज्य की जटिलताओं के अनुरूप अपने को ढाल रही है। बिहार में यह परिवर्तन एक नई धुरी का निर्माण है, जहां अनुभव और सामाजिक संतुलन के सहारे भाजपा ने सत्ता का केंद्र अपने हाथ में लिया है। अब असली परीक्षा वादों की नहीं, परिणामों की है; वही तय करेगा कि यह बदलाव कितना स्थायी होगा।
